पहिचान
गजानंद पहिचान बतावय, गुरु बालक धर बाना जी ।
गाँव सेंदरी जिला मुंगेली, हवय पथरिया थाना जी ।।
लैनदास के बेटा हम तो, धन्य दुकलहिन ओ दाई ।
सतनामी के शान बरोबर, सात हवन हम जी भाई ।।
अमृतदास हे पहला भइया, अमरित जेकर हे बानी ।
शिक्षा के जे जोत जलावय, ज्ञान धरे गुरु जिनगानी ।।
प्रेमदास हे दूजा भइया, प्रेम रंग जिनगी घोरे ।
एक बरोबर सुख दुख मानय, आस कभू खुद नइ टोरे ।।
धरम दास तीसरा बड़े मा, धरम वीर भइया मोरे ।
सिधवा बर बड़ सिधवा ये अउ, कपटी के माथा फोरे ।।
विष्णुदास हे चौथा भइया, बुद्धि ज्ञान बल के ज्ञाता ।।
धीर धरे रख मन मा भारी, बाँध रखे जम्मो नाता ।।
रामदास पाँचवा बड़े मा, भइया मोरे हे खाँटी ।
दुश्मन बैरी के छाती मा, ठोक मड़ावय वो काँटी ।।
भानदास हे छठवाँ भइया, जिनगी जेकर हे सादा ।
दूर रखे लिग़री चारी ले, करे सुमत के जे वादा ।।
गजानन्द मँय अभियंता हँव, छोट दुलरुवा जी भाई ।
अपन कूल के आन बान अउ, गुरु बालक के परछाईं ।।
सुंता के डोरी
बाँध चलव सुंता के डोरी, करम गढ़व जिनगानी के ।
गुरु बालक के कर लौ सुरता, याद करव बलिदानी के ।।
ताने सीना जी हौ कहिगे, सर ना झुकय गुलामी मा ।
मान बढ़ाहू सादा झंडा, झन जी हौ बदनामी मा ।।
औराबांधा अमर समाधी, रद्दा जोहत बइठे हे ।
देखव तो बलिदानी राजा, कइसे अंशज अइठे हे ।।
बोड़ सरा के माटी रोवय, खद्दर गुरु के बाड़ा हे ।
सेंकत रोटी सत्ता लोभी, बनगे युद्ध अखाड़ा हे ।।
तोर मोर के पाठ पढ़त हे, बगरे बिखहर काँटा जी ।
भाई भाई लड़ बइठे अउ, चाबत चबरी चांटा जी ।।
का मतलब हे मोला कहिके, चुप बइठे हौ घर मा जी।
मान गवांवत सतनामी के, फाटत देख अदरमा जीे।।
बेरा नइहे सोये के अब, हाथ म हाथ मिलाना हे ।
जागव जागव अब तो भाई, सुंता फूल खिलाना हे ।।
नारनौल के माटी बंदन
नारनौल के माटी बंदन, चंदन जइसे महके हे ।
बनके सोन चिरइँया जे हा, छत्तीसगढ़ म चहके हे ।।
जिहाँ बिराजे पुरखा हमरो, सादा झन्डा फहरे हे ।
नाम साध सतनामी कहिथे, बन खुश्बू इन कहरे हे ।।
वीरभान के सादा पगड़ी, ताकत बाजू फड़के जी ।
मान बढ़ाइस सतनामी के, गैर फिरंगी लड़के जी ।।
खाटी लाठी सतनामी के, सरहा अउ जोधाई हे ।
याद करव बलिदानी भाई, सतगुरु बने दुहाई हे ।।
माँगे मा तो भीख ह मिलथे, हक तो मिलथे लूटे मा ।
बनके शेर झपकथे गिधवा, साथ अपन के छूटे मा ।।
धर धर आँसू बोहत मोरो, समझव तो मन पीरा ला ।
मार भगावव मिलके भाई, अहम बिराजे कीरा ला ।।
बड़ा भागमानी तँय संगी, जनम धरे कुल सतनामी ।
धन्य करम ये कर ले भाई, झन होवय जी बदनामी ।।
सतनामी सत अनुयायी
तैं सतनामी मैं सतनामी, सतनामी सत अनुयायी ।
जात नहीं कोई सतनामी, सतगुरु जी बात बताई ।।
सत्य अहिंसा प्रेम धरम अउ, मानवता के पहिचानी ।
पर सेवा उपकार भाव हा, जेकर हे सत्य निशानी ।
भेद भाव अउ उँच नीच के, पाटे जे हा जग खाई ।
जात नहीं कोई सतनामी, सतगुरु जी बात बताई ।।1
सुमता समता मन मा राखे, रखे साथ भाईचारा ।
वृक्ष बने सतनाम पंथ हा, सबो धर्म येकर डारा ।।
मनखे मनखे एक बरोबर, जग हित भाव समाई ।
जात नहीं कोई सतनामी, सतगुरु जी बात बताई ।।2
ढोंग नहीं पाखंड जिहाँ जी, जेमा नहीं रूढ़िवादी ।
स्वतंत्रता के विचार बाँटे , जीये के दे आजादी ।।
आदि पुरुष सतनाम पिता जी, अइसे सत ज्ञान लखाई ।
जात नहीं कोई सतनामी, सतगुरु जी बात बताई ।।3
मोर कलम
सतनामी के मान बढ़ाये, छंद कलम हँव मँय थामे ।
मोर कलम से शेर सहीं जी, सतनामी बिजहा जामे ।।
अपन खून मा भरे हवँव मँय, गुरु बालक के बलिदानी ।
असल बाप के बेटा मँय हा, तुँहर खून हे का पानी ।।
बात गलत हे मोर कहूँ ता, ठोक बता खाटी सीना ।
कुछ समाज बर कर बतला दे, तब जानँव असली जीना ।।
परबुधिया के फाँस फँसे हव, माथा मा लाली टीका ।
मोर खून मा चिनगारी बस, तुँहर खून हे का फीका ।।
जात छुपाये फिरथव काबर, गोत्र रखे आनी बानी।
अपन छुपा पहिचान फिरे हव, धिक्कार तुँहर जिनगानी।।
फोकट के पाये रे बाबू, मार पालथी तँय खाये।
मान भुलाये खुद के पुरखा, गुन दूसर के तँय गाये।।
गजानंद के बात सुनव सब, भले बुरा कड़ुवा लागे।
मोर लेखनी तभे सफल जी, जब समाज निंदिया जागे।।
मान कहाँ पाबे रे भाई (गीत)
सुख जिनगी के रद्दा छोड़े, पकड़े छूत बिमारी ला ।।
मान कहाँ पाबे रे भाई, छोड़े अपन दुवारी ला ।
अपन मया ला बैरी जाने, पर ला मितवा तँय जाने ।
चार बछर के जिनगी भाई, गोठ सियानी नइ माने ।।
नीति धरम के बात बतइया, खोये गा सँगवारी ला ।
मान कहाँ पाबे रे भाई, छोड़े अपन दुवारी ला ।।1
फूल बरोबर महकत अँगना, बोयें काबर तँय काँटा ।
मोर कल्पना तोला भाई, काबर लगगे रे चांटा ।।
आ सुमता के पेड़ लगाबो, महकाबो फुलवारी ला ।
मान कहाँ पाबे रे भाई, छोड़े अपन दुवारी ला ।।2
जग निंदा झन होवय भाई, दाग मया मा झन लागे ।
अपन पराया कब होथे गा, सुख दुख मा रहिथे आगे ।।
सुबह भुले तँय शाम लहुट जा, सुन समाज चित्कारी ला ।
मान कहाँ पाबे रे भाई, छोड़े अपन दुवारी ला ।।3
अठारह दिसंबर आगे (गीत)
मांदर के थाप सुनावत हे, अठारह दिसंबर आगे ।
गाँव गाँव मा होवय पंथी, सत के झंडा लहरागे ।।
झोंक नेवता तँय आबे गुरु, आसन तोर बिराजे हे ।
गज मोतीयन चौक पुराये, कंचन कलश ह साजे हे ।।
सादा सादा चारों कोती हे, ये बड़ा सुहावन लागे ।
मांदर के थाप सुनावत हे, अठारह दिसंबर आगे ।।1
गली खोर गूँजत हे बाबा, तोर नाम के जयकारा ।
आस लगाये बइठे हन गुरु, बन जाबे तहीं सहारा ।।
जोत जलाये सत के बाबा, अँधियारी दूर भगागे ।
मांदर के थाप सुनावत हे, अठारह दिसंबर आगे ।।2
सादा चिनहा सतनामी के, जोड़ा तँय खाम गढ़ाये ।
मानवता के बात बताके, सत के तँय पाठ पढ़ाये ।।
निरमल गंगा ज्ञान बहाये, पापी के पाप धुलागे ।
मांदर के थाप सुनावत हे, अठारह दिसंबर आगे ।।3
भारत भुइँया के रतन बेटा श्रद्धेय लक्ष्मण मस्तुरिहा जी ला 7 जून पुण्यतिथि मा शत शत नमन 🙏
कुकुभ छंद गीत- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
भारत माँ के राज दुलरुवा, तँय जुग जुग नाम कमाबे ।
लक्ष्मन मस्तुरिहा गा भइया, तँय भुइँया पूत कहाबे ।।
लोक कला के अमर पुरोधा, प्रेम भरे छइँहा माटी ।
छत्तीसगढ़ स्वाभिमान खातिर, तहीं चलाये परिपाटी ।।
भक्ति भजन हरि ज्ञान लखाये, आ निरगुन भाव जगाबे ।
भारत माँ के राज दुलरुवा, तँय जुग जुग नाम कमाबे ।।1
गाड़ी वाला रद्दा जोहय, मुरझाये गोंदा चौंरा ।
भुकुर भुकुर ये जिंवरा लागे, अउ उठे नहीं मुँह कौंरा ।।
रुनझुन खेती खार सजाके, भुइँया के मान बढ़ाबे ।।
भारत माँ के राज दुलरुवा, तँय जुग जुग नाम कमाबे ।।2
क्रांति दूत तँय हक के खातिर, शांति दूत भाईचारा ।
लाये नवा बिहान इहाँ तँय, चमकाये भाग सितारा ।।
दया मया के सोर धरे गा, तँय लौट चले जग आबे ।
भारत माँ के राज दुलरुवा, तँय जुग जुग नाम कमाबे ।।3
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
कुकुभ छन्द- *दिन आगे खेति किसानी* चेत लगा के कर लौ जोरा, दिन आगे खेति किसानी। रदबिद-रदबिद पानी गिरही, बन किसान के जिनगानी।। लगही आसाढ़ महीना अब, चतवारव खेत बियारा ला। काँटा खूंटी बन बाखर अउ, काँदी दूबी डारा ला।। खातू माटी रखौ सकेले, सँग बिजहा धान बुवानी।। चेत लगा के कर लौ जोरा, दिन आगे खेति किसानी।। छेना लकड़ी ला कुरिया मा, रखलौ जी बने सकेले। रखौ बना के झीपारी ला, झन पानी परछी पेले।। कालकूत झन होवय भाई, छा लौ अब परवा छानी। चेत लगा के कर लौ जोरा, दिन आगे खेति किसानी।। नाँगर बइला वाले सुन लौ, अउ सुन लौ ट्रेक्टर वाले। खेती के औजार सजा लौ, झन बाद म दुःख म घाले।। जाँगर ला भी ठाँगुर राखव, सुन गजानंद के बानी। चेत लगा के कर लौ जोरा, दिन आगे खेति किसानी।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/06/2025
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कुकुभ छंद- *आदिवासी* पिछड़े जाति आदिवासी हें, भारत के मूल निवासी। तेंदू चार चिरौंजी खाथें, खाथें इन बोरे बासी।। कोल भील अउ गोंड सहरिया, हो बिरहोर भिलाला। हल्बा मुण्डा खड़िया बोडो, नायक भूमिज मतवाला।। हे जनजाति उरांव पारधी, जारी हे जाति तलाशी। पिछड़े जाति आदिवासी हें, भारत के मूल निवासी।। प्रकृति उपासक कहिलाथें अउ, जल जंगल के रखवाला। श्रम के बने पुजारी फिरथें, रहिथें इन भोला-भाला।। तरसें सुख सुविधा के खातिर, कष्ट सहें हें चौमासी। पिछड़े जाति आदिवासी हें, भारत के मूल निवासी।। मुड़ी सजायें पागा कलगी, धोती कुरता पहिनावा। धरथें तीर कमान हाथ मा, नइ जानें कपट छलावा।। सुवा ददरिया करमा गा के, कर लेथें दूर उदासी। पिछड़े जाति आदिवासी हें, भारत के मूल निवासी।। पाँच तत्व के करथें पूजा, जीथें सुग्घर जिनगानी। जिनगी के आधार धरा हे, आग हवा नभ अउ पानी।। हृदय समाये बुढ़ादेव ला, घट-घट मा मथुरा कासी। पिछड़े जाति आदिवासी हें, भारत के मूल निवासी। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/09/2025
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कुकुभ छंद- *मृदा अपरदन* मृदा अपरदन ला रोके बर, चल संगी पेड़ लगाबो। रोकव-रोकव पेड़ कटाई, नइतो सब बड़ पछताबो।। मृदा अपरदन भूमि क्षरण के, ये एक प्रकार गिनाथे। येखर एक हवय बस कारण, जब जंगल पेड़ कटाथे।। पेड़ रखे जी बाँध मृदा ला, अउ आगे लाभ बताबो। मृदा अपरदन ला रोके बर, चल संगी पेड़ लगाबो।।1 परत घटे हे बाढ़ हवा ले, बंजर खेती हो जाथे। माटी के उर्वरा शक्ति कम, येखर सेती हो जाथे।। मृदा बनाबो कइसे सोचव, अउ मृदा कहाँ ले पाबो। मृदा अपरदन ला रोके बर, चल संगी पेड़ लगाबो।।2 माटी ले जिनगी सिरजे हे, मिट्टी ले ही खुशहाली। बता बिना माटी के कइसे, पाबो हम सब हरियाली। माटी जब मिट जाही जग ले, संग येखरे मिट जाबो। मृदा अपरदन ला रोके बर, चल संगी पेड़ लगाबो।।3 ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/09/2025

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