*हरिप्रिया छंद/चंचरीक/चंचरी/चर्चरी छंद ---*
*विधान* :-- यह चार चरणों का सममात्रिक दंडक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 46 मात्राएँ होती है । दो दो या चारों चरण समतुकांत हो। प्रति चरण 7 षटकल हो तथा आंतरिक समांत हो। चरणांत में एक गुरु आवश्यक हैं। यति पूर्व दीर्घ लघु आवश्यक
*यति*-- इसके 12,12,12,10 मात्राओं पर यति आवश्यक।
कल संयोजन--
12= 2222121
10= 22222
विधान:-
प्रथम 12,12 पर यति पूर्व जगण (121) या 21 (दीर्घ लघु) किंतु इस त्रिकल के पूर्व में यदि त्रिकल हो तो वह 21 हो
12= 3+3+3(21)+3(21) या 4+2+3(21)+3(21) या 4+4+4(121)जगण
10= (3+3+4 या 4+4+2 या 4+2+4)
*माधव अद्भुत विशाल, जीवन करते कमाल, दूर करें सब मलाल, श्रीकृष्ण मुरारी।*
*नायक जग के प्रधान, भरते हिय शुभ विधान, कष्टों से दें निदान, महिमा अति न्यारी।।*
*धर्म ज्ञान नीति यज्ञ, सत्य कर्म विशेषज्ञ, भाव दिए सदा विज्ञ, बन के शुभकारी।*
*हृदय प्रेम सजा आज, जीवन कर सफल काज, जगत रखें सभी लाज, हैं पालनहारी।।*
*जगत दिए सदा प्रीत, राधा के बने मीत, हृदय समर देख जीत, प्रीति हृदय धरिए।*
*पहने है मोर ताज ,बंसीधर छेड़ साज, आये हैं किसन आज, मधुर पान करिए।।*
*दर्शन दें मुझे नाथ, सदा झुका चलें माथ, संकट में पकड़ हाथ, नेह भाव भरिए।*
*पूजन अर्चन प्रवाह, जीवन दे सदा राह, प्रेमा की परम चाह, कृष्ण चरण गहिए।।*
*संदर्भित ग्रंथ--- छंद कलश*
*-- योगिता चौरसिया 'प्रेमा' (प्रेरक)*
*--- बिलासा छंद महालय*
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक-- आज शरण आये (1 युग्म)*
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करो कष्ट का निदान, सुख का प्रभु दो विधान, करूँ सदा भक्ति गान, आज शरण आये।
रख मैं श्रद्धा अपार, सुन लो मेरी पुकार, बना खड़ा भक्त द्वार, झोली भर जाये।।
करो पाप का विनाश, हो न कभी मन हताश, भरो प्रेम का प्रकाश, हृदय जगमगाये।
गजानंद सच प्रचार, करे झूठ पर प्रहार, मुझको प्रभु दो निखार, मन है घबराये।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया दण्डक*
*प्रति पंक्ति -- 46 मात्रा*
*सृजन शीर्षक-- विकट समय आया। (1 युग्म)*
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संविधान पर प्रहार, रखे लोग हैं विकार, करें सभी हम विचार, विकट समय आया।
राजनीति दागदार, कूटनीति कटु कटार, करे सत्य तार-तार, कौन समझ पाया।।
जाति धर्म में विभेद, किया नहीं ग्रंथ वेद, एक सभी साँस स्वेद, रक्त रूप काया।
सभी लोग हो समान, देश बने तब महान, गजानंद सच जुबान, सबको बतलाया।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक-- सद्गुरु घर आये। (2 युग्म)*
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ढोल बजे हैं मृदंग, लोगों में है उमंग, भक्ति भाव की तरंग, सद्गुरु घर आये।
कृपा करो गुरु अपार, सजे खुशी की बहार, गाँव-गली द्वार-द्वार, घर आँगन भाये।।
पूर्ण करो सत्य काज, करे सदा शिष्य नाज, चंदन को माथ साज, सद्गुरु कहलाये।
दीन दुखी हूँ गरीब, धन्य कहूँ मैं नसीब, खुद को सद्गुरु करीब, गजानंद पाये।।
सद्गुरु जी हो महान, सीप-दीप के समान, करो मुझे ज्ञानवान, महिमा नित गाऊँ।
करो दया गुरु अशेष, मिट जाये द्वंद्व-द्वेष, बढ़े मीत रूप श्लेष, खुशियाँ बरसाऊँ।।
बन जाऊँ प्रीत-मीत, गाऊँ मैं प्रेम गीत, जीत हुआ अब प्रतीत, सबको बतलाऊँ।
दिव्य ज्ञान का प्रकाश, दूर किया है हताश, पूर्ण हुये अब तलाश, बलिहारी जाऊँ।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक-- चुप्पी प्रिय तोड़ो (2 युग्म)*
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करूँ शुरू आज बात, रात रहे या प्रभात, तुझे सभी राज ज्ञात, चुप्पी प्रिय तोड़ो।
नैन रहे अब निहोर, हुआ प्रिये मैं विभोर, प्रीत रीत बाँध डोर, दिल से दिल जोड़ो।।
हुआ तुम्हीं से लगाव, प्रेम किया है प्रभाव, बिन तेरे है अभाव, साथ नहीं छोड़ो।
रखूँ सदा साथ चाह, बहे प्यार का प्रवाह, लगन लगी है अथाह, राह नही मोड़ो।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक-- चंचल मन मेरा। (2 युग्म)*
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लाना जीवन बहार, पाना खुशियाँ अपार, देखा सपनें हजार, चंचल मन मेरा।
जाना मत साथ छोड़, सॉंसो से साँस जोड़, मिले भले कष्ट मोड़, चाहे दुख घेरा।।
बाँध प्रिये प्रीत डोर, नैन रहा है निहोर, हुआ आज मन विभोर, देख रूप तेरा।
देना तुम बात ध्यान, हम दोनों एक जान, दिल धड़कन भी समान, लेना है फेरा।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक_दुनिया का मेला (2 युग्म)*
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मिले प्रिये प्रीत मीत, हार नहीं हो प्रतीत, जाऊँ मैं जंग जीत, जीवन का खेला।
दिखे नहीं ओर छोर, नैन रहा हूँ निहोर, तुमसे है चाह भोर, पावन शुभ बेला।।
तुम हो अनुनाद प्रेम, चाहत है नेक नेम, बन जाओ मेघ हेम, बरसो बन रेला।
रखो नहीं द्वेष द्वंद, पुरवाई मंद-मंद, बात कहे गजानंद, सजा रखो मेला।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक-- झुलस रही धरती। (2 युग्म)*
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गायब है नींद चैन, ताक रही राह नैन, शीतल हो प्रात रैन, झुलस रही धरती।
पेड़ कटे नित हजार, उजड़ रहे हैं बहार, कौन है जवाबदार, भूमि पड़ी परती।।
गर्मी लू ताप ताव, पेड़ करें हैं बचाव, रोके मिट्टी कटाव, देते खुशहाली।
चलो करें एक काम, भावी पीढ़ी बनाम, हाथ सभी पेड़ थाम, लायें हरियाली।।
समझो सब पेड़ पीर, साथी बन यह समीर, बादल से खींच नीर, बारिस करवाता।
हितकारी बन समाज, करे सदा लोक काज, बनकर यह वैद्य राज, औषध दे जाता।।
मानव अब जाग-जाग, करो नहीं तुम सुराग, झोंक मत विकास आग, स्वार्थी तुम हो के।
है विकास बस तलाश, हुआ स्वयं का विनाश, गजानंद है निराश, पेड़ छाँव खो के।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक-- झूठ नही बोलो। (2 युग्म)*
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करो ढोंग पर प्रहार, सदा सत्य का प्रचार, मिट जाये भय विकार, झूठ नहीं बोलो।
छोड़ सभी दुख विलाप, करो राम नाम जाप, मिटे मोह त्रास पाप, मन का पट खोलो।।
अनुनय है बार-बार, कर्म राह को सुधार, बोझ धरा का उतार, नैन नीर धो लो।
जाति-धर्म का बुखार, चढ़ा नशा है खुमार, मानवता दागदार, जहर नहीं घोलो।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक-- वह साथी छूटा। (2 युग्म)*
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सूर्य चन्द्र है गवाह, लगन लगी और चाह, प्रेम किया था अथाह, वह साथी छूटा।
हुआ आज मैं अनाथ, छूट गया मीत साथ, चले गए छोड़ हाथ, किस्मत अब फूटा।
स्वप्न्न दिखा वो हजार, चला कष्ट का बयार, छीन लिये सुख बहार, किये प्रीत झूठे।
गजानंद बेकरार, सुनने तेरी पुकार, करे रोज इंतजार, रहो नहीं रूठे।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/05/2024
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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*
*प्रति पंक्ति-- 46*
*यति-- 12,12,12,10*
*सृजन शीर्षक- तुमसे जीवन है । (2 युग्म)*
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रहो सदा पास-पास, करो मुझे मत उदास, बने प्रेम का सुवास, तुमसे जीवन है।
तुमसे दिन रात शाम, रखो मुझे आप थाम, तभी मिलेगा मुकाम, कहता यह मन है।।
तुमसे है प्रीत चाह, प्यासी है ये निगाह, प्रेम करो अब अथाह, दिल में तड़पन है।
गजानंद बार-बार, मन में खिलते बहार, पाऊँ खुशियाँ हजार, प्रेम रतन धन है।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छतीसगढ़) 01/06/2024
