बुधवार, 18 मार्च 2026

कुण्डलिया छंद - (छत्तीसगढ़ी जनउला)

[01] कुण्डलियाँ छंद - जनउला


रहिथे दू ठन गोलवा, एक बीच मा छेद।
घूमे चिपका अंग ला, जानौ येखर भेद।।
जानौ येखर भेद, दबा मुट्ठा भर लेना।
बइठे टाँग पसार, डार दाना तॅंय देना।।
सत्यबोध बड़ काम, के हरे ये जी कहिथे।
छितका कुरिया बैठ, दरद मा कलरथ रहिथे।।

इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/03/2026
उत्तर- (जाॅंता)

[02] कुण्डलिया छन्द- *जनउला*

छितिका कुरिया मा करै, भुक्कुड़दुम आवाज।
नवा जमाना आय ले, हवय नँदावत आज।।
हवय नँदावत आज, गाँव ले ये हा भाई।
कूटॅंय छरॅंय अनाज, जेन मा मिल भौजाई।।
नइ जानँय जी फेर, आज के नवा बहुरिया।
सत्यबोध सुनसान, पड़े हे छितिका कुरिया।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/03/2026
उत्तर- (ढेंकी)

[03] कुण्डलिया छंद- *जनउला* 

हावय का तुॅंहला पता, संगी येखर नाँव।
गोल-गोल चाकर रहै, दू ठन जेखर पाँव।।
दू ठन जेखर पाँव, रहै जे लम्बा ठाढ़े।
खेत किसानी काम, बिना येखर नइ माढ़े।।
बइला भइॅंसा फाॅंद, बराती सब झन जावय।
सत्यबोध फिर आज, नॅंदावत ये हर हावय।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/03/2026
उत्तर - (गाड़ा)

[04] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

माटी-गोटी ला सुघर, देवय छाँट निमार।
भौजी लेके हाथ मा, फूनय चाँउर दार।।
फूनय चाँउर दार, संग मा कनकी कुटकी।
रँधनी घर के शान, कहत हे बहिनी छुटकी।।
रोज बिहनिया शाम, बहू मन बैठ मुहाटी।
फूनँय चाँउर दार, निमारँय गोटी-माटी।।
उत्तर -(सूपा)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/03/2026

[05] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

कारी जंगल बीच मा, जेखर रहय निवास।
पानी पीयय लाल ये, जब-जब मरय पियास।।
जब-जब मरय पियास, चाल तब तुरतुर चलथे।
परजीवी बन जीव, हमेशा ये हर पलथे।।
सत्यबोध जी नाँव, हवय पूछत सॅंगवारी।
देहू आप बताय, रहय जे छोटे कारी।।
उत्तर - (जुआँ)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/03/2026

[06] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

दिन भर जे अल्लर रहय, रतिहा मा ठड़िहाय।
पतला पर लंबा इही, छूये मा अटियाय।।
छूये मा अटियाय, रखय ये कसके बाँधे।
जेन करय उदबास, पाँव ला वोखर छाॅंदे।।
बबा जमाना खूब, मिलय जी ये हर घर-घर।
सत्यबोध चुपचाप, रहय कोना मा दिन भर।।
उत्तर - (गेरवा)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/03/2026

[07] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

राहय डबरी नानकुन, जेमा बुड़े जहाज।
पानी पीयय पूॅंछ ले, बूझव येखर राज।।
बूझव येखर राज, जला लौ मन के बाती।
घर करथे उजियार, जलय जब ये हा राती।।
सत्यबोध धर धीर, बहुत पीरा ला साहय।
मंदिर मा नवरात, जगमगावत ये राहय।।
उत्तर - (दीया)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/03/2026

[08] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

बाँधय टूरा नानकुन, कूद-कूद के पार।।
देहू उत्तर ला बता, संगी बन हुशियार।।
संगी बन हुशियार, बुता येमा तो करथें।
धारदार जी नोंक, देख मनखे मन डरथें।।
सत्यबोध बड़ काम, खाँध मा ये हर खाँधय।।
कूद-कूद के पार, नानकुन टूरा बाँधय।।
उत्तर- (सूजी)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/03/2026

[09] कुण्डलिया छन्द- *जनउला*

जीयय जब तक आदमी, तक तक येला खाय।
कहिथें सब येखर बिना, स्वाद घलो नइ आय।।
स्वाद घलो नइ आय, घरो-घर पाये जाथे।
रंगत धरे सफेद, मान सब ले बड़ पाथे।।
नीबू शरबत संग, घोल येला तो पीयय।
सत्यबोध उपयोग, करै जब तक जग जीयय।।
उत्तर- नून

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/03/2026

[10] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रस राहय बड़ भीतरी, देह दिखे जी लाल।
बिंदी सजे हे माथ मा, चिक्कन-चिक्कन गाल।।
चिक्कन-चिक्कन गाल, देख के मन ललचाथे।
बइठे बीच बजार, भाव ये अब्बड़ खाथे।।
तभो सुवारी मोर, बिसा के लाना काहय।
सत्यबोध जी अंग, भराये बड़ रस राहय।।
उत्तर- पताल

✍🏻 इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/03/2026

[11] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लाली-लाली तन रहय, आगी कस अंगार।
मूड़ी मा ठाड़े  मुकुट, छूवत  मा बड़ झार।।
छूवत  मा  बड़ झार, देख  के  बाबू  खाबे।
नइ राहय  जी दाँत, तभो  ला ये  हा चाबे।।
सत्यबोध  डर्राय,  रहे   राजा   या  माली।
तरकारी के शान, दिखे मा  लाली-लाली।।
 उत्तर- लाल मिर्चा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/03/2026

[12] कुण्डलियाँ छंद- *जनउला*

बत्तिस भाई एक घर, धरके खुशी उमंग।
लाल महल के बीच मा, रहिथें मिलके संग।।
रहिथें मिलके संग, चबावत चना चबेना।
का हड्डी का मांस, चीथ दय सबके डेना।।
आगू रहय कपाट, पीछु मा गहरा खाई।
सत्यबोध मिल संग, रहय जी बत्तिस भाई।।
उत्तर- दाँत 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/03/2026

[13] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

देखय दुनिया ला मगर, खुद ला देख न पाय।
बिना पंख के उड़ चलय, झट ले आवय जाय।।
झट ले आवय जाय, निभावय जिम्मेदारी।
अँधियारी मा सोय, जगय ये पा उजियारी।। 
सत्यबोध दे ध्यान, झूठ सच राह सरेखय।
तन के छोटे रूप, सदा दुनिया ला देखय।।
उत्तर- आँख

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/03/2026

[14] कुण्डलियाँ छन्द- *जनउला*

पानी भरे अथाह अउ, जटा जूट हे अंग।
बिना धार के धार धर, बहिथे लिये उमंग।।
बहिथे लिये उमंग, सबो के प्यास बुझाथे।
बनके इही प्रसाद, चढ़ाये मंदिर जाथे।।
चाहत हवॅंव जवाब, बतावव बन तुम ज्ञानी।
ऊपर रहय कठोर, भरे भीतर मा पानी।।
उत्तर- नारियल

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/03/2026

[15] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

चोला रखे सफेद ये, गाँव-गली बेचाय।
जनम धरे जी धान ले, मनखे येला खाय।।
मनखे येला खाय, हवय बहुते गुणकारी।
हल्का-फुल्का देह, करे ये दूर बिमारी।।
गरम रेत मा कूद, फूल बनगे हे गोला।
सत्यबोध इतराय, धरे ये सुघ्घर चोला।।
उत्तर- मुर्रा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/03/2026

[16] ​कुण्डलिया: *जनउला*

​अँधियारी ला मार के, देवय उज्जर जोत।
सुलगावय तन ला खुदे, रतिहा भर ये रोत।।
रतिहा भर ये रोत, देह हा घूरत जावय।
बिन आगी के काम, कभू ये नइ तो आवय।।
सत्यबोध जी नाम, बुझव जल्दी सँगवारी।
खतम होय जब देह, फेर छावय अँधियारी।।
उत्तर- मोमबत्ती

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/03/2026

[17] ​कुण्डलिया: *जनउला*

काँटा खूँटी ले बचा, रखथे ये हा पाँव।
पहन चले जी आदमी, धूप रहे या छाँव।।
धूप रहे या छाँव, सहे हे गरमी जाड़ा।
घर के बाहर होय, सदा जी येकर माड़ा।।
सत्यबोध इंसान, इही मा मारय चांटा।
बिन पहने तो पाँव, चले मा गड़थे काँटा।।
उत्तर- पनही

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[18] कुण्डलिया छन्द- *जनउला*

अइठे-अइठे गोल अउ, अंग संतरा रंग।
खाये मा अबड़े सखा, मन मा भरय उमंग।।
मन मा भरय उमंग, चासनी रस मा डूबे।
चिपचिप करथे हाथ, खाय बर जब भी छूबे।।
सत्यबोध बाजार, बीच मा राहय बइठे।
अंग संतरा रंग, गोल अउ अइठे-अइठे।।
उत्तर- जलेबी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[19] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

आगी-अँगरा ला सहॅंव, का दुख ला बतलाॅंव।
लोहा के मॅंय तन धरे, चूल्हा तीर सुहाॅंव।।
चूल्हा तीर सुहाॅंव, पाँव ला दू ठन राखे।
देवव आप बताय, काय कहि मोला भाखे।।
सहिथॅंव बड़ संताप, तभो नइ होवॅंव बागी।
सत्यबोध जी भाग्य, मा हवै अँगरा-आगी।।
उत्तर- चिमटा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[20] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

करिया-करिया देह रख, बइठे चूल्हा बीच।
गोल-गोल रोटी गढ़य, भूख ला देवय खींच।।
भूख ला देवय खींच, गरम जब होथे भारी।
रखव बचा के हाथ, जले झन उँगली यारी।।
सत्यबोध सुन मीत, आग मा जरथे दरिया।
भरय सबो के पेट, रखे तन करिया-करिया।।
उत्तर- तवा 

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[21] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

टेढ़ा-मेढ़ा रेंगथे, बिना पाँव के राह।
बिना कान आँखी रखे, जीये के जे चाह।।
जीये के जे चाह, छीन कतको के लेथे।
जहर भराये दाँत, खौफ मन मा भर देथे।।
सत्यबोध धर ध्यान, बने झन रहिबे येड़ा। 
जेकर ले तो जान, बचे चल टेढ़ा-मेढ़ा।।
उत्तर- सांप

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/03/2026

[22] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लाली कलगी मूड़ मा, दू ठन रहिथे टांग।
देथे रोज बिहान के, कुकड़ू-कू जे बांग।।
कुकड़ू-कू जे बांग, करत गिंजरे घर कोला।
कुछ मनखे के जात, पका खाथें भी ओला।।
सत्यबोध हर रोज, लगे हे बांग निराली।
दू ठन रहिथे टांग, मूड़ मा कलगी लाली।।
उत्तर- कुकरा (मुर्गा)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/03/2026

[23] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लोहा के हे चोंच अउ, लकड़ी के हे देह।
अब्बड़ गहिर उलेचथे, माटी ऊपर नेह।।
माटी ऊपर नेह, कोड़ के भुइॅंया फाड़े।
जुग-जुग ले ये वीर, खेत मा झण्डा गाड़े।।
सत्यबोध सुन मीत, सुनावय हलधर दोहा।
लकड़ी के हे देह, चोंच हा ओकर लोहा।।
उत्तर- नाॅंगर (हल)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/03/2026

[24] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

कारी भूरी देह अउ, मकड़ी जइसे रूप।
तन मा तो हड्डी नहीं, देख छुपय जे धूप।।
देख छुपय जे धूप, जहर के प्याला धरके।
जेकर ले सब लोग, रहय जी दुरिहा डरके।।
सत्यबोध जी नाॅंव, बतावव तो सॅंगवारी।
मारय जब ये डंक, पसीना छूटय कारी।।
उत्तर- बिच्छू 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/03/2026

[25] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

खंभा जइसे गोड़ अउ, सूपा जइसे कान।
पार येकरो पाय नइ, गजब गढ़े भगवान।।
गजब गढ़े भगवान, नाक हा लंबा भारी।
दू ठन राहय दाँत, लगे जे धरहा आरी।।
सत्यबोध सब लोग, देख के होय अचंभा
आँखी राहय छोट, गोड़ हा मोटा खंभा।।
उत्तर- हाथी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/03/2026

[26] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

डारा-पाना ला चरय, मिमियावय दिन-रात।
चार गोड़ के जानवर, कहय मिठावय बात।।
कहय मिठावय बात, दूध जेकर गुणकारी।
गांधी बाबा संग, रहय ये हा सॅंगवारी।
सत्यबोध सुन मीत, गिंजरे पारा-पारा।
प्यारा पीपर पान, चरय जे डारा-पाना।।
उत्तर - छेरी (बकरी)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/03/2026

[27] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

राहय संगे संग जे, कभू न छोड़य साथ।
पकड़े बर धॅंय दउड़बे, आय न ककरो हाथ।।
आय न ककरो हाथ, घाम मा तन ला तानय।
अँधियारी मा जाय, बात ये सब झन जानय।।
सत्यबोध जी बूझ, बता येला का काहय।
कभू न छोड़य साथ, संग मनखे के राहय।।
उत्तर - (परछाई)

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/03/2026

[28] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

कचरा कुड़ा बटोरथे, घर-घर करथे काम।
सुरुज उगे ला जागथे, नइ पावय आराम।।
नइ पावय आराम, रखय घर अँगना सुग्घर।
कोना-कोना खोर, रहय जेकर ले उज्जर।।
काम करे बर जेन, कभू नइ मारय ढचरा।
सत्यबोध उठ रोज, सफाई करथे कचरा।।
उत्तर - झाड़ू

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/03/2026

[29] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

मूसर कस मुँह हा दिखे, ठाड़े राहय कान।
कुतुर-कुतुर कुतरय लुका, घर के सबो समान।।
घर के सबो समान, बचय ना जेकर मारे।
रहिथें सब हलकान, रात-दिन नैन निहारे।।
सत्यबोध ये जीव, बील मा राहय घूसर।
छोटे चोखी दांत, लगे मुँह जइसे मूसर।।
उत्तर - मुसवा (चूहा)

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/03/2026

[30] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे कुबरा पीठ अउ, सादा जेकर चाम।
दिखथे पेट चिराय कस, आथे पूजा काम।।
आथे पूजा काम, संग मा रखय पुजारी।
मोर मुकुट के संग, लगय ये बड़ मनुहारी।।
सत्यबोध सब लोग, बता येला का कहिथे।
सादा जेकर चाम, पीठ हा कुबरा रहिथे।।
उत्तर - कौड़ी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/03/2026

[31] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

पथरा कस हे पीठ अउ, पानी तरी निवास।
धीर धरे ये रेंगथे, धीर धरे लय साॅंस।।
धीर धरे लय साॅंस, अजब के जीव कहाथे।
मुड़ गोड़ ला खींच, खोल मा अपन समाथे।।
सत्यबोध जी बूझ, खाय चुप माटी कचरा।
सौ ले ऊपर साल, जेन जीयय बन पथरा।।
उत्तर- कछुआ

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/03/2026

[32] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे साथी बन खड़े, का बारिस का घाम।
एक गोड़ के जीव ये, बूझव संगी नाम।।
बूझव संगी नाम, गजब हे जेकर माया।
बिन हड्डी के जेन, रखे हे करिया काया।।
सत्यबोध चुपचाप, खुदे जे दुख ला सहिथे।
का बरसा का घाम, खड़े बन साथी रहिथे।।
उत्तर - छाता

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/03/2026

[33] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

हरियर-हरियर तन दिखे, बीजा भरे शरीर।
फल पानी गुरतुर लगे, उगय नदी के तीर।।
उगय नदी के तीर, नार मा ये हा फरथे।
खाथें बना सलाद, रोग-राई ला हरथे।।
सत्यबोध खा खूब, देह ला राखय फरियर।
बीजा भरे शरीर, दिखे तन हरियर-हरियर।।
उत्तर- खीरा

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/04/2026

[34] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रोवत रतिहा भर रहय, धरय नहीं जे धीर।
कुकुर बरोबर तन दिखे, राहय नदिया तीर।।
राहय नदिया तीर, खीर बर मन डोलावय।
बहुते चतुर सुजान, बतावव का कहलावय।
माड़ा तरी लुकाय, भोर जइसे ही होवत।
सत्यबोध जी शोर, करय जे हरदम रोवत।।
उत्तर- कोलिहा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/04/2026

[35] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

दूर शहर मइके बसे, गाँव-गाँव ससुरार।
गली-गली डउका खड़े, घर-घर मा परिवार।।
घर-घर मा परिवार, नार कस फइले हावय।
जेकर बिन सुख चैन, कहाँ कोनो ला आवय।।
जेकर ले हे होत, सबो के दिन रात बसर।
सत्यबोध जी कोन, रखे मइके दूर शहर।।
उत्तर- बिजली

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/04/2026

[36] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

तन मा जेकर गाँठ अउ, मन मा भरे मिठास।
उगथे भर्री खेत मा, साध स्वाद के आस।।
साध स्वाद के आस, नदी रस के बोहाथे।
खूब करय गुनगान, जउन भी येला खाथे।।
सत्यबोध सुन मीत, काम आथे जीवन मा।
बांस सहीं जी देह, गाॅंठ राहय अउ तन मा।।
उत्तर - कुसियार

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/04/2026

[37] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे एके ठौर मा, सत्तर अस्सी लोग।
बिना हाड़ के तन रहय, मिटथे खाये रोग।।
मिटथे खाये रोग, रखय तन सादा जे हा।
सब्जी के ये शान, स्वाद मा प्यारा ये हा।।
सत्यबोध जी बूझ, बतावव तो का कहिथे।
खाथें कतको भून, खाय मा चिप्पुर रहिथे।।
उत्तर- लहसुन

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/04/2026

[38] कुण्डलिया-​ *जनउला*

बीजा फल मा नइ रहय, बिना हाड़ के रूख।
खाये मा मीठा अबड़, संग मिटावय भूख।।
​संग मिटावय भूख, सबो के मन ला भावय।
पाके मा पिंवराय, बतावव का कहलावय।।
लाथें सुनव खरीद, हमर दीदी अउ जीजा।
दर्जन मा बेचाय, रहय नइ जेमा बीजा।।
उत्तर - केरा

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/04/2026

[39] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

हरियर लुगरा ला पहिन, दाढ़ी रखय सफेद।
दांत दिखय जी सोन कस, बूझव येकर भेद।।
बूझव येकर भेद, भूंज के जेला खाथें।
तन मा नींबू नून, चुपर के स्वाद बढ़ाथें।।
चाव लगा के खाव, रखय ये मन ला फरियर।
ठाड़े राहय खेत, पहिन लुगरा ला हरियर।।
उत्तर - जोंधरी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/04/2026

[40] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

राजा के नइ राज मा, नइ माली के बाग।
खा येला बिन टोर के, अपन जगा ले भाग।।
अपन जगा ले भाग, जुड़ा जाही जी चोला।
छोट-छोट अउ गोल, रहय ये ठंडा गोला।।
मिलय नहीं कुछ स्वाद, तभो ले संगी खा जा।
बनथे अपने आप, कहाॅं ले पाही राजा।।
उत्तर - करा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/04/2026

[41] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

कारी भूरी तन दिखे, गुदगुद ले मोटाय।
मुड़ मा पहिरे हे मुकुट, मन ला अबड़े भाय।।
मन ला अबड़े भाय, बना भर्ता तॅंय खा ले।
खट्टा घलो मिठाय, मान गुन महिमा गा ले।।
सत्यबोध जी बूझ, नाम का हे तरकारी।
गुदगुद ले मोटाय, रखे तन भूरी कारी।।
उत्तर - भाटा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/04/2026

[42] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

डारा पाना फूल फर, आवै सब हा काम।
गुदा भराये देह मा, बूझव येकर नाम।।
बूझव येकर नाम, साॅंप कस झूलत रहिथे।
छेवरहिन बर आय, दवाई दाई कहिथे।।
सत्यबोध जे खाय, माॅंग फिर खाय दुबारा।।
आवै बहुते काम, फूल फर पाना डारा।।
उत्तर - मुनगा 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/04/2026

[43] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

तन मा खाकी पान के, ओढ़े जे हा खाल।
दिखे मुड़ी हा लाल अउ, उगले धुआँ कमाल।।
उगले धुआँ कमाल, भीतरे भीतर सुलगे।
ददा बबा के रूप, नजर मा रहि-रहि झुलगे।।
सत्यबोध जे रोग, धराथे ये जीवन मा।
सुग्घर खाकी पान, खाल ओढ़े जे तन मा।।
उत्तर - बीड़ी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/04/2026

[44] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

दिन मा आवय एक तो, एक ह आवय रात।
अविनासी बन हें खड़े, जग मा सुख बगरात।।
जग मा सुख बगरात, धरे आगी के गोला।
उजियारी जुड़ छाँव, जुड़ावत सबके चोला।।
सत्यबोध आधार, बने हे जे जीवन मा।
एक ह आवय रात, एक आवय जी दिन मा।।
उत्तर -  चंदा-सुरुज 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/04/2026

[45]कुण्डलिया छंद- *जनउला*

देह गुलाबी चूनरी, भीतर रहय सफेद।
ऊपर जटा सुहाय हे, बूझव येकर भेद।
बूझव येकर भेद, परत दर परत उघारत।
खाथें बना सलाद, जीभ ला सब चटकारत।।
सत्यबोध जी जेन, रखय नित शान नवाबी।
काटत मा रोवाय, साज के देह गुलाबी।।
उत्तर - प्याज 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/04/2026

[46] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

हरियर पींयर रंग अउ, सोहे सगा सिंगार।
बिन बोले बतियाय जे, साज सजन के प्यार।।
साज सजन के प्यार, खननखन खनके बढ़िया।।
का कहिथे बतलाव, जेन ला छत्तीसगढ़िया।
आय सुहाग प्रतीक, गजब के पावन फरियर।
सत्यबोध मन भाय, रंग धर पींयर हरियर।।
उत्तर - चूरी 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/04/2026

[47] कुण्डलिया छंद- *जनउला* 

हाॅंसय बिन मुॅंह कान के, राखे दाॅंत हजार।।
उलझे ला सुलझाय अउ, देवय रूप सँवार।
देवय रूप सँवार, शिकारी पर कहलावय।
कारी जंगल बीच, शेर ला मार गिरावय।।
सत्यबोध जे जाल, फेंक बैरी ला फाॅंसय।
राखे दाॅंत हजार, गजब के खुल-खुल हाॅंसय।।
उत्तर - कंघी (ककई)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/04/2026

[48] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

मनखे अइसन एक जे, थामे हाथ किताब।
कोट पहिन हे के खड़े, देवत न्याय हिसाब।।
देवत न्याय हिसाब, लड़िस पिछड़े वंचित बर।
करिस बहुत संघर्ष, ज्ञान अर्जित संचित बर।।
सत्यबोध पर आज, सत्य ला कोंन सरेखे।
करिस जगत कल्याण, मसीहा बन जे मनखे।।
उत्तर - बाबा साहब भीमराव अंबेडकर 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/04/2026

[49] कुण्डलिया छन्द- *जनउला*

बन मा लेथे जे जनम, रहिथे रुखवा डार।
अंग-अंग मा रस भरे, करथे पर उपकार।।
करथे पर उपकार, रोग ला दूर भगाथे।
रोज बिहनिया लोग, जेन ला कुचर चबाथे।।
सत्यबोध जी नाम, बुझव तो संगी मन मा।
बनके रुखवा डार, जनम लेथे जे बन मा।।
उत्तर - दतवन (मुखारी)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/04/2026

[50] ​कुण्डलिया- *जनउला*

​करिया हे तन लाट कस, माथ मुकुट के भार।
मुँह मा डारँय स्वाद बर, मिटय रोग के धार।।
मिटय रोग के धार, दाँत के पीरा भागय।
चाय-पान के शान, देख के मन हा जागय।।
दू अक्षर के नाम, मसाला के ये दरिया।
सत्यबोध जी बूझ, रहय तन जेकर करिया।।
उत्तर - लौंग

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर(छत्तीसगढ़) 16/04/2026

[51] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

जे हा गंदा चाल रख, भिनभिन करथे शोर।
रोग बढ़ाथे गाँव घर, घूम-घूम चहुॅंओर।।
घूम-घूम चहुॅंओर, गंदगी ला फइलाथे‌।
बिना सुई के जेन, सबो ला सुई लगाथे।।
सत्यबोध जी बूझ, कहाथे का तो ये हा।
भिनभिन करथे शोर, चाल गंदा रख जे हा।।
उत्तर - मच्छर

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/04/2026

[52] कुण्डलिया छंद - जनउला 

जनमे हे बिन पेड़ के, बादर के धर जोर।
निकले धरती फाड़ के, छतरी ताने छोर।।
छतरी ताने छोर, सबो के मन ला भाथे।
धरके भारी भाव, हाट मा जे बेचाथे।।
काया दिखे सफेद, उगे हे घर अउ बन में।
बिना पेड़ के कोंन, बतावव तो हे जनमे।।
उत्तर - पिहरी (पुटु)

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/04/2026

[53] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

टप-टप टपकय भोर मा, देहू नाम बताय।
मधुरस जइसे रस भरे, देख जिया ललचाय।।
देख जिया ललचाय, बने जब ये हा दारू।
बनथें पी मतवार, बहोरिक कका समारू।।
घुघरी गजब मिठाय, लोग खाथें जी गप-गप।
काया धरे सफेद, भोर मा टपकय टप-टप।।
उत्तर - महुआ 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/04/2026

[54] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

बइठे ठाड़े नाक मा, पकड़े दूनों कान।
आँखी के टोपा बने, देखे जेन जहान।।
देखे जेन जहान, पढ़े पोथी अउ पाती।
जिनगी मा उजियार, करे हे बन सुख बाती।।
सोये मा सुरताय, जगे मा राहय अइठे।
सत्यबोध जी कोंन, नाक मा ठाड़े बइठे।।
उत्तर - चश्मा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/04/2026

[55] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

झर-झर झरथे देह ले, पाथे जब-जब घाम।
छाँव देख मुरझाय हे, बूझव संगी नाम।।
बूझव संगी नाम, नून कस खारा रहिथे।
मोती के ये बूंद, सबो चतुरा मन कहिथे।।
सत्यबोध डर देख, माथ मा छूटे तर-तर।
पाथे जब-जब घाम, देह ले झरथे झर-झर।।
उत्तर - पसीना

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/04/2026

[56] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

ताकत रहिथे ध्यान धर, बइठे पानी बीच।
चुपके चारा चोंच मा, लेथे झट ले खींच।।
लेथे झट ले खींच, शिकारी बड़े कहाथे।
काया धरे सफेद, जेन पहिचाने जाथे।।
सत्यबोध चुपचाप, संत बन झाॅंकत रहिथे।
बइठे पानी बीच, ध्यान धर ताकत रहिथे।।
उत्तर - कोकड़ा (बगुला)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/04/2026

[57] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

राजा के नइ राज मा, नइ माली के बाग।
खा येला बिन टोर के, अपन जगा ले भाग।।
अपन जगा ले भाग, जुड़ा जाही जी चोला।
छोट-छोट अउ गोल, रहय ये ठंडा गोला।।
मिलय नहीं कुछ स्वाद, तभो ले संगी खा जा।
बनथे अपने आप, कहाॅं ले पाही राजा।।
उत्तर -करा 
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/04/2026

[58] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

पथरा कस हे पीठ अउ, पानी तरी निवास।
धीर  धरे  ये   रेंगथे, धीर  धरे   लय  साॅंस।।
धीर धरे लय साॅंस, अजब के जीव कहाथे।
मुड़ गोड़ ला खींच, खोल मा अपन समाथे।।
सत्यबोध जी बूझ, खाय चुप  माटी कचरा।
सौ ले  ऊपर साल, जेन  जीयय बन पथरा।।
उत्तर -कछुआ

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/04/2026

[59] कुण्डलिया छंद - *जनउला*

राहय हरियर देह अउ, लाली जेखर चोंच।
बोली बोलय मीठ बड़, बिना करे संकोच।।
बिना करे संकोच, खूब मिरचा ला खावय।
रखय पारखी आॅंख, सबो के मन ला भावय।।
सत्यबोध जी बूझ, बता तो का कहलावय।
लाली जेखर चोंच, देह हा हरियर राहय।।
उत्तर -सुआ (तोता)

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/04/2026

[60] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

काया चमड़ा के धरे, रेंगन करय सहाय।
धरके जोड़ी संग मा, कांटा-कंकड़ खाय।।
कांटा-कंकड़ खाय, जगत ला राह बतावय।
धूप-छाँव मा जेन, सबो ला अबड़े भावय।।
सत्यबोध जी बूझ, सूझ के येखर माया।
रेंगन करय सहाय, धरे चमड़ा के काया।।
उत्तर - पनही (जूता)

✍🏻इंजी गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/04/2026

[61] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

गहरा मुॅंह ले गोल अउ, पानी भरे अपार।
बसे सबो के चेहरा, देखव नैन निहार।।
देखव नैन निहार, दिनों-दिन हवय नॅंदावत।
बचे-खुचे हा आज, परे बिन नीर अटावत।।
सत्यबोध जी सूख, गइस अब सुख के दहरा।
पानी भरे अपार, रहय जेमा जी गहरा।।
उत्तर- कुआँ 

✍🏻इंजी गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/04/2026

[62] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे भुइॅंया मा गड़े, हण्डा सोन समान।
ऊपर मा छतराय जे, हरियर-हरियर पान।।
हरियर-हरियर पान, डार के बरी बनाथें।
दही मही सॅंग राॅंध, मसलहा तको मिठाथे।।
सत्यबोध जी बूझ, बता येला का कहिथे।
हण्डा सोन समान, गड़े भुइॅंया मा रहिथे।।
उत्तर - जिमीकांदा 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/04/2026

]63] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे छोटे जीव पर, ढोथे बड़का बोझ।
देथे सब ला सीख ये, चलहू रद्दा सोझ।।
चलहू रद्दा सोझ, सदा दिन बाँधे सुमता।
उजड़े घर परिवार, बसे जब मन मा कुमता।।
सत्यबोध जी बूझ, कोंन दुख अइसन सहिथे।
ढोथे बड़का बोझ, जीव पर छोटे रहिथे।।
उत्तर- चांटी 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/04/2026

[64] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

पानी के रख आसरा, तरिया के सिंगार।
बिना गोड़ के रेंगथे, धरे पीठ मा भार।।
धरे पीठ मा भार, देह चिखला मा डोलय।
पतला-पतला सींग, भेद येखर जी खोलय।।
सत्यबोध का जीव, बता दौ बोल जुबानी।
तरिया के सिंगार, आसरा रखथे पानी।।
उत्तर- घोंघी

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/04/2026

[65] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

हीरा श्रम के जे धरे, दिन भर करथे काम।
जग बर सुख रद्दा गढ़य, अपन जरावत चाम।।
अपन जरावत चाम, सहय जी गरमी जाड़ा।
पड़े फोफला हाथ, रचे हे काई हाड़ा।।
एकमई हे आज, समझ लौ इंखर पीरा।
सत्यबोध जी बूझ, कोंन ये अइसन हीरा।।
उत्तर- मजदूर

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/05/2026

[66] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

कारी-कारी तन दिखे, छेड़े सुघ्घर तान।
बइठे आमा डार मा, मीठ सुनावय गान।।
मीठ सुनावय गान, ज्ञान मनखे ला देवय।
देख प्रेम व्यवहार, सरी दुनिया हा नेंवय ।।
सत्यबोध जी बूझ, नाम येखर सॅंगवारी।
रखय सुरीली कंठ, दिखे तन कारी-कारी।।
उत्तर- कोयली

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/05/2026

[67] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

घर मा पहुना आय के, देथे जे संदेश।
महिना पीतर पाख मा, पाथे मान विशेष।।
पाथे मान विशेष, इही पुरखा बन आथे।
खाथे छप्पन भोग, मजा ये खूब उड़ाथे।।
सत्यबोध जी शोर, करे हे बड़े फजर मा।
देथे जे संदेश, आय के पहुना घर मा।।
उत्तर- कउॅंवा

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)  03/05/2026

[68] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

तर्रा- तर्रा मूँछ अउ, कर्री- कर्री आँख।
दूध- दही ला चट करय, आजू- बाजू झाँक।।
आजू- बाजू झाँक, जुठारय बरतन हाड़ी।
गिंजरय खोरे खोर, खेत घर कोला बाड़ी।।
ढूँढ- ढूँढ के जेन, उघारय झाँपी पर्रा।
सत्यबोध जी बूझ, मूँछ जे राखय तर्रा।।
उत्तर - बिलई

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[69] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रखवारी घर के करय, चोर देख गुर्राय।
खावय रोटी भात अउ, टेढ़ा पूॅंछ हिलाय।।
टेढ़ा पूॅंछ हिलाय, कभू नइ सीधा होवय।
भूॅंकय तान कमान, अर्ध निंदरा मा सोवय।।
सत्यबोध जी बूझ, बना येला सॅंगवारी।
चोर देख गुर्राय, करय घर के रखवारी।।
उत्तर - कुकुर (कुत्ता)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[70] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

महिमा जेखर हे अगम, सेवा करव मितान।
दूध दही पींयय सबो, लइका लोग सियान।।
लइका लोग सियान, कहॅंय जेला जी माता।
जनम-जनम ले जोड़, रखव सब कोई नाता।।
सत्यबोध जी बूझ, गाॅंव घर के जे गरिमा।
सेवा करव मितान, अगम हे जेखर महिमा।।
उत्तर - गाय 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 
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[71] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

रहिथे पानी बीच मा, जे हर तो दिन-रैन।
बूझव संगी नाम ला, मूॅंदय कभू न नैन।।
मूॅंदय कभू न नैन, कहाथे जल के रानी।
बिना गोड़ के जीव, बिताये हे जिनगानी।।
धोये बास न जाय, सरी दुनिया हा कहिथे।
जे हर तो दिन-रैन, बीच पानी के रहिथे।।
उत्तर- मछरी (मछली)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[72] कुण्डलिया छंद- *जनउला* 

सोहय पाँख म चाँदनी, माथ मुकुट के भार।
नाचय बदरा देख के, सुग्घर रूप सँवार।।
सुग्घर रूप सँवार, धरे सतरंगी काया।
कानन के ये शान, अजब हे जेखर माया।
सत्यबोध जी बूझ, सबो के मन जे मोहय।
माथ मुकुट के भार, चाँदनी पाँख म सोहय।।
उत्तर- मोर (मयूर)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/05/2026

[73] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

करिया भुरवा देह अउ, बिल मा करे निवास।
कुतुर-कुतुर सब चीज ला, करथे सत्यानाश।।
करथे सत्यानाश, कान ला टेंवत रहिथे।
शिव शंकर के लाल, सवारी जेखर करथे।।
सत्यबोध ये जीव, बुद्धि ला देथे छरिया।
बिल मा करे निवास, देह रख भुरवा करिया।।
उत्तर- मुसवा (चूहा)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/05/2026
 
[74] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

गढ़थे नींव मकान के, रचथे घर संसार।
करनी बसुली हाथ मा, साहुल सूत अपार।।
साहुल सूत अपार, धरे जिनगी ल पहाथे।
ऊँचा चार मिनार, नहर पुल बाँध बनाथे।।
बहुमंजिला मकान, जान जोख़िम धर चढ़थे।
सत्यबोध जी बूझ, कोंन ये सुविधा गढ़थे।।
उत्तर (राजमिस्त्री)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[75] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लकलक लोहा हा करय, घन के मारय चोट।
पीटय ताते-तात मा, दूर करय सब खोट।।
दूर करय सब खोट, बनावय गैंती नाॅंगर।
हँसिया टॅंगिया धार, करय जे पेरत जाॅंगर।।
कोंन करय ये काम, पसीना तन ले बोहा।
घन के मारय चोट, करय जब लकलक लोहा।।
उत्तर- लोहार

✍🏻इंजी गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[76] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

आरी बसुला ले करय, लकड़ी के सिंगार।
खुर्सी खटिया ला गढ़य‌‌‌, सुग्घर दै आकार।।
सुग्घर दै आकार, दुवारी खिड़की चमकय।
सोफा सॅंग दीवान, तखत के काया दमकय।।
सत्यबोध जी बूझ, कोंन अइसन सॅंगवारी।
लकड़ी के सिंगार, करय धर बसुला आरी।।
उत्तर- बढ़ई 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

[77] कुण्डलिया छन्द- *जनउला* 

बिन पाँखी आकाश मा, मारय ऊँच छलाँग।
गाँठ-गाँठ मा रस नहीं, तन हे लम्बा डाँग।।
तन हे लम्बा डाँग, हवा मा कट-कट बाजय।
येखर बने समान, खिलौना घर ला साजय।।
सत्यबोध जी बूझ, गाॅंठ मा राहय आँखी।
मारय ऊॅंचा छलाँग, रखे जे बिन तन पाॅंखी।।
उत्तर - बांस 

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[78] कुण्डलिया छन्द- *जनउला* 

पीरा खुद के भूल के, बाँटय जग मा आस।
रूप धरे बहरूपिया, करय हास-परिहास।।
करय हास-परिहास, सजे हे मुँह मा लाली।
गजब दिखाये खेल, बजाथें सब झन ताली।।
सत्यबोध जी बूझ, दिखे हे जेन फकीरा।
बाँटय जग विश्वास, भूल के खुद के पीरा।।
उत्तर - जोकर

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[79] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

तन मा तो हाड़ा नहीं, चलय  बिना पग चाल।
पानी भीतर  घर  रहय, खून पियय  जे लाल।।
खून पियय जे लाल, छुवत मा गुजगुज लागे।
देह    गुड़ाखू    नून,   डार   ता   तुरते  भागे।।
सत्यबोध जी बूझ, भरय डर  मनखे  मन मा।
परजीवी बन  जीव, चिपक  जाथे जे तन मा।।
उत्तर - जोंक

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[80] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

गारा अउ बिन ईंट के, महल रचय विकराल।
अपन देह के थूक ले, बूनय जे हा जाल।।
बूनय जे हा जाल, काल अस फंदा डारे।
आठ गोड़ के जीव, जीव ला फाॅंसे मारे।।
सत्यबोध जी बूझ, रहय बन जेन बिचारा।
महल रचय विकराल, धरे न ईंट अउ गारा।।
उत्तर - मेकरा 

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[81] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

राहय तरिया बीच मा, छोट टेड़गी रूख।
कतको बर ये साग बन, मेटय तन के भूख।।
मेटय तन के भूख, जाल मा जब फॅंस जावय।
मसगिद्दा मन खूब, राँध के घर मा खावय।।
सत्यबोध जी बूझ, जीव येला का काहय।
छोट टेड़गी रूख, बीच तरिया मा राहय।।
उत्तर- चिंगरी मछरी 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

[82] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

काँटा तन मा हे उगे, भीतर रस के खान।
जड़ से धड़ तक जे फरय, महिमा करौं बखान।।
महिमा करौं बखान, साग मा अबड़ मिठाथे।
येखर शौकिन लोग, बिसा के घर मा लाथें।।
राँध मसलहा खाव, मारहू जोर उॅंचाटा।
सत्यबोध जी बूझ, रहय तन येखर काॅंटा।।
उत्तर- कटहल 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/05/2026

[83] कुण्डलिया छंद- *जनउला*

लावन जेला खाय बर, खाये फेर न जाय।
बूझव संगी नाम ला, ये हा काय कहाय।।
ये हा काय कहाय, काम आवय पंगत मा।
धरे गोलवा रूप, मान पावय संगत मा।।
सत्यबोध चटकार, जेन मा जेवन खावन।
खाये फेर न जाय, खाय बर जेला लावन।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/05/2026

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🌟जनउला के उत्तर-
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हाइकु-

 1. हाइकू- *उम्र* ​कोरी सी उम्र, कागज़ की नाव है, खुशी अपार। ​उम्र की धूप, सपनों के हैं पंख, ऊँची उड़ान। ​बीतती उम्र, माथे की लकीरें हैं, लिखा...