दोहा छंद-
गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर।
अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।01
गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम।
तोर कृपा ले हे मिले, मोला जग मा नाम।।02
देहू शुभ आशीष गुरु, अरजी हे कर जोर।
मन के श्रद्धा फूल हा, अर्पित हे पग तोर।।03
गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावँव माथ।
देवत शुभ आशीष ला, थामे रखहू हाथ।।04
तन मन सब बलिहार हे, गुरु चरनन मा मोर।
करहू पूरन काज सब, अरजी हे कर जोर।।05
रखौ हाथ गुरु माथ मा, आशिष दौ घनघोर।
रोज नवावँव माथ मँय, पावन पग मा तोर।।06
जिनगी के हर साँस मा, लेवँव गुरु के नाम।
भटका झन खावँव कभू, लेहू गुरु जी थाम।।07
बरगद पीपर पेड़ कस, गुरु हा देथे छाँव।
अंतस ला शीतल करै, गुरु के पावन पाँव।।08
धर ले श्री गुरु के शरण, मिलही उँहे मुड़ाव।
गुरु बर पीपर छाँव कस, देही हृदय जुड़ाव।।09
गुरु सागर के सीप अउ, पावन गंगा नीर।
कर लौ जिनगी ला सफल, आवव गुरु के तीर।।10
दीया बन गुरु ज्ञान के, अंतस करय अँजोर।
जिनगी मा गुरु के बिना, नइ होवय सुख भोर।।11
दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय जग ला ज्ञान।
भेद नहीं मन मा रखय, मानय एक समान।।12
गावँव गुरु गुनगान ला, नित अंतस धर ध्यान।
गुरु किरपा ले हे मिले, नाम मान पहिचान।।13
गुरु के पावन पाँव के, बन जावँव मँय दास।
करौं भक्ति अरदास मँय, जब तक तन मा साँस।।14
नइ होवय गुरु के बिना, जिनगी के उद्धार।
बनके खेवनहार गुरु, नाव लगावय पार।।15
गुरुवर तरुवर ज्ञान के, देथे शीतल छाँव।
जिनगी होथे धन्य जी, पाके पावन पाँव।।16
जिनगी के हर साँस हा, गुरु पग मा बलिहार।
राहय मुड़ मा हाथ गुरु, विनय करौ स्वीकार।।17
बनके ज्ञान प्रकाश गुरु, उजियारी बगराय।
जिनगी के उद्धार बर, सत मारग दिखलाय।।18
आखर-आखर भाव भर, गावँव गुरु गुनगान।
चलत रहय ये लेखनी, महिमा करत बखान।।19
बलिहारी गुरु के चरण, परँव नवाँ मँय माथ।
जिनगी के हर मोड़ मा, थामे रखिहव हाथ।।20
दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय सब ला ज्ञान।
गजानंद याचक बने, माँगय सुख वरदान।।21
श्रद्धा के पर्याय गुरु, निष्ठा के प्रतिमान।
रख समानता भावना, देथे सब ला ज्ञान।।22
लँगड़ा पर्वत लाँघथे, गूँगा पाय जुबान।
पंडित पोथी बाचथे, पाके गुरु ले ज्ञान।।23
भरथे गुण संस्कार गुरु, करथे दूर विकार।
जोत जलाथे ज्ञान के, हरथे मन अँधियार।।24
आथें गुरु दरबार मा, लोग अमीर गरीब।
पर पाथें सत ज्ञान ला, जेखर बड़े नसीब।।25
गुरु बरगद कस पेड़ बन, देथे शीतल छाँव।
कर लौ जिनगी धन्य सब, पाके पावन पाँव।।26
गढ़ अनपढ़ इंसान ला, गुरुवर ज्ञान लखाय।
सिरजै कुम्हार कस घड़ा, अंतस ला चमकाय।।27
गुरु महिमा गुनगान कर, होही बेड़ापार।
ये जिनगी गुरु के बिना, हवय कुलुप अँधियार।।28
बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।
बात गजानन ध्यान दौ, कर लौ गुरु गुनगान।।29
जिनगी मा गुरु ज्ञान बिन, नइहे कुछ अस्तित्व।
भव सागर ले पार बर, गुरु के समझ महत्व।।30
मनखे माटी के घड़ा, गुरुवर चाक कुम्हार।
जिनगी ला गुरु हे गढ़े, दिए ज्ञान उपकार।।31
गजानंद गुरु जौहरी, पारस ज्ञान समान।
सोना लोहा के करय, गुरु तुरते पहिचान।।32
गुरु अवगुण ला मेटथे, काटे भ्रम भय जाल।
सत रस्ता हम ला चला, ऊँच करावय भाल।।33
गुरु गीता गुरु बाइबिल, गुरु गुरुग्रंथ कुरान।
गुरु पग चारो धाम हे, गुरु सउँहत भगवान।।34
जिनगी मा गुरु के शरण, रहिथे जेन करीब।
वो मनखे राहय नहीं, अनपढ़ ज्ञान गरीब।।35
गुरु हरथे अभिमान ला, गुरु भरथे सद्ज्ञान।
गुरु पूजा मन से करौ, मिल जाही भगवान।।36
गुरु के दरजा हे सुनव, माता पिता समान।
मिले नहीं गुरु के बिना, सत्यबोध सद्ज्ञान।।37
तोर भरोसा हे खड़े, नइया हा मझधार।
बनके गुरु पतवार तँय, कर दे बेड़ापार।।38
करम धरम के सत मरम, गुरु देवय संदेश।
मानौ गुरु के सीख ला, पाहू सुख परिवेश।।39
गुरु काबा कैलाश अउ, गुरु हे चारो धाम।
गुरु मंदिर मस्जिद घलो, गुरु रहीम अउ राम।।40
पहला गुरु माता-पिता, दिये जन्म संस्कार।
दूजा गुरु शिक्षा दिये, ज्ञान जोत ला बार।।41
गुरु के ज्ञान अथाह हे, समझें नइ नादान।
गुरु गोविंद समान हे, कइसे करौं बखान।।42
जग मा शब्द अनंत गुरु, जानँय बिरला लोग।
गुरु महिमा गाये बिना, मिलय नहीं सुख जोग।।43
दीपक बन गुरु ज्ञान के, उजियारी बगराय।
मारग सत्य असत्य के, परख करे सिखलाय।।44
लाख कीमती धन भला, पर गुरु मोर अमोल।
जग मा गुरु के ज्ञान ला, कोई सकय न तोल।।45
दोहा छन्द- *गुरु*
गुरु हे पावन पूर्णिमा, गुरु अंजोरी रात।
गुरु सावन के मेघ बन, करय ज्ञान बरसात।।46
मन मन्दिर के देव गुरु, वंदन कर कर जोर।
जिनगी के बन नेंव गुरु, दै खुशियाली भोर।।47
देवय सुख उजियार गुरु, मेटय दुख अँधियार।
संस्कृति अउ संस्कार के, गुरु हावय भण्डार।।48
शब्द ज्ञान के खान गुरु, आशा अउ विश्वास।
वोखर बड़ा नसीब हे, गुरु हे जेखर पास।।49
गुरु के कोनों जाति नइ, नइहे कोनों धर्म।
देना सब ला ज्ञान सम, मानय पावन कर्म।।50
गुरु कबीर रविदास बन, गुरु बन घासीदास।
ज्योति पुंज गुरु बुद्ध बन, देथे ज्ञान उजास।।51
गजानंद गुरु के बिना, जिनगी भटका खाय।
बूंद अमिय गुरु ज्ञान के, जो पीये तर जाय।।52
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 09/07/2025
दोहा छन्द- *गुरु*
जप ले गुरु के नाम मन, होही बेड़ापार।
गुरु जिनगी के नाव के, हावय खेवनहार।।53
साँसा मा ले गुरु बसा, अंतस मा धर ध्यान।
बिन पाये गुरु ज्ञान ला, मिलय नहीं सम्मान।।54
नइ होवय गुरु हा गरू, धर ज्ञानी के गोठ।
भाव भजन गुरु के करे, होथे जिनगी पोठ।।55
हरथे गुरु अज्ञानता, ज्ञान जोत ला बार।
दूर बुराई ले रखे, दिसा दसा चतवार।।56
गुरुवर फूल गुलाब के, महकावय मन बाग।
गुरु के पा सानिध्य ला, खिल जाथे सुख भाग।।57
गावय गुरु गुणगान ला, सात खण्ड नौ दीप।
चमकय गुरु आशीष ले, सागर के भी सीप।।58
पेड़ बने गुरु ज्ञान के, देथे जुड़हा छाँव।
गजानंद अंतस जुड़ा, पावन पा गुरु पाँव।।59
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/07/2025
जिनगी भर पावत रहौं, गुरुवर आशीर्वाद।
छइँहा दौ गुरु ज्ञान के, हे अतके फरियाद।।60
करथे काम पुनीत गुरु, बाँटे जग ला ज्ञान।
चलथे जे गुरु राह मा, बनथे मनुज महान।।61
गुरु सागर ये ज्ञान के, मिलय कभू नइ थाह।
पालक बन गुरु शिष्य के, करे सदा परवाह।।62
गुरु ही ले जिनगी शुरू, गुरु ले जिनगी अंत।
गुरु ही ले पावत रहँव, सब दिन ज्ञान अनंत।।63
गुरु गुण ज्ञान गुनान कर, चलके गुरु के राह।
बिन गुरु के नइ तो मिले, ये जिनगी के थाह।।64
बाँटय ज्ञान विवेक गुरु, देवय सत सन्देश।
सीख धरे गुरु के मिटे, मानव मन से क्लेश।।65
साधिन गुरु सानिध्य ला, तुलसी सूर कबीर।
पाइन गुरु के ज्ञान ला, ऋषि मुनि संत फकीर।।66
बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।
सीख धरे गुरु के बनय, मूरख मनुज महान।।67
सच्चा गुरु के कर चयन, शब्द ज्ञान पहिचान।
सही दिशा अउ प्रेरणा, मिलही तब सद्ज्ञान।।68
याचक बन गुरु ज्ञान के, माँगत हावँव भीख।
पाँव बढ़य सत राह मा, आप सिखाहू सीख।।69
बाँटे ले भी नइ पड़े, गुरु के ज्ञान अकाल।
जे पाथे वो हो जथे, पल मा मालामाल।।70
गुरु के आशीर्वाद ही, असली सुख-सम्मान।
नइ खावस भटका कभू, धरले गुरु के ज्ञान।।71
गुरुवर किताब ज्ञान के, गुरुवर कलम दवात।
देके आशिष अउ कृपा, करथे सुख बरसात।।72
गुरु मा रख विश्वास तँय, पाबे ज्ञान प्रकाश।
बनही सुखमय जिंदगी, होही दुख के नाश।।73
शीश झुका गुरु के चरण, करौं अरज कर जोर।
पावत राहँव मँय सदा, जिनगी मा सुख भोर।।74
जब ले हे धरती गगन, जब ले हे संसार।
तब ले हे गुरु ज्ञान के, जिनगी मा आधार।।75
चंदन पेड़ समान हे, गुरु के ज्ञान विचार।
अंतस ला शीतल करे, मेटे दोष विकार।।76
समय घलो ला एक गुरु, गजानंद जी मान।
देथे सुख-दुख सीख ये, बुरा-भला के ज्ञान।।77
गुरुवापन गुरु के करौ, मिले ज्ञान भंडार।
अँधियारी दुख के भगे, होथे सुख संचार।।78
ज्ञान खजाना बाँट के, गुरु करथे उपकार।
जिनगी रूपी नाव के, गुरु ये खेवनहार।।79
गुरु गंगा के धार ये, गुरु सागर के सीप।
गुरु पावस के बूंद ये, गुरु पूजा के दीप।।80
दुनिया के कल्याण बर, ज्ञान धरे गुरु गूढ़।
गुरु के पा सानिध्य ला, सुधरे मनखे मूढ़।।81
सुबो शाम गुरु नाम लौं, घट भीतर हे धाम।
अइसन दीन दयाल ला, बारम्बार प्रणाम।।82
बिनती हे कर जोर गुरु, दे दौ जनम सुधार।
ये जिनगी के नाव ला, कर दौ भव ले पार।।83
करथे बरसा ज्ञान के, गुरु सब बर घनघोर।
रखय नहीं मन भेद गुरु, बाँधय सुमता डोर।।84
आथे श्रद्धा भाव रख, गुरु के जेन करीब।
पाथे गुरु के ज्ञान ला, जाथे सँवर नसीब।।85
नानक घासीदास गुरु, गुरु कबीर रैदास।
बनके गुरु इन अवतरिन, मेटे जग के त्रास।।86
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गढ़थे सभ्य समाज गुरु, बाँटे नेक विचार।
भरथे शुभ संस्कार गुरु, दिये ज्ञान उपहार।।87
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
सिखलाथे गुरु धर्म धर, रीति-नीति संस्कार।
जिनगी जीये के कला, नेक कर्म व्यवहार।।88
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
करथे गुरु गुनगान ला, सतगुरु ग्रंथ कुरान।
कहिथे गीता बाइबिल, गुरु के ज्ञान महान।।89
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
मन मा श्रद्धा भाव रख, कर ले गुरु के ध्यान।
अंतस निर्मल हो जही, पा के गुरु के ज्ञान।।90
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
जिनगी के धर मर्म गुरु, देथे सीख सलाह।
गुरु के ज्ञान अथाह हे, मिलय नहीं जी थाह।।91
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
मँय अज्ञानी पाय हँव, ज्ञान कृपा गुरु छाँव।
महिमा करे बखान बर, शब्द कहाँ ले लाँव।।92
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
जिनगी मा गुरु ज्ञान के, पी लेना दू बूँद।
येती-ओती झन भटक, बिरथा आँखी मूँद।।93
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
पहिली पूजन गुरु चरण, जो जग खेवनहार।
करके ज्ञान प्रकाश गुरु, मेटे मन अँधियार।।94
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
शीश झुका गुरु के चरण, वंदन बारम्बार।
दिये ज्ञान उपहार गुरु, हे बड़का उपकार।।95
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु बिन जिनगी ब्यर्थ हे, गुरु बिन जग अँधियार।
धर ले गुरु के ज्ञान गुण, हो जाबे भव पार।।96
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बँध जै गुरु ले प्रीत तब, दुनिया लागे मीत।
गुरु प्रति सेवा भाव ही, हावय रीत अतीत।।97
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु के ज्ञान प्रकाश ले, बगरे जग उजियार।
गुरु महिमा गुनगान ला, गावय नित संसार।।98
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
ध्यान लगा सुन लौ सदा, गुरु वाणी अनमोल।
बसा रखौ गुरु नाम ला, अंतस पट ला खोल।।99
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
नेक कर्म अउ धर्म के, सिखलाथे गुरु पाठ।
पाये बिन गुरु ज्ञान ला, ये जिनगी हे काठ।। 100
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
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दिव्य अलौकिक ज्ञान के, गुरु रखथे भंडार।
बाँटय समान रूप ले, जिनगी के सुख सार।।101
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
कर ले गुरु के वंदना, भाग्य सँवरही तोर।
मिट जाही संकट सबो, सुख मिलही घनघोर।।102
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
पावन गुरु के पाँव मा, रोज नवावँव माथ।
कर दौ जिनगी ला सफल, बन गुरु दीनानाथ।।103
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
रूप हवय गुरुदेव के, निराकार साकार।
गुरु के निर्मल ज्ञान ले, आलोकित संसार।।104
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
माँगत हँव आशीष गुरु, अंतस पट ला खोल।
दे दव गुरुवर ज्ञान के, धन मोला अनमोल।।105
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
भरथे मन मा भाव गुरु, कर्म करे बर नेक।
दिखलाथे सत राह गुरु, दोष बुराई छेक।।106
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु के ज्ञान गुरुत्व ले, जग के हे कल्यान।
गुरु के धर संदेश ला, बनथें मनुज महान।।107
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु ला वंदन दंडवत, करौं सुबह अउ शाम।
बोझिल जिनगी के डगर, हे गुरु लेवव थाम।।108
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
नेक कर्म ले गुरु मिले, ध्यान धरे ले ज्ञान।
संगत गुरु के दूर जे, मूढ़ उही इंसान।।109
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
कर लौ गुरु गुनगान ला, रइहू सदा प्रसन्न।
सुख जिनगी रख भाव गुरु, ज्ञान दिये सम्पन्न।।110
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु महिमा ले बढ़ इँहा, नइहे काहीं और।
दूर भक्ति गुरु के रहे, मिले नहीं जग ठौर।।111
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
संगत संत सुजान गुरु, निर्मल करय सुभाव।
सतगुरु सुमिरन ले मिटे, अंतस के भटकाव।।112
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
जिनगी मा गुरु ज्ञान ले, होथे नवा बिहान।
गुरु के पा आशीष ला, बनथें मनुज महान।।113
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु जिनगी के प्रेरणा, गुरु सुख के आधार।
गुरु माली बन ज्ञान के, बाग करे गुलजार।।114
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु गीता संदेश ये, गुरु बाईबिल सार।
गुरु गरुग्रन्थ कुरान ये, गुरु ज्ञानी करतार।।115
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
नित बंदँव श्री गुरु चरण, झुका अपन मँय माथ।
सुख मा दुख मा आप गुरु, रखहू मुड़ मा हाथ।।116
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
ज्ञान दीप ला बार के, हरथे सब अँधियार।
नइ होवय गुरु के बिना, दुनिया मा उजियार।।117
अबड़ लुटाथे गुरु मया, देथे शिक्षा दान।
गुरु के चरन पखार के, पाथें सब सम्मान।।118
भटकत हंसा तार दै, मेटय मन के पीर।
गुरु के महिमा हे अगम, जइसे गंगा नीर।।119
सत के मारग दै बता, रखय कपट ले दूर।
शीश नवा गुरु के चरन, ज्ञान मिले भरपूर।।120
बार ज्ञान के दीप गुरु, मेटय मन अँधियार।
गुरु के पावन पाँव मा, वंदन बारम्बार।।121
कथरी ओढ़े ज्ञान के, गुरु जी रचे विधान।
जिनगी मा रख सादगी, जग मा पाथे मान।।122
माटी कस अनगढ़ रहय, लइका मन के जान।
गुरु जी गढ़य कुम्हार कस, सब ला एक समान।।123
जनम दिये दाई ददा, गुरु जी ज्ञान विवेक।
सहीं झूठ के कर परख, राह दिखावय नेक।।124
ज्ञान मिलय नइ गुरु बिना, चाहे पढ़व पुरान।
गुरु ही भव ले तारथे, कहिथे ग्रंथ कुरान।। 125
02/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
बिन स्वारथ के बाट गुरु, देखावय दिन-रात।
अड़बड़ गहिर विचार हे, ओखर मन के बात।। 126
गुरुवर घड़ा कुम्हार कस, गढ़थे रूप अनूप।
चेला ला गुरु वइसने, देवय गजब स्वरूप।।127
तिरबेनी कस छाय हे, गुरु के आशिष छाँव।
सुख जिनगी रद्दा मिलय, धर ले गुरु के पाँव।।128
माई-कोरा ले निकल, गुरु कोरा जब जाय।
लइका बनय सुजान तब, सुग्घर मान कमाय।।129
सागर कस गंभीर गुरु, हिरदे रखय उदार।
सत्यबोध गुरु के चरण, बहिथे सुख के धार।।130
05/05/2026
गुरु गंगा के धार अउ, गुरु हे खेवनहार।
भटकत हंसा गुरु बिना, नइ होवय भव पार।।131
गुरु हे संत कबीर अउ, गुरु हे घासीदास।
ढोंग रूढ़ि पाखण्ड के, तोड़िन जे मन फाॅंस।।132
गुरु धरती आकाश अउ, गुरु हे सुरुज समान।
करथे जग उपकार गुरु, बनके ज्ञान विधान।।133
पा के गुरु किरपा चढ़य, लॅंगड़ा ऊॅंच पहाड़।
अँधरा सुख सपना गढ़य, हरहा भरय दहाड़।।134
गुरु दीपक बन ज्ञान के, हरय तिमिर अज्ञान।
अंतस ला उजियार कर, दिखलावय भगवान।।135
शून्य हृदय ला शब्द दय, गढ़-गढ़ सुंदर रूप।
शिष्य सँवारय गुरु सदा, बनके ज्ञान अनूप।।136
गुरु के महिमा हे अगम, सागर ले गंभीर।
हर लेवय गुरु ज्ञान ले, अंतस के सब पीर।।137
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु जी ज्ञान विचार दय, मेटय मन के दोष।
दूर करय भ्रम भावना, देवय सुख संतोष।।138
गुरु ये रूप कुम्हार के, माटी शिष्य शरीर।
गढ़य घड़ा कस देह गुरु, चमकावय तकदीर।।139
नाॅंव कमावय शिष्य हा, पा गुरु आशिष छाॅंव।
सुख के चारों धाम हे, गुरु के पावन पाॅंव।।140
बलिहारी श्री गुरु चरण, हे ये जिनगी मोर।
बाॅंधे रखहू आप गुरु, सदा दया के डोर।।141
जब तक तन मा साॅंस हे, जपौं सदा गुरु नाम।
करौ कृपा घनघोर गुरु, होय सफल सब काम।।142
मिलथे बड़ सौभाग्य ले, गुरु के आशिर्वाद।
मानौं सच भगवान मॅंय, मातु-पिता के बाद।।143
होगे हावय धन्य गुरु, एक जनम ये मोर।
बिनती हे अगले जनम, पावॅंव किरपा तोर।।144
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु महिमा गुनगान ला, गावॅंव मॅंय दिन-रात।
दिये हवय गुरु ज्ञान के, मोला सुख सौगात।।145
ये ज़िनगी मा हे मिले, गुरु किरपा जी सार।
कइसे पाहूॅं मॅंय चुका, गुरु के ज्ञान उधार।।146
मुक्ति मिलय नइ गुरु बिना, भटकत रहिबे रोज।
सत रसता नित देखबे, कर ले गुरु के खोज।।147
पहिली गुरु हे मातु हा, पिता ज्ञान के रूप।
गुरु चरनन मा स्वर्ग हे, जइसे छइँहा-धूप।।148
माटी कस हे देह ये, गुरु हा आय कुम्हार।
चुपके-चुपके ठोक के, देवय रूप सॅंवार।।149
सब तीरथ गुरु के चरन, करथे सुख धर वास।
मिले जिहाॅं गुरु के कृपा, मिटय भरम अउ त्रास।।150
पाये बिन गुरु ज्ञान ला, भटकत रहिथे जीव।
गुरु के चरन पखार ले, बनही पक्का नींव।।151
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
पा के गुरु के ज्ञान ला, बनथे शिष्य सुजान।
गढ़थे सभ्य समाज अउ, लाथे नवा बिहान।।152
देथे शुभ संस्कार गुरु, मन के मेट विकार।
बनके खेवनहार गुरु, नाव लगाथे पार।।153
गुरु बिरवा बन ज्ञान के, देथे शीतल छाॅंव।
पा के गुरु सानिध्य ला, मिट जाथे भ्रम घाॅंव।।154
मेटय गरब गुमान के, अंतस ले गुरु फाॅंस।
गा ले गुरु गुनगान मन, जब तक तन मा साॅंस।।155
छोड़ सुवारथ ला सबो, गुरु हा देथे ज्ञान।
गुरु के दरजा ऊॅंच हे, कहिथे ग्रंथ कुरान।।156
का सादा रंगीन का, चिनहा देथे नीत।
सत्य डगर मा ले जथे, गुरु हा बनके मीत।।157
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु हे, गुरु हा आय महेस।
जेकर मन मा गुरु बसे, दूर होय सब क्लेस।।158
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
मातु-पिता जग जन्म दय, गुरु हा देवय ज्ञान।
सत मारग जे ले चलय, गुरु हे उही महान।।159
धरती बर भगवान गुरु, सागर बर ये सीप।
जग बर ज्ञान प्रकाश गुरु, अँधियारी बर दीप।।160
पूजा के ये थाल गुरु, मन मंदिर के देव।
मानय सब ला एक गुरु, छोड़ सबो भ्रम भेव।।161
गुरु चंदन के पेड़ बन, महकावय मन द्वार।
गुरु महिमा ला कोंन कब, पाइस हावय पार।।162
जिनगी के हर साॅंस मा, राहय गुरु के नाम।
करही भव ला पार गुरु, गुरु चरनन लौ थाम।।163
चमकावय नित लेखनी, गुरु जी बनके स्याह।
पड़य नहीं तो कम कभू, गुरु के ज्ञान अथाह।।164
सत्यबोध गुरु के चरन, जस गंगा के धार।
धोवय मन के पाप ला, लेवय नाव उबार।।165
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
कहिथें ओर न छोर हे, गुरु के ज्ञान अनंत।
महक उठे पतझड़ घलो, जइसे फूल बसंत।।166
गुरु के आशीर्वाद ले, होय सफल सब काम।
गुरु के सेवा ला करत, मिलथे सुख के धाम।।167
गुरु ला अंतस ले बिठा, गुरु हे भ्रम के काल।
गुरु अवगुण ला मेटथे, बनथे दुख मा ढाल।।168
गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावॅंव माथ।
पावॅंव नित आशीष गुरु, मुड़ मा रखहू हाथ।।169
गुरु के सेवा कर मनुज, गुरु ला मन मा धार।
शिष्य परम बन जोड़ ले, गुरु ले मन के तार।।170
दिखलाथे गुरुवर दिशा, दशा रहे विपरीत।
गुरु ले बढ़के हे नहीं, ये दुनिया मा मीत।।171
सब ला अलगे मोर गुरु, जेखर सुग्घर बैन।
दर्शन जेखर पाय बर, रहिथे मन बेचैन।।172
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु चरनन के धूल ला, माथ लगावॅंव रोज।
मिट जावय अज्ञानता, पूरन हो सुख खोज।।173
गुरु गोविंद ले हे बड़े, खुद गोविंद बतलाय।
जेखर पथ आलोक ले, दूर तिमिर हो जाय।।174
पत्थर ला कंचन करय, गुरु बन ज्ञान अधार।
मूरुख ला पंडित करय, महिमा अपरम्पार।।175
गुरु बिन उपजे ज्ञान नइ, गुरु बिन मिले न मोक्ष।
गुरु बिन संशय नइ मिटय, गुरु हे दिव्य परोक्ष।।176
एक दीप ले हे जले, जइसे दीप हजार।
गुरु के ज्योति जगात हे, अंतस मा उजियार।।177
गुरु जस और न मीत हे, गुरु जस और न देव।
गुरु चरनन के छाॅंव मा, मिट जावय सब भेव।।178
माटी के पुतरा खड़े, साॅंसा भरय कुलाल।
आत्म सॅंवारय गुरु सदा, बनके दुख मा ढाल।।179
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु हे नाव गहीर बड़, भवसागर के बीच।
सब ला पार लगाय हे, ऊॅंच होय या नीच।।180
आखर-आखर ज्ञान के, बरसा करय उदार।
मूरुख ला ज्ञानी करय, गुरु करके उपकार।।181
गुरु मूरत ये सादगी, मन मा करुणा भाव।
ज्ञान बचन जेखर सदा, हर लेथे सब घाव।।182
बिरथा गुरु बिन साधना, जइसे जल बिन मीन।
तड़पे मन ये ज्ञान बिन, बनके निस दिन दीन।।183
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु हे, गुरु हे शिव के रूप।
कहिथें गुरु परब्रह्म हे, सत्य ज्ञान के कूप।।184
गुरु के आज्ञा धार्य हे, गुरु के बचन प्रमाण।
जे गुरु पथ मा पग धरय, ओखर हो कल्याण।।185
जिहाॅं न पहुॅंचे रवि किरण, उॅंह पहुॅंचे गुरु ज्ञान।
घोर अँधेरा टार के, लाथे नवा बिहान।।186
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
धरे ज्ञान गुरु आसरा, पत्थर हा तर जाय।
बहरा बोलय वेद अउ, लॅंगड़ा हा बलखाय।।187
मान मिलय सम्मान अउ, मिलय सदा गुरु ज्ञान।
गुरु चरनन के धूल ले, बनथे मनुज महान।।188
गुरुवर आदि अनंत हे, गुरुवर मध्य विचार।
जिनगी के दुख मोड़ मा, गुरु हे सुख आधार।।189
शिष्य उही जे गुरु कहे, मानय पत्थर लीक।
छिपे हवय गुरु डाॅंट मा, जिनगी के हर सीख।।190
गुरु ला मानुस झन समझ, गुरु हावय करतार।
नर तन मा गुरु देव हे, करथे बेड़ा पार।।191
जे करथे गुरु से कपट, शिष्य नहीं कहलाय।
जइसे रेगिस्तान मा, बीज नहीं उग पाय।।192
विद्या धन अइसे दिये, लूट सकय ना चोर।
गुरु हा थामय डोर ला, जिनगी के हर छोर।।193
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु पारस सम तुल्य हे, चेला लौह समान।
छूवत ही कंचन करय, मेटय गरब गुमान।।194
गुरु के वाणी सार हे, गुरु के वाणी वेद।
मिट जाथे छिन मा सबो, मन के बिखहर भेद।।195
गुरु के गौरव गान हा, जग मा पूजे जाय।
ज्ञान बिना इंसान हा, मान कहूं ना पाय।।196
धन दौलत ले हे बड़े, गुरु के ज्ञान अपार।
सदा रहय ये संग मा, बन करके पतवार।।197
गुरु बिन माला फेरना, गुरु बिन करना दान।
बिरथा ये सब होय हे, कहिथे वेद पुरान।।198
गुरु हे सागर ज्ञान के, शिष्य नदी के धार।
मिल जाथे जब सिंधु मा, हो जाथे उद्धार।।199
सिखलाथे गुरु कर्म अउ, मानवता के पाठ।
छोड़व इरखा द्वेष ला, तजौ दम्भ के ठाठ।।200
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/05/2026
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दोहा छंद- *गुरु महिमा*
दिव्य दृष्टि गुरु हे दिये, देखॅंव सब ला एक।
सेवा ही पूजा बनय, कर्म रहय नित नेक।।201
गुरु हा तोड़य फाॅंस भ्रम, धन माया अउ मोह।
दिखलावय सत राह गुरु, मन भीतर मा पोह।।202
जइसे चंदन संग रहि, नीम सुगंधित होय।
वइसे गुरु सानिध्य पा, दुर्गुण बचे न कोय।।203
गुरु के आसन ऊॅंच हे, सब ले ऊपर मान।
ईश्वर भी झुकथे उहाॅं, जिहाॅं रहे गुरु स्थान।।204
गुरु जी मन के मैल ला, धोवय सबद सुजात।
गुरु दर्पण उजला करय, सूझय मन के बात।।205
कल्पवृक्ष सम गुरु हवय, माॅंगय जो फल पाय।
जावय जे विश्वास रख, खाली हाथ न आय।।206
थामय किरपा डोर गुरु, तन कठपुतली जान।
अइसन ज्ञान लखाय गुरु, होवय जग कल्यान।।207
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु सिखलाथे धैर्य अउ, गुरु सिखलाथे प्रेम।
सत्य राह मा ले चलय, देत क्षमा अउ क्षेम।।208
गुरु किरपा के मंत्र ले, सोये भाग जगाय।
फूल खिलय हर राह मा, शूल सबो मिट जाय।।209
कोरा कागज देह ला, कर दौं गुरु के नाम।
करौं सुमरनी गुरु चरन, रोज सुबह अउ शाम।।210
जग माया के जाल मा, भटके हौं हो अंध।
नैन दुनों गुरु खोल के, काटिस जम्मो बंध।।211
गुरु महिमा ला गात जी, थकय कभू नइ बैन।
दर्शन गुरु के पाय बर, तरसत रहिथे नैन।।212
जो भी आथे गुरु शरण, गुरु लेथे अपनाय।
जाति-पाति ला छोड़ के, सब ला ज्ञान लखाय।।213
बूंद पड़य जब गुरु कृपा, बूझय मन के प्यास।
मुरझाये मुख खिल उठय, गुरु के पा विश्वास।।214
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
बोलव शब्द सॅंभाल के, देथे गुरु ये सीख।
पी लौ अमरित प्रेम के, माॅंग न जग से भीख।।215
गुरु सिखलाथे त्याग अउ, परहित सेवा धर्म।
मिट जाथे जड़ द्वेष के, निर्मल हो सब कर्म।।216
गुरु सूरुज ये ज्ञान के, मॅंय हा छोटे दीप।
देवत मया दुलार गुरु, रखथे हृदय समीप।।217
गुरु के दर्शन पाय ले, मिटय सबो मन खोट।
देथे सुख आनंद गुरु, दूर करत दुख चोट।।218
गुरु वाणी अनमोल हे, मन मा लेवव पाल।
काल न बांका कर सकय, तोर एक भी बाल।।219
गुरु जी राह दिखाय हे, ईश मिलन के द्वार।
भटकय हंसा गुरु बिना, नाव बने मझधार।।220
गुरु के प्रेम अनन्य हे, स्वार्थ बिना आधार।
जइसे जलद उलेचथे, अम्बर ले जलधार।।221
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु अइसन वो नाव ये, चढ़ हो जावव पार।
श्रद्धा के पतवार गुरु, पार करय मझधार।।222
गुरु देथे नव चेतना, करा आत्म के बोध।
शांति कराये चित्त ला, मिटा व्यर्थ के क्रोध।।223
गुरु ही माली हे इहाॅं, हम बगिया के फूल।
सींच ज्ञान के नीर ला, झाड़य मन के धूल।।224
गुरु के आज्ञा मान के, जो करथे जग काम।
मंजिल ओखर द्वार मा, करय सदा आराम।।225
तेज निराला पुंज गुरु, जस पूनम के चंद।
मिटय हृदय अँधियार हा, बरसय सुख आनंद।।226
गुरु बिन जिनगी व्यर्थ हे, जइसे फल बिन पेड़।
ज्ञान शक्ति गुरु के मिले, टूटय दुर्गम मेड़।।227
तन मन धन अर्पन करौं, गुरु के पावन पाॅंव।
साॅंस घलो ये ओखरे, पाये हे सुख छाॅंव।।228
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु करजा ले मुक्ति हो, नइहे वश मा मोर।
ये जिनगी के साँस भी, पड़ जाही जी थोर।।229
हवय आसरा तोर गुरु, जब अंतस भरय थकान।
पंख लगा विश्वास के, भर लौं ऊँच उड़ान।।230
बनके शीतल छाँव गुरु, मेटव मन के ताप।
अर्पन श्रद्धा के सुमन, कर लौ कबूल आप।।231
गुरु ले ही तो सब मिले, न तो मिले नइ कोय।
गुरु बिन ये संसार मा, सुखी न कोई होय।।232
गुरु के वाणी कान मा, भरय मधुर संगीत।
उमड़य अंतस मा सदा, गुरु चरनन के प्रीत।।233
सिखलाये गुरु रेंगना, मोर पकड़ के हाथ।
नइ छोड़े गुरु तॅंय कभू, कठिन डगर मा साथ।।234
गुरु ले बढ़ दाता नहीं, जो देवय निज ज्ञान।
बदला मा कुछ लै नहीं, गुरु के त्याग महान।।235
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु चरनन के वंदना, कर लौ सौ-सौ बार।
गुरु के ज्ञान लखाय ले, होथे बेड़ा पार।।236
गुरु सुमिरन कर आत्म मा, मुख मा रख गुरु नाम।
गुरु से लगन लगाय रख, बन जाही सब काम।।237
गुरु के वाणी ला सदा, पत्थर लकीर मान।
चल लौ गुरु के राह मा, पा जाहू निर्वाण।।238
दिव्य दृष्टि गुरु के पड़े, खुल जै बंद किवाड़।
कंकर-पत्थर हा लगे, जइसे स्वर्ण पहाड़।।239
गुरु मन संशय दूर कर, सत्य कराथे बोध।
नइ राहय भ्रम द्वंद्व अउ, हट जावय अवरोध।।240
ज्ञान भक्ति गुरु सार हे, बाकी सब हे राख।
सदा सिखाथे संत जन, बचा रखौ खुद साख।।241
गुरु के किरपा पाय बिन, मिले न हरि के धाम।
सीढ़ी गुरुवर ला बना, पावय मनुज मुकाम।।242
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
दीप जला गुरु ज्ञान के, मेटय घोर अँधेर।
दिखलावय सत राह गुरु, तोड़ जगत के फेर।।243
गुरु के संगत साध के, चमक उठय जी भाग्य।
तज मन भोग विलास ला, जाग उठा वैराग्य।।244
गुरु चरनन मा स्वर्ग हे, गुरु चरनन मा धाम।
गुरु के सेवा छोड़ के, बिरथा हे सब काम।।245
शून्य से शिखर तक दिये, गुरु मोला पहुॅंचाय।
गुरु जी अंतिम साॅंस तक, साॅंस न नाम भुलाय।।246
गुरु बिन नइ तो ज्ञान हे, ना कोई आधार।
पार लगाथे नाव गुरु, बन करके पतवार।।247
नइ राहय सुख के कमी, पा गुरु आशिर्वाद।
हृदय कमल लगथे खिले, जिनगी हो आबाद।।248
दिखलाये गुरुवर हवय, खुद के ज्ञान स्वरूप।
घट-घट मा गुरु वास कर, चेतन रूप अनूप।।249
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)25/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
धरती नभ वश मा करय, गुरु के शक्ति अपार।
पावॅंय अक्षय यश सबो, गुरु के मारग धार।।250
गुरु किरपा के अंत ना, जइसे नीला व्योम।
गूॅंजत हे गुरु नाम ले, रोम-रोम मा ओम।।251
गुरु सिखलाये मौन ला, नित्य करे बर नाद।
मन के मिटे अशांति अउ, बचे सिर्फ संवाद।।252
गुरु किरपा हे संग मा, फिर न डरे के बात।
कठिन डगर मा मिल जथे, फूल भरे सौगात।।253
जिनगी बर हे साॉंस गुरु, अउ ये तन बर प्रान।
शीश नवाॅं गुरु के चरन, मिट जाही अभिमान।।254
बिन माॅंगे झोली भरय, पहिचानय गुरु दीन।
गुरु के करुणा देख के, मन होथे लवलीन।।255
गुरु के ज्ञान बखान बर, कम पड़थे आकाश।
हावय ज्योति अनंत गुरु, गुरु हे पूर्ण प्रकाश।।256
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
बतलाथे गुरु जी इहाॅं, धरम करम के सार।
मानव सेवा ही हरय, प्रभु पूजा आधार।।257
गुरु के तज सानिध्य ला, जाॅंव कहाॅं मॅंय नाथ।
मोर हवव गुरु आसरा, थामे रखिहौ हाथ।।258
बसे हवय छवि नैन गुरु, हृदय बसे हे नाम।
गुरु चरनन मा हे बसे, जग के चारो धाम।। 259
घोलय मन मा चाशनी, गुरु के मिश्री बोल।
जिनगी ला दै रोशनी, दिव्य दृष्टि ला खोल।।260
गुरु के किरपा ला धरे, जीते मन संसार।
अब ना कोई हार हे, ना कोई तकरार।।261
ज्ञान भक्ति गुरु के नशा, सब ले ऊँचा जान।
जिनगी भर उतरय नहीं, बात समझ इंसान।।262
शीश नवाॅं गुरु के चरन, माॅंगव ये वरदान।
करत रहॅंव गुरु हर जनम, तोर चरन के ध्यान।।263
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026
दोहा छंद - *गुरु महिमा*
गुरु चरनन के धूल ला, माथा तिलक लगाॅंव।
ज्ञान दीप ला बार के, मन के तिमिर भगाॅंव।।264
सत्यबोध नर अंध वो, गुरु ला बोलय और।
हरि रूठे गुरु ठौर हे, गुरु रूठे नइ ठौर।।265
जे रहिथे मतिमंद गुरु, लेत न दीक्षा कोय।
जइसे सूना घर इहाॅं, मान अतिथि नइ होय।।266
उपजय गुरु बिन ज्ञान नइ, मिलय नहीं संतोष।
गुरु बिन लखय न सत्य हा, गुरु बिन मिटय न दोष।।267
गुरु बिन घोर अँधेर हे, सत्य कहॅंव समुझाय।
जइसे सूरुज के बिना, तिमिर न दूर भगाय।।268
आखर-आखर गुरु लिखय, शब्द-शब्द मा ज्ञान।
बन शुभ चिंतक शिष्य के, प्रभु से जोड़य ध्यान।।269
अंधकार के गर्त ले, लावय खींच निकाल।
समय रहे विपरीत गुरु, खड़े रहय बन ढाल।।270
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
शिरोधार्य गुरु के बचन, कर सेवा निस्वार्थ।
मिलय परम पद हा सहज, सिद्ध होय पुरुषार्थ।।271
मन के भीतर मैल जो, गुरु धोवय छिन जाय।
शब्द साबुना से मिटय, दूजा और न भाय।।272
गुरु दीपक ये ज्ञान के, घट मा करय उजास।
मिटय कलेश कलेश सब, पूरन होवय आस।।273
गुरु से नाता जोड़ लौ, तज दुनिया के मोह।
सत्य राह मा जे चलय, मिटय जगत के द्रोह।।274
गुरु के करनी देख झन, गुरु के शब्द सम्हार।
नाव पुराना हो भले, देवय पार उतार।।275
गुरु के किरपा ले सदा, मिटय सकल संताप।
जनम मरण के दुख मिटय, मिटय त्रिविध सब पाप।।276
गुरु बिन होय न भक्ति हा, गुरु बिन मिलय न प्रेम।
गुरु बिन जिनगी व्यर्थ हे, बिगड़य नेकी नेम।।277
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु ला मानुस झन समझ, गुरु सॅंउहत हे ईश।
ये दुनिया के जीव सब, नित्य नॅंवाथे शीश।।278
चढ़ जावव गुरु नाव मा, रख अंतस मा धीर।
लहरा दुख के टार दै, मेटय मन के पीर।।279
ज्ञान दृष्टि गुरु हे दिये, गुरु मा देखॅंव राम।
कण-कण मा गुरु हे रमे, पूर्ण वहीं विश्राम।।280
गुरु ले सॅंवरे हे इहाॅं, जिनगी के हर साज।
राह न भटकय सारथी, थमे न कोई काज।।281
कल्पवृक्ष बन गुरु खड़े, जो माॅंगे सो पाय।
श्रद्धा मन मा धार लौ, काम सफल हो जाय।।282
अंतर्यामी गुरु हवय, जानय मन के बात।
मिट जावय दुख फाॅंस सब, आवय सुख के रात।।283
गुरु बिन नइहे शांति मन, गुरु बिन नइहे सार।
मेटय दुख अँधियार गुरु, खोलय सुख के द्वार।।284
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2026
दोहा छंद - *गुरु महिमा*
काम क्रोध अउ लोभ ला, गुरु हा दूर भगाय।
शांति दया अउ प्रेम के, अमरित धार बहाय।।285
गुरु वाणी अमरित झरे, जो पीये तर जाय।
मन के तृष्णा हा मिटय, थमय काल के मार।।286
गुरु ही जड़ ला सींचथे, फलय फुलय फर डार।
महकय ज्ञान सुगंध से, सारा ये संसार।।287
गुरु हे शीतल चंद्रमा, शिष्य हृदय के प्यास।
ज्ञान किरण गुरु के मिले, मिटय मोह के फाॅंस।।288
सतगुरु के उपदेश ला, सदा लगा लौ ध्यान।
मिटे भरम के जाल अउ, पावॅंय पद निर्वाण।।289
झन करिहौ गुरु से कपट, और न भेद छुपाव।
जइसे बोहव बीज तुम, वइसे ही फल पाव।।290
गुरु के सेवा हे परम, पावन तीर्थ समान।
दर्शन चारो धाम के, गुरु चरनन के ध्यान।।291
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/05/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु के वाणी वेद हे, गुरु के बचन पुराण।
मान हृदय गुरु के धरय, हे वो मनुज महान।।292
गुरु के सम्मुख जो रहय, मौन धरे मन ध्यान।
बिना कहे वो पी सके, ज्ञानी बन गुरु ज्ञान।।293
शिष्य उही जो गुरु कहे, पल भर करे न देर।
आज्ञा पालन जो करय, मिटय काल के फेर।।294
गुरु ला अर्पण सर्व सब, गुरु ला अर्पण प्रान।
जितना शिष गुरु के मिलय, उतना वो धनवान।।295
जे छोड़य गुरु संग ला, भटकय दर-दर द्वार।
डूबय बिन पतवार के, बीच नदी मझधार।।296
गुरु के आदर जे करय, पूज चरण के धूल।
जिनगी बगिया मा खिलय, रंग बिरंगी फूल।।297
ईश मान गुरुदेव ला, कर लौ सेवा रोज।
कोटि तपस्या फल इही, झन बाहिर मा खोज।।298
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/06/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु हा भरम निवारथे, सत्य दिखाथे रूप।
जड़चेतन हा जाग जै, त्याग जगत के कूप।।299
गुरु के शब्द कठोर ला, जानौ औषध रूप।
रोग मिटाये मन लगा, देवय स्वास्थ्य अनूप।।300
गुरु ले प्रेम गहीर रख, लगा न दूजा भाव।
मन के मिटथे पीर सब, लगय किनारे नाव।।301
गुरु चरनन मा सर झुका, झुका न दुनिया पास।
भाव सागर ला तर जबे, बनके गुरु के खास।।302
दृष्टि जिहाँ गुरु के पड़े, मिटे पाप के ढेर।
सत्य ज्ञान के हो उदय, लगे न पल भर देर।।303
गुरु अमरित के खान ये, गुरु जस मिले न और।
शिष्य बने जो धूल सम, पाये कहीं न ठौर।।304
गुरु चरणामृत पान कर, मिटे जनम के प्यास।
अंत समय मा पा सकव, गुरु चरनन के वास।।305
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/06/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
जे छोड़य गुरु संग ला, नइ पावय वो राह।
जइसे मछली जल बिना, छोड़य जिनगी चाह।।306
राह दिखाथे गुरु सुगम, भक्ति भाव मन तोल।
स्वयं दिखा गुरु रूप ला, मंत्र दिये अनमोल।।307
गुरु चरनन मा स्वर्ग हे, गुरु चरनन मा सार।
गुरु चरनन के दास बन, हो जाहू भव पार।।308
गुरु गुनगान अथाह हे, कोई सकय न गाय।
तीन लोक के देव मन, पार घलो नइ पाय।।309
गुरु हा गहरा सिंधु हे, ज्ञान रत्न के खान।
गोता मारय शिष्य जे, पावय मोती मान।।310
देइस दर्पण ज्ञान गुरु, देखव निज मुख शुद्ध।
मन के मैला धो चलव, गुरु बन कहिथे बुद्ध।।311
गुरु हे शीतल छाॅंव तरु, तपय जगत के धूप।
सत्यबोध आनंद हे, गुरु के निकट अनूप।।312
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/06/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु के वाणी मा बसे, सुख के सब्बो सार।
गोठ धरय जे शिष्य ये, पावय खुशी अपार।।313
गुरु चरनन के वंदना, भव सागर के नाव।
पार उतारय जीव ला, थामय जब गुरु पाॅंव।।314
गुरु हे दाता ज्ञान के, नइ माॅंगय कुछ दाम।
शिष्य समर्पित हो अगर, होय सफल सब काम।।315
गुरु हा बीजा ज्ञान तरु, सींचय सुख के नीर।
छाॅंव दिये हे शांति गुरु, मेटय मन के पीर।।316
रूप धरे भगवान गुरु, हरय सकल अज्ञान।
पीयय विष संसार के, देवय अमरित दान।।317
गुरु हा साधय कर्म अउ, त्याग तपस्या मर्म।
गुरु सेवा जग श्रेष्ठ हे, गुरु हे उत्तम धर्म।।318
महिमा अपरम्पार गुरु, का लिखॅंव मॅंय अल्प।
जिनगी के उद्धार बर, गुरु हे सहीं विकल्प।।319
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/06/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
राहव गुरु सानिध्य मा, तज माया अभिमान।
देवय खाली हाथ ला, गुरु जी सुख के खान।।320
गुरु के संगत जे करय, रहिके गुरु के संग।
जइसे चंदन पेड़ सम, महकय मानुस अंग।।321
गुरु के शक्ति अपार हे, पर्वत सम सामर्थ।
समझे जग मा कोंन हे, गुरु बिन जिनगी अर्थ।।322
ध्यान धरय गुरु शिष्य जे, मन ला करके शांत।
जानय जग के सत्य वो, मिटा सकल मन भ्रांत।।323
गुरु किरपा ले होय हे, ईश्वर के आभास।
घट-घट मा तो हे बसे, गुरु के दिव्य प्रकाश।।324
गुरु वाणी जे सुन सकय, धरे हृदय के बीच।
महके जिनगी खिलखिला, जइसे उपवन सींच।।325
गुरु माली ये बाग के, सींचय सुख के नीर।
शिष्य फूल बनके खिले, मिटे हृदय के पीर।।326
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/06/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
छत्र-छाॅंव जब गुरु करय, डरय न कोई काल।
घूमय निर्भय बन सबों, छोड़ अहं भ्रम जाल।।327
गुरु सीढ़ी ये ज्ञान के, चढ़व गगन के पार।
बनके अनहद नाद गुरु, करथे सुख झंकार।।328
भूल जिये जे गुरु मनुज, जलय नरक के आग।
गुरु चरनन के प्रीत हा, सब ले बड़े सुहाग।।329
भक्ति अधूरा गुरु बिना, गुरु बिन ज्ञान न शुद्ध।
बनय नहीं गुरु के बिना, कोई नर तन बुद्ध।।330
गुरु के महिमा हे अगम, गुरु जग के आधार।
पा के गुरु किरपा मनुज, जीत लिये संसार।।331
गुरु ला अर्पण गीत हे, गुरु ला अर्पण छंद।
शीश नॅंवा गुरु के चरन, मिटय सकल दुख द्वंद्व।।332
गुरु चरनन मा शीश रख, माॅंगव मॅंय आशीष।
ज्ञान दीप रखबे जला, भक्ति मिलय जगदीश।।333
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/06/2026
दोहा छंद- *गुरु महिमा*
गुरु गोविंद ले हे बड़े, सत्य कहय संसार।
कइसे पाही जग चुका, गुरु के ज्ञान उधार।।334
अंधकार के कोठरी, हे जग अति गंभीर।
ज्ञान दीप धर हाथ मा, गुरु बन खड़े प्रवीर।।335
मानुष ले सन्यासी करय, कंकर से दै हीर।
गुरु के आशीर्वाद ले, मिट जावय सब पीर।।336
गुरु के सत उपदेश के, शिष्य न पावय छोर।
जिनगी के हर साँस ले, बाँध रखय गुरु डोर।।337
गुरु दीपक गुरु रोशनी, गुरु हे जग के छोर।
बिन गुरु जिनगी नाव ये, भटकय चारो ओर।।338
लोहा ला कंचन करय, परस ईश के पाय।
मिटा अविद्या के भरम, गुरु उजियारी लाय।।339
हाथ रखय गुरु भाल मा, देवय अभय प्रसाद।
मिटय द्वंद्व भ्रम द्वेष सब, छूटय वाद-विवाद।।340
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/06/2026