दिनाँक- 01/06/2024
विधा- गीत
सृजन शब्द - दिवाकर/दिनकर
मात्रा भार- 16,12
छंद का नाम- सार छंद
विषय प्रदाता- श्री विजय तिवारी जी
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सुन लो विनती दिव्य दिवाकर, तप्त धरा हरसाओ।
रौद्र रूप कम अपना कर लो, राहत अब दे जाओ।।
धू-धू करती धरती जलती, पाने छाँव किनारा।
धूप प्रचंड हुआ लू गर्मी, बढ़ा हुआ है पारा।।
बहुत दिखाये तेवर दिनकर, मानूसन अब लाओ।
सुन लो विनती दिव्य दिवाकर, तप्त धरा हरसाओ।।
कूप नदी सब सूख गए हैं, झरनें भी है निर्झर।
त्रास भयावह देख चराचर, काँप रहें हैं थर-थर।।
नीर पेड़ से ही जीवन है, सबको यह बतलाओ।
सुन लो विनती दिव्य दिवाकर, तप्त धरा हरसाओ।।
बाग-बगीचे वन उपवन से, गायब है हरियाली।
भीषण लू गर्मी से व्याकुल, झुलस रहा है माली।
गजानंद पर रहम करो रवि, मत नौतपा तपाओ।
सुन लो विनती दिव्य दिवाकर, तप्त धरा हरसाओ।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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03/06/2024
विधा- गीत
सृजन शब्द- साहस
मात्रा भार- 16, 14
छंद का नाम- लावणी छंद
विषय प्रदाता- श्री विजय तिवारी जी
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साहस से साँसे चलती है, जीत इसी से मिलती है।
साहस से मुस्कान सुमन भी, नित अधरों पर खिलती है।।
साहस साधे अडिग खड़े हैं, देश सिपाही सीमा पर।
गान विजय को गाने आतुर, देह शत्रु का छलनी कर।।
साहस से ही बढ़े हौसला, धरा आसमाँ हिलती है।
साहस से साँसे चलती है, जीत इसी से मिलती है।।
साहस से संयम सजता है, दृढ़ता सोच विचारों में।
साहस से सम्मान मिले हैं, चमके चाह सितारों में।।
साहस से सार्थक सब होता, जीवन राह सुधरती है।
साहस से साँसे चलती है, जीत इसी से मिलती है।।
साहस से श्रम मिले सफलता, नेक राह दिखलाता है।
नहीं लाँघना मर्यादा को, अनुशासन सिखलाता है।
गजानंद साहस से ही तो, किस्मत साथ सँवरती है।
साहस से साँसे चलती है, जीत इसी से मिलती है।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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विधा- गीत
सृजन शब्द- *मन*
छंद का नाम- ताटंक छंद
मात्रा भार- 16, 14
विषय प्रदाता- श्री विजय तिवारी जी
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सच्चा नेक विचार रखो तुम, मन पुलकित हो जायेगा।
चंचल मन में चंचल किरणें, खुशियों की ले आयेगा।।
मन से मन टकराव नहीं हो, अच्छाई मन की मानें।
दया क्षमा करुणा की सागर, गहराई मन की जानें।।
जिसने मन को मार लिया वो, भव को पार लगायेगा।
सच्चा नेक विचार रखो तुम, मन पुलकित हो जायेगा।।
मन उपवन में मानवता का, हमकों पुष्प खिलाना है।
एक दूसरे के मन से अब, ईर्ष्या शूल मिटाना है।।
नीर दया का आओ सींचे, सबका मन हर्षायेगा।
सच्चा नेक विचार रखो तुम, मन पुलकित हो जायेगा।।
मन में कर्मों का लेखा हो, भाव रहे सच्चाई का।
मन में उपजे प्रेम एकता, करना काम भलाई का।।
गजानंद मन से कहता है, मन माया भरमायेगा।
सच्चा नेक विचार रखो तुम, मन पुलकित हो जायेगा।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/06/2024
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विधा- गीत
सृजन शब्द- *चलचित्र*
मात्रा भार- 16, 11
छंद का नाम- सरसी छंद
विषय प्रदाता- आ० श्री विजय तिवारी जी
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कहलाता दर्पण समाज का, सच में तो चलचित्र।
दिखलाता है इंसानों का, अच्छा बुरा चरित्र।।
खोज-खोज नव खबर दिखाता, घटना आँखों हाल।
गाँव शहर में बिछा हुआ है, चलचित्रों का जाल।।
श्रव्य दृश्य अरु साज सुसज्जित, यह तो यंत्र चलित्र।
कहलाता दर्पण समाज का, सच में तो चलचित्र।।
घर-घर की यह बात बताता, कथा कहानी गीत।
रीति नीति भी साथ सिखाता, धर्म धरा में मीत।।
हम सबका यह साथी जैसे, कृष्ण सुदामा मित्र।
कहलाता दर्पण समाज का, सच में तो चलचित्र।।
याद समेटे बचपन की यह, करता हमें विभोर।
जीवन की कुछ मर्म कहानी, देता मन झकझोर।।
प्रेम प्रसंग भरी पल यादें, बन जाता है इत्र।
कहलाता दर्पण समाज का, सच में तो चलचित्र।।
---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/06/2024
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विधा- गीत
सृजन शब्द- *धरोहर*
मात्रा भार- 14, 12
विषय प्रदाता- आ० श्री विजय तिवारी जी
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कर्म धरोहर करने कब, नेकी राह चलोगे।
तमस मिटाने जग से कब, बनकर दीप जलोगे।।
मर्म धर्म का कर्म गढ़े, गुरुओं की है वाणी।
सत्य अहिंसा प्रेम करो, पाओगे सुख प्राणी।।
मानवता के साँचे में, खुद ही आप ढलोगे।
कर्म धरोहर करने कब, नेकी राह चलोगे।।
साँस उधारी लेकर तुम, इस दुनिया में आये।
मोह मोद धन माया में, तुमने समय गँवाये।।
जीवन का कुछ ध्येय रखो, वरना हाथ मलोगे।
कर्म धरोहर करने कब, नेकी राह चलोगे।।
संस्कृति को संचित सिंचित, रखना सदा सँजोये।
मान पूर्वजों का पीढ़ी, युग-युग तक मत खोये।।
गजानंद संस्कार बिना, संकट पाल पलोगे।
कर्म धरोहर करने कब, नेकी राह चलोगे।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/06/2024
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सादर समीक्षार्थ-
विधा- गीत
सृजन शब्द- याचना
छंद का नाम- हरिगीतिका छंद
मात्रा भार- 14,14
विषय प्रदाता- आ० विजय तिवारी जी।
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प्रभु जी करूँ मैं याचना, देना मुझे वरदान तुम।
माता पिता तुम ही सखा, मेरे रहो भगवान तुम।।
शुभ काज हो शुभ नाम हो, करता रहूँ उपकार मैं।
लेना मुझे तुम थाम प्रभु, आये खड़ा हूँ द्वार मैं।।
नेकी करूँ सत पथ चलूँ, दो बुद्धि मुझको ज्ञान तुम।
प्रभु जी करूँ मैं याचना, देना मुझे वरदान तुम।।
पाऊँ सभी मैं लक्ष्य को, मन से कभी ना हार हो।
परित्याग हो भ्रम लोभ का, सच ही सदा स्वीकार हो।।
तुम ही कृपा का छाँव हो, सुख शांति का प्रतिमान तुम।
प्रभु जी करूँ मैं याचना, देना मुझे वरदान तुम।।
हो पूण्य पावन सोच भी, व्यवहार भी आचार भी।
पूजा करूँ मैं कर्म का, श्रम सुख रहे आधार भी।।
हो धीरता शालीनता, मुझको बना इंसान तुम।
प्रभु जी करूँ मैं याचना, देना मुझे वरदान तुम।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/06/2024
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विधा - गीत
मात्रा भार- 16, 11
सृजन शब्द- अक्षर/शब्द
छंद का नाम- सरसी छंद
सृजन शब्द प्रदाता- आ० श्री विजय तिवारी जी
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अक्षर-अक्षर शब्द बने हैं, शब्द भरा मकरंद।
हृदय पटल को शोभित करते, अलंकार रस छंद।।
अमिय अमित है शब्द साधना, दर्पण यह व्यक्तित्व।
भाव बिना अक्षर शब्दों का, रहा नहीं अस्तित्व।।
तथाकथित व्यवहारों का हो, इसमें तो पाबंद।
अक्षर-अक्षर शब्द बने हैं, शब्द भरा मकरंद।।
शब्द प्रेरणा शब्द धारणा, शब्द बना संकल्प।
शब्द भावना शब्द कामना, कभी नहीं हो स्वल्प।।
शब्द करे अक्षर को पावन, आये पढ़ आनंद।
अक्षर-अक्षर शब्द बने हैं, शब्द भरा मकरंद।।
अक्षर ही साहित्य सुधा है, शब्दों को उपहार।
ग्रन्थों का श्रृंगार बना यह, भावों का उद्गार।।
शब्द स्तुत्य कर अक्षर वंदन, गजानंद मतिमंद।
अक्षर-अक्षर शब्द बने हैं, शब्द भरा मकरंद।।
----इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/06/2024
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विधा- गीत
सृजन शब्द- नयन अश्रु
मात्रा भार- 16, 11
सृजन शब्द प्रदाता- आ० विजय तिवारी जी
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मनुज समझ लेना जीवन में, नयन अश्रु का मोल।
छुपा हुआ हर भेद बताता, हृदय द्वार को खोल।।
नैन नीर में नेह सजाना, रखना खुद में धीर।
स्वप्न्न पटल पर रखो बसाये, दीन दुखी का पीर।।
हो कल्याण सदा ही सबका, वाणी मधुरस घोल।
मनुज समझ लेना जीवन में, नयन अश्रु का मोल।।
बाप बुढ़ापा दर-दर भटके, पाने प्रेम पनाह।
माप भला हम कैसे पायें, उनका दर्द अथाह।।
मौन पड़ी है बूढ़ी माता, बीते बात टटोल।
मनुज समझ लेना जीवन में, नयन अश्रु का मोल।।
नैन नीर से सींच रखो तुम, मन का आँगन द्वार।
पुष्प खिले सुख का अधरों में, हो जाये गुलजार।।
गजानंद प्रिय सबका बनना, बोल नहीं कटु बोल।
मनुज समझ लेना जीवन में, नयन अश्रु का मोल।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/06/2024
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विधा- गीत
मात्रा भार- 14, 12
सृजन शब्द- गीत
छंद का नाम- गीतिका छंद
सृजन शब्द प्रदाता- आ० विजय तिवारी जी
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गीत गाथा प्रेम का मैं, हूँ कला संगीत की।
हूँ अटल विश्वास मैं तो, आस हूँ मैं रीत की।।
बाँध गठरी भाव का मैं, छेड़ता सुर ताल को।
मन हृदय आनंद कर दूँ, उच्च कर दूँ भाल को।।
शब्द का श्रृंगार हूँ मैं, प्यास हूँ मैं प्रीत की।
गीत गाथा प्रेम का मैं, हूँ कला संगीत की।।
कामना कल्याण का मैं, भावना उत्थान का।
बोल वंदेमातरम हूँ, राष्ट्र के सम्मान का।।
वीर की ललकार भी मैं, जोश हूँ नित जीत की।
गीत गाथा प्रेम का मैं, हूँ कला संगीत की।।
सत्य की प्रतिबिंब हूँ मैं, झूठ पर प्रतिबंध हूँ।
कर्म दर्पण साथ रखता, फर्ज का सौगंध हूँ।।
हूँ नयन का नीर मैं ही, प्रार्थना अनुनीत की।
गीत गाथा प्रेम का मैं, हूँ कला संगीत की।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/06/2024
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विधा- गीत
मात्रा भार- 16,10
सृजन शब्द- इच्छाएं/ बाधाएं
छंद का नाम- शंकर छंद
सृजन शब्द प्रदाता- आ० विजय तिवारी जी
➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖
इच्छाएं लालच की जननी, सुनो मेरी बात।
बाधाएं इससे बढ़ती है, मिले दुख बरसात।।
चंचल मन में सपने सजते, पाने नाम मान।
पूर्णित सत्कर्मों का होता, सदा ही गुणगान।।
प्रतिबिंबित आशा को रखना, मिले मत प्रतिघात।
इच्छाएं लालच की जननी, सुनो मेरी बात।।
आसमान को छूने की तुम, नित्य रखना चाह।
ठोकर खाकर ही मिलती है, सफलता की राह।।
रखो बुलंदी फौलादी तुम, बनो जग विख्यात।
इच्छाएं लालच की जननी, सुनो मेरी बात।।
मुफ्त नहीं मिलती है किस्मत, कर्मों का सुयोग।
मुसीबतों का करो सामना, सुखद पल फिर भोग।।
संघर्षों में जीना सीखों, छोड़ सुख खैरात।
इच्छाएं लालच की जननी, सुनो मेरी बात।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/06/2024
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विधा-गीत
सृजन शब्द- वेदना
छंद का नाम- गगनांगना छंद
मात्रा भार- 16,9
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बढ़ती है वेदना दिनों दिन, खुद को थाम लो।
सुबह शाम हर पल रे बंदे, प्रभु का नाम लो।।
घोर निराशा के आँगन में, लाता भोर है।
दया कृपा की बारिश करते, प्रभु घनघोर है।।
भक्ति भाव से नाम सदा प्रभु, आठो याम लो।
बढ़ती है वेदना दिनों दिन, खुद को थाम लो।।
परहित सेवा हाथ बढ़े नित, पूजो कर्म को।
दीन- दुखी का बनो हितैषी, समझो मर्म को।।
जान मिले पहचान मिले, नेकी काम लो।
बढ़ती है वेदना दिनों दिन, खुद को थाम लो।।
----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/06/2024
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विधा- गीत
सृजन शब्द- पिता
मात्रा भार- 16, 11
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पुण्य- प्रसाद पिता का पाया, पाया हरदम साथ।
जीवन का पतवार बने जो, थाम रखा नित हाथ।।
कभी कमी होने न दिया कुछ, पूर्ण किये सब चाह।
कर्म धर्म का मर्म बताया, थमा सत्य की राह।।
स्तुत्य पिता के श्री चरणों में, सदा झुकाऊँ माथ।
पुण्य- प्रसाद पिता का पाया, पाया हरदम साथ।।
पावन पुंज प्रकाश पिता है, सूर्य समान प्रताप।
जिनके लाड़ दुलार कभी भी, कोई सका न माप।।
मुसीबतों से दूर रखे जो, बनकर सदा सनाथ।
पुण्य- प्रसाद पिता का पाया, पाया हरदम साथ।।
संस्कारों का जनक पिता ही, नेक कर्म आधार।
बैठाकर कंधों पर अपने, दिखलाता संसार।।
बिना पिता के गजानंद अब, जग में हुआ अनाथ।।
पुण्य- प्रसाद पिता का पाया, पाया हरदम साथ।।
----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/07/2024
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विधा- गीत
सृजन शब्द- चिड़िया/पंछी
मात्रा भार- 16,11
➖➖➖➖➖➖➖➖➖
आसमान को छू लेने को, उड़ा परिंदा आज।
पंख पसारे आस न हारे, कर साहस आगाज।।
श्रम दानों से भूख मिटाये, तुष्टि नीर से प्यास।
भोर मधुर करलव से मन में, भर जाते उल्लास।।
सीख सिखाते जिम्मेदारी, कर लें हम सब नाज।
आसमान को छू लेने को, उड़ा परिंदा आज।।
चिंता कल की करे नहीं वह, वर्तमान विश्वास।
पेट सभी का भरते प्रभु जी, करते नहीं उदास।।
मुसीबतों से लड़ना सीखो, सिखलाते अंदाज।
आसमान को छू लेने को, उड़ा परिंदा आज।।
कभी आंधियाँ जल बरसातें, उजाड़ते हैं नीड़।
कौन पीर पंछी का समझे, बन बैठे सब भीड़।।
संरक्षित करने को पंछी, गजानंद कर काज।
आसमान को छू लेने को, उड़ा परिंदा आज।।
-----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/07/2024
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विधा- गीत
मात्रा भार- 16,14
*सृजन शब्द- खत*
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खत में मन की सारी बातें, बोल दिया हम करते थे।
भावों के सागर में डूबे, स्याह खुशी की भरते थे।।
कभी हँसाता कभी रुलाता, कभी दिलासा दे जाता।
सौंधी खुश्बू गाँवों की यह, साथ सँजोये ले आता।।
अपनों की यादों में खोये, नीर नयन से झरते थे।
भावों के सागर में डूबे, स्याह खुशी की भरते थे।।
प्रियतम की बन विरह वेदना, दिल में आग लगाती थी।
मधुर मिलन की आस लिये यह, सारी रात जगाती थी।।
तब तो खत को गले लगाकर, साजन रोज सँवरते थे।
भावों के सागर में डूबे, स्याह खुशी की भरते थे।।
आया इंटरनेट जमाना, बढ़ी दूरियाँ रिश्तों में।
माता पिता हुये बेगाने, कर्ज चुकाते किश्तों में।।
लाजवाब थे खत की दुनिया, शब्दों से भाव गुजरते थे।
भावों के सागर में डूबे, स्याह खुशी की भरते थे।।
-----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/07/2024
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विधा- गीत
मात्रा भार- 16,12
चित्राधारित सृजन शब्द- बचपन
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सार छंद में सार शब्द भर, गीत सुनो लाया हूँ।
बेगाना हर गम से बचपन, ये सुनते आया हूँ।।
कागज की हम नाव बनाकर, तब करते थे खेला।
ताऊ जी के पकड़े उँगली, जाते थे हम मेला।।
दादा-दादी की गोदी का, सुख पावन पाया हूँ।
बेगाना हर गम से बचपन, ये सुनते आया हूँ।।
बना घरौंदा मिट्टी का हम, नित स्वप्न सजाते थे।
छुकछुक-छुकछुक रेलगाड़ियाँ, हम खूब चलाते थे।।
ईचक दाना बीचक दाना, प्रिय गाना गाया हूँ।
बेगाना हर गम से बचपन, ये सुनते आया हूँ।।
लाद पीठ पर पुस्तक बस्ता, रोज स्कूल जाते थे।
नजर बचाकर पीछे बैठे, मिल मजा उड़ाते थे।।
ज्ञान ग्रहण गुरु जी से करने, चाँटा मैं खाया हूँ।
बेगाना हर गम से बचपन, ये सुनते आया हूँ।।
गर्मी छुट्टी खूब सुहाते, बरगद पीपल की छाया।
डूब-डूबकर ताल नदी में, करते रोज नहाया।।
अटकन बटकन दही चटाका, मैं खेल सुहाया हूँ।
बेगाना हर गम से बचपन, ये सुनते आया हूँ।।
शहर नौकरी करने आया, छोड़ गाँव की गलियाँ।
गई जवानी बाल पके अब, सूख रही मन कलियाँ।।
याद सताती जब अपनों की, छुप अश्रु बहाया हूँ।
बेगाना हर गम से बचपन, ये सुनते आया हूँ।।
-----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ) 08/07/2024
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विधा- गीत
मात्रा भार- 13-11
सृजन चित्राधारित- कर्म फल
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सुखद मिला है कर्म फल, सुखद करें जब काम।
वाणी पर संयम रखें, रख लें लोभ लगाम।।
द्वेष बुराई त्यागना, त्याग चलो अभिमान।
सत्य राह को थामना, नेक बनो इंसान।।
रखे स्वयं में हौसला, चढ़ो शिखर अविराम।
वाणी पर संयम रखें, रख लें लोभ लगाम।।
बाँध रखो बंधुत्व जग, सजा रखो मन गेह।
जीव चराचर के लिए, रखो आत्म में नेह।।
मानवता इंसानियत, रखे चलो नित थाम।
वाणी पर संयम रखें, रख लें लोभ लगाम।।
प्रीत बँधे विश्वास का, लोग बने सब मीत।
संस्कृति संस्कार ही, हो जीवन की रीत।।
याद जमाना नित करे, छोड़ चलो जग नाम।
वाणी पर संयम रखें, रख लें लोभ लगाम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/07/2024
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दिनाँक- 15/07/2024
विधा- कुंडलिया छंद
विषय- टूट रहा विश्वास
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कैसे करें यकीन अब, टूट रहा विश्वास।
देते अपने घात कटु, करके प्रेम विनाश।।
करके प्रेम विनाश, पीठ में घोंपे खंजर।
बदल गया परिवेश, छलावा छाया मंजर।।
हुए मतलबी लोग, चंद पाने को पैसे।
गजानंद विश्वास, दुबारा लायें कैसे।।
अच्छाई का देख लो, गया जमाना डूब।
बुरे कर्म में लिप्त जन, ढोंग दिखावा खूब।।
ढोंग दिखावा खूब, झूठ का फेंके पासा।
मानवता को त्याग, बढ़ाते कष्ट निराशा।।
धोखा देते लोग, छोड़कर पथ सच्चाई।
गजानंद है अस्त, जमाने में अच्छाई।।
------इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/07/2024
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विधा- गीत
मात्रा भार- 16, 14
चित्राधारित सृजन- भुट्टा
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सोना के सम पीला-पीला, सुंदर-सुंदर दाने हैं।
बारिश के मौसम में भुट्टा, लगते बहुत सुहाने हैं।।
हरा रंग तन कपड़ा ओढ़े, लिपटे कई परत रहते।
लोगों का मुख स्वाद बढ़ाने, आग बदन पर है सहते।।
ईचक दाना बीचक दाना, दाने ऊपर दाने हैं।
बारिश के मौसम में भुट्टा, लगते बहुत सुहाने हैं।।
रेशम के सम लम्बे-लम्बे, इसके बाल घनेरे हैं।
नींबू नमक लगाकर इस पर, हाथ मुलायम फेरे हैं।।
गरम-गरम में स्वाद बहुत है, खाते सब मनमाने हैं।
बारिश के मौसम में भुट्टा, लगते बहुत सुहाने हैं।।
गाँवों की बाड़ी में पहले, दादी लोग उगाते थे।
गजानंद परिवार साथ में, खूब मजे से खाते थे।।
अब तो सब बचपन की यादें, लगते स्वप्न पुराने हैं।
बारिश के मौसम में भुट्टा, लगते बहुत सुहाने हैं।।
---✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/05/2024
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विधा- दोहा गीत
मात्रा भार- 13-11
विषय- चित्राधारित- बेरोजगार
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बेरोजगार से हर युवा, परेशान है आज।
चिंता में है माता पिता, गिरा दुखों का गाज।।
शिक्षा का अब स्तर गिरा, निजीकरण का खेल।
मूक बधिर सरकार है, राजनीति का मेल।।
जनता बन बगुला भगत, चुप बैठा है आज।
चिंता में है माता पिता, गिरा दुखों का गाज।।
दिखता है चारों तरफ, बेगारी विकराल।
रोजगार पाने युवा, बजा रहे हैं गाल।।
आरक्षण को दोष दे, बैठे बन जो बाज।
चिंता में है माता पिता, गिरा दुखों का गाज।।
सर्वोपरि है धर्म अब, दिखता गर्त विकास।
रोजगार के द्वार को, बैठे किये विनाश।।
अंधभक्ति में लीन हैं, साक्षर सभ्य समाज।
चिंता में है माता पिता, गिरा दुखों का गाज।।
रोजगार मूलक करो, शिक्षा का विस्तार।
हर हाथों में काम हो, अर्जी सुन सरकार।।
पाट विषमता दर्द को, करें युवा तब नाज।
चिंता में है माता पिता, गिरा दुखों का गाज।।
-----इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/07/2024
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सादर समीक्षार्थ-
विधा- दोहा छंद गीत
मात्रा भार- 13-11
विषय- चित्राधारित(महँगाई)
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महँगाई की मार से, कौन करे उद्धार।
सब्जी गायब थाल से, चुप बैठी सरकार।।
सौ से भी ऊपर हुआ, कीमत अब पेट्रोल।
करते वादें खोखले, नेता बन बड़बोल।।
खुशियों में ताला लगा, बहा नैन दुख धार।
सब्जी गायब थाल से, चुप बैठी सरकार।।
जनता के मतदान का, व्यर्थ हुआ उपयोग।
नेता भरते जेब खुद, लोग रहें दुख भोग।।
जिस पर किये यकीन हम, निकला वह गद्दार।।
सब्जी गायब थाल से, चुप बैठी सरकार।।
निज राशन सामान का, दाम किया बेहाल।
तरस रही जनता सभी, खाने रोटी दाल।।
व्यापारी जन खुश दिखे, कर कालाबाजार।
सब्जी गायब थाल से, चुप बैठी सरकार।।
----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/07/2024
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सादर समीक्षार्थ-
विधा- सरसी छंद गीत
मात्रा भार- 16-11
विषय- किसान (चित्राधारित)
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बंजर धरती को उपजाऊ, करते धन्य किसान।
इसीलिए कहते हैं इनको, धरती का भगवान।।
श्रम का मोती खेत उगाते, सींच भावना नीर।
फिर भी कोई समझ न पाते, इनके मन का पीर।।
रहा उपेक्षित सुख सुविधा से, कैसे हो उत्थान।।
इसीलिए कहते हैं इनको, धरती का भगवान।।
अन्न उगाकर पेट भरे जग, रहकर भूखे प्यास।
संकल्पित रह विश्वासों पर, होते नहीं उदास।।
धन लालच में नहीं बेचते, अपना वे ईमान।।
इसीलिए कहते हैं इनको, धरती का भगवान।।
हलधर हल को साथी माने, बैल बना मनमीत।
धैर्य धरे वह करे किसानी, बाँध सभी से प्रीत।।
ये दुनिया के मालिक इनको, देना सुख वरदान।
इसीलिए कहते हैं इनको, धरती का भगवान।।
----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/07/2024
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सादर समीक्षार्थ-
विधा- गीत
मात्रा भार- 16, 14
विषय- चित्राधारित
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थाम काँध पर काँवड़ पावन, शिवधाम मुझे जाना है।
दर्शन कर औघड़दानी का, जीवन धन्य बनाना है।।
कालों का शिव महाकाल है, सुख दाता जग स्वामी है।
आदि अनादि अनंत यही है, प्रभु जी अंतर्यामी है।।
जटा बहे गंगा की धारा, चमके चाँद सुहाना है।
दर्शन कर औघड़दानी का, जीवन धन्य बनाना है।।
भष्म रमाये अंग-अंग में, बैठे हैं बन बैरागी।
पावस पावन शुभ बेला में, भक्ति हृदय में है जागी।।
शंकर भोलेनाथ मनाने, धतुरा दूध चढ़ाना है।
दर्शन कर औघड़दानी का, जीवन धन्य बनाना है।।
बम बम भोले शिव का हो ले, काँवरियों का नारा है।
दीन-दुखी भक्तों का बनते, भोलेनाथ सहारा है।।
मन में श्रद्धा भाव जगाकर, सुख समृद्धि पाना है।
दर्शन कर औघड़दानी का, जीवन धन्य बनाना है।।
-----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/07/2024
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सादर समीक्षार्थ-
विधा- कुण्डलिया छंद
सृजन - *कलम*-
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जग- जन की पीड़ा लिखूँ, लिखूँ गरीबी दर्द।
ढोंग रूढ़ि पाखण्ड को, करूँ सदा बेपर्द।।
करूँ सदा बेपर्द, कलम में भर सच्चाई।
कहूँ नीति की बात, हृदय में रख अच्छाई।।
रखो कर्म पर आस, इसी से सजता जीवन।
गजानंद सम्मान, करेगा तब सब जग-जन।।
दर्पण समाज का कलम, कवियों की तलवार।
लिखे इबादत भी कलम, रख जीवन का सार।।
रख जीवन का सार, कलम हित धर्म निभाती।
करती कलम कमाल, सदा सच राह दिखाती।।
गजानंद भर भाव, विचारों का हो अर्पण।
लिखना लोक हितार्थ, कलम बन समाज दर्पण।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/07/2024
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*****************************************विधा- सरसी छंद गीत
सृजन शब्द- *मातु भवानी*
मात्रा भार- 27
यति- 16,11 पर
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मातु भवानी वरद शारदे, विनती करूँ पुकार।
सुन लो मेरी अर्जी माता, शरण पड़ा हूँ द्वार।।
मंदिर-मन्दिर गूँज रहा है, माँ ही माँ का नाम।
पावन मन से शीश झुका लो, सिद्ध हुए सब काम।।
कलश सजे हैं दीप जले हैं, लाखों लाख हजार।
मातु भवानी वरद शारदे, विनती करूँ पुकार।।
जगराता नौ रात दिवस तक, भक्त करे यशगान।
ढोल मंजिरा मांदर बाजे, सुर में छेड़े तान।।
माँ आये नवरात्रि पर्व में, कर सोलह श्रृंगार।
मातु भवानी वरद शारदे, विनती करूँ पुकार।।
नाम एक सौ आठ जपूँ मैं, सुबह शाम दिन रात।
गजानंद को पुत्र समझ माँ, देना सुख सौगात।।
भवसागर से पार लगा दो, बन करके पतवार।
मातु भवानी वरद शारदे, विनती करूँ पुकार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/04/2025
*****************************************विधा- सरसी छंद गीत
सृजन शब्द- मोह भंग
यति- 16,11
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मोह भंग अब कभी न होवे, राम नाम से ध्यान।
शरण सदा मैं पड़ा रहूँ प्रभु, गाते महिमा गान।।
बीज संचरित अच्छाई का, करना प्रभु जी आप।
दूर बचा अवगुण से रखना, मिट जाए संताप।।
झूठ कपट की बोल न बोलूँ, भरना सत्य जुबान।
मोह भंग अब कभी न होवे, राम नाम से ध्यान।।
प्रेम प्रतिष्ठा मर्यादा का, सिखलाना प्रभु पाठ।
लोभ मोह भ्रम क्रोध अहं से, बने न जीवन काठ।।
सफल बना लूँ इस जीवन को, देना सद्गति ज्ञान।
मोह भंग अब कभी न होवे, राम नाम से ध्यान।।
रोम-रोम में राम रमा लूँ, मेरे मन की चाह।
भक्ति भाव में कमी न हो प्रभु, देना शक्ति अथाह।।
गजानंद बन दास खड़ा है, दे दो सुख वरदान।
मोह भंग अब कभी न होवे, राम नाम से ध्यान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/04/2025
*****************************************विधा- सरसी छन्द गीत
सृजन शब्द- भाग्य भरोसे
भाग्य भरोसे रहता है जो, मानव वह नादान।
कर्म राह को थाम बढ़ो नित, पाने को पहिचान।।
श्रम से मिले सफलता पग-पग, श्रम से मिले मुकाम।
बनना कर्म प्रधान सुनो जी, होगा जग में नाम।।
कर्मवीर बन जीवन रण में, चलना सीना तान।
भाग्य भरोसे रहता है जो, मानव वह नादान।।
सृजित हुआ है श्रम से ही तो, ताजमहल मीनार।
श्रम के आगे रुकी झुकी है, नदियों की भी धार।।
कर्म बना लो पूजा कहते, गीता ग्रंथ कुरान।
भाग्य भरोसे रहता है जो, मानव वह नादान।।
श्रम से अपने श्रमिक दिये हैं, पर्वत को भी नाप।
आँसू का सैलाब बहाकर, सहते दुख चुपचाप।
फिर भी श्रम का शोषण करते, आये हैं धनवान।
भाग्य भरोसे रहता है जो, मानव वह नादान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/04/2025
*****************************************विधा- सार छन्द गीत
सृजन शब्द- पधारो
दर्शन सुख को तरस रहा हूँ, प्रभुवर द्वार पधारो।
शरण पड़ा हूँ आस लिए प्रभु, मेरे कष्ट निवारो।।
याचक बन मैं करूँ याचना, सुन लो अर्जी दाता।
साँस चले इस तन में जब तक, रहे सुखों से नाता।।
लीन रहूँ मैं भक्ति भाव में, नंदित नैन निहारो।
दर्शन सुख को तरस रहा हूँ, प्रभुवर द्वार पधारो।।
द्वेष प्रवेश करे मत मन में, छल भ्रम क्रोध बुराई।
नेक बनाना कर्म सदा ही, राह दिखा सच्चाई।।
हो जाऊँ कर्तव्य विमुख मत, देना भूल सुधारो।
दर्शन सुख को तरस रहा हूँ, प्रभुवर द्वार पधारो।।
मन में मैं का ख्याल न आये, बहे बंधुता धारा।
बन करके पतवार आप ही, करना नाव किनारा।।
सफल करो प्रभु जन्म हमारे, जीवन भार उतारो।
दर्शन सुख को तरस रहा हूँ, प्रभुवर द्वार पधारो।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2025
****************************************,*विधा- सार छन्द गीत
सृजन शब्द- अभ्युदय
भाग्य अभ्युदय करने को नित, श्रम में ध्यान लगाना।
कर्म राह पर बढ़ते जाओ, छोड़ो व्यर्थ बहाना।।
लाँघ बताओ पर्वत सागर, पाने को सुख मोती।
रोक बताओ धार नदी की, हिम्मत में दम होती।।
कर्मपरायण बनकर हरदम, मंजिल अपना पाना।
भाग्य अभ्युदय करने को नित, श्रम में ध्यान लगाना।।
तथाकथित से ध्यान हटाओ, करो परख सच्चाई।
पढ़ना सीखो मन की बातें, और पीर गहराई।।
छोड़ सभी रुसवाई जग में, हँसना और हँसाना।
भाग्य अभ्युदय करने को नित, श्रम में ध्यान लगाना।।
गीता ग्रन्थ कुरान सभी के, मूलमन्त्र को जानो।
कर्म प्रधान मनुज बन जाओ, खुद को खुद पहिचानो।।
गजानंद जी कर्म महत्ता, सबको आप बताना।
भाग्य अभ्युदय करने को नित, श्रम में ध्यान लगाना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/04/2025
*****************************************विधा- सार छन्द गीत
सृजन शब्द- निर्विवाद
निर्विवाद जीवन को रखने, अपना ध्येय बनाना।
सत्य अहिंसा प्रेम दया का, सबको पाठ पढ़ाना।।
ठग बैठी है सत्कर्मों को, बनकर ठगनी माया।
सभी तरफ में मँडराता है, लोभ मोह का साया।।
समय सचेत किये अब जागो, पड़े नहीं पछताना।
निर्विवाद जीवन को रखने, अपना ध्येय बनाना।।
तुझमें मुझमें बसते सब में, राम नाम अविनाशी।
फिर क्यों दर-दर भटक रहा है, मन को किये उदासी।।
हरि मिले न पाहन पूजे से, है इतना समझाना।
निर्विवाद जीवन को रखने, अपना ध्येय बनाना।।
नहीं भरोसा है सांसों का, दे जाएगी धोखा।
पाने को सम्मान जगत में, कर्म करे जा चोखा।।
जोड़ रखो रिश्तों को हरदम, असली यही खजाना।
निर्विवाद जीवन को रखने, अपना ध्येय बनाना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/04/2025
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