मंगलवार, 30 जून 2026

उलटबांसी

​🌀 उलटबांसी- 1

बूझव बूझव गजानंद कहे रे भाई,

शेर ला गइया मार भगाई जी।


अम्बर ऊपर पेड़े उगे हे,

जड़ मा डारा पाना लगे हे जी।


सुक्खा तरिया मा बहे हे धारा,

बिना गोड़ के चले संसारा जी।


माली ला फूल हा मूड़ मा खोंचे,

परबत ला हे चाँटी दबोचे जी।


बइहा ला हे सब कुछ सूझे,

ज्ञानी हा देखव जनउला बूझे जी।


हाथी हा डर के मारे भागे,

मुसवा हा रतिहा बइठे जागे जी।


पथरा हा रोये, लोहा मुस्काये,

चेला हा गुरु ला ज्ञान सिखाये जी।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/06/2026

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​🌀 उलटबांसी- 2

बूझव-बूझव गजानंद कहे रे भाई,

सुक्खा तरिया मा बगुला नहाई जी।


मुसवा बिलाई ला हा पकड़े,

मछरी पेड़ के जड़ ला जकड़े जी।


बइला बियाये हे, गाय हे बांझा,

बछवा दूध दुहै दिन-सांझा जी।


पंख बिन चिरई उड़े हे अकाशा,

दीया बिना चारो मुड़ा प्रकाशा जी।


आगू मा पानी, पाछू मा आगी,

सोवत जागय, जागत हा भागी जी।


धरती हा अगास ऊपर छाये,

भुइँया, बादर मा पानी गिराये जी।


बिना गोड़ के दौड़य राही,

इहू अचंभा सूझत नाहीं जी।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/07/2026

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​🌀 उलटबांसी- 3

बूझव-बूझव गजानंद कहे रे भाई,

सुई मा हाथी हवे समाई जी।


कउँहा हा मोती चुग-चुग खाये,

हंस हा कचरा मा मँडराये जी।


बिना हाथ के बुनत हे साड़ी,

बिना चक्का के दउड़त हे गाड़ी जी।


बिना गला के गावत हे गाना,

गूंगा करत हे ग्रंथे बखाना जी।


मुर्दा हा उठके हे गोठियाये,

जीयत मनखे हा सुतियाये जी।


धरती गगन ला लीलत जाये,

अँधियारी मा दीया समाये जी।


कहे गजानंद सुनौ सुजाना,

उलट के देखव तो मिलही ज्ञाना जी।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)30/07/2026

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​🌀 उलटबांसी- 4

बूझव-बूझव गजानंद कहे रे भाई,

हिरना, बघवा ला हे कुदाई जी।


चंदा हा देखव घाम बरसाये,

सुरुज के गोदी मा ठंडा समाये जी।


नदिया हा सागर ला सोख जाए,

सुक्खा कुआँ मा पूरा हा आए जी।


पवन हा डोरी बन बंध जाए

लोहा के जंजीर पिघल जाए जी।


आगी के कोरा मा पानी हा सोए,

जीयत मनखे बर दुनिया रोये जी,


बंजर भुइँया मा अमरित बरखा,

समुंद हा बूँद मा डूबके परखा जी।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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​🌀 उलटबांसी: 5

बूझव-बूझव गजानंद कहे रे भाई,

मरे गइया देखव हे पगुराई जी।


मुसवा बिलई ला खदेड़ मारे,

मेचका ला देख साँपें टर्राये जी।


पेड़ हा भुइँया ऊपर नइ जावय,

जड़ी अकासे मा फर जावय जी।


माटी के पुतरा परान फूँके,

पंडित के मंतर भभूत चूके जी।


अँधरा हा दीया ला घटकत जाये,

कोंदा हा रात-दिन गारी सुनाये जी।


मछरी रूख मा महल बनाये,

चिरई पानी मा गोता लगाये जी।


सुक्खा तरिया मा डोंगा हा तउड़े,

ज्ञाने के रद्दा मा भरम हा दउड़े जी।

✍️ इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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​🌀 उलटबांसी: 6

गुनौ-गुनौ गजानंद कलजुग के बानी

उलटा बहय करम के पानी जी।


​सोना हा लोहा के गदहा ला बोहय,

काँचे के टुकड़ा हा हीरा ला धोवय जी।


​चेला हा बइठे जी आसन लगाये,

गुरु हा पाछू चउँर डोलाये जी।


​भीखे मँगइया हा दाने ला बाँटे,

करम के रेघा ला धरम हा चाँटे जी।


साँपे हा गिद्दा ला पंजा दबाये,

कोलिहा हा कुकर ला जंगल भगाये जी।


कागे भुसंडी हा मड़वा मा गावय,

कोयली हा बइठे रोना मचावय जी।


मुरुख हा ज्ञानी ला देखव ठगे हे,

सच मा झूठ के ताला लगे हे जी।

✍️ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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🌀 उलटबांसी: 7

गुनौ-गुनौ गजानंद कलजुग के बानी, 

ऊपर हे कमरा तरी हे छानी जी।

​माटी के घइला मा सागर समाये, 

अगास, लइका बन कोरा मा आये जी। 

​साँसे के खूँटा मा हिरदे हा बंँधगे, 

मिरगा के तीर मा शिकारी हा बिंधगे जी। 

​तरिया के पानी मा मछरी हा प्यासी, 

मरे हा जिये, जीयत पाये फाँसी जी। 

​सुक्खा रे तरिया मा लहरा उठत हे, 

बिना थाप दिये मँदरिया धुकत हे जी। 


​सुरुज,चंदा ले उजियारी माँगे,

ज्ञानी हा मुरुख के पाछू मा भागे जी।

​छोटे से फर, बड़ रुखवा झुकाये,

तप के छइहाँ हा घामे थिराये जी। 

​नदिया हा सागर ला गोदी सुताये,

झूठ के मारग हा जग ला जगाये जी।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)03/07/2026

सोमवार, 29 जून 2026

उल्लाला छंद (हिंदी)

उल्लाला छंद (13,13)

विषय- *मंदिर*

मन मंदिर पावन हुआ, आए प्रभु जी आज हैं।

दीपक श्रद्धा का जला, सिद्ध हुए सब काज हैं।।


मंदिर की चौखट छुई, पाया परमानंद को।

चरणों में अर्पित किया, जीवन के हर छंद को।।


मंदिर में जो आ गया, मिटते उसके कष्ट हैं।

करुणा सागर आप हैं, पाप सभी अब नष्ट हैं।।


मंदिर की घंटी बजी, गूँजा पावन नाद जी।

भक्तों को वरदान का, मिलता महा प्रसाद जी।।


मंदिर में मूरत सजी, अद्भुत रूप अनूप है।

अंतर का अज्ञान तो, सत्यबोध दुख धूप है।।


मंदिर में महकी हवा, चंदन की खुशबू उड़ी।

सच्ची श्रद्धा से यहाँ, भक्तों की टोली जुड़ी।।

मंदिर की महिमा अमित, गाते सब नर-नार जी।

जो भी आया द्वार पर, पाया उसने प्यार जी।।

मंदिर में दीपक जला, अंधकार सब दूर है।

कृपा तुम्हारी देखकर, मन मेरा भरपूर है।।

मंदिर पावन धाम है, मिलती मन को शांति है।

भजने से भगवान को, मिटती सब ही भ्रांति है।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)15/06/2026

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 उल्लाला छंद (13,13)

सृजन शब्द- *गाँव* 

पावन मेरा गाँव है, निर्मल इसकी रीत है।

सबके मन में बस रही, सच्ची अनुपम प्रीत है॥

हरी-भरी सी भूमि है, सुंदर सुखद समीर है।

शीतल जल से बह रही, पावन नदिया तीर है॥


बरगद की उस छाँव में, सजती है चौपाल भी।

दुख-सुख बाँटें प्यार से, बूढ़े और गुवाल भी॥


माटी की खुशबू यहाँ, महके चारों ओर हैं।

नाच दिखाए झूमकर, वन में सुंदर मोर हैं॥

सच्चा सुख मिलता यहाँ, छोड़ शहर का शोर जी।

खींच पुरानी याद को, लाता गाँव बटोर जी॥

✍🏻इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)17/06/2026

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उल्लाला छंद (13-13)

विषय- आँचल 

​नमन करूँ पग मातु का, आँचल का रख लाज जी।

संकट सारे दूर हों, सिद्ध हुए सब काज जी।।


​बीता बचपन मौज में, पा जननी का साथ जी।

शीतल पावन नेह का, मिला शीश पर हाथ जी।।


​दुख की घड़ियाँ भागतीं, मिलता सुख का मोद है।

माँ का आँचल दे रहा, पावन प्यारी गोद है।।


​श्रद्धा मन में धार के, आँचल सुमिरन कीजिए।

ममता की इस धार से, मन का घट भर लीजिए।।


​संकट में संबल बने, आँचल सुख का धाम है।

सत्यबोध इस छाँव को, सौ-सौ बार प्रणाम है।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)20/06/2026

छप्पय छंद (हिंदी)

 1- सवेरा

नष्ट हुआ तम-जाल, लाल नभ में छवि छाई।

शशि की मिटी प्रकाश, किरण रवि ने बिखराई॥

जागे खग-कलकंठ, कूंज कानन में गूंजी।

विकसित हुए सरोज, खुली वैभव की पूंजी॥

पवन मंद शीतल बहे, सुरभित अब चहुँओर है।

आलस तज अब जागिये, उदित हुआ सुख भोर है॥


मिटा निशा का कष्ट, नया दिन सम्मुख आया।

पुलकित हुआ समाज, मुदित जग जन की काया॥

कृषक चले निज खेत, शंख मंदिरों में बाजे।

श्रम का पावन मंत्र, वीर पुरुषों पर साजे॥

कर्म-मार्ग पर पग धरो, तजो मोह की यामिनी।

चमक उठेगा भाग्य अब, जैसे नभ में दामिनी॥


त्याग निशा का संग, विहग नभ मंगल गाते।

भक्त हृदय आनंद, ईश-सुमिरन में पाते॥

दूर प्रकृति के कष्ट, ओस-कण मणिवत चमकें।

मानो देव-विमान, स्वर्ग से भू पर दमकें॥

फैला चारों ओर अब, सत्य-ज्ञान का शुभ विमल।

वंदन कर इस प्रात को, मिटें शोक का पल-विपल॥

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

 बिलासपुर (छत्तीसगढ़)22/06/2026

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2- *आँगन*

तुलसी का है धाम, जहाँ पर दादी गातीं।

चिड़ियाँ करतीं शोर, भोर में हमें जगातीं।।

खेल-कूद दिन रात, धूल में तन सन जाता।

माटी का वह गंध, आज भी मन को भाता।।

बचपन का पावन सदन, याद बहुत अब आ रहा।

आँगन का शुभ दृश्य वह, जीवन को महका रहा।।


सजती सुंदर आज, चौक पुरवाती माता।

रंगों की बौछार, देख हर मन हर्षाता।।

सजते तोरण द्वार, दीप की आभा न्यारी।

मंगल गातीं नार, रीत लगती है प्यारी।।

होती पावन साधना, मिटती मन की भावना।

सुख की सुंदर अर्चना, पूरी होती कामना।।


बरसे सावन बूँद, नाचता मयूर मनहर।

कागज़ की वह नाव, तैरती बहते जल पर।।

धूप-छाँव का खेल, सुघर जाड़ों में भाता।

नीम झरे चुपचाप, ओस का मोती लाता।।

ऋतु का रूप सुहावना, हरती मन की तापना।

धूप अनूप लुभावना, सुख की करती साधना।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)26/06/2026

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3- *किसान*

तपता दिनकर तेज, गगन से बरसे शोला।

झुलस रहा भू भाग, पवन का चलता झोला।।

धीर धरम का वीर, खेत में हल को बाहे।

श्रम का जो शुचि नीर, बहाकर फसलें चाहे।।

वंदन उस भू पूत को, नमन कठिन तप साधना।

स्वेद बहाकर कर रहा, सबके हित की कामना।।


गरजे घन घनघोर, गगन में बादल छाए।

रिमझिम बरसे मेह, धरा पर खुशियाँ लाए।।

कृषक साथ ले बैल, खेत की ओर पधारे।

उगा अन्न के बीज, आस के दीप सँवारे।।

जगा रहा शुभ भावना, नाच रहा मन झूमता।

हर्षित भू का वीर वह, मेघ-चरन है चूमता।।


पवन चले झकझोर, शूल सी ठंड सताए।

चादर ओढ़े ओस, धुंध नभ में फैलाए।।

काँपे थर-थर गात, कृषक रखवार कहाए।

सहता तीखी शीत, खेत की ओर सिधाए।।

​पोषण करता विश्व का, शीश झुका वंदन करें।

ऋणी हमेशा हम रहें, भाव यही उर में भरें।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)27/06/2026

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4 - संत गुरु कबीरदास जी

सतगुरु संत कबीर, चेतना जग फैलाया।

तम का करके नाश, विमल पद-राह दिखाया।।

लहरताल के नीर, प्रकट अद्भुत छवि छाई।

नीरू-नीमा गेह, परम अनुपम सुख पाई।।

वे रूप रहित उस ब्रह्म के, ज्ञानी साधक सिद्ध हैं।

आडंबर तज करके सभी, जग में हुए प्रसिद्ध हैं।।1


वाणी में थी शक्ति, सत्य की राह दिखाए।

सहज साधना योग, घटित ही ब्रह्म कराए।।

जाति-पाति का भेद, मिटाकर समता लाए।

प्रेम पंथ को साध, अमित सुख जग ने पाए।।

आडम्बर तज करके सभी, पाया श्रेष्ठ विचार को।

त्रास मिटा भव सिंधु का, ज्ञान दिया संसार को।।2


साखी सबद रसाल, ज्ञान की गंगा बहती।

मिटे मोह के जाल, सत्य की बानी कहती।।

निर्गुण रूप अनूप, सत्य का अलख जगाया।

काया के इस कूप, मध्य ही प्रभु को पाया।।

काटी दुविधा जग जीव की, देकर अनुपम ज्ञान को।

जगमग कबीर ने कर गए, मानव के अभिमान को।।3

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)29/06/2026

बुधवार, 10 जून 2026

सायली छंद

 सायली छंद -


सायली छंद काव्य विधा है ।

 यह एक लघु और सुगठित काव्य रूप है, जिसमें केवल 5 पंक्तियाँ और कुल 9 शब्द होते हैं。सायली छंद का मुख्य विधान (संरचना)इस छंद की बुनावट 1-2-3-2-1 के गणितीय क्रम पर आधारित होती है — जो नीचे दी गई तालिका से स्पष्ट है:पंक्तिशब्दों की संख्याउदाहरण (भाव: दर्णण /आईना)

पहली पंक्ति----1शब्द  आईना

दूसरी पंक्ति---2शब्द 

मानो जीवन

तीसरी पंक्ति----3शब्द

झलके अक्स असली

चौथी पंक्ति----2 शब्द

मन जैसे

पाँचवी पंक्ति---1शब्द

सच्चा

*लेखन के प्रमुख नियम* .....

1. शब्द-सीमा: पूरी कविता में ठीक 9 शब्दों का प्रयोग अनिवार्य है।

2. शब्दों का विभाजन 1, 2, 3, 2 और 1 के क्रम में ही होना चाहिए।

3. अर्थपूर्ण भाव: संरचना छोटी होने के बावजूद, कविता पूरी तरह से अर्थपूर्ण और भावपूर्ण होनी चाहिए ( यह महत्वपूर्ण  है)

4. सायली छंद इस विशेषता के साथ लिखे जाते हैं कि उन्हें ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर दोनों तरफ पढ़ने पर एक ही अर्थ निकलता है।

5. पंक्तियों में क्रमबद्धता नहीं होनी चाहिए।

6.  एक ही पंक्तियों में शब्दों का पर्यायवाची शब्द नहीं लेना है।    -----------------------------------------------------------------

  ‌‌सायली छंद- *सागर*

​सागर 

अथाह गहरा 

छिपे राज अनगिनत

अमूल्य धरोहर 

मोती 

​लहरें 

उठतीं गिरतीं

मचातीं शोर निरंतर 

पातीं सिंधु 

किनारा


​खारा 

असीम पानी 

सहेजता धैर्य गंभीर

लाँघता जलधि 

मर्यादा 


​धूप 

तपे तीखी 

वारिधि भाप बने 

नभ छूते

बादल

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)09/06/2026

उलटबांसी

​🌀 उलटबांसी- 1 बूझव बूझव गजानंद कहे रे भाई, शेर ला गइया मार भगाई जी। अम्बर ऊपर पेड़े उगे हे, जड़ मा डारा पाना लगे हे जी। सुक्खा तरिया मा बह...