शुक्रवार, 8 मई 2026

हाइकु-

     *हाइकु* की उत्पत्ति 17 में शताब्दी में जापानी साहित्य में उस समय की लंबी और जटिल काव्य परंपराओं की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आई, जो पारंपरिक रूप से प्रकृति और ऋतुओं पर केंद्रित होती थी किंतु अब यह दुनिया भर की कई भाषाओं में और विविध विषयों पर लिखी जाती है।

(अंग्रेजी या कई अन्य भाषाओं में वर्णों की गणना थोड़ी मुश्किल होती है अतः उन भाषाओं के हाइकु रचनाकार 5,7,5 के नियम से हटकर भी रचना करते हैं)

✓पारंपरिक जापानी भाषा और हिंदी में हाइकु एक 17 अक्षरों (वर्णों) की अत्यंत लघु, प्यारी कविता विधा है, जिसमें तीन पंक्तियों में ही सारी बातें कह दी जाती हैं। यह 5, 7, 5 के नियम पर आधारित है । हम छंद शाला में इसी नियम के अनुसार रचना करेंगे।

पहली पंक्ति- 5 वर्ण

दूसरी पंक्ति- 7 वर्ण

तीसरी पंक्ति-  5 वर्ण

✓हाइकु में मात्राओं के बजाय वर्णों को गिना जाता है।

✓संयुक्त अक्षर को भी एक वर्ण माना जाता है।

जैसे - *बूंदें* में -- बूं और  दें को 2- 2 न गिनकर 1- 1 वर्ण गिना जाएगा ।

*हर्षाया* -- में -  र्षा और या को 1 -1 वर्ण गिना जाएगा।

✓हाइकु 'तुकबंदी' और ' तुकबंदी रहित' दोनों रूपों में लिखा जा सकता है लेकिन पारंपरिक हाइकु अतुकान्त ही लिखा जाता है। हाइकु में तुकबंदी की जगह किसी एक  दृश्य या भावना को छोटे शब्दों में चित्रित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

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 1. हाइकू- *उम्र*


​कोरी सी उम्र,

कागज़ की नाव है,

खुशी अपार।


​उम्र की धूप,

सपनों के हैं पंख,

ऊँची उड़ान।


​बीतती उम्र,

माथे की लकीरें हैं,

लिखा अनुभव।


​रुकती उम्र,

यादों के झरोखे में,

बीता कल है।


​ढलती उम्र,

सूरज की लाली सी,

शांत स्वभाव।


​उम्र की धार,

बहता ही जाए ये,

वक़्त का दरिया।


​कच्ची है उम्र,

मिट्टी का ये खिलौना,

अंत सलोना।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/05/2026

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2. हाइकु - *उम्र*


​उम्र की धार

बहती ही जाए ये

रुकती नहीं।


​पकते बाल

तजुर्बों की पोटली

उम्र का सार।


​बीती वो उम्र

कागज़ की कश्ती वो

ढूँढे ये मन।


​ढलती उम्र

सूरज की लालिमा

शांति अपार।


​चेहरे झुर्री

किस्सों की ये किताब

उम्र की छाप।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/05/2026

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3. हाइकु- *आभूषण*


​चमक न्यारी

मुखड़े पे निखार

गहना प्यारा।


​काँच की चूड़ी

खनकती कलाई

पिया की याद।

​पुरानी रीति

सोने की ये चमक

विरासत है।


​बिना गहना 

रूप तेरा निखरे

सच्चा श्रृंगार।


​पायल बाजे

छम-छम आँगन

मन रिझाए।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/05/2026

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4. हाइकु - *आंधी तूफान*


नभ गरजा

धूल भरी आंधी है

दृश्य धुंधला।

पेड़ कांपते

तूफानी वेग बढ़ा

पत्ते उड़े हैं।

खिड़की बजी

शोर मचाती हवा

भय पसरा।

तिनके उड़े

बवंडर का खेल

धूल का घेरा।

चीखती हवा

बादलों की गर्जना

तीव्र बिजली।

जड़ें अडिग

झुक गई डालियाँ

वेग प्रचंड।

शांत हुआ है

तूफान का तांडव

सन्नाटा छाया। 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे (सत्यबोध)

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)06/05/2026

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5. हाइकु - जन्मदिवस की बधाई

​आया जन्मदिन

खुशियों की हो वर्षा

मंगलमय।


​उगे सूरज

नई राहें दिखाएँ

कामयाब हो।


​महके बगिया

बधाई के ये स्वर

गूँजते रहें।


​दीप जलते

अंधेरा दूर भागे

चमको सदा।


​सजें सपने

हौसलों की उड़ान

शुभकामना।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2026

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6. ​हाइकु- *धरोहर*

पुरानी यादें

सँजोए विरासत

धरोहर को।

सांझी संस्कृति

अनमोल खज़ाना

रखें सँभाल।

पुरखों की देह

माटी की है महक

अमर रहे।

कल की नींव

आज का गौरव है

शान देश की।

सभ्यता दीप

अँधेरे में प्रकाश

अमिट छाप।

पीढ़ी-से-पीढ़ी

मिलता उपहार

सच्चा धन है।

रक्षा संकल्प

कर्तव्य है हमारा

बचे धरोहर।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/05/2026

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हाइकु- *माँ की ममता*

प्यारी सी गोदी

जैसे शीतल छाँव

ममता माँ की।

प्यार का है दरिया

अमृत की है धार

माँ का आँचल।

चोट जो लगे

आँख माँ की रोती है

अनोखा प्यार।

भोर किरण

लोरी गाती माँ जब

स्वर्ग है यहीं।

माँ भूख सह

सबको खिलाती है

त्याग की मूरत।

कष्ट सहती

बाँटती है मुस्कान 

ममता मयी।

ईश्वर रूप

चरणों में जन्नत

माँ पूजनीय 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/05/2026

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हाइकु- *माँ की ममता*

प्यारी सी गोदी

जैसे शीतल छाँव

ममता माँ की।

प्यार का है दरिया

अमृत की है धार

माँ का आँचल।

चोट जो लगे

आँख माँ की रोती है

अनोखा प्यार।

भोर किरण

लोरी गाती माँ जब

स्वर्ग है यहीं।

माँ भूख सह

सबको खिलाती है

त्याग की मूरत।

कष्ट सहती

बाँटती है मुस्कान 

ममता मयी।

ईश्वर रूप

चरणों में जन्नत

माँ पूजनीय 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/05/2026

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हाइकु- *अखण्ड सौभाग्य* 


सिर पर हो

सदा ही तेरा हाथ

और सुहाग।

लाल सिंदूर

माथे की है चमक

अमर रहे।


जन्म-जन्म का

संग रहे सजन

अटूट बंध।


पिया का प्यार

अखण्ड सौभाग्य हो

खुशी अपार।


बनी रहे ये

हाथों मेंहदी रची

अमर प्रीत।

मिले आशीष

सौभाग्य रहे सदा

शीश पे हाथ।


प्रेम का दीप

अखण्ड ज्योति बन

जलती रहे।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2026

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हाइकु- वर्षा की बूॅंदे 


​नभ से गिरी

मोती जैसी ये बूँदें

धरा हर्षाई।

हरी दूब पे

बूँदें वर्षा की सजी

​काँच के दाने।

​बूँदों का नाद

संगीत झींगुर का

रात भी भीगी।

​टप-टप वे

गिरती हैं बूँदें तो

महके माटी।

​काले मेघ से

बूँदें छन के आईं

धोने को पत्ता।

​बूँदों की धार

काँप उठी खिड़की

ठंडी हवाएँ।

​छूकर बूँद

खिल उठी है कली

बाग मुस्काया। 

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/05/2026

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हाइकु - लोकतंत्र


​जनता खड़ी

हाथ में महाशक्ति

भाग्य विधाता।

​एक ही मत

बदलेगा कल को

वोट चोट पे।


हैं ​राजा-रंक

एक ही कतार में

भेद ना कोई।


​मिले आवाज़

मौन भी अब टूटे

लें अधिकार।

​सच्चा चुनाव

पारदर्शी तराज़ू 

न्याय की नींव।


​विभिन्न रंग 

एक ही गुलदस्ता

देश महान।

​जन का तंत्र

उन्नति राह पर

बढ़ेगा आगे।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/05/2026

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