शनिवार, 21 मार्च 2026

दोहा छंद - गुरु (छत्तीसगढ़ी)

 दोहा छंद- 

गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर।

अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।01


गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम।

तोर कृपा ले हे मिले, मोला जग मा नाम।।02


देहू शुभ आशीष गुरु, अरजी हे कर जोर।

मन के श्रद्धा फूल हा, अर्पित हे पग तोर।।03


गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावँव माथ।

देवत शुभ आशीष ला, थामे रखहू हाथ।।04


तन मन सब बलिहार हे, गुरु चरनन मा तोर।

करहू पूरन काज सब, अरजी हे कर जोर।।05


रखौ हाथ गुरु माथ मा, आशिष दौ घनघोर।

रोज नवावँव माथ मँय, पावन पग मा तोर।।06


जिनगी के हर साँस मा, लेवँव गुरु के नाम।

भटका झन खावँव कभू, लेहू गुरु जी थाम।।07


बरगद पीपर पेड़ कस, गुरु हा देथे छाँव।

अंतस ला शीतल करै, गुरु के पावन पाँव।।08


धर ले श्री गुरु के शरण, मिलही उँहे मुड़ाव।

गुरु बर पीपर छाँव कस, देही हृदय जुड़ाव।।09

 

गुरु सागर के सीप अउ, पावन गंगा नीर।

कर लौ जिनगी ला सफल, आवव गुरु के तीर।।10


दीया बन गुरु ज्ञान के, अंतस करय अँजोर।

जिनगी मा गुरु के बिना, नइ होवय सुख भोर।।11


दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय जग ला ज्ञान।

भेद नहीं मन मा रखय, मानय एक समान।।12


गावँव गुरु गुनगान ला, नित अंतस धर ध्यान।

गुरु किरपा ले हे मिले, नाम मान पहिचान।।13


गुरु के पावन पाँव के, बन जावँव मँय दास।

करौं भक्ति अरदास मँय, जब तक तन मा साँस।।14


नइ होवय गुरु के बिना, जिनगी के उद्धार।

बनके खेवनहार गुरु, नाव लगावय पार।।15


गुरुवर तरुवर ज्ञान के, देथे शीतल छाँव।

जिनगी होथे धन्य जी, पाके पावन पाँव।।16


जिनगी के हर साँस हा, गुरु पग मा बलिहार।

राहय मुड़ मा हाथ गुरु, विनय करौ स्वीकार।।17


बनके ज्ञान प्रकाश गुरु, उजियारी बगराय।

जिनगी के उद्धार बर, सत मारग दिखलाय।।18


आखर-आखर भाव भर, गावँव गुरु गुनगान।

चलत रहय ये लेखनी, महिमा करत बखान।।19


बलिहारी गुरु के चरण, परँव नवाँ मँय माथ।

जिनगी के हर मोड़ मा, थामे रखिहव हाथ।।20


दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय सब ला ज्ञान।

गजानंद याचक बने, माँगय सुख वरदान।।21


श्रद्धा के पर्याय गुरु, निष्ठा के प्रतिमान।

रख समानता भावना, देथे सब ला ज्ञान।।22


लँगड़ा पर्वत लाँघथे, गूँगा पाय जुबान।

पंडित पोथी बाचथे, पाके गुरु ले ज्ञान।।23


भरथे गुण संस्कार गुरु, करथे दूर विकार।

जोत जलाथे ज्ञान के, हरथे मन अँधियार।।24


आथें गुरु दरबार मा, लोग अमीर गरीब।

पर पाथें सत ज्ञान ला, जेखर बड़े नसीब।।25


गुरु बरगद कस पेड़ बन, देथे शीतल छाँव।

कर लौ जिनगी धन्य सब, पाके पावन पाँव।।26


गढ़ अनपढ़ इंसान ला, गुरुवर ज्ञान लखाय।

सिरजै कुम्हार कस घड़ा, अंतस ला चमकाय।।27


गुरु महिमा गुनगान कर, होही बेड़ापार।

ये जिनगी गुरु के बिना, हवय कुलुप अँधियार।।28


बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।

बात गजानन ध्यान दौ, कर लौ गुरु गुनगान।।29


जिनगी मा गुरु ज्ञान बिन, नइहे कुछ अस्तित्व।

भव सागर ले पार बर, गुरु के समझ महत्व।।30


मनखे माटी के घड़ा, गुरुवर चाक कुम्हार।

जिनगी ला गुरु हे गढ़े, दिए ज्ञान उपकार।।31


गजानंद गुरु जौहरी, पारस ज्ञान समान।

सोना लोहा के करय, गुरु तुरते पहिचान।।32


गुरु अवगुण ला मेटथे, काटे भ्रम भय जाल।

सत रस्ता हम ला चला, ऊँच करावय भाल।।33


गुरु गीता गुरु बाइबिल, गुरु गुरुग्रंथ कुरान।

गुरु पग चारो धाम हे, गुरु सउँहत भगवान।।34


जिनगी मा गुरु के शरण, रहिथे जेन करीब।

वो मनखे राहय नहीं, अनपढ़ ज्ञान गरीब।।35


गुरु हरथे अभिमान ला, गुरु भरथे सद्ज्ञान।

गुरु पूजा मन से करौ, मिल जाही भगवान।।36


गुरु के दरजा हे सुनव, माता पिता समान।

मिले नहीं गुरु के बिना, सत्यबोध सद्ज्ञान।।37


तोर भरोसा हे खड़े, नइया हा मझधार।

बनके गुरु पतवार तँय, कर दे बेड़ापार।।38


करम धरम के सत मरम, गुरु देवय संदेश।

मानौ गुरु के सीख ला, पाहू सुख परिवेश।।39


गुरु काबा कैलाश अउ, गुरु हे चारो धाम।

गुरु मंदिर मस्जिद घलो, गुरु रहीम अउ राम।।40


पहला गुरु माता-पिता, दिये जन्म संस्कार।

दूजा गुरु शिक्षा दिये, ज्ञान जोत ला बार।।41


गुरु के ज्ञान अथाह हे, समझें नइ नादान।

गुरु गोविंद समान हे, कइसे करौं बखान।।42


जग मा शब्द अनंत गुरु, जानँय बिरला लोग।

गुरु महिमा गाये बिना, मिलय नहीं सुख जोग।।43


दीपक बन गुरु ज्ञान के, उजियारी बगराय।

मारग सत्य असत्य के, परख करे सिखलाय।।44


लाख कीमती धन भला, पर गुरु मोर अमोल।

जग मा गुरु के ज्ञान ला, कोई सकय न तोल।।45

दोहा छन्द- *गुरु*

गुरु हे पावन पूर्णिमा, गुरु अंजोरी रात।

गुरु सावन के मेघ बन, करय ज्ञान बरसात।।46


मन मन्दिर के देव गुरु, वंदन कर कर जोर।

जिनगी के बन नेंव गुरु, दै खुशियाली भोर।।47


देवय सुख उजियार गुरु, मेटय दुख अँधियार।

संस्कृति अउ संस्कार के, गुरु हावय भण्डार।।48


शब्द ज्ञान के खान गुरु, आशा अउ विश्वास।

वोखर बड़ा नसीब हे, गुरु हे जेखर पास।।49


गुरु के कोनों जाति नइ, नइहे कोनों धर्म।

देना सब ला ज्ञान सम, मानय पावन कर्म।।50


गुरु कबीर रविदास बन, गुरु बन घासीदास।

ज्योति पुंज गुरु बुद्ध बन, देथे ज्ञान उजास।।51


गजानंद गुरु के बिना, जिनगी भटका खाय।

बूंद अमिय गुरु ज्ञान के, जो पीये तर जाय।।52

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 09/07/2025

दोहा छन्द- *गुरु*

जप ले गुरु के नाम मन, होही बेड़ापार।

गुरु जिनगी के नाव के, हावय खेवनहार।।53


साँसा मा ले गुरु बसा, अंतस मा धर ध्यान।

बिन पाये गुरु ज्ञान ला, मिलय नहीं सम्मान।।54


नइ होवय गुरु हा गरू, धर ज्ञानी के गोठ।

भाव भजन गुरु के करे, होथे जिनगी पोठ।।55


हरथे गुरु अज्ञानता, ज्ञान जोत ला बार।

दूर बुराई ले रखे, दिसा दसा चतवार।।56


गुरुवर फूल गुलाब के, महकावय मन बाग।

गुरु के पा सानिध्य ला, खिल जाथे सुख भाग।।57


गावय गुरु गुणगान ला, सात खण्ड नौ दीप।

चमकय गुरु आशीष ले, सागर के भी सीप।।58


पेड़ बने गुरु ज्ञान के, देथे जुड़हा छाँव।

गजानंद अंतस जुड़ा, पावन पा गुरु पाँव।।59

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/07/2025


जिनगी भर पावत रहौं, गुरुवर आशीर्वाद।

छइँहा दौ गुरु ज्ञान के, हे अतके फरियाद।।60


करथे काम पुनीत गुरु, बाँटे जग ला ज्ञान।

चलथे जे गुरु राह मा, बनथे मनुज महान।।61


गुरु सागर ये ज्ञान के, मिलय कभू नइ थाह।

पालक बन गुरु शिष्य के, करे सदा परवाह।।62


गुरु ही ले जिनगी शुरू, गुरु ले जिनगी अंत।

गुरु ही ले पावत रहँव, सब दिन ज्ञान अनंत।।63


गुरु गुण ज्ञान गुनान कर, चलके गुरु के राह।

बिन गुरु के नइ तो मिले, ये जिनगी के थाह।।64


बाँटय ज्ञान विवेक गुरु, देवय सत सन्देश।

सीख धरे गुरु के मिटे, मानव मन से क्लेश।।65


साधिन गुरु सानिध्य ला, तुलसी सूर कबीर।

पाइन गुरु के ज्ञान ला, ऋषि मुनि संत फकीर।।66


बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।

सीख धरे गुरु के बनय, मूरख मनुज महान।।67


सच्चा गुरु के कर चयन, शब्द ज्ञान पहिचान।

सही दिशा अउ प्रेरणा, मिलही तब सद्ज्ञान।।68


याचक बन गुरु ज्ञान के, माँगत हावँव भीख।

पाँव बढ़य सत राह मा, आप सिखाहू सीख।।69


बाँटे ले भी नइ पड़े, गुरु के ज्ञान अकाल।

जे पाथे वो हो जथे, पल मा मालामाल।।70


गुरु के आशीर्वाद ही, असली सुख-सम्मान।

नइ खावस भटका कभू, धरले गुरु के ज्ञान।।71


गुरुवर किताब ज्ञान के, गुरुवर कलम दवात।

देके आशिष अउ कृपा, करथे सुख बरसात।।72


गुरु मा रख विश्वास तँय, पाबे ज्ञान प्रकाश।

बनही सुखमय जिंदगी, होही दुख के नाश।।73


शीश झुका गुरु के चरण, करौं अरज कर जोर।

पावत राहँव मँय सदा, जिनगी मा सुख भोर।।74


जब ले हे धरती गगन, जब ले हे संसार।

तब ले हे गुरु ज्ञान के, जिनगी मा आधार।।75


चंदन पेड़ समान हे, गुरु के ज्ञान विचार।

अंतस ला शीतल करे, मेटे दोष विकार।।76


समय घलो ला एक गुरु, गजानंद जी मान।

देथे सुख-दुख सीख ये, बुरा-भला के ज्ञान।।77


गुरुवापन गुरु के करौ, मिले ज्ञान भंडार।

अँधियारी दुख के भगे, होथे सुख संचार।।78


ज्ञान खजाना बाँट के, गुरु करथे उपकार।

जिनगी रूपी नाव के, गुरु ये खेवनहार।।79


गुरु गंगा के धार ये, गुरु सागर के सीप।

गुरु पावस के बूंद ये, गुरु पूजा के दीप।।80


दुनिया के कल्याण बर, ज्ञान धरे गुरु गूढ़।

गुरु के पा सानिध्य ला, सुधरे मनखे मूढ़।।81


सुबो शाम गुरु नाम लौं, घट भीतर हे धाम।

अइसन दीन दयाल ला, बारम्बार प्रणाम।।82


बिनती हे कर जोर गुरु, दे दौ जनम सुधार।

ये जिनगी के नाव ला, कर दौ भव ले पार।।83


करथे बरसा ज्ञान के, गुरु सब बर घनघोर।

रखय नहीं मन भेद गुरु, बाँधय सुमता डोर।।84


आथे श्रद्धा भाव रख, गुरु के जेन करीब।

पाथे गुरु के ज्ञान ला, जाथे सँवर नसीब।।85


नानक घासीदास गुरु, गुरु कबीर रैदास।

बनके गुरु इन अवतरिन, मेटे जग के त्रास।।86


गढ़थे सभ्य समाज गुरु, बाँटे नेक विचार।

भरथे शुभ संस्कार गुरु, दिये ज्ञान उपहार।।87


सिखलाथे गुरु धर्म धर, रीति-नीति संस्कार।

जिनगी जीये के कला, नेक कर्म व्यवहार।।88


करथे गुरु गुनगान ला, सतगुरु ग्रंथ कुरान।

कहिथे गीता बाइबिल, गुरु के ज्ञान महान।।89


मन मा श्रद्धा भाव रख, कर ले गुरु के ध्यान।

अंतस निर्मल हो जही, पा के गुरु के ज्ञान।।90


जिनगी के धर मर्म गुरु, देथे सीख सलाह।

गुरु के ज्ञान अथाह हे, मिलय नहीं जी थाह।।91


मँय अज्ञानी पाय हँव, ज्ञान कृपा गुरु छाँव।

महिमा करे बखान बर, शब्द कहाँ ले लाँव।।92


जिनगी मा गुरु ज्ञान के, पी लेना दू बूँद।

येती-ओती झन भटक, बिरथा आँखी मूँद।।93


पहिली पूजन गुरु चरण, जो जग खेवनहार।

करके ज्ञान प्रकाश गुरु, मेटे मन अँधियार।।94


शीश झुका गुरु के चरण, वंदन बारम्बार।

दिये ज्ञान उपहार गुरु, हे बड़का उपकार।।95


गुरु बिन जिनगी ब्यर्थ हे, गुरु बिन जग अँधियार।

धर ले गुरु के ज्ञान गुण, हो जाबे भव पार।।96


बँध जै गुरु ले प्रीत तब, दुनिया लागे मीत।

गुरु प्रति सेवा भाव ही, हावय रीत अतीत।।97


गुरु के ज्ञान प्रकाश ले, बगरे जग उजियार।

गुरु महिमा गुनगान ला, गावय नित संसार।।98


ध्यान लगा सुन लौ सदा, गुरु वाणी अनमोल।

बसा रखौ गुरु नाम ला, अंतस पट ला खोल।।99


नेक कर्म अउ धर्म के, सिखलाथे गुरु पाठ।

पाये बिन गुरु ज्ञान ला, ये जिनगी हे काठ।। 100

--------------------------------------------------------------------

दिव्य अलौकिक ज्ञान के, गुरु रखथे भंडार।

बाँटय समान रूप ले, जिनगी के सुख सार।।101


कर ले गुरु के वंदना, भाग्य सँवरही तोर।

मिट जाही संकट सबो, सुख मिलही घनघोर।।102


पावन गुरु के पाँव मा, रोज नवावँव माथ।

कर दौ जिनगी ला सफल, बन गुरु दीनानाथ।।103


रूप हवय गुरुदेव के, निराकार साकार।

गुरु के निर्मल ज्ञान ले, आलोकित संसार।।104


माँगत हँव आशीष गुरु, अंतस पट ला खोल।

दे दव गुरुवर ज्ञान के, धन मोला अनमोल।।105


भरथे मन मा भाव गुरु, कर्म करे बर नेक।

दिखलाथे सत राह गुरु, दोष बुराई छेक।।106


गुरु के ज्ञान गुरुत्व ले, जग के हे कल्यान।

गुरु के धर संदेश ला, बनथें मनुज महान।।107


गुरु ला वंदन दंडवत, करौं सुबह अउ शाम।

बोझिल जिनगी के डगर, हे गुरु लेवव थाम।।108


नेक कर्म ले गुरु मिले, ध्यान धरे ले ज्ञान।

संगत गुरु के दूर जे, मूढ़ उही इंसान।।109


कर लौ गुरु गुनगान ला, रइहू सदा प्रसन्न।

सुख जिनगी रख भाव गुरु, ज्ञान दिये सम्पन्न।।110


गुरु महिमा ले बढ़ इँहा, नइहे काहीं और।

दूर भक्ति गुरु के रहे, मिले नहीं जग ठौर।।111


संगत संत सुजान गुरु, निर्मल करय सुभाव।

सतगुरु सुमिरन ले मिटे, अंतस के भटकाव।।112


जिनगी मा गुरु ज्ञान ले, होथे नवा बिहान।

गुरु के पा आशीष ला, बनथें मनुज महान।।113


गुरु जिनगी के प्रेरणा, गुरु सुख के आधार।

गुरु माली बन ज्ञान के, बाग करे गुलजार।।114


गुरु गीता संदेश ये, गुरु बाईबिल सार।

गुरु गरुग्रन्थ कुरान ये, गुरु ज्ञानी करतार।।115


नित बंदँव श्री गुरु चरण, झुका अपन मँय माथ।

सुख मा दुख मा आप गुरु, रखहू मुड़ मा हाथ।।116


ज्ञान दीप ला बार के, हरथे सब अँधियार।

नइ होवय गुरु के बिना, दुनिया मा उजियार।।117


अबड़ लुटाथे गुरु मया, देथे शिक्षा दान।

गुरु के चरन पखार के, पाथें सब सम्मान।।118


भटकत हंसा तार दै, मेटय मन के पीर।

गुरु के महिमा हे अगम, जइसे गंगा नीर।।119


सत के मारग दै बता, रखय कपट ले दूर।

शीश नवा गुरु के चरन, ज्ञान मिले भरपूर।।120


बार ज्ञान के दीप गुरु, मेटय मन अँधियार।

गुरु के पावन पाँव मा, वंदन बारम्बार।।121


कथरी ओढ़े ज्ञान के, गुरु जी रचे विधान।

जिनगी मा रख सादगी, जग मा पाथे मान।।122


माटी कस अनगढ़ रहय, लइका मन के जान।

गुरु जी गढ़य कुम्हार कस, सब ला एक समान।।123


जनम दिये दाई ददा, गुरु जी ज्ञान विवेक।

सहीं झूठ के कर परख, राह दिखावय नेक।।124


ज्ञान मिलय नइ गुरु बिना, चाहे पढ़व पुरान।

गुरु ही भव ले तारथे, कहिथे ग्रंथ कुरान।। 125

02/05/2026

दोहा छंद- *गुरु महिमा*


बिन स्वारथ के बाट गुरु, देखावय दिन-रात।

अड़बड़ गहिर विचार हे, ओखर मन के बात।। 126


गुरुवर घड़ा कुम्हार कस, गढ़थे रूप अनूप।

चेला ला गुरु वइसने, देवय गजब स्वरूप।।127


तिरबेनी कस छाय हे, गुरु के आशिष छाँव।

सुख जिनगी रद्दा मिलय, धर ले गुरु के पाँव।।128


माई-कोरा ले निकल, गुरु कोरा जब जाय। 

लइका बनय सुजान तब, सुग्घर मान कमाय।।129


सागर कस गंभीर गुरु, हिरदे रखय उदार।

सत्यबोध गुरु के चरण, बहिथे सुख के धार।।130 

05/05/2026

गुरु गंगा के धार अउ, गुरु हे खेवनहार।

भटकत हंसा गुरु बिना, नइ होवय भव पार।।131


गुरु हे संत कबीर अउ, गुरु हे घासीदास।

ढोंग रूढ़ि पाखण्ड के, तोड़िन जे मन फाॅंस।।132


गुरु धरती आकाश अउ, गुरु हे सुरुज समान।

करथे जग उपकार गुरु, बनके ज्ञान विधान।।133


पा के गुरु किरपा चढ़य, लॅंगड़ा ऊॅंच पहाड़।

अँधरा सुख सपना गढ़य, हरहा भरय दहाड़।।134


गुरु दीपक बन ज्ञान के, हरय तिमिर अज्ञान।

अंतस ला उजियार कर, दिखलावय भगवान।।135


शून्य हृदय ला शब्द दय, गढ़-गढ़ सुंदर रूप।

शिष्य सँवारय गुरु सदा, बनके ज्ञान अनूप।।136


गुरु के महिमा हे अगम, सागर ले गंभीर।

हर लेवय गुरु ज्ञान ले, अंतस के सब पीर।।137

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2026

दोहा छंद- *गुरु महिमा*


गुरु जी ज्ञान विचार दय, मेटय मन के दोष।

दूर करय भ्रम भावना, देवय सुख संतोष।।138


गुरु ये रूप कुम्हार के, माटी शिष्य शरीर।

गढ़य घड़ा कस देह गुरु, चमकावय तकदीर।।139


नाॅंव कमावय शिष्य हा, पा गुरु आशिष छाॅंव।

सुख के चारों धाम हे, गुरु के पावन पाॅंव।।140


बलिहारी श्री गुरु चरण, हे ये जिनगी मोर।

बाॅंधे रखहू आप गुरु, सदा दया के डोर।।141


जब तक तन मा साॅंस हे, जपौं सदा गुरु नाम।

करौ कृपा घनघोर गुरु, होय सफल सब काम।।142


मिलथे बड़ सौभाग्य ले, गुरु के आशिर्वाद।

मानौं सच भगवान मॅंय, मातु-पिता के बाद।।143


होगे हावय धन्य गुरु, एक जनम ये मोर।

बिनती हे अगले जनम, पावॅंव किरपा तोर।।144

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु महिमा गुनगान ला, गावॅंव मॅंय दिन-रात।

दिये हवय गुरु ज्ञान के, मोला सुख सौगात।।145


ये ज़िनगी मा हे मिले, गुरु किरपा जी सार।

कइसे पाहूॅं मॅंय चुका, गुरु के ज्ञान उधार।।146


मुक्ति मिलय नइ गुरु बिना, भटकत रहिबे रोज।

सत रसता नित देखबे, कर ले गुरु के खोज।।147


पहिली गुरु हे मातु हा, पिता ज्ञान के रूप।

गुरु चरनन मा स्वर्ग हे, जइसे छइँहा-धूप।।148


माटी कस हे देह ये, गुरु हा आय कुम्हार।

चुपके-चुपके ठोक के, देवय रूप सॅंवार।।149


सब तीरथ गुरु के चरन, करथे सुख धर वास।

मिले जिहाॅं गुरु के कृपा, मिटय भरम अउ त्रास।।150


पाये बिन गुरु ज्ञान ला, भटकत रहिथे जीव।

गुरु के चरन पखार ले, बनही पक्का नींव।।151

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

पा के गुरु के ज्ञान ला, बनथे शिष्य सुजान।

गढ़थे सभ्य समाज अउ, लाथे नवा बिहान।।152


देथे शुभ संस्कार गुरु, मन के मेट विकार।

बनके खेवनहार गुरु, नाव लगाथे पार।।153


गुरु बिरवा बन ज्ञान के, देथे शीतल छाॅंव।

पा के गुरु सानिध्य ला, मिट जाथे भ्रम घाॅंव।।154


मेटय गरब गुमान के, अंतस ले गुरु फाॅंस।

गा ले गुरु गुनगान मन, जब तक तन मा साॅंस।।155


छोड़ सुवारथ ला सबो, गुरु हा देथे ज्ञान।

गुरु के दरजा ऊॅंच हे, कहिथे ग्रंथ कुरान।।156


का सादा रंगीन का, चिनहा देथे नीत।

सत्य डगर मा ले जथे, गुरु हा बनके मीत।।157


गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु हे, गुरु हा आय महेस।

जेकर मन मा गुरु बसे, दूर होय सब क्लेस।।158

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

मातु-पिता जग जन्म दय, गुरु हा देवय ज्ञान।

सत मारग जे ले चलय, गुरु हे उही महान।।159


धरती बर भगवान गुरु, सागर बर ये सीप।

जग बर ज्ञान प्रकाश गुरु, अँधियारी बर दीप।।160


पूजा के ये थाल गुरु, मन मंदिर के देव।

मानय सब ला एक गुरु, छोड़ सबो भ्रम भेव।।161


गुरु चंदन के पेड़ बन, महकावय मन द्वार।

गुरु महिमा ला कोंन कब, पाइस हावय पार।।162


जिनगी के हर साॅंस मा, राहय गुरु के नाम।

करही भव ला पार गुरु, गुरु चरनन लौ थाम।।163


चमकावय नित लेखनी, गुरु जी बनके स्याह।

पड़य नहीं तो कम कभू, गुरु के ज्ञान अथाह।।164


सत्यबोध गुरु के चरन, जस गंगा के धार।

धोवय मन के पाप ला, लेवय नाव उबार।।165

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

कहिथें ओर न छोर हे, गुरु के ज्ञान अनंत।

महक उठे पतझड़ घलो, जइसे फूल बसंत।।166


गुरु के आशीर्वाद ले, होय सफल सब काम।

गुरु के सेवा ला करत, मिलथे सुख के धाम।।167


गुरु ला अंतस ले बिठा, गुरु हे भ्रम के काल।

गुरु अवगुण ला मेटथे, बनथे दुख मा ढाल।।168


गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावॅंव माथ।

पावॅंव नित आशीष गुरु, मुड़ मा रखहू हाथ।।169


गुरु के सेवा कर मनुज, गुरु ला मन मा धार।

शिष्य परम बन जोड़ ले, गुरु ले मन के तार।।170


दिखलाथे गुरुवर दिशा, दशा रहे विपरीत।

गुरु ले बढ़के हे नहीं, ये दुनिया मा मीत।।171


सब ला अलगे मोर गुरु, जेखर सुग्घर बैन।

दर्शन जेखर पाय बर, रहिथे मन बेचैन।।172

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु चरनन के धूल ला, माथ लगावॅंव रोज।

मिट जावय अज्ञानता, पूरन हो सुख खोज।।173


गुरु गोविंद ले हे बड़े, खुद गोविंद बतलाय।

जेखर पथ आलोक ले, दूर तिमिर हो जाय।।174


पत्थर ला कंचन करय, गुरु बन ज्ञान अधार।

मूरुख ला पंडित करय, महिमा अपरम्पार।।175


गुरु बिन उपजे ज्ञान नइ, गुरु बिन मिले न मोक्ष।

गुरु बिन संशय नइ मिटय, गुरु हे दिव्य परोक्ष।।176


एक दीप ले हे जले, जइसे दीप हजार।

गुरु के ज्योति जगात हे, अंतस मा उजियार।।177


गुरु जस और न मीत हे, गुरु जस और न देव।

गुरु चरनन के छाॅंव मा, मिट जावय सब भेव।।178


माटी के पुतरा खड़े, साॅंसा भरय कुलाल।

आत्म सॅंवारय गुरु सदा, बनके दुख मा ढाल।।179

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु हे नाव गहीर बड़, भवसागर के बीच।

सब ला पार लगाय हे, ऊॅंच होय या नीच।।180


आखर-आखर ज्ञान के, बरसा करय उदार।

मूरुख ला ज्ञानी करय, गुरु करके उपकार।।181


गुरु मूरत ये सादगी, मन मा करुणा भाव।

ज्ञान बचन जेखर सदा, हर लेथे सब घाव।।182


बिरथा गुरु बिन साधना, जइसे जल बिन मीन।

तड़पे मन ये ज्ञान बिन, बनके निस दिन दीन।।183


गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु हे, गुरु हे शिव के रूप।

कहिथें गुरु परब्रह्म हे, सत्य ज्ञान के कूप।।184


गुरु के आज्ञा धार्य हे, गुरु के बचन प्रमाण।

जे गुरु पथ मा पग धरय, ओखर हो कल्याण।।185


जिहाॅं न पहुॅंचे रवि किरण, उॅंह पहुॅंचे गुरु ज्ञान।

घोर अँधेरा टार के, लाथे नवा बिहान।।186

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

धरे ज्ञान गुरु आसरा, पत्थर हा तर जाय।

बहरा बोलय वेद अउ, लॅंगड़ा हा बलखाय।।187


मान मिलय सम्मान अउ, मिलय सदा गुरु ज्ञान।

गुरु चरनन के धूल ले, बनथे मनुज महान।।188


गुरुवर आदि अनंत हे, गुरुवर मध्य विचार।

जिनगी के दुख मोड़ मा, गुरु हे सुख आधार।।189


शिष्य उही जे गुरु कहे, मानय पत्थर लीक।

छिपे हवय गुरु डाॅंट मा, जिनगी के हर सीख।।190


गुरु ला मानुस झन समझ, गुरु हावय करतार।

नर तन मा गुरु देव हे, करथे बेड़ा पार।।191


जे करथे गुरु से कपट, शिष्य नहीं कहलाय।

जइसे रेगिस्तान मा, बीज नहीं उग पाय।।192


विद्या धन अइसे दिये, लूट सकय ना चोर।

गुरु हा थामय डोर ला, जिनगी के हर छोर।।193

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु पारस सम तुल्य हे, चेला लौह समान।

छूवत ही कंचन करय, मेटय गरब गुमान।।194


गुरु के वाणी सार हे, गुरु के वाणी वेद।

मिट जाथे छिन मा सबो, मन के बिखहर भेद।।195


गुरु के गौरव गान हा, जग मा पूजे जाय।

ज्ञान बिना इंसान हा, मान कहूं ना पाय।।196


धन दौलत ले हे बड़े, गुरु के ज्ञान अपार।

सदा रहय ये संग मा, बन करके पतवार।।197


गुरु बिन माला फेरना, गुरु बिन करना दान।

बिरथा ये सब होय हे, कहिथे वेद पुरान।।198


गुरु हे सागर ज्ञान के, शिष्य नदी के धार।

मिल जाथे जब सिंधु मा, हो जाथे उद्धार।।199


सिखलाथे गुरु कर्म अउ, मानवता के पाठ।

छोड़व इरखा द्वेष ला, तजौ दम्भ के ठाठ।।200

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/05/2026

---------------------------------------------------------------------

दोहा छंद- *गुरु महिमा*

दिव्य दृष्टि गुरु हे दिये, देखॅंव सब ला एक।

सेवा ही पूजा बनय, कर्म रहय नित नेक।।201


गुरु हा तोड़य फाॅंस भ्रम, धन माया अउ मोह।

दिखलावय सत राह गुरु, मन भीतर मा पोह।।202


जइसे चंदन संग रहि, नीम सुगंधित होय।

वइसे गुरु सानिध्य पा, दुर्गुण बचे न कोय।।203


गुरु के आसन ऊॅंच हे, सब ले ऊपर मान।

ईश्वर भी झुकथे उहाॅं, जिहाॅं रहे गुरु स्थान।।204


गुरु जी मन के मैल ला, धोवय सबद सुजात।

गुरु दर्पण उजला करय, सूझय मन के बात।।205


कल्पवृक्ष सम गुरु हवय, माॅंगय जो फल पाय।

जावय जे विश्वास रख, खाली हाथ न आय।।206


थामय किरपा डोर गुरु, तन कठपुतली जान।

अइसन ज्ञान लखाय गुरु, होवय जग कल्यान।।207

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु सिखलाथे धैर्य अउ, गुरु सिखलाथे प्रेम।

सत्य राह मा ले चलय, देत क्षमा अउ क्षेम।।208


गुरु किरपा के मंत्र ले, सोये भाग जगाय।

फूल खिलय हर राह मा, शूल सबो मिट जाय।।209


कोरा कागज देह ला, कर दौं गुरु के नाम।

करौं सुमरनी गुरु चरन, रोज सुबह अउ शाम।।210


जग माया के जाल मा, भटके हौं हो अंध।

नैन दुनों गुरु खोल के, काटिस जम्मो बंध।।211


गुरु महिमा ला गात जी, थकय कभू नइ बैन।

दर्शन गुरु के पाय बर, तरसत रहिथे नैन।।212


जो भी आथे गुरु शरण, गुरु लेथे अपनाय।

जाति-पाति ला छोड़ के, सब ला ज्ञान लखाय।।213


बूंद पड़य जब गुरु कृपा, बूझय मन के प्यास।

मुरझाये मुख खिल उठय, गुरु के पा विश्वास।।214

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

बोलव शब्द सॅंभाल के, देथे गुरु ये सीख।

पी लौ अमरित प्रेम के, माॅंग न जग से भीख।।215


गुरु सिखलाथे त्याग अउ, परहित सेवा धर्म।

मिट जाथे जड़ द्वेष के, निर्मल हो सब कर्म।।216


गुरु सूरुज ये ज्ञान के, मॅंय हा छोटे दीप।

देवत मया दुलार गुरु, रखथे हृदय समीप।।217


गुरु के दर्शन पाय ले, मिटय सबो मन खोट।

देथे सुख आनंद गुरु, दूर करत दुख चोट।।218


गुरु वाणी अनमोल हे, मन मा लेवव पाल।

काल न बांका कर सकय, तोर एक भी बाल।।219


गुरु जी राह दिखाय हे, ईश मिलन के द्वार।

भटकय हंसा गुरु बिना, नाव बने मझधार।।220


गुरु के प्रेम अनन्य हे, स्वार्थ बिना आधार।

जइसे जलद उलेचथे, अम्बर ले जलधार।।221

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु अइसन वो नाव ये, चढ़ हो जावव पार।

श्रद्धा के पतवार गुरु, पार करय मझधार।।222


गुरु देथे नव चेतना, करा आत्म के बोध।

शांति कराये चित्त ला, मिटा व्यर्थ के क्रोध।।223


गुरु ही माली हे इहाॅं, हम बगिया के फूल।

सींच ज्ञान के नीर ला, झाड़य मन के धूल।।224


गुरु के आज्ञा मान के, जो करथे जग काम।

मंजिल ओखर द्वार मा, करय सदा आराम।।225


तेज निराला पुंज गुरु, जस पूनम के चंद।

मिटय हृदय अँधियार हा, बरसय सुख आनंद।।226


गुरु बिन जिनगी व्यर्थ हे, जइसे फल बिन पेड़।

ज्ञान शक्ति गुरु के मिले, टूटय दुर्गम मेड़।।227


तन मन धन अर्पन करौं, गुरु के पावन पाॅंव।

साॅंस घलो ये ओखरे, पाये हे सुख छाॅंव।।228

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु करजा ले मुक्ति हो, नइहे वश मा मोर।

ये जिनगी के साँस भी, पड़ जाही जी थोर।।229


हवय आसरा तोर गुरु, जब अंतस भरय थकान।

पंख लगा विश्वास के, भर लौं ऊँच उड़ान।।230


बनके शीतल छाँव गुरु, मेटव मन के ताप।

अर्पन श्रद्धा के सुमन, कर लौ कबूल आप।।231


गुरु ले ही तो सब मिले, न तो मिले नइ कोय।

गुरु बिन ये संसार मा, सुखी न कोई होय।।232


गुरु के वाणी कान मा, भरय मधुर संगीत।

उमड़य अंतस मा सदा, गुरु चरनन के प्रीत।।233


सिखलाये गुरु रेंगना, मोर पकड़ के हाथ।

नइ छोड़े गुरु तॅंय कभू, कठिन डगर मा साथ।।234


गुरु ले बढ़ दाता नहीं, जो देवय निज ज्ञान।

बदला मा कुछ लै नहीं, गुरु के त्याग महान।।235

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु चरनन के वंदना, कर लौ सौ-सौ बार।

गुरु के ज्ञान लखाय ले, होथे बेड़ा पार।।236


गुरु सुमिरन कर आत्म मा, मुख मा रख गुरु नाम।

गुरु से लगन लगाय रख, बन जाही सब काम।।237


गुरु के वाणी ला सदा, पत्थर लकीर मान।

चल लौ गुरु के राह मा, पा जाहू निर्वाण।।238


दिव्य दृष्टि गुरु के पड़े, खुल जै बंद किवाड़।

कंकर-पत्थर हा लगे, जइसे स्वर्ण पहाड़।।239


गुरु मन संशय दूर कर, सत्य कराथे बोध।

नइ राहय भ्रम द्वंद्व अउ, हट जावय अवरोध।।240


ज्ञान भक्ति गुरु सार हे, बाकी सब हे राख।

सदा सिखाथे संत जन, बचा रखौ खुद साख।।241


गुरु के किरपा पाय बिन, मिले न हरि के धाम।

सीढ़ी गुरुवर ला बना, पावय मनुज मुकाम।।242

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

दीप जला गुरु ज्ञान के, मेटय घोर अँधेर।

दिखलावय सत राह गुरु, तोड़ जगत के फेर।।243


गुरु के संगत साध के, चमक उठय जी भाग्य।

तज मन भोग विलास ला, जाग उठा वैराग्य।।244


गुरु चरनन मा स्वर्ग हे, गुरु चरनन मा धाम।

गुरु के सेवा छोड़ के, बिरथा हे सब काम।।245


शून्य से शिखर तक दिये, गुरु मोला पहुॅंचाय।

गुरु जी अंतिम साॅंस तक, साॅंस न नाम भुलाय।।246


गुरु बिन नइ तो ज्ञान हे, ना कोई आधार।

पार लगाथे नाव गुरु, बन करके पतवार।।247


नइ राहय सुख के कमी, पा गुरु आशिर्वाद।

हृदय कमल लगथे खिले, जिनगी हो आबाद।।248


दिखलाये गुरुवर हवय, खुद के ज्ञान स्वरूप।

घट-घट मा गुरु वास कर, चेतन रूप अनूप।।249

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)25/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

धरती नभ वश मा करय, गुरु के शक्ति अपार।

पावॅंय अक्षय यश सबो, गुरु के मारग धार।।250


गुरु किरपा के अंत ना, जइसे नीला व्योम।

गूॅंजत हे गुरु नाम ले, रोम-रोम मा ओम।।251


गुरु सिखलाये मौन ला, नित्य करे बर नाद।

मन के मिटे अशांति अउ, बचे सिर्फ संवाद।।252


गुरु किरपा हे संग मा, फिर न डरे के बात।

कठिन डगर मा मिल जथे, फूल भरे सौगात।।253


जिनगी बर हे साॉंस गुरु, अउ ये तन बर प्रान।

शीश नवाॅं गुरु के चरन, मिट जाही अभिमान।।254


बिन माॅंगे झोली भरय, पहिचानय गुरु दीन।

गुरु के करुणा देख के, मन होथे लवलीन।।255


गुरु के ज्ञान बखान बर, कम पड़थे आकाश।

हावय ज्योति अनंत गुरु, गुरु हे पूर्ण प्रकाश।।256

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा* 

बतलाथे गुरु जी इहाॅं, धरम करम के सार।

मानव सेवा ही हरय, प्रभु पूजा आधार।।257


गुरु के तज सानिध्य ला, जाॅंव कहाॅं मॅंय नाथ।

मोर हवव गुरु आसरा, थामे रखिहौ हाथ।।258


बसे हवय छवि नैन गुरु, हृदय बसे हे नाम।

गुरु चरनन मा हे बसे, जग के  चारो धाम।। 259


घोलय मन मा चाशनी, गुरु के मिश्री बोल।

जिनगी ला दै रोशनी, दिव्य दृष्टि ला खोल।।260


गुरु के किरपा ला धरे, जीते मन संसार।

अब ना कोई हार हे, ना कोई तकरार।।261


ज्ञान भक्ति गुरु के नशा, सब ले ऊँचा जान।

जिनगी भर उतरय नहीं, बात समझ इंसान।।262


शीश नवाॅं गुरु के चरन, माॅंगव ये वरदान।

करत रहॅंव गुरु हर जनम, तोर चरन के ध्यान।।263

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026


दोहा छंद - *गुरु महिमा*

गुरु चरनन के धूल ला, माथा तिलक लगाॅंव।

ज्ञान दीप ला बार के, मन के तिमिर भगाॅंव।।264


सत्यबोध नर अंध वो, गुरु ला बोलय और।

हरि रूठे गुरु ठौर हे, गुरु रूठे नइ ठौर।।265


जे रहिथे मतिमंद गुरु, लेत न दीक्षा कोय।

जइसे सूना घर इहाॅं, मान अतिथि नइ होय।।266


उपजय गुरु बिन ज्ञान नइ, मिलय नहीं संतोष।

गुरु बिन लखय न सत्य हा, गुरु बिन मिटय न दोष।।267


गुरु बिन घोर अँधेर हे, सत्य कहॅंव समुझाय।

जइसे सूरुज के बिना, तिमिर न दूर भगाय।।268


आखर-आखर गुरु लिखय, शब्द-शब्द मा ज्ञान।

बन शुभ चिंतक शिष्य के, प्रभु से जोड़य ध्यान।।269


अंधकार के गर्त ले, लावय खींच निकाल।

समय रहे विपरीत गुरु, खड़े रहय बन ढाल।।270

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

शिरोधार्य गुरु के बचन, कर सेवा निस्वार्थ।

मिलय परम पद हा सहज, सिद्ध होय पुरुषार्थ।।271


मन के भीतर मैल जो, गुरु धोवय छिन जाय।

शब्द साबुना से मिटय, दूजा और न भाय।।272


गुरु दीपक ये ज्ञान के, घट मा करय उजास।

मिटय कलेश कलेश सब, पूरन होवय आस।।273


गुरु से नाता जोड़ लौ, तज दुनिया के मोह।

सत्य राह मा जे चलय, मिटय जगत के द्रोह।।274


गुरु के करनी देख झन, गुरु के शब्द सम्हार।

नाव पुराना हो भले, देवय पार उतार।।275


गुरु के किरपा ले सदा, मिटय सकल संताप।

जनम मरण के दुख मिटय, मिटय त्रिविध सब पाप।।276


गुरु बिन होय न भक्ति हा, गुरु बिन मिलय न प्रेम।

गुरु बिन जिनगी व्यर्थ हे, बिगड़य नेकी नेम।।277

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु ला मानुस झन समझ, गुरु सॅंउहत हे ईश।

ये दुनिया के जीव सब, नित्य नॅंवाथे शीश।।278


चढ़ जावव गुरु नाव मा, रख अंतस मा धीर।

लहरा दुख के टार दै, मेटय मन के पीर।।279


ज्ञान दृष्टि गुरु हे दिये, गुरु मा देखॅंव राम।

कण-कण मा गुरु हे रमे, पूर्ण वहीं विश्राम।।280


गुरु ले सॅंवरे हे इहाॅं, जिनगी के हर साज।

राह न भटकय सारथी, थमे न कोई काज।।281


कल्पवृक्ष बन गुरु खड़े, जो माॅंगे सो पाय।

श्रद्धा मन मा धार लौ, काम सफल हो जाय।।282


अंतर्यामी गुरु हवय, जानय मन के बात।

मिट जावय दुख फाॅंस सब, आवय सुख के रात।।283


गुरु बिन नइहे शांति मन, गुरु बिन नइहे सार।

मेटय दुख अँधियार गुरु, खोलय सुख के द्वार।।284

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2026


दोहा छंद - *गुरु महिमा*

काम क्रोध अउ लोभ ला, गुरु हा दूर भगाय।

शांति दया अउ प्रेम के, अमरित धार बहाय।।285


गुरु वाणी अमरित झरे, जो पीये तर जाय।

मन के तृष्णा हा मिटय, थमय काल के मार।।286


गुरु ही जड़ ला सींचथे, फलय फुलय फर डार।

महकय ज्ञान सुगंध से, सारा ये संसार।।287


गुरु हे शीतल चंद्रमा, शिष्य हृदय के प्यास।

ज्ञान किरण गुरु के मिले, मिटय मोह के फाॅंस।।288


सतगुरु के उपदेश ला, सदा लगा लौ ध्यान।

मिटे भरम के जाल अउ, पावॅंय पद निर्वाण।।289


झन करिहौ गुरु से कपट, और न भेद छुपाव।

जइसे बोहव बीज तुम, वइसे ही फल पाव।।290


गुरु के सेवा हे परम, पावन तीर्थ समान।

दर्शन चारो धाम के, गुरु चरनन के ध्यान।।291

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के वाणी वेद हे, गुरु के बचन पुराण।

मान हृदय गुरु के धरय, हे वो मनुज महान।।292


गुरु के सम्मुख जो रहय, मौन धरे मन ध्यान।

बिना कहे वो पी सके, ज्ञानी बन गुरु ज्ञान।।293


शिष्य उही जो गुरु कहे, पल भर करे न देर।

आज्ञा पालन जो करय, मिटय काल के फेर।।294


गुरु ला अर्पण सर्व सब, गुरु ला अर्पण प्रान।

जितना शिष गुरु के मिलय, उतना वो धनवान।।295


जे छोड़य गुरु संग ला, भटकय दर-दर द्वार।

डूबय बिन पतवार के, बीच नदी मझधार।।296


गुरु के आदर जे करय, पूज चरण के धूल।

जिनगी बगिया मा खिलय, रंग बिरंगी फूल।।297


ईश मान गुरुदेव ला, कर लौ सेवा रोज।

कोटि तपस्या फल इही, झन बाहिर मा खोज।।298

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/06/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु हा भरम निवारथे, सत्य दिखाथे रूप।

जड़चेतन हा जाग जै, त्याग जगत के कूप।।299


गुरु के शब्द कठोर ला, जानौ औषध रूप।

रोग मिटाये मन लगा, देवय स्वास्थ्य अनूप।।300

---------------------------------------------------------------------

गुरु ले प्रेम गहीर रख, लगा न दूजा भाव।

मन के मिटथे पीर सब, लगय किनारे नाव।।301


गुरु चरनन मा सर झुका, झुका न दुनिया पास।

भाव सागर ला तर जबे, बनके गुरु के खास।।302


दृष्टि जिहाँ गुरु के पड़े, मिटे पाप के ढेर।

सत्य ज्ञान के हो उदय, लगे न पल भर देर।।303


गुरु अमरित के खान ये, गुरु जस मिले न और।

शिष्य बने जो धूल सम, पाये कहीं न ठौर।।304


गुरु चरणामृत पान कर, मिटे जनम के प्यास।

अंत समय मा पा सकव, गुरु चरनन के वास।।305

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/06/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

जे छोड़य गुरु संग ला, नइ पावय वो राह।

जइसे मछली जल बिना, छोड़य जिनगी चाह।।306


राह दिखाथे गुरु सुगम, भक्ति भाव मन तोल।

स्वयं दिखा गुरु रूप ला, मंत्र दिये अनमोल।।307


गुरु चरनन मा स्वर्ग हे, गुरु चरनन मा सार।

गुरु चरनन के दास बन, हो जाहू भव पार।।308


गुरु गुनगान अथाह हे, कोई सकय न गाय।

तीन लोक के देव मन, पार घलो नइ पाय।।309


गुरु हा गहरा सिंधु हे, ज्ञान रत्न के खान।

गोता मारय शिष्य जे, पावय मोती मान।।310


देइस दर्पण ज्ञान गुरु, देखव निज मुख शुद्ध।

मन के मैला धो चलव, गुरु बन कहिथे बुद्ध।।311


गुरु हे शीतल छाॅंव तरु, तपय जगत के धूप।

सत्यबोध आनंद हे, गुरु के निकट अनूप।।312

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/06/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के वाणी मा बसे, सुख के सब्बो सार।

गोठ धरय जे शिष्य ये, पावय खुशी अपार।।313


गुरु चरनन के वंदना, भव सागर के नाव।

पार उतारय जीव ला, थामय जब गुरु पाॅंव।।314


गुरु हे दाता ज्ञान के, नइ माॅंगय कुछ दाम।

शिष्य समर्पित हो अगर, होय सफल सब काम।।315


गुरु हा बीजा ज्ञान तरु, सींचय सुख के नीर।

छाॅंव दिये हे शांति गुरु, मेटय मन के पीर।।316


रूप धरे भगवान गुरु, हरय सकल अज्ञान।

पीयय विष संसार के, देवय अमरित दान।।317


गुरु हा साधय कर्म अउ, त्याग तपस्या मर्म।

गुरु सेवा जग श्रेष्ठ हे, गुरु हे उत्तम धर्म।।318


महिमा अपरम्पार गुरु, का लिखॅंव मॅंय अल्प।

जिनगी के उद्धार बर, गुरु हे सहीं विकल्प।।319

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/06/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

राहव गुरु सानिध्य मा, तज माया अभिमान।

देवय खाली हाथ ला, गुरु जी सुख के खान।।320


गुरु के संगत जे करय, रहिके गुरु के संग।

जइसे चंदन पेड़ सम, महकय मानुस अंग।।321


गुरु के शक्ति अपार हे, पर्वत सम सामर्थ।

समझे जग मा कोंन हे, गुरु बिन जिनगी अर्थ।।322


ध्यान धरय गुरु शिष्य जे, मन ला करके शांत।

जानय जग के सत्य वो, मिटा सकल मन भ्रांत।।323


गुरु किरपा ले होय हे, ईश्वर के आभास।

घट-घट मा तो हे बसे, गुरु के दिव्य प्रकाश।।324


गुरु वाणी जे सुन सकय, धरे हृदय के बीच।

महके जिनगी खिलखिला, जइसे उपवन सींच।।325


गुरु माली ये बाग के, सींचय सुख के नीर।

शिष्य फूल बनके खिले, मिटे हृदय के पीर।।326

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/06/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

छत्र-छाॅंव जब गुरु करय, डरय न कोई काल।

घूमय निर्भय बन सबों, छोड़ अहं भ्रम जाल।।327


गुरु सीढ़ी ये ज्ञान के, चढ़व गगन के पार।

बनके अनहद नाद गुरु, करथे सुख झंकार।।328


भूल जिये जे गुरु मनुज, जलय नरक के आग।

गुरु चरनन के प्रीत हा, सब ले बड़े सुहाग।।329


भक्ति अधूरा गुरु बिना, गुरु बिन ज्ञान न शुद्ध।

बनय नहीं गुरु के बिना, कोई नर तन बुद्ध।।330


गुरु के महिमा हे अगम, गुरु जग के आधार।

पा के गुरु किरपा मनुज, जीत लिये संसार।।331


गुरु ला अर्पण गीत हे, गुरु ला अर्पण छंद।

शीश नॅंवा गुरु के चरन, मिटय सकल दुख द्वंद्व।।332


गुरु चरनन मा शीश रख, माॅंगव मॅंय आशीष।

ज्ञान दीप रखबे जला, भक्ति मिलय जगदीश।।333

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/06/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु गोविंद ले हे बड़े, सत्य कहय संसार।

कइसे पाही जग चुका, गुरु के ज्ञान उधार।।334


अंधकार के कोठरी, हे जग अति गंभीर।

ज्ञान दीप धर हाथ मा, गुरु बन खड़े प्रवीर।।335


मानुष ले सन्यासी करय, कंकर से दै हीर।

गुरु के आशीर्वाद ले, मिट जावय सब पीर।।336


गुरु के सत उपदेश के, शिष्य न पावय छोर।

जिनगी के हर साँस ले, बाँध रखय गुरु डोर।।337


गुरु दीपक गुरु रोशनी, गुरु हे जग के छोर।

बिन गुरु जिनगी नाव ये, भटकय चारो ओर।।338


लोहा ला कंचन करय, परस ईश के पाय।

मिटा अविद्या के भरम, गुरु उजियारी लाय।।339


हाथ रखय गुरु भाल मा, देवय अभय प्रसाद।

मिटय द्वंद्व भ्रम द्वेष सब, छूटय वाद-विवाद।।340

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/06/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु मूरत मुख चंद्रमा, कृपा दृष्टि सुख धार।

बचन सुनत गुरु के मिटे, संशय कोटि हजार।।341


ये तन माटी ढेर अउ, गुरु हा चतुर कुम्हार।

भीतर हाथ दुलार दै, बाहर मारय मार।।342


गुरु पूरन पावन परम, अंतर्यामी रूप।

निर्झर मन के बाग मा, सींचय नेह अनूप।।343


जग के नाता झूठ सब, गुरु के नाता साॅंच।

पता न पावय शिष्य हा, गुरु सह लेवय आँच।।344


आँख मूँद के देख ले, गुरु बइठे दिख जाय।

अगम अगोचर राह ला, गुरु पल मा सुलझाय।।345


गुरु वाणी अमरित झरे, प्यासा चातक शिष्य।

एक बूँद गुरु ज्ञान के, देत सुधार भविष्य।।346


अहंकार के गाँठ ला, पल मा देवय काट।

सत्य पंथ दिखलाय गुरु, मन के खोल कपाट।।347


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/06/2026


दोहा छंद - *गुरु महिमा*

ज्ञान ध्यान जानॅंव नहीं, जानॅंव गुरु के पैर।

पा गुरु के पावन चरन, छुटगे जग से बैर।।348


पंथ अगम होगे सुगम, गुरु थामिस जब बाॅंह।

मिटगे दुख के धूप अउ, मिलगे सुख के छाॅंह।।349


दीक्षा देइस ज्ञान के, मन मा भरिस प्रकाश।

जागिस हे सोये हृदय, कटिस मोह के फाॅंस।।350


ये मन चंचल बावरा, माढ़य एक न ठौर।

शब्द बान गुरु ज्ञान के, थाम सकय ना और।।351


अँधरा ला लाठी मिलय, बहरा ला तो कान।

लॅंगड़ा चढ़य पहाड़ मा, ज्यों गुरु मिलय सुजान।।352


माया के बाजार मा, बिकत रहिस ये जीव।

गुरु हा कौड़ी ला उठा, रख दिस पक्का नींव।।353


सत्यबोध ये जान ले, गुरु जब होय सहाय।

भ्रम के परदा दै उठा, जोत निरंजन आय।।354

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/06/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु जइसे दाता नहीं, याचक ये संसार।

देवय दुख ले मुक्ति गुरु, बिना करे उपकार।।355


तीर्थ नहाये ले कभू, नइ जावय मन मैल।

गुरु बिन ढोवॅंय बोझ ला, बन कोल्हू के बैल।।356


सत्य नाम के मंत्र ले, कट जावय दुख फंद।

खुल जावय सुख द्वार सब, राहय जे हा बंद।।357


मृगतृष्णा के जल विकल, भटकत राहय दास।

सतगुरु सागर रस भरे, उही बुझावय प्यास।।358


ज्ञान चक्षु गुरु हा दिये, मिटा भरम के जाल।

नैन उठा देखॅंव जिहाॅं, पावॅंव दीनदयाल।।359


गुरु के शब्द अकाथ हे, काटय सकल विकार।

जेन धरय गुरु के शरन, पावय सुख संसार।।360


शिष्य उही जे सीख लै, गुरु के कड़ुवा बात।

जइसे तपथे सोन हा, कुन्दन बने प्रभात।।361

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छन्द- *गुरु महिमा*

गुरु के सेवा जे करय, तज के गरब गुमान।

ओला गुरु के रूप मा, मिल जाथे भगवान।।362


बिना समर्पण ज्ञान के, बिरथा हे सब बात।

शीश झुका गुरु के चरन, पाबे सुख सौगात।।363


चतुरई गुरु से नइ चलय, त्याग सबो पाखंड।

विनय भाव मन राख ले, पाबे ज्ञान अखंड।।364


गुरु के सम्मुख बैठ ले, सुन ले पावन बोल।

गुरु के अमरित ज्ञान ला, झन फोकट मा ताेल।।365


गुरु जो ताड़य प्रेम से, समझव कृपा अपार।

माली सींचय नेह से, कली खिले गुलजार।।366


जइसे प्रीत चकोर के, चंदा के सॅंग होय।

तइसे गुरु के प्रीत ला, समझे चेला कोय।।367


तन के सुध-बुध भूल के, गुरु चरनन ला देख।

मिटे जनम के पाप सब, बदले विधि के लेख।।368

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

ज्ञान सुधा गुरु मुख झरे, बहे सुजस के धार।

सत्यबोध मन मा जगे, जग जन बर उपकार।।369


रोम-रोम गुरु के ऋणी, शीश झुका गुरु पाँव।

दीन हीन ला गुरु दिये, सुख के शीतल छाँव।।370


जिनगी सूना गुरु बिना, जइसे जल बिन मीन।

ज्ञान बिना ये साँस हा, रहिथे सदा मलीन।।371


सतगुरु के हे बंदना, बारम्बार प्रनाम।

जेन दिखाये हे इहाँ, अविनाशी के धाम।।372


जिहाँ-जिहाँ गुरु पग धरे, तीर्थ उहाँ हे होय।

चरण धूलि मस्तक धरे, पाप रहे ना कोय।।373


धन्य पिता माता हवय, धन्य गुरु के ज्ञान।

जिंखर किरपा ले मिटे, जनम मरण के भान।।374


गुरु सुमिरन जे नर करय, आठ पहर दिन-रात।

ओखर रक्षा गुरु करय, देवत सुख सौगात।।375

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

बंदव सतगुरु के चरन, हरव तिमिर अज्ञान।

सत्यबोध उर मा जगय, गुरु के प्रति सम्मान।।376


कथनी तज करनी करव, गुरु के ये संदेश।

मिटे द्वेष अभिमान सब, रहे न कोई क्लेश।।377


अमरित जइसे गुरु बचन, कर लौ जी रसपान।

भव सागर ले तर जहू, पाके गुरु के ज्ञान।।378


मन मंदिर पावन करव, छोड़ सबो अभिमान।

घट-घट मा गुरु हे बसे, कहिथें संत सुजान।।379


दीया जलथे रात भर, सहिके कष्ट अपार।

पा सतगुरु के ज्ञान ला, मिट जाथे अँधियार।।380


चंदन सम शीतल करय, गुरु के अमरित ज्ञान।

क्रोध अगन तुरते बुझय, सुख के होय बिहान।।381


सत्यबोध गुरु राह मा, पग-पग मिलय प्रकाश।

दीप जलय गुरु नाम के, मिटय मोह के पाश।।382

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के महिमा का कहौं, शब्द न पावै पार।

कर दै रेगिस्तान मा, पानी के बोछार।।383


दुनिया काॅंच समान हे, सत्यबोध पहिचान।

भीतर रूप सॅंवार ले, गुरु के धर के ज्ञान।।384


खुद के अंतस झाॅंक लौ, गुरु के कहना सार।

भटकव झन संसार मा, तज गुरु ज्ञान विचार।।385


बोली मा मिश्री घुलय, मन मा रहय न खोट।

गुरु के अइसन ज्ञान धर, लगे न दुविधा चोट।।386


तीर्थ नहाये एक फल, संत मिले फल चार।

सतगुरु मिले अनंत फल, कहिथे ग्रंथ पुकार।।387


गुरु पारस के रूप ये, शिष्य लौह अज्ञान।

छूवत ही कंचन करय, बदले सकल जहान।।388


कोटि देव पूजत फिरे, मिटे न मन के ताप।

एक शब्द गुरु के जपे, मिटे सकल दुख पाप।।389

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के मूरत ध्यान धर, मुख से जप गुरु नाम।

चरण कमल ला पूज ले, सिद्ध होय सब काम।।390


हे अँधियारी कोठरी, ये संसार अनूप।

गुरु दीपक बन हे खड़े, लेके ज्ञान स्वरूप।।391


मन पंछी बन हे उड़त, तृष्णा के आकाश।

सतगुरु फंदा प्रेम के, फेंक करे निज दास।।392


गुरु सत मारग हे दिये, जिहाँ न पहुँचे धूप।

शीतल छाया प्रेम के, अनुपम सुख के रूप।।393


गुरु उपदेश सुहावना, सुनय लगा जे कान।

विष प्याला अमरित बने, पावय पद निर्वाण।।394


जे घट मा गुरु भक्ति हे, ते घट ईश निवास।

काम क्रोध भागे उहाँ, जिहाँ दास के वास।।395


गुरु चरनन के वंदना, नाशय विघ्न अनंत।

मंगल मोद प्रमोद पा, गावॅंय मिल सब संत।।396

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

ज्ञान दीप गुरु हा जला, मेटय दुख अँधियार।

बीच नदी पतवार बन, नाव लगावय पार।।397


सबद-सबद अमरित घुले, गुरु के बचन अमोल।

मूरख ला ज्ञानी करय, हृदय पटल गुरु खोल।।398


गुरु दीपक ये ज्ञान के, शिष्य बने लौ संग।

तिमिर मिटे अज्ञान के, चढ़य प्रेम जब रंग।।399


भटके ला सत राह दे, संशय करय विनाश।

बनके सच्चा देव गुरु, देवय ज्ञान प्रकाश।।400

---------------------------------------------------------------------

जइसे रात अँधेर मा, देवय चाँद प्रकाश।

वइसे ही गुरुदेव हा, मन मा भरय उजास।।401


ज्ञान रूप गागर भरे, गुरु सागर के नीर।

प्यास बुझाये आत्म के, मेट सकल भव पीर।।402


लोभ मोह भ्रम क्रोध ला, कर देथे गुरु दूर।

सत्य राह ला थाम लै, जेन रहय मद चूर।।403

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद - *गुरु महिमा*

आखर-आखर ज्ञान दै, जग के रीत सिखाय।

ये जग मा गुरु देव बन, सब ले पूज्य कहाय।।404


गुरु वाणी मा सार हे, कहिथे वेद पुरान।

आज्ञा गुरु के जे धरय, हे वो शिष्य महान।।405


अँधरा ला आँखी मिलय, बहरा ला तो कान।

गुरु किरपा ले मूक हा, गावय वेद पुरान।।406


जइसे माटी रूप लै, पा कुम्हार के हाथ।

वइसे सॅंवरय शिष्य हा, धरके गुरु के साथ।।407


मानय गुरु उपदेश जे, ओखर बेड़ापार।

दुख दरिद्र दुरिहा भगे, महके घर संसार।।408


सीप रूप मा शिष्य हे, स्वाति बूॅंद गुरु ज्ञान।

चमकय मुक्ताफल बने, पावत जग सम्मान।।409


गुरु के दीक्षा मंत्र ये, भय बाधा के काल।

नाम जपत गुरु के मिटे, सब्बो संकट जाल।।410

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

शिष्य उही जे झुक सके, गुरु चरनन के पास।

अहंकार तज के बनय, गुरु किरपा के दास।। 411


गुरु आज्ञा सिर माथ मा, और न दूजा काम।

गुरु के सत उपदेश मा, सुख के चारो धाम।।412


जन करिहौ गुरु ले कपट, गुरु से रख मन साफ।

कहिथें गुरु दरबार मा, होथे अवगुण माफ।।413


गुरु ला मानुस मान के, जे करथे अपमान।

वो नर यम के द्वार मा, पाथे कष्ट महान।।414


सतगुरु देव दयाल ये, देथे अक्षय दान।

शरण पड़े गुरु जीव के, रखय हमेशा ध्यान।।415


गुरु के किरपा के कहूं, हावय ओर न छोर।

खींच शिष्य ला लाय गुरु, धरे ज्ञान के डोर।।416


गुरु के आदर जे करय, पावय विद्या दान।

सकल कला मा हो निपुण, भर लै ऊॅंच उड़ान।।417

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

दुनिया दुख के धूप हे, गुरु छाया के रूप।

मन करथे शीतल सदा, गुरू दे ज्ञान अनूप।।418


गुरु सिखलाथे प्रेम अउ, गुरु सिखलाथे त्याग।

गुरु के पा सानिध्य ला, किस्मत जाथे जाग।।419


जे घर मा गुरु वंदना, होवय गुरु के ध्यान।

वो घर तीरथ धाम हे, बसे उहाॅं भगवान।।420


गुरु हा सच्चा मीत बन, संकट मा दै साथ।

जब भी फिसले पाॅंव ये, गुरु हा थामय हाथ।।421


गुरु के सेवा छोड़ जे, करथे अन्य उपाय।

मूरख बन जग मा फिरे, जनम अकारथ जाय।।422


सतगुरु बोलय सत्य ये, मिथ्या सब संसार।

नइया चढ़ गुरु नाम के, कर ले भव ला पार।।423


अज्ञानी ला ज्ञान दै, चतुरा ला सम्मान।

सत्यबोध गुरुदेव हा, हावय कृपानिधान।।424

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के पावन पाँव मा, पावॅंव परम विवेक।

मिटय मोह के आसरा, रहय सत्य बस एक।।425


अंधकार ला चीर के, गुरु हा भरय प्रकाश।

गुरुवर के सानिध्य मा, मिटय सकल संत्रास।।426


माटी ला कंचन करय, देवय ज्ञान अनूप।

शत शत गुरु ला हे नमन, जे हे ईश स्वरूप।।427


आखर-आखर मा बसे, गुरु के आशिर्वाद।

जेखर किरपा ले मिटय, मन के सब अवसाद।।428


शब्द-शब्द मोती भरय, वाणी अमरित धार।

देवय जब-जब ज्ञान गुरु, होवय जग उद्धार।।429


लोभ मोह अउ वासना, गुरु हा करय विनाश।

हृदय कमल हा खिल उठय, फइलय दिव्य प्रकाश।।430


टूटय निद्रा झूठ के, जागय आत्म विवेक।

कहना हे गुरुदेव के, सब मा ईश्वर एक।।431

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के सुन उपदेश जे, मन मा धारय ध्यान।

हो जावय भव पार वो, पा के उत्तम ज्ञान।।432


सिखलाथे गुरु प्रेम हा, सब ले बड़का धर्म।

कर लौ पर उपकार तुम, श्रेष्ठ इही ये कर्म।।433


गुरु हा देथे दृष्टि नव, बदल जथे संसार।

बैरी लागय मित्र तब, उपजै मन मा प्यार।।434


अमृतमयी गुरु के बचन, कर लौ जी रसपान।

हो जावय जिनगी सफल, पा के पावन ज्ञान।।435


गुरु के सम्मुख मौन रहि, सुन लेवव उपदेश।

दुरिहा वाद विवाद ले, मिट जाही सब क्लेश।।436


गुरु सेवा हे तप परम, गुरु सेवा हे ध्यान।

गुरु सेवा ले ही मिलय, जिनगी मा सम्मान।।437


जे डूबय गुरु प्रेम मा, वो होवय भव पार।

बइठे तट मा जे रहय, डूबय वो मझधार।।438

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के छाया हे सुखद, जइसे बरगद छाॅंव।

मन के मिटे थकान हा, छू के गुरु के पाॅंव।।439


गुरु के आसन हा हृदय, गुरु के मूरत नैन।

गुरु के सुमिरन से मिले, मन ला सच्चा चैन।।440


गुरु के वाणी तीर सम, बेधे मन के मोह।

पिघल जथे अभिमान सब, जइसे तप के लोह।।441


गुरु से मिलथे शांति सुख, गुरु बिन हे सब शून्य।

गुरु के सेवा से बड़े, और न कोई पूण्य।।442


धन्य-धन्य माता पिता, धन्य-धन्य वो ग्राम।

जिहाॅं जनम ले शिष्य हे, पाइस हे गुरु नाम।।443


गुरु के मूरत हा हृदय, रहय निरंतर पास।

साॅंसा के माला जपॅंव, गुरु मा रख विश्वास।।444


ये संसार असार हे, गुरु हे केवल सार।

जे जानय ये सत्य ला, ओखर बेड़ापार।।445

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के जय-जयकार हा, गूॅंजय चारो ओर।

जेखर किरपा ज्ञान से, होवय सुख के भोर।।446


असली धन हे गुरु कृपा, बाकी हे सब धूल।

गुरु चरनन के धूल ला, समझव जीवन मूल।।447


गुरु के करुणा देख के, पिघल जथे पाषाण।

शरण पड़े हर शिष्य के, गुरु करथे कल्याण।।448


गुरु हे दीप समान जे, स्वयं जलय दिन-रात।

जिनगी मा गुरु शिष्य के, भरय ज्ञान के बात।।449


गुरु चरनन के बंदना, करॅंव सुबह अउ शाम।

सहज रूप मा मिल गये, जिनगी ला गुरु नाम।।450


गुरु के वाणी ले झरे, ज्ञान सुधा के बूॅंद।

गुरु के पावन नाम ला, जप लौं आँखी मूँद।।451


गुरु हे आदि अनंत अउ, गुरु हे जग आधार।

नमन करॅंव गुरुदेव ला, नाव लगावव पार।।452

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

शब्द रूप मा गुरु बसे, अर्थ रूप संसार।

जेखर ऊपर गुरु कृपा, ओखर बेड़ापार।।453


गुरु के मूरत मन बसे, मिटे सकल संताप।

ध्यान धरय जे प्रेम से, धूलय मन के पाप।।454


भटके राही ला मिलय, सच के सच्चा छोर।

घन अँधियारी रात मा, गुरु हा उजला भोर।।455


गुरु के शिक्षा धूप सम, करय कपट के नाश।

फइलय बाहर भीतरी, बनके दिव्य प्रकाश।।456


सत्य अहिंसा प्रेम के, गुरु हा पाठ सिखाय।

शूल बिछे हर राह मा, गुरु हा फूल खिलाय।।457


गुरु समता संदेश दै, मेट ऊँच अउ नीच।

नीर प्रेम के सींचथे, गुरु नफरत के बीच।।458


गुरु हा सच्चा देव ये, गुरु हा सच्चा मीत।

सिखलाथे गुरु ज्ञान के, सब ला सुग्घर रीत।।459

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

परम पूज्य गुरुदेव के, चरन नवावॅंव माथ।

देवव ज्ञान प्रकाश गुरु, थाम हाथ मा हाथ।।460


अँधियारी संसार मा, गुरु हे दीपक रूप।

बगरत हे चहुॅंओर अब, ज्ञान अमृत के धूप।।461


गुरु के वाणी मा भरे, मिश्री सहीं मिठास।

सुनके मन हर्षाय हे, मिट जावय सब त्रास।।462


मन मंदिर मा बैठ गुरु, देवय शुभ संदेश।

मिट जावय मन के सबो, दुख ब्याधा अउ क्लेश।।463


गुरु के मूरत देख के, नैन जुड़ागे मोर।

जइसे चंदा ला तके, बनके चोर चकोर।।464


कासी-काबा का फिरॅंव, गुरु पग चारो धाम।

जप लेवॅंव गुरु नाम ला, उही बनाही काम।।465


गुरु मूरख ला ज्ञान दै, सिखलालय गुण बात।

जइसे कारी रात मा, होवय सुरुज प्रभात।।466

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

कहिथें ज्ञानी बात सच, समझौ सबो सुजान।

गुरु बिन उपजै ज्ञान नइ, कतको पढ़व पुरान।।467


बुद्धिहीन ला बुद्धि दै, ज्ञानहीन ला ज्ञान।

गुरु हे अइसन देव जे, सबके राखय मान।।468


चेतन करथे जीव ला, गुरु के अमरित बोल।

दुनिया मा गुरु के बिना, नइहे ककरो मोल।।469


तन सौपॅंव मन सौपॅंव, सौपॅंव धन अउ धाम।

गुरु के पावन पाॅंव मा, मिलथे सुख आराम।।470


गुरु हा सच्चा मीत ये, संकट मा दै साथ।

दुनिया जब मुख मोड़ लै, गुरु हा पकड़ै हाथ।।471


गुरु के कृपा अपार हे, लिखे न जाय बखान।

सात समुंदर मसि करॅंव, तभो न पूरय ज्ञान।।472


सतगुरु के सुमिरन करौ, मन पावन हो जाय।

पाप-ताप दुरिहा भगय, सुख के सावन आय।।473

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

ज्ञान भानु गुरुदेव बन, मेटय दुख के रात।

शीतल पावन छाॅंव मा, देवय सुख सौगात।।474


माटी के ये घट चतुर, गुरु देवय आकार।

थपकी मारय प्रेम के, रूप गढ़य मनुहार।।475


दुनिया के तीरथ सबो, गुरु चरनन के पास।

जे ध्यावय मन शुद्ध रख, पूरन होवय आस।।476


अँधियारी ला दूर कर, गुरु दिखलावय राह।

सतगुरु बन सच्चा सखा, लेवय मन के थाह।।477


बइठव गुरु के पास मा, मिटय हृदय के शूल।

बन जावय काँटा घलो, सुंदर पावन फूल।।478


गुरु पावन दरबार मा, सदा झुका चल शीश।

राजा हो या रंक हो, पावॅंय सब आशीष।।479


गुरु चरनन के बंदना, जिनगी के सिंगार।

गुरु किरपा मा हे छुपे, मोक्ष-मुक्ति के द्वार।।480

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु समान दाता नहीं, कर लौ जगत तलाश।

भवसागर ले तारथे, देके ज्ञान प्रकाश।।481


अंधकारमय सृष्टि मा, गुरु हा दीपक रूप।

ज्ञान किरण ले काटथे, भरम जाल के धूप।।482


आखर-आखर मा छुपे, गुरु के अमित प्रसाद।

जे सुमरय गुरु नाम ला, मिटे सकल अवसाद।।483


​पारस अउ गुरुदेव मा, अंतर बड़े सुजान।

लोहा ला कंचन करय, गुरु देके सम्मान।।484


गुरु गोविंद दूनों खड़े, मन मा उपजे भाव।

पहिली वंदन गुरु चरण, देथे ज्ञान पड़ाव।।485


महिमा गुरु के का कहॅंव, मुख मा शब्द न आय।

सागर ला स्याही करॅंव, तो भी लिखे न जाय।।486


धरती ला कागद करॅंव, लेखन सब बनराय।

गुरु गुन गाये ना मिटे, मन व्याकुल हो जाय।।487

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)21/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के वंदन जे करय, निशदिन आठों याम।

ओखर सँवरय भाग्य अउ, सिद्ध होय सब काम।।488


ज्ञान चक्षु गुरु हा दिये, खोल जगत के द्वार।

गुरु हा सत्य असत्य के, सीख दिये संसार।।489


संशय के अंधियार ला, गुरु किरपा दै काट।

सहज रूप मा खोल दै, जिनगी के सब बाट।।490


भ्रम के परदा हा गिरय, छूटय सब पाखंड।

गुरु हा सत्य बताय हे, हे ब्रह्मांड अखंड।।491


शब्द बाण गुरु के लगे, मिटय मोह के रोग।

परम तत्त्व के बोध हो, जगय भक्ति के जोग।।492


अहंकार के बेल ला, जड़ से देवय काट।

दिखलावय गुरु हा सदा, प्रेम विमल के बाट।।493


कागा ला हंसा करय, गुरु के अमरित ज्ञान।

वाणी मा मिश्री घुले, मिट जावय अज्ञान।।494

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

भूल-भुलइया हे जगत, पग-पग मा हे जाल।

गुरु पथदर्शक बन खड़े, काटय दुख के काल।।495


मानय गुरु उपदेश जे, अंतस बीच उतार।

ओखर जिनगी मा सदा, सुख के बहय बयार।।496


चतुर सयाना शिष्य जे, गुरु इच्छा पहचान।

सेवा मा तत्पर रहय, तज के सब अभिमान।।497


अहंकार ला त्याग के, बइठव गुरु के पास।

खाली बर्तन हा भरय, बरसय जब मधुमास।।498


सतगुरु ला तुम खोज लौ, तज के कपट विकार।

नइ होवय गुरु के बिना, जिनगी के उद्धार।।499


माटी ला मूरत करय, गुरु के पावन हाथ।

शिष्य सदा पावन बनय, पाके गुरु के साथ।।500

---------------------------------------------------------------------

कपटी शिष्य न पा सकय, गुरु के प्रेम अनूप।

जइसे ऊसर भूमि मा, बरसय मेघ कुरूप।।501

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के आसन ऊॅंच हे, ऊँचा ओखर नाम।

ध्यान लगा वंदन करॅंव, रोज सुबह अउ शाम॥502


नेकी गुरु के याद रख, जिनगी के हर मोड़।

नइया करही पार गुरु, मन के दुविधा छोड़॥503


गुरु सेवा से ही मिलय, विद्या के वरदान।

अमर हवय इतिहास मा, गुरु आरुणि के ज्ञान॥504


गुरु के छाया हे सुखद, जइसे बरगद छाँव।

धूप न दुख के छू सकय, छू ले गुरु के पाॅंव॥505


गुरु के समान देव नइ, गुरु समान नइ मीत।

इही परम गुरु सीख ये, इही धरम अउ रीत॥506

मन के संशय हा मिटय, जब हो गुरु के ओट।

ज्ञान कुल्हाड़ी से कटय, भ्रम के गहरा चोट॥507


​गुरु के कहना याद रख, कभू न होबे दीन।

ज्ञान बिना मानव सदा, जइसे जल बिन मीन॥508

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के मूरत मन बसे, अमरित बरसे अंग।

रंग चढ़े गुरु नाम के, चढ़य न दूजा रंग॥509


चरण धूल गुरुदेव के, चंदन ले भी खास।

तिलक लगा ले माथ मा, मिटे सकल संत्रास॥510


कल्पवृक्ष बन गुरु खड़े, देवत छाॅंव अनूप।

जे बइठय ये छाँव मा, मिट जावय दुख धूप॥511


वाणी मा अमरित घुले, नयनन करुणा धार।

अइसन गुरु के नाम मा, अर्पण हे सुख सार॥512

शीश कटय पर गुरु वचन, टूटय कभी न मीत।

इही ज्ञान के धर्म ये, इही शिष्य के रीत॥।513


मन के मैला धो सके, केवल गुरु के नाम।

गुरु चरनन मा हे छिपे, चारो तीरथ धाम॥514


गुरु के दर्शन लाभ हे, गुरु के चिंतन योग।

गुरु चरनन के वंदना, हर लेथे सब रोग॥515

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

​जड़-चेतन के भेद ला, गुरु पल मा समझाय।

जग मा असली गुरु उही, परम पूज्य कहलाय॥516


​गुरु के निंदा जे सुनय, पड़य नरक के द्वार।

गुरु ला ईश्वर मान के, भज ले बारंबार॥517


कहिथें शास्त्र निचोड़ सब, गुरु के पावन बोल।

जग के जम्मो रत्न धन, गुरु आगे बेमोल।।518


भरम मिटा संसार के, तोड़य दुख ज़ंजीर।

गुरु जइसे अउ कोंन हे, जे बदलय तकदीर॥519


सुख मा गुरु ला भूल झन, दुख मा धर ले ध्यान।

सुख दुख मा जे खुश रहय, शिष्य उही धनवान॥520


गुरु के छोड़ पनाह ला, भटके चारो ओर।

पंछी पिंजरा के बिना, पावय कहीं न छोर॥521


माया ठगनी जग ठगे, ठग न सकय गुरु-दास।

गुरु किरपा के जाल हा, तोड़य भ्रम के पाश॥522

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

माटी ला सोना करय, गुरु के अमरित बोल।

दुनिया के बाजार मा, गुरु किरपा अनमोल॥523


जइसे चातक बूँद बर, तरसे सावन मास।

वइसे तरसे शिष्य हा, गुरु दर्शन के आस॥524


अँधियारी में दीप सम, गुरु के हे विश्वास।

भटके राही ला मिलय, जइसे नूतन आस॥525


संशय के आँधी चलय, डगमग होवय नाव।

गुरु हा हाथ सम्हाल के, बदलय मन के भाव॥526


गुरु सेवा के फल सुखद, मन पावय विश्राम।

जग के तृष्णा हा मिटे, सुधरय बिगड़े काम॥527


​गुरु हा सच्चा बंधु हे, गुरु हा सच्चा मीत।

गुरु चरनन के प्रीति हा, जिनगी के हे जीत॥528


गुरु किरपा के मेघ जब, बरसय मन के खेत।

फसल उगय सद्ज्ञान के, मिटे पाप के रेत॥529

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*


दीपक मा जस तेल हे, चकमक मा जस आग।

तइसे गुरु के शब्द हे, जागय सोये भाग॥530


मन मक्का मन द्वारिका, मन काबा कैलास।

गुरु के आशीर्वाद ले, पूरन होवय आस॥531


चतुर पारखी गुरु मिले, परखय मन के खोट।

हीरा चमके धूल ले, सहिके छेनी चोट॥532


गुरु के बोली कड़ु लगे, दवा सरीखे जान।

रोग मिटावय मोह के, करय परम कल्यान॥533


​गुरु के सेवा हे सहज, कठिन हृदय के त्याग।

मन अर्पन गुरु पाॅंव मा, मिट जावय दुख दाग़।।534


​गुरु के सेवा से मिलय, सुख जिनगी के सार।

करे बिना गुरु साधना, निष्फल हे संसार॥535


गुरु के महिमा हे अमित, लिखे सकय नइ ग्रंथ।

कदम-कदम मा रोशनी, दिखलावय गुरु पंथ॥536

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा* 

भटके मन ला राह दै, थाम हाथ मा हाथ।

बनके तारनहार गुरु, सदा निभावय साथ॥537


​मिटे आवरण मोह के, टूटे भ्रम के जाल।

गुरु किरपा जेला मिले, सुख पावय तत्काल॥538


चरण शरण गुरु के मिले, होय भटकना बंद।

रोम-रोम मन खिल उठे, उपजे परमानंद॥539


गुरु हा अंजन ज्ञान के, दीस नैन मा डार।

मिटा तिमिर अज्ञान के, बगराइस उजियार॥540


सच्चा सुख तो गुरु चरण, बाकी सब दुख-मूल।

माया के संसार मा, मत जा मानव भूल॥541


सद्गुरु शब्द कबीर के, रवि नानक के ज्ञान।

मिलय नहीं गुरु के बिना, कोई पद निरवान॥542


भोर भये गुरु नाम ले, सांझ भये गुरु ध्यान।

गुरु के आदर मान कर, श्रेष्ठ इही हे ज्ञान॥543

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़ी) 25/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

श्रद्धा बिन विद्या नहीं, नहीं ज्ञान के वास।

गुरु चरनन मा जे झुके, शिष्य उही हे खास।।544


कोटि सूर्य चमके जिहाँ, अइसे गुरु के ज्ञान।

छॅंट जावय भ्रम कोहरा, पावॅंय पद निर्वाण।।545


कंचन बरसे ज्ञान के, सतगुरु के दरबार।

झोली भर-भर ले गए, सेवक अपरम्पार।।546


पाप कोटि सब कट गये, गुरु के एक निहार।

नजर दया के जब पड़य, रहय सुखी संसार।।547


गुरु करुणा के हे नहीं, जग मा कोई अंत।

अधम उधारन नाम हे, कहिथें ज्ञानी संत।।548


भव के दुख के हे दवा, गुरु चरनन के धूल।

हृदय लगावव प्रेम से, मिटे सकल दुख शूल।।549


गुरु के आसन पूज्य हे, रहव नहीं अज्ञान।

नम्र भाव से ही मिले, गुरु के पावन ज्ञान।।550

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु मूरत मन मा बसा, वाणी मा विश्वास।

लाही जिनगी मा सदा, गुरु हा ज्ञान प्रकाश।।551


अँधियारी संसार मा, गुरु हे चंदा सूर।

भटके मन ला राह दै, करके संशय दूर।।552


श्रद्धा बिन सूना जगत, भक्ति बिना सब छार।

गुरु प्रति निष्ठा ही करय, भवसागर ले पार।।553


देथे सत्य असत्य के, गुरु हा ज्ञान विवेक।

सार-सार ला थाम लै, तज के बात अनेक।।554


सुख-दुख दूनों एक हे, गुरु हा दिये सिखाय।

समता के चढ़ नाव मा, भव ला पार लगाय।।555


नाम-जपन के मंत्र दे, गुरु हा करे निहाल।

सत्य नाम के ओढ़नी, ओढ़े दीन-दयाल।।556


सतगुरु के वाणी हृदय, जे लेवय मन धार।

सत्यबोध खुशहाल वो, रहय सदा संसार।।557

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)26/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

दीया सुग्घर तेल बिन, जल न सकय दिन-रैन।

ज्ञान बिना गुरु के मनुज, पा न सकय सुख-चैन॥558


गुरु समान दाता नहीं, याचक सब संसार।

तीन लोक के संपदा, गुरु देवय उपहार॥559


नाव पुराना जर्जरा, नदिया गहरा धार।

बनके खेवनहार गुरु, कर देवय भव पार॥560


ज्ञान शब्द के छाँव मा, मिटे जगत के क्लेश।

सतगुरु के उपदेश ले, उपजय प्रेम विशेष॥561


भक्ति बिना नइ मुक्ति हे, मुक्ति बिना नइ चैन।

पा के सतगुरु के कृपा, खुले अलौकिक नैन॥562


लोहा ला कंचन करय, सतगुरु देव सुजान।

अँधरा ला आँखी मिलय, बहरा पावय कान॥563


कठिन डगर संसार के, काँटा भरे अनेक।

हाथ पकड़ गुरु के चलव, पाहू ज्ञान विवेक॥564

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026


दोहा छंद *गुरु महिमा*

गुरु महिमा गाये बिना, पार न पावय कोय।

जे पावय गुरु के कृपा, ओखर मंगल होय।।565


मिसरी ले भी मीठ हे, गुरु के अमरित के बोल।

भर देथे घट मा सदा, ज्ञान सुधा अनमोल।।566

गुरु करुणा के सिंधु हे, ममता के हे सार।

गुरु के पावन दृष्टि हा, कर देथे भव पार।।567


​ज्ञान विधाता रूप मा, गुरु हा प्रभु के दूत।

भय बाधा सब काटथे, देथे प्रेम अकूत।।568


सच्चा मारग गुरु दिखा, मेटय दुख संताप।

गुरु किरपा ले धुल जथे, जनम-जनम के पाप।।569


बिराजथे भगवान सब, जिहाँ बसे गुरु धाम।

अइसन पावन पाँव ला, बारंबार प्रणाम।।570


गुरु के आज्ञा शीश धर, जे हा बढ़ते जाय।

दुख विपदा सब हार के, आगू शीश झुकाय।।571

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

अहंकार ला मारथे, दे के विनय विवेक।

गुरु हा मन मा रोपथे, नेकी बात अनेक।।572


​काम क्रोध मद लोभ के, देवय ताला तोड़।

सत्य राह के ओर गुरु, देवय मन ला मोड़।।573


बुद्धिहीन ला बुद्धि दै, मूरख ला दै ज्ञान।

गुरु के महिमा देख के, अचरज हे विज्ञान।।574


भ्रम के चादर ओढ़ के, सोय रहिस ये जीव।

सतगुरु आके हे रखिस, सत्य धर्म के नींव।।575


मन के संशय धुंध ला, गुरु छाॅंटय तत्काल।

गुरु सूरज बनके उगे, शिष्य रहय खुशहाल।।576


खाद धरे संस्कार के, सींचय मन के बाग।

गुरु के शिक्षा से जगय, सोये सुंदर भाग।।577


वाणी ला संयम दिये, अंतस ला ठहराव।

जिनगी ला गुरु हे दिये, सुंदर सुखी भराव।।578

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

माटी के ये पिंड ला, रूप दिये अनमोल।

फूँक मार गुरु ज्ञान के, दिये शब्द शुभ बोल॥579


काया ला कंचन करय, गुरु के पारस ज्ञान।

लोहा हा सोना बनय, छू के चरन सुजान॥580


भवसागर के धार मा, नाव फँसे मँझधार।

आ के दीनदयाल गुरु, कर दिस बेड़ा पार।।581


बंदव गुरु के श्री चरण, जे हे दया-निधान।

भटके मन ला राह दै, देवय सच्चा ज्ञान।।582


महिमा गुरु के का कहॅंव, हावय अगम अपार।

दीन-दया के सिंधु गुरु, जग बर तारनहार।।583

हावय अवगुण अनगिनत, गुण ना कोई एक।

बनके ज्ञान विहान गुरु, राह दिखावव नेक।।584


बंदव मॅंय पग कंज गुरु, दया सिंधु सुख धाम।

जेखर किरपा ले मिटय, दुविधा कष्ट तमाम।।585

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

विघ्न हरन मंगल करन, गुरु के पावन नाम।

चरन धूलि मस्तक धरौं, होय सफल सब काम।।586


प्रथम पूज्य गुरुदेव हे, ज्ञान दीप के रूप।

तिमिर भगा अज्ञान के, कर दै विमल अनूप।।587


कोटि-कोटि बंदन करॅंव, बार-बार हर बार।

जिनगी ला गुरु हे दिये, जीये के आधार।।588


आदि अंत गुरु मध्य अउ, गुरु हे दीनदयाल।

जेन धरय गुरु के शरन, होवय उही निहाल।।589


नमन करॅंव गुरुदेव ला, जेखर बचन अनूप।

भरम जाल ला काट दै, धरे ईश गुरु रूप।।590


गुरु चरनन के प्रीत हा, हे जिनगी के सार।

येखर बिन मानुस जनम, समझव जी बेकार।।591


गुरु दीपक घट मा धरे, मिटय मोह के अंध।

ज्ञान विमल जागय तहाॅं, छूटय माया बंध।।592

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

कोरा कागज मा लिखय, गुरु हा नाम अनूप।

मेट जगत के कल्पना, दिखलावय सच रूप।।593


पत्थर ला पिघला करय, गुरु हा कोमल मोम।

ज्ञान सुधा रस घोल के, महकावय हर रोम।।594


दूर करय गुरु लोभ भ्रम, शंका करय विनास।

गुरु के शीतल छाॅंव मा, मिलय परम विश्वास।।595


नारायण गुरु रूप मा, हवय धरा मा आज।

शरन पड़े ला तारथे, रखथे सबके लाज।।596


गुरु चरनन के बंदना, देथे सुख आनंद।

सत्यबोध छिन मा कटय, चौरासी के फंद।।597


गुरु के सेवा ले बड़े, नइहे राज-सपाट।

गुरु चरनन के चाकरी, खोलय मोक्ष कपाट।।598


सत्यबोध गुरु उपनिषद, गुरु हे गीता ज्ञान।

गुरु हे चारो वेद अउ, गुरु हे ग्रंथ कुरान।।599

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

कोटि-कोटि बंदन करॅंव, गुरु देवय सुख ठौर।

गुरु के सम संसार मा, देव न कोई और।।600

---------------------------------------------------------------------

मन के पंछी उड़ चलय, पा के गुरु के नाम।

सच्चा तीरथ गुरु चरन, बसे जिहाॅं सुख धाम।।601


शरन गहे गुरुदेव के, मिटय हृदय के शूल।

चरन कमल के धूल मा, खिलय ज्ञान के फूल।।602


आखर-आखर ज्ञान दै, मन के मैल छुड़ाय।

शब्द बान से गुरु सदा, सोये भाग जगाय।।603


दिखलावय सत राह गुरु, दूर करय अज्ञान।

जग मा सब ले श्रेष्ठ हे, गुरु के ज्ञान महान।।604


तिमिर हटा संसार के, चमकय ज्ञान-दिनेश।

सतगुरु के महिमा बड़े, काटय मन के क्लेश।।605


एक शब्द गुरु के मिले, कटय जनम के पीर।

ज्यों दीपक के लौ छुए, भगय तिमिर गंभीर॥606

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)27/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

माली सींचय बाग ला, चुन-चुन कलियाँ आज।

गुरु सींचय इंसान ला, सुधरय सर्व समाज॥607


तुलना गुरु के का करॅंव, कोई सकय न तोल।

हीरा-मोती धूल सब, गुरु के बचन अमोल॥608


गुरु के बचन हरेक हा, मंत्र रूप कहलाय।

नाम जपत हर जीव ला, परम शांति मिल जाय॥609


सच्चा गुरु के कर परख, मन हो जावय शांत।

लोभ-मोह ले दूर रह, हर लेवय सब भ्रांत॥610


मान-बड़ाई त्याग के, समझय सब ला एक।

पूज्य उही गुरुदेव हे, जेमा भरा विवेक॥611


गुरु पूजा ही बंदगी, गुरु सुमिरन ही जाप।

गुरु दर्शन से मिट गइस, जनम-जनम के पाप॥612


भूल सकल संसार ला, गुरु मा हो मन लीन।

जइसे जल के संग में, सुखी रहय जस मीन॥613

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

​शीश नवावॅंव गुरु चरण, मिटय तिमिर अज्ञान।

जेखर छूवन से मिलय, घट मा अनुपम ज्ञान।।614


ज्ञान दीप घट मा जला, हर लेवय अज्ञान।

कर देवय पावन पटल, गुरु बनके भगवान।।615


भटका खात रहेंव मॅंय, सूझत रहिस न छोर।

उॅंगरी पकड़ बढ़ाय गुरु, लाये सुख के भोर।।616


आखर-आखर जोड़ के, सिखलाये सब सार।

गुरु किरपा ले हे मिले, जिनगी मा उपहार।।617


​बिना समर्पण शिष्य के, मिले न पूरा ज्ञान।

बंजर धरती मा कहाँ, उपजे सुंदर धान॥618


भक्ति भाव के पाठ पढ़, चेला चतुर सुजान।

गुरु के आज्ञा मान के, पावय पद निर्वाण॥619


​वाणी मा संयम रहय, मन मा रहय विवेक।

गुरु हा जिनगी मा भरय, सुंदर भाव अनेक॥620

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)28/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

माया ठगनी जग ठगय, ठग न पावय ज्ञान।

गुरु के किरपा ले जगत, पावय पद कल्यान॥621


कोठी-बँगला व्यर्थ सब, यदि न गुरु के वास।

गुरु के कुटिया मा मिलय, सच्चा सुख अहसास॥622


​गुरु चरनन के बंदना, जिनगी के सिंगार।

बिरथा हे गुरु के बिना, ये मानुस अवतार॥623


गुरु के पद-पंकज नमन, हरथे मन के ताप।

शरन पड़े हर जीव के, कट जाथे दुख पाप।।624


गुरु चरनामृत जे पियय, अमर करय वो प्रान।

काया हा कंचन बनय, मिलय मुक्ति के दान।।625


गुरु चरनन के बंदना, देथे वैभव मोद।

जइसे सुख शिशु पा जथे, पा के माॅं के गोद।।626


गुरु माली ये बाग के, हम ओखर हन फूल।

सींच-सींच जल ज्ञान के, दूर करय सब शूल।।627

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

वंदन गुरु के ज्ञान ला, वंदन गुरु के पाॅंव।

गुरु के आशिर्वाद ले, पाये हॅंव सुख छाॅंव।।628


रख दौ मुड़ मा हाथ गुरु, बनके बंदी छोर।

गावॅंव मॅंय गुनगान ला, सुबह शाम कर जोर।।629


गुरु के पाये ज्ञान बिन, जिनगी रहिस बिरान।

गुरु हा देइस पंख नव, ऊँच भरेंव उड़ान।।630


मित्र बंधु माता पिता, गुरु के रूप अनेक।

पर सच्चा गुरु हे उही, जे मा ज्ञान विवेक।।631


तन ला माँजय साबुना, मन ला माँजय ज्ञान।

मन माँजे ले गुरु मिले, समझव चतुर सुजान।।632


जोत जला गुरु ज्ञान के, मेटय दुख अँधियार।

जग बर गुरु के हे बड़े, दया धर्म उपकार।।633


कोंन चुका पाही भला, गुरु के ज्ञान उधार।

संकट मा गुरु हे खड़े, बन करके करतार।।634

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)29/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

माथ नवावॅंव गुरु चरन, करके पावन ध्यान।

गुरु के कृपा प्रसाद ले, मिट जावय अज्ञान।।635


गुरु हा सत्य-असत्य के, भेद सहज समझाय।

पा के पावन गुरु चरन, मन हर्षित हो जाय।।636


गुरु दीपक संसार मा, देथे ज्ञान प्रकाश।

तिमिर मिटय अज्ञान के, होवय कष्ट बिनाश।।637


​मातु-पिता जग जन्म दे, लावय ये संसार।

गुरु हा आतम ज्ञान दे, करय सिंधु से पार।।638


जग मा राह दिखाय गुरु, भर दै मन मा प्रीत।

ढोंग रूढ़ि ले दूर रख, सिखलावय सच रीत।।639


गुरु मूरत मन मा बसा, अंतस कर उजियार।

गुरु के करुणा से मिलय, सच्चा सुख संसार।।640


आखर-आखर मा छुपे, गुरु के अद्भुत ज्ञान।

जे समझय ये भेद ला, बन जावय विद्वान।।641

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

खोल चक्षु गुरु ज्ञान के, दिखलावय सच रूप।

मोह-निशा तम हा मिटय, बिखरय निर्मल धूप।।642


शब्द-बाण गुरु के लगे, मिटय मोह के जाल।

भय के सब बंधन छुटय, छू न सकय फिर काल।।643


भटके मन ला राह दै, गुरु के ज्ञान विचार।

जइसे अटके नाव ला, मिल जावय पतवार।।644


ज्ञान बीज बोवय हृदय, सींच प्रेम के नीर।

फल देवय गुरु पेड़ बन, मेटय अंतस पीर।।645


​जे न झुकय गुरु सामने, वो तरु सूखा जान।

एक हवा के झोंक से, टूट गिरय अभिमान।।646


सद्गुरु के टकसाल मा, ढलथे सुंदर प्रान।

खोटा सिक्का भी उहाँ, पा जाथे सम्मान।।647


बिन श्रद्धा शिक्षा मिले, टिके न मन के पास।

जइसे ऊसर भूमि मा, नइ उगय हरा घास।।648

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु वाणी गुरु ग्रंथ हे, गुरु के बचन प्रमान।

जे मानय ये बात ला, शिष्य उही गुणवान।।649


अहंकार ला त्याग के, जा गुरु के दरबार।

खाली झोली भर हँसय, पावय मया दुलार।।650


​चिंता-ज्वर ले हे जलत, ये सारा संसार।

गुरु वाणी पीयूष सम, शीतल करय विचार।।651


भूल-चूक ला माफ़ कर, अपना लौ गुरुदेव।

मॅंय मूरख अज्ञान हॅंव, नइ जानॅंव कुछ भेव।।652


गुरु हे पूजा आरती, गुरु हे पावन पाठ।

गुरु के चरनन मा झुकय, ये माटी के ठाठ।।653


​ज्ञान-सिंधु गुरुदेव ला, नमन करॅंव कर जोड़।

भवसागर के धार मा, झन देहव गुरु छोड़।।654


अंतस मा गुरुवर बसे, नैनन मा गुरु-रूप।

धन्य भये ये शिष्य हा, पा के ज्ञान अनूप।।655

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

बंदव गुरु के पग कमल, पावन निर्मल बोध।

कर दै तिमिर विनाश गुरु, मेट सकल अवरोध।।656


सत्यबोध सत राह मा, गुरु हे प्रथम प्रकाश।

भर देथे गुरु हा हृदय, अनुपम ज्ञान अकाश।।657


गुरु मूरत हे सादगी, गुरु करुणा भंडार।

भवसागर ले तारथे, गुरु के एक पुकार।।658


गुरु के दीक्षा मंत्र ये, गुरु के शिक्षा सार।

सत्यबोध गुरु के कृपा, करथे सब साकार।।659


निराकार ला रूप दै, घट मा भर दै ज्ञान।

गुरु समान ये सृष्टि मा, कोई नहीं महान।।660


भीतर के अँधियार हा, भागय कोसो दूर।

गुरु हा जब आलोक के, बिखरावय सिंदूर।।661


संशय के बैरी नदी, ले डूबोवय प्राण।

थामय गुरु हा हाथ ला, करय सदा कल्याण।।662

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

कपट क्रोध अउ मोह के, बँधन काटय धीर।

सत्यबोध गुरु ज्ञान ले, जाय बदल तकदीर।।663


आखर-आखर दीप हे, शब्द-शब्द अनमोल।

गुरु वाणी सुनके खुले, अंतर पट के पोल।। 664


ज्ञानहीन मनखे रहिस, पशु जइसे अज्ञान।

गुरु हा आके फूँक दिस, मानवता के जान।।665


भ्रम के जाला जाय कट, उपजय सत्य विचार।

गुरु के पावन दृष्टि हा, बदलय सब संसार।।666


साँस मरुस्थल हे तपत, गुरु हे घना बयार।

अमरित बरसे मेघ हा, जब खुलथे गुरु द्वार।।667


धन-दौलत सब व्यर्थ हे, ज्ञान बिना सब सून।

गुरु के किरपा से मिलय, सच्चा एक सुकून।।668


काया काँच समान हे, टूट पड़े इक बार।

जे मा गुरु हा भर दिये, अविनाशी टंकार।।669

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

​शीश नवावॅंव गुरु चरन, मिटे अमित अज्ञान।

अँधियारी ला दूर कर, देवय अनुपम ज्ञान।।670


गुरु जइसे संसार मा, नइहे कोनों मीत।

भवसागर ले तारथे, गुरु के पावन प्रीत।।671


मातु-पिता हर हे दिये, ये माटी के देह।

गुरु हा जेमा फूॅंक दिस, सत्य ज्ञान के नेह।।672


गुरु मूरत जब मन बसय, छूटय सब अभिमान।

चरण धूलि मस्तक लगे, हो जावय कल्यान।।673


तीर्थ नहाये का भला, जब मन मैल न जाय।

गुरु वचनामृत जे पियय, परम मोक्ष वो पाय।।674


गुरु गोविंद के राह के, सच्चा हे प्रतिमान।

बिन गुरु हंसा नइ तरय, गावय वेद पुरान।।675


आखर-आखर दीप हे, शब्द-शब्द हे जोत।

गुरुमुख ले हरदम बहे, ज्ञान सुधा के स्रोत।।676

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

भाग्य विधाता गुरु बने, रचथे नव इतिहास।

मूरख ला पंडित करे, भरथे ज्ञान प्रकाश।।677


गुरु किरपा के छाँव मा, सुख पावय संसार।

जइसे बंजर भूमि मा, बरसय जल के धार।।678


मिटय तिमिर अज्ञान के, होय उदित जब भान।

वइसे ही गुरु शब्द ले, जगय आत्म के ज्ञान।।679


तन मन अर्पन गुरु चरन, कूट-कूट अनुराग।

शिष्य उही जे पा सकय, गुरु सेवा के भाग।।680


​पारस रूपी गुरु मिले, शिष्य लौह के रूप।

छूवत ही कंचन करे, महिमा अगम अनूप।।681


शिरोधार्य गुरु के बचन, रहे न शंका कोय।

जे डूबय गुरु-ज्ञान मा, पार उही हा होय।।682


चंदन सम गुरु के हृदय, महकय सारा बाग।

जे हर जावय गुरु शरन, किस्मत जावय जाग।।683

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

तन ला मानौं बांसुरी, सुर गुरु देव सुजान।

जइसे मारय फूॅंक गुरु, वइसे निकलय तान।।684


चतुर चितेरा गुरु मिले, जिनगी रॅंगे अनंत।

पतझड़ कस ये देह मा, ला दै अमिय बसंत।।685


गाॅंठ बाॅंध गुरु के बचन, तज दे सब अभिमान।

सत्य पंथ मा जे चलय, बढ़य मान अउ ज्ञान।।686


काम क्रोध मद लोभ के, गुरु करथे संहार।

सच्चा गुरु के रूप मा, ईश्वर के अवतार।।687


शब्द सॅंभाले गुरु कहय, वाणी अमोल रत्न।

मन मंदिर पावन करय, बिन पूजा बिन यत्न।।688


गुरु हे दीपक ज्ञान के, स्वयं जलय दिन-रात।

आलोकित मन ला करय, बनके ज्ञान प्रभात।।689


गुरु के संगत ला धरे, कउॅंवा कोयल होय।

काॅंच बदल कंचन बनय, दोष न देखय कोय।।690

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

जिनगी के ये धूप मा, गुरु हे शीतल छाॅंव।

राह दिखावय मुक्ति के, गुरु के पावन नाॅंव।।691


वाणी ला वरदान दै, मति ला दै विस्तार।

गुरु के किरपा से खिले, साहित के संसार।।692


अहंकार के साख ला, देवय फेंक उखाड़।

श्रेष्ठ कहावय गुरु उही, खोलय बंद किवाड़।।693


सत्यबोध के साधना, गुरु चरनन के पास।

मन के संशय दूर हो, प्रगटय प्रेम प्रकाश।।694


गुरु चरनन के धूल हा, चंदन रंग अबीर।

तिलक लगावत ही मिटे, भय बाधा अउ पीर।।695


सत्य करावय बोध गुरु, बन करके करतार।

भ्रम के परदा फाड़ के, दिखलावय संसार।।696


सत्यबोध गुरु सतसई, गुरु किरपा से पूर्ण।

पढ़त सुनत हरसे हृदय, पाप होय सब चूर्ण।।697


शीश नवाॅं आभार हे, अर्पन श्रद्धा-मीत।

गुरु भवसागर तारथे, दे के अनुपम प्रीत।।698


शब्द-शब्द गुरु के चरन, अर्पन करॅंव सुजान।

'सत्यबोध' जग मा मिले, गुरुवर परम निधान।।699


मात्रा-वरन सँवार के, देइस छंद विशाल।

शिल्प सहित गुरुदेव हा, काटिस संशय जाल।।700

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु के आज्ञा शीश मा, धारॅंव आठो याम।

सत्यबोध के राह के, इही प्रथम विश्राम।।701


अमरित के वर्षा करय, गुरु के मीठा बोल।

सत्यबोध संसार मा, सब ले ये अनमोल।।702


गुरु दीपक ये ज्ञान के, अउ हे शिष्य पतंग।

जलके जे पावन भये, चढ़य ज्ञान के रंग।।703


कालचक्र के मार ले, गुरु हा राखय लाज।

भवसागर के पार मा, सिद्ध होय सब काज।।704


सत्यबोध के छाॅंव मा, मिटे सकल संताप।

गावत गुरु गुनगान ला, मिटे जनम के पाप।।705


सत्यबोध सतसई कहे, गुरु हे जग आधार।

ज्ञान बिना गुरु के लगय, सूना ये संसार।।706


पूरा होइस सतसई, गुरु चरनन के पास।

सत्यबोध घट मा रहय, हे ये अंतिम आस।।707

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/05/2026

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

सायली छंद

 सायली छंद - सायली छंद काव्य विधा है ।  यह एक लघु और सुगठित काव्य रूप है, जिसमें केवल 5 पंक्तियाँ और कुल 9 शब्द होते हैं。सायली छंद का मुख्य ...