गुरुवार, 26 सितंबर 2019

गीतिका छंद

गीतिका छंद-( छंद हूँ बस छंद हूँ मैं,)

छंद दोहा शांति का मैं, सोरठा हूँ क्रोध का।
भावना हूँ मीत रोला, गीतिका सच शोध का।।
दर्द जन हरिगीतिका हूँ, कुंडली मैं ज्ञान का।
छंद शंकर काल हूँ मैं, शान छप्पय मान का।।

छंद चौपाई दया मैं, चौपई में गीत हूँ।
विष्णु पद हूँ प्रेम का मैं, छंद आल्हा जीत हूँ।।
छंद शोभन रूप हूँ मैं, रूपमाला धर्म का।
शक्ति हूँ सुन वीर का मैं, हूँ त्रिभंगी कर्म का।।

सार हूँ अल्लाह का मैं, छंद बरवै राम का।
मैं कुकुभ प्रभु ईश का हूँ, मैं अमृत सतनाम का।
भाव उल्लाला कृपा मैं, दीप सरसी छंद हूँ।
हे विधाता ज्ञान देना, बुद्धि कज्जल मंद हूँ।।

हूँ पकैया छन्न मोहन, राधिका का प्यार हूँ।
छंद हूँ ताटंक माया, कामरुप संसार हूँ।।
भूल माफी माँगता हूँ, जोड़ दोनों हाथ को।
छंद हूँ बस छंद हूँ मैं, छंदछोड़ना मत साथ को।।

रचना- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर,जिला- बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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