मंगलवार, 23 सितंबर 2025

प्रदीप छंद

 प्रदीप छंद- अशिक्षा

जोत जलालव शिक्षा के जी, मन मंदिर के द्वार मा।

धरे अशिक्षा के दुख ला तुम, झन रोवव अँधियार मा।।


शिक्षा शिक्षित करथे सब ला, कहिथे ग्रंथ कुरान हा।

शिक्षा ले ही मिलथे जग मा, आदर अउ सम्मान हा।।

पढ़े-लिखे शिक्षित होये ले, आथे सुख परिवार मा।

जोत जलालव शिक्षा के जी, मन मंदिर के द्वार मा।।


बेटी-बेटा मा शिक्षा बर, झन तो होवय भेद हा।

सार्थक तभे हवय शिक्षा हा, कहिथे गीता वेद हा।

नर- नारी ला शिक्षा पाना, हे मौलिक अधिकार मा।

जोत जलालव शिक्षा के जी, मन मंदिर के द्वार मा।।


शिक्षा ले संस्कार समाहित, होथे ज्ञान समृद्ध जी।

शिक्षा पाये बर नइ लागे, उमर युवा अउ वृद्ध जी।।

शिक्षा अगम अथाह समुंदर, बैतरणी के पार मा।

जोत जलावव शिक्षा के जी, मन मंदिर के द्वार मा।।


शिक्षा के बलबूते गढ़ही, भारत देश विकास ला।

रोजगार के अवसर देही, हरही जग-जन त्रास ला।।

नाम देश के ऊँचा होही, सुन लौ तब संसार मा।

जोत जलालव शिक्षा के जी, मन मंदिर के द्वार मा।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/08/2025

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प्रदीप छंद- *गरीबी*

भूख गरीबी के पीरा ला, समझे जेन गरीब हे।

नौकर-चाकर कार बंगला, सब ला कहाँ नसीब हे।।


रोज कमाथें रोजे खाथें, रहिथें काम तलाश मा।

आही इक दिन सुख जिनगी मा, बाँध रखे मन आस मा।।

ये आँखी के बस सपना ये, सच तो कहाँ करीब हे।

भूख गरीबी के पीरा ला, समझे जेन गरीब हे।।1


पोट-पोट तो पेट करे अउ, भूख मरे परिवार हा।

महँगाई के मार दिखावत, हावँय नित सरकार हा।।

दूर गरीबी कइसे होही, करे काय तरकीब हे।

भूख गरीबी के पीरा ला, समझे जेन गरीब हे।।2


हे अभिशाप गरीबी जग मा, ये समाज बर दाग ये।

हक ले वंचित जिनगी जीना, का गरीब के भाग ये।।

हे सरकार विधाता कइसे, खेले खेल अजीब हे।

भूख गरीबी के पीरा ला, समझे जेन गरीब हे।।3

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/09/2025

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*(मातृ दिवस पर स्मृतिशेष मोर महतारी ला सादर समर्पित🙏🏻💐)*


प्रदीप छंद- *दाई* 

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दाई के अँचरा मा मिलथे, दुनिया के सुख छाँव हा।

लगथे चारो धाम बरोबर, पबरित ओखर पाँव हा।।


रखे ओद्र मा नौ महिना ले, बन के सिरजनहार जी।

सहे प्रसव पीड़ा ला भारी, बड़का हे उपकार जी।।

जनम दिये तब ये दुनिया मा, वंदन हे जग नाँव हा।

लगथे चारो धाम बरोबर, पबरित ओखर पाँव हा।।


अमरित गोरस ला तो पीके, लइका भरे हुँकार ला।

नइ तो कभू चुका जी पावँय, कोनों पूत उधार ला।।

दवा दुआ दाई के पा के, भरथे दुख के घाँव हा।

लगथे चारो धाम बरोबर, पबरित ओखर पाँव हा।।


गजानंद हे आज अभागा, पाये मया दुलार ला।

कइसे छोड़ चले गे दाई, रोवत ये परिवार ला।।

दाई बिन तो बिरथा लगथे, खोर गली घर गाँव हा।

लगथे चारो धाम बरोबर, पबरित ओखर पाँव हा।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/05/2025

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