1. दोहा छंद-
गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर।
अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।01
गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम।
तोर कृपा ले हे मिले, मोला जग मा नाम।।02
देहू शुभ आशीष गुरु, अरजी हे कर जोर।
मन के श्रद्धा फूल हा, अर्पित हे पग तोर।।03
गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावँव माथ।
देवत शुभ आशीष ला, थामे रखहू हाथ।।04
तन मन सब बलिहार हे, गुरु चरनन मा मोर।
करहू पूरन काज सब, अरजी हे कर जोर।।05
रखौ हाथ गुरु माथ मा, आशिष दौ घनघोर।
रोज नवावँव माथ मँय, पावन पग मा तोर।।06
जिनगी के हर साँस मा, लेवँव गुरु के नाम।
भटका झन खावँव कभू, लेहू गुरु जी थाम।।07
बरगद पीपर पेड़ कस, गुरु हा देथे छाँव।
अंतस ला शीतल करै, गुरु के पावन पाँव।।08
धर ले श्री गुरु के शरण, मिलही उँहे मुड़ाव।
गुरु बर पीपर छाँव कस, देही हृदय जुड़ाव।।09
गुरु सागर के सीप अउ, पावन गंगा नीर।
कर लौ जिनगी ला सफल, आवव गुरु के तीर।।10
दीया बन गुरु ज्ञान के, अंतस करय अँजोर।
जिनगी मा गुरु के बिना, नइ होवय सुख भोर।।11
दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय जग ला ज्ञान।
भेद नहीं मन मा रखय, मानय एक समान।।12
गावँव गुरु गुनगान ला, नित अंतस धर ध्यान।
गुरु किरपा ले हे मिले, नाम मान पहिचान।।13
गुरु के पावन पाँव के, बन जावँव मँय दास।
करौं भक्ति अरदास मँय, जब तक तन मा साँस।।14
नइ होवय गुरु के बिना, जिनगी के उद्धार।
बनके खेवनहार गुरु, नाव लगावय पार।।15
गुरुवर तरुवर ज्ञान के, देथे शीतल छाँव।
जिनगी होथे धन्य जी, पाके पावन पाँव।।16
जिनगी के हर साँस हा, गुरु पग मा बलिहार।
राहय मुड़ मा हाथ गुरु, विनय करौ स्वीकार।।17
बनके ज्ञान प्रकाश गुरु, उजियारी बगराय।
जिनगी के उद्धार बर, सत मारग दिखलाय।।18
आखर-आखर भाव भर, गावँव गुरु गुनगान।
चलत रहय ये लेखनी, महिमा करत बखान।।19
बलिहारी गुरु के चरण, परँव नवाँ मँय माथ।
जिनगी के हर मोड़ मा, थामे रखिहव हाथ।।20
दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय सब ला ज्ञान।
गजानंद याचक बने, माँगय सुख वरदान।।21
श्रद्धा के पर्याय गुरु, निष्ठा के प्रतिमान।
रख समानता भावना, देथे सब ला ज्ञान।।22
लँगड़ा पर्वत लाँघथे, गूँगा पाय जुबान।
पंडित पोथी बाचथे, पाके गुरु ले ज्ञान।।23
भरथे गुण संस्कार गुरु, करथे दूर विकार।
जोत जलाथे ज्ञान के, हरथे मन अँधियार।।24
आथें गुरु दरबार मा, लोग अमीर गरीब।
पर पाथें सत ज्ञान ला, जेखर बड़े नसीब।।25
गुरु बरगद कस पेड़ बन, देथे शीतल छाँव।
कर लौ जिनगी धन्य सब, पाके पावन पाँव।।26
गढ़ अनपढ़ इंसान ला, गुरुवर ज्ञान लखाय।
सिरजै कुम्हार कस घड़ा, अंतस ला चमकाय।।27
गुरु महिमा गुनगान कर, होही बेड़ापार।
ये जिनगी गुरु के बिना, हवय कुलुप अँधियार।।28
बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।
बात गजानन ध्यान दौ, कर लौ गुरु गुनगान।।29
जिनगी मा गुरु ज्ञान बिन, नइहे कुछ अस्तित्व।
भव सागर ले पार बर, गुरु के समझ महत्व।।30
मनखे माटी के घड़ा, गुरुवर चाक कुम्हार।
जिनगी ला गुरु हे गढ़े, दिए ज्ञान उपकार।।31
गजानंद गुरु जौहरी, पारस ज्ञान समान।
सोना लोहा के करय, गुरु तुरते पहिचान।।32
गुरु अवगुण ला मेटथे, काटे भ्रम भय जाल।
सत रस्ता हम ला चला, ऊँच करावय भाल।।33
गुरु गीता गुरु बाइबिल, गुरु गुरुग्रंथ कुरान।
गुरु पग चारो धाम हे, गुरु सउँहत भगवान।।34
जिनगी मा गुरु के शरण, रहिथे जेन करीब।
वो मनखे राहय नहीं, अनपढ़ ज्ञान गरीब।।35
गुरु हरथे अभिमान ला, गुरु भरथे सद्ज्ञान।
गुरु पूजा मन से करौ, मिल जाही भगवान।।36
गुरु के दरजा हे सुनव, माता पिता समान।
मिले नहीं गुरु के बिना, सत्यबोध सद्ज्ञान।।37
तोर भरोसा हे खड़े, नइया हा मझधार।
बनके गुरु पतवार तँय, कर दे बेड़ापार।।38
करम धरम के सत मरम, गुरु देवय संदेश।
मानौ गुरु के सीख ला, पाहू सुख परिवेश।।39
गुरु काबा कैलाश अउ, गुरु हे चारो धाम।
गुरु मंदिर मस्जिद घलो, गुरु रहीम अउ राम।।40
पहला गुरु माता-पिता, दिये जन्म संस्कार।
दूजा गुरु शिक्षा दिये, ज्ञान जोत ला बार।।41
गुरु के ज्ञान अथाह हे, समझें नइ नादान।
गुरु गोविंद समान हे, कइसे करौं बखान।।42
जग मा शब्द अनंत गुरु, जानँय बिरला लोग।
गुरु महिमा गाये बिना, मिलय नहीं सुख जोग।।43
दीपक बन गुरु ज्ञान के, उजियारी बगराय।
मारग सत्य असत्य के, परख करे सिखलाय।।44
लाख कीमती धन भला, पर गुरु मोर अमोल।
जग मा गुरु के ज्ञान ला, कोई सकय न तोल।।45
दोहा छन्द- *गुरु*
गुरु हे पावन पूर्णिमा, गुरु अंजोरी रात।
गुरु सावन के मेघ बन, करय ज्ञान बरसात।।46
मन मन्दिर के देव गुरु, वंदन कर कर जोर।
जिनगी के बन नेंव गुरु, दै खुशियाली भोर।।47
देवय सुख उजियार गुरु, मेटय दुख अँधियार।
संस्कृति अउ संस्कार के, गुरु हावय भण्डार।।48
शब्द ज्ञान के खान गुरु, आशा अउ विश्वास।
वोखर बड़ा नसीब हे, गुरु हे जेखर पास।।49
गुरु के कोनों जाति नइ, नइहे कोनों धर्म।
देना सब ला ज्ञान सम, मानय पावन कर्म।।50
गुरु कबीर रविदास बन, गुरु बन घासीदास।
ज्योति पुंज गुरु बुद्ध बन, देथे ज्ञान उजास।।51
गजानंद गुरु के बिना, जिनगी भटका खाय।
बूंद अमिय गुरु ज्ञान के, जो पीये तर जाय।।52
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 09/07/2025
दोहा छन्द- *गुरु*
जप ले गुरु के नाम मन, होही बेड़ापार।
गुरु जिनगी के नाव के, हावय खेवनहार।।53
साँसा मा ले गुरु बसा, अंतस मा धर ध्यान।
बिन पाये गुरु ज्ञान ला, मिलय नहीं सम्मान।।54
नइ होवय गुरु हा गरू, धर ज्ञानी के गोठ।
भाव भजन गुरु के करे, होथे जिनगी पोठ।।55
हरथे गुरु अज्ञानता, ज्ञान जोत ला बार।
दूर बुराई ले रखे, दिसा दसा चतवार।।56
गुरुवर फूल गुलाब के, महकावय मन बाग।
गुरु के पा सानिध्य ला, खिल जाथे सुख भाग।।57
गावय गुरु गुणगान ला, सात खण्ड नौ दीप।
चमकय गुरु आशीष ले, सागर के भी सीप।।58
पेड़ बने गुरु ज्ञान के, देथे जुड़हा छाँव।
गजानंद अंतस जुड़ा, पावन पा गुरु पाँव।।59
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/07/2025
जिनगी भर पावत रहौं, गुरुवर आशीर्वाद।
छइँहा दौ गुरु ज्ञान के, हे अतके फरियाद।।60
करथे काम पुनीत गुरु, बाँटे जग ला ज्ञान।
चलथे जे गुरु राह मा, बनथे मनुज महान।।61
गुरु सागर ये ज्ञान के, मिलय कभू नइ थाह।
पालक बन गुरु शिष्य के, करे सदा परवाह।।62
गुरु ही ले जिनगी शुरू, गुरु ले जिनगी अंत।
गुरु ही ले पावत रहँव, सब दिन ज्ञान अनंत।।63
गुरु गुण ज्ञान गुनान कर, चलके गुरु के राह।
बिन गुरु के नइ तो मिले, ये जिनगी के थाह।।64
बाँटय ज्ञान विवेक गुरु, देवय सत सन्देश।
सीख धरे गुरु के मिटे, मानव मन से क्लेश।।65
साधिन गुरु सानिध्य ला, तुलसी सूर कबीर।
पाइन गुरु के ज्ञान ला, ऋषि मुनि संत फकीर।।66
बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।
सीख धरे गुरु के बनय, मूरख मनुज महान।।67
सच्चा गुरु के कर चयन, शब्द ज्ञान पहिचान।
सही दिशा अउ प्रेरणा, मिलही तब सद्ज्ञान।।68
याचक बन गुरु ज्ञान के, माँगत हावँव भीख।
पाँव बढ़य सत राह मा, आप सिखाहू सीख।।69
बाँटे ले भी नइ पड़े, गुरु के ज्ञान अकाल।
जे पाथे वो हो जथे, पल मा मालामाल।।70
गुरु के आशीर्वाद ही, असली सुख-सम्मान।
नइ खावस भटका कभू, धरले गुरु के ज्ञान।।71
गुरुवर किताब ज्ञान के, गुरुवर कलम दवात।
देके आशिष अउ कृपा, करथे सुख बरसात।।72
गुरु मा रख विश्वास तँय, पाबे ज्ञान प्रकाश।
बनही सुखमय जिंदगी, होही दुख के नाश।।73
शीश झुका गुरु के चरण, करौं अरज कर जोर।
पावत राहँव मँय सदा, जिनगी मा सुख भोर।।74
जब ले हे धरती गगन, जब ले हे संसार।
तब ले हे गुरु ज्ञान के, जिनगी मा आधार।।75
चंदन पेड़ समान हे, गुरु के ज्ञान विचार।
अंतस ला शीतल करे, मेटे दोष विकार।।76
समय घलो ला एक गुरु, गजानंद जी मान।
देथे सुख-दुख सीख ये, बुरा-भला के ज्ञान।।77
गुरुवापन गुरु के करौ, मिले ज्ञान भंडार।
अँधियारी दुख के भगे, होथे सुख संचार।।78
ज्ञान खजाना बाँट के, गुरु करथे उपकार।
जिनगी रूपी नाव के, गुरु ये खेवनहार।।79
गुरु गंगा के धार ये, गुरु सागर के सीप।
गुरु पावस के बूंद ये, गुरु पूजा के दीप।।80
दुनिया के कल्याण बर, ज्ञान धरे गुरु गूढ़।
गुरु के पा सानिध्य ला, सुधरे मनखे मूढ़।।81
सुबो शाम गुरु नाम लौं, घट भीतर हे धाम।
अइसन दीन दयाल ला, बारम्बार प्रणाम।।82
बिनती हे कर जोर गुरु, दे दौ जनम सुधार।
ये जिनगी के नाव ला, कर दौ भव ले पार।।83
करथे बरसा ज्ञान के, गुरु सब बर घनघोर।
रखय नहीं मन भेद गुरु, बाँधय सुमता डोर।।84
आथे श्रद्धा भाव रख, गुरु के जेन करीब।
पाथे गुरु के ज्ञान ला, जाथे सँवर नसीब।।85
नानक घासीदास गुरु, गुरु कबीर रैदास।
बनके गुरु इन अवतरिन, मेटे जग के त्रास।।86
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गढ़थे सभ्य समाज गुरु, बाँटे नेक विचार।
भरथे शुभ संस्कार गुरु, दिये ज्ञान उपहार।।87
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
सिखलाथे गुरु धर्म धर, रीति-नीति संस्कार।
जिनगी जीये के कला, नेक कर्म व्यवहार।।88
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
करथे गुरु गुनगान ला, सतगुरु ग्रंथ कुरान।
कहिथे गीता बाइबिल, गुरु के ज्ञान महान।।89
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
मन मा श्रद्धा भाव रख, कर ले गुरु के ध्यान।
अंतस निर्मल हो जही, पा के गुरु के ज्ञान।।90
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
जिनगी के धर मर्म गुरु, देथे सीख सलाह।
गुरु के ज्ञान अथाह हे, मिलय नहीं जी थाह।।91
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
मँय अज्ञानी पाय हँव, ज्ञान कृपा गुरु छाँव।
महिमा करे बखान बर, शब्द कहाँ ले लाँव।।92
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
जिनगी मा गुरु ज्ञान के, पी लेना दू बूँद।
येती-ओती झन भटक, बिरथा आँखी मूँद।।93
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
पहिली पूजन गुरु चरण, जो जग खेवनहार।
करके ज्ञान प्रकाश गुरु, मेटे मन अँधियार।।94
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
शीश झुका गुरु के चरण, वंदन बारम्बार।
दिये ज्ञान उपहार गुरु, हे बड़का उपकार।।95
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु बिन जिनगी ब्यर्थ हे, गुरु बिन जग अँधियार।
धर ले गुरु के ज्ञान गुण, हो जाबे भव पार।।96
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बँध जै गुरु ले प्रीत तब, दुनिया लागे मीत।
गुरु प्रति सेवा भाव ही, हावय रीत अतीत।।97
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु के ज्ञान प्रकाश ले, बगरे जग उजियार।
गुरु महिमा गुनगान ला, गावय नित संसार।।98
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
ध्यान लगा सुन लौ सदा, गुरु वाणी अनमोल।
बसा रखौ गुरु नाम ला, अंतस पट ला खोल।।99
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
नेक कर्म अउ धर्म के, सिखलाथे गुरु पाठ।
पाये बिन गुरु ज्ञान ला, ये जिनगी हे काठ।। 100
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
दिव्य अलौकिक ज्ञान के, गुरु रखथे भंडार।
बाँटय समान रूप ले, जिनगी के सुख सार।।101
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
कर ले गुरु के वंदना, भाग्य सँवरही तोर।
मिट जाही संकट सबो, सुख मिलही घनघोर।।102
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
पावन गुरु के पाँव मा, रोज नवावँव माथ।
कर दौ जिनगी ला सफल, बन गुरु दीनानाथ।।103
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
रूप हवय गुरुदेव के, निराकार साकार।
गुरु के निर्मल ज्ञान ले, आलोकित संसार।।104
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
माँगत हँव आशीष गुरु, अंतस पट ला खोल।
दे दव गुरुवर ज्ञान के, धन मोला अनमोल।।105
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
भरथे मन मा भाव गुरु, कर्म करे बर नेक।
दिखलाथे सत राह गुरु, दोष बुराई छेक।।106
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु के ज्ञान गुरुत्व ले, जग के हे कल्यान।
गुरु के धर संदेश ला, बनथें मनुज महान।।107
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु ला वंदन दंडवत, करौं सुबह अउ शाम।
बोझिल जिनगी के डगर, हे गुरु लेवव थाम।।108
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
नेक कर्म ले गुरु मिले, ध्यान धरे ले ज्ञान।
संगत गुरु के दूर जे, मूढ़ उही इंसान।।109
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
कर लौ गुरु गुनगान ला, रइहू सदा प्रसन्न।
सुख जिनगी रख भाव गुरु, ज्ञान दिये सम्पन्न।।110
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु महिमा ले बढ़ इँहा, नइहे काहीं और।
दूर भक्ति गुरु के रहे, मिले नहीं जग ठौर।।111
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
संगत संत सुजान गुरु, निर्मल करय सुभाव।
सतगुरु सुमिरन ले मिटे, अंतस के भटकाव।।112
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
जिनगी मा गुरु ज्ञान ले, होथे नवा बिहान।
गुरु के पा आशीष ला, बनथें मनुज महान।।113
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु जिनगी के प्रेरणा, गुरु सुख के आधार।
गुरु माली बन ज्ञान के, बाग करे गुलजार।।114
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
गुरु गीता संदेश ये, गुरु बाईबिल सार।
गुरु गरुग्रन्थ कुरान ये, गुरु ज्ञानी करतार।।115
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
नित बंदँव श्री गुरु चरण, झुका अपन मँय माथ।
सुख मा दुख मा आप गुरु, रखहू मुड़ मा हाथ।।116
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
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जगण(121) आधारित दोहा छंद-
सृजन शब्द- बिहान (1)
भुइँया ये छत्तीसगढ़, दया मया के खान।
नवा बिहान सुराज हे, येखर तो पहिचान।।
नव बिहान लाबो चलौ, सब झन सुमता बाँध।
गढ़बो राह विकास के, जोर काँध मा काँध।।
ये भुइँया के मान बर, पुरखा करिन प्रयास।
लानिन नवा बिहान हे, सहिके दुख चउमास।।
कहिथें छत्तीसगढ़ ला, धान कटोरा धाम।
सुख के नवा बिहान हे, सबो हाथ मा काम।।
होही नवा बिहान कब, सोचँव मँय दिन रात।
बहिगे धार विकास के, आज धरे सौगात।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/11/24
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जगण (121) आधारित दोहा छंद
सृजन शब्द- पताल (2)
मिर्चा लाल पताल मा, चटनी गजब सुहाय।
लार टपकथे देख के, मन अबड़े ललचाय।।
झोत्था झोत्था हे फरे, संगी लाल पताल।
महँगाई मा हे करे, सब ला ये बेहाल।।
माथा बिंदी हे हरा, गोल-गोल हे गाल।
टुकनी मा बइठे दिखे, दुल्हन बने पताल।।
झोझो नीक पताल के, खा लौ सूप सलाद।
रक्तचाप ला कम करे, रख लौ भइया याद।।
खेती करौ पताल के, उन्नत पैदावार।
धरके बढ़िया दाम ये, बिकथे हाट बजार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/11/2024
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जगण (121) आधारित दोहा छंद
सृजन शब्द- *मिठास* (3)
राख मिठास जुबान कहि, देथें सीख सियान।
बनही सब्बो काम अउ, मिलही जग मा मान।।
कूक कोयली के लगे, अड़बड़ नीक मिठास।
कउँवा के बोली कहाँ, आथे सब ला रास।।
ककरो बोली हा कभू, मन मा करथे घाँव।
जेकर गोठ मिठास हे, वो देथे सुख छाँव।।
कपटी मनखे मन सदा, रहिथें स्वारथ दास।
काम निकाले बर करै, हरदम गोठ मिठास।।
गजानंद रख ध्यान तँय, गोठ बनै झन फाँस।
बोल मिठास जुबान तँय, जब तक तन मा साँस।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/11/2024
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जगण (121) आधारित दोहा छंद
सृजन शब्द- सियान (4)
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बिन सियान के जान लौ, सुन्ना हे घर द्वार।
बनके काँड़ मयार जे, थाम रखँय परिवार।।
होवय नहीं सियान बिन, घर बन के कुछ काम।
उमर सियाना मा तको, करँय नहीं आराम।।
बुरा भला ला सोच के, देथें नेक सलाह।
जिनगी के खुशहाल बर, सदा बताथें राह।।
जीते जी होवय नहीं, जे घर मान सियान।
हवय कहावत सत्य ये, वो घर मरे बिहान।।
पढ़े नहीं पर बड़ कढ़े, राहँय हमर सियान।
गजानंद मधुरस भरे, गुरतुर उँखर जुबान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/11/2024
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जगण (121) आधारित दोहा छंद-
सृजन शब्द- महान (5)
कर लौ कर्म महान जी, होही जग मा नाम।
बिना कर्म के कब कहाँ, मिलथे सुख धन धाम।।
कहिथन गरब गुमान ले, भारत देश महान।
अनेकता मा एकता, येखर हे पहिचान।।
सैनिक वीर जवान मन, हावँय धन्य महान।
रक्षा करथें देश के, हम ला हे अभिमान।।
सोन चिरइँया सब कहय, ग्रन्थ करय गुणगान।
हरा भरा खलिहान हे, हीरा मोती खान।।
संविधान ले हे मिले, सब ला हक अधिकार।
बनगे ग्रंथ महान ये, पढ़व बनव हुशियार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/11/2024
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जगण आधारित दोहा छंद
सृजन शब्द- सुराज (6)
गढ़बो नवा सुराज अब, गाँव शहर घर खोर।
लाबो सुख के भोर तब, पाबो सुमत अँजोर।।
सुनौ सुजान सुराज बर, आगू रख लौ पाँव।
देखव नैन निहार के, काँव- काँव हर ठाँव।।
छींनत हे सुख साँस ला, परदेशी यमदूत।
अपन सुराज बचाय बर, जागव पूत सपूत।।
धर लौ बात सियान के, गाँठ बाँध तुम खास।
संगी बिना सुराज के, होवय नहीं विकास।।
हमर हाथ पुरखा हमर, सौंपे हवय सुराज।
कहिथे आज पुकार उन, रखव बचा के लाज।।
भुइँया ये छत्तीसगढ़, हावय हम ला नाज।
गजानंद धर ध्यान अब, लाने इहाँ सुराज।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/11/2024
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जगण (121) आधारित दोहा छंद-*
सृजन शब्द- किसान (7)
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गावँव नित गुनगान ला, माटी पूत किसान।
जेखर श्रम ले हे बने, भारत देश महान।।
नाँगर बइला संग मा, धरे तुतारी हाथ।
जाड़ घाम बरसात मा, करम सजाये माथ।।
अर्र तता के बोल ले, गूँजय खेती खार।
गावँय किसान ददरिया, दोहा कुहकी पार।।
भुइँया ये छत्तीसगढ़, धान कटोरा धाम।
सुन लौ देश विदेश मा, फइले हावय नाम।।
महिनत के भरपूर कब, पाथें दाम किसान।
सबो तरफ बस लूट हे, कोंन धरय अब ध्यान।।
होही सबल किसान जब, करही देश विकास।
गजानंद कहिथे तभे, बँधही मन मा आस।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/11/2024
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जगण (121) आधारित दोहा छंद-
सृजन शब्द- उधार (8)
...................----------------.....................
साँसा मिले उधार हे, कर लौ करम विशेष।
बाँटव मया पिरीत ला, त्याग अहं भ्रम द्वेष।।
पाके मानुस जोनि ला, कर लौ कुछ उपकार।
राहय कर्म उधार झन, रख लौ नेक विचार।।
झन तँय बेच उधार मा, इज्जत खेती खार।
कम कर ले खुद खर्च ला, होही बेड़ापार।।
पुस्तक समय सुहाग के, झन दौ कभू उधार।
सुन लौ तीनों चीज ये, जिनगी के सुख सार।।
लइका बुढ़ा जवान सब, बनगे हें मतवार।
पीयत दारु उधार ले, ध्यान धरौ सरकार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/11/2024
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सृजन शब्द- ईमान (9)
मनखे बनगे कलजुगी, बेच डरें ईमान।
लोभ मोह मा हें फँसे, धरें नहीं गुरु ज्ञान।।
गोठ करय ईमान के, कहाँ बचे हें लोग।
सब ला लूट खसोट के, लगे हवय अब रोग।।
मनखे के ईमान के, नइ हे अब विश्वास।
नियत बदलही कब कहाँ, बनके स्वारथ दास।।
होही जब इंसान मा, दया धरम ईमान।
भुइँया ये छत्तीसगढ़, बनही तभे महान।।
ढोंग रूढ़ि पाखण्ड मा, डूबे हें इंसान।
सत्य बात समझे नहीं, झूठ धरे ईमान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/11/2024
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सृजन शब्द- जीवन परिचय (10)
जन्म गाँव हे सेंदरी, गजानंद हे नाम।
मुंगेली पड़थे जिला, अभियंता हे काम।।
थाना पड़थे पथरिया, संग इही तहसील।
हवय जरेली डाकघर, हवय बसे दू मील।।
उसलापुर साईंनगर, हावय अभी निवास।
गोपेश्वर मंदिर गली, शांति सरोवर पास।।
दुकलहीन दाई रहिस, गे परलोक सिधार।
लैनदास पात्रे ददा, जोड़ रखिस परिवार।।
होथन भाई सात हम, जेमा मँय हा छोट।
रहिथन मिलजुल हम सबो, मन मा नइहे खोट।।
जीवन साथी हे उषा, सुख दुख मा दय साथ।
जिनगी के गाड़ी चलय, थाम हाथ मा हाथ।।
वर्षा रितु मेघा गुनिक, बेटी हावय तीन।
जीवन परिचय मोर ये, जानौ संत सुधीन।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/12/2024
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आज दिनाँक 04/12/2024 के दोहा छंद -
सृजन शब्द- मजदूर (11)
दुनिया के धन धाम ला, सिरजावय मजदूर।
वोखर जिनगी मा तभो, नइहे सुख भरपूर।।
सड़क कारखाना महल, मशीनरी औजार।
सृजनहार मजदूर बन, करथे जग उपकार।।
माथ पसीना गार के, करथे जग निमार्ण।
भर देथे मजदूर हा, पथरा मा भी प्राण।।
तरसे कपड़ा अन्न बर, हो करके मजबूर।
शोषण अत्यचार सहि, झेले दुख मजदूर।।
कोंन करय मजदूर बर, सुख सुविधा के ध्यान।
गजानंद कर चेत अब, श्रम के पावय मान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/12/2024
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*आज दिनाँक- 09/12/2024 के दोहा छंद अभ्यास-*
सृजन शब्द- जाड़/जाड़ा (12)
माह दिसम्बर जनवरी, खूब जनावय जाड़।
काम बुता मन नइ लगे, थर्रावय तन हाड़।।
संगी जाड़ा काल मा, गजब सुहावय चाय।
ठिठुरत रहिथे देह हा, नइतो काँही भाय।।
जाड़ा गरमी घाम ला, नइ देखय मजदूर।
पेट भरे बर रात दिन, काम करय भरपूर।।
गजब सुहाथे गोरसी, बइठे बबा रपोट।
दाई ओढ़े साल ला, बाबू पहिने कोट।।
सुबह शाम भुर्री जले, तापय मिल परिवार।
पहिने रइहौ कनटपी, बहिथे शीत बयार।।
महिना अगहन पूस के, धरके आवय जाड़।
बाचे बर तो जाड़ ले, करथें लोग जुगाड़।।
गजानंद कहिथे सुनौ, रख लौ सेहत ध्यान।
रोग भगावय बन दवा, योगा करौ मितान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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*आज दिनाँक- 11/12/2024 के दोहा छंद अभ्यास-*
सृजन शब्द- पुरखा (13)
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पुरखा हम ला हे दिये, दया धरम उपहार।
पाठ पढ़ाइन कर्म के, रीति नीति संस्कार।।
पुरखा के धन मान ला, रखहू जोर बचाय।
दुख दिन जाँगर पेर के, सुख सुम्मत हे लाय।।
धरौ धरोहर ज्ञान के, हरय खजाना पोठ।
मया लुटावव हाँस के, पुरखा के हे गोठ।।
पुरखा सुमता जोत बन, जलथे शुभ दिन रात।
उँखर सिखौना गोठ हा, हम सब बर सौगात।।
पुरखा के सम्मान मा, झन करिहौ जी ढोंग।
परम्परा के नाम मा, रूढ़िवाद मन ओंग।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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*दोहा छंद अभ्यास* 18/12/2024
सृजन शब्द- गुरु घासीदास
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पावन धाम गिरौदपुर, माह दिसंबर खास।
सत्य रूप मा अवतरे, सतगुरु घासीदास।।
अमरौतिन के कोख अउ, महँगू दास दुलार।
सत्रह सौ छप्पन रहिस, लेइस गुरु अवतार।।
छागे अँगना मा खुशी, बाजय मंगल गीत।
गुरु दर्शन बर आय सब, सगा सहोदर मीत।।
मांदर झाँझ मृदंग सँग, सजे आरती थाल।
आये जग उद्धार बर, अमरौतिन के लाल।।
देवँय आशीर्वाद ला, नर नारी सब लोग।
सत्यपुरुष अवतार ये, करही सत के जोग।।
मातु पिता गुरु नाम ला, राखिस घासीदास।
बनही संत महान गुरु, हरही जग जन त्रास।।
जतन करे लइका बढ़े, पानी पाये धान।
बाढ़े उही प्रकार ले, गुरु जी धारत ज्ञान।।
नानपना ले ही करिस, गुरु जी सत के काम।
महिमा गजब दिखाय हे, नाम जपत सतनाम।।
सखा बुधारू ला दिये, गुरु जी जीवन दान।
तारिस गौ माता घलो, लगा सत्य के ध्यान।।
बिना अन्न पानी बिना, जेवन दिये बनाय।
बिना सुरूज प्रकाश के, कपड़ा घलो सुखाय।।
भाटा बारी ले बबा, लानिस मिरचा टोर।
जोतिस नाँगर ला अधर, होगे महिमा शोर।।
वैज्ञानिकता तर्क ले, सत के करिस प्रचार।
गुरु के दे सिद्धांत ले, आज चलत संसार।।
शादी घासीदास गुरु, माता सफुरा साथ।
हँसी खुशी जिनगी जिये, थाम हाथ मा हाथ।।
चार पुत्र के संग मा, होइस पुत्री एक।
बेटा सब ज्ञानी गुनी, बेटी सुशील नेक।।
अमरदास बेटा बड़े, मझला बालकदास।
तीसर आगरदास गुरु, अउ अड़गड़िहा खास।।
सहोदरा बेटी सुघर, बहुत चतुर हुशियार।
मातु पिता के लाड़ली, पाये मया दुलार।।
सपना देइस एक दिन, पुरुषपिता सतनाम।
माया मा गे हस भुला, घासी तँय सतकाम।।
दुनिया के उद्धार बर, लिये हवस अवतार।
घासी तँय तो हस फँसे, मोह मया परिवार।।
सपना ले झकना उठिस, बाबा घासीदास।
पुरुषपिता गुरु माफ कर, तोड़े हँव विश्वास।।
फेर वचन हँव देत मँय, करहूँ जग उद्धार।
जावत हँव सत खोज बर, छोड़ आज घर द्वार।।
सत खोजन बर गे निकल, गुरु जी छात पहाड़।
जिहाँ शेर भालू रहय, कटकट जंगल झाड़।।
धुनी रमाये बैठ गे, ध्यान लगा सतनाम।
पाये जी गुरु ज्ञान ला, बना हृदय सत धाम।।
छै महिना ले तप करिस, पाये बर सत ज्ञान।
जोग साधना से बनिस, गुरु जी संत महान।।
सफुरा पुत्र वियोग मा, तज दे राहय प्रान।
आके घासीदास गुरु, देइस जीवन दान।।
आंदोलन सतनाम के, करिस जोर शुरुआत।
जाति- पाति के बंध मा, फँसे रहिन सब जात।।
मनखे ले मनखे छुआ, छूत करे कुछ लोग।
रूढ़िवाद पाखण्ड के, छाये राहय रोग।।
बोले घासीदास गुरु, मनखे-मनखे एक।
एक खून तन चाम हे, राह चलौ सत नेक।।
मानवता के पाठ पढ़, लौ सब संत सुजान।
आही सुमत समाज मा, बोले संत महान।।
जगह-जगह सत रावटी, होवय गुरु जी तोर।
जोड़े सबो समाज ला, बाँध दया के डोर।।
ढोंग रूढ़ि पाखण्ड के, छाय रहय अँधियार।
मुक्ति दिलाइस संत गुरु, करके सत्य प्रहार।।
सत रद्दा चलिहौ कहिस, बानी रखिहौ नेक।
लोभ मोह अभिमान ला, देहव संतो फेक।।
मनखे जग कल्यान बर, देइस सत संदेश।
कर लौ पालन संत जन, मिट जाही सब क्लेश।।।
दिये सात संदेश गुरु, ब्यालिस अमरित बोल।
अमल करौ सब संत हो, हिरदे के पट खोल।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/12/2024
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दोहा छंद अभ्यास- 26/12/2024
सृजन शब्द- महँगाई
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महँगाई सुरसा बने, रूप धरे विकराल।
लीलत हे परिवार सुख, जग जन हे बेहाल।।
चाउँर शक्कर दाल के, दाम बढ़े भरपूर।
ऊपर ले जीएसटी, करत हवय मजबूर।।
सौ ले ऊपर पार हे, डीजल अउ पेट्रोल।
गैस रसोई के तको, बाढ़े हे बड़ मोल।।
भरही कइसे पेट ला, दीन दुखी मजदूर।
महँगाई हा हे करत, सपना चकनाचूर।।
महँगाई अनुपात मा, श्रम के नइ हे दाम।
होथे शोषण कम कहाँ, कतको कर ले काम।।
बनगे हावय आजकल, शिक्षा हा व्यापार।
निजीकरण के खेल ला, खेलत हे सरकार।।
नइ होवय संगी कभू, जनता के उद्धार।
बस जनता ला लूटथे, सबके सब सरकार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/12/2024
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दोहा छंद अभ्यास- 28/12/2024
सृजन शब्द- अभ्यास
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रखके जे मन मा लगन, करथे नित अभ्यास।
चढ़े सफलता नाँव मा, बाँध हृदय मा आस।।
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दोहा छंद गीत अभ्यास- 02/01/2025
सृजन शब्द- नवा बछर
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दो हजार पच्चीस सन, आये धर नव रंग।
नवा बछर के छाय हे, मन मा खुशी उमंग।।
बैर भाव ला भूलके, रख लौ मया दुलार।
बाँधव जी सुंता सुमत, सजा हृदय के द्वार।।
राहँय सब खुशहाल अउ, राहँय मिल सब संग।
दो हजार पच्चीस सन, आये धर नव रंग।।
उन्नत खेत किसान हो, उन्नत भारत देश।
सबके संग विकास हो, पावन हो परिवेश।।
बदहाली ले दूर हो, राहँय लोग मतंग।
दो हजार पच्चीस सन, आये धर नव रंग।।
शिक्षा अउ व्यापार के, बाढ़य हाथ सजोर।
संस्कृति संस्कार ले, होही शुभ दिन भोर।।
रखना ध्यान विशेष हे, बातचीत के ढंग।
दो हजार पच्चीस सन, आये धर नव रंग।।
कर्म धर्म के मर्म ला, जानँय सब झन लोग।
ढोंग रूढ़ि पाखण्ड के, झन सँचरय जी रोग।।
मन ला झन घुन्ना करय, अंधभक्ति के जंग।
दो हजार पच्चीस सन, आये धर नव रंग।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/01/2025
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दोहा छंद अभ्यास- 03/01/2025
सृजन शब्द- चुनाव
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आवत हवय चुनाव अब, होही खूब प्रचार।
हाथ दुनों जोरे अपन, नेता दिखहीं द्वार।।
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दोहा छंद अभ्यास- 07/01/2025
सृजन शब्द- मितान
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असली उही मितान ये, दुख मा दय जे साथ।
सुख मा भी साथी बने, थाम रखय जे हाथ।।
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*दोहा छंद अभ्यास*- 08/01/2025
सृजन शब्द- नशा
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नशा नाश के जड़ हवय, कर लौ बात कबूल।
राख करे घर द्वार तन, बन दुख के ये शूल।।
खोथे इज्जत मान अउ, होथे धन बरबाद।
नशापान ला छोड़ दव, रख लौ सुख मरजाद।।
नस- नस मा जाथे समा, बनके नशा बिगाड़।
रोग समाये देह मा, दुख के गिरे पहाड़।।
हरथे नशा विवेक ला, रहय नहीं कुछ चेत।
होथे घर हलकान तब, लइका लोग समेत।।
नइ पीबे जब तँय कभू, दारू गांजा भाँग।
जीबे सुख धर सौ बछर, दुख ला खूंटी टाँग।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/01/2025
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दोहा छंद अभ्यास- 09/01/2025
सृजन शब्द- *जिनगी*
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जिनगी के दिन चार हे, जप लौ प्रभु के नाम।
कर्म करव आगू बढ़व, मिलही सुख के धाम।।
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दोहा छंद अभ्यास- 13/01/2025
सृजन शब्द- *छेरछेरा*
★★★★★★★★★★★★★★★★
परब छेरछेरा हमर, संस्कृति अउ पहिचान।
पूस महीना मा सुघर, मनय तिहार महान।।
लोक पर्व छत्तीसगढ़, कहिथें येला लोग।
लोगन सब खुशहाल हो, बढ़े सुमत के जोग।।
छेरिक छेरा छेर कहि, लइका आवँय द्वार।
दान धरम के काम मा, झन करहू इंकार।।
बनथे जी बबरा बरा, घर-घर मा पकवान।
पावन पुन्नी मा करौ, स्नान ध्यान अउ दान।।
लइका सियान मिल सबो, नाचँय गावँय गीत।
डंडा नाचा अउ सुवा, रखय सँजो के रीत।।
नवा फसल कोठी भरे, उन्नत रहय किसान।
संस्कृति संस्कार धर, आवय नवा बिहान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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दोहा गीत- मोर सेंदरी *गाँव*
नदी टेसुआ तीर मा, मोर सेंदरी गाँव।
बहिथे पुरवाई मया, बर पीपर के छाँव।।
सतनामी पारा सुनव, लगथे खासमखास।
जैतखाम जोड़ा जघा, हावय मोर निवास।।
सतगुरु घासीदास के, पग मा माथ नवाँव।
नदी टेसुआ तीर मा, मोर सेंदरी गाँव।।
थाना परथे पथरिया, पोस्ट जरेली आय।
मुंगेली सुन तो सखा, खाँटी जिला कहाय।।
इही मोर परिचय हरे, गजानंद हे नाँव।
नदी टेसुआ तीर मा, मोर सेंदरी गाँव।।
देहू ध्यान लगाय अब, खोले दूनों कान।
चंदन माटी गाँव के, महिमा करौं बखान।।
छोटे ला आशीष शुभ, परँव बड़े के पाँव।
नदी टेसुआ तीर मा, मोर सेंदरी गाँव।।
उत्ती मा बस स्टेंड हे, बुड़ती नदिया पार।
खेत खार रक्सेल मा, आन गाँव भंडार।।
कोयल गाथे गीत अउ, कउँवा करथे काँव।
नदी टेसुआ तीर मा, मोर सेंदरी गाँव।।
लोधी राउत गोड़ अउ, हवय जाति लोहार।
सतनामी केंवट बसे, बहिथे सुमता धार।।
मन मा नइहे काखरो, द्वेष जलन के घाँव।
नदी टेसुआ तीर मा, मोर सेंदरी गाँव।।
लोग उगाथें धान अउ, राहर चना मसूर।
मूंगफली तिंवरा घलो, होथे जी भरपूर।।
उपजाऊ मिट्टी इहाँ, हावय सुग्घर ठाँव।।
नदी टेसुआ तीर मा, मोर सेंदरी गाँव।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/07/2025
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---------------------- सोरठा छंद -------------------------------
*सोरठा छन्द*- विधान
डाँड़ (पद) - 2, चरण - 4
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 24,
विषम चरण मा मात्रा - 11,
सम चरण मा मात्रा - 13
तुकांत के नियम - विषम-विषम चरण के अंत मा।
यति / बाधा - 11, 13 मात्रा मा,
खास - चरण के शुरू मा जगण या पंचकल के मनाही.
सम चरण के आखिर मा रगण गुरु, लघु, गुरु (212), इहाँ गुरु के जघा मा दू लघु तको हो सकथें।
सम चरण के ग्यारहवाँ मात्रा ला लघु होना चाही।
विषम चरण के आखिर मा गुरु ,लघु (2,1) अनिवार्य
पहिली डाँड़ (पद)
(राज)(करय)(उजि)(यार) - विषम चरण
(3) (3) (2) (2+1) = 11
(अँधिया)(री हा)(रय सदा)- सम चरण
(4) (4) (2+1+2) = 13
दूसर डाँड़ (पद)
(मया)(पिरित) (के) (बार) - विषम चरण
(3) (3) (2)(2+1) = 11
(देवा)(री मा) (तँय दिया) - सम चरण
(4) (4) (2+1+2) = 13
तुकांत- विषम चरण के आखिर मा (यार /बार) माने गुरु ,लघु (2,1) आय हे.
राज करय उजियार, अँधियारी हारय सदा।
मया-पिरित के बार, देवारी मा तँय दिया।।
तरि नरि नाना गाँय, नान नान नोनी मनन।
सबके मन हरसाँय, सुआ-गीत मा नाच के।।
.
सुटुर-सुटुर दिन रेंग, जुगुर-बुगुर दियना जरिस।
आज जुआ के नेंग, जग्गू घर-मा फड़ जमिस।।
*अरुण कुमार निगम*
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सोरठा छंद अभ्यास- 15/01/2025
सृजन शब्द- *तिहार*
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हावय संगी खान, छत्तीसगढ़ तिहार के।
कहिथें हमर सियान, दया मया जेमा भरे।।
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सोरठा छंद अभ्यास-
सृजन शब्द- *नारी*
*****************************************
नारी रूप महान, नारी के सम्मान कर।
गीता ग्रंथ कुरान, करे हवय गुणगान जी।।
नारी ममता छाँव, करुणा के सागर घलो।
वो घर सुख के ठाँव, जे घर नारी मान हे।।
बाँध मया के डोर, जोड़ रखे परिवार घर।
लाथे सुमता भोर, सुख छइँहा अँचरा भरे।।
नारी सउँहत काल, शोषण अत्याचार बर।
काटे मुड़ चंडाल, रण चंडी बनके सदा।।
नारी करथे काम, काँधा ले काँधा मिला।
होगे ऊँचा नाम, पाँव मढ़ा दिस चाँद मा।।
दू कुल के बन लाज, रखे सँजो घर मान ला।
सुन लौ लोग समाज, अबला नइ सबला कहौ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/01/2025
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सोरठा छंद अभ्यास- 17/01/2025
सृजन शब्द- *बेटी*
*******************************
मीठा गुड़ कस पाग, बेटी के बोली लगे।
जेखर बड़का भाग, पाथे बेटी गोद मा।।
बेटी बनके फूल, महकाये घर द्वार ला।
कर लौ बात कबूल, माली बन दाई ददा।।
सृष्टि मिले उपहार, बेटी ला मानौ सदा।
सुख जिनगी आधार, बेटी ले विस्तार जग।।
ऊँचा करथे भाल, बेटी कुल के आन बन।
अउ पूजा के थाल, तुलसी के चौंरा इही।।
भक्ति प्रेम गुनगान, मीरा बन बेटी करे।
हावँय भरत उड़ान, बनके बेटी कल्पना।।
बेटी- बेटा एक, छोड़व करना भेद अब।
राह धरा नित नेक, शिक्षा अउ संस्कार दौ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/01/2025
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*सोरठा छंद अभ्यास*- 18/01/2025
सृजन शब्द- *मेला- मड़ई*
******************************
संस्कृति पहिचान, मेला- मड़ई हा हमर।
अपन धरोहर शान, रखना हम ला हे सँजो।।
राहय सजे दुकान, आनी- बानी चीज ले।
मनिहारी सामान, बिके जलेबी ओखरा।।
भाटो खावय पान, दीदी झूलय ढेलवा।
होवय मीत मितान, भेंट भलाई हा घलो।।
राहय भीड़ कतार, मंदिर दर्शन बर लगे।
ठाड़े देव दुवार, लइका लोग सियान सब।।
संस्कृति के सुख बीज, बोये बर मन के पटल।
चलत फिरत टाकीज, मेला मड़ई मा लगय।।
दिखथे रंग उमंग, पहिली जइसे अब कहाँ।
होथे अब हुड़दंग, मेला मड़ई मा बहुत।।
कहिथे सुन धर ध्यान, गजानंद इह बात ला।
संस्कृति के यश मान, रखना हे संभाल के।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/01/2025
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******************रोला छंद*****************
*रोला छन्द*
*डाँड़ /(पद)* - 4, चरण - 8
*तुकांत के नियम* - दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरण मा, 1 गुरु या 2 लघु आवै.
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 24
*यति / बाधा* - विषम चरण मा 11 मात्रा के बाद अउ सम चरण मा 13 मात्रा के बाद यति सबले बढ़िया माने जाथे, रोला के डाँड़ मा 12 गुरु घला माने गेहे तेपाय के 12 मात्रा या 12 ले ज्यादा मात्रा मा घला यति हो सकथे. एकर बर कोन्हों विशेष नियम नइ हे. फेर आधुनिक कवि मन 11, 13 के यति ला मान्य करके लिखत हें. इनकर अनुसार यति के पहिली अउ बाद मा त्रिकल आना जरूरी माने गेहे।
सम चरण मा जगण (121) मनाही।
*खास-* डाँड़ मन के आखिर मा 1 गुरु या 2 लघु आना चाहिए.
पहिली डाँड़ (पद)
(पछता)(वै मत)(वार) - पहिली चरण
(4) (4) (2+1) = 11
(पुनस्)(तर)(होवै)(ढिल्ला) - दूसर चरण
(3) (2) (4) (4) = 13
दूसर डाँड़ (पद)
(भुगतै) (घर परि)(वार) - तीसर चरण
(4) (4) (2+1) = 11
(सँगे)(सँग) (माई)(पिल्ला) - चउथा चरण
(3) (2) (4) (4) = 13
दुन्नों विषम चरण के आखिर मा (“वार”/ “वार”) माने गुरु ,लघु (2,1) के त्रिकल आये हे अउ दुन्नों सम चरण के शुरू मा (पुनस् / सँग) के त्रिकल आये हे. दुनों डाँड़ के1 अंत मा आय हे.
तुकांत- दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरण मा (ढिल्ला / पिल्ला) आय हे.
*मतवार (रोला छन्द)*
पछतावै मतवार, पुनस्तर होवै ढिल्ला।
भुगतै घर परिवार, सँगेसँग माई-पिल्ला।।
पइसा खइता होय, मिलै दुख झउँहा- झउँहा।
किरिया खा के आज, छोड़ दे दारू-मउँहा।।
अरुण कुमार निगम
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*रोला छंद अभ्यास-* 20/01/2025
सृजन शब्द- *तारनहार*
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गुरु जी तारनहार, बने पतवार खड़े हे।
भवसागर ले पार, करे उपकार बड़े हे।।
गुरु महिमा गुनगान, करौं मँय माथ झुका के।
होगे धन्य नसीब, शरण गुरु जी के पाके।।
गीता ग्रंथ कुरान, लिखे हे गुरु के महिमा।
गुरु के ज्ञान महान, धरे जा बढ़ही गरिमा।।
गुरु बन खेवनहार, नाव भव पार लगाथे।
गजानंद दिन-रात, चरण मा माथ झुकाथे।।
वंदन पग कर जोर, करौं मँय गुरु के सेवा।
ये धरती मा मोर, आप गुरु असली देवा।।
माता पिता समान, ध्यान दे राह दिखाये।
गजानंद के भाग्य, तहीं गुरु जी चमकाये।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/01/2025
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रोला छंद अभ्यास- 21/01/2025
सृजन शब्द- *चोला*
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गा ले प्रभु गुनगान, मुक्ति पा जाही चोला।
छोड़ भरोसा साँस, दगा दे जाही तोला।।
कर ले नेकी काम, इही हा सँग मा जाही।
जप ले गुरु के नाम, नाव भवपार लगाही।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/01/2025
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रोला छंद अभ्यास- 22/01/2025
सृजन शब्द- *ममता*
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सुख जी सरग समान, हवय दाई के ममता।
छइँहा अँचरा छोर, बँधाये सुमता क्षमता।।
बनके पूत सपूत, चुका ले गोरस कर्जा।
जग मा देव समान, हवय माता के दर्जा।।
कइसे करौं बखान, तोर ममता के माता।
देथस मया दुलार, तहीं जिनगी सुख दाता।।
तोर चरन मा माथ, रहँव मँय सदा झुकाये।
गीता ग्रंथ कुरान, तोर महिमा ला गाये।।
रखबे ममता छाँव, सदा दिन तँय हा दाई।
लेवँव जब-जब जन्म- मिलय अँचरा पुरवाई।।
पूत बनौं मँय तोर, मोर तँय हा ओ माता।
गजानंद हर जन्म,रहय माता सँग नाता।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/01/2025
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*रोला छंद अभ्यास-* 23/01/2025
सृजन शब्द- *आजादी*
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नेता वीर जवान, पहिन तन कपड़ा खादी।
थाम हाथ मा हाथ, दिलाइन हे आजादी।।
जनगण मन के गीत, सबो झन मिल के गाइन।
होगे देश स्वतंत्र, तिरंगा ध्वज फहराइन।।
आजादी के जंग, लड़िन हें मिल सब भाई।
बिरथा झन अब जाय, उँखर जी नेक कमाई।।
राहव मिल सब लोग, बाँध आपस मा सुमता।
बाढ़य झन मनभेद, रखव झन मन मा कुमता।।
जाति धरम के भेद, तुमन खूँटी मा टाँगव।
देश बनाव महान, सुमत के बँधना बाँधव।।
मनखे- मनखे एक, संत गुरु मन के कहना।
मानवता के पाठ, पढ़त हम ला हे रहना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/01/2025
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रोला छंद अभ्यास- 24/01/2025
सृजन शब्द- गाँव
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कहाँ गवाँगे गाँव, सुखद सुमता पुरवाई।
बंजर परगे खेत, नदी नरवा अमराई।।
सुन्ना हे चौपाल, चले नइ बात सियानी।
लोग भुलागे आज, संत गुरु मन के बानी।।
बर पीपर के छाँव, उजरगे धनहा डोली।
कौंआ मन के काँव, मीठ कोयल के बोली।।
गली खोर सुनसान, दिखे नइ संगी साथी।
रीति- नीति संस्कार, गवाँगे पोथी थाथी।।
बेजा कब्जा पाँव, हवय हर गाँव पसारे।
नइहे चारागाह, कोंन अब बात बिचारे।।
निज स्वारथ मा छेक, डरिन मनखे मन परिया।
खड़े सड़क मा गाय, उँखर बर नइहे कुरिया।।
एक नेक परिवार, कहाँ देखे बर मिलथे।
भाई- भाई आज, धरे कुमता ला लड़थे।।
बाँट डरिन माँ बाप, बुढ़ापा मा घिरलावत।
गजानंद दुख देख, नैन हे नीर बहावत।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/01/2025
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रोला छंद अभ्यास- 25/01/2025
सृजन शब्द- *गणतंत्र दिवस*
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पर्व हमर गणतंत्र, दिवस हावय जी पावन।
मन मा जगे उमंग, लगे हे खुशी सुहावन।।
संविधान अधिकार, दिये हे हक आजादी।
रखबो येखर मान, रखे सीना फौलादी।।
हमर शान अभिमान, तिरंगा ला फहराबो।
जनगणमन के गीत, चलौ सब मिलके गाबो।।
धरे एकता सूत्र, प्रतिज्ञा हम सब करबो।
भाई-भाई एक, बने आपस मा रहिबो।।
लोग रहँय खुशहाल, सुमत के गूँजय बानी।
जाति धरम ला छोड़, कहावँय हिंदुस्तानी।।
उन्नत देश विकास, सदा हो लोक भलाई।
भूख गरीबी दूर, मिटे जग जन करलाई।।
सैनिक वीर जवान, नमन हे देश सिपाही।
तुँहर दिये बलिदान, युगो युग सुरता आही।।
जोर काँध मा काँध, इमन जी लड़िन लड़ाई।
गजानंद कर जोर, करत हे मान बड़ाई।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/01/2025
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************* *उल्लाला छंद* ****************
*उल्लाला छन्द* -
उल्लाला छन्द 2 किसिम के होथे 13,13 मात्रा मा यति वाले अउ 15,13 मात्रा मा यति वाले
डाँड़ (पद) - 2, ,चरण - 4
तुकांत के नियम –
13-13 मात्रा मा यति वाले उल्लाला मा विषम-सम चरण मा तुकांत भी होथे अउ सम-सम चरण मा तुकांत भी होथे.
15-13 मात्रा मा यति वाले उल्लाला मा सिरिफ सम-सम चरण मा तुकांत माने जाथे.
हर डाँड़ मा मात्रा 13-13 मात्रा वाले उल्लाला मा 26 अउ 15-13 मात्रा वाले उल्लाला मा 28 मात्रा
यति / बाधा - 13, 13 मात्रा मा अउ 15-13 मात्रा मा.
खास - उल्लाला छन्द ला उल्लाल अउ चंद्रमणि छन्द घला कहिथें. रोला छन्द के बाद उल्लाला छन्द जोड़ के छप्पय छन्द बनाये जाथे.
*जिनगी (उल्लाला - 13,13 मा यति, विषम-सम तुकांत)*
जिनगी के दिन चार जी, हँस के बने गुजार जी।
दुख के हे अँधियार जी, सुख के दियना बार जी।।
नइ हे खेवन-हार जी, धर मन के पतवार जी।
तेज नदी के धार जी, झन हिम्मत तँय हार जी।।
(जिनगी) (के दिन) (चार जी),
4 4 (2,1,2)
(हँस के) (बने गु)(जार जी)।
4 4 (2,1,2)
*गुरू - 1 (उल्लाला - 13,13 मा यति, सम-सम तुकांत)*
दुख के पाछू सुख हवे, गोठ सियानी मान ले।
बिरथा नइ जाये कभू, संत गुरु के ज्ञान ले।।
गुरू बड़े भगवान ले, हरि दरसन करवाय जी।
गुरू साधना मा जरै, अउ अँजोर बगराय जी।।
(दुख के)(पाछू) (सुख हवे),
4 4 (2,1,2)
(गोठ सियानी) (मान ले)।
( 3,3,2) (2,1,2)
*गुरु - 2 (उल्लाला - 15,13 मा यति, सम-सम तुकांत)*
तँय घुनहा डोंगा बइठ झन, बुड़ो दिही मँझधार मा।
गुन बिना गुरू पतवार के, कोन उतरही पार मा।।
सुन तीन लोक के देव मन, जपैं गुरू के नाम ला।
जब पावैं आशीर्वाद तब, शुरू करैं उन काम ला।।
(तँय)(घुनहा)(डोंगा)(बइठ झन)
(2) { (4) (4) (2,1,2)}
(बुड़ो दिही मँझ)(धार मा)।
(3,3,2) (2,1,2)
*अरुण कुमार निगम*
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*उल्लाला छंद अभ्यास-* 27/01/2025
13-13 मात्रा मा यति,
(विषम- सम चरण मा तुकांत)
सृजन विषय- *गुरु ज्ञान*
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कहना मान सियान के, गठरी धर गुरु ज्ञान के।
कीमत जान जुबान के, जी ले सीना तान के।।
गरब गुमानी छोड़ दे, सच पथ मा पग मोड़ दे।
सुख सँग नाता जोड़ दे, भ्रम के मटका फोड़ दे।।
समझ बने संसार ला, साँसा मिले उधार ला।
सरल बना ब्यवहार ला, सुन ले दीन पुकार ला।।
दीप जला सत ज्ञान के, बड़ कीमत हे दान के।
जिनगी जी सम्मान के, छोड़ बुराई आन के।।
दया धरम उपकार ला, जिनगी के आधार ला।
झन भूलव सुख सार ला, जोड़ रखव परिवार ला।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/01/2025
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उल्लाला छंद अभ्यास- 29/01/2025
13-13 मा यति, (विषम-सम चरण मा तुकांत)
सृजन शब्द- *पर्यावरण*
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बाढ़त हे शहरीकरण, होवत हे सुख के हरण।
स्वच्छ रखौ पर्यावरण, नइ तो हो जाही मरण।।
सबो तरफ हे गंदगी, बाढ़त रोग दरिंदगी।
चलौ बचा लौ जिंदगी, करत हवँव मैं बंदगी।।
रँग-रँग के उद्योग मन, धुआँ धरे हे रोग बन।
निगलत हे तन खेत वन, जिनगी होगे थोर कन।।
बंजर खेती खार अब, करहू लोग बिचार कब।
उजड़ जही घर द्वार सब, नइ बचही सुख सार तब।।
घटत स्रोत जल के सुनौ, झन बइठे माथा धुनौ।
मनखे सोचव अउ गुनौ, रस्ता बचाव के चुनौ।।
प्लास्टिक पन्नी बंद कर, दिस साँसा ला चंद कर।
बिरथा झन तँय द्वंद कर, मोरो बात पसंद कर।।
बात बिचारिन आप हम, पेड़ बचाय बढ़ा कदम।
होत दिनोंदिन पेड़ कम, गजानंद के आँख नम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/01/2025
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उल्लाला छंद अभ्यास- 31/01/2025
13-13 मा यति, (विषम-सम चरण मा तुकांत)
सृजन शब्द- *करम*
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करम कमाई काम के, राह चलौ सच थाम के।
माला जप गुरु नाम के, देव मना घट धाम के।।
कर लौ जी नेकी करम, असल इही जग मा धरम।
भाखा मा राखव नरम, सुख जिनगी मिलही परम।।
सरल रखौ ब्यवहार ला, झन भूलव उपकार ला।
जोड़ रखौ सुख तार ला, जिनगी के आधार ला।।
मनखे करम सुधार ले, क्रोध अहं ला मार ले।
घट के देव पुकार ले, दाई ददा दुलार ले।।
गजानंद मन ठान जी, कर लौ करम महान जी।
रखौ धरम ईमान जी, बढ़ही जग मा शान जी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/01/2025
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उल्लाला छंद अभ्यास- 04/02/2025
13-13 मा यति, (सम-सम चरण मा तुकांत)
सृजन शब्द- ऋतु बसंत
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ऋतु बसंत के आगमन, धरा करे सिंगार हे।
मन मा रंग उमंग अउ, छाये खुशी बहार हे।।
कुहकत कारी कोयली, बइठे आमा डार मा।
मादकता बड़ छाय हे, फूल पात अउ नार मा।।
मोर पपीहा झूम के, गावत हावय गीत जी।
पड़की मैना संग मा, बाँधे मया पिरीत जी।।
फगुवा राग सुनात हे, रंग मया के घोल के।
सनन-सनन पुरवा करे, आये होली बोल के।।
पहिरे लुगरा लाल के, सेमर पेड़ पलास हा।
दुल्हन जइसे हे सजे, लजवंती मधुमास हा।।
गेहूँ चना मसूर ले, गहदे खेती खार हे।
ममहाये महुआ घलो, पाके तेंदू चार हे।।
पींयर-पींयर फूल के, सरसो मन सरसात हे।
रस स्वादन बर फूल मा, भँवरा मन मँडरात हे।।
ढोल नगाड़ा हा बजे, थामे रंग गुलाल ला।
भइया भौजी ले कहे, तोर रँगा दौं गाल ला।।
झूमत देख बसंत ऋतु, मन मा जगा उमंग ला।
हरियाली के संग मा, भरय मया के रंग ला।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/02/2025
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उल्लाला छंद अभ्यास- 05/02/2025
13-13 मा यति, (सम-सम चरण मा तुकांत)
सृजन शब्द- *कुम्हार*
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गुरुवर चाक कुम्हार के, गढ़-गढ़ रूप सजाय हे।
राह धरा गुरु ज्ञान के, मनखे नेक बनाय हे।।
छंद सरोवर मा नहा, तन मन ला उजराय हँव।
दया मया बिरवा तरी, ज्ञान छाँव ला पाय हँव।।
गुरु के आर्शीवाद ले, चंद लिखत हँव छंद जी।
नाम मान सम्मान सँग, मिलगे सुख मकरंद जी।।
गुरु गुरु गुण मा भेद हे, कर लौ गुरु पहिचान जी।
मान उही ला सत्य गुरु, जे मन नइ अभिमान जी।।
जड़मति मँय इंसान जी, भाग्य अपन सिरजाय हँव।
अरुण निगम गुरुदेव कस, गुरुवर मँय हा पाय हँव।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/02/2025
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उल्लाला छंद अभ्यास-
13-13 मा यति (सम-सम चरण मा तुकांत)
सृजन शब्द- *चंदन*
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बाबा घासीदास गुरु, चंदन माथ लगाय हे।
सतगुरु संत कबीर हा, चंदन मर्म बताय हे।।
चंदन जइसे राख ले, मनखे अपन स्वभाव ला।
शीतल सोच विचार ले, भर ले मन के घाव ला।।
संगत चंदन कस रखौ, होही अवगुण दूर जी।
मिलही जग मा मान अउ, यश बढ़ही भरपूर जी।।
पावन चंदन पेड़ मा, लिपटे रहिथे सर्प हा।
ईर्ष्या विष व्यापय नहीं, मिट जाथे जी दर्प हा।।
घिस-घिस चंदन ला लगा, बाहर तन उजराय हे।
चोवा चंदन पोत कुछ, मनखे ढोंग रचाय हे।।
चंदन कस महकौ सदा, अंतस करौ उजास जी।
शीतल निर्मल भाव रख, भर लौ प्रेम प्रकाश जी।।
गजानंद चंदन सहीं, खुद के रख व्यवहार ला।
सत्य करम से जोड़ ले, ये जिनगी के तार ला।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/02/2025
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उल्लाला छंद अभ्यास- 10/02/2025
15-13 मा यति (सम-सम चरण मा तुकांत)
सृजन शब्द- *मन*
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मन के तो जीते जीत हे, मन के हारे हार जी।
जिनगी के हर संघर्ष ला, हँसी-खुशी स्वीकार जी।।
मन ला रख ले चंचल सदा, बसे इही मा आस हे।
मन भीतर स्वच्छ विचार ले, बनथे जिनगी खास हे।।
ये मन ही जवाबदार हे, मन मा उठे सवाल के।
मन ही रोथे फिर बाद मा, मन मा दुख ला पाल के।।
मन हा मन ला भरमाय हे, मन मा लालच डार के।
फूँक-फूँक के रखबे कदम, मन मा सोच विचार के।।
मन हा दौड़य छिन-छिन सखा, बाँधे सुरता डोर ला।
राखे रहिबे मन भीतरी, दया-मया के सोर ला।।
मन हा बइठे मन भीतरी, दउड़े हे सौ कोस जी।
आ जाथे दुनिया घूम के, संगी आस पड़ोस जी।।
माँग मनौती मन ला मना, राहय दूर विकार ला।
गजानंद खुश रहिबे तहूँ, खुश रखबे संसार ला।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/02/2025
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उल्लाला छंद अभ्यास- 12/02/2025
15-13 मा यति (सम-सम चरण मा तुकांत)
सृजन शब्द- रैदास
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सन चौदह सौ तैंतीस के, माघ सुदी पन्द्रास जी।
दुखिया मन के कल्याण बर, जनम लिये रैदास जी।।
जनम धरे शुभ काशी नगर, माँ कलसां के कोख जी।
लीना हा जीवन संगिनी, पिता दास संतोख जी।।
साधु संत के संगति धरे, भाखिस सत के ज्ञान ला।
करके करम कमाई बने, पाइस जग मा मान ला।।
मोची जाति म जनमे करे, कर्मकार के काम ला।
जाति नहीं वो सत कर्म ले, पाइस जग मा नाम ला।।
ढोंग रूढ़ि अउ पाखण्ड के, जमके करिस विरोध ला।
सत्य राह अउ सत पंथ के, सदा कराइस बोध ला।।
बोलिस मन ला चंगा रखे, मिलथे खुशी अपार जी।
बसे कठौती गंगा घलो, बहिथे बन सुख धार जी।।
चाम मांस हाड़ा खून ले, सबके बने शरीर हे।
सबके सुख एक समान अउ, एके सबके पीर हे।।
बोलिस जग ला रैदास गुरु, भेदभाव ला छोड़ दौ।
मानवता अउ इंसानियत, के पथ मन ला मोड़ दौ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/02/2025
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उल्लाला छंद अभ्यास- 15/02/2025
15-13 मा यति (सम-सम चरण मा तुकांत)
सृजन शब्द- *दहेज*
**********************************
नाता जोड़व सब प्रेम के, छोड़व लोभ दहेज के।
बहू ला पराया झन कहौ, बेटी रखौ सहेज के।।
देना दहेज अभिशाप हे, लेना दहेज पाप हे।
मिल चिंतन करौ समाज अब, चिंता मा माँ बाप हे।।
झन करहू अंतर जी कभू, बेटी समान हे बहू।
भव सागर ले तब तर जहू, अपन समझहू जब लहू।।
झन आज दहेज सकेल जी, बेटी ला बढ़िया पढ़ा।
अपन पाँव मा होवय खड़ा, मान हौसला ला बढ़ा।।
सबके घर मा बेटी हवय, माँ नारी के रूप मा।
याद रखौ झन झुलसै कभू, तन दहेज के धूप मा।।
धर पद पैसा के रूतबा, करे दिखावा लोग हे।
बस कारण इही दहेज के, बाढ़त दिन-दिन रोग हे।।
पइसा मा वर तौलत हवैं, बेटी के माँ बाप जी।
अँधरा बन सभ्य समाज अब, देखत हे चुपचाप जी।।
भूँजत हे घर-घर के खुशी, बनके दहेज आग जी।
गजानंद आज समाज ले, मिटही कइसे दाग जी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/02/2025
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*छप्पय छन्द*
विधान-
डाँड़ (पद) - 6, ,चरण - 12, पहिली 4 डाँड़ रोला अउ बाद के 2 डाँड़ उल्लाला होथे. माने छप्पय छन्द हर 1 रोला अउ 1 उल्लाला ला मिला के बनाये जाथे.
तुकांत के नियम - पहिली 4 डाँड़ रोला हे त रोला के नियम लागू होही, आखरी 2 डाँड़ उल्लाला हे त उल्लाला के नियम लागू होही.
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - रोला मा 24 मात्रा अउ उल्लाला मा 26 या 28 मात्रा
यति/बाधा - रोला अउ उल्लाला के नियम अनुसार
छप्पय छन्द के शुरू के चार डाँड़ रोला हे. (11-13 यति वाले चार डाँड़)
बिसराये ब्यौहार, पहिर अँगरेजी चोला।
महतारी अउ बाप, नजर नइ आवै तोला।।
जाये बर परदेस, तियागे कुटुम-कबीला।
बन सुविधा के दास, करे बिरथा जिनगी ला।।
छप्पय छन्द के आखिरी के दू डाँड़ उल्लाला हे. (13,13 यति वाले दू डाँड़)
का पाबे परदेस ले, नाता-रिश्ता जोड़ के।
असली सुख इहिंचे मिलै, झन जा घर ला छोड़ के।।
*बिदेसी बाबू (छप्पय छन्द)*
बिसराये ब्यौहार, पहिर अँगरेजी चोला।
महतारी अउ बाप, नजर नइ आवै तोला।।
जाये बर परदेस, तियागे कुटुम-कबीला।
बन सुविधा के दास, करे बिरथा जिनगी ला।।
का पाबे परदेस ले, नाता-रिश्ता जोड़ के।
असली सुख इहिंचे मिलै, झन जा घर ला छोड़ के।।
*अरुण कुमार निगम*
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*छप्पय छंद* मा छप्पय छंद विधान
छप्पय के छै डाड़, हवय रोला उल्लाला।
मिलके दूनों छंद, करे हे शब्द उजाला।।
प्रथम चार जी डाड़, समाहित रोला जेमा।
अंतिम दू जी डाड़, छंद उल्लाला येमा।।
रोला उल्लाला संग मा, सुर लय ताल उमंग मा।
छलकत हे छप्पय छंद जी, मन मधुरस मकरंद जी।।
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छप्पय छंद अभ्यास- 17/02/2025
सृजन शब्द- ईमान
झन खोहू ईमान, इही ये असली धन जी।
देख पराया चीज, भरौ झन लालच मन जी।।
करौ मेहनत खूब, खुशी जिनगी मा भर लौ।
नेक बनौ इंसान, राह नेकी के धर लौ।।
इज्जत होथे गुणवान के, मनखे के ईमान के।
कहना मानौ गुरु ज्ञान के, गीता ग्रंथ कुरान के।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/02/2025
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छप्पय छंद अभ्यास- 19/02/2025
सृजन शब्द- *नवा बिहान*
मन मा भर विश्वास, सुमत के बाँधव डोरी।
लावव नवा बिहान, करौं बिनती कर जोरी।।
टोर कुमत के फाँस, मया के बोलव बोली।
राखव जोड़ विचार, रहव सब मिल हमजोली।।
एक सहीं सुख नइ मिलय, फूल दुबारा नइ खिलय।
सुमता रस्ता गढ़ चलव, नेक राह मा बढ़ चलव।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/02/2025
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छप्पय छंद अभ्यास- 21/02/2025
सृजन शब्द- *शिक्षा*
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शिक्षा के उजियार, घरो-घर हम फइलाबो।
गढ़बो सभ्य समाज, सुखद परिवार बनाबो।।
भगही भय भ्रम भूत, सजग मनखे हो जाहीं।
रूढ़ि अंधविश्वास, मिटा सत जोत जलाहीं।।
शिक्षा ले संस्कार अउ, मिलथे जग मा मान जी।
नोनी-बाबू ला पढ़ा, रख के बढ़िया ध्यान जी।।
शिक्षा बिन अँधियार, हवय जी चारो कोती।
शिक्षा ज्ञान प्रकाश, रूप मा सुख के मोती।।
करथे तर्क वितर्क, मनुज शिक्षा ला पाके।
देथे सबल जवाब, दुसर के मुँह नइ झाँके।।
शिक्षा जननी ज्ञान के, ध्यान धरौ इंसान जी।
बनके शिक्षा दूत सब, बाँटव निस दिन ज्ञान जी।।
शिक्षा नवा बिहान, हमर जिनगी मा लाथे।
बनथे मनुज सुजान, ज्ञान के पोथी पाथे।।
जेन कलम ले दूर, रहय वो बड़ पछतावय।
नीति धरम के बात, समझ ओला नइ आवय।।
भले खाव कम दू कौर ला, पर शिक्षा मा ध्यान दौ।
बेटा बेटी ला दौ पढ़ा, एक बरोबर मान दौ।।
भरही शुभ संस्कार, हमर जिनगी मा शिक्षा।
पढ़ लौ आखर चार, ग्रहण कर लौ गुरु दीक्षा।।
बनही सभ्य समाज, अपन हक बर सब लड़हीं।
होही लोक विकास, शिखर उन्नति के चढ़हीं।।
मनखे बात विचार कर, थाम चलौ शिक्षा डगर।
सुखद रही परिवार घर, शिक्षा के बुनियाद धर।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/02/2025
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छप्पय छंद अभ्यास- 24/02/2025
सृजन शब्द- मतदान/मतदाता
कर लौ जी मतदान, अपन मत से मतदाता।
रखहू मन निष्पक्ष, छोड़ लालच से नाता।।
राखव सोच विकास, गाँव घर के खुशहाली।
चुन लौ नेता खास, करय जे सुख रखवाली।।
बात सुनौ छोटे बड़े, शूल द्वेष के झन गड़े।
जे दुख मा राहय खड़े, वोट ओकरे मा पड़े।।
समझौ मत के मोल, चेत कर सब मतदाता।
कर लौ बात विचार, छोड़ लालच से नाता।।
होही राष्ट्र विकास, सही जब नेता चुनबो।
करके गलत चुनाव, सदा दिन माथा धुनबो।।
मतदाता मतदान के, समझौ सुग्घर मोल जी।
चिंतन करौ विकास के, अंतस पट ला खोल जी।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/02/2025
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छप्पय छंद - 26/02/2025
सृजन शब्द- महाशिवरात्रि
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परब महाशिवरात्रि, लगे हे बड़ा सुहावन।
शंकर भोले नाथ, बबा ला जी परघावन।।
देही आशीर्वाद, मनोरथ पूरा करही।
पाबो शुभ वरदान, कष्ट बाधा ला हरही।।
जयकारा गूँजत हवय, बम बम भोले नाथ के।
डमडम डम डमरू करे, नीलकंठ के हाथ के।।
जप शंकर के नाम, महाशिवरात्रि मनाबो।
महादेव शिव धाम, मनौती माँगे जाबो।।
करही पूरन काज, सबो दुख विघ्न मिटाही।
सुख के नवा अँजोर, हमर जिनगी मा लाही।।
माला जप लौ रात दिन, शिव शंकर के नाम के।
जिनगी भोलेनाथ बिन, नइहे कौड़ी काम के।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/02/2025
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-------------------------कुण्डलिया छंद--------------------------
*कुण्डलिया छन्द*
डाँड़ (पद) - 6, चरण - 12, पहिली 2 डाँड़ दोहा अउ बाद के 4 डाँड़ रोला होथे. माने कुण्डलिया छन्द हर 1 दोहा अउ 1 रोला ला मिला के बनाये जाथे.
तुकांत के नियम – दोहा के पहिली 2 डाँड़ मा दोहा के नियम अउ बाद के 4 डाँड़ मा रोला के नियम के पालन होथे.
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 24 दोहा अउ रोला के नियम अनुसार.
यति / बाधा – दोहा अउ रोला के नियम अनुसार
खास - कुण्डलिया छन्द मा बहुत अकन खास बात हे. येखर शुरुवात माने दोहा वाले पहिली चरण के शुरुवात के शब्द या शब्द समूह या आगू-पीछू करके शब्द समूह ला कुण्डलिया के आखिरी मा माने रोला के 8 वाँ चरण के आखिरी मा आना जरूरी होथे. माने कि कुण्डलिया छन्द के मुड़ी- पूँछी एक्के जइसन होना चाहिए. इही पाय के एला कुण्डलिया कहिथें. अइसे लागथे मानों कोन्हों साँप हर कुण्डली मार के बइठे हे अउ ओखर मुड़ी- पूँछी एक्के बरोबर दिखथे.
कुण्डलिया छन्द के दूसर खासियत ये हे कि दोहा के 4 था चरण हर, रोला के पहिली चरण बने.
हरियर रुखराई कटिस, सहर लील गिन खेत (दोहा के पहिली डाँड़)
देखत हवैं बिनास सब, कब आही जी चेत (दोहा के दूसर डाँड़)
कब आही जी चेत, हवा-पानी हे बिखहर (रोला के पहिली डाँड़)
खातू के भरमार, खेत होवत हे बंजर (रोला के दूसर डाँड़)
रखौ हवा-ला शुद्ध, अऊ पानी-ला फरियर (रोला के तीसर डाँड़)
डारौ गोबर-खाद, रखौ धरती ला हरियर (रोला के चउथा डाँड़)
एमा पहिली दू डाँड़ “दोहा” हे. बाद के चार डाँड़ रोला हे.
दोहा के चउथा चरण “कब आही जी चेत’ रोला के शुरुवात मा आय हे. दोहा के पहिली शब्द “हरियर” रोला के आखिर मा आय हे. कुंडलिया के दोहा वाले हिस्सा मा दोहा के नियम लागू होय हे, अउ रोला वाले हिस्सा मा रोला के नियम के पालन होय हे.
*कुण्डलिया छन्द*
हरियर रुखराई कटिस, सहर लील गिन खेत।
देखत हवैं बिनास सब,कब आही जी चेत।।
कब आही जी चेत, हवा-पानी हे बिखहर।
खातू के भरमार, खेत होवत हें बंजर।।
रखौ हवा-ला शुद्ध, अऊ पानी-ला फरियर।
डारौ गोबर-खाद, रखौ धरती ला हरियर।।
*अरुण कुमार निगम*
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कुण्डलिया छंद- 03/03/2025
सृजन शब्द- महँगाई
महँगाई के मार ले, हलाकान सब लोग।
सबो रोग ले हे बड़े, महँगाई के रोग।।
महँगाई के रोग, बने विकराल खड़े हे।
चुलहा हे चुपचाप, गृहस्थी मौन पड़े हे।।
गजानंद अब कोंन, करय सुख के भरपाई।
चुप बइठे सरकार, बढ़त हे बड़ महँगाई।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/03/2025
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कुण्डलिया छंद- 06/03/2025
सृजन शब्द- पेड़
राखव पेड़ सहेज के, संगी मोर मितान।
पेड़ बिना संसार ये, हो जाही वीरान।।
हो जाही वीरान, सबो के सुख अउ जिनगी।
झन काटव जी पेड़, सुलगही दुख के तिलगी।।
गजानंद जी पेड़, लगाये बर नित भाखव।
पेड़ साँस आधार, बचा के हरदम राखव।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/03/2025
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कुण्डलिया छंद अभ्यास- 07/03/2025
सृजन शब्द- पानी
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पानी हे अनमोल जी, पानी रखव सँभाल।
बिन पानी के हो जही, ये जिनगी बेहाल।।
ये जिनगी बेहाल, होय झन सोचव भाई।
पानी के हर बूँद, हवय सुन बड़ सुखदाई।।
बिरथा झन बोहाव, करत मनखे मनमानी।
साँसा के आधार, सदा दिन राहय पानी।।
पानी जइसे जी रखौ, सरल सदा व्यवहार।
सब ला लेके संग मा, बनौ सुवासित धार।।
बनौ सुवासित धार, कहावव पावन गंगा।
बचन धरौ रैदास, रखौ मन ला जी चंगा।।
पानी बानी ज्ञान, कदर करथे जी ज्ञानी।
गजानंद अनमोल, हवय जग मा जी पानी।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/03/2025
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कुण्डलिया छंद- 08/03/2025
सृजन शब्द- *नारी*
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नारी मूरत त्याग के, नारी ममता खान।
नारी ले सिरजे जगत, नारी जग बरदान।।
नारी जग बरदान, कहाथे सुख के पेटी।
नारी माता रूप, बहू बहिनी अउ बेटी।।
गजानंद जी कोंन, कथे इन ताड़नहारी।
रचत हवँय इतिहास, आज बन सबला नारी।।
नारी के सिंगार ये, ओखर तन के लाज।
मर्यादा ला राख के, पाथे मान समाज।।
पाथे मान समाज, रहे ले शिक्षित नारी।
करथे घर खुशहाल, निभा के जवाबदारी।।
रखथे सुख सम्भाल, काम कर मंगलहारी।
गजानंद इतिहास, रचे बन सबला नारी।।
चौका चूल्हा तक नहीं, अब नारी के काम।
आसमान मा पग रखत, पावत हावँय नाम।।
पावत हावँय नाम, मान अउ इज्जत भारी।
दो कुल के बन शान, करत हें घर उजियारी।।
गजानंद सुन बात, मिले नारी ला मौका।
गढ़य नवा प्रतिमान, छोड़ अब चूल्हा चौका।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/03/2025
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कुण्डलिया छंद- 10/03/2025
सृजन शब्द- *सुरता मा सूरुज बसे*
सुरता मा सूरुज बसे, रइही जी दिन रात।
लोरिक चंदा भरथरी, ढोला मारू गात।।
ढोला मारू गात, सुनावत हम ला रहिबे।
बसे दूर परदेश, मयारू काला कहिबे।।
तोर मया संदेश, कोंन करही अब पुरता।
गजानंद सब लोग, करत हें रो-रो सुरता।।
गाइस गाना भरथरी, बहिस मया के धार।
सूरुज बाई ला नमन, करत हवँव सौ बार।।
करत हवँव सौ बार, तोर सुरता ला दाई।
रोवत हे दिन रैन, होय कइसे भरपाई।।
गजानंद सम्मान, जियत जी वो नइ पाइस।
छत्तिसगढ़ यश कंठ, भरथरी जेहर गाइस।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/03/2025
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कुण्डलिया छंद अभ्यास- 12/03/2025
सृजन शब्द- *फागुन*
आये फागुन झूम के, धरके रंग गुलाल।
दो हजार पच्चीस के, मनभावन ये साल।।
मनभावन ये साल, बधाई गाड़ा-गाड़ा।
गावव मिल सब फाग, बजावव ढोल नगाड़ा।।
द्वेष द्वंद ला लेस, सबो के मन हरियाये।
धरे मया के रंग, झूम के फागुन आये।।
फागुन मा माते हवय, गाँव शहर अउ खोर।
ढोल नगाड़ा फाग के, गूँजत गजबे शोर।।
गूँजत गजबे शोर, पता कर ले हमजोली।
धर आ रंग गुलाल, खेलबो मिलके होली।।
गजानंद तज द्वेष, मया के गा ले तँय धुन।
झूम-झूम के देख, हवय नाचत जी फागुन।।
होली खेलव मिल सबो, द्वेष द्वंद ला लेश।
सरग बनावव गाँव घर, स्वच्छ रखौ परिवेश।।
स्वच्छ रखौ परिवेश, देश के नाम बढ़ावव।
हिंदू मुस्लिम सिक्ख, इसाई भाई आवव।।
गजानंद जी बाँट, मया सँग हँसी ठिठोली।
चढ़े पिरित के रंग, खेल लौ अइसन होली।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/03/2025
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कुण्डलिया छंद- 18/03/2025
सृजन शब्द- *परिवार*
कहना हावय मोर ये, असली धन परिवार।
जिनगी मा परिवार ले, हावय सुख आधार।।
हावय सुख आधार, बात ये सच पतियावव।
झंझट झगड़ा छोड़, कुमत ले तुम दुरिहावव।।
राहव मिलके संग, संग मा सुख-दुख सहना।
गजानंद धर ध्यान, हवय बस अतके कहना।।
सुमता मा परिवार घर, बनथे सरग समान।
जे घर काँड़ मयार बन, रखथें ध्यान सियान।।
रखथें ध्यान सियान, सदा ही कर चतुराई।
बात सियानी लोग, कहाँ अब धरथें भाई।।
बटगे घर परिवार, घरोघर दिखथे कुमता।
गजानंद जी आज, कहाँ मिलथे सुख सुमता।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/03/2025
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कुण्डलिया छंद- 20/03/2025
सृजन शब्द- गौरइया
पावत नइ हँव आजकल, गौरइया के शोर।
घर अँगना सुन्ना पड़े, खाली- खाली खोर।।
खाली- खाली खोर, दिखत हे बारी कोला।
गौरइया के गोठ, सुने बर तरसे चोला।।
गजानंद जी तोर, हवय रद्दा ला ताकत।
गौरइया आ लौट, शोर नइ हँव मैं पावत।।
गौरइया के खोंधरा, दिखे नहीं जी आज।
लेस डरिन मनखे इहाँ, बनके स्वारथ बाज।।
बनके स्वारथ बाज, उजाड़त हें रुख राई।
जीव-जंतु के पीर, कहाँ समझत हें भाई।।
गजानंद घर खोर, हवय सुन्ना अमरइया।
कहाँ लुकागे मोर, कोयली अउ गौरइया।।
छत मा पानी दौ मढ़ा, लागत हावय प्यास।
कनकी कुटकी दौ खिला, अतके हावय आस।।
अतके हावय आस, पुकारत हे गौरइया।
ब्याकुल हे मन मोर, मिले नइ सुख पुरवइया।।
गजानंद कर जोर, कहत हे लिख के खत मा।
गौरइया आ लौट, मोर अँगना घर छत मा।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/03/2025
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कुण्डलिया छंद अभ्यास-
सृजन शब्द- आलस
मानव मन मस्तिष्क ला, करथे आलस सुस्त।
आलसपन ला छोड़ के, राहव हरदम चुस्त।।
राहव हरदम चुस्त, नाम प्रभु गुन ला गावव।
जिनगी मा नित नेक, करम बर पाँव बढ़ावव।।
गजानंद अनमोल, समय के कीमत जानव।
कर लौ जतन शरीर, छोड़ आलस ला मानव।।
करना हे ता सोच झन, मनखे कल अउ आज।
उठा कलम लिख डाल तँय, अपन हृदय के राज।।
अपन हृदय के राज, खोल दे सब सच्चाई।
झन रह जी चुपचाप, बता का हे करलाई।।
गजानंद धर ध्यान, बहा ले सुख के झरना।
गुरु जी हे पतवार, फिकर तब का हे करना।।
जिनगी के अउ काम बर, हवय समय पर्याप्त।
छंद सृजन बर पर अनुज, जाथे ओढ़र ब्याप्त।।
जाथे ओढ़र ब्याप्त, बताथस बूता भारी।
जानत हँव सब बात, बोल झन गोठ लबारी।।
सच्चाई ला बोल, झूठ हे दुख के तिलगी।
गजानंद के गोठ, धरे जा खिलही जिनगी।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/03/2025
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कुण्डलिया छंद- *22 मार्च विश्व जल दिवस विशेष*
पानी बिन मनखे घलो, तड़पत जइसे मीन।
फोकट पानी झन बहा, झन साँसा ला छीन।।
झन साँसा ला छीन, लगा ले तँय रुख राई।
लाही पानी खींच, सरग ला दे पुरवाई।।
गजानंद जल स्रोत, बचाये ले जिनगानी।
रही सुरक्षित आज, हमर कल हो जब पानी।।
पानी ला राखव सदा, संवर्धित अउ साफ।
नइ तो नइ करही कभू, भावी पीढ़ी माफ।।
भावी पीढ़ी माफ, माँग के झन लौ मउका।
पानी रखव सहेज, कहत हौं सब ला ठउका।।
गजानंद धर ध्यान, करव झन जी बचकानी।
रोकव ब्यर्थ बहाव, तभे बचही जी पानी।।
पानी-पानी हो जही, बिन पानी संसार।
पानी ले जिनगी चले, पानी जग आधार।।
पानी जग आधार, सुनौ जी मोरो बानी।
नदी कुँआ तालाब, बनावव बनके दानी।।
प्यास बुझा संसार, अमर होही जिनगानी।
गजानंद हो धन्य, बचा के पावन पानी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/03/2025
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कुण्डलिया छंद- *छंद सृजन अवकाश*
रहिथे दिन इतवार के, छंद सृजन अवकाश।
समय बिता परिवार मा, बाँटत खुशी प्रकाश।।
बाँटत खुशी प्रकाश, मगन मन झूमे नाचे।
जीवन साथी संग, मीठ बोली ला बाचे।।
गजानंद परिवार, खजाना असली कहिथे।
सुन संगी रविवार, दिवस छुट्टी के रहिथे।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/03/2025
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कुण्डलिया छंद- 24/03/2025
सृजन शब्द- माटी
माटी ले राखव मया, कर लौ शुभ यशगान।
ये माटी के गोद मा, सिरजे सुख के खान।।
सिरजे सुख के खान, सुमत के सरग समाये।
गीता ग्रंथ कुरान, हवय महिमा ला गाये।।
माथा तिलक लगांव, बसा के मया मुहाटी।
गजानंद कर जोर, करे नित वंदन माटी।।
करजा माटी के चुका, होही बड़ उपकार।
पाबे जग मा नाम अउ, मन मा नित मनुहार।।
मन मा नित मनुहार, जगा के जतन करौ जी।
कर माटी सिंगार, मया के रतन भरौ जी।।
गजानंद जी तोर, नाम जग होही दरजा।
बनके पूत सपूत, चुका माटी के करजा।।
माटी ले सिरजे हवय, मनखे तन ये तोर।
झन कर गरब गुमान ला, लमा मया के शोर।
लमा मया के शोर, कहत हँव सुन ले भाई।
कुमता खाई पाट, सुमत के कर भरपाई।।
तोर अपन परिवार, सुताही तोला खाटी।
गजानंद तन तोर, एक दिन मिलही माटी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/03/2025
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कुण्डलिया छंद- 26/03/2025
सृजन शब्द- पीरा
पीरा मा दाई-ददा, दिखथें ब्याकुल आज।
आँखी ले आँसू ढरे, झेलत हें दुख गाज।।
झेलत हें दुख गाज, बुढापा मा सौ आना।
देथें ताना मार, बहू बेटा मन खाना।।
गजानंद कर भूल, पूत ला समझे हीरा।
सत्य कहौं सुन बात, समझथें बेटी पीरा।।
पीरा ला मत रख दबा, कहि दे मन के बात।
अंतस मा सोचत गुनत, झन रहिबे दिन रात।।
झन रहिबे दिन रात, बता के हल्का कर ले।
दया मया ला बाँट, खुशी जिनगी मा भर ले।।
पीरा मा मन तोर, कभू झन होय अधीरा।
गजानंद दिन रात, पड़े रह झन धर पीरा।।
पीरा पर के जान लौ, पीरा स्वयं समान।
मानवता के चढ़ चलौ, सब दिन ऊँच मचान।।
सब दिन ऊँच मचान, ज्ञान शिक्षा ले मिलथे।
रखे दया के भाव, फूल हर पग मा खिलथे।।
गजानंद खुद कर्म, बना लौ तुम जी हीरा।
तोर मोर ला छोड़, समझ लौ पर के पीरा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/03/2025
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कुण्डलिया छंद- *सात सतनाम सिद्धांत संदेशा*
संदेशा सतनाम मा, हवय सात सिद्धांत।
येखर पालन ला करव, होही दुख के अंत।।
होही दुख के अंत, धरे गुरु गुन जब चलबो।
पाबो ज्ञान प्रकाश, जोत सत के बन जलबो।।
गजानंद गुरु ज्ञान, मिटाथे भ्रम अंदेशा।
चलव सदा सत राह, धरे गुरु के संदेशा।।
*1. सतनाम ऊपर अडिग विश्वास रखव-*
संदेशा पहला सुनव, गुनव लगा के ध्यान।
आस रखव सतनाम मा, बोलव सत्य जुबान।।
बोलव सत्य जुबान, तभे जग आदर मिलही।
दया मया के फूल, सदा जिनगी मा खिलही।।
गजानंद विश्वास, सत्य मा रखव हमेशा।
अजर नाम सतनाम, हवय गुरु के संदेशा।।
*2. मूर्ति पूजा झन करव*
संदेशा गुरु दूसरा, छोड़व पूजा मूर्ति।
मूर्ति देवता हा कभू, करय नहीं कुछ पूर्ति।।
करय नहीं कुछ पूर्ति, अंधविश्वास बताये।
शातिर स्वारथ साध, लूट ब्यवसाय बढ़ाये।।
गजानंद पाखंड, करे जिनगी ला शेशा।
जागव संत समाज, दिये गुरु सत संदेशा।।
*3. जाति-पाति के प्रपंच मा झन परव*
संदेशा गुरु तीसरा, सुन लौ आप जरूर।
राहव मनखे बन सबो, जाति-पाति ले दूर।।
जाति-पाति ले दूर, रहे ले सुमता बढ़थे।
बनथे नेक समाज, सबो सुख सीढ़ी चढ़थे।।
गजानंद जी कर्म, दिलाथे सुख अउ क्लेशा।
मनखे-मनखे एक, दिये गुरु जी संदेशा।।
*4. जीव हत्या मत करव*
संदेशा चौथा दिये, सतगुरु घासीदास।
बंद जीव हत्या करव, एक सबो के साँस।।
एक सबो के साँस, हाड़ तन खून समाये।
मूक जीव ला मार, मनुज तँय काबर खाये।।
गजानंद जी छोड़, जीव हत्या के पेशा।
जीये के अधिकार, सबो ला दौ संदेशा।।
*5. नशा के सेवन झन करव*
संदेशा गुरु पाँचवाँ, नशा पान दौ छोड़।
रइही खुश परिवार घर, नाता सुख से जोड़।।
नाता सुख से जोड़, मान धन इज्जत पाहू।
नशा नाश के खान, बात जब सच पतियाहू।।
गजानंद गुन ज्ञान, नशा ले जाथे लेसा।
नशा पान दौ छोड़, दिये गुरु जी संदेशा।।
*6. पर के नारी ला भी माता बहिन मानौ*
संदेशा छठवाँ दिये, नारी के सम्मान।
पर नारी माता कहौ, रखव बात ये ध्यान।।
रखव बात ये ध्यान, बुरा झन नजर उठावव।
घर के इज्जत आन, शान ला आप बचावव।।
गजानंद झन मार, गोठ के ब्यंग्य हुदेशा।
पर नारी ला मान, बहिन माता संदेशा।।
*7. चोरी अउ जुआ ले दूर रहव*
संदेशा गुरु सातवाँ, ज्ञान भरे भरपूर।।
राहव चोरी अउ जुआ, ले सब दिन जी दूर।।
ले सब दिन जी दूर, बचव लिग़री चारी ले।
भर लौ भूखन पेट, अपन श्रम के थारी ले।।
बुरा काम ले जेल, एक दिन जाहू ठेसा।।
गजानंद जी कर्म, बड़े कर गुरु संदेशा।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/03/2025
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कुण्डलिया छंद- 29/03/2025
सृजन शब्द- मेला
मेला जिनगी मा सजे, रहय सदा रख ध्यान।
हँसी खुशी मा दिन बिते, गावत गुरु गुणगान।।
गावत गुरु गुणगान, सदा शुभ कारज कर ले।
तज दे गरब गुमान, डगर नेकी के धर ले।।
उड़ही साँसा तोर, सबो ला छोड़ अकेला।
गजानंद संसार, मया माया के मेला।।
मेला जइसे हे लगे, ये जिनगी मा भीड़।
दुख के रद्दा छोड़ के, बुन ले सुख के नीड़।।
बुन ले सुख के नीड़, मया के छा ले छानी।
दया धरम जग बाँट, चार दिन के जिनगानी।।
गजानंद हँस बोल, बहा सुमता के रेला।
सौदा कर ले छाँट, लगे जिनगी मा मेला।।
मेला माया मोह के, लगे हवय संसार।
नेक करम ला ले बना, सुख जिनगी आधार।।
सुख जिनगी आधार, गढ़े जा सुमता सीढ़ी।
कर ले अइसन काम, करय सुरता नव पीढ़ी।।
मोर-मोर झन बोल, मरे मा सब कुछ ढेला।
गजानंद तज मोह, लगा मन गुरु गुन मेला।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/03/2025
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कुण्डलिया छन्द- *छत्तीसगढ़*
भुइँया ये छत्तीसगढ़, हावय सरग समान।
येखर गोदी अवतरिन, ऋषि मुनि संत महान।।
ऋषि मुनि संत महान, ज्ञान के धरे पिटारा।
धन्य धरा सुख धाम, अन्न धन के भंडारा।।
गजानंद कर जोर, परय नित येखर पइँया।
छत्तीसगढ़ महान, नमन कर लौ ये भुइँया।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/06/2025
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कुण्डलिया छन्द- *आसाढ़*
भागे दिन अब जेठ के, लगगे हे आसाढ़।
पानी गिरही रदरदा, आही नदिया बाढ़।।
आही नदिया बाढ़, छलकही नरवा तरिया।
हरियाही सब पेड़, सुघर लगही बन परिया।।
जाहीं खेत किसान, किसानी के दिन आगे।
गजानंद जी जेठ, घाम के दुख अब भागे।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/06/2025
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कुण्डलिया छन्द- तिहार
संगी तीज तिहार हा, देथे खुशी अपार।
बँधे मया के पाग मा, रीति नीति संस्कार।।
रीति नीति संस्कार, धरम के मरम सिखाथे।
भरथे रंग उमंग, सुमत के राह दिखाथे।।
गजानंद आनन्द, कभू नइ होवय तंगी।
पावन तीज तिहार, मनाथे मिल सब संगी।।
आनी-बानी के परब, मनभावन परिवेश।
रखथे संस्कृति ला सँजो, छत्तीसगढ़ प्रदेश।।
छत्तीसगढ़ प्रदेश, कहाथे धान कटोरा।
सबके मन ला भाय, हरेली तीजा पोरा।।
गजानंद जी बाँट, दया धन बनके दानी।
माने लोग तिहार, खुशी धर आनी-बानी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/06/2025
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कुण्डलिया छन्द- *बोरे- बासी*
बोरे- बासी खाय ले, तन- मन चंगा होय।
मनखे रहे निरोग अउ, नइ तो रोग बिटोय।।
नइ तो रोग बिटोय, बचाथे गरमी लू ले।
वसा विटामिन खूब, हवय जी येमा घूले।।
करथे दूर थकान, रखे नइ कभू उदासी।
गजानंद गुनगान, करे जा बोरे- बासी।।
खाथँय रख के चाव बड़, बारो महिना लोग।
बोरे- बासी खाय ले, नइ होवय कुछु रोग।।
नइ होवय कुछु रोग, घरेलू आय दवाई।
शरम करे ला छोड़, लगा मन खावव भाई।।
गजानंद विज्ञान, गुनी सब महिमा गाथँय।
नीबू आम अथान, गोंदली सँग मा खाथँय।।
बर्गर पिज़्ज़ा खाय बर, खूब मचे हे होड़।
पाले लोगन शौक ये, बोरे- बासी छोड़।।
बोरे- बासी छोड़, खात हें मैगी पास्ता।
इडली दोसा आज, बने हे फैशन नास्ता।।
गजानंद धर रोग, होत हे तन हा जर्जर।
लोगन जावव चेत, खाव झन पिज़्ज़ा बर्गर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/06/2025
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कुण्डलिया छन्द- *ओरी* (ओरवाती)
ओरी के पानी कहे, कर लौ संगी चेत।
फिसलत हे जिनगी इहाँ, बन मुट्ठी भर रेत।।
बन मुट्ठी भर रेत, काम काहीं नइ आही।
लालच धन के छोड़, ख़ाक मा ये मिल जाही।।
गजानंद धर ध्यान, मया के बाँधव डोरी।
ये जिनगी हा तोर, हवय पानी के ओरी।।
ओरी- ओरी देख ले, चुचुवावत हे नीर।
समझय कोंन गरीब के, अंतस के अब पीर।।
अंतस के अब पीर, बतावत हवय चुहानी।
आसो के बरसात, उजड़ जाही घर छानी।।
गजानंद मन झाँक, हवय दुख कोरी- कोरी।
चुचुवावय झन पीर, नैन ले ओरी- ओरी।।
ओरी के पानी सहीं, होगे इँखर नसीब।
मजबूरी मा हें जियत, भाई लोग गरीब।।
भाई लोग गरीब, निवाला बर हें तरसे।
बादर दुख के छाय, झमाझम पानी बरसे।।
गजानंद सरकार, करत हे बस मुँहजोरी।
सत्ता धरे गुमान, कभू नइ ढाँकय ओरी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/06/2025
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कुंडलिया छन्द- *गाँव*
गावँव महिमा गाँव के, रुमझुम खेती खार।
बर पीपर के पेड़ हे, हावय मया अपार।।
हावय मया अपार, दया के कोठी छलके।
पानी भरे मिठास, कुआँ तरिया नल जल के।।
होय किसानी काम, अन्न खाये बर पावँव।
धरती के भगवान, किसानन के गुन गावँव।।
देखे बर मिलथे इहाँ, पबरित मया पिरीत।
मन ला सबके मोहथे, सुवा ददरिया गीत।।
सुआ ददरिया गीत, पंडवानी अउ पंथी।
पढ़ँय रमायन पाठ, वेद गीता के ग्रन्थी।।
पुरखा हमर सियान, सबो ला रखे सरेखे।
गजानंद सुख छाँव, गाँव मा मिलथे देखे।।
नाँगर बइला के सुघर, हावय इहाँ मिलाप।
लोगन करथे भाव भर, सबो देव के जाप।।
सबो देव के जाप, गाँव के ठाकुर देवा।
पाथें आशीर्वाद, करत निसदिन जी सेवा।।
गजानंद सब लोग, भरोसा रखथें जाँगर।
उपजाये बर अन्न, खेत जाथें धर नाँगर।।
बोली भरे मिठास बड़, जस शक्कर कस पाग।
जनम धरे छत्तीसगढ़, सँहराथें सब भाग।।
सँहराथें सब भाग, कहा जी छत्तिसगढ़िया।
मनभावन परिवेश, इहाँ के मनखे बढ़िया।।
रँगय सबो इक रंग, मना दीवाली होली।
मन ला लेथे मोह, गाँव के गुरतुर बोली।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/07/2025
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कुण्डलिया छन्द- चौमास
दिन बादर चौमास के, धर आये बरसात।
अब तो संगी मान लौ, गजानंद के बात।।
गजानंद के बात, चेत धर सुन लौ गुन लौ।
झन रोहू पछतात, अपन घर कुरिया तुन लौ।।
लौ छानी ला ढाँक, सुतव झन ओढ़े चादर।
गिरही पानी खूब, बखत आगे दिन बादर।।
नाँगर बइला ला सजा, राखव सबो किसान।
गिरही पानी रदरदा, बोये चलबो धान।।
बोये चलबो धान, किसानी के दिन आगे।
खातू माटी खेत, सुघर बिजहा जतनागे।
गजानंद के संग, मितानी कर ले जाँगर।
बोये चलबो धान, सजा ले बइला नाँगर।।
आसा सम्मत के धरे, जावय खेत किसान।
उपजावय पर पेट बर, अन्न सदा धर ध्यान।।
अन्न सदा धर ध्यान, करे वो काम किसानी।
ओखर जइसे ढूँढ, मिले नइ जग मा दानी।।
सम्मत रहय किसान, बँधावव मन म दिलासा।
अरजी सुन भगवान, टोरहू झन तुम आसा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/07/2025
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कुण्डलिया छन्द- *दिहिस ज्ञान गुरु छंद के*
साधक अँव मँय सत्र दू, अरुण निगम गुरुदेव।
दिहिस ज्ञान गुरु छन्द के, मिटगे मन के भेव।।
मिटगे मन के भेव, मिलिस अनमोल खजाना।
तभे सकत हँव आज, छन्द ला मँय लिख पाना।।
थाम कलम ला हाथ, बने हँव गुरु आराधक।
गजानंद हे नाँव, सत्र मँय दू के साधक।।
जनकवि कोदूराम के, जनम दिवस सौगात।
दो हजार सोलह भइस, छंद सत्र शुरुआत।।
छंद सत्र शुरुआत, शुरू मा कंझट लागय।
फेर कहत हँव आज, सिरिफ जी छंद सुहावय।।
गजानंद जी नाम, कमाये हे सुग्घर छवि।
वंदन कोदूराम, दलित पुरखा जनकवि।।
संगी रहिस दिलीप अउ, भइया चोवाराम।
सूर्यकांत गुप्ता घलो, दिहिस संग अविराम।।
दिहिस संग अविराम, हमर दीदी जी आशा।
शकुंतला हा छोड़, बीच मा करिस निराशा।।
आसकरण जी दास, सुखन मन रहिन मतंगी।
हेमलाल प्रिय मोर, हवय आजो ले संगी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/07/2025
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कुंडलिया छंद- *लोक गीत*
करमा पंथी अउ सुआ, लोक गीत के शान।
बाँस ददरिया भरथरी, हमर मान सम्मान।।
हमर मान स्वभिमान, बढ़ाइस चंदा लोरिक।
गजानंद लिख छन्द, गात हे महिमा थोरिक।।
आवव ध्यान लगाय, सुनिन मइपिल्ला घर मा।
सुआ ददरिया नीक, लगे पंथी अउ करमा।।
सोहर लोरी भोजली, बिहा पठौनी गीत।
नीक भड़ौनी हा लगे, बाँधय मया पिरीत।।
बाँधय मया पिरीत, जँवारा गौरी- गौरा।
पचरा अउ जस गीत , सजावय मन के चौरा।।
गजानंद दौ ध्यान, होय झन ये हा नोहर।
रखौ सँजो के आज, भोजली लोरी सोहर।।
गम्मत डंडा नाच अउ, राहस छैला फाग।
हवय नँदावत आज ये, मनखे जावव जाग।।
मनखे जावव जाग, गीत अउ रीत बचावव।
शरम करे ला छोड़, साथ मिल हाथ बढ़ावव।।
गजानंद जी फेर, मया के होही सम्मत।
होही छैला नाच, संग मा राहस गम्मत।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/07/2025
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कुंडलिया छन्द- *नशा*
दारू झन पीयव कभू, झन पीयव सिगरेट।
बीड़ी गाँजा भाँग हा, देथे जिनगी मेट।।
देथे जिनगी मेट, देह मा रोग समाथे।
नाम भये बदनाम, मान मिट्टी मिल जाथे।।
गजानंद के गोठ, ध्यान दे आज समारू।
नशा करे धन नाश, छोड़ पीये बर दारू।।
आदी बनवा के नशा, जिनगी करे तबाह।
काल बने इंसान ला, करथे सुनव अगाह।।
करथे सुनव अगाह, चेत जावव रे भाई।
जकड़े रोग शरीर, होत हे बड़ करलाई।।
गजानंद परिवार, सबो के हे बर्बादी।
जिनगी रख खुशहाल, नशा के झन बन आदी।।
होथे नशा विनाश के, जड़ जानौ सब लोग।
जिनगी होत खुवार नित, सँचरे तन मा रोग।।
सँचरे तन मा रोग, बुद्धि मनखे के हरथे।
खोथे इज्जत मान, बुराई मन मा भरथे।।
गजानंद पछतात, मनुज जिनगी भर रोथे।
करे जला के राख, नशा दुख तिलगी होथे।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/07/2025
*छन्द खजाना बर*
कुण्डलिया छंद- *जाति-प्रथा*
भेद करिस हे कोंन जी, रंग लहू मा फर्क।
सबके तन तो एक हे, मनखे कर लौ तर्क।।
मनखे कर लौ तर्क, बहे सब बर पुरवाई।
ऊँच-नीच ला छोड़, जाति के पाटव खाई।।
छुआछूत विकराल, धरा मा पाँव धरिस हे।
कपटी शातिर कोंन, मनुज मा भेद करिस हे।।
बनही कइसे विश्व गुरु, बोलव भारत देश।
जाति-धर्म के हे जिहाँ, मनखे मन मा द्वेष।।
मनखे मन मा द्वेष, धरे हें जहर बरोबर।
भेदभाव के खूब, भरे माथा मा गोबर।।
रखे श्रेष्ठता भाव, भेद के खाई खनही।
गजानंद तब देश, विश्व गुरु कइसे बनही।।
बाढ़त बनके हे जहर, जाति-धर्म हा रोज।
जावत नइहे जाति हा, हल येखर लौ खोज।।
हल येखर लौ खोज, तभे सुख सुमता आही।
नइ तो भारत देश, गर्त मा गिरते जाही।।
गजानंद जी जाति, साँप कस फन हे काढ़त।
बनके अछूत रोग, दिनोदिन हावय बाढ़त।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/08/25
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************अमृतध्वनि छंद******************
*अमृत ध्वनि छन्द*
*डाँड़ (पद)* - 6, चरण - 16, पहिली 2 डाँड़ दोहा अउ बाद के 4 डाँड़ 8-8 के मात्रा मा यति वाले 3-3 चरण माने कुल 24-24 मात्रा के रहिथे फेर रोला नइ राहय.
*तुकांत के नियम* - दोहा के पहिली 2 डाँड़ मा दोहा के नियम अउ बाद के 4 डाँड़ मा 8-8 के मात्रा मा यति वाले 3-3 चरण.
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 24
*यति / बाधा*– दोहा म 13,11 मा यति अउ बाद के 4 डाँड़ मा 8-8 मात्रा के बाद यति.
*खास*- अमृत ध्वनि छन्द मा कुण्डलिया छन्द जइसे छै डाँड़ होथें. पहिली दू डाँड़ मन दोहा के होथें. दोहा के आख़िरी चरण कुण्डलिया छन्द जइसे तीसर डाँड़ के पहिली चरण बनथे. आख़िरी चार डाँड़ के हर डाँड़ मन आठ-आठ मात्रा के समूह मा बँटे रहिथें. अमृत ध्वनि छन्द के पहिला शब्द या शब्द-समूह अउ आख़िरी शब्द या शब्द-समूह एक्के रहिथे.
अमृत ध्वनि छन्द के आखरी 4 डाँड़ 8-8 के मात्रा मा यति वाले 3-3 चरण माने कुल 24-24 मात्रा के रहिथे फेर रोला नइ रहाय. अउ कुण्डलिया छन्द के आखरी डाँड़ रोला छन्द होथे.
अमृत ध्वनि छन्द के शुरू के दू डाँड़ “दोहा” हे. एमा दोहा छन्द के सबो नियम के पालन होय हे.
जाबे जब संसार ले, का ले जाबे साथ
संगी अइसन कर करम, जस होवै सर-माथ
दोहा के चउथा चरण “जस होवै सर-माथ” हर अमृत ध्वनि छन्द के तीसर डाँड़ के शुरू मा आय हे. संगेसंग तीसर डाँड़ हर 8-8 मात्रा के तीन चरण मा बँटे हे. इही किसिम ले बाद के तीन डाँड़ माने दोहा के बाद के चारों डाँड़ मन 8-8 मात्रा के तीन-तीन चरण मा बँटे हें. अमृत ध्वनि छन्द “जाबे” शब्द ले शुरू होय हे अउ आखिर मा घला “जाबे” शब्द आय हे.
*जब तँय जाबे (अमृत ध्वनि छन्द)*
जाबे जब संसार ले, का ले जाबे साथ।
संगी अइसन कर करम, जस होवै सिर-माथ।।
जस होवै सिर - माथ नवाबे, नाम कमाबे।
जेती जाबे, रस बरसाबे, फूल उगाबे।।
झन सुस्ताबे, अलख जगाबे, मया लुटाबे।
रंग जमाबे, सरग ल पाबे, जब तँय जाबे।।
*अरुणकुमार निगम*
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अमृत ध्वनि छंद- 31/03/2025
सृजन शब्द- करम
करहू करम महान तब, पाहू सुख आधार।
राखव गठरी बाँध के, ज्ञान दिये गुरु सार।।
ज्ञान दिये गुरु, सार बताये, धरौ सिखौना।
किस्मत खिलही, सुख के मिलही, बिछे बिछौना।।
धीरज धरहू, अंतस भरहू, भव ले तरहू।
पग-पग डरहू, भ्रम मा जरहू, भय जब करहू।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/03/2025
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अमृतध्वनि छंद-
सृजन शब्द- *मृत्यु भोज*
करना हवय समाज ले, मृत्यु भोज ला बंद।
बहुत बड़े अभिशाप ये, सोच रखौ झन मंद।।
सच रखौ झन, मंद बनौ झन, आगू आवव।
हवय बुराई, दुख के खाई, येला त्यागव।।
ध्यान धरौ जी, मदद करौ जी, दुख ला हरना।
पीरा पर के, मन मा धर के, चिंतन करना।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/04/2025
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अमृत ध्वनि छंद-
सृजन शब्द- *छंद ल सिखहू*
लिखहू छंद विधान मा, कलम रखौ झन बंद।
पाहू गुरु ले ज्ञान ला, कहे अमृत ध्वनि छंद।।
कहे अमृत ध्वनि, छंद खजाना, हावय पाना।
साधक मन ला, इच्छुक जन ला, छंद सिखाना।।
ध्यान लगन ले, मस्त मगन ले, जब जी लिखहू।
आनी-बानी, बनके ज्ञानी, छंद ल सिखहू।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/04/2025
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अमृतध्वनि छंद-
सृजन शब्द- *चैत*
पावन महिना चैत के, खुशियाँ मिले अपार।
ज्योति कलश ले हे सजे, माता के शुभ द्वार।।
माता के शुभ, द्वार चले सब, भक्तन आवँय।
नारी अउ नर, जयकारा कर, यश ला गावँय।।
मन के अंदर, भक्ति भाव भर, माथ नवाँवन।
मातु बिराजिन, शुभ ये नौ दिन, आसन पावन।।
होथे शुभ नवरात्रि के, महिना चैत कुँवार।
जगराता जसगीत के, बहिथे पावन धार।।
बहिथे पावन, धार हृदय ले, भक्ति अपारा।
भक्त खड़े हें, शरण पड़े हें, मातु दुवारा।।
जय जयकारा, जोत जँवारा, भक्तन बोथे।
सब लोगन के, इच्छा मन के, पूरन होथे।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/04/2025
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अमृतध्वनि छन्द-
सृजन शब्द- *बँटवारा*
बँटवारा माँ- बाप के, झन करहू सुन बात।
बिपत बुढ़ापा काल मा, देवव सुख के रात।।
देवव सुख के, रात सुहाती, अंत पहाती।
कर लौ सेवा, पाहू मेवा, जस धन थाती।।
भटकै झन इन, दुख दिन गिन-गिन, बनौ सहारा।
करहू झन माँ-बाप मया के, तुम बँटवारा।।
बँटवारा मा बाँट झन, दाई- ददा दुलार।
इँखरे ले परिवार मा, सुमता अउ सुख सार।।
सुमता अउ सुख, सार सदा दिन, पावत रइहू।
करके सेवा, मिश्री मेवा, खावत रइहू।।
झन दौ ताना, मार बहाना, भाखा खारा।
दुख के दहरा, बिखहर मँहुरा, हे बँटवारा।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/04/2025
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अमृतध्वनि छन्द-
सृजन शब्द- गंगा अमली
गंगा अमली हा फरे, कोकी- कोकी मीठ।
झोत्था- झोत्था पेड़ मा, जोरे- जोरे पीठ।।
जोरे- जोरे, पीठ मयारू, आना खा ले।
छत्तिसगढ़ के, फल हे बढ़ के, गुन ला गा ले।।
ओली मा भर, ले जा तँय घर, मन कर चंगा।
फरे लटालट, खा ले झटपट, अमली गंगा।।
गंगा अमली खाय हन, नानपना मा खूब।
खाये बर पछतात हें, अब सुरता मा डूब।।
अब सुरता मा, डूब सबो झन, हें ललचावत।
चाव लगा के, लोग गाँव के, हावँय खावत।।
कर ले मन ला, ताजा तन ला, तँय हर चंगा।
गाँव डगर धर, खा ले मन भर, अमली गंगा।।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/04/2025
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अमृतध्वनि छन्द अभ्यास-
सृजन शब्द- *हनुमान*
वंदन श्री हनुमान के, संकट मोचन नाम।
जेखर हिरदे मा बसे, दसरथ नंदन राम।।
दसरथ नंदन, राम सियापति, के गुण गाता।
कष्ट हरो प्रभु, दया करो प्रभु, सुख के दाता।।
जन्म जयंती, हे हनुमंती, शत अभिनंदन।
द्वार पधारव, काज सँवारव, हे पग वंदन।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/04/2025
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अमृतध्वनि छन्द - रूढ़ि
दिन-दिन बाढ़त हे अबड़, ढोंग रूढ़ि के रोग।
सिर से ले के पाँव तक, जकड़े हें सब लोग।।
जकड़े हें सब, लोग इहाँ तो, बनके अँधरा।
पूजत पत्थर, जीयत डर-डर, भय धर अँगरा।।
चीज लुटावत, मान गवाँवत, दुख दिन गिन-गिन।
सीखव मनखे, सत्य सरेखे, लाये सुख दिन।।
दिखथे आज समाज मा, अंधभक्ति के कोढ़।
ढोंग रूढ़ि के लोग मन, सूते चादर ओढ़।।
सूते चादर, ओढ़ नींद मा, हे बउराये।
मनखे अप्पत, बात हकीकत, समझ न पाये।।
मंदिर-मंदिर, बन मूक बधिर, फोकट चिखथे।
पथरा पूजत, बंदन बूकत, लोगन दिखथे।।
करथे मन ला खोखला, ढोंग रूढ़ि अउ झूठ।
अंधभक्ति पाखण्ड मा, जिनगी होथे ठूठ।।
जिनगी होथे, ठूठ बरोबर, सुन लौ भाई।
मजा उड़ावत, कुछ हें खावत, दूध मलाई।।
धर्म धरा के, खूब डरा के, मति ला हरथे।
चोवा चंदन, पोते बंदन, धंधा करथे।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/04/2025
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अमृतध्वनि छन्द- कुरीति
रहिके दूर कुरीति ले, गढ़बो सभ्य समाज।
शिक्षा अउ संस्कार ले, पाबो सुख के ताज।।
पाबो सुख के, ताज मुड़ी मा, सुघर चमकही।
नेक करम के, दया धरम के, ज्ञान बगरही।।
छोड़ सलामी, धर्म गुलामी, जी झन सहिके।
धर सच्चाई, कर अच्छाई, मानव रहिके।।
फइले हे चारो मुड़ा, ढोंग रूढ़ि के रोग।
सभ्य समाज कुरीति के, हवँय लगाये जोग।।
हवँय लगाये, जोग इँहा जी, सत्य न समझे।
तथाकथित मा, झूठ रचित मा, मनखे अरझे।।
पथरा पूजन, बंदन बूकन, मा मन मइले।
करम धरम मा, भूत भरम मा, भय हे फइले।।
जकड़े हे जंजीर बन, मानव मन ला ढोंग।
मनखे राख कुरीति के, चुपरे तन मा ओंग।।
चुपरे तन मा, ओंग- ओंग के, पाखंडी बन।
लोग धरे दुख, लुटा डरे सुख, इज्जत अउ धन।।
करत नदानी, झूठ जुबानी, ला हें पकड़े।
नइहे सुध मा, पर के बुध मा, हावँय जकड़े।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/04/2025
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अमृत ध्वनि छन्द- गरमी
गरमी के दिन मा सखा, अबड़ जनाथे घाम।
पाँव जराथे भोंभरा, जरे चटाचट चाम।।
जरे चटाचट, चाम घाम ले, बच के रइहू।
काटौ झन रुख, गरमी के दुख, तब नइ सइहू।।
लू नइ पकड़े, खावव अबड़े, केला दरमी।
झाँझ झकोरत, तन ला टोरत, बाढ़े गरमी।।
गरमी काबर हे बढ़त, करौ बात मा चेत।
कटगे रुख राई सबो, बंजर परगे खेत।।
बंजर परगे, खेत खार अउ, धनहा डोली।
मनुज अकारथ, धर के स्वारथ, दागत गोली।।
रुख ला काटत, दुख हे बाँटत, बन बेशरमी।
पेड़ बचावव, पेड़ लगावव, भगही गरमी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/04/2025
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अमृतध्वनि छन्द- गुलमोहर
गुलमोहर के पेड़ मा, रंग बिरंगी फूल।
मँडरावत भँवरा फिरे, अंतस मारे हूल।।
अंतस मारे, हूल सखा सुन, सुरता आथे।
बचपन के दिन, गौकिन थोकिन, हे रोवाथे।।
डार पान सब, छाँव घलो अब, होगे नोहर।
नैनन झूले, फूले-फूले, हे गुलमोहर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/04/2025
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अमृतध्वनि छन्द- लाटा
लाटा इमली के बना, खावत हँव चटकार।
मुँह मा पानी आ जही, देखइया के यार।।
देखइया के, यार लार भी, चुचवा जाही।
दिन बचपन के, खान हकन के, सुरता आही।।
चखे हवँव मँय, रखे हवँव मँय, तोरो बाँटा।
आ जा आ जा, शहरी राजा, खा ले लाटा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छ.ग.) 23/04/2025
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*****************बरवै छन्द*****************
*बरवै छंद (12 + 7)*
डाँड़ (पद) - 2, चरण - 4
तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरण मा, गुरु ,लघु (2,1)
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 19, विषम चरण मा मात्रा - 12, सम चरण मा मात्रा - 7
यति / बाधा / 12, 7 मात्रा मा
खास - विषम चरण के आखिर मा 1 गुरु या 2 लघु, सम चरण के आखिर मा गुरु, लघु (2,1).
बेटी बिन सुन्ना हे - विषम चरण (4) +(2) + (4) +(2) = 12
घर परिवार - सम चरण (2) +(2) + (2+1) = 7
बेटी बनके लछमी - विषम चरण (4) +(4)+(4) = 12
ले अवतार - सम चरण (2) + (2)+(2+1) = 7
तुकांत - सम चरण के आखिर मा (वार / तार), गुरु, लघु (2,1)
*उदाहरण*
बेटी (बरवै छंद)
बेटी बिन सुन्ना हे, घर परिवार।
बेटी बनके लछमी, ले अवतार।।
घर के किस्मत देथे, इही सँवार।
बिन बेटी के कइसे, परब-तिहार।।
बेटी के किलकारी, काटय पाप।
मंतर जइसे गुरतुर, मंगल जाप।।
तुलसी के बिरवा कस, बेटी आय।
जेखर आँगन खेले, वो हरसाय।।
सुनो गुनो का कहिथें, सबो सियान।
महादान कहिलाथे, कन्या-दान।।
अरे कसाई झन कर, अतियाचार।
बेटी के पूजा कर, जनम सुधार।।
*अरुण कुमार निगम*
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बरवै छन्द- दाई- ददा
दाई- ददा सदा सुख, के आधार।
बिरथा इँखरे बिन हे, घर परिवार।।
दाई काँड़ मया के, ददा मयार।
देव रूप मा इन हे, जग उपहार।।
दाई जग मा सुख के, देवी रूप।
ददा सदा सहिथे जी, दुख के धूप।।
अलग कभू झन करिहौ, रखिहौ संग।
देवव जीयत मा सुख, खुशी उमंग।।
सरवन कुमार जइसे, बन जा पूत।
चुपर ददा- दाई बर, भक्ति भभूत।।
दाई- ददा हमर हे, सिरजनहार।
पूत सपूत बने तँय, कर्ज उतार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/04/2025
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बरवै छन्द- मजदूर दिवस
एक मई के दिन हा, होथे खास।
मजदूर दिवस बाँधय, मन मा आस।।
सब्बो सुख सुविधा के, सिरजनहार।
पावत राहय सब दिन, मया दुलार।।
श्रम के बड़े पुजारी, इन ला मान।
परहित खातिर करथे, काम महान।।
गरमी जाड़ धूप अउ, का बरसात।
करथे काम बुता ला, देह तिपात।।
बज्र भुजा ले सिरजे, खान मकान।
नहर सड़क पुलिया सब, सुख सामान।।
ताज- महल हा चमके, शोभा साज।
चार मिनार खड़े हे, बनके नाज।।
गजानन्द जी कहिथे, मन के बात।
मजदूर घलो पावय, सुख के रात।।
एक मई का हर दिन, देवव मान।
एकमई दुख झन हो, रख लौ ध्यान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/05/2025
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बरवै छन्द- बोरे- बासी
भोर- दुपहरी बोरे, बासी खाव।
तन के थकान आलस, दूर भगाव।।
नून गोंदली चटनी, संग अथान।
हे गुणकारी खा लौ, मेंछा तान।।
साग खेड़हा अम्मट, स्वाद बढ़ाय।
बोरे- बासी खाये, देह जुड़ाय।।
वैज्ञानिक मन करगे, येमा शोध।
बीमारी ले करथे, ये प्रतिरोध।।
प्रोटीन विटामिन के, सुग्घर स्रोत।
सब दिन खाये सब ला, हवँव खँदोत।।
पिज़्ज़ा बर्गर खाये, जाहू भूल।
सिरतो कहिथौं कर लौ, बात कबूल।।
छत्तिसगढ़िया मन के, ये मिष्ठान।
खाथे गरीब येला, अउ धनवान।।
बोरे- बासी महिमा, करे बखान।
गजानंद जी बोले, धरहू ध्यान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/05/2025
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बरवै छन्द- *बिहाव*
गाँव शहर मा माढ़े, हवय बिहाव।
मड़वा अँगना ठाढ़े, कर पहुनाव।।
सगा सहोदर जम्मो, हें सकलाय।
चुलमाटी कोड़े के, नेंग निभाय।।
मड़वा मा मँगरोहन, आमा पान।
सजे सुवासा के मुख, हे मुस्कान।।
बाजे गड़वा बाजा, थिरके पाँव।
गीत मया के गूँजे, धर सुख छाँव।।
सजे बराती जावत, हवँय बरात।
भेंट करे समधी सँग, हे परघात।।
भाँवर गिंजरे दूल्हा, दुल्हिन संग।
सात जनम के फेरा, छाय उमंग।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2025
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***************रूपमाला छन्द****************
*रूपमाला छन्द (मदन छन्द)* 14-10
डाँड़ (पद) - 4, चरण - 8
तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरण मा, गुरु ,लघु (2,1)
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 24, विषम चरण मा मात्रा - 14,
सम चरण मा मात्रा - 10
यति / बाधा - 14, 10 मात्रा मा
*खास - एला मदन छन्द घला कहिथें*
देह जाही रूप जाही - विषम चरण
(2122) (2122) = 14
छोड़ जाही चाम - सम चरण
(2122) (21) = 10
जोर ले कतको इहाँ धन - विषम चरण
((2122) (2122) = 14
कुछु न आही काम - सम चरण
(2122) (21) = 10
तुकांत - आखिर मा माने सम-सम चरण मा,(चाम / काम), गुरु, लघु (2,1)
उदाहरण -
नाम रहि जाही (रूपमाला छन्द)
देह जाही रूप जाही, छोड़ जाही चाम।
जोर ले कतको इहाँ धन, कुछु न आही काम।।
धर्म करले कर्म करले, तँय कमा ले साख।
नाम रहि जाही जगत-मा, देह होही राख।।
साँस के झन कर भरोसा, छोड़ जाही साथ।
तोर जिनगी काठ-पुतरी, डोर ओखर हाथ।।
कर्म डोंगा ला सजा के, तँय उतर भव-पार।
मन रमाले हरि-भजन-मा, बस इही हे सार।।
*अरुण कुमार निगम*
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रूपमाला छन्द- *नशा*
हे नशा जड़ नाश के जी, गोठ धर ले ध्यान।
तन सुखाथे धन सिराथे, अउ गँवाथे मान।।
पड़ नशा के फेर मा तँय, बेच झन घर खेत।
चीज पुरखा के सिरागे, थोक कर ले चेत।।
रोत हे परिवार धर-धर, कर फिकर दिन रात।
मंद मा माते पड़े तँय, घर खुशी दुरिहात।।
सुध लमा दाई ददा हा, राह देखय तोर।
लोग लइका के गला मा, बाँध झन दुख डोर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2025
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*छत्तीसगढ़ी अनुवादित*
रूपमाला छन्द- *माँ भारती*
हे नमन माँ भारती ला, नित झुकाके शीश।
हे सबो अर्पन चरन मा, मान के शुभ ईश।।
धन धरा पावन सुशोभित, नाम भारत देश।
एकता हे प्राण येखर, शुद्ध हे परिवेश।।
प्रेम हे सौहार्द्र हे अउ, आपसी सद्भाव।
देश के रक्षा करे बर, हे हृदय मा चाव।।
वीर सरहद मा खड़े हें, बज्र सीना तान।
मिल बढ़ाबो हर कदम मा, देश के हम शान।।
आन हम देवन नहीं जी, आन मा प्रतिघात।
खाक मा देबो मिला हम, जान लौ औकात।।
हिन्द भारत के तिरंगा, हे हमर तो शान।
धन्य गर्वित हे सदा ये, देश हिंदुस्तान।।
संत गुरु मन के धरा ये, कीर्ति चारो ओर।
ग्रंथ गीता वेद मा भी, हे लिखे यश शोर।
गर्व कर माँ भारती मा, दौं सबो कुछ त्याग।
जान मा भी खेल के मँय, दौं मिटा सब दाग।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/05/2025
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रूपमाला छन्द- *गरमी*
बाढ़गे गरमी अबड़ अब, नइ सहावय घाम।
ध्यान खुद के रख करौ जी, छाँव मा सब काम।।
तन झकोरत लू चले हे, झाँझ ताते तात।
खूब पानी हा सुहाये, नइ सुहाये भात।।
लकलकावत हे धरा हा, झनझनावत घाम।
पाँव भूँजत भोम्भरा हे, चटचटावत चाम।।
जीव कइसे बाचही जी, सोच मा हे जीव।
खाव बोरे बोर के अउ, खूब पसिया पीव।।
कम करे बर घाम गरमी, सोचना हे आज।
मिल लगाबो पेड़ तब तो, बाचही तन लाज।।
खींच लाही पेड़ हा जी, मेघ ले तो नीर।
जाग उठही तब धरा के, खिलखिला तकदीर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/05/2025
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रूपमाला छन्द- दाई- ददा गुरु
हे नमन दाई- ददा गुरु, के चरन मा मोर।
थाम लेहू हाथ ला जी, हे अरज कर जोर।।
साँस तन मा जब तलक हे, गांव गुन दिन रात।
आप सिरजनहार हौ जग, सच इही हे बात।।
सुन ददा दाई बिना हे, ब्यर्थ घर परिवार।
नाव भवसागर कृपा कर, गुरु लगाथे पार।।
हे सबो इंसान मन बर, इन सदा वरदान।
पूज लौ जीते जियत मा, मान के भगवान।।
झन दुखाहू मन कभू भी, बोल के कड़ु गोठ।
पूत सच्चा बन सदा दिन, दौ मया ला पोठ।।
मान लौ दाई ददा के, सच बचन सुख सार।
जन्म शिक्षा कोख के तुम, दौ चुका उपकार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/05/2025
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रूपमाला छन्द- *गौरैया*
आज गौरैया कहाँ हे, कोंन करही चेत।
लागथे सुन्ना गली घर, शोर आरो लेत।।
बचपना के संगवारी, तँय खिलौना मोर।
हौं रखे हिरदे समा के, मँय मया ला तोर।।
रोज चीं-चीं तँय पुकारत, आच अँगना खोर।
हम पकड़ के रंग देवन, लाल पाखी तोर।।
तँय फुदक के अउ फुदक के, आच मोरे तीर।
आज आवत हे समझ मा, तोर मन के पीर।।
हर गली टॉवर खड़े हे, हे कटत नित पेड़।
हाथ मोबाइल धरे सब, हें निहारत टेड़।।
गोठ सच तो मँय कहत हौं, हे वजह ये नाश।
आज पक्षी नइ करत हे, गाँव घर मा वास।।
गे कहाँ तँय तो लुका अब, संग ला जी छोड़।
तँय पराया बन गये हस, मोर मन ला तोड़।।
धीर आके तँय बँधा जा, हौं पुकारत रोज।
आ जना तँय तो उड़त अब, मोर घर ला खोज।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/05/2025
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रूपमाला छन्द- *नवतपा*
नवतपा मा नइ तपत हे, लू हवा अउ घाम।
हे करत बरसात हा जी, जेठ ला बदनाम।।
छाय रहिथस रोज करिया, का बिहनिया शाम।
नवतपा ला दे तपन तँय, छोड़ दे ये काम।।
तीन महिना मोर बारी, तीन महिना तोर।
खूब तप लेबे तहूँ हा, धीर धर ले थोर।।
रझरझा गिरबे पता हे, गाँव अँगना खोर।
दे तपन मोला अभी तँय, हे अरज कर जोर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2025
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रूपमाला छन्द- सुन मयारू मोर जोही
सुन मयारू मोर जोही, मोर दौना पान।
तोर बिन तो छूट जाही, मोर तन ले प्रान।।
जब तलक हे साँस तन मा, छोड़बे झन साथ।
संग जीबो संग मरबो, थाम दूनों हाथ।।
तँय चमेली मोंगरा बन, मोर महका द्वार।
फूल गजरा गाँथ बेनी, कर बने सिंगार।।
मन मया जिनगी समो के, झन जबे तँय भूल।
तोर हँसना अउ ठिठोली, मारथे ओ हूल।।
का गजब तोला दिये सुन, हे विधाता रूप।
तोर कंचन देह ला ओ, झन छुये दुख धूप।।
राखहूँ रानी बना के, हे कसम जी तोर।
मोर जिनगी तोर बर हे, तोर जिनगी मोर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2025
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31 मई विश्व तम्बाकू निषेध दिवस-
रूपमाला छन्द- *नशा*
छोड़ देना तँय पिये बर, दारु अउ सिगरेट।
खोखला तन ला करे हे, हर खुशी ला मेट।।
पान गुटका मुख बिगाड़े, मुफ्त मा दै रोग।
खूब तम्बाकू चबावत, हें तभो ले लोग।।
भाँग गाँजा ड्रग नशा के, हे नशा जी काल।
शान सेखी शौक खातिर, पाल झन जंजाल।।
झन धुआँ मा तँय उड़ा तन, मान लेना बात।
हर तरफ फइले हवय जी, बन नशा दुख घात।।
मौत के ठेला लगे हे, हर गली अउ खोर।
नव युवा पीढ़ी फँसे हे, आज ओरी ओर।।
चेत जावव छोड़ देवव, हे नशा घर नाश।
सुन गजानन जी नशा के, झन बनौ तुम दास।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/05/2025
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05 जून विश्व पर्यावरण दिवस विशेष
रूपमाला छन्द- *चल लगाबो पेड़ संगी*
चल लगाबो पेड़ संगी, माँ पिता के नाम।
जान ले संसार मा तो, नेक ये हा काम।।
छाँव देथे फूल देथे, अउ गिराथे नीर।
फेर समझत नइ मनुज हे, पेड़ के तो पीर।।
आम बरगद नीम पीपर, साल अउ सागोन।
पेड़ काटत हें सबो पर, हे लगावत कोन।।
गाँठ बाँधे बात धर लौ, दौ सुवारथ छोड़।
पेड़ के रक्षा करे बर, पाँव ला अब मोड़।।
हे तिपावत ताप तन ला, हे जरावत चाम।
पेड़ काटे ले बढ़त हे, बड़ दिनोंदिन घाम।।
जल सतह नीचे गिरत हे, हे सुखावत ताल।
नल नदी सुक्खा कुआँ हे, लोग हें बेहाल।।
आज जल पर्यावरण के, रोक लौ जी नाश।
रुक जही नइतो सुनव जी, तोर तन ले श्वांस।।
पेड़ हे आधार जिनगी, पेड़ ले संसार।
सुन गजानन पेड़ बिन तो, ब्यर्थ हे सुख सार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/06/2025
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********शोभन (सिंहिका) छन्द (14,10)*********
डाँड़ (पद) - 4, चरण - 8
तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरण मा जगण - लघु,गुरु,लघु (1, 2,1)
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 24 ,
विषम चरण मा मात्रा - 14, सम चरण मा मात्रा - 10
यति / बाधा - 14, 10 मात्रा मा
खास - एला सिंहिका छन्द घला कहिथें
नेट के आइस जमाना - विषम चरण
(2122) (2122) = 14
सीख लेवव ज्ञान - सम चरण
(2121) (121) = 10
जे चलय सँग मा समय के - विषम चरण
(2122) (2122) = 14
होय ओखर मान - सम चरण
(2121) (121) = 10
तुकांत - आखिर मा माने सम-सम चरण मा जगण, (व ज्ञान / र मान), लघु,गुरु,लघु (1, 2,1).
उदाहरण -
सीख लेवौ ज्ञान (शोभन छन्द)
नेट के आइस जमाना, सीख लेवव ज्ञान।
जे चलय सँग मा समय के, होय ओखर मान।।
मूड़ मा धर हाथ बइठे, वो सदा पछुवाय।
कर परन आघू बढ़य जे, वो सदा अघुवाय।।
तोर धरती तोर माटी, तोर हावय राज।
तँय अपन ला चीन्ह संगी, तोर मस्तक ताज।।
बुध-अकल मा कम नहीं तँय, देह मा बलवान।
स्वर्ग पिरथी मा उतरही, बस जगा सभिमान।।
*अरुणकुमार निगम*
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शोभन (सिंहिका) छन्द- *मान लेना तँय सिखौना*
मान लेना तँय सिखौना, छोड़ दे अभिमान।
राह सच के थाम लेना, कर करम पहिचान।।
छाय हे चारो मुड़ा मा, लोभ के अँधियार।
होय नइ गुरु के बिना तो, नाव हा भव पार।।
कोंन बैरी कोंन मितवा, हे बिछे भ्रम जाल।
देख तो जग मा सुवारथ, हे बजावत गाल।।
लोग बनगे मतलबी अब, नेक कारज छोड़।
धन सकेले के सबो मा, हे मते बस होड़।।
छोड़ जाबे मोह माया, अउ बँधे परिवार।
चार दिन के सुख सबेरा, फेर हे अँधियार।।
बोल लेना मीठ बोली, हे इही सुख सार।
द्वेष इरखा मा गजानन, झन मचा तँय रार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/06/2025
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शोभन (सिंहिका) छन्द- *गुरु कबीरा दास*
गुरु कबीरा दास के जी, ज्ञान गुण अनमोल।
ढोंग भ्रम पाखंड भय के, पोल ला दय खोल।।
सत्य मारग ला दिखाये, छोड़ के सब झूठ।
आज जिनगी ला करत हे, लोभ बन घुन ठूठ।।
एक हे मनखे सबो जी, एक हे तन चाम।
धर्म धंधा हा करत हे, कर्म ला बदनाम।।
जाति मा मनखे बँटे हें, सुख सुमत पग भूल।
देख लौ तन मन गड़ावत, कोंन हे अब शूल।।
लोग मानत हें कबीरा, पर उँखर नइ सीख।
मूर्ति पूजत हें मगन हो, माँग दर-दर भीख।।
लोग भ्रम मा हें फँसे अब, भूल खुद पहिचान।
ब्यर्थ जिनगी हें करत उन, झूठ ला धर ध्यान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/06/2025
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शोभन (सिंहिका छन्द)- *सत्य के उदगार*
छन्द शोभन मा लिखौ जी, सत्य के उदगार।
लोग दुखिया के दुखी अउ, दीन प्रति उपकार।।
भाव हा प्रेरित करय नित, शब्द मा ललकार।
ये कलम ला तुम बना लौ, ढाल अउ तलवार।।
देख अत्याचार ला जी, झन रहव चुपचाप।
लड़ लड़ाई लौ कलम के, छोड़ दौ सच छाप।।
कर करम अइसे कलम से, लोग लेवय नाम।
याद करही ये जमाना, तोर परहित काम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/06/2025
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शोभन छन्द- *जोत शिक्षा के जला लौ*
लोग लइका ला पढ़ा के, लौ खिला सुख फूल।
पाठशाला भेज देवव, मिट जही दुख शूल।।
खूब पढ़हीं भाग्य गढ़हीं, बन अपन कुल आस।
नाम पाही मान पाही, लिख नवा इतिहास।।
जोत शिक्षा के जला लौ, आज हर घर द्वार।
जानहीं अधिकार हक ला, सभ्य हो परिवार।।
दू निवाला खा भले कम, पर पढ़ा खुद लाल।
ज्ञान शिक्षा ला बना ले, तँय अपन सुख ढाल।।
का भला अउ का बुरा हे, सोचहीं रख तर्क।
झूठ अउ सच बात के जी, जानहीं सब फर्क।।
बुद्धि शिक्षा ले बढ़े हे, अउ बढ़े गुन ज्ञान।
मिट जथे अँधियार मन के, बात देवव ध्यान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/06/2025
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शोभन (सिंहिका) छन्द- *बन सिपाही तँय कलम के*
कर सृजन साहित्य के जी, गढ़ नवा इतिहास।
जन भलाई के शबद लिख, बाँध ले सुख आस।।
खुद कलम के मान रखके, तँय बना पहिचान।
युग युगों तक होत राहय, नाम अउ गुनगान।।
छोड़ देना चाटुकारी, लिख सदा सच बात।
फर्ज कवि के तँय निभा ले, सुख छटा बगरात।।
दे दिशा सत ज्ञान सब ला, मेट भ्रम अँधियार।
रह खड़े भय झूठ के प्रति, बन कलम तलवार।।
झन कलम मा जंग लागय, अउ लगय झन दाग।
मूक बन चमचागिरी के, झन अलापय राग।।
स्वार्थ धर मनखे खड़े हे, झूठ के अब संग।
बन सिपाही तँय कलम के, लड़ सदा सच जंग।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/06/2025
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21 जून अंतराष्ट्रीय योग दिवस के बधाई💐
शोभन (सिंहिका) छन्द- *योग*
रोज योगा के करे ले, भागथे सब रोग।
स्वस्थ तन मन ला रखे बर, बात लौ धर लोग।।
उठ बिहनिया रेंग लौ अउ, दौड़ लौ हर रोज।
तज मसालेदार खाना, स्वल्प लौ तुम भोज।।
योग चरबी ला घटाथे, बन दवा उपचार।
उम्र बढ़थे सौ बछर ले, अउ अधिक सुन यार।।
नइ कभू सँचरय बुढ़ापा, अउ कभू नइ रोग।
येखरे सेती कहत हँव, नित करव सब योग।।
संत ऋषि मुनि मन सबो जी, योग राखिन साध।
तेखरे सेती रहिन उन, दूर हर तन ब्याध।।
कर गजानन योग रोजे, होय स्वस्थ शरीर।
दूर तन तकलीफ होही, राखही मन धीर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/06/2025
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शोभन (सिंहिका) छन्द- *माह सुख आषाढ़ लगगे*
माह सुख आषाढ़ लगगे, हे खुशी चहुँओर।
सुन किसानी के मते हे, हर गली घर शोर।।
छाय बादर मा बदरिया, गय जुड़ा अब घाम।
धान बोये के बतर जी, हे लगे कर काम।।
रदरदा पानी गिरत हे, हे बहत सुख धार।
अर-तता के गूँजही जी, बोल हा अब खार।।
जोर ले जाँगर मयारू, मोर मान किसान।
तोर श्रम ऊपर भरोसा, हे करे भगवान।।
साज नाँगर बैल हलधर, खाँध मा धर धान।
अब धरा सिंगारना हे, कर अपन श्रम दान।।
राह देखत तोर हावय, मुस्कुरावत खेत।
पालना हे पेट जग के, राख ले तँय चेत।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/06/2025
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शोभन छन्द- *छत्तीसगढ़*
हे धरा छत्तीसगढ़ के, संत ऋषि मुनि धाम।
धान के हावय कटोरा, धन्य पबरित नाम।।
गुरु कबीरा दास के जी, बोल हे अनमोल।
संत घासीदास गुरु के, ज्ञान मधुरस घोल।।
राजधानी रायपुर गढ़, हे हमर अभिमान।
न्यायधानी हे बिलासा, जग बढ़ावत शान।।
हे जिला तैंतीस ठो जी, जान लौ सब लोग।
धान धन से हे भरे ये, शांति अउ सुख जोग।।
नृत्य पंथी अउ सुआ के, नीक लागय बोल।
गीत करमा अउ ददरिया, दै हृदय रस घोल।।
शुभ परब होली दिवाली, पुन्य तीज तिहार।
बाँध सुमता लोग रहिथें, एक बन परिवार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/06/2025
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*गीतिका छन्द*- विधान
डाँड़ (पद) - 4, ,चरण - 8
तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ मा.
अंत मा रगण माने गुरु,लघु,गुरु (2,1,2)
हर डाँड़ मा कुल मात्रा – 26 ,
विषम चरण मा मात्रा - 14 या 12 ,
सम चरण मा मात्रा- 12 या 14 मात्रा मा
यति / बाधा - 14, 12 या 12,14 मात्रा मा
खास- 3,,10,17 अउ 24 वाँ मात्रा लघु होय ले गाये मा ज्यादा गुरतुर लागथे.
एमा 14-12 मा यति होथे अउ
अउ 12-14 मात्रा मा भी यति हो सकथे.
*विषम चरण -*
(ज्ञान)(के गं)(गा म)(बूड़व),
(2,1) (4) (2,1) (4) = 14
*सम चरण -*
(मोह)(माया)(छोड़ के)
(2,1) (4) (2,1,2) = 12
तीसरा (न), दसवाँ (म), सतरवाँ (ह) अउ चोबीसवाँ (ड़) मात्रा लघु आय हे.
*विषम चरण*
(संत)(मन के)(गोठ)(गूनव) (2,1) (4) (2,1) (4) = 14
*सम चरण*
(हाथ)(दुन्नो)(जोड़ के)
(2,1) (4) (2,1,2) = 12
तीसरा (त), दसवाँ (ठ), सतरवाँ (थ) अउ चोबीसवाँ (ड़) मात्रा लघु आय हे.
संक्षेप मा
विषम चरण के मात्रा बाँट
3, 4, 3, 4
सम चरण के मात्राबाँट
3, 4, 3 2
विषम अउ सम चरण के मात्राबाँट मा 3 ला 2,1 (गुरु, लघु) होना अनिवार्य रही।
तुकांत - दू-दू डाँड़ मा. रगण (छोड़ के / जोड़ के) माने गुरु ,लघु,गुरु (2,1,2)
*उदाहरण*
बस इही मा सार (गीतिका)
ज्ञान के गंगा म बूड़व, मोह माया छोड़ के।
संत मन के गोठ गूनव, हाथ दुन्नो जोड़ के।।
हे सरी दुनिया छलावा, झूठ के भरमार हे।
नाम भज लौ राम जी के, बस इही मा सार हे।।
*अरुणकुमार निगम*
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गीतिका छन्द- जाति बंधन तोड़ देवव।
जाति बंधन तोड़ देवव, जन्म ले सब एक जी।
धर्म मानवता बड़े हे, कर्म कर लौ नेक जी।।
कोंन बाँटिस हे मनुज ला, कर फरक तन चाम ला।।
सोच मइला हे उँखर सुन, नइ डरिस बदनाम ला।।
एक खाथें अन्न सब झन, एक पीथें नीर ला।
वो मनुज नोहय मनुज जी, जे न समझे पीर ला।।
एक हे धरती गगन अउ, एक पुरवाई बहे।
एक हे साँसा सबो के, संत गुरु मन हे कहे।।
भेद के खाई पटय अब, सोच सुग्घर राख लौ।
झन दुखय मन काखरो जी, बोल गुरतुर भाख लौ।।
छेद तन ला देख लौ तो, रंग एक्के खून के।
संग साथी मिल रहव सब, द्वेष इरखा भून के।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/07/2025
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गीतिका छन्द- चौमास
हे बखत चौमास के अब, जाग हलधर जाग तँय।
खाँध नाँगर थाम लेना, अउ जगा ले भाग तँय।।
पेट जग के तँय भरे बर, कर किसानी काम ला।
कर अमर छत्तीसगढ़ के, विश्व मा अब नाम ला।।
ये धरा हा देश मा तो, हे कटोरा धान के।
होय पूजा कर्म के अउ, पर भलाई दान के।।
श्रम कभू झन जाय बिरथा, बात रख ले ध्यान तँय।
नाम हलधर ला सँजो ले, पात रह नित मान तँय।।
माथ ले टपके पसीना, श्रम शिखर बन बूँद जी।
आय बिपदा कष्ट कतको, पाँव मा तँय खूँद जी।।
जय विजय हो तोर जग मा, दूर भागय हार हा।
तोर जयकारा करत हे, देख ले संसार हा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/07/2025
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गीतिका छन्द- *रील*
रील के देखव नशा मा, मातगे सब लोग हें।
छोकरी अउ डोकरी सब, पाल बइठे रोग हें।।
लत लगा पइसा कमाये, हें दिखावत अंग ला।
छोट कपड़ा देह पहिने, लागथे इन कंगला।।
अब बहू बेटी घलो मन, त्याग दे हें शर्म ला।
नाक काटत हें ददा के, कर बुरा इन कर्म ला।।
बड़ हिलावत हें कमर ला, बेहुदा कर नृत्य ला।
हे अदरमा आज फाटत, देख अइसन कृत्य ला।।
फेसबुक यूट्यूब गूगल, लिंक इंस्टाग्राम मा।
वीडियो अश्लील डाले, नइ डरें बदनाम ला।।
भूलगें संस्कृति खुदे अउ, भूलगें संस्कार ला।
तन दिखा पइसा कमा बस, थाम लिंन व्यापार ला।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/07/2025
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गीतिका छंद- *हरेली*
हे हरेली के परब जी, नीक लागय गाँव हा।
बड़ सुहावय खेत डोली, नीम बरगद छाँव हा।।
गीत सावन गात हे सुन, ताल लय मा झूम के।
हे मगन हलधर सबो अब, ये धरा ला चूम के।।
जात हें गउठान मनखे, थाल साजे हाथ मा।
हें करत पूजा किसानी, मिल जमो झन साथ मा।।
गाय गरुवा ला खवावँय, नून लोंदी पान ला।
माँगथें वरदान सुख के, कर अरज भगवान ला।।
आत हें लोहार भाई, सुख धरे त्योहार मा।
दूर बीमारी ले रहे बर, कील ठोके द्वार मा।।
आत हें राउत घलो हा, रख मया व्यवहार ला।
सुख सुमत बर द्वार खोंचे, नीम पाना डार ला।।
रचरचावत हे गजब जी, आज गेड़ी पाँव मा।
लेत हें लइका मजा बड़, ये परब के नाँव मा।।
ठेठरी खुरमी घरोघर, अउ बनय पकवान जी।
ये परब छत्तीसगढ़ के, आय शोभा शान जी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/07/2025
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*हरिगीतिका छन्द*
डाँड़ (पद) - 4, चरण - 8
तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ मा, आख़िरी मा रगण माने गुरु,लघु,गुरु (2,1,2)
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 28 ,
विषम चरण मा मात्रा -16
सम चरण मा मात्रा - 12
यति / बाधा - 16, 12 मात्रा मा (या 14,14 मात्रा मा)
खास - 5,12 19, अउ 26 वाँ मात्रा लघु होय ले गाये मा ज्यादा गुरतुर लागथे।
विषम अउ सम चरण मा 14, 14 मात्रा घलो हो सकथे।
(झन हाँसजी),(झन नाच जी) - विषम चरण (1,1,2,1,2)+(1,1,2,1,2) = 14
(कुछु बाँचही),(बन काट के)? - सम चरण (1,1,2,1,2)+(1,1,2,1,2) = 14
पाँचवाँ (स), बारवाँ (च), उन्नीसवाँ (च) अउ छब्बीसवाँ (ट) मात्रा लघु आय हे.
(कल के जरा)(तयँ सोच ले) - विषम चरण (1,1,2,1,2)+(1,1,2,1,2) = 14
(इतरा नहीं)(नद पाट के) - सम चरण (1,1,2,1,2)+(1,1,2,1,2) = 14
पाँचवाँ (ज), बारवाँ (च), उन्नीसवाँ (न) अउ छब्बीसवाँ (ट) मात्रा लघु आय हे.
तुकांत - दू-दू डाँड़ मा. आख़िरी मा (काट के / पाट के) रगण माने गुरु ,लघु,गुरु (2,1,2)
*हरिगीतिका के मात्राबाँट* *2122,2122,2122,2122*
*घलो करे जा सकथे।*
*उदाहरण*
तँय रुख लगा (हरिगीतिका)
(1)
झन हाँस जी, झन नाच जी, कुछु बाँचही, बन काट के ?
कल के जरा तँय सोच ले, इतरा नहीं नद पाट के।।
बदरा नहीं बिजुरी नहीं, पहिली सहीं बरखा नहीं।
रितु बाँझ होवत जात हे, अब खेत मन बंजर सहीं।।
(2)
झन पाप-पुन अउ धरम ला, बिसरा कभू बेपार मा।
भगवान के सिरजाय जल, झन बेंच हाट-बजार मा।।
तँय रुख लगा कुछु पुन कमा, रद्दा बना भवपार के।
अपने-अपन उद्धार होही ये जगत-संसार के।।
*अरुण कुमार निगम*
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏.
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हरिगीतिका छंद- *दाई-ददा*
दाई-ददा होथे सुनव, जग मा बड़े भगवान जी।
देथे जनम गढ़थे करम, बरसाय सुख वरदान जी।।
गोदी सुला लोरी सुना, देथे मया उपहार जी।
लालन करे पालन करे, बहुते हवय उपकार जी।।
चुपचाप रहि दुख ला सहे, अउ पेज पसिया ला पिये।
खुद मार के इच्छा सबो, औलाद के खातिर जिये।।
कहिथे गजानन ध्यान दौ, सेवा करौ तुम पूत बन।
दाई-ददा संतान बर, आये जगत सुख दूत बन।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/07/2025
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*सार छन्द सार (दोवे) 16-12*
डाँड़ (पद) - 2, ,चरण - 4
तुकांत के नियम - दू-दू डाँड़ मा (सम-सम चरण मा)
आखिर मा एक गुरु या दू लघु
हर डाँड़ मा कुल मात्रा - 28
विषम चरण मा मात्रा - 16
समचरण मा मात्रा - 12
यति / बाधा - 16, 12 मात्रा मा
*खास- भानु कवि कहिन हें के अंत मा दू गुरु आये ले छन्द अउ गुरतुर हो जाथे*
विषम चरण
(हाँसत)(गावत)(जीयत)(जावौ)
(4) (4) (4) (4) = 16
सम चरण
पालौ नहीं झमेला
(4) (3) (3)(2) = 12
विषम चरण
छोड़ जगत के मेला-ठेला
(3) (3) (2)(4) (4) = 16
सम चरण
पंछी उड़े अकेला-
(4) (3) (3)(2) = 12
तुकांत - दू-दू डाँड़ मा (ठेला/केला) माने सम-सम चरण मा,
अंत मा दू गुरु
*उदाहरण*
*माटी मा माटी मिलना हे (सार छन्द)*
हाँसत गावत जीयत जावौ, पालौ नहीं झमेला।
छोड़ जगत के मेला-ठेला, पंछी उड़े अकेला।।
बड़े-बड़े मनखे मन आइन, पाइस कोन ठिकाना।
चार घड़ी के रिंगी-चिंगी , तेखर बाद रवाना।।
जइसन जेखर करम रहे वो, तइसन नाम कमाये।
पूजे जावै कोन्हों मनखे, कोन्हों गारी खाये।।
कोन इहाँ का लेके आइस, लेगिस कोन खजाना।
जुच्छा आना सुक्खा जाना, का सेती इतराना।।
माटी मा माटी मिलना हे, इही सत्य हे भाई।
बिधुना के आगू मनखे के,चलै नहीं चतराई।।
कोट-कछेरी पाप-पुन्न के, माँगै नहीं गवाही।
बने करम के बाँध मोठरी, इही संग मा जाही।।
*अरुणकुमार निगम*
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