सोमवार, 29 जून 2026

छप्पय छंद (हिंदी)

 1- सवेरा

नष्ट हुआ तम-जाल, लाल नभ में छवि छाई।

शशि की मिटी प्रकाश, किरण रवि ने बिखराई॥

जागे खग-कलकंठ, कूंज कानन में गूंजी।

विकसित हुए सरोज, खुली वैभव की पूंजी॥

पवन मंद शीतल बहे, सुरभित अब चहुँओर है।

आलस तज अब जागिये, उदित हुआ सुख भोर है॥


मिटा निशा का कष्ट, नया दिन सम्मुख आया।

पुलकित हुआ समाज, मुदित जग जन की काया॥

कृषक चले निज खेत, शंख मंदिरों में बाजे।

श्रम का पावन मंत्र, वीर पुरुषों पर साजे॥

कर्म-मार्ग पर पग धरो, तजो मोह की यामिनी।

चमक उठेगा भाग्य अब, जैसे नभ में दामिनी॥


त्याग निशा का संग, विहग नभ मंगल गाते।

भक्त हृदय आनंद, ईश-सुमिरन में पाते॥

दूर प्रकृति के कष्ट, ओस-कण मणिवत चमकें।

मानो देव-विमान, स्वर्ग से भू पर दमकें॥

फैला चारों ओर अब, सत्य-ज्ञान का शुभ विमल।

वंदन कर इस प्रात को, मिटें शोक का पल-विपल॥

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

 बिलासपुर (छत्तीसगढ़)22/06/2026

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2- *आँगन*

तुलसी का है धाम, जहाँ पर दादी गातीं।

चिड़ियाँ करतीं शोर, भोर में हमें जगातीं।।

खेल-कूद दिन रात, धूल में तन सन जाता।

माटी का वह गंध, आज भी मन को भाता।।

बचपन का पावन सदन, याद बहुत अब आ रहा।

आँगन का शुभ दृश्य वह, जीवन को महका रहा।।


सजती सुंदर आज, चौक पुरवाती माता।

रंगों की बौछार, देख हर मन हर्षाता।।

सजते तोरण द्वार, दीप की आभा न्यारी।

मंगल गातीं नार, रीत लगती है प्यारी।।

होती पावन साधना, मिटती मन की भावना।

सुख की सुंदर अर्चना, पूरी होती कामना।।


बरसे सावन बूँद, नाचता मयूर मनहर।

कागज़ की वह नाव, तैरती बहते जल पर।।

धूप-छाँव का खेल, सुघर जाड़ों में भाता।

नीम झरे चुपचाप, ओस का मोती लाता।।

ऋतु का रूप सुहावना, हरती मन की तापना।

धूप अनूप लुभावना, सुख की करती साधना।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)26/06/2026

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3- *किसान*

तपता दिनकर तेज, गगन से बरसे शोला।

झुलस रहा भू भाग, पवन का चलता झोला।।

धीर धरम का वीर, खेत में हल को बाहे।

श्रम का जो शुचि नीर, बहाकर फसलें चाहे।।

वंदन उस भू पूत को, नमन कठिन तप साधना।

स्वेद बहाकर कर रहा, सबके हित की कामना।।


गरजे घन घनघोर, गगन में बादल छाए।

रिमझिम बरसे मेह, धरा पर खुशियाँ लाए।।

कृषक साथ ले बैल, खेत की ओर पधारे।

उगा अन्न के बीज, आस के दीप सँवारे।।

जगा रहा शुभ भावना, नाच रहा मन झूमता।

हर्षित भू का वीर वह, मेघ-चरन है चूमता।।


पवन चले झकझोर, शूल सी ठंड सताए।

चादर ओढ़े ओस, धुंध नभ में फैलाए।।

काँपे थर-थर गात, कृषक रखवार कहाए।

सहता तीखी शीत, खेत की ओर सिधाए।।

​पोषण करता विश्व का, शीश झुका वंदन करें।

ऋणी हमेशा हम रहें, भाव यही उर में भरें।।

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)27/06/2026

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4 - संत गुरु कबीरदास जी

सतगुरु संत कबीर, चेतना जग फैलाया।

तम का करके नाश, विमल पद-राह दिखाया।।

लहरताल के नीर, प्रकट अद्भुत छवि छाई।

नीरू-नीमा गेह, परम अनुपम सुख पाई।।

वे रूप रहित उस ब्रह्म के, ज्ञानी साधक सिद्ध हैं।

आडंबर तज करके सभी, जग में हुए प्रसिद्ध हैं।।1


वाणी में थी शक्ति, सत्य की राह दिखाए।

सहज साधना योग, घटित ही ब्रह्म कराए।।

जाति-पाति का भेद, मिटाकर समता लाए।

प्रेम पंथ को साध, अमित सुख जग ने पाए।।

आडम्बर तज करके सभी, पाया श्रेष्ठ विचार को।

त्रास मिटा भव सिंधु का, ज्ञान दिया संसार को।।2


साखी सबद रसाल, ज्ञान की गंगा बहती।

मिटे मोह के जाल, सत्य की बानी कहती।।

निर्गुण रूप अनूप, सत्य का अलख जगाया।

काया के इस कूप, मध्य ही प्रभु को पाया।।

काटी दुविधा जग जीव की, देकर अनुपम ज्ञान को।

जगमग कबीर ने कर गए, मानव के अभिमान को।।3

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)29/06/2026

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