*आ जाओ परदेशी बलमा*
तन है प्यासा मन है प्यासा, प्यासा है दिन रात।
नैन बदरिया बरसे जमकर, सावन की सौगात।।1
नैन बदरिया बरसे जमकर, सावन की सौगात।।1
विरह - वेदना सजा मौत सी, पास खड़ी है रोज।
पलक झपकते उम्मीदों की, पास ख़ुशी को खोज।।2
पलक झपकते उम्मीदों की, पास ख़ुशी को खोज।।2
साथ गूँजती है तन्हाई, बनकर चाँद चकोर।
तड़पाती हैं यादें उनकी, बनकर सूरज भोर।।3
तड़पाती हैं यादें उनकी, बनकर सूरज भोर।।3
सावन झूले लगे झूलने, फूल खिले हैं बाग़।
दहक रहा है शोला जैसे, बदन लगी जो आग।।4
दहक रहा है शोला जैसे, बदन लगी जो आग।।4
राह ताकती नैना बैठी, पिया मिलन की आस।
आ जाओ परदेशी बलमा, अब ना करो उदास।।5
आ जाओ परदेशी बलमा, अब ना करो उदास।।5
इंजी.गजानंद पात्रे *"सत्यबोध"*
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें