*पद्धरि छंद*
विधान-----
1)यह एक मात्रिक छंद है जिसमें कुल 16 मात्राएँ होती हैं |
2) 8,8 मात्रा पर यति चिह्न |
3) प्रत्येक शब्द चौकल का 4,4,4,4
4) अंत सदैव 121(लघु गुरु लघु )
5)क्रमागत दो-दो पंक्तियों में तुकान्त सुमेलन |
उदाहरण-----
बरसे बादल, लेकर उमंग |
बूँदें बजती, जैसे मृदंग ||
धरती हरषी,मनहर तरंग |
अम्बर उड़ते,नभचर विहंग ||
|| कामना पांडेय ||
13/01/2025
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विधा- पद्धरि छंद
सृजन शब्द- *अनंत*
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जीवन चलते, जाए अनंत।
खुशियाँ भर दे, शुभ ऋतु बसंत।।
करो न बातें, तुम मनगढ़ंत।
रखो सदा ही, मन में सुमंत।।
मानवता की, पढ़ना किताब।
इन साँसों की, देना हिसाब।।
रखो कभी मत, संगत खराब।
महको बनके, खिलता गुलाब।।
सत्य अहिंसा, प्रेम सुविचार।
अंतस भर लो, करुणा पुकार।।
मिली सभी को, साँसे उधार।
गजानंद जी, नित सच निहार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/01/2025
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विधा- पद्धरि छंद-
सृजन शब्द- *अनंत*
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हरदम भरना, अंतस सुमंत।
खुशियाँ देना, मुझको अनंत।।
छाये जीवन, विपदा ज्वलंत।
सतगुरु थामो, मुझको तुरंत।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/01/2025
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विधा- पद्धरि छंद
सृजन शब्द- *विचार*
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अंतस सुचिता, भरना विचार।
दुर्लभ जीवन, त्यागो विकार।।
करना मंथन, बनना उदार।
आदत अपनी, मानव सुधार।।
मानव कर्मठ, बनना महान।
रखना हरदम, मीठी जुबान।।
समता चाहत, करना वितान।
साहस थामे, भरना उड़ान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/01/2025
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विधा- पद्धरि छंद
सृजन शब्द- *निखार*
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करना चिंतन, बातें विचार।
रखना संयम, तजना विकार।।
रहना प्रमुदित, खुशियाँ बहार।
सतगुरु देगा, जीवन निखार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/01/2025
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*****************ताटंक छंद*****************
विधान----
1) सम मात्रिक छंद
2) प्रत्येक चरण में 30 मात्राएँ
3) 16-14 पर यति
4) अंत तीन गुरु (२२२) से
5) दो-दो चरण में समतुकांत
उदाहरण------
*बुंदेले हर बोलों के मुँह , हमने सुनी कहानी थी ।*
*खूब लड़ी मर्दानी वो तो , झाँसी वाली रानी थी ।*
19/01/2025
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विधा- ताटंक छंद गीत
सृजन शब्द- *खाली हाथ लिए जग आया।*
खाली हाथ लिए जग आया, खाली वापस जाना है।
मतलब के सब रिश्ते नाते, धन पद व्यर्थ खजाना है।।
दीन दुखी की सेवा करना, असली ईश्वर पूजा है।
मातु पिता से बढ़कर कोई, जग में देव न दूजा है।।
दया धर्म की गठरी बांधो, जीवन फर्ज निभाना है।
खाली हाथ लिए जग आया, खाली वापस जाना है।।
इन साँसों का मोल चुकाओ, जग में मिली उधारी है।
सत्य राह पर बढ़ते जाओ, पथ यह मंगलकारी है।।
नश्वर तन पर क्या इतराना, मिट्टी देह समाना है।
खाली हाथ लिए जग आया, खाली वापस जाना है।।
आशाओं का दीप जलाओ, सपना भाग्य सजाओगे।
रखना नित विश्वास कर्म पर, नया सवेरा लाओगे।।
जो करना है आज करो जी, कल का नहीं ठिकाना है।
खाली हाथ लिए जग आया, खाली वापस जाना है।।
अश्रु कभी भी नहीं बहाना, बूँद- बूँद में मोती है।
धैर्य हृदय पर जो रख चलते, जीत उसी की होती है।।
समय नहीं अब इंतजार का, बात यही समझाना है।।
खाली हाथ लिए जग आया, खाली वापस जाना है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/01/2025
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विधा- ताटंक छंद
सृजन शब्द- जगमग सारे दीप जलें हैं
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जगमग सारे दीप जलें हैं, हर घर के गलियारे में।
खुशियाँ लेकर आई दीवाली, सबके मन के द्वारे में।।
धनतेरस लक्ष्मी पूजा को, बाँटे लोग मिठाई है।
गोवर्धन को गौ माता की, पूजा बेला आई है।।
आसमान में हुई रोशनी, चमके चाँद सितारे में।
जगमग सारे दीप जलें हैं, हर घर के गलियारे में।।
फूलझड़ी बम अनारदाना, फोड़े खूब फटाके हैं।
बच्चे बूढ़े लोग सभी मिल, करते शोर धमाके हैं।।
द्वेष द्वंद को भूल सभी जन, बँधते भाईचारे में।
जगमग सारे दीप जलें हैं, हर घर के गलियारे में।।
कार्तिक माह लगे मनभावन, होती शुभ दीवाली है।
पर्व किसानी का यह पावन, देते सुख खुशहाली है।।
गजानंद जी करे कामना, दुख हो दूर किनारे में।।
जगमग सारे दीप जलें हैं, हर घर के गलियारे में।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/01/2025
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विधा- ताटंक छंद गीत
सृजन शब्द- *उम्मीदों का हाथ थामकर*
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उम्मीदों का हाथ थामकर, चलना जिनको आया है।
शूल भरी राहों में भी तो, उसने कदम बढ़ाया है।।
थाम हौसला आगे बढ़ते, तजकर बात पुरानी को।
लिखते नव इतिहास सदा वह, देकर जोश जवानी को।।
लक्ष्य शिखा पर साध निशाना, विजयी ध्वज फहराया है।
उम्मीदों का हाथ थामकर, चलना जिनको आया है।।
पाषाणों का सीना छलनी, करते श्रम के बाणों से।
कर्म साधना उनको प्यारी, अपने तन-मन प्राणों से।।
विपदाओं का तमस मिटाकर, भोर सुनहरा लाया है।।
उम्मीदों का हाथ थामकर, चलना जिनको आया है।।
नहीं देखते पीछे मुड़कर, आगे बढ़ते जाता है।
सहज सरल साहस संयम से, उनका अटूट नाता है।।
गजानंद जी कर्मवीर बन, जग में नाम कमाया है।
उम्मीदों का हाथ थामकर, चलना जिनको आया है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/01/2025
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विधा- ताटंक छंद
सृजन शब्द- *जब-जब गहन अँधेरा छाया*
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जब-जब गहन अँधेरा छाया, प्रभु ने किया उजाला है।
कभी हँसाते कभी रुलाते, उनका खेल निराला है।।
भाव सभी प्रभु मन का जाने, बनते आस सहारा है।
जीवन का पतवार वही बन, करते नाव किनारा है।।
कभी धूप कभी छाँव दिखाते, खोले किस्मत ताला है।
जब-जब गहन अँधेरा छाया, प्रभु ने किया उजाला है।।
सत्य अहिंसा मानवता अरु, पाठ पढ़ा सच्चाई का।
मानव को मानव से जोड़े, राह दिखा अच्छाई का।।
जीव चराचर के मुख में प्रभु, सुख का दाना डाला है।
जब-जब गहन अँधेरा छाया, प्रभु ने किया उजाला है।।
कहते प्रभु स्वीकार करो तुम, आशा और निराशा को।
सुख-दुख जीवन की परिभाषा, करना दूर हताशा को।।
मानव कभी उदास न होना, प्रभु सबका रखवाला है।
जब-जब गहन अँधेरा छाया, प्रभु ने किया उजाला है।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/01/2025
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विधा- ताटंक छंद गीत
सृजन शब्द- फागुन मतवाला आया।
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धरती का श्रृंगार सजाने, फागुन मतवाला आया।
झूम उठे हैं फूल कली अब, भौंरों ने गाना गाया।।
महुए की भीनीं खुश्बू से, खींच चला मन आता है।
लाल पलास उठा बाहों को, अपने पास बुलाता है।।
गुलमोहर ने लाली पीली, रंग धरा में है पाया।
धरती का श्रृंगार सजाने, फागुन मतवाला आया।।
बागों में आमों की रौनक, मादकता बौराई है।
रंग गुलाल उड़े गलियों में, खुशियाँ ढेरों लाई है।।
ढोल नगाड़ों की थापों से, रंग बसंती दो काया।
धरती का श्रृंगार सजाने, फागुन मतवाला आया।।
गीत पपीहा कोयल गाते, नाच रहें डाली-डाली।
रूप सजाये हैं धरती की, गेहूँ सरसो की बाली।।
गजानंद होली की डोली, देखो यारों ने लाया।
धरती का श्रृंगार सजाने, फागुन मतवाला आया।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/01/2025

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