उल्लाला छंद (13,13)
विषय- *मंदिर*
मन मंदिर पावन हुआ, आए प्रभु जी आज हैं।
दीपक श्रद्धा का जला, सिद्ध हुए सब काज हैं।।
मंदिर की चौखट छुई, पाया परमानंद को।
चरणों में अर्पित किया, जीवन के हर छंद को।।
मंदिर में जो आ गया, मिटते उसके कष्ट हैं।
करुणा सागर आप हैं, पाप सभी अब नष्ट हैं।।
मंदिर की घंटी बजी, गूँजा पावन नाद जी।
भक्तों को वरदान का, मिलता महा प्रसाद जी।।
मंदिर में मूरत सजी, अद्भुत रूप अनूप है।
अंतर का अज्ञान तो, सत्यबोध दुख धूप है।।
मंदिर में महकी हवा, चंदन की खुशबू उड़ी।
सच्ची श्रद्धा से यहाँ, भक्तों की टोली जुड़ी।।
मंदिर की महिमा अमित, गाते सब नर-नार जी।
जो भी आया द्वार पर, पाया उसने प्यार जी।।
मंदिर में दीपक जला, अंधकार सब दूर है।
कृपा तुम्हारी देखकर, मन मेरा भरपूर है।।
मंदिर पावन धाम है, मिलती मन को शांति है।
भजने से भगवान को, मिटती सब ही भ्रांति है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)15/06/2026
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उल्लाला छंद (13,13)
सृजन शब्द- *गाँव*
पावन मेरा गाँव है, निर्मल इसकी रीत है।
सबके मन में बस रही, सच्ची अनुपम प्रीत है॥
हरी-भरी सी भूमि है, सुंदर सुखद समीर है।
शीतल जल से बह रही, पावन नदिया तीर है॥
बरगद की उस छाँव में, सजती है चौपाल भी।
दुख-सुख बाँटें प्यार से, बूढ़े और गुवाल भी॥
माटी की खुशबू यहाँ, महके चारों ओर हैं।
नाच दिखाए झूमकर, वन में सुंदर मोर हैं॥
सच्चा सुख मिलता यहाँ, छोड़ शहर का शोर जी।
खींच पुरानी याद को, लाता गाँव बटोर जी॥
✍🏻इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)17/06/2026
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उल्लाला छंद (13-13)
विषय- आँचल
नमन करूँ पग मातु का, आँचल का रख लाज जी।
संकट सारे दूर हों, सिद्ध हुए सब काज जी।।
बीता बचपन मौज में, पा जननी का साथ जी।
शीतल पावन नेह का, मिला शीश पर हाथ जी।।
दुख की घड़ियाँ भागतीं, मिलता सुख का मोद है।
माँ का आँचल दे रहा, पावन प्यारी गोद है।।
श्रद्धा मन में धार के, आँचल सुमिरन कीजिए।
ममता की इस धार से, मन का घट भर लीजिए।।
संकट में संबल बने, आँचल सुख का धाम है।
सत्यबोध इस छाँव को, सौ-सौ बार प्रणाम है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)20/06/2026

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