*मयूर शिखा (अर्ध सममात्रिक छंद)* नव प्रस्तारित आधार छंद है।
*कुल मात्रा -- 54*
*यति-- 14,13*
*पदांत- IIS*
*मापनी--- SSS-SSS-S, SSIS-SIIS*
( 17 वाँ, 24 वाँ और 25 वाँ वर्ण को लघु वर्ण होना आवश्यक है, और गुरु के जगह में दो लघु भी रखा जा सकता है।)
*****************************************
*मानवता*
इंसानों का धर्म यही, कहते जिसे मानवता।
दया क्षमा करुणा करिए, जग से मिटे दानवता।।
मानवता पाठ पढ़ाते, ये ग्रंथ सारे अपने।
हिंसात्मक हर कृत्य तजो, तो सत्य होंगे सपने।।
सभी महापुरुषों वाणी, करुणा अहिंसा कहती।
इनके ही जीवन पथ पर, पावन त्रिवेणी बहती।।
कभी क्रूरता जो करते, इंसानियत को तजते।
मुक्ति नहीं इन जीवों का, ये नर्क जाते मरते।।
मानवतावादी बनिए, तब सर्वहित संभव है।
हो पावन विचारधारा, या अन्यथा तांडव है।।
मानव के स्वाभाविक गुण, देवत्व भी विकसित हो।
फूल नहीं कोई झुलसे, सारा चमन कुसुमित हो।।
आदर्शों को हो स्थापन, हिंसक प्रणों को तजिए।
पूजनीय संरक्षक बन, शुभ भावना से सजिए।।
मानव द्रोही नहीं बनो, बदला तजो प्यार करो।
मानवता का मार्ग यही, नवचेतना आज भरो।।
मानव प्रेमी हृदय रखो, जगबंधु उपनाम रहे।
मानवता ही धर्म बड़ा, प्रिय ग्रंथ सब संत कहे।।
-- डॉ रामनाथ साहू 'ननकी'
***************************************
*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*
*यति - 14,13*
*परिचय-- चार चरण 54 मात्रा*
*मापनी--SSS-SSS-S, SSIS-SIIS*
*पदांत-- सगण (IIS)*
*सृजन शीर्षक-- चंचलता* (5 युग्म)
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
मन में भरना चंचलता, कटु बोल परित्याग करो।
हार मिले या जीत मिले, पर भाव उत्साह भरो।।
नमन करूँ मैं मातु पिता, जिसने मुझे जन्म दिया।
शिक्षा का शुभ दीप जला, गुरु आप ने धन्य किया।।
बनें उपासक मानवता, उपकार बंधुत्व रहे।
परहित सेवा हाथ बढ़े, कोई न अब कष्ट सहे।।
द्वेष द्वंद से मन कलुषित, होवे न यह ध्यान रखें।
करें मेहनत की पूजा, श्रम अन्न हम आप चखें।।
कुसुमित बगिया जीवन की, मनमीत गुलजार करें।
गजानंद जग प्रीत बढ़े, मन में मुदित भाव भरें।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- तूफानों से डरना क्यों* (5 युग्म)
**************************
तूफानों से डरना क्यों, रख हौसला नित बढ़ना।
कर्मवीर मंजिल पाना, इतिहास हरदम गढ़ना।।
देश भक्ति का भाव जगे, इसका हमें भान रहे।
शान तिरंगा ऊँचा हो, जय भारती लोग कहे।।
खनिज संपदा देश भरा, मत नष्ट इसको करना।
इसकी रक्षा करने को, मत कष्ट से तुम डरना।।
सीमा पर तैनात खड़े, हरदम सिपाही रहते।
ठंड धूप सर्दी गर्मी, हँसकर सदा वे सहते।।
देश धर्म ही हम सबका, सबसे बड़ा धर्म रहे।
गजानंद जी गर्व करे, वंदन सदा कर्म कहे।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- हँसता हुआ आँगन है* (5 युग्म)
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
बेटी से घर में रौनक, हँसता हुआ आँगन है।
बेटी माता बहन बहू, ममतामयी दामन है।।
फूल कली है बागों की, खिलके चमन में महके।
पंख पसारे खुशियों की, चिड़िया बने वह चहके।।
बेटी से जीवन पावन, गंगा बने है बहती।
अश्रु छुपाये आँखों की, पीड़ा बहुत वह सहती।।
बेटी कुल की मर्यादा, संस्कार की है जननी।
गृह लक्ष्मी कहलाती है, बनकर पिया की सजनी।।
हँसी खुशी परिवार रखे, जब वो हँसे फूल खिले।
गजानंद जी बेटी को, यश कीर्ति सम्मान मिले।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- मंजिल* (5 युग्म)
**************************
मंजिल कदमों पर होगी, रख हौसला तुम बढ़ना।
कर्मवीर भारत के बन, तुमको शिखर है चढ़ना।।
भुजा समाये रखना पर्वत, ललकार हो शेर सहीं।
आगे बढ़ते जाना है, जिसकी कहीं छोर नहीं।।
बन सपूत भारत माँ का, देना सदा कर्ज चुका।
रखो हौसला फौलादी, दुश्मन चले आँख झुका।।
मान तिरंगा ऊँचा रखना, नित देश हित प्रण करना।
इसके लिए सदा जीना, इसके लिए ही मरना।।
दुश्मन के प्रतिघातों से, अविरल लहू है बहती।
मान बढ़ाना मेरे बच्चे, माँ भारती नित कहती।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- झिलमिल सितारे हँसते* (5 युग्म)
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
आसमान में बनकर हम, झिलमिल सितारे हँसते।
विरह अमावस फेरे में, दिल जो न ऐसे फँसते।।
चातक चाह चकोरी का, पाने सँजोया सपना।
स्वार्थ भरी इस दुनिया में, कोई नहीं है अपना।।
पिया मिलन की तड़पन में, घायल हुआ मैं करता।
प्रियवर तुमसे मिलने को, आहें सदा ही भरता।।
बनकर मेरी धड़कन तुम, दिल में समाये रहना।
तुम्हें देख जीना मुझको, मेरा यही है कहना।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- *गुंजित आँगन किलकारी*(5 युग्म)
**************************
गुंजित आँगन करती है, बेटी सदा दो कुल का।
कृपा चाहती मातु पिता, वो तो दसो अंगुल का।।
बेटी की किलकारी से, परिवार घर नित महके।
आसमान में बेटी अब, बनके परिंदा चहके।।
बेटी ममता परछाई, रौनक उसी से घर है।
पार लगाये भवसागर, करुणामयी सागर है।।
बेटी सुख की पेटी बन, घर में खजाना भरती।
बेटी नित गुणगान करे, खुशहाल हो यह धरती।।
अपने हक अधिकार लिये, वीरांगना बन लड़ते।
बेटी की तारीफ करूँ, तो शब्द भी कम पड़ते।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- हर ओर छाई खुशियाँ* (5 युग्म)
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
राम लौट घर आये हैं, हर ओर छाई खुशियाँ।
एक झलक दर्शन करने, व्याकुल दिखे हैं अखियाँ।।
गाँव-शहर घर द्वार सजे, सजने लगी हैं गलियाँ।
देखो प्रभु के स्वागत में, खिलने लगी हैं कलियाँ।।
बादल ढोल बजाये तब, सुन मोरनी नृत्य करे।
कोयल कुहके अमराई, मन में मधुर भाव भरे।।
अवधपुरी में दीवाली, जन-जन हुये हर्षित है।
प्रभु के पावन चरणों में, श्रद्धा सुमन अर्पित है।।
वास करो मेरे मन में, सुन लो यही है विनती।
गजानंद को भक्तों में, पहले करो प्रभु गिनती।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- मयूरशिखा अर्ध सममात्रिक*
*सृजन शीर्षक--गुड्डा गुड्डी शादी है*(5 युग्म)
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
गुड्डा-गुड्डी शादी है, अक्षय तृतीया दिन को।
आमंत्रण स्वीकार करो, भेजा निमंत्रण जिनको।।
कब छोटी से बड़ी हुई, अब जुदाई पल है।
तेरी तो मुस्कान हमें, कल भूलना मुश्किल है।।
हाथ रची है मेहंदी, अरु माथ बिंदी चमके।
पायल छमछम पाँव बजे, गोरा बदन है दमके।।
बाराती है द्वार खड़ी, डोला सजा आँगन में।
घड़ी विदाई की आई, है दर्द सबके मन में।।
आँख हुई नम बाबुल का, बेसुध पड़ी माँ घर में।
भाई रोये मन अंदर, रोये बहन बाहर में।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- गर्मी (2 युग्म)*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
गर्मी में सब चाहते, ठंडा जल तरु छाँव।
चप्पल जूते के बिना, जल जाते हैं पाँव।।
जल जाते हैं पाँव, गर्म लू बदन जलाता।
लस्सी मट्ठा छाछ, सभी को गजब सुहाता।।
गजानंद हम आप, रखें सेहत में नर्मी।
व्याकुल हैं सब लोग, बढ़ी है जब से गर्मी।।
बढ़ते गर्मी देखकर, हलाकान हैं लोग।
हुआ देख तन संचरित, तरह-तरह के रोग।।
तरह-तरह के रोग, घरो-घर पड़े दिखाई।
पंखा कूलर फ्रीज, सभी पर शामत आई।।
भू स्तर का जल स्रोत, नही ऊपर को चढ़ते।
गजानंद लू धूप, बहुत गर्मी में बढ़ते।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- मिला सहारा (2 युग्म)*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
मिला सहारा है मुझे, नित दिन दीनानाथ।
करूँ यही बस कामना, रखना सिर पर हाथ।।
रखना सिर पर हाथ, कृपा की बारिश करना।
शिक्षा ज्ञान विवेक, पिपासा मन में भरना।।
गजानंद कर जाप, नाम प्रभु जी का प्यारा।
आया विपदा काल, मुझे तब मिला सहारा।।
सबका मालिक एक है, सबका एक विचार।
जाति धर्म से हो परे, जोड़ो मन का तार।।
जोड़ो मन का तार, सभी से प्रेम करें हम।
दया भाव बंधुत्व, अहिंसा भाव भरें हम।।
वंचित हक अधिकार, रहे मत कोई तबका।
गजानंद हर चाह, पूर्ण हो जाये सबका।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- मिला खजाना (2 युग्म)*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
मिला खजाना ज्ञान का, रखना इसे सहेज।
सुख जीवन आधार यह, खुशियों का है सेज।
खुशियों का है सेज, ज्ञान सम्मान दिलाता।
पाकर गुरु से ज्ञान, लोग बन जाते ज्ञाता।।
मातु-पिता गुरु देव, सदा मैंने है माना।
गजानंद सौभाग्य, ज्ञान का मिला खजाना।।
मिला खजाना है मुझे, पावन प्रेम अकूत।
इसीलिए मैं आज तक, हुआ नहीं परिभूत।।
हुआ नहीं परिभूत, सफलता पग-पग पाया।
कण-कण प्रेम निवास, चराचर जीव समाया।।
गजानंद मिल साथ, सुनायें मधुर तराना।
आप सभी का प्रेम, रूप में मिला खजाना।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- नमन महालय (2 युग्म)*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
नमन महालय छंद को, नमन पटल गुरुदेव।
नमन सृजन नव शब्द को, नमन कलम स्वयमेव।।
नमन कलम स्वयमेव, करूँ अभिनंदन वंदन।
दिये सुगंधित ज्ञान, मुझे बन पावन चंदन।।
गजानंद उर ध्यान, बसा लें हम गुरुआलय।
शत-शत बारम्बार, करूँ मैं नमन महालय।।
पाऊँ मैं श्री गुरु शरण, गाऊँ गुरु गुणगान।
नमन करूँ माँ शारदे, नमन महालय ज्ञान।।
नमन महालय ज्ञान, जहाँ है छंद खजाना।
सीखा छंद विधान, छंद को लय में गाना।।
गजानंद गुरुदेव, चरण में माथ झुकाऊँ।
गुरुवर आशीर्वाद, आपका नित मैं पाऊँ।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/05/2024
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
*आधार छंद-- कुण्डलिया विषम मात्रिक*
*सृजन शीर्षक-- सजन अनाड़ी (2 युग्म)*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
सजन अनाड़ी आपका, प्यारा है अंदाज।
धड़कन बन करते सदा, मेरे दिल पर राज।।
मेरे दिल पर राज, तुम्हारा ही है जानों।
बाँध प्रीत की डोर, मुझे तुम अपना मानों।।
गजानंद दिन रात, फिरे मन जंगल झाड़ी।
समझो दिल की बात, रहो मत सजन अनाड़ी।।
सजन अनाड़ी लौट कर, आओ मेरे पास।
लेकर बाहों में बुझा, पिया मिलन की प्यास।।
पिया मिलन की प्यास, बढ़ाती यादें तेरी।
जाना न मुझे छोड़, कसम है तुमको मेरी।।
गजानंद है चाह, चढ़ूँ मैं प्रीत पहाड़ी।
करना प्रेम अथाह, मुझे तुम सजन अनाड़ी।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/05/2024

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें