रविवार, 23 जून 2024

पदावली

 *पदावली----*

        "पदावली गीत की जननी है।"  आधुनिक काल में पदावली ने गीत का स्वरूप ग्रहण कर लिया है। अब गीत हर हृदय की अंतरंग भाषा व्यंजना बन चुका है।महाकवि विद्यापति इसके जनक माने जाते हैं। भक्ति काल पर इस विधा में तुलसी, मीरा ,कबीर आदि कवियों के पदावली प्राप्त होते हैं।


 पदावली अब लुप्त हो चुकी है किन्तु उसके उपलब्ध साहित्य में दृष्टिगोचर होते हैं। "प्रीत-पदावली" नामक यह काव्य संग्रह इस विधा को पुनर्जीवित करने का मेरा अल्प प्रयत्न है। प्रस्तुत पद संग्रह प्रीति-पदावली पर 220 पदावलियाँ हैं।


विधान-- पदावली की शुरुआत प्रायः एक अर्धाली से होती है यही ध्रुव पंक्ति कहा जा सकता है दूसरी पंक्ति जो कि एक निश्चित छंद की मात्रा पर पूर्ण की जाती है,इसे पूरक पंक्ति कह सकते हैं। दोनों पंक्तियां समतुकांत तो होती है प्रत्येक पंक्ति प्रथम पंक्ति के ही तुकांत पर रखी जाती है लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। पदावली में कुल कितनी पंक्तियां हो यह सृजन कार के ऊपर होता है। ये अधिकतर 10 ,12 पंक्तियों पर लिखे जाते हैं। प्रत्येक दो पंक्ति के तुकांत भिन्न भी हो सकते हैं। सृजनकार अंतिम पंक्ति पर अगर चाहे तो अपना नाम या उपनाम भी रख सकता है।


10--- अनंत (16,14)


                                 बोलो, मैं कब हारा हूँ।

विजय पताका सबसे ऊँचा, नीलगगन ध्रुवतारा हूँ।।


घूर्णित जीवन चक्र अनवरत, लगता सबको न्यारा हूँ।

मैं इसकी हर चाल समझता, इसीलिए तो प्यारा हूँ।।


सात समंदर तीन लोकहित, चूना मिट्टी गारा हूँ।

मति सक्रियता सदा शीर्ष पर, अजेय अनंत धारा हूँ।।


हर घट पर मेरी ही सत्ता, श्री मंदिर गुरुद्वारा हूँ।

व्यास बाल्मिकी पाणिनि नारद, मैं ही सदा सँवारा हूँ।।


सृजन देवता परिचय मेरा, मनमौजी बंजारा हूँ।

नहीं किसी से बैर पुरानी, नहीं किसी का यारा हूँ।।


21---- मनबोधिनी (16,15)


                                           गुप्त मंत्र है तेरा नाम।

सप्त लोक में सबसे सुंदर, अभिरंजित अनुपम स्वर ग्राम।।


रूप मनोहर मति दिग्दर्शित, सहज चपलता है अभिराम।

सिद्धि शिवा सा उन्नत मस्तक, मनबोधिनी महान ललाम।।


नपा तुला कद सदा सुगंधित, गंध कमलिनी आठो याम।

मदगर्वित उन्मीलित आँखें, बलिहारी शत शत रति काम।।


यौवन के प्रतिमान प्रिये तुम, अंग मदिर उपमेय किमाम।

झील झरोखे उपवन सुरभित, ये बदन कश्मीर आसाम।।


चित्त महल में वास तुम्हारा, सदा विराजित रहते वाम।

काव्य कामिनी हे रसवंती, रखा चित्तेश्वरी प्रिय नाम।।

साभार- प्रीत पदावली

*-- डॉ रामनाथ साहू 'ननकी'*

   *छंदाचार्य, बिलास छंद महालय*

*पदावली*

विधान :-

आधार छंद : सरसी छंद(16,11)

             8(4+4/3+3+2/3+5)+21। 👈तुकांत

4+4+4+4/3+3+2+4+4/2+3+3+4+4/4+4+3+3(12)+2, 8(4+4/3+3+2/3+5)+21।।👈समतुकांत


4+4+4+4/3+3+2+4+4/2+3+3+4+4/4+4+3+3(12)+2, 8(4+4/3+3+2/3+5)+21। 👈समतुकांत

4+4+4+4/3+3+2+4+4/2+3+3+4+4/4+4+3+3(12)+2, 8(4+4/3+3+2/3+5)+21।। 👈समतुकांत


8(4+4/3+3+2/3+5)+21। 👈तुकांत

इस प्रकार किसी भी मात्रा संयोजन पर आप सृजन कर सकते हैं।

--------*पदावली*

विधान :-

आधार छंद : सरसी छंद(16,11)

             8(4+4/3+3+2/3+5)+21। 👈तुकांत

4+4+4+4/3+3+2+4+4/2+3+3+4+4/4+4+3+3(12)+2, 8(4+4/3+3+2/3+5)+21।।👈समतुकांत


4+4+4+4/3+3+2+4+4/2+3+3+4+4/4+4+3+3(12)+2, 8(4+4/3+3+2/3+5)+21। 👈समतुकांत

4+4+4+4/3+3+2+4+4/2+3+3+4+4/4+4+3+3(12)+2, 8(4+4/3+3+2/3+5)+21।। 👈समतुकांत


8(4+4/3+3+2/3+5)+21। 👈तुकांत

इस प्रकार किसी भी मात्रा संयोजन पर आप सृजन कर सकते हैं।------------------------*------------------------------------------

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*विधा-- पदावली*

*आधार छंद-- 16,14 (ताटंक छंद)*

अनिवार्यता- पदान्त पर 3 गुरु अनिवार्य

*सृजन शीर्षक--  चंचल मन भटकाता है (10 पंक्ति)*

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                                     चंचल मन भटकाता है।

जग में लोभ विकार भरा है, समझ नहीं क्यों पाता है।।


जाना सबको छोड़ अकेला, क्यों धन पर इतराता है।

कर्म करो यश धर्म करो नित, सिर्फ नाम रह जाता है।।


धन माया कुछ साथ चले ना, चलती साथ भलाई है।

जीना सफल उसी का है जो, समझे पीर पराई है।।


मतलब के सब रिश्ते नाते, मतलब के सब यारी है।

संकट में सब हुये पराये, मानवता भी हारी है।।


त्याग झूठ की राह हमेशा, पास रखो खुद्दारी है।

इस जीवन का कर्ज चुकाना, पाया साँस उधारी है।।


गीता ग्रन्थ कुरान बाइबिल, नेकी ज्ञान सिखाता है।

गजानंद मिलजुल रहने से, स्वर्ग धरा बन जाता है।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/06/2024

संध्याकालीन कक्षा हेतु-//


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*विधा-- पदावली*

*आधार छंद-- 14,10*

*पदांत-- 22*

*सृजन शीर्षक-- प्रेम गीत गाओ। (10 पंक्ति)*

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                                  प्रेम गीत गाओ।

नेह नीर अब बरस रहा, भीग सभी जाओ।।


ध्येय बना इस जीवन का, बढ़ते जाना है।

नेक कर्म से ही सुख का, मंजिल पाना है।।


रीत रहा है प्रीत यहाँ, फूट नहीं डालो।

दो संदेश एकता का, द्वेष नहीं पालो।।


मानव-मानव भेद नहीं, सबको समझाओ।

जाति-धर्म के नाम कभी, द्वेष नहीं लाओ।।


माथ झुका मैं नमन करूँ, देश सिपाही को।

गजानंद आनंदित कर, भटके राही को।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/06/2024

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*विधा-- पदावली*

*आधार छंद यति-- 14,11*

*सृजन शीर्षक--  कब आओगे राम (10 पंक्ति)*

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                            कब आओगे राम।

राह ताकते बैठा हूँ, मन को अपना थाम।।


शोषण अत्याचार बढ़ा, बढ़ा द्वेष तकरार।

तरस रहें हैं लोग यहाँ, पाने को अधिकार।।


गरज रहा है रावण अब, हृदय लिए अभिमान।

धूर्त मूर्ख बन कर ज्ञानी, बाँट रहे हैं ज्ञान।।


मान संत गुरु का करना, भूल गया इंसान।

हुआ पराया मातु पिता, सास ससुर भगवान।।


लोग नहीं सच बात सुने, करते झूठ प्रचार।

भूल गये पथ मर्यादा, राम नाम का सार।।


कलयुग का उद्धार करो, आकर प्रभु श्री राम।

गजानंद कर जोर कहे, पाये सब सुख धाम।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/06/2024

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*विधा-- पदावली*

*आधार छंद यति-- 14,12*

*सृजन शीर्षक-- जीवन दर्शन प्यारा।(10 पंक्ति)*

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                              जीवन दर्शन प्यारा।

द्वेष द्वंद को त्याग सदा, बनना मीत सहारा।।


दुख विपदा बतलाता है, जीवन की परिभाषा।

कभी जरूरत से ज्यादा, रखो नहीं अभिलाषा।।


समय साथ चलना सीखो, बीते पल को छोड़ो।

दीन भलाई सेवा में, मानव खुद को जोड़ो।।


नहीं कभी अभिमान करो, यह मिट्टी का काया।

मिट्टी में मिल जायेगा, धन पद मिथ्या माया।।


चाहे ग्रंथ कुरान पढ़ो, चाहे पढ़ लो गीता।

पढ़े नहीं मानवता तो, मानव जीवन रीता।।


गजानंद आपस लड़ना, मजहब नहीं सिखाता।

धर्म नीति का पाठ पढ़ा, नेकी राह दिखाता।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/06/2024

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*विधा-- पदावली*

*आधार छंद यति-- 14,12

*सृजन शीर्षक-- हलचल  हिय है भारी।(10 पंक्ति)*

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                           हलचल हिय है भारी।

द्रवित बहुत है मन मेरा, ढूँढ़ रहा हितकारी।।


हुये मतलबी लोग यहाँ, किसको अपना मानूँ।

कौन पराया अपना है, कैसे मैं पहचानूँ।।


दागदार विश्वास हुआ, किस पर करें भरोसा।

दुख में भी तो लोग यहाँ, खाते तीन परोसा।।


बाँट कौर खाया जिसने, कहलाया वह दाता।

दीन दुखी का साथ दिया, बाँध सदा ही नाता।।


करो समय की कद्र सदा, समय सभी का आता।

राजा भी तो रंक हुये, कहते भाग्य विधाता।।


तथाकथित की बातों को, समझो परखो जानो।

पढ़े लिखे विद्वान जनों, सच्चाई को मानो।।

----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/06/2024

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*विधा-- पदावली*

*आधार छंद-- (धनुष्कर) 14,12*

*यति- 14,12*

*पदांत- 112 (सगण)*

*मापनी-- (4442, 2222-112)*

*सृजन शीर्षक-- मन का मधुबन महका।(10 पंक्ति)*

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                          मन का मधुबन महका।

हुआ बावरा मन मेरा, प्रीत प्रिया पा चहका।।


रूप सलोनी नैन बसा, रोज निहारूँ तुझको।

प्रेम पुजारी बन बैठा, साथ मिले अब मुझको।।


चमचम बिंदी माथ सजे, छमछम पायल बजती।

गोरी-गोरी हाथों में, नाम पिया का सजती।।


शर्माती घूँघट से तब, दिल में बिजली गिरती।

जुल्फ बिखेरे जब चलती, घोर घटा तब घिरती।।


हुआ अचेतन देख तुम्हें, कहीं नहीं दिल लगता।

बेकरार मिलने को प्रिय, रात-रात भर जगता।।


दूरी अब मंजूर नहीं, साथ-साथ है रहना।

गजानंद तन मन तेरे, प्यार बना दे गहना।।


----🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/06/2024

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*विधा-- पदावली*

*आधार छंद-- (धनुष्कर) 14,12*

*यति- 14,12*

*पदांत- 112 (सगण)*

*मापनी-- (4442, 2222-112)*

*सृजन शीर्षक-- भ्रमर जाल में मत फँसना ।(10 पंक्ति)*

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भ्रमर जाल में मत फँसना, सोच कदम को रखना।

बढ़ना आगे धैर्य रखे, फल मीठा नित चखना।।


रखे भरोसा चलना तुम, कर्म स्वयं का गढ़ने।

रोक नहीं पायेगा पल, तुमको मंजिल चढ़ने।।


धन माया में डूब कभी, अहंकार मत करना।

सत्य राह में चलना नित, नहीं हार से डरना।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/06/2024

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*विधा-- पदावली*

*आधार छंद-- (राधेश्यामी) 16,16*

*सृजन शीर्षक-- नवल प्रभा का स्वागत करिए 10 पंक्ति)*

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                                नवल प्रभा का स्वागत करिए।

जीवन को आनंदित करने, मन में रंग खुशी का भरिए।


आलोकित हो श्रम का मोती, सुख का माथ पसीना चमके।

कर्म साधना का वंदन हो, सच आभूषण बन तन दमके।।


साम्य भाव को उदित करो तुम, बोलो हरदम मीठी वाणी।

रखो भावना भाईचारा, सुख से प्रमुदित हो हर प्राणी।।


दूर रहो लालच तृष्णा से, मन से बूझ नहीं पाती है।

करे पल्लवित सोच बुरा यह, खुशियों में आग लगाती है।।


कटुता कंटक को हम काटे, दिल में प्रेम सुमन खिल जाये।

छोड़ आपसी द्वंद द्वेष को, अपनों से अपने मिल जाये।।


सच्चाई से खुद को जोड़ें, तज तथाकथित भ्रम भय राहें।

सदा बचाकर रखना खुद को, गजानंद पाखंड निगाहें।।

---🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/06/2024


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