सोमवार, 27 मई 2024

आधार छंद- कुण्डलिया विषम मात्रिक छंद

कुण्डलिया-----


  *श्रीमत पिंगलाचार्य मतानुसार यह षष्ठपदी कुल 144 मात्रा का विषम मात्रिक छन्द है, जो दोहा और रोला छन्दों के मिलने से बनता है। इसमें  सर्वप्रथम एक दोहा (13,11 पदांत --21) लिखें । इसी दोहे के चौथे चरण से रोला सममात्रिक छंद चार चरण युक्त (11,13 पदांत -- चौकल) का प्रथम चरण लिखते हैं। पाँचवीं पंक्ति पर सृजनकर्ता अपना नाम या उपनाम रख सकता है जैसे-- कह गिरधर कविराय।*

    *दोहे की शुरुआत जिस चौकल से होती उसी चौकल शब्द से कुण्डलिया छंद को समाप्त करते हैं।। दोहा एवं रोला छन्द एक दूसरे में कुण्डलित रहते हैं। इसीलिए इस छन्द को 'कुण्डलिया' कहा गया है।*

 रोला छंद--

समकल संयोजन-- (443- 3244)

विषम कल संयोजन--- (3323- 32332)

( *कुण्डलियाँ छंद का सूत्र --*

4+4+212 , 4+4+21 । 

4+4+212 ,4+4+21 ।। (दोहा के चौथे चरण से रोले की शुरुआत करे)

👇🏻

4+4+21 , 3+2+4+4  ।

4+4+21 , 3+2+4+4 ।।

4+4+21👈 ,3+2+4+4 । इस पंक्ति के प्रथम चरण में अपना नाम या उपनाम रखे 

4+4+21 ,3+2+4+4 ।।

पाँचवीं छटवीं पक्ति समतुकांत दोहे का प्रथम शब्द कुण्डलिया के अंत में रखें।

चौकल के किसी भी रूप से दोहे की शुरुवात कर सकते है या त्रिकल यमाता से,उसे ही अंत में भी रखें।

रोले के विषमकल संयोजन में अंत में  चौकल/त्रिकल यमाता/12+2 इस प्रकार का त्रिकल द्विकल रख सकते है।

तगण या जगण से दोहे का आरम्भ वर्जित है)

अवलोकनार्थ----

रमता हर कण में वही, कहते जिसको राम।

निराकार ओंकार वह, उसके अनगिन नाम।।

उसके अनगिन नाम, कहो जो चाहो कहना।

अंतिम प्रिय विश्राम, देह का अद्भुत गहना।।

कह ननकी कवि तुच्छ, जगत की झूठी ममता।

करो राम अनुराग, व्यर्थ ही जग पर रमता।।


सदा भवानी दाहिनी, सम्मुख रहे गणेश।

पंचदेव रक्षा करें, ब्रह्मा विष्णु महेश।।

ब्रह्मा विष्णु महेश, त्रिगुण के जगन्नियंता।

जब है तेरे साथ, व्यर्थ ही करता चिंता।।

कह ननकी कवि तुच्छ, देव करते अगवानी।

पावन हो जब कर्म, प्रहर्षित सदा भवानी।

-- डॉ रामनाथ साहू 'ननकी'

   छंदाचार्य, बिलास छंद महालय

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*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*

*कुल मात्रा-- 144*

*परिचय-- षष्ठपदी*

*सूत्र-- कुण्डलिया= दोहा+ रोला*

*सृजन शीर्षक-- दाता (2 युग्म)*

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दाता पालनहार प्रभु, करो कृपा उपकार।

आप सहारे कर सकूँ, भवसागर को पार।।

भवसागर को पार, करूँ गाकर प्रभु महिमा।

सदा बढ़ाना आप, मान पद मेरी गरिमा।।

याचक दाता बीच, रहे नित पावन नाता।

गजानंद कर जोर, करे विनती प्रभु दाता।।


दाता के उपकार को, नहीं भूलना आप।

जितना है पर्याप्त है, छोड़ो पश्चाताप।।

छोड़ो पश्चाताप, व्यर्थ ही अश्रु बहाना।

रहना सदा प्रसन्न, सभी से प्रीत निभाना।।

गजानंद व्यवहार, सदा सम्मान दिलाता।

सुख शुभ आशीर्वाद, सभी को देता दाता।।

----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/05/2024

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