गीत की अलंकारिक परिभाषा-----
गीत किसी उद्दीपित भाव की एक मर्यादित अविरल धारा है, मुखड़ा जिसका उद्गम है, अंतरे जिसके मनोरम घाट हैं, पूरक पद जिसके तटबन्ध हैं और समापन जिसका अनंत सागर में विलय है।
गीत के छः शैल्पिक लक्षण है- (1) मुखड़ा (2) टेक (3) अन्तरा (4) पूरक पंक्ति (5) तुकान्तता (6) लयात्मकता) और दो शिल्पेतर लक्षण हैं-(1) भावप्रवणता (2) लालित्य।
उदाहरण---
भाव भरे उर लेकर आओ, पुण्य उदय कर दो।
संबंधों के सूत्र बने जो, तुम अक्षय कर दो।।
दिव्य अक्षरा कंचन कविता, तरंगिणी तटिनी।
रसवंती हो मधु रसिका भी, नटवर की नटिनी।।
नाद वृंद के तृष्ण दलों को, मुखर विलय कर दो।
भाव भरे उर लेकर आओ, पुण्य उदय कर दो।।
ऐसी दिव्य निकटता दे दो, सीता राघव ज्यों।
शब्द चित्र साकार करो अब, राधा माधव ज्यों।।
सपने सिंदूरी जो भी हैं, अब अभिनय कर दो।
भाव भरे उर लेकर आओ, पुण्य उदय कर दो।।
पवित्रता की पावन प्रतिमा, हो विश्वास खरा।
चित्त महल का हर इक कोना, लगता आज भरा।।
सतत अमृतमय बेला संभव, शुभ परिणय कर दो।
भाव भरे उर लेकर आओ, पुण्य उदय कर दो।।
---- डॉ रामनाथ साहू " ननकी "
(इस गीत में केवल एक ही आधार छन्द विष्णुपद का प्रयोग हुआ है।)
(1) मुखड़ा– इसमें प्रायः एक से चार तक पंक्तियाँ होती है जो प्रायः सामान लय में होती हैं। यह लय किसी न किसी छन्द पर आधारित होती है। कुछ गीतों में मुखड़े की पंक्तियों की लय एक दूसरे से भिन्न भी हो सकती है।
उक्त गीत में दो पंक्तियों का मुखड़ा है, जिसकी पहली पंक्ति टेक है –
भाव भरे उर लेकर आओ, पुण्य उदय कर दो ।
संबंधों के सूत्र बने जो, तुम अक्षय कर दो ।।
(इस गीत की सभी पंक्तियों की लय का आधार-छंद मापनीमुक्त मात्रिक छंद विष्णुपद’ है)
(2) टेक– मुखड़े की एक पंक्ति ऐसी होती है जो अंतरे के अंत में जोड़कर गायी जाती है, इसे टेक कहते है। टेक को स्थायी या ध्रुव पंक्ति भी कहते हैं।
उक्त गीत की टेक इस प्रकार है-
भाव भरे उर लेकर आओ, पुण्य उदय कर दो ।
(3) अन्तरा– गीत में दो या अधिक अंतरे होते हैं। प्रत्येक अंतरे में प्रायः तीन या अधिक लयात्मक पंक्तियाँ होती हैं। इनमे से अंतिम पंक्ति को पूरक पंक्ति तथा शेष को प्राथमिक पंक्तियाँ कहते हैं। प्राथमिक पंक्तियों की तुकांत-व्यवस्था स्वैच्छिक होता है किन्तु जो भी होती है वह सभी अंतरों में एक समान होती है।
उक्त गीत के प्रत्येक अंतरे में तीन पंक्तियाँ है, जिनके साथ टेक को मिलाकर गाया जाता है। इस दृष्टि से पहला अंतरा दृष्टव्य है-
दिव्य अक्षरा कंचन कविता, तरंगिणी तटिनी। (प्रथम पंक्ति)
रसवंती हो मधु रसिका भी, नटवर की नटिनी।।
(द्वितीय पंक्ति)
नाद वृंद के तृष्ण दलों को, मुखर विलय कर दो। (पूरक पंक्ति)
भाव भरे उर लेकर आओ, पुण्य उदय कर दो।। (टेक)
(4) पूरक पंक्ति– अंतरे की अंतिम पंक्ति को पूरक पंक्ति कहते हैं, इसके साथ टेक को मिलाकर गाया जाता है। पूरक पंक्तियों और टेक का तुकांत एक समान होता है। प्रायः दोनों की लय भी एक समान होती है किन्तु कभी-कभी भिन्न भी होती है लेकिन तब लय में निरंतरता अनिवार्य होती है।
उक्त गीत के पहले अंतरे की पूरक पंक्ति और टेक का संयोजन इस प्रकार है-
नाद वृंद के तृष्ण दलों को, मुखर विलय कर दो। (पूरक पंक्ति)
भाव भरे उर लेकर आओ, पुण्य उदय कर दो।। (टेक)
(5) तुकान्तता– सभी अंतरों के तुकान्त भिन्न-भिन्न होते हैं किन्तु एक अंतरे में जिस क्रम की पंक्तियाँ तुकान्त होती है, सभी अंतरों में उसी क्रम की पंक्तियाँ तुकान्त होती है। एक अंतरे में तुकान्तता का क्रम स्वैच्छिक होता है किन्तु जो क्रम निर्धारित हो जाता है उसका अनुपालन सभी अंतरों में अनिवार्य होता है।
(6) लयात्मकता– सामान्यतः गीत की सभी पंक्तियों की लय समान होती है किन्तु कुछ गीतों में पंक्तियों की लय भिन्न-भिन्न भी हो सकती है। प्रत्येक स्थिति में मुखड़ा और एक अन्तरा में लयात्मक पंक्तियों का जो क्रम होता है वह आगे के सभी अंतरों में ज्यों का त्यों दुहराया जाता है। लय को जिस छन्द के द्वारा निर्धारित किया जाता है उसे ‘आधार-छन्द’ कहते है हैं।
उक्त उदाहरण में गीत की सभी पंक्तियों की लय समान है जिसका आधार-छन्द विष्णुपद है।
गीत के दो शिल्पेतर लक्षण निम्न प्रकार हैं-
(1) भावप्रवणता
गीत किसी एक भावभूमि पर रचा जाता है। मुखड़े में गीत की भूमिका होती है और इसे कुछ इस प्रकार रचा जाता है जिससे गीत की विषयवस्तु के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हो। इसमें से उस पंक्ति को टेक के रूप में चुना जाता है जिसका भावात्मक तालमेल प्रत्येक अंतरे की पूरक पंक्ति के साथ स्थापित हो सके। प्रत्येक अंतरा गीत के केंद्रीय भाव के परितः चक्रण करता हुआ तथा उसी की पुष्टि करता हुआ प्रतीत होता है। गीत जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे पाठक या श्रोता उसकी भावभूमि में उतरता चला जाता है और समापन होते-होते वह उस भावभूमि में डूब जाता है। एक उत्तम गीत के प्रत्येक अंतरे की प्राथमिक पंक्तियों में विषय का संधान किया जाता है और पूरक पंक्ति में प्रहार किया जाता है और इसी प्रहार के साथ जब टेक को दुहराया जाता है तो भावविभोर श्रोता बरबस झूम उठता है और उसके मुँह से ‘वाह’ निकल जाता है।
(2) लालित्य
गीत में सटीक उपमान, भावानुरूप शब्द-संयोजन, लोकोक्तियाँ और मुहाविरे सुरुचिपूर्वक प्रयोग करने से विशेष लालित्य उत्पन्न होता है। इसके साथ नवीन प्रतीकों और बिम्ब योजनाओं के प्रयोग से गीत का लालित्य बहुगुणित हो जाता है। ध्यान रहे कि नवीनता के संवरण में गीत की भावप्रवणता कदापि बाधित नहीं होनी चाहिए। गीत की संरचना ऐसी होनी चाहिए कि पढ़ने और समझने के बीच अधिक समय न लगे अर्थात गीत को पढ़ते या सुनते ही उसका भाव स्पष्ट हो जाये अन्यथा अभिव्यक्ति में अंतराल-दोष आ जाता है जो रसानन्द में बाधक होता है।
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- विष्णुपद (16,10)*
*सृजन शीर्षक-- कभी नहीं छलना (2अंतरे)*
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मातु-पिता के विश्वासों को, कभी नहीं छलना।
उनने शुभ संस्कार दिये हैं, उस पर ही चलना।।
पाल पोसकर बड़ा किया है, खुद ही दुख तपके।
कष्ट सहा सुख शिखर चढ़ाया, कर्म धरा जप के।।
सिखलाया है जीवन जीना, साथ समय ढलना।
मातु-पिता के विश्वासों को, कभी नहीं छलना।।
पिता वृक्ष है बरगद का तो, माता छाँव तना।
बनकर जीवन दाता दोनों, भरते भाव घना।।
साँस मिली इनसे ही हमकों, भ्रम में मत पलना।
मातु-पिता के विश्वासों को, कभी नहीं छलना।।
संतानों से उम्मीदों की, चाह लिये चलते।
कर्तव्यों से विमुख पुत्र अब, बोझ बने पलते।।
कर्म नहीं तुम ऐसा करना, हाथ पड़े मलना।
मातु-पिता के विश्वासों को, कभी नहीं छलना।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- विष्णुपद (16,10)*
*सृजन शीर्षक-- करो पूर्ण अपना (2अंतरे)*
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कर्मवीर बन सभी लक्ष्य को, करो पूर्ण अपना।
सच्चा सोना बन साँचे में, है तुमको तपना।।
हार जीत जीवन का हिस्सा, सिखलाता बढ़ना।
रखे हौसला उच्च शिखर पर, है तुमको चढ़ना।।
बढ़ते जाना थाम बुलंदी, पूरा हो सपना।
कर्मवीर बन सभी लक्ष्य को, करो पूर्ण अपना।।
अधरों पर मुस्कान खिलेगी, सीखो दुख सहना।
मुसीबतों का करो सामना, हँसते तुम रहना।।
कभी निराशा हाथ लगे तो, राम नाम जपना।
कर्मवीर बन सभी लक्ष्य को, करो पूर्ण अपना।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- विष्णुपद (16,10)*
*सृजन शीर्षक-- योग करो मन से ।(2अंतरे)*
पदांत-- 112
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स्वस्थ निरोगी काया रखने, योग करो मन से।
तरह-तरह की बीमारी को, दूर करो तन से।।
लोम विलोम कपोल करें नित, पद्मासन कर लें।
तन आलस्य थकान भगायें, हृदय स्फूर्ति भर लें।।
उम्र बढ़ायें सौ से ऊपर, हम योगासन से।
स्वस्थ निरोगी काया रखने, योग करो मन से।।
योग साधना से संभव है, लक्ष्य प्राप्ति करना।
शक्ति सन्तुलन कार्य करे यह, दृढ़ साहस भरना।।
जीवन में उल्लास भरो तुम, नित योग मनन से।
स्वस्थ निरोगी काया रखने, योग करो मन से।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- विष्णुपद (16,10)*
*सृजन शीर्षक-- पहनो गुण गहना ।(2अंतरे)*
पदांत-- 112
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सहज सरल व्यक्तित्व रखो तुम, पहनो गुण गहना।
पावन करने मन की गंगा, नीर बने बहना।।
शांति प्रेम का दूत बनो तुम, धीर सदा धरना।
पाठ पढ़ो नित भाईचारा, द्वेष नहीं करना।।
बनो सहारा दीन दुखी का, मिलजुल कर रहना।
सहज सरल व्यक्तित्व रखो तुम, पहनो गुण गहना।।
पद गरिमा सम्मान मिलेगा, नम व्यवहार रखो।
रखे हौसला आगे बढ़ लो, श्रम का स्वाद चखो।।
संगत चंदन जैसे कर लो, संत गुणी कहना।
सहज सरल व्यक्तित्व रखो तुम, पहनो गुण गहना।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- विष्णुपद (16,10)*
*सृजन शीर्षक-- मुरझाई कलियाँ ।(2अंतरे)*
पदांत-- 112
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व्यर्थ बिना माली के उपवन, मुरझाई कलियाँ।
बिना सखा के सूना जैसे, गाँव शहर गलियाँ।।
बैठ आम की डाली कोयल, कुहू- कुहू चहके।
गीत गुनगुना गाते भँवरे, प्रीत सुमन महके।।
लेकिन देखो खाली-खाली, फूलों की डलियाँ।
व्यर्थ बिना माली के उपवन, मुरझाई कलियाँ।।
सींच-सींच कर प्रेम नीर को, पुष्पित बाग किये।
काम भलाई का कर जाना, अर्पण भाव लिए।।
पिया बिना मन नहीं लागे, बजती पैजनियाँ।
व्यर्थ बिना माली के उपवन, मुरझाई कलियाँ।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक-- जग कल्याण हो। (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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नीतिपरक ही बात करें हम, जग कल्याण हो।
धर्म परायण मानवता का, नव निर्माण हो।।
कर्म साधना लोग करें नित, सोच महान हो।
दीन दुखी सेवा परहित का, भाव प्रधान हो।।
झूठ असत्य सदा ही हारे, सच संत्राण हो।
नीतिपरक ही बात करें हम, जग कल्याण हो।।
आपस में हो भाईचारा, जग उत्थान हो।
सत्य अहिंसा प्रेम दया का, सबको भान हो।।
चर्चित हर्षित लोग रहें सब, शांति प्रमाण हो।
नीतिपरक ही बात करें हम, जग कल्याण हो।।
ढोंग रूढ़ि प्रतिकार करें हम, भ्रम पाखंड का।
कुत्सित लोगों से बच रहना, पथ उद्दंड का।।
धूर्त अधर्मी चोर लुटेरों, नित निष्प्राण हो।
नीतिपरक ही बात करें हम, जग कल्याण हो।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक--तुम श्रृंगार हो। (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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तुमसे ही साँसे चलती है, प्रिय स्वीकार हो।
प्रीत मिलन की विरह वेदना, तुम श्रृंगार हो।।
व्यर्थ जिंदगी भूल तुम्हें अब, रात प्रभात है।
जाना छोड़ नहीं तुम मुझको, दुख बरसात है।।
सावन में बिजुरी चमके तब, प्रेम फुहार हो।
तुमसे ही साँसे चलती है, प्रिय स्वीकार हो।।
रूप छबीली देह सलोनी, नैन कटार है।
प्रीत रंग में हुआ बावरा, नेह बहार है।।
पुष्पित इस जीवन की हर्षित, तुम आधार हो।
तुमसे ही साँसे चलती है, प्रिय स्वीकार हो।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24-06-2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक-- रास्ते मोड़ दो। (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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घोर निराशा हाथ लगे तब, रास्ते मोड़ दो।
करे मित्रता में जो धोखा, बंधन तोड़ दो।।
मतलब से बस हाथ बढ़ाते, झूठा मीत है।
इस दुनिया में मातु-पिता की, सच्ची प्रीत है।।
बिना कर्म फल मीठा पाने, आशा छोड़ दो।
घोर निराशा हाथ लगे तब, रास्ते मोड़ दो।।
रखे सादगी जीवन जीना, तय कर्तव्य हो।
शुभ कर्मों से मान नाम हो, मन आदित्य हो।।
स्वार्थ अहम भ्रम लोभ मोह का, मटका फोड़ दो।
घोर निराशा हाथ लगे तब, रास्ते मोड़ दो।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक-- चढ़ता रंग है। (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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देख तुम्हें ही इस जीवन में, चढ़ता रंग है।
अधरों पर मुस्कान खिले प्रिय, प्रीत उमंग है।।
सावन का झूले बन आते, याद बहार का।
स्वप्न सुहावन दिखला जाते, अपने प्यार का।।
साथ तुम्हारे नाम जुड़े अब, प्रेम प्रसंग है।
देख तुम्हें ही इस जीवन में, चढ़ता रंग है।।
तुम्हीं भावना तुम्हीं साधना, तुम हो कामना।
टूट कहीं मैं दुख में जाऊँ, आकर थामना।।
मेरी चाहत की तुम पूजा, जीना संग है।
देख तुम्हें ही इस जीवन में, चढ़ता रंग है।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक-- पूरी कामना।(2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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सतगुरु पूर्ण करो मेरी अब, पूरी कामना।
अहंकार भ्रम लोभ करूँ तो, मुझको थामना।।
धन पद का अभिमान रखा जो, जीना व्यर्थ है।
लोभ मोह को त्याग करो तब, जीवन अर्थ है।।
तथाकथित शब्दों का करना, सीखो सामना।
सतगुरु पूर्ण करो मेरी अब, पूरी कामना।।
द्वेष द्वंद मन कभी न पनपे, सर्व समान हो।
जाति धर्म से दूर रहें सब, यह संज्ञान हो।।
कर्म वचन से आहत जन का, मत हो भावना।
सतगुरु पूर्ण करो मेरी अब, पूरी कामना।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक-- होगा सामना।(2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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इस जीवन की यथार्थता से, होगा सामना।
इसीलिए तो नेक भलाई, पथ को थामना।।
अवगुण मत मन कभी समाये, भ्रम को रोकना।
बुरा कर्म परिणाम बुरा है, खुद को टोकना।।
भवसागर से पार करे प्रभु, कर लो कामना।
इस जीवन की यथार्थता से, होगा सामना।।
तन कच्चा मन पक्का मानो, साँस उधार है।
दीन- हीन प्रति भाव दया रख, जग उद्धार है।।
जिसकी जैसी सोच हुई है, वैसी भावना।
इस जीवन की यथार्थता से, होगा सामना।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक- हरि का नाम ले।(2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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संकट में जब आप घिरे हो, हरि का नाम ले।
भक्तों का कल्याण करे नित, आकर थाम ले।।
भाव बिना है भक्ति अधूरा, भक्ति को भक्त है।
प्रभु का नाम समाहित कण-कण, शामिल रक्त है।।
श्रद्धा दीप जलाये रखना, नेकी काम ले।
संकट में जब आप घिरे हो, हरि का नाम ले।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/06/2024
संध्याकालीन कक्षा हेतु---
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक- नाता जोड़ ले। (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य
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सत्य अहिंसा प्रेम दया से, नाता जोड़ ले।
लोभ मोह दुख कारण बनते, मन को मोड़ ले।।
ध्यान लगाओ प्रभु चरणों में, बनता काम है।
पर निंदा से बचके रहना, मिटता नाम है।।
अहंकार भ्रम द्वेष द्वंद का, मटका फोड़ ले।
सत्य अहिंसा प्रेम दया से, नाता जोड़ ले।।
मातु-पिता गुरु से ही मिलता, जीवन अर्थ है।
बचा नहीं है स्वाभिमान तो, जीना व्यर्थ है।।
कलुषित कुत्सित बुरे जनों का, संगत छोड़ ले।
सत्य अहिंसा प्रेम दया से, नाता जोड़ ले।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/06/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- गगनांगना (16,9)*
*सृजन शीर्षक- बढ़ती वेदना। (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य
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बढ़ती है वेदना दिनों दिन, खुद को थाम लो।
सुबह शाम हर पल रे बंदे, प्रभु का नाम लो।।
घोर निराशा के आँगन में, लाता भोर है।
दया कृपा की बारिश करते, प्रभु घनघोर है।।
भक्ति भाव से नाम सदा प्रभु, आठो याम लो।
बढ़ती है वेदना दिनों दिन, खुद को थाम लो।।
परहित सेवा हाथ बढ़े नित, पूजो कर्म को।
दीन- दुखी का बनो हितैषी, समझो मर्म को।।
जान मिले पहचान मिले, नेकी काम लो।
बढ़ती है वेदना दिनों दिन, खुद को थाम लो।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/06/2024
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सरसी/कबीर छंद
इस गेय छंद में चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों में 16-16 मात्रायें (चौपाई चाल में) और सम चरणों में -11-11 मात्रायें होती है। (दोहे के सम चरण की तरह)। इस प्रकार इस सममात्रिक छंद में कुल 27 मात्रायें होती है। पदांत पर 21(दीर्घ लघु) अनिवार्य
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी/कबीर (16,11)*
*सृजन शीर्षक- चित्त कहाँ विश्राम ।(2अंतरे)*
*पदांत-- गुरु लघु (21) अनिवार्य*
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भरा आत्म में मोह जहाँ हो, चित्त कहाँ विश्राम।
ऐसा अब इंसान कहाँ जो, कर्म करे निष्काम।।
अपने ही अपनों को धोखा, देते हैं दिन रात।
हाथ मदद को नहीं बढ़ाते, जहर घुली है बात।।
मद में मानव चूर हुआ है, भूल कर्म परिणाम।
ऐसा अब इंसान कहाँ जो, कर्म करे निष्काम।।
छाया मन में अहंकार का, बादल अब घनघोर।
प्रेम दया करुणा को मन से, लूट रहा भ्रम चोर।।
धन पद माया लोभ बना है, सर्व सुखों का धाम।
ऐसा अब इंसान कहाँ जो, कर्म करे निष्काम।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी/कबीर (16,11)*
*सृजन शीर्षक- बूँदें बरसी आज। (2अंतरे)*
*पदांत-- गुरु लघु (21) अनिवार्य*
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घटा घिरी घनघोर घना घन, बूँदे बरसी आज।
खेत किसान चले हल पकड़े, छोड़ सभी अब काज।।
धरती का श्रृंगार अधूरा, बिना खेत खलिहान।
सबके मन को भा जाती है, हरा-भरा परिधान।।
सावन उस पर करे मनोहर, हरियाली ले साज।
खेत किसान चले हल पकड़े, छोड़ सभी अब काज।।
आवाजें झींगुर की भाती, दादुर की प्रिय गीत।
जैसे सबसे बाँध रखे हो, इसने अपनी प्रीत।।
मिल दोनों सिखलाते हमकों, दिल में करना राज।
खेत किसान चले हल पकड़े, छोड़ सभी अब काज।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- चलो गाँव की ओर। (2अंतरे)*
*पदांत-- गुरु लघु (21) अनिवार्य*
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पुकारते अब आँगन गलियाँ, चलो गाँव की ओर।
शांति सुखद गाँवों में है बस, शहर बहुत है शोर।।
नदी किनारे बैठे साथी, निहारते जल धार।
कागज की तो नाव बनाकर, नदी कराते पार।।
देख नीर बलखाती धारा, मन में उठे हिलोर।
शांति सुखद गाँवों में है बस, शहर बहुत है शोर।।
आम नीम बरगद पीपल का, खूब सुहाते छाँव।
खेल खेलते थे हम दिन भर, थक जाते थे पाँव।।
माँ की गोदी सिर रख सोते, चलता पता न भोर।
शांति सुखद गाँवों में है बस, शहर बहुत है शोर।।
दादी की लोरी सुनते थे, सोते दादा साथ।
गली घुमाने ले जाते थे, चाचा पकड़े हाथ।।
गाँवों में बचपन की यादें, देता अब झकझोर।
शांति सुखद गाँवों में है बस, शहर बहुत है शोर।।
पहले लगते थे गाँवों में, शाम-रात चौपाल।
घर की बातें घर में रहती, सब रहते खुशहाल।।
घर आँगन परिवार बँटा अब, मीत हुये कमजोर।
शांति सुखद गाँवों में है बस, शहर बहुत है शोर।।
गौठानों में गाय नहीं अब, गायब चारागाह।
बीच सड़क में गायें दिखती, सुध लेने रख चाह।।
दूध दही को तरस रहें वें, घर निकाल कर ढोर।
शांति सुखद गाँवों में है बस, शहर बहुत है शोर।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- क्यों करता है भूल। (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (21) अनिवार्य*
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नेक कर्म को ध्येय बना लो, क्यों करता है भूल।
लोभ मोह भय के राहों में, बिछा हुआ है शूल।।
सत्य सनातन अजर अमर है, सत्य सुखों का खान।
सत्य अहिंसा प्रेम दया का, रख चलना तुम ध्यान।।
इस जीवन में मनुज झूठ को, करना नहीं कुबूल।
नेक कर्म को ध्येय बना लो, क्यों करता है भूल।।
पढ़ लो गीता रामायण तुम, पढ़ लो वेद कुरान।
सर्व धर्म संदेश यही है, एक सभी इंसान।।
जाति-धर्म का बंधन तोड़ो, खिले सुमत का फूल।
नेक कर्म को ध्येय बना लो, क्यों करता है भूल।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- सुनलो कजरी गीत। (2अंतरे)*
*पदांत-- गुरु लघु (21) अनिवार्य*
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विरह वेदना छोड़ मिलन की, सुन लो कजरी गीत।
लौट चले आऊँगा जल्दी, आस रखो तुम प्रीत।।
बसी हुई हो इस धड़कन में, बन करके तुम साँस।
पल-पल मुझको तड़पा जाती, याद तुम्हारी फाँस।।
भूल नहीं पाता हूँ मैं भी, बातें साथ अतीत।
लौट चले आऊँगा जल्दी, आस रखो तुम प्रीत।।
समझो मेरी मजबूरी तुम, समझो मेरा क्लेश।
पूरा करने चाह जरूरत, दूर बसा परदेश।।
थोड़े दिन समझा लो खुद को, सुन लो मेरे मीत।
लौट चले आऊँगा जल्दी, आस रखो तुम प्रीत।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- तुम मेरे सरकार। (2अंतरे)*
*पदांत-- गुरु लघु (21) अनिवार्य*
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जीने का आधार बने हो, तुम मेरे सरकार।
प्रीत बने तुम कर जाना अब, जीवन का उद्धार।।
बात जुदाई कभी न करना, देना हरदम साथ।
मान तुम्हें मैं जीवन साथी, थाम लिया है हाथ।।
साँसों से साँसों का मिलना, जोड़ लिया है तार।
प्रीत बने तुम कर जाना अब, जीवन का उद्धार।।
मेरे सपनों की तुम रानी, मेरे हो तुम प्यार।
इंतजार मैं करते रहता, पाने को दीदार।।
सजा रखा हूँ प्रिये मिलन को, अपने मन का द्वार।
प्रीत बने तुम कर जाना अब, जीवन का उद्धार।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- मंद मंद मुस्कान ।(2अंतरे)*
*पदांत-- गुरु लघु (21) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
प्यारी बिटिया रानी तेरी, मंद-मंद मुस्कान।
देख तुम्हारी भोली सूरत, होता दूर थकान।।
पंछी बन आँगन में चहके, करते भाव विभोर।
कभी फुदक कर खेला करती, कभी मचाती शोर।।
बेटी है तुलसी की चौंरा, बेटी फूल समान।
देख तुम्हारी भोली सूरत, होता दूर थकान।।
बेटी है पूजा की थाली, बेटी लक्ष्मी रूप।
आँखों में वह नीर सजाकर, सह जाती दुख धूप।।
बेटी है ममता की मूरत, बेटी सुख की खान।
देख तुम्हारी भोली सूरत, होता दूर थकान।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- बेटी तो अनमोल ।(2अंतरे)*
*पदांत-- गुरु लघु (21) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
वेद पुराण हमारे कहते, बेटी तो अनमोल।
बेटी से दो कुल है रोशन, ऋषि मुनियों का बोल।।
संस्कारो की जननी बेटी, मर्यादा माँ बाप।
घर की इज्जत मान बचाने, दुख सहती चुपचाप।।
जब-जब बेटी हँसती है तब, देती मिश्री घोल।
बेटी से दो कुल है रोशन, ऋषि मुनियों का बोल।।
बेटी ही माँ बहू बनी है, बेटी ही तो सास।
जिम्मेदारी सदा निभाती, रखे आत्मविश्वास।।
मन की बातों को भी बेटी, लेती सदा टटोल।
बेटी से दो कुल है रोशन, ऋषि मुनियों का बोल।।
राष्ट्र चलाया बेटी ही बन, महिला प्रथम प्रधान।
पाँव चाँद पर रखा प्रथम भी, बन भारत अभिमान।।
बेटी नित इतिहास रचा है, देखो पन्ना खोल।
बेटी से दो कुल है रोशन, ऋषि मुनियों का बोल।।
भेद करो मत बेटी बेटा, दोनों एक समान।
बेटा कुल का दीपक है तो, बेटी सुख की खान।।
एक दर्द से दोनों आते, गजानंद मत तोल।
बेटी से दो कुल है रोशन, ऋषि मुनियों का बोल।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- करे धरा श्रृंगार ।(2अंतरे)*
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हरियाली की ओढ़ चुनरिया, किये धरा श्रृंगार।
मस्ती में मुस्काती बहती, शीतल मंद बयार।।
बरसातों से ताल नदी में, भरा नीर अब खूब।
खेत किसान चले हल पकड़े, आज खुशी में डूब।।
पेड़ पात पर बूँद पड़ी जब, पाया रूप निखार।
मस्ती में मुस्काती बहती, शीतल मंद बयार।।
घोर घटा ले बादल बरसे, खुशहाली रख ध्यान।
दादुर नाचे गीत सुनाये, झींगुर छेड़े तान।।
फूल कली में यौवन आया, बाग हुये गुलजार।
मस्ती में मुस्काती बहती, शीतल मंद बयार।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- चलना सोच विचार (2अंतरे)*
*पदांत-- गुरु लघु (21) अनिवार्य*
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पग-पग धोखा जाल बिछा है, चलना सोच विचार।
मानवता उपकार नहीं अब, मन में भरा विकार।।
लोभ लालसा धन पद माया, कर बैठे हैं लोग।
जग-जन को विकलांग किया है, अंधभक्ति का रोग।।
अपनों से अपने ही लड़ते, आपस रख तकरार।
मानवता उपकार नहीं अब, मन में भरा विकार।।
दीन भलाई परहित सेवा, लोग गये हैं भूल।
कर्म घड़ा में गरल भरा है, वचनों में तो शूल।।
गजानंद रख प्रेम भावना, सुखमय हो संसार।
मानवता उपकार नहीं अब, मन में भरा विकार।।
----इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- सरसी (16,11)*
*सृजन शीर्षक- महक उठा संसार (2अंतरे)*
*पदांत-- (21) अनिवार्य*
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प्यार मिला है जबसे तेरा, महक उठा संसार।
एक झलक पाने को मैं तो, करता हूँ दीदार।।
इंतजार में रातें बीते, प्रीत मिलन में भोर।
बाँध रखा है मैंने तुमसे, जनम-जनम का डोर।।
प्रेम पथिक बन जीवन मैंने, तुम पर दिया गुजार।
एक झलक पाने को मैं तो, करता हूँ दीदार।।
तुमको मूरत चाहत माना, तुमको छवि भगवान।
प्रीत बिना इंसान हुआ है, सुन लो स्वान समान।।
प्रेम पुजारी बन मैं बैठा, मंदिर मस्जिद द्वार।
एक झलक पाने को मैं तो, करता हूँ दीदार।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- ऊँची मेरी उड़ान (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
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अभी कहॉं तुम तो देखे हो, ऊँची मेरी उड़ान।
रखे हौसला खुद में चलता, मैं छू लूँ आसमान।।
दिशा हवा की बदल बता दूँ, पानी का राह मोड़।
बज्र भुजा जब देखे भागे, दुश्मन मैदान छोड़।।
झूठ विनाश सदा करने को, थाम रखा हूँ कमान।
रखे हौसला खुद में चलता, मैं छू लूँ आसमान।।
भूखा कोई लोग न सोये, ऐसा मेरा प्रयास।
धरती का भगवान कहाऊँ, मैं सबका प्रेम आस।।
लोग किसान मुझे हैं कहते, कर्म करूँ मैं महान।
रखे हौसला खुद में चलता, मैं छू लूँ आसमान।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- आई देखो बहार (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
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*परम श्रद्धेय गुरुदेव जी को जन्मदिवस की हार्दिक बधाई देते हुए यह छंद सुमन श्री गुरु चरण में सादर समर्पित करता हूँ🙏🏻*********************************
श्री रामनाथ साहू गुरुवर, हृदय आपका उदार।
इसीलिए तो जन्मदिवस में, आई देखो बहार।।
छंद विधान दिया सीखा है, छंद बिलासा महान।
ज्ञान खजाना लुटा दिये गुरु, मान सभी को समान।।
सोच आपका उत्तम अनुपम, सर्वश्रेष्ठ है विचार।
इसीलिए तो जन्मदिवस में, आई देखो बहार।।
दोहा रोला छंद सोरठा, सीखा सरसी विशाल।
पदावली चौपाई रुचिरा, रास गीतिका कमाल।।
नित नवनूतन छंद सिखाये, छंद पुराना प्रचार।
इसीलिये तो जन्मदिवस में, आई खुशी बहार।।
गुरु सानिध्य कृपा पाने को, हुआ हृदय है अधीर।
गुरु नानक जैसे ननकी गुरु, लगे मुझे हैं कबीर।।
गजानंद जी करे कामना, पाओ खुशियाँ अपार।
इसीलिए तो जन्मदिवस में, आई खुशी बहार।।
-----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- छंददेव हैं महान। (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
छंद बिलासा पुण्य पटल है, छंददेव है महान।
छंद सीख साहित्य गगन में, साधक भरते उड़ान।।
सृजन शब्द देते गुरु सत्ता, भरते गहरा विचार।
बतलाते गण कल संयोजन, लय गायन में निखार।।
बारीकी से सभी छंद का, हमें सिखाते विधान।
छंद सीख साहित्य गगन में, साधक भरते उड़ान।।
गुरु रामनाथ साहू ननकी जी, स्तुत्य आपका प्रयास।
भक्ति भाव स्वीकार करो गुरु, भरो कलम में उजास।।
गजानंद को दया कृपा गुरु, करते रहना प्रदान।
छंद सीख साहित्य गगन में, साधक भरते उड़ान।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- होगी बातें हजार । (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
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साथ झूठ का दोगे तुम तो, होगी बातें हजार।
सत्य राह में जीवन जीने, कर लेना तुम विचार।।
कदम चूमेगी सदा सफलता, नहीं छोड़ना प्रयास।
सबक सिखाती है असफलता, मत हो जाना उदास।।
धीर धरे चलने से मिलता, मन में खुशियाँ अपार।
सत्य राह में जीवन जीने, कर लेना तुम विचार।।
--- 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/07/2024
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*विधा- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- छोड़ो कोई निशान । (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
*****************************
नाम अमर जग में हो जाये, छोड़ो ऐसा निशान।
कर्म महान करो रे बंदे, यही दुखो का निदान।।
छोड़ो निंदा लोभ बुराई, रखो हृदय को विशाल।
तथाकथित तथ्यों पर करना, सीखो तुम तो सवाल।।
मुसीबतों का करो सामना, थाम हौसला कमान।
कर्म महान करो रे बंदे, यही दुखो का निदान।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- सोचो कोई उपाय । (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
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शोषण अत्याचार मिटाने, सोचो कोई उपाय।
भूख गरीबी चरम लाँघते, इसको कैसे मिटाय।।
त्रस्त लोग हैं बेकारी से, कौन करे पर सवाल।
इसी बात की गजानंद को, हरदम रहता मलाल।।
अंध मूक कानून हुआ अब, कौन बनेगा सहाय।
भूख गरीबी चरम लाँघते, इसको कैसे मिटाय।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- नहीं किसी के गुलाम (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
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सत्य राह में चलने वाला, नहीं किसी के गुलाम।
अपने कर्म लगन से पाता, निशदिन ऊँचा मुकाम।।
लक्ष्य प्राप्त करने को मन से, करे सदा वह प्रयास।
मुसीबतों का करे सामना, दिखे नहीं वह उदास।।
कर्मशील मानव को दुनिया, करे सदा ही प्रणाम।
अपने कर्म लगन से पाता, निशदिन ऊँचा मुकाम।।
लोक भलाई काम करे वह, रखकर मन को उदार।
शब्द-शब्द में भाव भरे प्रिय, पावन गहरा विचार।।
आत्म प्रशंसा दूर परे वह, जीवन जीता अनाम।
अपने कर्म लगन से पाता, निशदिन ऊँचा मुकाम।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- आई बरखा बहार। (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
गरज-गरज कर बादल बरसे, आई बरखा बहार।
जीव चराचर खुशहाली में, झूम रहे हैं अपार।।
झरने झर-झर करते झरते, नदियों में है उमंग।
ताल कूप सब दिखे लबालब, दादुर झींगुर मतंग।।
खेत किसानी किसान करने, हुआ हृदय घन उदार।
जीव चराचर खुशहाली में, झूम रहे हैं अपार।।
मंद-मंद तरु पवन पुकारे, भरते मन में हुलास।
हरियाली में झूले झूलो, प्रिय मत रहना उदास।।
पिया मिलन को देखो साजन, चढ़ा हुआ है खुमार।
जीव चराचर खुशहाली में, झूम रहे हैं अपार।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- धृष (16,12)*
*सृजन शीर्षक- करना होगा चुनाव । (2अंतरे)*
*पदांत-- जगण (121) अनिवार्य*
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सबको अपना मीत कहें हम, छोड़ चले अब दुराव।
कौन सही है कौन गलत है, सीखें करना चुनाव।।
सत्य अहिंसा मानवता का, छोड़ चले लोग राह।
झूठ ढोंग पाखंड रूढ़ि को, दिए सदा हैं पनाह।।
शूल चुभाते अपने ही अब, देते मन को तनाव।
कौन सही है कौन गलत है, सीखें करना चुनाव।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/07/2024
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*विधा-- गीत*
*प्रदीप छंद-- सममात्रिक छंद*
*कुल मात्रा -29*
*यति - 16,13*
*सृजन शीर्षक- नारी का श्रृंगार है। (2अंतरे)*
*पदांत-- राजभा (212) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
नारी से विस्तार जगत का, सँजो रखे दो द्वार है।
मर्यादा संस्कार हया ही, नारी का श्रृंगार है।।
नारी प्रतिमूर्ति प्रेम करुणा, धागा है विश्वास का।
नारी पूजा की थाली है, भक्ति भाव उपवास का।।
कर्मों से परिपूर्ण सुसज्जित, नारी हृदय उदार है।
मर्यादा संस्कार हया ही, नारी का श्रृंगार है।।
माता बेटी बहन बहू बन, बनती दो कुल शान है।
जीवन साथी बन पति का, पाती वह पहचान है।।
रीति नीति में पारंगत वह, ग्रंथों का उद्गार है।
मर्यादा संस्कार हया ही, नारी का श्रृंगार है।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- बूँदों का त्योहार है। (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
रिमझिम-रिमझिम पानी गिरता, बूँदों का त्योहार है।
सावन में हरियाली भावन, पावन मन का द्वार है।।
कूप नदी सब ताल तलैया, हुए लबालब खेत भी।
मेड़ सुरक्षा करने जाने, सोच किसान सचेत भी।।
गीत दादरा दादुर गाते, झींगुर की झंकार है।
सावन में हरियाली भावन, पावन मन का द्वार है।।
सावन भादो तीज हरेली, रक्षा बंधन पर्व है।
स्वतंत्रता का दिवस सुहावन, होता सबको गर्व है।।
भाता जन्माष्टमी कृष्ण प्रभु, धर्म रीति संस्कार है।
सावन में हरियाली भावन, पावन मन का द्वार है।।
सावन में ही काँवर यात्रा, शंकर भोलेनाथ का।
ज्योतिर्लिंग में नीर चढ़ाते, अपने- अपने हाथ का।।
सात सोम व्रत रखते नारी, भक्तों भक्ति अपार है।
सावन में हरियाली भावन, पावन मन का द्वार है।।
बचपन की यादों में खोये, रोये दोनों नैन है।
कागज की वो नाव चलाने, मन मेरा बेचैन है।।
सोंधी-सोंधी महक गाँव की, शोर शहर बेकार है।
सावन में हरियाली भावन, पावन मन का द्वार है।।
-----इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- ऐसा मेरा प्यार हो । (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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दिल के जज्बातों को समझे, ऐसा मेरा प्यार हो।
जीवन की बगियाँ महका दो, तुम्हीं सनम संसार हो।।
प्रेम पुजारी बन बैठा मैं, एक झलक दीदार है।
विरह वेदना प्यास बुझा दो, छाया चाह खुमार है।।
थाम हाथ तुम मेरा लेना, खुशियों का गुलजार हो।
जीवन की बगियाँ महका दो, तुम्हीं सनम संसार हो।।
प्रीत बिना है साँस अधूरी, गरल हुआ प्रिय चाह है।
बिना हमसफ़र सुन लो साथी, दुष्कर जीवन राह है।।
मधुर मनोहर गीत प्रिये तुम, मनभावन झंकार हो।
जीवन की बगियाँ महका दो, तुम्हीं सनम संसार हो।।
----इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- करते निज उपहास है । (3अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
कर्म बुरा जग करके मानव, करते निज उपहास है।
तार-तार है मानवता अब, घात लगा विश्वास है।।
सत्य सनातन परंपरा को, दिखते जन-जन भूलते।
रूढ़ि राह में पाँव बढाकर, बीच अधर में झूलते।।
अपने कर्मों का लोगों को, हुआ नहीं आभास है।
तार-तार है मानवता अब, घात लगा विश्वास है।।
भाग्य भरोसे बैठें है सब, छोड़ कर्म की राह को।
संस्कृति संस्कार निभाने, रखना टिका निगाह को।।
बिना मेहनत मंजिल पाना, मानों झूठा आस है।
तार-तार है मानवता अब, घात लगा विश्वास है।।
जीवन की परिभाषा समझो, समझो जीवन सार को।
दीन-हीन सेवा ही देवा, याद रखो उपकार को।।
गजानंद धनवान वही है, मातु पिता जो पास है।
तार-तार है मानवता अब, घात लगा विश्वास है।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- करें सभी माँ आरती । (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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सुबह शाम नित शीश झुकाकर, करें सभी माँ आरती।
भारत का हो भाग्य विधाता, वंदन है माँ भारती।।
वीर शहीदों की कुर्बानी, युद्धभूमि ललकार हो।
रानी लक्ष्मीबाई दुर्गा, चेतक की रफ्तार हो।।
रणचंडी बन पापों को माँ, पल भर में संहारती।
भारत का हो भाग्य विधाता, वंदन है माँ भारती।।
रक्त-रक्त में आप समाये, कर्जदार हूँ आपका।
भरा हुआ है मन में पीड़ा, बलिदानी संताप का।।
गजानंद विश्वास अटल है, भय से माँ है तारती।
भारत का हो भाग्य विधाता, वंदन है माँ भारती।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- बदल गया इंसान रे। (3अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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चाँद न बदला सूर्य न बदला, बदला नहीं विधान रे।
पर लालच में देखो कितना, बदल गया इंसान रे।।
भाई ही भाई का दुश्मन, बन बैठा है आज तो।
बँटवारा माँ बाप किये हैं, बचा नहीं तन लाज तो।।
बाँट लिए हैं मंदिर मस्जिद, बाँट लिए भगवान रे।
पर लालच में देखो कितना, बदल गया इंसान रे।।
धर्म नाम का चादर ओढ़े, लड़ा रहें हैं लोग को।
स्वार्थ साधने ढोंग किये हैं, फैला भ्रम भय रोग को।।
लोक भलाई मर्यादा का, रहा नहीं अब भान रे।
पर लालच में देखो कितना, बदल गया इंसान रे।।
गली-गली में रावण दिखता, द्वार-द्वार पर कंस है।
नारी इज्जत नहीं सलामत, मानवता विध्वंस है।।
गजानंद ऐसे में कैसे, होगा देश महान रे।
पर लालच में देखो कितना, बदल गया इंसान रे।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- अनुपम यह उपहार है। (3अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
मानव तन सौभाग्य मिला, अनुपम यह उपहार है।
आग हवा आकाश धरा जल, पाँच तत्व ही सार है।।
आये खाली हाथ सभी जग, जाना खाली हाथ है।
धन पद माया मोह अहं सब, साँसों तक का साथ है।।
जीते जी सब मेरा-मेरा, मरने पर बेकार है।
आग हवा आकाश धरा जल, पाँच तत्व ही सार है।।
माटी का तन माटी मिलना, छोड़ो झूठी शान को।
सत्य कर्म रख जीवन जीना, मत बेचो ईमान को।।
धर्म बड़ा सुख परहित सेवा, दीन-दुखी उपकार है।
आग हवा आकाश धरा जल, पाँच तत्व ही सार है।।
आपस में हो भाईचारा, सबका सुख कल्याण हो।
मानवता की रक्षा करना, जब तक तन में प्राण हो।।
सत्य अहिंसा प्रेम दया ही, जीवन का आधार है।
आग हवा आकाश धरा जल, पाँच तत्व ही सार है।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- मातु पिता का प्यार हो । (3अंतरे)*
*पदांत-- रगण (212) अनिवार्य*
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इस जीवन का असल खजाना, मातु-पिता का प्यार है।
जिनके पावन चरणों में ही, सर्व सुखों का सार है।।
माता ममता की परछाईं, पिता प्रेम पर्याय है।
गीता का उपदेश पिता ही, वेदों का अध्याय है।।
ग्रन्थ कुरान समाहित इनमें, दुख में तारणहार है।
जिनके पावन चरणों में ही, सर्व सुखों का सार है।।
दुख विपदा से जूझ-जूझकर, मुँह में डाले कौर है।
सर्व देव में माना मैनें, मातु-पिता सिरमौर है।।
जन्म दिए हैं हमें धरा पर, बहुत बड़ा उपकार है।
जिनके पावन चरणों में ही, सर्व सुखों का सार है।।
मातु-पिता से साँस मिली है, कर्जदार यह खून है।
सेवा करके कर्ज चुकाऊँ, मन में रखा जुनून है।।
कभी बुढ़ापा मत तरसे सुख, गजानंद उद्गार है।
जिनके पावन चरणों में ही, सर्व सुखों का सार है।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- गुरु की महिमा गाइए।(3अंतरे)*
*पदांत-- रगण 212 अनिवार्य*
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चरण कमल में शीश झुकाकर, गुरु की महिमा गाइए।
गुरु से पाकर ज्ञान सुधा रस, भव सागर तर जाइए।।
तीन लोक में गुरु से बढ़कर, बड़ा नहीं भगवान है।
बरसाते गुरु नेह नीर नित, पावन मेघ समान है।।
दुख विपदा में साथ खड़े हैं, कभी नहीं घबराइए।
गुरु से पाकर ज्ञान सुधा रस, भव सागर तर जाइए।।
लोहे को गुरु कुंदन करते, बनकर पारस ज्ञान का।
कर्मपरायण भाव जगाते, सुप्त हुए इंसान का।।
साक्षर सभ्य समाज बनाने, शिक्षा दीप जलाइए।
गुरु से पाकर ज्ञान सुधा रस, भव सागर तर जाइए।।
चाक कुम्हार समान हुए गुरु, गढ़े घड़ा तन रूप को।
दिए दीन को ज्ञान बराबर, ज्ञान बराबर भूप को।।
सबको एक समान मानते, गजानंद समझाइए।
गुरु से पाकर ज्ञान सुधा रस, भव सागर तर जाइए।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- प्रदीप (16,13)*
*सृजन शीर्षक- मोती बिखरे बाल में (2अंतरे)*
*पदांत-- रगण 212 अनिवार्य*
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श्याम सलोने रूप कन्हैया, मोती बिखरे बाल में।
मोह मोहना मन को लेते, ठुमुक-ठुमुक की चाल में।।
दूध मलाई माखन खाते, घूम- घूम हर द्वार में।
रास रचाते वृंदावन में, राधा के जो प्यार में।।
कृष्ण गोपियाँ मजा उड़ाते, बैठ कदम के डाल में।
मोह मोहना मन को लेते, ठुमुक-ठुमुक की चाल में।।
धर्म सनातन रक्षा करने, नाश किये वह कंस का।
कारक कृष्ण कन्हाई प्रभु हैं, पापों के विध्वंस का।।
गीता का उपदेश पढ़ो नित, मत फँसना जंजाल में।
मोह मोहना मन को लेते, ठुमुक-ठुमुक की चाल में।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- खुशियाँ खूब मनायेंगे। (3अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
तीन रंग का ध्वजा तिरंगा, साथी मिल फहरायेंगे।
आजादी का पर्व सुहावन, खुशियाँ खूब मनायेंगे।।
अमर शहीदों की कुर्बानी, नम कर देती आँखों को।
झूल गए फाँसी के फंदे, हँसकर चूम सलाखों को।।
वीर पुत्र भारत माँ खोया, कैसे याद भुलायेंगे।
आजादी का पर्व सुहावन, खुशियाँ खूब मनायेंगे।।
जाति धर्म से परे सभी हो, सबने लड़ी लड़ाई थी।
सोने की चिड़िया हाथों में, लाकर हमें थमाई थी।।
उनके सपनों का हम भारत, आओ आज बनायेंगे।
आजादी का पर्व सुहावन, खुशियाँ खूब मनायेंगे।।
रहे न वंचित कोई तबका, अपने सुख अधिकारों से।
चोर खजाना ले मत जाये, अर्जी पहरेदारों से।।
हर हाथों में काम रहे अब, जनगण मन मिल गायेंगे।
आजादी का पर्व सुहावन, खुशियाँ खूब मनायेंगे।।
लोकतंत्र का पावन उत्सव, खुशहाली ले आया है।
अनेकता में भाव एकता, गजानंद मन भाया है।।
जिस मिट्टी में जन्म लिये हैं, उसका कर्ज चुकायेंगे।
आजादी का पर्व सुहावन, खुशियाँ खूब मनायेंगे।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- राग रंग भरमाते हैं । (2अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
चार दिनों के इस जीवन में, राग रंग भरमाते हैं।
कौन पराया अपना है जग, काम कौन दुख आते हैं।।
माया ठगनी ठग नित करते, लालच आत्म दुखाया है।
करो नहीं अभिमान कभी भी, मिट्टी का यह काया है।।
स्वार्थ भरी हैं इस दुनिया में, हुए मतलबी नाते हैं।
कौन पराया अपना है जग, काम कौन दुख आते हैं।।
जीवन साँस उधार मिला है, इसका कर्ज चुकाना है।
त्याग स्वयं की अभिलाषा को, अपनों का साथ निभाना है।।
गजानंद नित प्रेम शांति का, परिभाषा समझाते हैं।
कौन पराया अपना है जग, काम कौन दुख आते हैं।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- पुलकित है धरती रानी। (3अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
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बूँद गिरा पावस का पावन, पुलकित है धरती रानी।
दुल्हन जैसी धरा सजी है, आज चुनर ओढ़े धानी।।
खेतों में है हरियाली अब, मोर पपीहा गाते हैं।
मस्ती में है पुरवाई भी, दादुर ढोल बजाते हैं।।
घोर घटा ले घन हैं बरसे, बूँद लगे हैं मस्तानी।
दुल्हन जैसी धरा सजी है, आज चुनर ओढ़े धानी।।
फूल पात तरु की नव डाली, झूम रहे खुशहाली में।
बाग बगीचों में अब दिखते, माली भी रखवाली में।।
ऊपर पानी नीचे पानी, सभी तरफ दिखते पानी।
दुल्हन जैसी धरा सजी है, आज चुनर ओढ़े धानी।।
चमक उठी हलधर की आँखें, करने धान बुआई को।
श्रम का गाना गाते फिरते, जोड़े मीत मिताई को।
बैल किसान गजानन बोले, छोड़ो अब आनाकानी।।
दुल्हन जैसी धरा सजी है, आज चुनर ओढ़े धानी।।
----इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- सजी द्वार में रंगोली । (2अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
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श्री सतगुरु जी के स्वागत में, सजी द्वार में रंगोली।
करूँ कामना पूर्ण करो गुरु, भर देना मेरी झोली।।
रहूँ अभागा सुख से मत मैं, मेरे आप सहारा हो।
इस जीवन को निर्मल कर दो, गंगा पावन धारा हो।।
रहना मेरे पास सदा ही, साथी बन दामन चोली।
करूँ कामना पूर्ण करो गुरु, भर देना मेरी झोली।।
सबका मालिक एक तुम्हीं हो, मेरे भाग्य विधाता हो।
हाथ कभी खाली मत रखना, सर्व सुखों का दाता हो।
गजानंद कर जोर कहे गुरु, कर देना मधुरस बोली।
करूँ कामना पूर्ण करो गुरु, भर देना मेरी झोली।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- गीत जीत के गायेंगे 3अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
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थाम बाजुओं में ताकत हम, गीत जीत के गायेंगे।
भारत के दुश्मन को हरदम, रण में धूल चटायेंगे।।
बच्चा-बच्चा वीर शिवा है, हर नारी लक्ष्मीबाई।
मातु भारती रक्षा करने, हमनें कसमें है खाई।।
जान हथेली दाँव लगाकर, इनकी लाज बचायेंगे।
भारत के दुश्मन को हरदम, रण में धूल चटायेंगे।।
वीरों की बलिदानी से ही, मिली हमें है आजादी।
नींव हिला दी अंग्रेजों की, वस्त्र पहन बापू खादी।।
अमर खुदी आजाद रहेंगे, इनका कर्ज चुकायेंगे।
भारत के दुश्मन को हरदम, रण में धूल चटायेंगे।।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, मिलकर लड़े लड़ाई थे।
जाति- धर्म को भूल वहाँ पर, सब तो भाई-भाई थे।।
ऐसे ही अब देश धर्म का, सबको सीख सिखायेंगे।
भारत के दुश्मन को हरदम, रण में धूल चटायेंगे।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- सच दर्पण दिखलायेगा (3अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️
करके पर्दाफाश झूठ का, सच दर्पण दिखलायेगा।
सत्य अहिंसा मानवता का, सबको पाठ पढ़ायेगा।।
पीर पराई अपना मानो, सुख का पाठ पढ़ाना है।
दीन दुखी परहित सेवा को, निस-दिन हाथ बढ़ाना है।।
चलकर नेकी राह भलाई, वह मानव बन जायेगा।
सत्य अहिंसा मानवता का, सबको पाठ पढ़ायेगा।।
छोड़ बुराई पर निंदा को, आगे बढ़ते जाना है।
सत्कर्मों से इस जीवन को, पावन धन्य बनाना है।।
बाँट निवाला जिसने खाया, स्वर्ग यही वह पायेगा।
सत्य अहिंसा मानवता का, सबको पाठ पढ़ायेगा।।
श्रम से ही तो मिले सफलता, श्रम ही पूजा देवा है।
इस दुनिया में सबसे बढ़कर, मातु-पिता का सेवा है।।
गजानंद गुरु भक्ति भजन में, अपना समय बितायेगा।
सत्य अहिंसा मानवता का, सबको पाठ पढ़ायेगा।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/07/2024
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🌀 *बिलासा छंद महालय* 🐚
*दिनांक -- 26/07/2024*
*दिन -- शुक्रवार*
*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- शिवधाम मुझे जाना है। (3अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
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थाम काँध पर काँवड़ पावन, शिवधाम मुझे जाना है।
दर्शन कर औघड़दानी का, जीवन धन्य बनाना है।।
कालों का शिव महाकाल है, सुख दाता जग स्वामी है।
आदि अनादि अनंत यही है, प्रभु जी अंतर्यामी है।।
जटा बहे गंगा की धारा, चमके चाँद सुहाना है।
दर्शन कर औघड़दानी का, जीवन धन्य बनाना है।।
भष्म रमाये अंग-अंग में, बैठे हैं बन बैरागी।
पावस पावन शुभ बेला, में भक्ति हृदय में है जागी।।
शंकर भोलेनाथ मनाने, धतुरा दूध चढ़ाना है।
दर्शन कर औघड़दानी का, जीवन धन्य बनाना है।।
बम बम भोले शिव का हो ले, काँवरियों का नारा है।
दीन-दुखी भक्तों का बनते, भोलेनाथ सहारा है।।
मन में श्रद्धा भाव जगाकर, सुख समृद्धि पाना है।
दर्शन कर औघड़दानी का, जीवन धन्य बनाना है।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- रक्षा भार उठायेंगे । (3अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
बन सपूत हम भारत माँ का, रक्षा भार उठायेंगे।
इसका मान बढ़ाने को नित, आगे कदम बढायेंगे।।
तीन रंग का ध्वजा तिरंगा, हमको सीख सिखाता है।
त्याग शांति हरियाली का यह, सबको राह दिखाता है।
मातृभूमि की सेवा करने, शूली पर चढ़ जायेंगे।
इसका मान बढ़ाने को नित, आगे कदम बढायेंगे।।
प्राणों से भी प्यारा भारत, महिमा ऋषि मुनि गाते हैं।
विश्व बंधुता देश प्रेम का, परचम हम फहराते हैं।।
जनगण मन मंगल दायक का, जग को गीत सुनायेंगे।
इसका मान बढ़ाने को नित, आगे कदम बढायेंगे।।
कभी नहीं हम झुकने देंगे, इसके पग मर्यादा को।
खाक मिला देंगे दुश्मन को, उसकी बुरी इरादा को।।
आन तिरंगा मान गजानन, इसको गले लगायेंगे।
इसका मान बढ़ाने को नित, आगे कदम बढायेंगे।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- शब्द शब्द मुस्काते हैं। (2अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
गजानंद जब छंद सुनाते, सब पुलकित हो जाते हैं।।
अक्षर-अक्षर गाना गाते, शब्द- शब्द मुस्काते हैं।
ध्यान रखे लय कल संयोजन, मन का भाव सजाता है।
यति गति का कर परिपालन, शुद्ध तुकांत मिलाता है।।
मात्रा भार विधान सही रख, अनुपम छंद सृजाते हैं।
अक्षर-अक्षर गाना गाते, शब्द- शब्द मुस्काते हैं।।
दिखलाता दर्पण समाज को, बुरा भला सच्चाई का।
सबसे कहता थाम चलो तुम, राह सदा अच्छाई का।।
तथाकथित तथ्यों को त्यागो, सबको सीख सिखाते हैं।
अक्षर- अक्षर गाना गाते, शब्द- शब्द मुस्काते हैं।।
जग-जन के पीड़ा को लिखता, थामे लोक भलाई को।
किये रूढ़ि पाखण्ड उजागर, लिखकर ढोंग बुराई को।।
इसीलिए तो गजानंद जी, सत्यबोध कहलाते हैं।
अक्षर-अक्षर गाना गाते, शब्द- शब्द मुस्काते हैं।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- ताटंक (16,14)*
*सृजन शीर्षक- नया सवेरा लायेंगे (2अंतरे)*
*पदांत-- मगण (222) अनिवार्य*
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
सत्य अहिंसा प्रेम राह चल, नया सवेरा लायेंगे।
मानव- मानव एक बनें हम, मन से भेद मिटायेंगे।।
एक खून तन चाम सभी का, एक दर्द से आये हैं।
जाति धर्म का बोलो किसने, रोग अछूत लगाये हैं।।
मानवता का पाठ पढ़ाते, सबको आज जगायेंगे।
मानव- मानव एक बनें हम, मन से भेद मिटायेंगे।।
पाँच तत्व से देह बना यह, जीवन सत्य दिलासा है।
आग हवा आकाश धरा जल, चले इन्हीं से श्वांसा है।।
तथाकथित हम तथ्य विखंडन, निसदिन करते जायेंगे।
मानव- मानव एक बनें हम, मन से भेद मिटायेंगे।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- कुकुभ (16,14)*
*सृजन शीर्षक- तुम बिगड़ी आज बनाओ (2अंतरे)*
*पदांत-- (22) अनिवार्य*
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सतगुरु तेरे द्वार खड़ा हूँ, तुम बिगड़ी आज बनाओ।
ठोकर खाया हूँ दुनिया से, गुरु मुझको गले लगाओ।।
दर्द दिया अपनों ने मुझको, पग धोखा शूल बिछाया।
समझ नहीं कुछ पाया मैं तो, जग खेल लोभ धन माया।।
स्वार्थ भरी इस दुनिया से अब, हे सतगुरु मुझे बचाओ।
ठोकर खाया हूँ दुनिया से, गुरु मुझको गले लगाओ।।
तार-तार विश्वास हुआ है, टूटे हैं सभी सहारा।
कैसे हो सुख नाव किनारा, फिरता हूँ दर-दर मारा।।
कष्टों का अब तमस मिटाकर, खुशियों का दीप जलाओ।
ठोकर खाया हूँ दुनिया से, गुरु मुझको गले लगाओ।।
भावों के सागर में डूबे, मैं गोता रोज लगाता।
देख दुखों के सैलाबों को, मन मेरा है घबराता।।
गजानंद का प्यास बुझा दो, और नहीं अब तरसाओ।
ठोकर खाया हूँ दुनिया से, गुरु मुझको गले लगाओ।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/07/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- कुकुभ (16,14)*
*सृजन शीर्षक- चमकेंगे भाग्य सितारे (2अंतरे)*
🔯✡️☸️🔯✡️🔯☸️🔯✡️☸️
सतगुरु का आशीष मिले तो, चमकेंगे भाग्य सितारे।
उन पर ही विश्वास रखा हूँ, कर देंगे नाव किनारे।।
जीवन सीख सिखाते सतगुरु, बन करके भाग्य विधाता।
कर्म- धर्म का मर्म बताते, बन ज्ञान गुणों के दाता।।
भटक कहीं इंसान गये तो, बनते हैं वही सहारे।
उन पर ही विश्वास रखा हूँ, कर देंगे नाव किनारे।।
बना हुआ हूँ भक्ति पुजारी, मैं भाव सँजोये आशा।
रखूँ पिपासा कृपा दृष्टि की, पाऊँ मत कभी निराशा।।
आसमान में रहूँ चमकते, बन सूरज चाँद सितारे।
उन पर ही विश्वास रखा हूँ, कर देंगे नाव किनारे।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/07/2024
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🌀 *बिलासा छंद महालय* 🐚
*दिनांक -- 30/07/2024*
*दिन -- मंगलवार*
*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- कुकुभ (16,14)*
*सृजन शीर्षक- जलाओ (2अंतरे)*
*पदांत-- (22) अनिवार्य*
पटल क्रमांक---1
समीक्षक -- आ. भावना तर्वे ' भव्या' जी
अभ्यास--10 बजे से 5 बजे तक
समीक्षा काल --- 5 बजे पश्चात्
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*संस्थापक, छंदाचार्य - डॉ रामनाथ साहू "ननकी"*
*अध्यक्ष - डॉ माधुरी डड़सेना "मुदिता"*
*सचिव -- *डॉ ओमकार साहू "मृदुल" (सचिव)*
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अवधपुरी श्री राम पधारे, घर-घर में दीप जलाओ।
करो आरती प्रभु का पावन, मंगल गीत सभी गाओ।।
लौटे हैं वनवास पूर्ण कर, साथ लिए लक्ष्मण सीते।
नगरवासियों का आँसू से, नैन नहीं होते रीते।।
पाकर अपने धाम राम को, धन्य स्वयं को कर जाओ।
करो आरती प्रभु का पावन, मंगल गीत सभी गाओ।।
रूप सुहावन मनमोहक है, मुख पर मुस्कान निराली।
प्रभु दर्शन को झूम रहे हैं, फूल पात तरु अरु डाली।।
कलरव करते नभ में खग भी, हम पर भी दया दिखाओ।
करो आरती प्रभु का पावन, मंगल गीत सभी गाओ।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/07/2024
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*आधार छंद-- कुकुभ (16,14)*
*सृजन शीर्षक-कहानी (2अंतरे)*
*पदांत-- (22) अनिवार्य*
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अगर मिला जो साथ तुम्हारा, लिख दूँगा प्रेम कहानी।
चाहत तेरी पाकर कर दूँ, मैं तेरे नाम जवानी।।
इस धड़कन की तुम साँसे हो, नैन समाये सपना हो।
बन जाओ इस दिल की देवी, सुबह शाम बस जपना हो।।
माला तेरे नाम जपूँ मैं, दे जाओ अमर निशानी।
चाहत तेरी पाकर कर दूँ, मैं तेरे नाम जवानी।।
फिरता हूँ बन चातक मैं तो, इस दिल का प्यास बुझाने।
लग जाओ सीने से प्रियवर, तुम भी तो साथ निभाने।।
गजानंद के इस जीवन में, ला देना भोर सुहानी।
चाहत तेरी पाकर कर दूँ, मैं तेरे नाम जवानी।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/07/2024
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*उदाहरणार्थ*
*विधा लावणी छंद गीत ---*
*विधान — 16,14 (पदांत पर 2 अनिवार्य )*
*सूत्र - 8+8, 8+6 ( पदांत पर गुरु)*
*(8=4+4/2+2+2+2/2+2+4/4+2+2/3+3+2)*
*लावणी छंद गीत*
सम मात्रिक छन्द है। इस छंद में चार पद होते हैं, जिनमें प्रति पद 30 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पद दो चरण में बंटा हुआ रहता है जिनकी यति 16-14 पर निर्धारित होती है। अर्थात् विषम चरण 16 मात्राओं का और सम चरण 14 मात्राओं का होता है। चारों चरण के पदांत पर दीर्घ अनिवार्य है।
विश्व सनातन सत ग्रंथों का, निशिदिन सब गुणगान करें।
हिन्द देश के भारतवासी,हिन्दी पर अभिमान करें।।
बनी सभ्यता जबसे बोली, हिन्दी की पहचान हुई ।
बातचीत आरम्भ हुई तो, हिन्दी जीवनदान हुई ।
विश्व जगत में व्यापक हिन्दी, सर्व विदित प्रतिदान करें।
हिन्द देश के भारतवासी, हिन्दी पर अभिमान करें।।1।।
बाल कथा हो या रोचक हो, कविताओं का पठन कहीं।
धर्म-शास्त्र का निष्पादन हो, सद्ग्रंथों का कथन कहीं।।
हिन्दी का आलिंगन करते, व्याख्याता संज्ञान करें।
हिन्द देश के भारतवासी, हिन्दी पर अभिमान करें।।2।।
जप-तप कीर्तन योग-साधना, महायज्ञ आयोजन हो ।
मन-हठ नर्तन प्रेम-भावना, विद्वतजन मत मंचन हो ।।
सार्वभौम सर्वस्व विजय का, निशिदिन जग गुणगान करें ।
हिन्द देश के भारतवासी, हिन्दी पर अभिमान करें ।।3।।
*----अनुराधा सुनील पारे'अवि'*
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- लावणी (16,14)*
*सृजन शीर्षक- सतरंगी अपने सपने। (3अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (2) अनिवार्य*
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कर्म महान करो जीवन में, सतरंगी अपने सपने।
त्याग अहं को आगे बढ़ना, मान सभी को प्रिय अपने।।
प्राप्त वही पर्याप्त मानना, लालच का परित्याग करो।
श्रम का तिलक माथ लगाकर, प्रति पल पथ आनंद भरो।।
अगर चमकना है जीवन में, सोन समान लगो तपने।।
त्याग अहं को आगे बढ़ना, मान सभी को प्रिय अपने।।
मुँह मत फेरो कठिनाई से, नहीं हार से आप डरो।
जीत मिलेगी आज नहीं कल, खुद पर दृढ़ विश्वास करो।।
मान समाज प्रतिष्ठा पाने, लगो ढोंग को मत जपने।
त्याग अहं को आगे बढ़ना, मान सभी को प्रिय अपने।।
जीना नित उद्देश्य बनाकर, सोच सदा साकार रहे।
सत्य अहिंसा प्रेम दया ही, सभी सुखों का सार रहे।।
गजानंद पाखंड मिटाने, लगा उम्र भी अब खपने।
त्याग अहं को आगे बढ़ना, मान सभी को प्रिय अपने।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/08/2024
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*दिन -- गुरुवार*
*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- लावणी (16,14)*
*सृजन शीर्षक- छुप कर काम नहीं करना (2 अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (2) अनिवार्य*
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सच्चाई के पथ पर चलना, करना छुप कर काम नहीं।
अपनों को जो धोखा देता, उनका होता नाम नहीं।।
विश्वासों पर टिका धरा है, आओ दूर दुराव करें।
सबसे नम व्यवहार रखें हम, समानता का भाव भरें।।
द्वेष भावना का सुन मानव, जीवन में कुछ दाम नहीं।
अपनों को जो धोखा देता, उनका होता नाम नहीं।।
बड़े बुजुर्गों का आदर हो, छोटो के प्रति नेह रहे।
खुद के कर्म वचन से कोई, नहीं मुसीबत कष्ट सहे।।
मातु पिता के शुभ चरणों से, बढ़कर कोई धाम नहीं।
अपनों को जो धोखा देता, उनका होता नाम नहीं।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- लावणी (16,14)*
*सृजन शीर्षक- पूरी हो मनोकामना। (2 अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (2) अनिवार्य*
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प्रभु पूरी हो मनोकामना, दया प्रेम उपकार करो।
बीच भँवर में जीवन नैय्या, कृपा करो भव पार करो।।
देख दुखों की परछाईं को, हिम्मत मत कमजोर पड़े।
मुसीबतों में बनो सहारा, थाम हाथ को साथ खड़े।।
कर जाऊँ प्रभु मंजिल हासिल, साहस दुगना चार करो।
बीच भँवर में जीवन नैय्या, कृपा करो भव पार करो।।
चढ़ूँ सफलता की सीढ़ी मैं, प्रभु जी आशीर्वाद रहे।
मेरे खुद के कर्म वचन से, कभी न कोई कष्ट सहे।
द्वंद द्वेष से दूर रखो प्रभु, सुख का नित विस्तार करो।
बीच भँवर में जीवन नैय्या, कृपा करो भव पार करो।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/08/2024
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*आधार छंद-- लावणी (16,14)*
*सृजन शीर्षक - क्यों मूरख वन-वन भटके (2 अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (1) अनिवार्य*
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घट- घट में सतगुरु बसते हैं, क्यों मूरख वन-वन भटके।
बिना ज्ञान सतगुरु से पाये, भवसागर नैय्या अटके।।
अक्षर-अक्षर शब्द बना गुरु, भावों का विस्तार करे।
उनके मुख वाणी से हरदम, सदा सुखों का फूल झरे।।
बुरे भले का राह सुझाते, कोई हक को मत झटके।
बिना ज्ञान सतगुरु से पाये, भवसागर नैय्या अटके।।
गीता गुरु गुणगान लिखा है, गुरु का पद सम्मान बड़ा।
गुरु से ही संसार सुखद है, गुरु से ही आधार खड़ा।।
गजानंद गुरु गुण सागर हैं, सर्व देव से हैं हट के।
बिना ज्ञान सतगुरु से पाये, भवसागर नैय्या अटके।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छतीसगढ़) 02/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- लावणी (16,14)*
*सृजन शीर्षक- उपवन में हँसती कलियाँ। (2 अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (2) अनिवार्य*
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उपवन में हँसती कलियाँ अब, धरा हरा परिधान किये।
दादुर झींगुर मोर पपीहा, सावन का गुणगान किये।।
इठलाती नदियाँ बहती है, झरने तो झरझर झरते।
मंद हवाओं के झोखे से, नभ में घन घड़घड़ करते।।
खेत किसान चले हल पकड़े, धरती का उत्थान किये।
दादुर झींगुर मोर पपीहा, सावन का गुणगान किये।।
फूल कली भी मुस्काई है, भौंरे गूँजन कर फिरते।
छपक-छपक कर बच्चें खेले, रिमझिम पानी जब गिरते।।
खुशहाली का शीश झुकाकर, गजानंद सम्मान किये।
दादुर झींगुर मोर पपीहा, सावन का गुणगान किये।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/08/2024
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*अश्वावतारी (वर्गभेद--2178309)*
*कुल मात्रा---31*
*यति-- (16,15)*
*पदांत--21*
*वीर छंद दो पदों के चार चरणों में रचा जाता है जिसमें यति १६-१५ मात्रा पर नियत होती है. छंद में विषम चरण का अंत गुरु (S) या लघु लघु (II) या लघु लघु गुरु (IIS) या गुरु लघु लघु (SII) अनिवार्य है।*
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- चमक उठी तलवार। (3अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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आजादी के दीवानों की, आओ कर लें जय-जयकार।
मार भगाने अंग्रेजों को, जिनकी चमक उठी तलवार।।
राज्य हड़पने डलहौजी की, आँख उठी झाँसी की ओर।
छिड़ी लड़ाई यमुना तट पर, हो गई सुनो लड़ते भोर।।
रणचंडी बन लक्ष्मीबाई, करते दुश्मन का संहार।
आजादी के दीवानों की, आओ कर लें जय-जयकार।।
शेर दहाड़ खुदी बिस्मिल की, सुने फिरंगी जाये काँप।
चाल चंद्रशेखर सुभाष का, दुश्मन पाये कभी न भाँप।।
लाल बाल अरु पाल साथ में, दिखे धधकते नित अंगार।
आजादी के दीवानों की, आओ कर लें जय-जयकार।।
जलियाँवाला बाग कांड से, झुलस रहा था सारा देश।
करो मरो का नारा दे तब, बापू ने बदला परिवेश।
छोड़ देश को वापस जाने, हुये फिरंगी फिर लाचार।
आजादी के दीवानों का, आओ कर लें जय-जयकार।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- जलवा देखेगा संसार (2अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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ओलंपिक में मनु भाकर ने, किया प्रदर्शन है दमदार।
शान बनी भारत की बेटी, जलवा देख लिया संसार।।
साध निशाना शूटिंग में वह, रजत पदक ली है दो जीत।
बढ़े हौसला उनकी आओ, शौर्य शक्ति के गायें गीत।।
नहीं किसी से कम अब बेटी, सिद्ध किये उसने उद्गार।
शान बनी भारत की बेटी, जलवा देख लिया संसार।।
ध्वजवाहक बन मनु भारत की, फहरायेगी परचम मान।
गूँज उठेगा आसमान में, राष्ट भक्ति की गाथा गान।।
किया भाल ऊँचा पेरिस में, हर्षित है भारत सरकार।
शान बनी भारत की बेटी, जलवा देख लिया संसार।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- अब न सहेंगे अत्याचार। (3अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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संविधान ने दिया हमें है, समानता का हक अधिकार।
बहुत सहे हैं शोषण हमनें, अब न सहेंगे अत्याचार।।
ऊँच-नीच का भेद मिटायें, मानव- मानव एक समान।
जाति-धर्म की त्याग भावना, मानवता रख लें पहचान।।
कोख खून में फर्क करे वह, राष्ट्र एकता का गद्दार।
बहुत सहे हैं शोषण हमनें, अब न सहेंगे अत्याचार।।
श्रेष्ठ न कोई जन्मजात से, श्रेष्ठ बनाता है निज कर्म।
मानव तन अभिमान करो मत, बुरा भला का समझो मर्म।।
जाति-पाति अरु छुआछूत का, आज तोड़ना है दीवार।
बहुत सहे हैं शोषण हमनें, अब न सहेंगे अत्याचार।।
रहे न वंचित कोई तबका, रोटी कपड़ा और मकान।
मूलभूत अधिकार दिलाने, देना है हम सबको ध्यान।।
द्वेष द्वंद मत आपस पनपे, गजानंद जग बाँटो प्यार।
बहुत सहे हैं शोषण हमनें, अब न सहेंगे अत्याचार।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- अभिमान । (3अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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नाशवान इस तन पर मानव, करना कभी नहीं अभिमान।
मिट्टी का काया मिट्टी में, मिल जाएगा रखना ध्यान।।
सत्य अहिंसा प्रेम दया का, आओ हम सब पढ़ लें पाठ।
हृदय बसायें ममता करुणा, कर्म बिना यह जीवन काठ।।
रखे चलें हम भाईचारा, मानवता का गायें गान।
मिट्टी का काया मिट्टी में, मिल जाएगा रखना ध्यान।।
कभी किसी को कर्म वचन से, मत पहुँचाना तुम आघात।
परहित सेवा जीवन जीना, देना सबको सुख सौगात।।
मातु-पिता की सेवा करना, अमल करो नित गुरु का ज्ञान।
मिट्टी का काया मिट्टी में, मिल जाएगा रखना ध्यान।।
कर्म महान बनाने को जग, पायें हैं यह साँस उधार।
इस जीवन को धन्य करें हम, दीन-दुखी पर कर उपकार।।
गजानंद तज द्वंद द्वेष को, मानें सबको एक समान।
मिट्टी का काया मिट्टी में, मिल जाएगा रखना ध्यान।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- वीर प्रसूता माँ के लाल। (3अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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झूल गये फाँसी पर हँसते, वीर प्रसूता माँ के लाल।
हमें दिलाई आजादी को, बन करके भारत का ढाल।।
लौह समान रखे थे सीना, भुजा समाया था तूफान।
आजादी के दीवानों का, देश सदा करता गुणगान।।
वीर शहीदों की बलिदानी, सुन होता है ऊँचा भाल।
हमें दिलाई आजादी को, बन करके भारत का ढाल।।
वीर शिवा की जननी भारत, झाँसी की रानी की आन।
लाल बाल आजाद खुदी के, शौर्य शक्ति पर है अभिमान।।
शेर समान गरजते थे जो, देकर निज मूछों में ताल।
हमें दिलाई आजादी को, बन करके भारत का ढाल।।
तोड़ गुलामी की जंजीरे, देश किये हैं जो आजाद।
धन्य-धन्य हैं वीर सपूतों, युग-युग लोग करेंगे याद।।
गजानंद लिख आल्हा गाते, हो जाते सुन सभी निहाल।
हमें दिलाई आजादी को, बन करके भारत का ढाल।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- हिंदुस्तान (3अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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शांति एकता पाठ पढ़ाता, प्यारा मेरा हिंदुस्तान।
जाति-धर्म से परे सदा यह, राष्ट्र धर्म इसकी पहचान।।
संविधान से मिला सभी को, समानता मौलिक अधिकार।
ऊँच- नीच का भेद मिटाकर, बाँटे आपस में हम प्यार।।
एक लहू तन हाड़ सभी का, मानव-मानव एक समान।
जाति-धर्म से परे सदा यह, राष्ट्र धर्म इसकी पहचान।।
जनसंख्या आधारित सबका, आरक्षण का हो अनुपात।
व्यर्थ लोग कहते फिरते हैं, आरक्षण को निज खैरात।।
शोषित वंचित वर्गों का हित, संविधान से है उत्थान।
जाति-धर्म से परे सदा यह, राष्ट्र धर्म इसकी पहचान।।
जुल्म सहा है छोटे तबका, युगों-युगों से अत्याचार।
दानें-दानें को तरसाये, उच्च शिखर बैठे गद्दार।।
एक कोख से जन्म सभी का, फिर भी हम सब हैं नादान।
जाति-धर्म से परे सदा यह, राष्ट्र धर्म इसकी पहचान।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- शूरवीर भारत के लाल। (2अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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शत-शत नमन तुम्हें करता हूँ, शूरवीर भारत के लाल।
गैर फिरंगी को ललकारे, किये देश का ऊँचा भाल।।
देश भक्ति की रखे भावना, कूद गये आजादी जंग।
करो मरो का नारा थामे, किये लड़ाई वीर दबंग।।
अंग-अंग बारूद समाये, रौद्र दिखे भारी विकराल।
गैर फिरंगी को ललकारे, किये देश का ऊँचा भाल।।
मातृभूमि की रक्षा करने, रखे हौसला थे मन ठान।
शान तिरंगा ऊँचा रखने, किये स्वयं को जो बलिदान।।
डटे हुये थे अंग्रेजों से, लाल बाल बन करके ढाल।
गैर फिरंगी को ललकारे, किये देश का ऊँचा भाल।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक-अपनी जीवन धारा मोड़ (2अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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सत्य अहिंसा प्रेम दया पथ, अपनी जीवन धारा मोड़।
द्वेष द्वंद भ्रम लोभ अहं का, प्रेम बना है सच्चा तोड़।।
मान सदा सच्चाई की है, झूठ हुये नित जग अपमान।
मानवता का पाठ पढ़ाना, जीना बन करके इंसान।।
सर्वश्रेष्ठ दुनिया में बनने, मची हुई है सब में होड़।
द्वेष द्वंद भ्रम लोभ अहं का, प्रेम बना है सच्चा तोड़।।
विश्वासों पर टिका हुआ है, रिश्ते नाते यह संसार।
नहीं दुखाना दिल अपनों का, विनय सभी से बारंबार।।
गजानंद सुन मेरी बातें, धन को नहीं दिलों को जोड़।
द्वेष द्वंद भ्रम लोभ अहं का, प्रेम बना है सच्चा तोड़।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- मातृभूमि पर सब कुरबान। (3अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️✡️☸️⚛️🕉️
हँसते-हँसते वीर किये हैं, मातृभूमि पर सब कुरबान।
आजादी के परवानों का, व्यर्थ नहीं होगा बलिदान।।
सोने की चिड़िया कहलाता, मेरा प्यारा भारत देश।
देश प्रेम का पाठ पढ़ाता, भाईचारा रख परिवेश।।
गर्वित हैं हम भारतवासी, हम सबको इस पर अभिमान।
आजादी के परवानों का, व्यर्थ नहीं होगा बलिदान।।
कल-कल कर झरने झरते हैं, महानदी गंगा की धार।
हीरे मोती सोन यहाँ पर, खनिज संपदा है भंडार।।
रीति नीति संस्कृति का होता, देश विदेशों में गुणगान।
आजादी के परवानों का, व्यर्थ नहीं होगा बलिदान।।
संत महापुरुषों की वाणी, सीख सिखाते हमको नेक।
भिन्न-भिन्न है जाति-धर्म पर, रहते बनकर हम तो एक।।
राष्ट्र एकता सर्वोपरि है, गजानंद देना नित ध्यान।
आजादी के परवानों का, व्यर्थ नहीं होगा बलिदान।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/08/2024
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*विधा-- गीत*
*आधार छंद-- वीर/आल्हा(16,15)*
*सृजन शीर्षक- उपकार (3अंतरे)*
*पदांत-- दीर्घ लघु (21) अनिवार्य*
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प्रेम दया उपकार करो नित, यही विधाता का उद्गार।
दीन-दुखी परहित सेवा ही, जीवन का है असली सार।।
नफरत से नफरत बढ़ता है, करो द्वेष का मन से त्याग।
ध्यान रखे चल मानवता का, लगे कभी मत इस पर दाग।।
बाँटो जग में प्यार सदा ही, बदले में पाओगे प्यार।
दीन-दुखी परहित सेवा ही, जीवन का है असली सार।।
जाति धर्म से परे रहें हम, कहलायें सब मानव एक।
हिंद देश के हम हैं वासी, सोच विचार बहुत ही नेक।।
नहीं सिखाता मजहब हमको, आपस में रखना तकरार।
दीन-दुखी परहित सेवा ही, जीवन का है असली सार।।
पीर पराया अपना जानें, सुख-दुख में हम आते काम।
देव अतिथि हम तो मानें, मातु -पिता को चारो धाम।।
बड़े बुजुर्गों का आदर से, गजानंद करतें सत्कार।
दीन-दुखी परहित सेवा ही, जीवन का है असली सार।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/08/2024
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राधेश्यामी छंद “विधान”
यह छंद मत्त सवैया के नाम से भी प्रसिद्ध है। पंडित राधेश्याम जी ने राधेश्यामी रामायण 32 मात्रिक चरण में रची है । छंद में कुल चार चरण होते हैं तथा क्रमागत दो-दो चरण तुकान्त होते हैं। प्रति चरण पदपादाकुलक का दो गुना होता है l
तब से यह छंद राधेश्यामी छंद के नाम से प्रसिद्धि हो गया है
पदपादाकुलक छंद के एक चरण में 16 मात्रा होती हैं , आदि में द्विकल (2 या 11) अनिवार्य होता है किन्तु त्रिकल और जगण वर्जित होता है।
राधेश्यामी छंद का मात्रा बाँट इस प्रकार तय होता है:
2 + 12 + 2 = 16 मात्रा (चरण का प्रथम पद)
2 + 12 + 2 = 16 मात्रा (चरण का द्वितीय पद)
द्विकल के दोनों रूप (2 या 1 1) मान्य है। तथा 12 मात्रा में तीन चौकल, अठकल और चौकल या चौकल और अठकल हो सकते हैं। चौकल और अठकल के नियम निम्न प्रकार हैं जिनका पालन अत्यंत आवश्यक है।
चौकल:- (1) प्रथम मात्रा पर शब्द का समाप्त होना वर्जित है। ‘करो न’ सही है जबकि ‘न करो’ गलत है।
(2) चौकल में पूरित जगण जैसे सरोज, महीप, विचार जैसे शब्द वर्जित हैं।
अठकल:- (1) प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द समाप्त होना वर्जित है। ‘राम कृपा हो’ सही है जबकि ‘हो राम कृपा’ गलत है क्योंकि राम शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है। यह ज्ञातव्य हो कि ‘हो राम कृपा’ में विषम के बाद विषम शब्द पड़ रहा है फिर भी लय बाधित है।
(2) 1-4 और 5-8 मात्रा पर पूरित जगण शब्द नहीं आ सकता।
(3) अठकल का अंत गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- मत्त सवैया/ राधेश्यामी
*यति-- (16,16)*
*सृजन शीर्षक- बलिदानों की गाथा कहते। (2अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (S) अनिवार्य*
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बलिदानों की गाथा कहती, हर्षित होकर भारत माता।
मेरे वीरों के रहते तो, मुझको दुख कैसे हो पाता।।
झाँसी की रानी लक्ष्मी में, लड़ने को दमदारी थी।
मर्दों जैसे सीना रखकर, अंग्रेजों को ललकारी थी।।
थर-थर काँपे डर में दुश्मन, उनसे लड़ने को घबराता।
मेरे वीरों के रहते तो, मुझको दुख कैसे हो पाता।।
आजादी के दीवानों ने, रक्तों की होली खेली थी।
कुरबानी की चिंगारी को, तन पर अपने झेली थी।।
तूफानों सी हिम्मत रखते, पत्थर से भी टकरा जाता।
मेरे वीरों के रहते तो, मुझको दुख कैसे हो पाता।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- मत्त सवैया/ राधेश्यामी
*यति-- (16,16)*
*सृजन शीर्षक- इस माटी को चंदन मानो । (2अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (S) अनिवार्य*
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इस माटी को चंदन मानो, सब इसकी महिमा गाते हैं।
प्राणों से भी हमको प्यारा, गर्वित हो हम इठलाते हैं।।
बलिदानों की पावन गाथा, यह वीरों की कुरबानी है।
इस माटी ने जन्मा भी है, नित ज्ञानी ऋषि मुनि दानी है।।
संस्कृति में सबसे आगे हम, भारतवासी कहलाते हैं।
प्राणों से भी हमको प्यारा, गर्वित हो हम इठलाते हैं।।
अंगारों से लड़ना जानें, हम बाहों में भरकर शोला।
तूफानों से टकरा जाते, पत्थर जैसे रखते चोला।।
भारत माँ की रक्षा करने, हँसते फाँसी चढ़ जाते हैं।
प्राणों से भी हमको प्यारा, गर्वित हो हम इठलाते हैं।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/08/2024
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🌀 *बिलासा छंद महालय* 🐚
*दिनांक -- 13/08/2024*
*दिन -- मंगलवार*
*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- मत्त सवैया/ राधेश्यामी
*यति-- (16,16)*
*सृजन शीर्षक- आहट पाकर महकी गलियाँ । (3अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (S) अनिवार्य*
*पटल क्रमांक---*1
*समीक्षक --*आ. भावना तर्वे ' भब्या' जी
*अभ्यास--10 बजे से 5 बजे तक*
*समीक्षा काल --- 5 बजे पश्चात्*
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*संस्थापक, छंदाचार्य - डॉ रामनाथ साहू "ननकी"*
*अध्यक्ष - डॉ माधुरी डड़सेना "मुदिता"*
*सचिव -- *डॉ ओमकार साहू "मृदुल" (सचिव)*
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- मत्त सवैया/ राधेश्यामी
*यति-- (16,16)*
*सृजन शीर्षक- आहट पाकर महकी गलियाँ । (3अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (S) अनिवार्य*
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आहट पाकर महकी गलियाँ, रौनक दिखती है गाँवों में।
छोटे- छोटे प्यारे बच्चें, खेले कूदे जब छाँवों में।।
सावन में झूले पड़ते हैं, गर्मी में भाते अमराई।
बलखाती नदियाँ बहती है, मदमाती चलती पुरवाई।।
पढ़ने जाते विद्यालय को, चढ़ करके बच्चें नावों में।
छोटे- छोटे प्यारे बच्चें, खेले कूदे जब छाँवों में।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/08/2024
विभागीय कार्यवश रायपुर आने के कारण आज बस एक ही अंतरा लिख पाया हूँ।🙏🏻
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- मत्त सवैया/ राधेश्यामी
*यति-- (16,16)*
*सृजन शीर्षक- इन बूँदों में मोती झरते। (3अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (S) अनिवार्य*
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सावन में जब बरसे बरखा, इन बूँदों में मोती झरते।
धरती में हरियाली दिखती, हलधर मन में खुशियाँ भरते।।
बलखाती नदियाँ बहती है, मदमाती हो करके झरने।
गिरते पानी झम-झम करते, खुशियों की सौगातें भरने।
काले-काले घन मतवाले, निस दिन डेरा डाले रहते।
धरती में हरियाली दिखती, हलधर मन में खुशियाँ भरते।।
छम-छम पायल बूँद बजाती, दादुर झींगुर गाना गाते।
रौनक है घर गाँव गली में, बागों में भौंरा मँडराते।।
नाचे झूमे मोर पपीहा, पंछी उड़ते कलरव करते।
धरती में हरियाली दिखती, हलधर मन में खुशियाँ भरते।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- मत्त सवैया/ राधेश्यामी
*यति-- (16,16)*
*सृजन शीर्षक- इच्छाएँ सब पूरी कर लो। (3अंतरे)*
*पदांत-- एक गुरु (S) अनिवार्य*
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प्रभु पर रखना प्रेम भरोसा, इच्छाएँ सब पूरी कर लो।
सबका मालिक कहलाता वह, सारी खुशियाँ दामन भर लो।।
पीछे मुड़कर मत तुम देखो, हरदम आगे बढ़ते जाना।
खुद पर ही विश्वास रखे चल, आसानी से मंजिल पाना।।
जीना जीवन परहित सेवा, पीड़ा दीन दुखी का हर लो।
सबका मालिक कहलाता वह, सारी खुशियाँ दामन भर लो।।
होठों पर मुस्कान खिले नित, घेरे मत दुख की परछाई।
साँसों में हो सुख का सरगम, बाजे खुशियों की शहनाई।।
सबकी उन्नति खुशहाली का, प्रभु से पावन मंगल वर लो।
सबका मालिक कहलाता वह, सारी खुशियाँ दामन भर लो।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- धौत (नव प्रस्तारित)*
*यति-- (13,11,8)*
*सृजन शीर्षक- रक्षित रहिए (3अंतरे)*
*पदांत-- सगण (IIS) अनिवार्य*
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रक्षाबंधन पर्व यह, मन में भरे हुलास, खुशियाँ गहिये।
सदा सुरक्षित हो बहन, भाई करे प्रयास, रक्षित रहिये।।
बाँध प्रेम के डोर को, बंधन रखे अटूट, जीवन भर का।
भाई ममता आसरा, जाये न कभी छूट, बाबुल घर का।।
बहन दुआ करती सदा, भाई हो खुशहाल, सुख का पहिये।
सदा सुरक्षित हो बहन, भाई करे प्रयास, रक्षित रहिये।।
भाई मेरी आन तुम, भाई मेरा शान, मेरा गहना।
एक कोख के प्यार को, देना नित सम्मान, मानो कहना।।
रखती इतनी चाह मैं, हो मेरी परवाह, दुख को सहिये।
सदा सुरक्षित हो बहन, भाई करे प्रयास, रक्षित रहिये।।
बन करके ममतामयी, बहन जताती प्यार, दुनिया सुन लो।
पाये सम अधिकार अरु, पाये लाड़ दुलार, बातें गुन लो।।
करना मत दिल से जुदा, मुझे पराया मान, भाई कहिये।
सदा सुरक्षित हो बहन, भाई करे प्रयास, रक्षित रहिये।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- धौत (नव प्रस्तारित)
*यति-- (13,11,8)*
*सृजन शीर्षक- मिलकर चलिए । (3अंतरे)*
*पदांत-- सगण (IIS)
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मंजिल पाना है अगर, शांति सुखद हर राह, मिलकर चलिए।
मीठी वाणी बोल कर, मन में भर उत्साह, द्वेष न पलिए।।
क्रोध अहं को त्यागकर, बाँटो में जग में प्यार, मिलजुल रहना।
सबको करने तृप्त तुम, बन गंगा की धार, अविरल बहना।
हाथ निराशा मत लगे, उम्मीदों का दीप, बनकर जलिये।
मीठी वाणी बोल कर, मन में भर उत्साह, द्वेष न पलिए।।
पढ़ो एकता पाठ नित, सबको मान समान, मानव बनना।
देश प्रेम की भावना, दिल में रख इंसान, गर्वित करना।।
कभी न लूटे देश को, रखना इतना ध्यान, कोई छलिए।
मीठी वाणी बोल कर, मन में भर उत्साह, द्वेष न पलिए।।
हार-जीत से सीखना, जीवन का सच मर्म, आगे बढ़ना।
शिखर कामयाबी तुम्हें, करके नेकी कर्म, नित है चढ़ना।।
अपने जीवन में कभी, कर बदनामी काम, हाथ न मलिए।
मीठी वाणी बोल कर, मन में भर उत्साह, द्वेष न पलिए।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- धौत (नव प्रस्तारित)
*यति-- (13,11,8)*
*सृजन शीर्षक- चलते-चलते । (3अंतरे)*
*पदांत-- सगण (IIS)
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हक मुद्दे की जंग में, देना हरदम साथ, चलते-चलते।
समय गया जो बीत तो, रह जाओगे हाथ, मलते-मलते।।
हो आवाज बुलंद अब, शोषण जुल्म खिलाफ, चुप मत रहना।
भावी पीढ़ी अन्यथा, नहीं करेगी माफ, फिर मत कहना।।
क्यों बैठे खामोश हो, अपना सब अधिकार, जलते-जलते।
समय गया जो बीत तो, रह जाओगे हाथ, मलते-मलते।।
जागो वीर सपूत अब, कर लो शेर दहाड़, मंजिल गढ़ना।
शक्ति हमारी आज तो, शत्रु रहे हैं ताड़, आगे बढ़ना।
चमक बिखेरो आप भी, तपकर स्वर्ण समान, ढलते- ढलते।
समय गया जो बीत तो, रह जाओगे हाथ, मलते-मलते।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- धौत (नव प्रस्तारित)
*यति-- (13,11,8)*
*सृजन शीर्षक- पहनो गहना (3अंतरे)*
*पदांत-- सगण (IIS) अनिवार्य*
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जिंदा नित्य जमीर रख, सच्चाई रख आन, पहनो गहना।
मानव मन तू मान ले, स्वाभिमान को शान, जुल्म न सहना।।
संविधान से है मिला, सुख समता आधार, लिखना पढ़ना।
वंचित दलित समाज को, कहाँ किये स्वीकार, आगे बढ़ना।।
छीनों हक अधिकार मत, शोषक बन सरकार, छोड़ो डहना।
मानव मन तू मान ले, स्वाभिमान को शान, जुल्म न सहना।।
नहीं चाहते हम यहाँ, आपस में तकरार, रंजिश करना।
प्रेम अमन हो देश में, छोड़ें दुर्व्यवहार, नफरत भरना।।
मानव-मानव एक हो, जाति-धर्म को छोड़, मिलकर रहना।
मानव मन तू मान ले, स्वाभिमान को शान, जुल्म न सहना।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- धौत (नव प्रस्तारित)*
*यति-- (13,11,8)*
*सृजन शीर्षक- गौरव अपना । (3अंतरे)*
*पदांत-- सगण (IIS)*।
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मातृभूमि की हम सदा, गाते हैं गुणगान, गौरव अपना।
बढ़ना आगे है हमें, पाने को सम्मान, है यह सपना।।
अनेकता में एकता, भारत की पहचान, हम सब कहते।
हिन्दू मुस्लिम सिख सभी, सबको मान समान, मिलकर रहते।।
जाति-धर्म से हो परे, मानवता गुरुमंत्र, निशदिन जपना।
बढ़ना आगे है हमें, पाने को सम्मान, है यह सपना।।
करें कामना हम सदा, आपस में हो प्यार, द्वेष न करना।
दीन-दुखी प्रति हो दया, मन को रखें उदार, चाहत भरना।।
अगर चमकना है हमें, सुन लो स्वर्ण समान, सीखें तपना।
बढ़ना आगे है हमें, पाने को सम्मान, है यह सपना।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- धौत (नव प्रस्तारित)
*यति-- (13,11,8)*
*सृजन शीर्षक- वीणा बजती । (3अंतरे)*
*पदांत-- सगण (IIS)*
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सरस्वती स्वर दायिनी, कंठ मधुर दो साज, वीणा बजती।
करूँ सदा गुणगान माँ, सफल करो सब काज, थाली सजती।।
झंकृत मन का तार हो, भावों का विस्तार, हर्षित करते।
सात सुरों लय में सजे, गीत करे श्रृंगार, मोती झरते।।
है सुकून संगीत से, मिटते सभी थकान, पीड़ा तजती।
करूँ सदा गुणगान माँ, सफल करो सब काज, थाली सजती।।
राग भैरवी छेड़ना, गाना गीत मल्हार, पुलकित सब हो।
प्रेम शांति सुख बाँटने, करो सदा उद्गार, जीना जब हो।।
हस्तवरद माँ भगवती, भरो ज्ञान भंडार, भव-भव भजती।
करूँ सदा गुणगान माँ, सफल करो सब काज, थाली सजती।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/08/2024
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*विधा-- गीत*
*कुल मात्रा-- 32*
*आधार छंद-- धौत (नव प्रस्तारित)
*यति-- (13,11,8)*
*सृजन शीर्षक- झूठा सजना (3अंतरे)*
*पदांत-- सगण (IIS) अनिवार्य*
☸️✡️🕉️🔯🕉️✡️☸️✡️🕉️🔯
झूठा सजना छोड़ दो, आये न कभी काम, सत पथ चलना।
जीवन जीना मत कभी, होकर के बदनाम, हाथ न मलना।।
पर सेवा परमार्थ है, रख चलना तुम ध्यान, आगे बढ़ना।
मिट जाये जग दीनता, हो सबका कल्याण, सुख पथ गढ़ना।।
काम करो उपकार का, सबका सदा विकास, कभी न जलना।
जीवन जीना मत कभी, होकर के बदनाम, हाथ न मलना।।
मानव तन अनमोल है, समझो इसका मोल, रख सच गहना।
मद माया में चूर हो, जहर कभी मत घोल, नम हो रहना।।
पाठ पढ़ाओ प्रेम का, पाओगे तब नाम, सुख का पलना।
जीवन जीना मत कभी, होकर के बदनाम, हाथ न मलना।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/08/2024