शनिवार, 21 मार्च 2026

दोहा छंद - गुरु (छत्तीसगढ़ी)

 दोहा छंद- 

गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर।

अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।01


गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम।

तोर कृपा ले हे मिले, मोला जग मा नाम।।02


देहू शुभ आशीष गुरु, अरजी हे कर जोर।

मन के श्रद्धा फूल हा, अर्पित हे पग तोर।।03


गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावँव माथ।

देवत शुभ आशीष ला, थामे रखहू हाथ।।04


तन मन सब बलिहार हे, गुरु चरनन मा मोर।

करहू पूरन काज सब, अरजी हे कर जोर।।05


रखौ हाथ गुरु माथ मा, आशिष दौ घनघोर।

रोज नवावँव माथ मँय, पावन पग मा तोर।।06


जिनगी के हर साँस मा, लेवँव गुरु के नाम।

भटका झन खावँव कभू, लेहू गुरु जी थाम।।07


बरगद पीपर पेड़ कस, गुरु हा देथे छाँव।

अंतस ला शीतल करै, गुरु के पावन पाँव।।08


धर ले श्री गुरु के शरण, मिलही उँहे मुड़ाव।

गुरु बर पीपर छाँव कस, देही हृदय जुड़ाव।।09

 

गुरु सागर के सीप अउ, पावन गंगा नीर।

कर लौ जिनगी ला सफल, आवव गुरु के तीर।।10


दीया बन गुरु ज्ञान के, अंतस करय अँजोर।

जिनगी मा गुरु के बिना, नइ होवय सुख भोर।।11


दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय जग ला ज्ञान।

भेद नहीं मन मा रखय, मानय एक समान।।12


गावँव गुरु गुनगान ला, नित अंतस धर ध्यान।

गुरु किरपा ले हे मिले, नाम मान पहिचान।।13


गुरु के पावन पाँव के, बन जावँव मँय दास।

करौं भक्ति अरदास मँय, जब तक तन मा साँस।।14


नइ होवय गुरु के बिना, जिनगी के उद्धार।

बनके खेवनहार गुरु, नाव लगावय पार।।15


गुरुवर तरुवर ज्ञान के, देथे शीतल छाँव।

जिनगी होथे धन्य जी, पाके पावन पाँव।।16


जिनगी के हर साँस हा, गुरु पग मा बलिहार।

राहय मुड़ मा हाथ गुरु, विनय करौ स्वीकार।।17


बनके ज्ञान प्रकाश गुरु, उजियारी बगराय।

जिनगी के उद्धार बर, सत मारग दिखलाय।।18


आखर-आखर भाव भर, गावँव गुरु गुनगान।

चलत रहय ये लेखनी, महिमा करत बखान।।19


बलिहारी गुरु के चरण, परँव नवाँ मँय माथ।

जिनगी के हर मोड़ मा, थामे रखिहव हाथ।।20


दाता बन गुरु ज्ञान के, बाँटय सब ला ज्ञान।

गजानंद याचक बने, माँगय सुख वरदान।।21


श्रद्धा के पर्याय गुरु, निष्ठा के प्रतिमान।

रख समानता भावना, देथे सब ला ज्ञान।।22


लँगड़ा पर्वत लाँघथे, गूँगा पाय जुबान।

पंडित पोथी बाचथे, पाके गुरु ले ज्ञान।।23


भरथे गुण संस्कार गुरु, करथे दूर विकार।

जोत जलाथे ज्ञान के, हरथे मन अँधियार।।24


आथें गुरु दरबार मा, लोग अमीर गरीब।

पर पाथें सत ज्ञान ला, जेखर बड़े नसीब।।25


गुरु बरगद कस पेड़ बन, देथे शीतल छाँव।

कर लौ जिनगी धन्य सब, पाके पावन पाँव।।26


गढ़ अनपढ़ इंसान ला, गुरुवर ज्ञान लखाय।

सिरजै कुम्हार कस घड़ा, अंतस ला चमकाय।।27


गुरु महिमा गुनगान कर, होही बेड़ापार।

ये जिनगी गुरु के बिना, हवय कुलुप अँधियार।।28


बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।

बात गजानन ध्यान दौ, कर लौ गुरु गुनगान।।29


जिनगी मा गुरु ज्ञान बिन, नइहे कुछ अस्तित्व।

भव सागर ले पार बर, गुरु के समझ महत्व।।30


मनखे माटी के घड़ा, गुरुवर चाक कुम्हार।

जिनगी ला गुरु हे गढ़े, दिए ज्ञान उपकार।।31


गजानंद गुरु जौहरी, पारस ज्ञान समान।

सोना लोहा के करय, गुरु तुरते पहिचान।।32


गुरु अवगुण ला मेटथे, काटे भ्रम भय जाल।

सत रस्ता हम ला चला, ऊँच करावय भाल।।33


गुरु गीता गुरु बाइबिल, गुरु गुरुग्रंथ कुरान।

गुरु पग चारो धाम हे, गुरु सउँहत भगवान।।34


जिनगी मा गुरु के शरण, रहिथे जेन करीब।

वो मनखे राहय नहीं, अनपढ़ ज्ञान गरीब।।35


गुरु हरथे अभिमान ला, गुरु भरथे सद्ज्ञान।

गुरु पूजा मन से करौ, मिल जाही भगवान।।36


गुरु के दरजा हे सुनव, माता पिता समान।

मिले नहीं गुरु के बिना, सत्यबोध सद्ज्ञान।।37


तोर भरोसा हे खड़े, नइया हा मझधार।

बनके गुरु पतवार तँय, कर दे बेड़ापार।।38


करम धरम के सत मरम, गुरु देवय संदेश।

मानौ गुरु के सीख ला, पाहू सुख परिवेश।।39


गुरु काबा कैलाश अउ, गुरु हे चारो धाम।

गुरु मंदिर मस्जिद घलो, गुरु रहीम अउ राम।।40


पहला गुरु माता-पिता, दिये जन्म संस्कार।

दूजा गुरु शिक्षा दिये, ज्ञान जोत ला बार।।41


गुरु के ज्ञान अथाह हे, समझें नइ नादान।

गुरु गोविंद समान हे, कइसे करौं बखान।।42


जग मा शब्द अनंत गुरु, जानँय बिरला लोग।

गुरु महिमा गाये बिना, मिलय नहीं सुख जोग।।43


दीपक बन गुरु ज्ञान के, उजियारी बगराय।

मारग सत्य असत्य के, परख करे सिखलाय।।44


लाख कीमती धन भला, पर गुरु मोर अमोल।

जग मा गुरु के ज्ञान ला, कोई सकय न तोल।।45

दोहा छन्द- *गुरु*

गुरु हे पावन पूर्णिमा, गुरु अंजोरी रात।

गुरु सावन के मेघ बन, करय ज्ञान बरसात।।46


मन मन्दिर के देव गुरु, वंदन कर कर जोर।

जिनगी के बन नेंव गुरु, दै खुशियाली भोर।।47


देवय सुख उजियार गुरु, मेटय दुख अँधियार।

संस्कृति अउ संस्कार के, गुरु हावय भण्डार।।48


शब्द ज्ञान के खान गुरु, आशा अउ विश्वास।

वोखर बड़ा नसीब हे, गुरु हे जेखर पास।।49


गुरु के कोनों जाति नइ, नइहे कोनों धर्म।

देना सब ला ज्ञान सम, मानय पावन कर्म।।50


गुरु कबीर रविदास बन, गुरु बन घासीदास।

ज्योति पुंज गुरु बुद्ध बन, देथे ज्ञान उजास।।51


गजानंद गुरु के बिना, जिनगी भटका खाय।

बूंद अमिय गुरु ज्ञान के, जो पीये तर जाय।।52

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 09/07/2025

दोहा छन्द- *गुरु*

जप ले गुरु के नाम मन, होही बेड़ापार।

गुरु जिनगी के नाव के, हावय खेवनहार।।53


साँसा मा ले गुरु बसा, अंतस मा धर ध्यान।

बिन पाये गुरु ज्ञान ला, मिलय नहीं सम्मान।।54


नइ होवय गुरु हा गरू, धर ज्ञानी के गोठ।

भाव भजन गुरु के करे, होथे जिनगी पोठ।।55


हरथे गुरु अज्ञानता, ज्ञान जोत ला बार।

दूर बुराई ले रखे, दिसा दसा चतवार।।56


गुरुवर फूल गुलाब के, महकावय मन बाग।

गुरु के पा सानिध्य ला, खिल जाथे सुख भाग।।57


गावय गुरु गुणगान ला, सात खण्ड नौ दीप।

चमकय गुरु आशीष ले, सागर के भी सीप।।58


पेड़ बने गुरु ज्ञान के, देथे जुड़हा छाँव।

गजानंद अंतस जुड़ा, पावन पा गुरु पाँव।।59

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/07/2025


जिनगी भर पावत रहौं, गुरुवर आशीर्वाद।

छइँहा दौ गुरु ज्ञान के, हे अतके फरियाद।।60


करथे काम पुनीत गुरु, बाँटे जग ला ज्ञान।

चलथे जे गुरु राह मा, बनथे मनुज महान।।61


गुरु सागर ये ज्ञान के, मिलय कभू नइ थाह।

पालक बन गुरु शिष्य के, करे सदा परवाह।।62


गुरु ही ले जिनगी शुरू, गुरु ले जिनगी अंत।

गुरु ही ले पावत रहँव, सब दिन ज्ञान अनंत।।63


गुरु गुण ज्ञान गुनान कर, चलके गुरु के राह।

बिन गुरु के नइ तो मिले, ये जिनगी के थाह।।64


बाँटय ज्ञान विवेक गुरु, देवय सत सन्देश।

सीख धरे गुरु के मिटे, मानव मन से क्लेश।।65


साधिन गुरु सानिध्य ला, तुलसी सूर कबीर।

पाइन गुरु के ज्ञान ला, ऋषि मुनि संत फकीर।।66


बिन पाये गुरु ज्ञान ला, जिनगी काठ समान।

सीख धरे गुरु के बनय, मूरख मनुज महान।।67


सच्चा गुरु के कर चयन, शब्द ज्ञान पहिचान।

सही दिशा अउ प्रेरणा, मिलही तब सद्ज्ञान।।68


याचक बन गुरु ज्ञान के, माँगत हावँव भीख।

पाँव बढ़य सत राह मा, आप सिखाहू सीख।।69


बाँटे ले भी नइ पड़े, गुरु के ज्ञान अकाल।

जे पाथे वो हो जथे, पल मा मालामाल।।70


गुरु के आशीर्वाद ही, असली सुख-सम्मान।

नइ खावस भटका कभू, धरले गुरु के ज्ञान।।71


गुरुवर किताब ज्ञान के, गुरुवर कलम दवात।

देके आशिष अउ कृपा, करथे सुख बरसात।।72


गुरु मा रख विश्वास तँय, पाबे ज्ञान प्रकाश।

बनही सुखमय जिंदगी, होही दुख के नाश।।73


शीश झुका गुरु के चरण, करौं अरज कर जोर।

पावत राहँव मँय सदा, जिनगी मा सुख भोर।।74


जब ले हे धरती गगन, जब ले हे संसार।

तब ले हे गुरु ज्ञान के, जिनगी मा आधार।।75


चंदन पेड़ समान हे, गुरु के ज्ञान विचार।

अंतस ला शीतल करे, मेटे दोष विकार।।76


समय घलो ला एक गुरु, गजानंद जी मान।

देथे सुख-दुख सीख ये, बुरा-भला के ज्ञान।।77


गुरुवापन गुरु के करौ, मिले ज्ञान भंडार।

अँधियारी दुख के भगे, होथे सुख संचार।।78


ज्ञान खजाना बाँट के, गुरु करथे उपकार।

जिनगी रूपी नाव के, गुरु ये खेवनहार।।79


गुरु गंगा के धार ये, गुरु सागर के सीप।

गुरु पावस के बूंद ये, गुरु पूजा के दीप।।80


दुनिया के कल्याण बर, ज्ञान धरे गुरु गूढ़।

गुरु के पा सानिध्य ला, सुधरे मनखे मूढ़।।81


सुबो शाम गुरु नाम लौं, घट भीतर हे धाम।

अइसन दीन दयाल ला, बारम्बार प्रणाम।।82


बिनती हे कर जोर गुरु, दे दौ जनम सुधार।

ये जिनगी के नाव ला, कर दौ भव ले पार।।83


करथे बरसा ज्ञान के, गुरु सब बर घनघोर।

रखय नहीं मन भेद गुरु, बाँधय सुमता डोर।।84


आथे श्रद्धा भाव रख, गुरु के जेन करीब।

पाथे गुरु के ज्ञान ला, जाथे सँवर नसीब।।85


नानक घासीदास गुरु, गुरु कबीर रैदास।

बनके गुरु इन अवतरिन, मेटे जग के त्रास।।86

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गढ़थे सभ्य समाज गुरु, बाँटे नेक विचार।

भरथे शुभ संस्कार गुरु, दिये ज्ञान उपहार।।87

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


सिखलाथे गुरु धर्म धर, रीति-नीति संस्कार।

जिनगी जीये के कला, नेक कर्म व्यवहार।।88

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


करथे गुरु गुनगान ला, सतगुरु ग्रंथ कुरान।

कहिथे गीता बाइबिल, गुरु के ज्ञान महान।।89

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


मन मा श्रद्धा भाव रख, कर ले गुरु के ध्यान।

अंतस निर्मल हो जही, पा के गुरु के ज्ञान।।90

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


जिनगी के धर मर्म गुरु, देथे सीख सलाह।

गुरु के ज्ञान अथाह हे, मिलय नहीं जी थाह।।91

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


मँय अज्ञानी पाय हँव, ज्ञान कृपा गुरु छाँव।

महिमा करे बखान बर, शब्द कहाँ ले लाँव।।92

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


जिनगी मा गुरु ज्ञान के, पी लेना दू बूँद।

येती-ओती झन भटक, बिरथा आँखी मूँद।।93

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


पहिली पूजन गुरु चरण, जो जग खेवनहार।

करके ज्ञान प्रकाश गुरु, मेटे मन अँधियार।।94

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


शीश झुका गुरु के चरण, वंदन बारम्बार।

दिये ज्ञान उपहार गुरु, हे बड़का उपकार।।95

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु बिन जिनगी ब्यर्थ हे, गुरु बिन जग अँधियार।

धर ले गुरु के ज्ञान गुण, हो जाबे भव पार।।96

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


बँध जै गुरु ले प्रीत तब, दुनिया लागे मीत।

गुरु प्रति सेवा भाव ही, हावय रीत अतीत।।97

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु के ज्ञान प्रकाश ले, बगरे जग उजियार।

गुरु महिमा गुनगान ला, गावय नित संसार।।98

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


ध्यान लगा सुन लौ सदा, गुरु वाणी अनमोल।

बसा रखौ गुरु नाम ला, अंतस पट ला खोल।।99

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


नेक कर्म अउ धर्म के, सिखलाथे गुरु पाठ।

पाये बिन गुरु ज्ञान ला, ये जिनगी हे काठ।। 100

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


दिव्य अलौकिक ज्ञान के, गुरु रखथे भंडार।

बाँटय समान रूप ले, जिनगी के सुख सार।।101

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


कर ले गुरु के वंदना, भाग्य सँवरही तोर।

मिट जाही संकट सबो, सुख मिलही घनघोर।।102

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


पावन गुरु के पाँव मा, रोज नवावँव माथ।

कर दौ जिनगी ला सफल, बन गुरु दीनानाथ।।103

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


रूप हवय गुरुदेव के, निराकार साकार।

गुरु के निर्मल ज्ञान ले, आलोकित संसार।।104

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


माँगत हँव आशीष गुरु, अंतस पट ला खोल।

दे दव गुरुवर ज्ञान के, धन मोला अनमोल।।105

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


भरथे मन मा भाव गुरु, कर्म करे बर नेक।

दिखलाथे सत राह गुरु, दोष बुराई छेक।।106

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु के ज्ञान गुरुत्व ले, जग के हे कल्यान।

गुरु के धर संदेश ला, बनथें मनुज महान।।107

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु ला वंदन दंडवत, करौं सुबह अउ शाम।

बोझिल जिनगी के डगर, हे गुरु लेवव थाम।।108

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


नेक कर्म ले गुरु मिले, ध्यान धरे ले ज्ञान।

संगत गुरु के दूर जे, मूढ़ उही इंसान।।109

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


कर लौ गुरु गुनगान ला, रइहू सदा प्रसन्न।

सुख जिनगी रख भाव गुरु, ज्ञान दिये सम्पन्न।।110

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु महिमा ले बढ़ इँहा, नइहे काहीं और।

दूर भक्ति गुरु के रहे, मिले नहीं जग ठौर।।111

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


संगत संत सुजान गुरु, निर्मल करय सुभाव।

सतगुरु सुमिरन ले मिटे, अंतस के भटकाव।।112

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


जिनगी मा गुरु ज्ञान ले, होथे नवा बिहान।

गुरु के पा आशीष ला, बनथें मनुज महान।।113

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु जिनगी के प्रेरणा, गुरु सुख के आधार।

गुरु माली बन ज्ञान के, बाग करे गुलजार।।114

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


गुरु गीता संदेश ये, गुरु बाईबिल सार।

गुरु गरुग्रन्थ कुरान ये, गुरु ज्ञानी करतार।।115

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


नित बंदँव श्री गुरु चरण, झुका अपन मँय माथ।

सुख मा दुख मा आप गुरु, रखहू मुड़ मा हाथ।।116

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


ज्ञान दीप ला बार के, हरथे सब अँधियार।

नइ होवय गुरु के बिना, दुनिया मा उजियार।।117


अबड़ लुटाथे गुरु मया, देथे शिक्षा दान।

गुरु के चरन पखार के, पाथें सब सम्मान।।118


भटकत हंसा तार दै, मेटय मन के पीर।

गुरु के महिमा हे अगम, जइसे गंगा नीर।।119


सत के मारग दै बता, रखय कपट ले दूर।

शीश नवा गुरु के चरन, ज्ञान मिले भरपूर।।120


बार ज्ञान के दीप गुरु, मेटय मन अँधियार।

गुरु के पावन पाँव मा, वंदन बारम्बार।।121


कथरी ओढ़े ज्ञान के, गुरु जी रचे विधान।

जिनगी मा रख सादगी, जग मा पाथे मान।।122


माटी कस अनगढ़ रहय, लइका मन के जान।

गुरु जी गढ़य कुम्हार कस, सब ला एक समान।।123


जनम दिये दाई ददा, गुरु जी ज्ञान विवेक।

सहीं झूठ के कर परख, राह दिखावय नेक।।124


ज्ञान मिलय नइ गुरु बिना, चाहे पढ़व पुरान।

गुरु ही भव ले तारथे, कहिथे ग्रंथ कुरान।। 125

02/05/2026

दोहा छंद- *गुरु महिमा*


बिन स्वारथ के बाट गुरु, देखावय दिन-रात।

अड़बड़ गहिर विचार हे, ओखर मन के बात।। 126


गुरुवर घड़ा कुम्हार कस, गढ़थे रूप अनूप।

चेला ला गुरु वइसने, देवय गजब स्वरूप।।127


तिरबेनी कस छाय हे, गुरु के आशिष छाँव।

सुख जिनगी रद्दा मिलय, धर ले गुरु के पाँव।।128


माई-कोरा ले निकल, गुरु कोरा जब जाय। 

लइका बनय सुजान तब, सुग्घर मान कमाय।।129


सागर कस गंभीर गुरु, हिरदे रखय उदार।

सत्यबोध गुरु के चरण, बहिथे सुख के धार।।130 

05/05/2026

गुरु गंगा के धार अउ, गुरु हे खेवनहार।

भटकत हंसा गुरु बिना, नइ होवय भव पार।।131


गुरु हे संत कबीर अउ, गुरु हे घासीदास।

ढोंग रूढ़ि पाखण्ड के, तोड़िन जे मन फाॅंस।।132


गुरु धरती आकाश अउ, गुरु हे सुरुज समान।

करथे जग उपकार गुरु, बनके ज्ञान विधान।।133


पा के गुरु किरपा चढ़य, लॅंगड़ा ऊॅंच पहाड़।

अँधरा सुख सपना गढ़य, हरहा भरय दहाड़।।134


गुरु दीपक बन ज्ञान के, हरय तिमिर अज्ञान।

अंतस ला उजियार कर, दिखलावय भगवान।।135


शून्य हृदय ला शब्द दय, गढ़-गढ़ सुंदर रूप।

शिष्य सँवारय गुरु सदा, बनके ज्ञान अनूप।।136


गुरु के महिमा हे अगम, सागर ले गंभीर।

हर लेवय गुरु ज्ञान ले, अंतस के सब पीर।।137

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2026

दोहा छंद- *गुरु महिमा*


गुरु जी ज्ञान विचार दय, मेटय मन के दोष।

दूर करय भ्रम भावना, देवय सुख संतोष।।138


गुरु ये रूप कुम्हार के, माटी शिष्य शरीर।

गढ़य घड़ा कस देह गुरु, चमकावय तकदीर।।139


नाॅंव कमावय शिष्य हा, पा गुरु आशिष छाॅंव।

सुख के चारों धाम हे, गुरु के पावन पाॅंव।।140


बलिहारी श्री गुरु चरण, हे ये जिनगी मोर।

बाॅंधे रखहू आप गुरु, सदा दया के डोर।।141


जब तक तन मा साॅंस हे, जपौं सदा गुरु नाम।

करौ कृपा घनघोर गुरु, होय सफल सब काम।।142


मिलथे बड़ सौभाग्य ले, गुरु के आशिर्वाद।

मानौं सच भगवान मॅंय, मातु-पिता के बाद।।143


होगे हावय धन्य गुरु, एक जनम ये मोर।

बिनती हे अगले जनम, पावॅंव किरपा तोर।।144

✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

गुरु महिमा गुनगान ला, गावॅंव मॅंय दिन-रात।

दिये हवय गुरु ज्ञान के, मोला सुख सौगात।।145


ये ज़िनगी मा हे मिले, गुरु किरपा जी सार।

कइसे पाहूॅं मॅंय चुका, गुरु के ज्ञान उधार।।146


मुक्ति मिलय नइ गुरु बिना, भटकत रहिबे रोज।

सत रसता नित देखबे, कर ले गुरु के खोज।।147


पहिली गुरु हे मातु हा, पिता ज्ञान के रूप।

गुरु चरनन मा स्वर्ग हे, जइसे छइँहा-धूप।।148


माटी कस हे देह ये, गुरु हा आय कुम्हार।

चुपके-चुपके ठोक के, देवय रूप सॅंवार।।149


सब तीरथ गुरु के चरन, करथे सुख धर वास।

मिले जिहाॅं गुरु के कृपा, मिटय भरम अउ त्रास।।150


पाये बिन गुरु ज्ञान ला, भटकत रहिथे जीव।

गुरु के चरन पखार ले, बनही पक्का नींव।।151

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

पा के गुरु के ज्ञान ला, बनथे शिष्य सुजान।

गढ़थे सभ्य समाज अउ, लाथे नवा बिहान।।152


देथे शुभ संस्कार गुरु, मन के मेट विकार।

बनके खेवनहार गुरु, नाव लगाथे पार।।153


गुरु बिरवा बन ज्ञान के, देथे शीतल छाॅंव।

पा के गुरु सानिध्य ला, मिट जाथे भ्रम घाॅंव।।154


मेटय गरब गुमान के, अंतस ले गुरु फाॅंस।

गा ले गुरु गुनगान मन, जब तक तन मा साॅंस।।155


छोड़ सुवारथ ला सबो, गुरु हा देथे ज्ञान।

गुरु के दरजा ऊॅंच हे, कहिथे ग्रंथ कुरान।।156


का सादा रंगीन का, चिनहा देथे नीत।

सत्य डगर मा ले जथे, गुरु हा बनके मीत।।157


गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु हे, गुरु हा आय महेस।

जेकर मन मा गुरु बसे, दूर होय सब क्लेस।।158

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

मातु-पिता जग जन्म दय, गुरु हा देवय ज्ञान।

सत मारग जे ले चलय, गुरु हे उही महान।।159


धरती बर भगवान गुरु, सागर बर ये सीप।

जग बर ज्ञान प्रकाश गुरु, अँधियारी बर दीप।।160


पूजा के ये थाल गुरु, मन मंदिर के देव।

मानय सब ला एक गुरु, छोड़ सबो भ्रम भेव।।161


गुरु चंदन के पेड़ बन, महकावय मन द्वार।

गुरु महिमा ला कोंन कब, पाइस हावय पार।।162


जिनगी के हर साॅंस मा, राहय गुरु के नाम।

करही भव ला पार गुरु, गुरु चरनन लौ थाम।।163


चमकावय नित लेखनी, गुरु जी बनके स्याह।

पड़य नहीं तो कम कभू, गुरु के ज्ञान अथाह।।164


सत्यबोध गुरु के चरन, जस गंगा के धार।

धोवय मन के पाप ला, लेवय नाव उबार।।165

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/05/2026


दोहा छंद- *गुरु महिमा*

कहिथें ओर न छोर हे, गुरु के ज्ञान अनंत।

महक उठे पतझड़ घलो, जइसे फूल बसंत।।166


गुरु के आशीर्वाद ले, होय सफल सब काम।

गुरु के सेवा ला करत, मिलथे सुख के धाम।।167


गुरु ला अंतस ले बिठा, गुरु हे भ्रम के काल।

गुरु अवगुण ला मेटथे, बनथे दुख मा ढाल।।168


गुरु के पावन पाँव मा, रोज नवावॅंव माथ।

पावॅंव नित आशीष गुरु, मुड़ मा रखहू हाथ।।169


गुरु के सेवा कर मनुज, गुरु ला मन मा धार।

शिष्य परम बन जोड़ ले, गुरु ले मन के तार।।170


दिखलाथे गुरुवर दिशा, दशा रहे विपरीत।

गुरु ले बढ़के हे नहीं, ये दुनिया मा मीत।।171


सब ला अलगे मोर गुरु, जेखर सुग्घर बैन।

दर्शन जेखर पाय बर, रहिथे मन बेचैन।।172

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/05/2026


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