शुक्रवार, 8 मई 2026

हाइकु-

 1. हाइकू- *उम्र*


​कोरी सी उम्र,

कागज़ की नाव है,

खुशी अपार।


​उम्र की धूप,

सपनों के हैं पंख,

ऊँची उड़ान।


​बीतती उम्र,

माथे की लकीरें हैं,

लिखा अनुभव।


​रुकती उम्र,

यादों के झरोखे में,

बीता कल है।


​ढलती उम्र,

सूरज की लाली सी,

शांत स्वभाव।


​उम्र की धार,

बहता ही जाए ये,

वक़्त का दरिया।


​कच्ची है उम्र,

मिट्टी का ये खिलौना,

अंत सलोना।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/05/2026

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2. हाइकु - *उम्र*


​उम्र की धार

बहती ही जाए ये

रुकती नहीं।


​पकते बाल

तजुर्बों की पोटली

उम्र का सार।


​बीती वो उम्र

कागज़ की कश्ती वो

ढूँढे ये मन।


​ढलती उम्र

सूरज की लालिमा

शांति अपार।


​चेहरे झुर्री

किस्सों की ये किताब

उम्र की छाप।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/05/2026

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3. हाइकु- *आभूषण*


​चमक न्यारी

मुखड़े पे निखार

गहना प्यारा।


​काँच की चूड़ी

खनकती कलाई

पिया की याद।

​पुरानी रीति

सोने की ये चमक

विरासत है।


​बिना गहना 

रूप तेरा निखरे

सच्चा श्रृंगार।


​पायल बाजे

छम-छम आँगन

मन रिझाए।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/05/2026

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4. हाइकु - *आंधी तूफान*


नभ गरजा

धूल भरी आंधी है

दृश्य धुंधला।

पेड़ कांपते

तूफानी वेग बढ़ा

पत्ते उड़े हैं।

खिड़की बजी

शोर मचाती हवा

भय पसरा।

तिनके उड़े

बवंडर का खेल

धूल का घेरा।

चीखती हवा

बादलों की गर्जना

तीव्र बिजली।

जड़ें अडिग

झुक गई डालियाँ

वेग प्रचंड।

शांत हुआ है

तूफान का तांडव

सन्नाटा छाया। 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे (सत्यबोध)

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)06/05/2026

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5. हाइकु - जन्मदिवस की बधाई

​आया जन्मदिन

खुशियों की हो वर्षा

मंगलमय।


​उगे सूरज

नई राहें दिखाएँ

कामयाब हो।


​महके बगिया

बधाई के ये स्वर

गूँजते रहें।


​दीप जलते

अंधेरा दूर भागे

चमको सदा।


​सजें सपने

हौसलों की उड़ान

शुभकामना।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

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6. ​हाइकु- *धरोहर*

पुरानी यादें

सँजोए विरासत

धरोहर को।

सांझी संस्कृति

अनमोल खज़ाना

रखें सँभाल।

पुरखों की देह

माटी की है महक

अमर रहे।

कल की नींव

आज का गौरव है

शान देश की।

सभ्यता दीप

अँधेरे में प्रकाश

अमिट छाप।

पीढ़ी-से-पीढ़ी

मिलता उपहार

सच्चा धन है।

रक्षा संकल्प

कर्तव्य है हमारा

बचे धरोहर।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/05/2026

शनिवार, 21 मार्च 2026

दोहा छंद - गुरु (छत्तीसगढ़ी)

 दोहा छंद- 

गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर।

अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।01


गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम।

तोर कृपा ले हे मिले, मोला जग मा नाम।।02


देहू शुभ आशीष गुरु, अरजी हे कर जोर।

मन के श्रद्धा फूल हा, अर्पित हे पग तोर।।03


गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावँव माथ।

देवत शुभ आशीष ला, थामे रखहू हाथ।।04


तन मन सब बलिहार हे, गुरु चरनन मा मोर।

करहू पूरन काज सब, अरजी हे कर जोर।।05


रखौ हाथ गुरु माथ मा, आशिष दौ घनघोर।

रोज नवावँव माथ मँय, पावन पग मा तोर।।06


जिनगी के हर साँस मा, लेवँव गुरु के नाम।

भटका झन खावँव कभू, लेहू गुरु जी थाम।।07


बरगद पीपर पेड़ कस, गुरु हा देथे छाँव।

अंतस ला शीतल करै, गुरु के पावन पाँव।।08


धर ले श्री गुरु के शरण, मिलही उँहे मुड़ाव।

गुरु बर पीपर छाँव कस, देही हृदय जुड़ाव।।09

 

गुरु सागर के सीप अउ, पावन गंगा नीर।

कर लौ जिनगी ला सफल, आवव गुरु के तीर।।10


दीया बन गुरु ज्ञान के, अंतस करय अँजोर।

जिनगी मा गुरु के बिना, नइ होवय सुख भोर।।11


दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय जग ला ज्ञान।

भेद नहीं मन मा रखय, मानय एक समान।।12


गावँव गुरु गुनगान ला, नित अंतस धर ध्यान।

गुरु किरपा ले हे मिले, नाम मान पहिचान।।13


गुरु के पावन पाँव के, बन जावँव मँय दास।

करौं भक्ति अरदास मँय, जब तक तन मा साँस।।14


नइ होवय गुरु के बिना, जिनगी के उद्धार।

बनके खेवनहार गुरु, नाव लगावय पार।।15


गुरुवर तरुवर ज्ञान के, देथे शीतल छाँव।

जिनगी होथे धन्य जी, पाके पावन पाँव।।16


जिनगी के हर साँस हा, गुरु पग मा बलिहार।

राहय मुड़ मा हाथ गुरु, विनय करौ स्वीकार।।17


बनके ज्ञान प्रकाश गुरु, उजियारी बगराय।

जिनगी के उद्धार बर, सत मारग दिखलाय।।18


आखर-आखर भाव भर, गावँव गुरु गुनगान।

चलत रहय ये लेखनी, महिमा करत बखान।।19


बलिहारी गुरु के चरण, परँव नवाँ मँय माथ।

जिनगी के हर मोड़ मा, थामे रखिहव हाथ।।20


दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय सब ला ज्ञान।

गजानंद याचक बने, माँगय सुख वरदान।।21


श्रद्धा के पर्याय गुरु, निष्ठा के प्रतिमान।

रख समानता भावना, देथे सब ला ज्ञान।।22


लँगड़ा पर्वत लाँघथे, गूँगा पाय जुबान।

पंडित पोथी बाचथे, पाके गुरु ले ज्ञान।।23


भरथे गुण संस्कार गुरु, करथे दूर विकार।

जोत जलाथे ज्ञान के, हरथे मन अँधियार।।24


आथें गुरु दरबार मा, लोग अमीर गरीब।

पर पाथें सत ज्ञान ला, जेखर बड़े नसीब।।25


गुरु बरगद कस पेड़ बन, देथे शीतल छाँव।

कर लौ जिनगी धन्य सब, पाके पावन पाँव।।26


गढ़ अनपढ़ इंसान ला, गुरुवर ज्ञान लखाय।

सिरजै कुम्हार कस घड़ा, अंतस ला चमकाय।।27


गुरु महिमा गुनगान कर, होही बेड़ापार।

ये जिनगी गुरु के बिना, हवय कुलुप अँधियार।।28


बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।

बात गजानन ध्यान दौ, कर लौ गुरु गुनगान।।29


जिनगी मा गुरु ज्ञान बिन, नइहे कुछ अस्तित्व।

भव सागर ले पार बर, गुरु के समझ महत्व।।30


मनखे माटी के घड़ा, गुरुवर चाक कुम्हार।

जिनगी ला गुरु हे गढ़े, दिए ज्ञान उपकार।।31


गजानंद गुरु जौहरी, पारस ज्ञान समान।

सोना लोहा के करय, गुरु तुरते पहिचान।।32


गुरु अवगुण ला मेटथे, काटे भ्रम भय जाल।

सत रस्ता हम ला चला, ऊँच करावय भाल।।33


गुरु गीता गुरु बाइबिल, गुरु गुरुग्रंथ कुरान।

गुरु पग चारो धाम हे, गुरु सउँहत भगवान।।34


जिनगी मा गुरु के शरण, रहिथे जेन करीब।

वो मनखे राहय नहीं, अनपढ़ ज्ञान गरीब।।35


गुरु हरथे अभिमान ला, गुरु भरथे सद्ज्ञान।

गुरु पूजा मन से करौ, मिल जाही भगवान।।36


गुरु के दरजा हे सुनव, माता पिता समान।

मिले नहीं गुरु के बिना, सत्यबोध सद्ज्ञान।।37


तोर भरोसा हे खड़े, नइया हा मझधार।

बनके गुरु पतवार तँय, कर दे बेड़ापार।।38


करम धरम के सत मरम, गुरु देवय संदेश।

मानौ गुरु के सीख ला, पाहू सुख परिवेश।।39


गुरु काबा कैलाश अउ, गुरु हे चारो धाम।

गुरु मंदिर मस्जिद घलो, गुरु रहीम अउ राम।।40


पहला गुरु माता-पिता, दिये जन्म संस्कार।

दूजा गुरु शिक्षा दिये, ज्ञान जोत ला बार।।41


गुरु के ज्ञान अथाह हे, समझें नइ नादान।

गुरु गोविंद समान हे, कइसे करौं बखान।।42


जग मा शब्द अनंत गुरु, जानँय बिरला लोग।

गुरु महिमा गाये बिना, मिलय नहीं सुख जोग।।43


दीपक बन गुरु ज्ञान के, उजियारी बगराय।

मारग सत्य असत्य के, परख करे सिखलाय।।44


लाख कीमती धन भला, पर गुरु मोर अमोल।

जग मा गुरु के ज्ञान ला, कोई सकय न तोल।।45

दोहा छन्द- *गुरु*

गुरु हे पावन पूर्णिमा, गुरु अंजोरी रात।

गुरु सावन के मेघ बन, करय ज्ञान बरसात।।46


मन मन्दिर के देव गुरु, वंदन कर कर जोर।

जिनगी के बन नेंव गुरु, दै खुशियाली भोर।।47


देवय सुख उजियार गुरु, मेटय दुख अँधियार।

संस्कृति अउ संस्कार के, गुरु हावय भण्डार।।48


शब्द ज्ञान के खान गुरु, आशा अउ विश्वास।

वोखर बड़ा नसीब हे, गुरु हे जेखर पास।।49


गुरु के कोनों जाति नइ, नइहे कोनों धर्म।

देना सब ला ज्ञान सम, मानय पावन कर्म।।50


गुरु कबीर रविदास बन, गुरु बन घासीदास।

ज्योति पुंज गुरु बुद्ध बन, देथे ज्ञान उजास।।51


गजानंद गुरु के बिना, जिनगी भटका खाय।

बूंद अमिय गुरु ज्ञान के, जो पीये तर जाय।।52

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 09/07/2025

दोहा छन्द- *गुरु*

जप ले गुरु के नाम मन, होही बेड़ापार।

गुरु जिनगी के नाव के, हावय खेवनहार।।53


साँसा मा ले गुरु बसा, अंतस मा धर ध्यान।

बिन पाये गुरु ज्ञान ला, मिलय नहीं सम्मान।।54


नइ होवय गुरु हा गरू, धर ज्ञानी के गोठ।

भाव भजन गुरु के करे, होथे जिनगी पोठ।।55


हरथे गुरु अज्ञानता, ज्ञान जोत ला बार।

दूर बुराई ले रखे, दिसा दसा चतवार।।56


गुरुवर फूल गुलाब के, महकावय मन बाग।

गुरु के पा सानिध्य ला, खिल जाथे सुख भाग।।57


गावय गुरु गुणगान ला, सात खण्ड नौ दीप।

चमकय गुरु आशीष ले, सागर के भी सीप।।58


पेड़ बने गुरु ज्ञान के, देथे जुड़हा छाँव।

गजानंद अंतस जुड़ा, पावन पा गुरु पाँव।।59

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/07/2025


जिनगी भर पावत रहौं, गुरुवर आशीर्वाद।

छइँहा दौ गुरु ज्ञान के, हे अतके फरियाद।।60


करथे काम पुनीत गुरु, बाँटे जग ला ज्ञान।

चलथे जे गुरु राह मा, बनथे मनुज महान।।61


गुरु सागर ये ज्ञान के, मिलय कभू नइ थाह।

पालक बन गुरु शिष्य के, करे सदा परवाह।।62


गुरु ही ले जिनगी शुरू, गुरु ले जिनगी अंत।

गुरु ही ले पावत रहँव, सब दिन ज्ञान अनंत।।63


गुरु गुण ज्ञान गुनान कर, चलके गुरु के राह।

बिन गुरु के नइ तो मिले, ये जिनगी के थाह।।64


बाँटय ज्ञान विवेक गुरु, देवय सत सन्देश।

सीख धरे गुरु के मिटे, मानव मन से क्लेश।।65


साधिन गुरु सानिध्य ला, तुलसी सूर कबीर।

पाइन गुरु के ज्ञान ला, ऋषि मुनि संत फकीर।।66


बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।

सीख धरे गुरु के बनय, मूरख मनुज महान।।67


सच्चा गुरु के कर चयन, शब्द ज्ञान पहिचान।

सही दिशा अउ प्रेरणा, मिलही तब सद्ज्ञान।।68


याचक बन गुरु ज्ञान के, माँगत हावँव भीख।

पाँव बढ़य सत राह मा, आप सिखाहू सीख।।69


बाँटे ले भी नइ पड़े, गुरु के ज्ञान अकाल।

जे पाथे वो हो जथे, पल मा मालामाल।।70


गुरु के आशीर्वाद ही, असली सुख-सम्मान।

नइ खावस भटका कभू, धरले गुरु के ज्ञान।।71


गुरुवर किताब ज्ञान के, गुरुवर कलम दवात।

देके आशिष अउ कृपा, करथे सुख बरसात।।72


गुरु मा रख विश्वास तँय, पाबे ज्ञान प्रकाश।

बनही सुखमय जिंदगी, होही दुख के नाश।।73


शीश झुका गुरु के चरण, करौं अरज कर जोर।

पावत राहँव मँय सदा, जिनगी मा सुख भोर।।74


जब ले हे धरती गगन, जब ले हे संसार।

तब ले हे गुरु ज्ञान के, जिनगी मा आधार।।75


चंदन पेड़ समान हे, गुरु के ज्ञान विचार।

अंतस ला शीतल करे, मेटे दोष विकार।।76


समय घलो ला एक गुरु, गजानंद जी मान।

देथे सुख-दुख सीख ये, बुरा-भला के ज्ञान।।77


गुरुवापन गुरु के करौ, मिले ज्ञान भंडार।

अँधियारी दुख के भगे, होथे सुख संचार।।78


ज्ञान खजाना बाँट के, गुरु करथे उपकार।

जिनगी रूपी नाव के, गुरु ये खेवनहार।।79


गुरु गंगा के धार ये, गुरु सागर के सीप।

गुरु पावस के बूंद ये, गुरु पूजा के दीप।।80


दुनिया के कल्याण बर, ज्ञान धरे गुरु गूढ़।

गुरु के पा सानिध्य ला, सुधरे मनखे मूढ़।।81


सुबो शाम गुरु नाम लौं, घट भीतर हे धाम।

अइसन दीन दयाल ला, बारम्बार प्रणाम।।82


बिनती हे कर जोर गुरु, दे दौ जनम सुधार।

ये जिनगी के नाव ला, कर दौ भव ले पार।।83


करथे बरसा ज्ञान के, गुरु सब बर घनघोर।

रखय नहीं मन भेद गुरु, बाँधय सुमता डोर।।84


आथे श्रद्धा भाव रख, गुरु के जेन करीब।

पाथे गुरु के ज्ञान ला, जाथे सँवर नसीब।।85


नानक घासीदास गुरु, गुरु कबीर रैदास।

बनके गुरु इन अवतरिन, मेटे जग के त्रास।।86

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गढ़थे सभ्य समाज गुरु, बाँटे नेक विचार।

भरथे शुभ संस्कार गुरु, दिये ज्ञान उपहार।।87

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


सिखलाथे गुरु धर्म धर, रीति-नीति संस्कार।

जिनगी जीये के कला, नेक कर्म व्यवहार।।88

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


करथे गुरु गुनगान ला, सतगुरु ग्रंथ कुरान।

कहिथे गीता बाइबिल, गुरु के ज्ञान महान।।89

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


मन मा श्रद्धा भाव रख, कर ले गुरु के ध्यान।

अंतस निर्मल हो जही, पा के गुरु के ज्ञान।।90

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


जिनगी के धर मर्म गुरु, देथे सीख सलाह।

गुरु के ज्ञान अथाह हे, मिलय नहीं जी थाह।।91

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


मँय अज्ञानी पाय हँव, ज्ञान कृपा गुरु छाँव।

महिमा करे बखान बर, शब्द कहाँ ले लाँव।।92

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


जिनगी मा गुरु ज्ञान के, पी लेना दू बूँद।

येती-ओती झन भटक, बिरथा आँखी मूँद।।93

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


पहिली पूजन गुरु चरण, जो जग खेवनहार।

करके ज्ञान प्रकाश गुरु, मेटे मन अँधियार।।94

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


शीश झुका गुरु के चरण, वंदन बारम्बार।

दिये ज्ञान उपहार गुरु, हे बड़का उपकार।।95

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु बिन जिनगी ब्यर्थ हे, गुरु बिन जग अँधियार।

धर ले गुरु के ज्ञान गुण, हो जाबे भव पार।।96

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


बँध जै गुरु ले प्रीत तब, दुनिया लागे मीत।

गुरु प्रति सेवा भाव ही, हावय रीत अतीत।।97

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु के ज्ञान प्रकाश ले, बगरे जग उजियार।

गुरु महिमा गुनगान ला, गावय नित संसार।।98

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


ध्यान लगा सुन लौ सदा, गुरु वाणी अनमोल।

बसा रखौ गुरु नाम ला, अंतस पट ला खोल।।99

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


नेक कर्म अउ धर्म के, सिखलाथे गुरु पाठ।

पाये बिन गुरु ज्ञान ला, ये जिनगी हे काठ।। 100

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


दिव्य अलौकिक ज्ञान के, गुरु रखथे भंडार।

बाँटय समान रूप ले, जिनगी के सुख सार।।101

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


कर ले गुरु के वंदना, भाग्य सँवरही तोर।

मिट जाही संकट सबो, सुख मिलही घनघोर।।102

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


पावन गुरु के पाँव मा, रोज नवावँव माथ।

कर दौ जिनगी ला सफल, बन गुरु दीनानाथ।।103

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


रूप हवय गुरुदेव के, निराकार साकार।

गुरु के निर्मल ज्ञान ले, आलोकित संसार।।104

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


माँगत हँव आशीष गुरु, अंतस पट ला खोल।

दे दव गुरुवर ज्ञान के, धन मोला अनमोल।।105

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


भरथे मन मा भाव गुरु, कर्म करे बर नेक।

दिखलाथे सत राह गुरु, दोष बुराई छेक।।106

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु के ज्ञान गुरुत्व ले, जग के हे कल्यान।

गुरु के धर संदेश ला, बनथें मनुज महान।।107

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु ला वंदन दंडवत, करौं सुबह अउ शाम।

बोझिल जिनगी के डगर, हे गुरु लेवव थाम।।108

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


नेक कर्म ले गुरु मिले, ध्यान धरे ले ज्ञान।

संगत गुरु के दूर जे, मूढ़ उही इंसान।।109

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


कर लौ गुरु गुनगान ला, रइहू सदा प्रसन्न।

सुख जिनगी रख भाव गुरु, ज्ञान दिये सम्पन्न।।110

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु महिमा ले बढ़ इँहा, नइहे काहीं और।

दूर भक्ति गुरु के रहे, मिले नहीं जग ठौर।।111

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


संगत संत सुजान गुरु, निर्मल करय सुभाव।

सतगुरु सुमिरन ले मिटे, अंतस के भटकाव।।112

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


जिनगी मा गुरु ज्ञान ले, होथे नवा बिहान।

गुरु के पा आशीष ला, बनथें मनुज महान।।113

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु जिनगी के प्रेरणा, गुरु सुख के आधार।

गुरु माली बन ज्ञान के, बाग करे गुलजार।।114

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु गीता संदेश ये, गुरु बाईबिल सार।

गुरु गरुग्रन्थ कुरान ये, गुरु ज्ञानी करतार।।115

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


नित बंदँव श्री गुरु चरण, झुका अपन मँय माथ।

सुख मा दुख मा आप गुरु, रखहू मुड़ मा हाथ।।116

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


ज्ञान दीप ला बार के, हरथे सब अँधियार।

नइ होवय गुरु के बिना, दुनिया मा उजियार।।117


अबड़ लुटाथे गुरु मया, देथे शिक्षा दान।

गुरु के चरन पखार के, पाथें सब सम्मान।।118


भटकत हंसा तार दै, मेटय मन के पीर।

गुरु के महिमा हे अगम, जइसे गंगा नीर।।119


सत के मारग दै बता, रखय कपट ले दूर।

शीश नवा गुरु के चरन, ज्ञान मिले भरपूर।।120


बार ज्ञान के दीप गुरु, मेटय मन अँधियार।

गुरु के पावन पाँव मा, वंदन बारम्बार।।121


कथरी ओढ़े ज्ञान के, गुरु जी रचे विधान।

जिनगी मा रख सादगी, जग मा पाथे मान।।122


माटी कस अनगढ़ रहय, लइका मन के जान।

गुरु जी गढ़य कुम्हार कस, सब ला एक समान।।123


जनम दिये दाई ददा, गुरु जी ज्ञान विवेक।

सहीं झूठ के कर परख, राह दिखावय नेक।।124


ज्ञान मिलय नइ गुरु बिना, चाहे पढ़व पुरान।

गुरु ही भव ले तारथे, कहिथे ग्रंथ कुरान।। 125

02/05/2026

दोहा छंद- *गुरु महिमा*


बिन स्वारथ के बाट गुरु, देखावय दिन-रात।

अड़बड़ गहिर विचार हे, ओखर मन के बात।। 126


गुरुवर घड़ा कुम्हार कस, गढ़थे रूप अनूप।

चेला ला गुरु वइसने, देवय गजब स्वरूप।।127


तिरबेनी कस छाय हे, गुरु के आशिष छाँव।

सुख जिनगी रद्दा मिलय, धर ले गुरु के पाँव।।128


माई-कोरा ले निकल, गुरु कोरा जब जाय। 

लइका बनय सुजान तब, सुग्घर मान कमाय।।129


सागर कस गंभीर गुरु, हिरदे रखय उदार।

सत्यबोध गुरु के चरण, बहिथे सुख के धार।।130 

05/05/2026

गुरु गंगा के धार अउ, गुरु हे खेवनहार।

भटकत हंसा गुरु बिना, नइ होवय भव पार।।131


गुरु हे संत कबीर अउ, गुरु हे घासीदास।

ढोंग रूढ़ि पाखण्ड के, तोड़िन जे मन फाॅंस।।132


गुरु धरती आकाश अउ, गुरु हे सुरुज समान।

करथे जग उपकार गुरु, बनके ज्ञान विधान।।133


पा के गुरु किरपा चढ़य, लॅंगड़ा ऊॅंच पहाड़।

अँधरा सुख सपना गढ़य, हरहा भरय दहाड़।।134


गुरु दीपक बन ज्ञान के, हरय तिमिर अज्ञान।

अंतस ला उजियार कर, दिखलावय भगवान।।135


शून्य हृदय ला शब्द दय, गढ़-गढ़ सुंदर रूप।

शिष्य सँवारय गुरु सदा, बनके ज्ञान अनूप।।136


गुरु के महिमा हे अगम, सागर ले गंभीर।

हर लेवय गुरु ज्ञान ले, अंतस के सब पीर।।137

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2026

दोहा छंद- *गुरु महिमा*


गुरु जी ज्ञान विचार दय, मेटय मन के दोष।

दूर करय भ्रम भावना, देवय सुख संतोष।।138


गुरु ये रूप कुम्हार के, माटी शिष्य शरीर।

गढ़य घड़ा कस देह गुरु, चमकावय तकदीर।।139


नाॅंव कमावय शिष्य हा, पा गुरु आशिष छाॅंव।

सुख के चारों धाम हे, गुरु के पावन पाॅंव।।140


बलिहारी श्री गुरु चरण, हे ये जिनगी मोर।

बाॅंधे रखहू आप गुरु, सदा दया के डोर।।141


जब तक तन मा साॅंस हे, जपौं सदा गुरु नाम।

करौ कृपा घनघोर गुरु, होय सफल सब काम।।142


मिलथे बड़ सौभाग्य ले, गुरु के आशिर्वाद।

मानौं सच भगवान मॅंय, मातु-पिता के बाद।।143


होगे हावय धन्य गुरु, एक जनम ये मोर।

बिनती हे अगले जनम, पावॅंव किरपा तोर।।144

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु महिमा गुनगान ला, गावॅंव मॅंय दिन-रात।

दिये हवय गुरु ज्ञान के, मोला सुख सौगात।।145


ये ज़िनगी मा हे मिले, गुरु किरपा जी सार।

कइसे पाहूॅं मॅंय चुका, गुरु के ज्ञान उधार।।146


मुक्ति मिलय नइ गुरु बिना, भटकत रहिबे रोज।

सत रसता नित देखबे, कर ले गुरु के खोज।।147


पहिली गुरु हे मातु हा, पिता ज्ञान के रूप।

गुरु चरनन मा स्वर्ग हे, जइसे छइँहा-धूप।।148


माटी कस हे देह ये, गुरु हा आय कुम्हार।

चुपके-चुपके ठोक के, देवय रूप सॅंवार।।149


सब तीरथ गुरु के चरन, करथे सुख धर वास।

मिले जिहाॅं गुरु के कृपा, मिटय भरम अउ त्रास।।150


पाये बिन गुरु ज्ञान ला, भटकत रहिथे जीव।

गुरु के चरन पखार ले, बनही पक्का नींव।।151

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

पा के गुरु के ज्ञान ला, बनथे शिष्य सुजान।

गढ़थे सभ्य समाज अउ, लाथे नवा बिहान।।152


देथे शुभ संस्कार गुरु, मन के मेट विकार।

बनके खेवनहार गुरु, नाव लगाथे पार।।153


गुरु बिरवा बन ज्ञान के, देथे शीतल छाॅंव।

पा के गुरु सानिध्य ला, मिट जाथे भ्रम घाॅंव।।154


मेटय गरब गुमान के, अंतस ले गुरु फाॅंस।

गा ले गुरु गुनगान मन, जब तक तन मा साॅंस।।155


छोड़ सुवारथ ला सबो, गुरु हा देथे ज्ञान।

गुरु के दरजा ऊॅंच हे, कहिथे ग्रंथ कुरान।।156


का सादा रंगीन का, चिनहा देथे नीत।

सत्य डगर मा ले जथे, गुरु हा बनके मीत।।157


गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु हे, गुरु हा आय महेस।

जेकर मन मा गुरु बसे, दूर होय सब क्लेस।।158

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

मातु-पिता जग जन्म दय, गुरु हा देवय ज्ञान।

सत मारग जे ले चलय, गुरु हे उही महान।।159


धरती बर भगवान गुरु, सागर बर ये सीप।

जग बर ज्ञान प्रकाश गुरु, अँधियारी बर दीप।।160


पूजा के ये थाल गुरु, मन मंदिर के देव।

मानय सब ला एक गुरु, छोड़ सबो भ्रम भेव।।161


गुरु चंदन के पेड़ बन, महकावय मन द्वार।

गुरु महिमा ला कोंन कब, पाइस हावय पार।।162


जिनगी के हर साॅंस मा, राहय गुरु के नाम।

करही भव ला पार गुरु, गुरु चरनन लौ थाम।।163


चमकावय नित लेखनी, गुरु जी बनके स्याह।

पड़य नहीं तो कम कभू, गुरु के ज्ञान अथाह।।164


सत्यबोध गुरु के चरन, जस गंगा के धार।

धोवय मन के पाप ला, लेवय नाव उबार।।165

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

कहिथें ओर न छोर हे, गुरु के ज्ञान अनंत।

महक उठे पतझड़ घलो, जइसे फूल बसंत।।166


गुरु के आशीर्वाद ले, होय सफल सब काम।

गुरु के सेवा ला करत, मिलथे सुख के धाम।।167


गुरु ला अंतस ले बिठा, गुरु हे भ्रम के काल।

गुरु अवगुण ला मेटथे, बनथे दुख मा ढाल।।168


गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावॅंव माथ।

पावॅंव नित आशीष गुरु, मुड़ मा रखहू हाथ।।169


गुरु के सेवा कर मनुज, गुरु ला मन मा धार।

शिष्य परम बन जोड़ ले, गुरु ले मन के तार।।170


दिखलाथे गुरुवर दिशा, दशा रहे विपरीत।

गुरु ले बढ़के हे नहीं, ये दुनिया मा मीत।।171


सब ला अलगे मोर गुरु, जेखर सुग्घर बैन।

दर्शन जेखर पाय बर, रहिथे मन बेचैन।।172

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/05/2026


बुधवार, 18 मार्च 2026

कुण्डलिया छंद - (छत्तीसगढ़ी जनउला)

[01] कुण्डलियाँ छंद - जनउला


रहिथे दू ठन गोलवा, एक बीच मा छेद।
घूमे चिपका अंग ला, जानौ येखर भेद।।
जानौ येखर भेद, दबा मुट्ठा भर लेना।
बइठे टाँग पसार, डार दाना तॅंय देना।।
सत्यबोध बड़ काम, के हरे ये जी कहिथे।
छितका कुरिया बैठ, दरद मा कलरथ रहिथे।।

इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/03/2026
उत्तर- (जाॅंता)

[02] कुण्डलिया छन्द- *जनउला*

छितिका कुरिया मा करै, भुक्कुड़दुम आवाज।
नवा जमाना आय ले, हवय नँदावत आज।।
हवय नँदावत आज, गाँव ले ये हा भाई।
कूटॅंय छरॅंय अनाज, जेन मा मिल भौजाई।।
नइ जानँय जी फेर, आज के नवा बहुरिया।
सत्यबोध सुनसान, पड़े हे छितिका कुरिया।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/03/2026
उत्तर- (ढेंकी)

[03] कुण्डलिया छंद- *जनउला* 

हावय का तुॅंहला पता, संगी येखर नाँव।
गोल-गोल चाकर रहै, दू ठन जेखर पाँव।।
दू ठन जेखर पाँव, रहै जे लम्बा ठाढ़े।
खेत किसानी काम, बिना येखर नइ माढ़े।।
बइला भइॅंसा फाॅंद, बराती सब झन जावय।
सत्यबोध फिर आज, नॅंदावत ये हर हावय।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/03/2026
उत्तर - (गाड़ा)

[04] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

माटी-गोटी ला सुघर, देवय छाँट निमार।
भौजी लेके हाथ मा, फूनय चाँउर दार।।
फूनय चाँउर दार, संग मा कनकी कुटकी।
रँधनी घर के शान, कहत हे बहिनी छुटकी।।
रोज बिहनिया शाम, बहू मन बैठ मुहाटी।
फूनँय चाँउर दार, निमारँय गोटी-माटी।।
उत्तर -(सूपा)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/03/2026

[05] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

कारी जंगल बीच मा, जेखर रहय निवास।
पानी पीयय लाल ये, जब-जब मरय पियास।।
जब-जब मरय पियास, चाल तब तुरतुर चलथे।
परजीवी बन जीव, हमेशा ये हर पलथे।।
सत्यबोध जी नाँव, हवय पूछत सॅंगवारी।
देहू आप बताय, रहय जे छोटे कारी।।
उत्तर - (जुआँ)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/03/2026

[06] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

दिन भर जे अल्लर रहय, रतिहा मा ठड़िहाय।
पतला पर लंबा इही, छूये मा अटियाय।।
छूये मा अटियाय, रखय ये कसके बाँधे।
जेन करय उदबास, पाँव ला वोखर छाॅंदे।।
बबा जमाना खूब, मिलय जी ये हर घर-घर।
सत्यबोध चुपचाप, रहय कोना मा दिन भर।।
उत्तर - (गेरवा)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/03/2026

[07] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

राहय डबरी नानकुन, जेमा बुड़े जहाज।
पानी पीयय पूॅंछ ले, बूझव येखर राज।।
बूझव येखर राज, जला लौ मन के बाती।
घर करथे उजियार, जलय जब ये हा राती।।
सत्यबोध धर धीर, बहुत पीरा ला साहय।
मंदिर मा नवरात, जगमगावत ये राहय।।
उत्तर - (दीया)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/03/2026

[08] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

बाँधय टूरा नानकुन, कूद-कूद के पार।।
देहू उत्तर ला बता, संगी बन हुशियार।।
संगी बन हुशियार, बुता येमा तो करथें।
धारदार जी नोंक, देख मनखे मन डरथें।।
सत्यबोध बड़ काम, खाँध मा ये हर खाँधय।।
कूद-कूद के पार, नानकुन टूरा बाँधय।।
उत्तर- (सूजी)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/03/2026

[09] कुण्डलिया छन्द- *जनउला*

जीयय जब तक आदमी, तक तक येला खाय।
कहिथें सब येखर बिना, स्वाद घलो नइ आय।।
स्वाद घलो नइ आय, घरो-घर पाये जाथे।
रंगत धरे सफेद, मान सब ले बड़ पाथे।।
नीबू शरबत संग, घोल येला तो पीयय।
सत्यबोध उपयोग, करै जब तक जग जीयय।।
उत्तर- नून

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/03/2026

[10] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रस राहय बड़ भीतरी, देह दिखे जी लाल।
बिंदी सजे हे माथ मा, चिक्कन-चिक्कन गाल।।
चिक्कन-चिक्कन गाल, देख के मन ललचाथे।
बइठे बीच बजार, भाव ये अब्बड़ खाथे।।
तभो सुवारी मोर, बिसा के लाना काहय।
सत्यबोध जी अंग, भराये बड़ रस राहय।।
उत्तर- पताल

✍🏻 इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/03/2026

[11] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लाली-लाली तन रहय, आगी कस अंगार।
मूड़ी मा ठाड़े  मुकुट, छूवत  मा बड़ झार।।
छूवत  मा  बड़ झार, देख  के  बाबू  खाबे।
नइ राहय  जी दाँत, तभो  ला ये  हा चाबे।।
सत्यबोध  डर्राय,  रहे   राजा   या  माली।
तरकारी के शान, दिखे मा  लाली-लाली।।
 उत्तर- लाल मिर्चा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/03/2026

[12] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

बत्तिस भाई एक घर, धरके खुशी उमंग।
लाल महल के बीच मा, रहिथें मिलके संग।।
रहिथें मिलके संग, चबावत चना चबेना।
का हड्डी का मांस, चीथ दय सबके डेना।।
आगू रहय कपाट, पीछु मा गहरा खाई।
सत्यबोध मिल संग, रहय जी बत्तिस भाई।।
उत्तर- दाँत 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/03/2026

[13] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

देखय दुनिया ला मगर, खुद ला देख न पाय।
बिना पंख के उड़ चलय, झट ले आवय जाय।।
झट ले आवय जाय, निभावय जिम्मेदारी।
अँधियारी मा सोय, जगय ये पा उजियारी।। 
सत्यबोध दे ध्यान, झूठ सच राह सरेखय।
तन के छोटे रूप, सदा दुनिया ला देखय।।
उत्तर- आँख

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/03/2026

[14] कुण्डलियाँ छन्द- *जनउला*

पानी भरे अथाह अउ, जटा जूट हे अंग।
बिना धार के धार धर, बहिथे लिये उमंग।।
बहिथे लिये उमंग, सबो के प्यास बुझाथे।
बनके इही प्रसाद, चढ़ाये मंदिर जाथे।।
चाहत हवॅंव जवाब, बतावव बन तुम ज्ञानी।
ऊपर रहय कठोर, भरे भीतर मा पानी।।
उत्तर- नारियल

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/03/2026

[15] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

चोला रखे सफेद ये, गाँव-गली बेचाय।
जनम धरे जी धान ले, मनखे येला खाय।।
मनखे येला खाय, हवय बहुते गुणकारी।
हल्का-फुल्का देह, करे ये दूर बिमारी।।
गरम रेत मा कूद, फूल बनगे हे गोला।
सत्यबोध इतराय, धरे ये सुघ्घर चोला।।
उत्तर- मुर्रा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/03/2026

[16] ​कुण्डलिया: *जनउला*

​अँधियारी ला मार के, देवय उज्जर जोत।
सुलगावय तन ला खुदे, रतिहा भर ये रोत।।
रतिहा भर ये रोत, देह हा घूरत जावय।
बिन आगी के काम, कभू ये नइ तो आवय।।
सत्यबोध जी नाम, बुझव जल्दी सँगवारी।
खतम होय जब देह, फेर छावय अँधियारी।।
उत्तर- मोमबत्ती

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/03/2026

[17] ​कुण्डलिया: *जनउला*

काँटा खूँटी ले बचा, रखथे ये हा पाँव।
पहन चले जी आदमी, धूप रहे या छाँव।।
धूप रहे या छाँव, सहे हे गरमी जाड़ा।
घर के बाहर होय, सदा जी येकर माड़ा।।
सत्यबोध इंसान, इही मा मारय चांटा।
बिन पहने तो पाँव, चले मा गड़थे काँटा।।
उत्तर- पनही

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[18] कुण्डलिया छन्द- *जनउला*

अइठे-अइठे गोल अउ, अंग संतरा रंग।
खाये मा अबड़े सखा, मन मा भरय उमंग।।
मन मा भरय उमंग, चासनी रस मा डूबे।
चिपचिप करथे हाथ, खाय बर जब भी छूबे।।
सत्यबोध बाजार, बीच मा राहय बइठे।
अंग संतरा रंग, गोल अउ अइठे-अइठे।।
उत्तर- जलेबी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[19] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

आगी-अँगरा ला सहॅंव, का दुख ला बतलाॅंव।
लोहा के मॅंय तन धरे, चूल्हा तीर सुहाॅंव।।
चूल्हा तीर सुहाॅंव, पाँव ला दू ठन राखे।
देवव आप बताय, काय कहि मोला भाखे।।
सहिथॅंव बड़ संताप, तभो नइ होवॅंव बागी।
सत्यबोध जी भाग्य, मा हवै अँगरा-आगी।।
उत्तर- चिमटा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[20] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

करिया-करिया देह रख, बइठे चूल्हा बीच।
गोल-गोल रोटी गढ़य, भूख ला देवय खींच।।
भूख ला देवय खींच, गरम जब होथे भारी।
रखव बचा के हाथ, जले झन उँगली यारी।।
सत्यबोध सुन मीत, आग मा जरथे दरिया।
भरय सबो के पेट, रखे तन करिया-करिया।।
उत्तर- तवा 

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[21] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

टेढ़ा-मेढ़ा रेंगथे, बिना पाँव के राह।
बिना कान आँखी रखे, जीये के जे चाह।।
जीये के जे चाह, छीन कतको के लेथे।
जहर भराये दाँत, खौफ मन मा भर देथे।।
सत्यबोध धर ध्यान, बने झन रहिबे येड़ा। 
जेकर ले तो जान, बचे चल टेढ़ा-मेढ़ा।।
उत्तर- सांप

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/03/2026

[22] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लाली कलगी मूड़ मा, दू ठन रहिथे टांग।
देथे रोज बिहान के, कुकड़ू-कू जे बांग।।
कुकड़ू-कू जे बांग, करत गिंजरे घर कोला।
कुछ मनखे के जात, पका खाथें भी ओला।।
सत्यबोध हर रोज, लगे हे बांग निराली।
दू ठन रहिथे टांग, मूड़ मा कलगी लाली।।
उत्तर- कुकरा (मुर्गा)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/03/2026

[23] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लोहा के हे चोंच अउ, लकड़ी के हे देह।
अब्बड़ गहिर उलेचथे, माटी ऊपर नेह।।
माटी ऊपर नेह, कोड़ के भुइॅंया फाड़े।
जुग-जुग ले ये वीर, खेत मा झण्डा गाड़े।।
सत्यबोध सुन मीत, सुनावय हलधर दोहा।
लकड़ी के हे देह, चोंच हा ओकर लोहा।।
उत्तर- नाॅंगर (हल)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/03/2026

[24] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

कारी भूरी देह अउ, मकड़ी जइसे रूप।
तन मा तो हड्डी नहीं, देख छुपय जे धूप।।
देख छुपय जे धूप, जहर के प्याला धरके।
जेकर ले सब लोग, रहय जी दुरिहा डरके।।
सत्यबोध जी नाॅंव, बतावव तो सॅंगवारी।
मारय जब ये डंक, पसीना छूटय कारी।।
उत्तर- बिच्छू 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/03/2026

[25] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

खंभा जइसे गोड़ अउ, सूपा जइसे कान।
पार येकरो पाय नइ, गजब गढ़े भगवान।।
गजब गढ़े भगवान, नाक हा लंबा भारी।
दू ठन राहय दाँत, लगे जे धरहा आरी।।
सत्यबोध सब लोग, देख के होय अचंभा
आँखी राहय छोट, गोड़ हा मोटा खंभा।।
उत्तर- हाथी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/03/2026

[26] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

डारा-पाना ला चरय, मिमियावय दिन-रात।
चार गोड़ के जानवर, कहय मिठावय बात।।
कहय मिठावय बात, दूध जेकर गुणकारी।
गांधी बाबा संग, रहय ये हा सॅंगवारी।
सत्यबोध सुन मीत, गिंजरे पारा-पारा।
प्यारा पीपर पान, चरय जे डारा-पाना।।
उत्तर - छेरी (बकरी)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/03/2026

[27] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

राहय संगे संग जे, कभू न छोड़य साथ।
पकड़े बर धॅंय दउड़बे, आय न ककरो हाथ।।
आय न ककरो हाथ, घाम मा तन ला तानय।
अँधियारी मा जाय, बात ये सब झन जानय।।
सत्यबोध जी बूझ, बता येला का काहय।
कभू न छोड़य साथ, संग मनखे के राहय।।
उत्तर - (परछाई)

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/03/2026

[28] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

कचरा कुड़ा बटोरथे, घर-घर करथे काम।
सुरुज उगे ला जागथे, नइ पावय आराम।।
नइ पावय आराम, रखय घर अँगना सुग्घर।
कोना-कोना खोर, रहय जेकर ले उज्जर।।
काम करे बर जेन, कभू नइ मारय ढचरा।
सत्यबोध उठ रोज, सफाई करथे कचरा।।
उत्तर - झाड़ू

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/03/2026

[29] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

मूसर कस मुँह हा दिखे, ठाड़े राहय कान।
कुतुर-कुतुर कुतरय लुका, घर के सबो समान।।
घर के सबो समान, बचय ना जेकर मारे।
रहिथें सब हलकान, रात-दिन नैन निहारे।।
सत्यबोध ये जीव, बील मा राहय घूसर।
छोटे चोखी दांत, लगे मुँह जइसे मूसर।।
उत्तर - मुसवा (चूहा)

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/03/2026

[30] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे कुबरा पीठ अउ, सादा जेकर चाम।
दिखथे पेट चिराय कस, आथे पूजा काम।।
आथे पूजा काम, संग मा रखय पुजारी।
मोर मुकुट के संग, लगय ये बड़ मनुहारी।।
सत्यबोध सब लोग, बता येला का कहिथे।
सादा जेकर चाम, पीठ हा कुबरा रहिथे।।
उत्तर - कौड़ी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/03/2026

[31] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

पथरा कस हे पीठ अउ, पानी तरी निवास।
धीर धरे ये रेंगथे, धीर धरे लय साॅंस।।
धीर धरे लय साॅंस, अजब के जीव कहाथे।
मुड़ गोड़ ला खींच, खोल मा अपन समाथे।।
सत्यबोध जी बूझ, खाय चुप माटी कचरा।
सौ ले ऊपर साल, जेन जीयय बन पथरा।।
उत्तर- कछुआ

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/03/2026

[32] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे साथी बन खड़े, का बारिस का घाम।
एक गोड़ के जीव ये, बूझव संगी नाम।।
बूझव संगी नाम, गजब हे जेकर माया।
बिन हड्डी के जेन, रखे हे करिया काया।।
सत्यबोध चुपचाप, खुदे जे दुख ला सहिथे।
का बरसा का घाम, खड़े बन साथी रहिथे।।
उत्तर - छाता

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/03/2026

[33] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

हरियर-हरियर तन दिखे, बीजा भरे शरीर।
फल पानी गुरतुर लगे, उगय नदी के तीर।।
उगय नदी के तीर, नार मा ये हा फरथे।
खाथें बना सलाद, रोग-राई ला हरथे।।
सत्यबोध खा खूब, देह ला राखय फरियर।
बीजा भरे शरीर, दिखे तन हरियर-हरियर।।
उत्तर- खीरा

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/04/2026

[34] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रोवत रतिहा भर रहय, धरय नहीं जे धीर।
कुकुर बरोबर तन दिखे, राहय नदिया तीर।।
राहय नदिया तीर, खीर बर मन डोलावय।
बहुते चतुर सुजान, बतावव का कहलावय।
माड़ा तरी लुकाय, भोर जइसे ही होवत।
सत्यबोध जी शोर, करय जे हरदम रोवत।।
उत्तर- कोलिहा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/04/2026

[35] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

दूर शहर मइके बसे, गाँव-गाँव ससुरार।
गली-गली डउका खड़े, घर-घर मा परिवार।।
घर-घर मा परिवार, नार कस फइले हावय।
जेकर बिन सुख चैन, कहाँ कोनो ला आवय।।
जेकर ले हे होत, सबो के दिन रात बसर।
सत्यबोध जी कोन, रखे मइके दूर शहर।।
उत्तर- बिजली

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/04/2026

[36] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

तन मा जेकर गाँठ अउ, मन मा भरे मिठास।
उगथे भर्री खेत मा, साध स्वाद के आस।।
साध स्वाद के आस, नदी रस के बोहाथे।
खूब करय गुनगान, जउन भी येला खाथे।।
सत्यबोध सुन मीत, काम आथे जीवन मा।
बांस सहीं जी देह, गाॅंठ राहय अउ तन मा।।
उत्तर - कुसियार

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/04/2026

[37] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे एके ठौर मा, सत्तर अस्सी लोग।
बिना हाड़ के तन रहय, मिटथे खाये रोग।।
मिटथे खाये रोग, रखय तन सादा जे हा।
सब्जी के ये शान, स्वाद मा प्यारा ये हा।।
सत्यबोध जी बूझ, बतावव तो का कहिथे।
खाथें कतको भून, खाय मा चिप्पुर रहिथे।।
उत्तर- लहसुन

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/04/2026

[38] कुण्डलिया-​ *जनउला*

बीजा फल मा नइ रहय, बिना हाड़ के रूख।
खाये मा मीठा अबड़, संग मिटावय भूख।।
​संग मिटावय भूख, सबो के मन ला भावय।
पाके मा पिंवराय, बतावव का कहलावय।।
लाथें सुनव खरीद, हमर दीदी अउ जीजा।
दर्जन मा बेचाय, रहय नइ जेमा बीजा।।
उत्तर - केरा

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/04/2026

[39] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

हरियर लुगरा ला पहिन, दाढ़ी रखय सफेद।
दांत दिखय जी सोन कस, बूझव येकर भेद।।
बूझव येकर भेद, भूंज के जेला खाथें।
तन मा नींबू नून, चुपर के स्वाद बढ़ाथें।।
चाव लगा के खाव, रखय ये मन ला फरियर।
ठाड़े राहय खेत, पहिन लुगरा ला हरियर।।
उत्तर - जोंधरी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/04/2026

[40] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

राजा के नइ राज मा, नइ माली के बाग।
खा येला बिन टोर के, अपन जगा ले भाग।।
अपन जगा ले भाग, जुड़ा जाही जी चोला।
छोट-छोट अउ गोल, रहय ये ठंडा गोला।।
मिलय नहीं कुछ स्वाद, तभो ले संगी खा जा।
बनथे अपने आप, कहाॅं ले पाही राजा।।
उत्तर - करा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/04/2026

[41] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

कारी भूरी तन दिखे, गुदगुद ले मोटाय।
मुड़ मा पहिरे हे मुकुट, मन ला अबड़े भाय।।
मन ला अबड़े भाय, बना भर्ता तॅंय खा ले।
खट्टा घलो मिठाय, मान गुन महिमा गा ले।।
सत्यबोध जी बूझ, नाम का हे तरकारी।
गुदगुद ले मोटाय, रखे तन भूरी कारी।।
उत्तर - भाटा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/04/2026

[42] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

डारा पाना फूल फर, आवै सब हा काम।
गुदा भराये देह मा, बूझव येकर नाम।।
बूझव येकर नाम, साॅंप कस झूलत रहिथे।
छेवरहिन बर आय, दवाई दाई कहिथे।।
सत्यबोध जे खाय, माॅंग फिर खाय दुबारा।।
आवै बहुते काम, फूल फर पाना डारा।।
उत्तर - मुनगा 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/04/2026

[43] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

तन मा खाकी पान के, ओढ़े जे हा खाल।
दिखे मुड़ी हा लाल अउ, उगले धुआँ कमाल।।
उगले धुआँ कमाल, भीतरे भीतर सुलगे।
ददा बबा के रूप, नजर मा रहि-रहि झुलगे।।
सत्यबोध जे रोग, धराथे ये जीवन मा।
सुग्घर खाकी पान, खाल ओढ़े जे तन मा।।
उत्तर - बीड़ी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/04/2026

[44] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

दिन मा आवय एक तो, एक ह आवय रात।
अविनासी बन हें खड़े, जग मा सुख बगरात।।
जग मा सुख बगरात, धरे आगी के गोला।
उजियारी जुड़ छाँव, जुड़ावत सबके चोला।।
सत्यबोध आधार, बने हे जे जीवन मा।
एक ह आवय रात, एक आवय जी दिन मा।।
उत्तर -  चंदा-सुरुज 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/04/2026

[45]कुण्डलिया छंद- *जनउला*

देह गुलाबी चूनरी, भीतर रहय सफेद।
ऊपर जटा सुहाय हे, बूझव येकर भेद।
बूझव येकर भेद, परत दर परत उघारत।
खाथें बना सलाद, जीभ ला सब चटकारत।।
सत्यबोध जी जेन, रखय नित शान नवाबी।
काटत मा रोवाय, साज के देह गुलाबी।।
उत्तर - प्याज 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/04/2026

[46] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

हरियर पींयर रंग अउ, सोहे सगा सिंगार।
बिन बोले बतियाय जे, साज सजन के प्यार।।
साज सजन के प्यार, खननखन खनके बढ़िया।।
का कहिथे बतलाव, जेन ला छत्तीसगढ़िया।
आय सुहाग प्रतीक, गजब के पावन फरियर।
सत्यबोध मन भाय, रंग धर पींयर हरियर।।
उत्तर - चूरी 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/04/2026

[47] कुण्डलिया छंद- *जनउला* 

हाॅंसय बिन मुॅंह कान के, राखे दाॅंत हजार।।
उलझे ला सुलझाय अउ, देवय रूप सँवार।
देवय रूप सँवार, शिकारी पर कहलावय।
कारी जंगल बीच, शेर ला मार गिरावय।।
सत्यबोध जे जाल, फेंक बैरी ला फाॅंसय।
राखे दाॅंत हजार, गजब के खुल-खुल हाॅंसय।।
उत्तर - कंघी (ककई)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/04/2026

[48] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

मनखे अइसन एक जे, थामे हाथ किताब।
कोट पहिन हे के खड़े, देवत न्याय हिसाब।।
देवत न्याय हिसाब, लड़िस पिछड़े वंचित बर।
करिस बहुत संघर्ष, ज्ञान अर्जित संचित बर।।
सत्यबोध पर आज, सत्य ला कोंन सरेखे।
करिस जगत कल्याण, मसीहा बन जे मनखे।।
उत्तर - बाबा साहब भीमराव अंबेडकर 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/04/2026

[49] कुण्डलिया छन्द- *जनउला*

बन मा लेथे जे जनम, रहिथे रुखवा डार।
अंग-अंग मा रस भरे, करथे पर उपकार।।
करथे पर उपकार, रोग ला दूर भगाथे।
रोज बिहनिया लोग, जेन ला कुचर चबाथे।।
सत्यबोध जी नाम, बुझव तो संगी मन मा।
बनके रुखवा डार, जनम लेथे जे बन मा।।
उत्तर - दतवन (मुखारी)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/04/2026

[50] ​कुण्डलिया- *जनउला*

​करिया हे तन लाट कस, माथ मुकुट के भार।
मुँह मा डारँय स्वाद बर, मिटय रोग के धार।।
मिटय रोग के धार, दाँत के पीरा भागय।
चाय-पान के शान, देख के मन हा जागय।।
दू अक्षर के नाम, मसाला के ये दरिया।
सत्यबोध जी बूझ, रहय तन जेकर करिया।।
उत्तर - लौंग

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर(छत्तीसगढ़) 16/04/2026

[51] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

जे हा गंदा चाल रख, भिनभिन करथे शोर।
रोग बढ़ाथे गाँव घर, घूम-घूम चहुॅंओर।।
घूम-घूम चहुॅंओर, गंदगी ला फइलाथे‌।
बिना सुई के जेन, सबो ला सुई लगाथे।।
सत्यबोध जी बूझ, कहाथे का तो ये हा।
भिनभिन करथे शोर, चाल गंदा रख जे हा।।
उत्तर - मच्छर

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/04/2026

[52] कुण्डलिया छंद - जनउला 

जनमे हे बिन पेड़ के, बादर के धर जोर।
निकले धरती फाड़ के, छतरी ताने छोर।।
छतरी ताने छोर, सबो के मन ला भाथे।
धरके भारी भाव, हाट मा जे बेचाथे।।
काया दिखे सफेद, उगे हे घर अउ बन में।
बिना पेड़ के कोंन, बतावव तो हे जनमे।।
उत्तर - पिहरी (पुटु)

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/04/2026

[53] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

टप-टप टपकय भोर मा, देहू नाम बताय।
मधुरस जइसे रस भरे, देख जिया ललचाय।।
देख जिया ललचाय, बने जब ये हा दारू।
बनथें पी मतवार, बहोरिक कका समारू।।
घुघरी गजब मिठाय, लोग खाथें जी गप-गप।
काया धरे सफेद, भोर मा टपकय टप-टप।।
उत्तर - महुआ 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/04/2026

[54] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

बइठे ठाड़े नाक मा, पकड़े दूनों कान।
आँखी के टोपा बने, देखे जेन जहान।।
देखे जेन जहान, पढ़े पोथी अउ पाती।
जिनगी मा उजियार, करे हे बन सुख बाती।।
सोये मा सुरताय, जगे मा राहय अइठे।
सत्यबोध जी कोंन, नाक मा ठाड़े बइठे।।
उत्तर - चश्मा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/04/2026

[55] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

झर-झर झरथे देह ले, पाथे जब-जब घाम।
छाँव देख मुरझाय हे, बूझव संगी नाम।।
बूझव संगी नाम, नून कस खारा रहिथे।
मोती के ये बूंद, सबो चतुरा मन कहिथे।।
सत्यबोध डर देख, माथ मा छूटे तर-तर।
पाथे जब-जब घाम, देह ले झरथे झर-झर।।
उत्तर - पसीना

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/04/2026

[56] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

ताकत रहिथे ध्यान धर, बइठे पानी बीच।
चुपके चारा चोंच मा, लेथे झट ले खींच।।
लेथे झट ले खींच, शिकारी बड़े कहाथे।
काया धरे सफेद, जेन पहिचाने जाथे।।
सत्यबोध चुपचाप, संत बन झाॅंकत रहिथे।
बइठे पानी बीच, ध्यान धर ताकत रहिथे।।
उत्तर - कोकड़ा (बगुला)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/04/2026

[57] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

राजा के नइ राज मा, नइ माली के बाग।
खा येला बिन टोर के, अपन जगा ले भाग।।
अपन जगा ले भाग, जुड़ा जाही जी चोला।
छोट-छोट अउ गोल, रहय ये ठंडा गोला।।
मिलय नहीं कुछ स्वाद, तभो ले संगी खा जा।
बनथे अपने आप, कहाॅं ले पाही राजा।।
उत्तर -करा 
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/04/2026

[58] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

पथरा कस हे पीठ अउ, पानी तरी निवास।
धीर  धरे  ये   रेंगथे, धीर  धरे   लय  साॅंस।।
धीर धरे लय साॅंस, अजब के जीव कहाथे।
मुड़ गोड़ ला खींच, खोल मा अपन समाथे।।
सत्यबोध जी बूझ, खाय चुप  माटी कचरा।
सौ ले  ऊपर साल, जेन  जीयय बन पथरा।।
उत्तर -कछुआ

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/04/2026

[59] कुण्डलिया छंद - *जनउला*

राहय हरियर देह अउ, लाली जेखर चोंच।
बोली बोलय मीठ बड़, बिना करे संकोच।।
बिना करे संकोच, खूब मिरचा ला खावय।
रखय पारखी आॅंख, सबो के मन ला भावय।।
सत्यबोध जी बूझ, बता तो का कहलावय।
लाली जेखर चोंच, देह हा हरियर राहय।।
उत्तर -सुआ (तोता)

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/04/2026

[60] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

काया चमड़ा के धरे, रेंगन करय सहाय।
धरके जोड़ी संग मा, कांटा-कंकड़ खाय।।
कांटा-कंकड़ खाय, जगत ला राह बतावय।
धूप-छाँव मा जेन, सबो ला अबड़े भावय।।
सत्यबोध जी बूझ, सूझ के येखर माया।
रेंगन करय सहाय, धरे चमड़ा के काया।।
उत्तर - पनही (जूता)

✍🏻इंजी गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/04/2026

[61] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

गहरा मुॅंह ले गोल अउ, पानी भरे अपार।
बसे सबो के चेहरा, देखव नैन निहार।।
देखव नैन निहार, दिनों-दिन हवय नॅंदावत।
बचे-खुचे हा आज, परे बिन नीर अटावत।।
सत्यबोध जी सूख, गइस अब सुख के दहरा।
पानी भरे अपार, रहय जेमा जी गहरा।।
उत्तर- कुआँ 

✍🏻इंजी गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/04/2026

[62] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे भुइॅंया मा गड़े, हण्डा सोन समान।
ऊपर मा छतराय जे, हरियर-हरियर पान।।
हरियर-हरियर पान, डार के बरी बनाथें।
दही मही सॅंग राॅंध, मसलहा तको मिठाथे।।
सत्यबोध जी बूझ, बता येला का कहिथे।
हण्डा सोन समान, गड़े भुइॅंया मा रहिथे।।
उत्तर - जिमीकांदा 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/04/2026

]63] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे छोटे जीव पर, ढोथे बड़का बोझ।
देथे सब ला सीख ये, चलहू रद्दा सोझ।।
चलहू रद्दा सोझ, सदा दिन बाँधे सुमता।
उजड़े घर परिवार, बसे जब मन मा कुमता।।
सत्यबोध जी बूझ, कोंन दुख अइसन सहिथे।
ढोथे बड़का बोझ, जीव पर छोटे रहिथे।।
उत्तर- चांटी 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/04/2026

[64] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

पानी के रख आसरा, तरिया के सिंगार।
बिना गोड़ के रेंगथे, धरे पीठ मा भार।।
धरे पीठ मा भार, देह चिखला मा डोलय।
पतला-पतला सींग, भेद येखर जी खोलय।।
सत्यबोध का जीव, बता दौ बोल जुबानी।
तरिया के सिंगार, आसरा रखथे पानी।।
उत्तर- घोंघी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/04/2026

[65] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

हीरा श्रम के जे धरे, दिन भर करथे काम।
जग बर सुख रद्दा गढ़य, अपन जरावत चाम।।
अपन जरावत चाम, सहय जी गरमी जाड़ा।
पड़े फोफला हाथ, रचे हे काई हाड़ा।।
एकमई हे आज, समझ लौ इंखर पीरा।
सत्यबोध जी बूझ, कोंन ये अइसन हीरा।।
उत्तर- मजदूर

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/05/2026

[66] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

कारी-कारी तन दिखे, छेड़े सुघ्घर तान।
बइठे आमा डार मा, मीठ सुनावय गान।।
मीठ सुनावय गान, ज्ञान मनखे ला देवय।
देख प्रेम व्यवहार, सरी दुनिया हा नेंवय ।।
सत्यबोध जी बूझ, नाम येखर सॅंगवारी।
रखय सुरीली कंठ, दिखे तन कारी-कारी।।
उत्तर- कोयली

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/05/2026

[67] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

घर मा पहुना आय के, देथे जे संदेश।
महिना पीतर पाख मा, पाथे मान विशेष।।
पाथे मान विशेष, इही पुरखा बन आथे।
खाथे छप्पन भोग, मजा ये खूब उड़ाथे।।
सत्यबोध जी शोर, करे हे बड़े फजर मा।
देथे जे संदेश, आय के पहुना घर मा।।
उत्तर- कउॅंवा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)  03/05/2026

[68] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

तर्रा- तर्रा मूँछ अउ, कर्री- कर्री आँख।
दूध- दही ला चट करय, आजू- बाजू झाँक।।
आजू- बाजू झाँक, जुठारय बरतन हाड़ी।
गिंजरय खोरे खोर, खेत घर कोला बाड़ी।।
ढूँढ- ढूँढ के जेन, उघारय झाँपी पर्रा।
सत्यबोध जी बूझ, मूँछ जे राखय तर्रा।।
उत्तर - बिलई

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[69] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रखवारी घर के करय, चोर देख गुर्राय।
खावय रोटी भात अउ, टेढ़ा पूॅंछ हिलाय।।
टेढ़ा पूॅंछ हिलाय, कभू नइ सीधा होवय।
भूॅंकय तान कमान, अर्ध निंदरा मा सोवय।।
सत्यबोध जी बूझ, बना येला सॅंगवारी।
चोर देख गुर्राय, करय घर के रखवारी।।
उत्तर - कुकुर (कुत्ता)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[70] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

महिमा जेखर हे अगम, सेवा करव मितान।
दूध दही पींयय सबो, लइका लोग सियान।।
लइका लोग सियान, कहॅंय जेला जी माता।
जनम-जनम ले जोड़, रखव सब कोई नाता।।
सत्यबोध जी बूझ, गाॅंव घर के जे गरिमा।
सेवा करव मितान, अगम हे जेखर महिमा।।
उत्तर - गाय 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 
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[71] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे पानी बीच मा, जे हर तो दिन-रैन।
बूझव संगी नाम ला, मूॅंदय कभू न नैन।।
मूॅंदय कभू न नैन, कहाथे जल के रानी।
बिना गोड़ के जीव, बिताये हे जिनगानी।।
धोये बास न जाय, सरी दुनिया हा कहिथे।
जे हर तो दिन-रैन, बीच पानी के रहिथे।।
उत्तर- मछरी (मछली)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[72] कुण्डलिया छंद- *जनउला* 

सोहय पाँख म चाँदनी, माथ मुकुट के भार।
नाचय बदरा देख के, सुग्घर रूप सँवार।।
सुग्घर रूप सँवार, धरे सतरंगी काया।
कानन के ये शान, अजब हे जेखर माया।
सत्यबोध जी बूझ, सबो के मन जे मोहय।
माथ मुकुट के भार, चाँदनी पाँख म सोहय।।
उत्तर- मोर (मयूर)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/05/2026

[73] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

करिया भुरवा देह अउ, बिल मा करे निवास।
कुतुर-कुतुर सब चीज ला, करथे सत्यानाश।।
करथे सत्यानाश, कान ला टेंवत रहिथे।
शिव शंकर के लाल, सवारी जेखर करथे।।
सत्यबोध ये जीव, बुद्धि ला देथे छरिया।
बिल मा करे निवास, देह रख भुरवा करिया।।
उत्तर- मुसवा (चूहा)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/05/2026
 
[74] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

गढ़थे नींव मकान के, रचथे घर संसार।
करनी बसुली हाथ मा, साहुल सूत अपार।।
साहुल सूत अपार, धरे जिनगी ल पहाथे।
ऊँचा चार मिनार, नहर पुल बाँध बनाथे।।
बहुमंजिला मकान, जान जोख़िम धर चढ़थे।
सत्यबोध जी बूझ, कोंन ये सुविधा गढ़थे।।
उत्तर (राजमिस्त्री)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[75] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लकलक लोहा हा करय, घन के मारय चोट।
पीटय ताते-तात मा, दूर करय सब खोट।।
दूर करय सब खोट, बनावय गैंती नाॅंगर।
हँसिया टॅंगिया धार, करय जे पेरत जाॅंगर।।
कोंन करय ये काम, पसीना तन ले बोहा।
घन के मारय चोट, करय जब लकलक लोहा।।
उत्तर- लोहार

✍🏻इंजी गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[76] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

आरी बसुला ले करय, लकड़ी के सिंगार।
खुर्सी खटिया ला गढ़य‌‌‌, सुग्घर दै आकार।।
सुग्घर दै आकार, दुवारी खिड़की चमकय।
सोफा सॅंग दीवान, तखत के काया दमकय।।
सत्यबोध जी बूझ, कोंन अइसन सॅंगवारी।
लकड़ी के सिंगार, करय धर बसुला आरी।।
उत्तर- बढ़ई 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[77] कुण्डलिया छन्द- *जनउला* 

बिन पाँखी आकाश मा, मारय ऊँच छलाँग।
गाँठ-गाँठ मा रस नहीं, तन हे लम्बा डाँग।।
तन हे लम्बा डाँग, हवा मा कट-कट बाजय।
येखर बने समान, खिलौना घर ला साजय।।
सत्यबोध जी बूझ, गाॅंठ मा राहय आँखी।
मारय ऊॅंचा छलाँग, रखे जे बिन तन पाॅंखी।।
उत्तर - बांस 

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[78] कुण्डलिया छन्द- *जनउला* 

पीरा खुद के भूल के, बाँटय जग मा आस।
रूप धरे बहरूपिया, करय हास-परिहास।।
करय हास-परिहास, सजे हे मुँह मा लाली।
गजब दिखाये खेल, बजाथें सब झन ताली।।
सत्यबोध जी बूझ, दिखे हे जेन फकीरा।
बाँटय जग विश्वास, भूल के खुद के पीरा।।
उत्तर - जोकर

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[79] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

तन मा तो हाड़ा नहीं, चलय  बिना पग चाल।
पानी भीतर  घर  रहय, खून पियय  जे लाल।।
खून पियय जे लाल, छुवत मा गुजगुज लागे।
देह    गुड़ाखू    नून,   डार   ता   तुरते  भागे।।
सत्यबोध जी बूझ, भरय डर  मनखे  मन मा।
परजीवी बन  जीव, चिपक  जाथे जे तन मा।।
उत्तर - जोंक

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[80] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

गारा अउ बिन ईंट के, महल रचय विकराल।
अपन देह के थूक ले, बूनय जे हा जाल।।
बूनय जे हा जाल, काल अस फंदा डारे।
आठ गोड़ के जीव, जीव ला फाॅंसे मारे।।
सत्यबोध जी बूझ, रहय बन जेन बिचारा।
महल रचय विकराल, धरे न ईंट अउ गारा।।
उत्तर - मेकरा 

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[81] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

राहय तरिया बीच मा, छोट टेड़गी रूख।
कतको बर ये साग बन, मेटय तन के भूख।।
मेटय तन के भूख, जाल मा जब फॅंस जावय।
मसगिद्दा मन खूब, राँध के घर मा खावय।।
सत्यबोध जी बूझ, जीव येला का काहय।
छोट टेड़गी रूख, बीच तरिया मा राहय।।
उत्तर- चिंगरी मछरी 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[82] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

काँटा तन मा हे उगे, भीतर रस के खान।
जड़ से धड़ तक जे फरय, महिमा करौं बखान।।
महिमा करौं बखान, साग मा अबड़ मिठाथे।
येखर शौकिन लोग, बिसा के घर मा लाथें।।
राँध मसलहा खाव, मारहू जोर उॅंचाटा।
सत्यबोध जी बूझ, रहय तन येखर काॅंटा।।
उत्तर- कटहल 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/05/2026

[83] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लावन जेला खाय बर, खाये फेर न जाय।
बूझव संगी नाम ला, ये हा काय कहाय।।
ये हा काय कहाय, काम आवय पंगत मा।
धरे गोलवा रूप, मान पावय संगत मा।।
सत्यबोध चटकार, जेन मा जेवन खावन।
खाये फेर न जाय, खाय बर जेला लावन।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/05/2026

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हाइकु-

 1. हाइकू- *उम्र* ​कोरी सी उम्र, कागज़ की नाव है, खुशी अपार। ​उम्र की धूप, सपनों के हैं पंख, ऊँची उड़ान। ​बीतती उम्र, माथे की लकीरें हैं, लिखा...