मंगलवार, 28 मई 2024

हरिप्रिया छंद/चंचरीक/चंचरी/चर्चरी छंद --

 *हरिप्रिया छंद/चंचरीक/चंचरी/चर्चरी छंद ---*

*विधान* :-- यह चार चरणों का सममात्रिक दंडक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 46 मात्राएँ होती है । दो दो या चारों चरण समतुकांत हो। प्रति चरण 7 षटकल हो तथा आंतरिक समांत हो। चरणांत में एक गुरु आवश्यक हैं। यति पूर्व दीर्घ लघु आवश्यक

*यति*-- इसके 12,12,12,10 मात्राओं पर यति आवश्यक।


कल संयोजन--

12= 2222121

10= 22222

विधान:-

प्रथम 12,12 पर यति पूर्व जगण (121) या 21 (दीर्घ लघु) किंतु इस त्रिकल के पूर्व में यदि त्रिकल हो तो वह 21 हो

12= 3+3+3(21)+3(21) या 4+2+3(21)+3(21) या 4+4+4(121)जगण 

10= (3+3+4 या 4+4+2 या 4+2+4)

*माधव अद्भुत विशाल, जीवन करते कमाल, दूर करें सब मलाल, श्रीकृष्ण मुरारी।*

*नायक जग के प्रधान, भरते हिय शुभ विधान, कष्टों से दें निदान, महिमा अति न्यारी।।*

*धर्म ज्ञान नीति यज्ञ, सत्य कर्म विशेषज्ञ, भाव दिए सदा विज्ञ, बन के शुभकारी।*

*हृदय प्रेम सजा आज, जीवन कर सफल काज, जगत रखें सभी लाज, हैं पालनहारी।।*

*जगत दिए सदा प्रीत, राधा के बने मीत, हृदय समर देख जीत, प्रीति हृदय धरिए।*

*पहने है मोर ताज ,बंसीधर छेड़ साज, आये हैं किसन आज, मधुर पान करिए।।*

*दर्शन दें मुझे नाथ, सदा झुका चलें माथ, संकट में पकड़ हाथ, नेह भाव भरिए।*

*पूजन अर्चन प्रवाह, जीवन दे सदा राह, प्रेमा की परम चाह, कृष्ण चरण गहिए।।*

*संदर्भित ग्रंथ--- छंद कलश*

      *-- योगिता चौरसिया 'प्रेमा' (प्रेरक)*

         *--- बिलासा छंद महालय*

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक-- आज शरण आये (1 युग्म)*

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करो कष्ट का निदान, सुख का प्रभु दो विधान, करूँ सदा भक्ति गान, आज शरण आये।

रख मैं श्रद्धा अपार, सुन लो मेरी पुकार, बना खड़ा भक्त द्वार, झोली भर जाये।।

करो पाप का विनाश, हो न कभी मन हताश, भरो प्रेम का प्रकाश, हृदय जगमगाये।

गजानंद सच प्रचार, करे झूठ पर प्रहार, मुझको प्रभु दो निखार, मन है घबराये।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया दण्डक*

*प्रति पंक्ति -- 46 मात्रा*

*सृजन शीर्षक-- विकट समय आया। (1 युग्म)*

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संविधान पर प्रहार, रखे लोग हैं विकार, करें सभी हम विचार, विकट समय आया।

राजनीति दागदार, कूटनीति कटु कटार, करे सत्य तार-तार, कौन समझ पाया।।

जाति धर्म में विभेद, किया नहीं ग्रंथ वेद, एक सभी साँस स्वेद, रक्त रूप काया।

सभी लोग हो समान, देश बने तब महान, गजानंद सच जुबान, सबको बतलाया।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक-- सद्गुरु घर आये। (2 युग्म)*

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ढोल बजे हैं मृदंग, लोगों में है उमंग, भक्ति भाव की तरंग, सद्गुरु घर आये।

कृपा करो गुरु अपार, सजे खुशी की बहार, गाँव-गली द्वार-द्वार, घर आँगन भाये।।

पूर्ण करो सत्य काज, करे सदा शिष्य नाज, चंदन को माथ साज, सद्गुरु कहलाये।

दीन दुखी हूँ गरीब, धन्य कहूँ मैं नसीब, खुद को सद्गुरु करीब, गजानंद पाये।।


सद्गुरु जी हो महान, सीप-दीप के समान, करो मुझे ज्ञानवान, महिमा नित गाऊँ।

करो दया गुरु अशेष, मिट जाये द्वंद्व-द्वेष, बढ़े मीत रूप श्लेष, खुशियाँ बरसाऊँ।।

बन जाऊँ प्रीत-मीत, गाऊँ मैं प्रेम गीत, जीत हुआ अब प्रतीत, सबको बतलाऊँ।

दिव्य ज्ञान का प्रकाश, दूर किया है हताश, पूर्ण हुये अब तलाश, बलिहारी जाऊँ।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक-- चुप्पी प्रिय तोड़ो (2 युग्म)*

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करूँ शुरू आज बात, रात रहे या प्रभात, तुझे सभी राज ज्ञात, चुप्पी प्रिय तोड़ो।

नैन रहे अब निहोर, हुआ प्रिये मैं विभोर, प्रीत रीत बाँध डोर, दिल से दिल जोड़ो।।

हुआ तुम्हीं से लगाव, प्रेम किया है प्रभाव, बिन तेरे है अभाव, साथ नहीं छोड़ो।

रखूँ सदा साथ चाह, बहे प्यार का प्रवाह, लगन लगी है अथाह, राह नही मोड़ो।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक-- चंचल मन मेरा। (2 युग्म)*

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लाना जीवन बहार, पाना खुशियाँ अपार, देखा सपनें हजार, चंचल मन मेरा।

जाना मत साथ छोड़, सॉंसो से साँस जोड़, मिले भले कष्ट मोड़, चाहे दुख घेरा।।

बाँध प्रिये प्रीत डोर, नैन रहा है निहोर, हुआ आज मन विभोर, देख रूप तेरा।

देना तुम बात ध्यान, हम दोनों एक जान, दिल धड़कन भी समान, लेना है फेरा।।

----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक_दुनिया का मेला (2 युग्म)*

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मिले प्रिये प्रीत मीत, हार नहीं हो प्रतीत, जाऊँ मैं जंग जीत, जीवन का खेला।

दिखे नहीं ओर छोर, नैन रहा हूँ निहोर, तुमसे है चाह भोर, पावन शुभ बेला।।

तुम हो अनुनाद प्रेम, चाहत है नेक नेम, बन जाओ मेघ हेम, बरसो बन रेला।

रखो नहीं द्वेष द्वंद, पुरवाई मंद-मंद, बात कहे गजानंद, सजा रखो मेला।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक-- झुलस रही धरती। (2 युग्म)*

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गायब है नींद चैन, ताक रही राह नैन, शीतल हो प्रात रैन, झुलस रही धरती।

पेड़ कटे नित हजार, उजड़ रहे हैं बहार, कौन है जवाबदार, भूमि पड़ी परती।।

गर्मी लू ताप ताव, पेड़ करें हैं बचाव, रोके मिट्टी कटाव, देते खुशहाली।

चलो करें एक काम, भावी पीढ़ी बनाम, हाथ सभी पेड़ थाम, लायें हरियाली।।


समझो सब पेड़ पीर, साथी बन यह समीर, बादल से खींच नीर, बारिस करवाता।

हितकारी बन समाज, करे सदा लोक काज, बनकर यह वैद्य राज, औषध दे जाता।।

मानव अब जाग-जाग, करो नहीं तुम सुराग, झोंक मत विकास आग, स्वार्थी तुम हो के।

है विकास बस तलाश, हुआ स्वयं का विनाश, गजानंद है निराश, पेड़ छाँव खो के।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक-- झूठ नही बोलो। (2 युग्म)*

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करो ढोंग पर प्रहार, सदा सत्य का प्रचार, मिट जाये भय विकार, झूठ नहीं बोलो।

छोड़ सभी दुख विलाप, करो राम नाम जाप, मिटे मोह त्रास पाप, मन का पट खोलो।।

अनुनय है बार-बार, कर्म राह को सुधार, बोझ धरा का उतार, नैन नीर धो लो।

जाति-धर्म का बुखार, चढ़ा नशा है खुमार, मानवता दागदार, जहर नहीं घोलो।।

----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक-- वह साथी छूटा। (2 युग्म)*

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सूर्य चन्द्र है गवाह, लगन लगी और चाह, प्रेम किया था अथाह, वह साथी छूटा।

हुआ आज मैं अनाथ, छूट गया मीत साथ, चले गए छोड़ हाथ, किस्मत अब फूटा।

स्वप्न्न दिखा वो हजार, चला कष्ट का बयार, छीन लिये सुख बहार, किये प्रीत झूठे।

गजानंद बेकरार, सुनने तेरी पुकार, करे रोज इंतजार, रहो नहीं रूठे।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/05/2024

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*आधार छंद-- हरिप्रिया सममात्रिक दण्डक*

*प्रति पंक्ति-- 46*

*यति-- 12,12,12,10*

*सृजन शीर्षक- तुमसे जीवन है । (2 युग्म)*

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रहो सदा पास-पास, करो मुझे मत उदास, बने प्रेम का सुवास, तुमसे जीवन है।

तुमसे दिन रात शाम, रखो मुझे आप थाम, तभी मिलेगा मुकाम, कहता यह मन है।।

तुमसे है प्रीत चाह, प्यासी है ये निगाह, प्रेम करो अब अथाह, दिल में तड़पन है।

गजानंद बार-बार, मन में खिलते बहार, पाऊँ खुशियाँ हजार, प्रेम रतन धन है।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छतीसगढ़) 01/06/2024


सुदर्शना छंद- नव प्रस्तारित छंद

 *सुदर्शना विषम मात्रिक छंद--- नवीन प्रस्तारित*


यह षष्ठपदी कुल 148 मात्रा का विषम मात्रिक छन्द है, जो सोरठा और पारधी छन्द के मिलने से बनता है। सोरठा छंद की शुरुआत भगण युक्त  (211) शब्द से करना अनिवार्य है। इसमें सर्वप्रथम एक सोरठा तथा इसी सोरठा के चौथे चरण से पारधी सममात्रिक का प्रथम चरण लिखते हैं। पाँचवीं पंक्ति पर सृजनकर्ता अपना नाम या उपनाम रख सकता है। 

(1) सोरठा- अर्ध सममात्रिक , द्विपदी, कुल मात्रा 48, यति -11,13  चार चरण, पदांत- 12 या 111, प्रथम एवं तृतीय चरण में समतुकांत आवशयक ।

(2) पारधी-- सममात्रिक, 25 मात्रा यति- 13,12  पदांत - भगण (211), चार चरण, प्रति दो पंक्ति समतुकांत, 

तेवर है विकराल, लगती नागिन कैकयी।

बिखरे बिखरे बाल, देवों का षड्यंत्र यह।।

देवों का षड्यंत्र यह, लगता नहीं अकारण।

राम जन्म का हेतु ही, है लंकापति रावण।।

राजा दसरथ दंग हैं, उतरा है क्यों जेवर।

घटित हुआ क्या बोलिए, क्यों बदले हैं तेवर।।


दर्पण कहता सत्य, झूठ इसे भाता नहीं।

बीते बार्हस्पत्य, निष्ठापूर्वक है अटल।।

निष्ठापूर्वक है अटल, करता सत्य उजागर।

भेद कभी करता नहीं, सागर हो या गागर।।

ननकी बन अंतर्मुखी, हरि पद कर भावार्पण।

दर्शन हो निज दोष का, झाँक अरे मन दर्पण।।

*-- डॉ रामनाथ साहू 'ननकी'*

   *छंदाचार्य, बिलास छंद महालय*

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*आधार छंद-- सुदर्शना विषम मात्रिक*

*कुल मात्रा-- 148*

*परिचय-- षष्ठपदी*

*सूत्र-- सुदर्शना= सोरठा + पारधी*

*सृजन शीर्षक-- स्वागत(1 युग्म)*

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स्वागत है प्रभु राम, कुटिया दीन गरीब की।

मन मंदिर में धाम, रखा बसाकर आपको।।

रखा बसाकर आपको, हुई हृदय में आहट।

बिना भक्ति इंसान सुन, खुले नहीं मन का पट।।

बन जाऊँ प्रभु दास मैं, पावन पग को पाकर।

कर लूँ जीवन धन्य यह, राम नाम को गाकर।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/05/2024

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*आधार छंद-- सुदर्शना विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- मौसम (1 युग्म)*

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मौसम सदाबहार, साजन तुम खोना नहीं।

आओ कर लो प्यार, शरमाना तुम छोड़ दो।।

शरमाना तुम छोड़ दो, समझो मेरी चाहत।

हुआ बहुत बैचैन दिल, अब तो दे दो राहत।।

बिना आपके जान लो, यह जीवन है दुर्गम।

सुन लो प्रेम पुकार को, बोले दिल का मौसम।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/05/2024

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*आधार छंद-- सुदर्शना विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- नायक (1 युग्म)*

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जन-जन को दे प्यार, रहकर हृदय करीब जो।

सहज सरल व्यवहार, जन नायक में चाहिये।।

जन नायक में चाहिये, दुख का करे निवारण।

सत्ता सुख से हो परे, करता जो सच धारण।

अपने शासन काल में, कर दे अर्पित तन-मन।

गजानंद सच बोलता, नायक है वह जन-जन।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/05/2024

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*आधार छंद-- सुदर्शना विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक--  पायल (1युग्म)*

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पायल की आवाज, घायल मुझको कर गई।

मेरे दिल पर राज, तेरे नैनों ने किया।।

तेरे नैनों ने किया, मुझसे छुप-छुप चाहत।

तब से मैं बेचैन हूँ, कौन दिलाये राहत।।

बिंदी चमके माथ पर, देख हुआ मैं कायल।

गजानंद की नींद भी, गई चुरा ले पायल।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/05/2024

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*आधार छंद-- सुदर्शना विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- मोहित (1 युग्म)*

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मोहित करते नैन, दिल में मेरे बस गये।

लूट लिया है चैन, अधरों की मुस्कान ने।।

अधरों की मुस्कान ने, रंग भरा मनभावन।

माना खुद को धन्य मैं, पाकर प्रीत सुहावन।।

गजानंद जी ध्यान दो, कहते बात पुरोहित।

ले लो फेरे सात तुम, सजनी को कर मोहित।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/05/2024

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*आधार छंद-- सुदर्शना विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- बोधक (2 युग्म)*

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बोधक करता ज्ञान, जीवन सुख परमार्थ का।

मिलती है पहचान, शिक्षा से इंसान को।।

शिक्षा से इंसान को, सभी जगह है आदर।

शिक्षा से संस्कार को, नमन करूँ मैं सादर।।

गजानंद रख ध्यान नित, बनो सत्य का शोधक।

ताकि सभी को हो सके, मानवता का बोधक।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/05/2024



सोमवार, 27 मई 2024

आधार छंद- कुण्डलिया विषम मात्रिक छंद

कुण्डलिया-----


  *श्रीमत पिंगलाचार्य मतानुसार यह षष्ठपदी कुल 144 मात्रा का विषम मात्रिक छन्द है, जो दोहा और रोला छन्दों के मिलने से बनता है। इसमें  सर्वप्रथम एक दोहा (13,11 पदांत --21) लिखें । इसी दोहे के चौथे चरण से रोला सममात्रिक छंद चार चरण युक्त (11,13 पदांत -- चौकल) का प्रथम चरण लिखते हैं। पाँचवीं पंक्ति पर सृजनकर्ता अपना नाम या उपनाम रख सकता है जैसे-- कह गिरधर कविराय।*

    *दोहे की शुरुआत जिस चौकल से होती उसी चौकल शब्द से कुण्डलिया छंद को समाप्त करते हैं।। दोहा एवं रोला छन्द एक दूसरे में कुण्डलित रहते हैं। इसीलिए इस छन्द को 'कुण्डलिया' कहा गया है।*

 रोला छंद--

समकल संयोजन-- (443- 3244)

विषम कल संयोजन--- (3323- 32332)

( *कुण्डलियाँ छंद का सूत्र --*

4+4+212 , 4+4+21 । 

4+4+212 ,4+4+21 ।। (दोहा के चौथे चरण से रोले की शुरुआत करे)

👇🏻

4+4+21 , 3+2+4+4  ।

4+4+21 , 3+2+4+4 ।।

4+4+21👈 ,3+2+4+4 । इस पंक्ति के प्रथम चरण में अपना नाम या उपनाम रखे 

4+4+21 ,3+2+4+4 ।।

पाँचवीं छटवीं पक्ति समतुकांत दोहे का प्रथम शब्द कुण्डलिया के अंत में रखें।

चौकल के किसी भी रूप से दोहे की शुरुवात कर सकते है या त्रिकल यमाता से,उसे ही अंत में भी रखें।

रोले के विषमकल संयोजन में अंत में  चौकल/त्रिकल यमाता/12+2 इस प्रकार का त्रिकल द्विकल रख सकते है।

तगण या जगण से दोहे का आरम्भ वर्जित है)

अवलोकनार्थ----

रमता हर कण में वही, कहते जिसको राम।

निराकार ओंकार वह, उसके अनगिन नाम।।

उसके अनगिन नाम, कहो जो चाहो कहना।

अंतिम प्रिय विश्राम, देह का अद्भुत गहना।।

कह ननकी कवि तुच्छ, जगत की झूठी ममता।

करो राम अनुराग, व्यर्थ ही जग पर रमता।।


सदा भवानी दाहिनी, सम्मुख रहे गणेश।

पंचदेव रक्षा करें, ब्रह्मा विष्णु महेश।।

ब्रह्मा विष्णु महेश, त्रिगुण के जगन्नियंता।

जब है तेरे साथ, व्यर्थ ही करता चिंता।।

कह ननकी कवि तुच्छ, देव करते अगवानी।

पावन हो जब कर्म, प्रहर्षित सदा भवानी।

-- डॉ रामनाथ साहू 'ननकी'

   छंदाचार्य, बिलास छंद महालय

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*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*

*कुल मात्रा-- 144*

*परिचय-- षष्ठपदी*

*सूत्र-- कुण्डलिया= दोहा+ रोला*

*सृजन शीर्षक-- दाता (2 युग्म)*

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दाता पालनहार प्रभु, करो कृपा उपकार।

आप सहारे कर सकूँ, भवसागर को पार।।

भवसागर को पार, करूँ गाकर प्रभु महिमा।

सदा बढ़ाना आप, मान पद मेरी गरिमा।।

याचक दाता बीच, रहे नित पावन नाता।

गजानंद कर जोर, करे विनती प्रभु दाता।।


दाता के उपकार को, नहीं भूलना आप।

जितना है पर्याप्त है, छोड़ो पश्चाताप।।

छोड़ो पश्चाताप, व्यर्थ ही अश्रु बहाना।

रहना सदा प्रसन्न, सभी से प्रीत निभाना।।

गजानंद व्यवहार, सदा सम्मान दिलाता।

सुख शुभ आशीर्वाद, सभी को देता दाता।।

----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/05/2024

सोमवार, 6 मई 2024

मयूरशिखा छंद-

*मयूर शिखा (अर्ध सममात्रिक छंद)* नव प्रस्तारित आधार छंद है।

*कुल मात्रा -- 54*

*यति-- 14,13*

*पदांत- IIS*

*मापनी--- SSS-SSS-S, SSIS-SIIS*

( 17 वाँ, 24 वाँ और 25 वाँ वर्ण को लघु वर्ण होना आवश्यक है, और गुरु के जगह में दो लघु भी रखा जा सकता है।)

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                  *मानवता*

इंसानों का धर्म यही, कहते जिसे मानवता।

दया क्षमा करुणा करिए, जग से मिटे दानवता।।


मानवता पाठ पढ़ाते, ये ग्रंथ सारे अपने।

हिंसात्मक हर कृत्य तजो, तो सत्य होंगे सपने।।


सभी महापुरुषों वाणी, करुणा अहिंसा कहती।

इनके ही जीवन पथ पर, पावन त्रिवेणी बहती।।

 

कभी क्रूरता जो करते, इंसानियत को तजते।

मुक्ति नहीं इन जीवों का, ये नर्क जाते मरते।।


मानवतावादी बनिए, तब सर्वहित संभव है।

हो पावन विचारधारा, या अन्यथा तांडव है।।


मानव के स्वाभाविक गुण, देवत्व भी विकसित हो।

फूल नहीं कोई झुलसे, सारा चमन कुसुमित हो।।


आदर्शों को हो स्थापन, हिंसक प्रणों  को तजिए।

पूजनीय संरक्षक बन, शुभ भावना से सजिए।।


मानव द्रोही नहीं बनो, बदला तजो प्यार करो।

मानवता का मार्ग यही, नवचेतना आज भरो।।


मानव प्रेमी हृदय रखो, जगबंधु उपनाम रहे।

मानवता ही धर्म बड़ा, प्रिय ग्रंथ सब संत कहे।।

-- डॉ रामनाथ साहू 'ननकी'

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*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*

*यति - 14,13*

*परिचय-- चार चरण 54 मात्रा*

*मापनी--SSS-SSS-S, SSIS-SIIS*

*पदांत--  सगण (IIS)*

*सृजन शीर्षक-- चंचलता* (5 युग्म)

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मन में भरना चंचलता, कटु बोल परित्याग करो।

हार मिले या जीत मिले, पर भाव उत्साह भरो।।


नमन करूँ मैं मातु पिता, जिसने मुझे जन्म दिया।

शिक्षा का शुभ दीप जला, गुरु आप ने धन्य किया।।


बनें उपासक मानवता, उपकार बंधुत्व रहे।

परहित सेवा हाथ बढ़े, कोई न अब कष्ट सहे।।


द्वेष द्वंद से मन कलुषित, होवे न यह ध्यान रखें।

करें मेहनत की पूजा, श्रम अन्न हम आप चखें।।


कुसुमित बगिया जीवन की, मनमीत गुलजार करें।

गजानंद जग प्रीत बढ़े, मन में मुदित भाव भरें।।

----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2024

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*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- तूफानों से डरना क्यों* (5 युग्म)

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तूफानों से डरना क्यों, रख हौसला नित बढ़ना।

कर्मवीर मंजिल पाना, इतिहास हरदम गढ़ना।।


देश भक्ति का भाव जगे, इसका हमें भान रहे।

शान तिरंगा ऊँचा हो, जय भारती लोग कहे।।


खनिज संपदा देश भरा, मत नष्ट इसको करना।

इसकी रक्षा करने को, मत कष्ट से तुम डरना।।


सीमा पर तैनात खड़े, हरदम सिपाही रहते।

ठंड धूप सर्दी गर्मी, हँसकर सदा वे सहते।।


देश धर्म ही हम सबका, सबसे बड़ा धर्म रहे।

गजानंद जी गर्व करे, वंदन सदा कर्म कहे।।

----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2024

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*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- हँसता हुआ आँगन है* (5 युग्म)

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बेटी से घर में रौनक, हँसता हुआ आँगन है।

बेटी माता बहन बहू, ममतामयी दामन है।।


फूल कली है बागों की, खिलके चमन में महके।

पंख पसारे खुशियों की, चिड़िया बने वह चहके।।


बेटी से जीवन पावन, गंगा बने है बहती।

अश्रु छुपाये आँखों की, पीड़ा बहुत वह सहती।।


बेटी कुल की मर्यादा, संस्कार की है जननी।

गृह लक्ष्मी कहलाती है, बनकर पिया की सजनी।।


हँसी खुशी परिवार रखे, जब वो हँसे फूल खिले।

गजानंद जी बेटी को, यश कीर्ति सम्मान मिले।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/05/2024

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*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- मंजिल* (5 युग्म)

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मंजिल कदमों पर होगी, रख हौसला तुम बढ़ना।

कर्मवीर भारत के बन, तुमको शिखर है चढ़ना।।


भुजा समाये रखना पर्वत, ललकार हो शेर सहीं।

आगे बढ़ते जाना है, जिसकी कहीं छोर नहीं।।


बन सपूत भारत माँ का, देना सदा कर्ज चुका।

रखो हौसला फौलादी, दुश्मन चले आँख झुका।।


मान तिरंगा ऊँचा रखना, नित देश हित प्रण करना।

इसके लिए सदा जीना, इसके लिए ही मरना।।


दुश्मन के प्रतिघातों से, अविरल लहू है बहती।

मान बढ़ाना मेरे बच्चे, माँ भारती नित कहती।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/05/2024

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*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- झिलमिल सितारे हँसते* (5 युग्म)

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आसमान में बनकर हम, झिलमिल सितारे हँसते।

विरह अमावस फेरे में, दिल जो न ऐसे फँसते।।


चातक चाह चकोरी का, पाने सँजोया सपना।

स्वार्थ भरी इस दुनिया में, कोई नहीं है अपना।।


पिया मिलन की तड़पन में, घायल हुआ मैं करता।

प्रियवर तुमसे मिलने को, आहें सदा ही भरता।।


बनकर मेरी धड़कन तुम, दिल में समाये रहना।

तुम्हें देख जीना मुझको, मेरा यही है कहना।।

----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/05/2024

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*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- *गुंजित आँगन किलकारी*(5 युग्म)

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गुंजित आँगन करती है, बेटी सदा दो कुल का।

कृपा चाहती मातु पिता, वो तो दसो अंगुल का।।


बेटी की किलकारी से, परिवार घर नित महके।

आसमान में बेटी अब, बनके परिंदा चहके।।


बेटी ममता परछाई, रौनक उसी से घर है।

पार लगाये भवसागर, करुणामयी सागर है।।


बेटी सुख की पेटी बन, घर में खजाना भरती।

बेटी नित गुणगान करे, खुशहाल हो यह धरती।।


अपने हक अधिकार लिये, वीरांगना बन लड़ते।

बेटी की तारीफ करूँ, तो शब्द भी कम पड़ते।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/05/2024

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*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- हर ओर छाई खुशियाँ* (5 युग्म)

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राम लौट घर आये हैं, हर ओर छाई खुशियाँ।

एक झलक दर्शन करने, व्याकुल दिखे हैं अखियाँ।।


गाँव-शहर घर द्वार सजे, सजने लगी हैं गलियाँ।

देखो प्रभु के स्वागत में, खिलने लगी हैं कलियाँ।।


बादल ढोल बजाये तब, सुन मोरनी नृत्य करे।

कोयल कुहके अमराई, मन में मधुर भाव भरे।।


अवधपुरी में दीवाली, जन-जन हुये हर्षित है।

प्रभु के पावन चरणों में, श्रद्धा सुमन अर्पित है।।


वास करो मेरे मन में, सुन लो यही है विनती।

गजानंद को भक्तों में, पहले करो प्रभु गिनती।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2024

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*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*

*सृजन शीर्षक--गुड्डा गुड्डी शादी है*(5 युग्म)

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गुड्डा-गुड्डी शादी है, अक्षय तृतीया दिन को।

आमंत्रण स्वीकार करो, भेजा निमंत्रण जिनको।।


कब छोटी से बड़ी हुई, अब जुदाई पल है।

तेरी तो मुस्कान हमें, कल भूलना मुश्किल है।।


हाथ रची है मेहंदी, अरु माथ बिंदी चमके।

पायल छमछम पाँव बजे, गोरा बदन है दमके।।


बाराती है द्वार खड़ी, डोला सजा आँगन में।

घड़ी विदाई की आई, है दर्द सबके मन में।।


आँख हुई नम बाबुल का, बेसुध पड़ी माँ घर में।

भाई रोये मन अंदर, रोये बहन बाहर में।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/05/2024

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*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- गर्मी (2 युग्म)*

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गर्मी में सब चाहते, ठंडा जल तरु छाँव।

चप्पल जूते के बिना, जल जाते हैं पाँव।।

जल जाते हैं पाँव, गर्म लू बदन जलाता।

लस्सी मट्ठा छाछ, सभी को गजब सुहाता।।

गजानंद हम आप, रखें सेहत में नर्मी।

व्याकुल हैं सब लोग, बढ़ी है जब से गर्मी।।


बढ़ते गर्मी देखकर, हलाकान हैं लोग।

हुआ देख तन संचरित, तरह-तरह के रोग।।

तरह-तरह के रोग, घरो-घर पड़े दिखाई।

पंखा कूलर फ्रीज, सभी पर शामत आई।।

भू स्तर का जल स्रोत, नही ऊपर को चढ़ते।

गजानंद लू धूप, बहुत गर्मी में बढ़ते।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2024

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*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- मिला सहारा (2 युग्म)*

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मिला सहारा है मुझे, नित दिन दीनानाथ।

करूँ यही बस कामना, रखना सिर पर हाथ।।

रखना सिर पर हाथ, कृपा की बारिश करना।

शिक्षा ज्ञान विवेक, पिपासा मन में भरना।।

गजानंद कर जाप, नाम प्रभु जी का प्यारा।

आया विपदा काल, मुझे तब मिला सहारा।।


सबका मालिक एक है, सबका एक विचार।

जाति धर्म से हो परे, जोड़ो मन का तार।।

जोड़ो मन का तार, सभी से प्रेम करें हम।

दया भाव बंधुत्व, अहिंसा भाव भरें हम।।

वंचित हक अधिकार, रहे मत कोई तबका।

गजानंद हर चाह, पूर्ण हो जाये सबका।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2024

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*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- मिला खजाना (2 युग्म)*

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मिला खजाना ज्ञान का, रखना इसे सहेज।

सुख जीवन आधार यह, खुशियों का है सेज।

खुशियों का है सेज, ज्ञान सम्मान दिलाता।

पाकर गुरु से ज्ञान, लोग बन जाते ज्ञाता।।

मातु-पिता गुरु देव, सदा मैंने है माना।

गजानंद सौभाग्य, ज्ञान का मिला खजाना।।


मिला खजाना है मुझे, पावन प्रेम अकूत।

इसीलिए मैं आज तक, हुआ नहीं परिभूत।।

हुआ नहीं परिभूत, सफलता पग-पग पाया।

कण-कण प्रेम निवास, चराचर जीव समाया।।

गजानंद मिल साथ, सुनायें मधुर तराना।

आप सभी का प्रेम, रूप में मिला खजाना।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/05/2024

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*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- नमन महालय (2 युग्म)*

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नमन महालय छंद को, नमन पटल गुरुदेव।

नमन सृजन नव शब्द को, नमन कलम स्वयमेव।।

नमन कलम स्वयमेव, करूँ अभिनंदन वंदन।

दिये सुगंधित ज्ञान, मुझे बन पावन चंदन।।

गजानंद उर ध्यान, बसा लें हम गुरुआलय।

शत-शत बारम्बार, करूँ मैं नमन महालय।।


पाऊँ मैं श्री गुरु शरण, गाऊँ गुरु गुणगान।

नमन करूँ माँ शारदे, नमन महालय ज्ञान।।

नमन महालय ज्ञान, जहाँ है छंद खजाना।

सीखा छंद विधान, छंद को लय में गाना।।

गजानंद गुरुदेव, चरण में माथ झुकाऊँ।

गुरुवर आशीर्वाद, आपका नित मैं पाऊँ।।

🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/05/2024


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*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*

*सृजन शीर्षक-- सजन अनाड़ी (2 युग्म)*

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सजन अनाड़ी आपका, प्यारा है अंदाज।

धड़कन बन करते सदा, मेरे दिल पर राज।।

मेरे दिल पर राज, तुम्हारा ही है जानों।

बाँध प्रीत की डोर, मुझे तुम अपना मानों।।

गजानंद दिन रात, फिरे मन जंगल झाड़ी।

समझो दिल की बात, रहो मत सजन अनाड़ी।।


सजन अनाड़ी लौट कर, आओ मेरे पास।

लेकर बाहों में बुझा, पिया मिलन की प्यास।।

पिया मिलन की प्यास, बढ़ाती यादें तेरी।

जाना न मुझे छोड़, कसम है तुमको मेरी।।

गजानंद है चाह, चढ़ूँ मैं प्रीत पहाड़ी।

करना प्रेम अथाह, मुझे तुम सजन अनाड़ी।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/05/2024








कुण्डलिया छंद - (छत्तीसगढ़ी जनउला)

[01] कुण्डलियाँ छंद - जनउला रहिथे दू ठन गोलवा, एक बीच मा छेद। घूमे चिपका अंग ला, जानौ येखर भेद।। जानौ येखर भेद, दबा मुट्ठा भर लेना। बइठे टाँ...