56. दोहा छंद- सतगुरु जी का नाम
सत्य अलौकिक नाम है, सतगुरु जी का नाम।
जाप करें सतनाम का, सुबह शाम अविराम।।
सत्य अहिंसा प्रेम का, पढ़ लें हम सब पाठ।
मन में मानवता बिना, यह जीवन है काठ।।
दिए सदा बंधुत्व का, सतगुरु ने पैगाम।
सत्य अलौकिक नाम है, सतगुरु जी का नाम।।1
जाँचो परखो फिर करो, तथ्यों पर विश्वास।
हिये तराजू तौलिये, कहना घासी दास।।
कर्म करें जब नेक तब, नेक मिले परिणाम।
सत्य अलौकिक नाम है, सतगुरु जी का नाम।।2
सत्य दीप सतनाम का, जोत जले मन द्वार।
घर- घर घट संसार में, हो सतनाम प्रचार।।
गजानंद सतगुरु कृपा, करे सदा सतकाम।
सत्य अलौकिक नाम है, सतगुरु जी का नाम।।3
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/10/2023
55. दोहा गीत- मुंशी_प्रेमचंद जी (जन्म जयंती विशेष)
प्रेमचंद साहित्य का, दिये अमर उद्गार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।
ईदगाह बचपन पढ़ा, ठण्ड पूस की रात।
बूढ़ी काकी कह उठी, दर्द बुढ़ापा बात।।
पीड़ा देख समाज की, बहा कलम की धार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।1
पाठ सुभागी में पढ़ा, बेटी है अनमोल।
कफ़न तरसते लाश भी, मानवता की पोल।।
नैतिकता की बात ही, प्रेम चंद का सार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।2
एक झलक गोदान है, गाँव शहर परिवेश।
सौतन दिखलाती जहाँ, नारी रूप विशेष।।
हीरा मोती बैल का, झूरी के प्रति प्यार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।3
परमात्मा का वास है, पंच करे सच न्याय।
खाला जुम्मन शेख को, अलगू न्याय सुनाय।।
परमेश्वर है पंच मुख, गजानंद स्वीकार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।5
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/07/22
54. दोहा छंद गीत- *फल*
फल की इच्छा छोड़कर, रखें कर्म की चाह।
सुखमय जीवन की तभी, सृजित हुए हैं राह।।
बाधाओं को लाँघना, कर्मपुरुष पहचान।
परहित सेवा भाव का, रखते हैं नित ध्यान।।
स्वयं सभी कर्तव्य का, कर चलना निर्वाह।
फल की इच्छा छोड़कर, रखें कर्म की चाह।।1
भाग्य राशिफल पर करें, लोग जहाँ विश्वास।
निश्चित उस इंसान का, भूत भविष्य विनाश।।
नेक कर्म का फल सुफल, मिलता सदा अथाह।
फल की इच्छा छोड़कर, रखें कर्म की चाह।।2
रहता है जो वृक्ष नम, देता है फल छाँव।
दुर्जन, पेड़ बबूल का, देता तन मन घांव।।
जग जन को करते रहो, गजानंद आगाह।
फल की इच्छा छोड़कर, रखें कर्म की चाह।।3
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/09/2023
53. मित्र
कहते वेद कुरान भी, मित्र रूप भगवान।
बिना मित्र के जिंदगी, लगते शून्य समान।।
सुख में दुख में मित्र ही, अपना बन दे साथ।
बनकर तारणहार वह, सदा बढाते हाथ।।
देते नेक सलाह भी, बुरा भला का ज्ञान।
कहते वेद कुरान भी, मित्र रूप भगवान।।
आत्म मिलन हो मित्र में, विश्वासों का डोर।
विपदा में तत्पर खड़े, रहे रात या भोर।।
सोच समझकर कीजिये, संगत मित्र सुजान।
कहते वेद कुरान भी, मित्र रूप भगवान।।
मन की बातें जानते, दिल का हर इक राज।
कृष्ण सुदामा की तरह, कहाँ मित्र है आज।।
गजानंद करते फिरे, सदा मित्र गुणगान।
कहते वेद कुरान भी, मित्र रूप भगवान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/08 2023
52. जीवन पथ पर बढ़ चलो
जीवन पथ पर बढ़ चलो, कर्म बना अभियान।
चढ़ो सफ़लता का शिखर, पाकर गुरु से ज्ञान।।
शब्द समय अनमोल है, करना बात विचार।
वापस कभी न लौटते, बहते जल की धार।
सत्य अहिंसा थामकर, बनना मनुज महान।
जीवन पथ पर बढ़ चलो, कर्म बना अभियान।।
मैं से मन में है अहम, मैं से सर्व विनाश।
मैं से जिसने लड़ सका, मैं भी उसका दास।।
रखना सर्वहिताय का, भाव सहज इंसान।
जीवन पथ पर बढ़ चलो, कर्म बना अभियान।।
रखना बचा जमीर को, अच्छाई चल राह।
मानवता की हो पहल, दीन दुखी सुख चाह।।
गजानंद करते रहो, सदा सत्य गुणगान।
जीवन पथ पर बढ़ चलो, कर्म बना अभियान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/07/2023
51 मन के अंदर झाँकिये
मन के अंदर झाँकिये, सतगुरु जी का वास।
मन के मनोविकार को, जो करते हैं नाश।।
श्वेत सिंहासन है सजा, मंगल चौक पुराय।
पान सुपारी नारियल, कंचन थाल सजाय।।
भक्त करे भव आरती, भर दो ज्ञान प्रकाश।
मन के अंदर झाँकिये, सतगुरु जी का वास।।
चंदन की सत सादगी, सजे सुशोभित माथ।
कर्म खड़ाऊ पाँव में, दिव्य ज्ञान गुरु हाथ।।
कंठी माला उर सजे, कंचन बदन उजास।
मन के अंदर झाँकिये, सतगुरु जी का वास।।
दर-दर भटका खा रहा, पाया ना मन चैन।
गुरु दर्शन की आस में, मौन पड़ी द्वय नैन।।
मन मंदिर में है बसा, सतगुरु घासीदास।
मन के अंदर झाँकिये, सतगुरु जी का वास।।
मन से मन को जोड़िये, तज माया अभिमान।
सहज सरल जीवन करो, थाम सत्य गुरु ज्ञान।।
गजानंद गुरु घट बसा, बाहर त्याग तलाश।
मन के अंदर झाँकिये, सतगुरु जी का वास।।
इंजी. गज़ानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)21/09/22
50. दान
किसे जरूरत दान की, करना जरा विचार।
देव धर्म के नाम पर, पनप रहा व्यापार।।
देना दान सुपात्र को, जो हो देह अपंग।
अंधा बहरा लंगड़ा, जीवन जीते तंग।।
सही दान का मान कर, व्यर्थ दान प्रतिकार।
किसे जरूरत दान की, करना जरा विचार।।
मंदिर मस्जिद में चढ़े, देखो छप्पन भोग।
भूखे प्यासे द्वार पर, भीख माँगते लोग।।
कहा कभी भगवान क्या, दान चढ़ा हरि द्वार।
किसे जरूरत दान की, करना जरा विचार।।
मानवता का पाठ पढ़, अंधभक्ति को त्याग।
देना दीन गरीब को, दान प्रेम अनुराग।।
गजानंद जग श्रेष्ठ है, रक्त दान उपहार।
किसे जरूरत दान की, करना जरा विचार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
49. दोहा गीत- हिंदी
अनेकता में एकता, हिंदी की पहचान।
मुकुट हिंद हिंदी सजा, देते शोभा मान।।
माँ की ममता प्यार यह, यही पिता सुख छाँव।
हिंदी देश विदेश में, बसा प्राण बन गाँव।।
हिंदी जीवन सीख दे, बनकर ग्रंथ कुरान।।
अनेकता में एकता, हिंदी की पहचान।।
पंत निराला प्रेम यह, कवि दिनकर की ढाल।
ऊँचा जनगण गीत ने, किये हिन्द का भाल।।
मीरा का प्रेमप्रलाप यह, भक्ति भाव रसखान।
अनेकता में एकता, हिंदी की पहचान।।
हिंदी की रक्षा किये, तुलसी सूर रहीम।
मुक्तिबोध की युक्ति से, आओ करें उदीम।।
गजानंद जग जन करे, हिंदी का गुणगान।
अनेकता में एकता, हिंदी की पहचान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/09/22
48. दोहा गीत- याचना
याचक बन कर याचना, सुमिरन कर सतनाम।
सतगुरु घासीदास जी, सिद्ध करे सब काम।।
दुविधा बाधा सब मिटे, कटे मोह भ्रम फाँस।
दुखहर्ता गुरु नाम को, बसा रखो हर साँस।।
जिनके चरणों में सहज, मिलता है सुख धाम।
याचक बन कर याचना, सुमिरन कर सतनाम।।
प्रेम दया अनुराग भर, मन का मिटा विकार।
जीव चराचर के लिए, करुणा नैन निहार।।
विचलित कभी न हो कदम, सत्य राह को थाम।
याचक बन कर याचना, सुमिरन कर सतनाम।।
मर्यादा का पाठ पढ़, अमल करो सत राह।
गुरु की वाणी में भरा, दरिया ज्ञान अथाह।।
गजानंद रुकना नहीं, बढ़ते जा अविराम।
याचक बन कर याचना, सुमिरन कर सतनाम।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/09/22
47. दोहा गीत- मनका
मन का मधुर मिलाप कर, मन का मनका फेर।
ध्यान लगा गुरु नाम का, करो नहीं अब देर।।
जीवन यह अनमोल है, खोना न कभी व्यर्थ।
कर्म धर्म व्यवहार का, मनुज समझ लो अर्थ।।
गुरु के शरण वियोग से, लेते दुख मन घेर।
मन का मधुर मिलाप कर, मन का मनका फेर।।
रखें पिरोयें एकता, मनका दे संदेश।
प्रेम दया बंधुत्व से, बदले जग परिवेश।।
बाँटे चारा नेह का, कागा बैठ मुँडेर।
मन का मधुर मिलाप कर, मन का मनका फेर।।
मन से मन भ्रम टालिये, मानव-मानव एक।
जाति धर्म को त्याग कर, कर्म करें हम नेक।।
गजानंद तब देश में, आये नया सबेर।
मन का मधुर मिलाप कर, मन का मनका फेर।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
46. दोहा गीत- किसान
भरते जग का पेट जो, माटी पुत्र किसान।
जिनके कर्मों से बना, भारत देश महान।।
ठंडी जाड़ा धूप की, किये नहीं परवाह।
खेतों पर ही रात दिन, जिनकी रहे निगाह।।
साथी जिनके बैल हल, श्रम सेवा पहचान।
भरते जग का पेट जो, माटी पुत्र किसान।।
कीमत पाने मेहनत, नैन बहाये नीर।
मौन प्रशासन आप हम, कौन हरे दुख पीर।।
कभी मारती बाढ़ तो, अल्पवृष्टि ले जान।।
भरते जग का पेट जो, माटी पुत्र किसान।।
मँहगू दास किसान घर, जन्मा घासीदास।
जन सेवा श्रम साधकर, बना अटल विश्वास।।
सत बिजहा जग बो दिये, मुट्ठी भर ले धान।
भरते जग का पेट जो, माटी पुत्र किसान।।
धान कटोरा है बना, छत्तीसगढ़ यह राज।
जाता श्रेय किसान को, हम सबको है नाज।।
गजानंद करता नमन, गा किसान गुणगान।
भरते जग का पेट जो, माटी पुत्र किसान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
45. दोहा गीत- पूर्वज
पूर्वज से हमको मिला, रीति नीति संस्कार।
जीवन का आधार नव, जग परहित उपकार।।
पर पूर्वज के नाम पर, बढ़े ढोंग ना जाप।
सेवा आदर कीजिये, जीते जी माँ बाप।।
तभी मनाना ना पड़े, पितर मोक्ष त्यौहार।
पूर्वज से हमको मिला, रीति नीति संस्कार।।
कागा को पूर्वज बना, आज पूजते लोग।
अंधभक्ति से बढ़ रहा, रूढ़िवाद का रोग।।
लूट झूठ का इसलिए, पनप रहा व्यापार।
पूर्वज से हमको मिला, रीति नीति संस्कार।।
तरस गये माँ बाप सुख, पाने तन लंगोट।
जीते जी देते रहे, बात-बात पर चोट।।
गए मृत्यु उपरांत ले, हाड़ा गंगा पार।
पूर्वज से हमको मिला, रीति नीति संस्कार।।
गढ़ने सभ्य समाज हम, चलो बढायें हाथ।
गजानंद कहता सदा, देवें सच का साथ।।
सतगुरु घासीदास ने, किया ढोंग प्रतिकार।
पूर्वज से हमको मिला, रीति नीति संस्कार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
44. दोहा गीत- समय
समय बड़ा बलवान है, रखना इसका ध्यान।
समय कराता है यहाँ, भला बुरा पहचान।।
समय चक्र के फेर में, राजा बनते रंक।
अभिमानी इंसान को, मारे दुख का डंक।।
समय गये बहुरे नहीं, जैसे तीर कमान।
समय बड़ा बलवान है, रखना इसका ध्यान।।
समय साथ जिसने चला, समय उसी का दास।
कद्र नहीं जिसने किया, सब कुछ हुआ विनाश।।
समय सिखाता है सबक, करते जो अभिमान।
समय बड़ा बलवान है, रखना इसका ध्यान।।
समय-समय की बात है, समय-समय का फेर।
आज सुहानी रात तो, कल है दुख का ढेर।।
गजानंद कहता समय, मैं हूँ काल समान।
समय बड़ा बलवान है, रखना इसका ध्यान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/09/22
43. दोहा गीत- बदलाव
गढ़ने नेक समाज अब, लाना है बदलाव।
मानव से मानव जुड़े, बढ़े नहीं अलगाव।।
रूढ़िवाद की आग से, घिरा हुआ संसार।
धूँ-धूँ करके जल रहा, मानव घर परिवार।।
ज़ख्म ज़हन को दे रहा, अंधभक्ति का घांव।
गढ़ने नेक समाज अब, लाना है बदलाव।।
लूट ढोंग पांखण्ड का, बिछा हुआ है जाल।
तथाकथित में हैं फँसे, लोग झूठ भ्रम पाल।।
मन मस्तिष्क पतन किया, मानव स्वयं स्वभाव।
गढ़ने नेक समाज अब, लाना है बदलाव।।
कैसे हो बदलाव जग, करना मनन विचार।
पहले बदलें आप हम, फिर बदले संसार।।
गजानंद कहता फिरे, रखना प्रेम जुड़ाव।
गढ़ने नेक समाज अब, लाना है बदलाव।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/09/22
42. दोहा गीत- जीवन का परिणाम
जीवन का परिणाम हो, आत्म-मूल्य सद्ज्ञान।
शांति प्राप्ति प्रभु साधना, बनना कर्म प्रधान।।
हिया तराजू तौलिये, शब्द-शब्द अनमोल।
करें प्रेम की बात हम, वाणी मधुरस घोल।।
पाँव बढ़े सत राह में, हाथ उठे यश दान।
जीवन का परिणाम हो, आत्म-मूल्य सद्ज्ञान।।
जग जन का कल्याण कर, दीन दुखी उपकार।
बड़े बुजर्गों से करें, सहज सरल व्यवहार।।
जरा सोंचिये कौन मैं, मेरा क्या पहचान।
जीवन का परिणाम हो, आत्म-मूल्य सद्ज्ञान।।
आये खाली हाथ हैं, जाना खाली हाथ।
रह जायेगा सब धरा, चले कर्म बस साथ।।
जीना अपनी जिंदगी, बन सच्चा इंसान।
जीवन का परिणाम हो, आत्म-मूल्य सद्ज्ञान।।
पर सेवा उपकार कर, दूर करो जग पीर।
मानवता रखना कहे, घासी संत कबीर।।
माया मोह शरीर का, करना नहीं गुमान।
जीवन का परिणाम हो, आत्म-मूल्य सद्ज्ञान।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/09/22
41. दोहा गीत- शिक्षक
शिक्षक हैं माता पिता, शिक्षक है परिवार।
शिक्षक मित्र समाज हैं, देते हैं संस्कार।।
मिले कहीं से ज्ञान जब, करना ग्रहण सहर्ष।
शिक्षक से शिक्षा मिले, मिले परम उत्कर्ष।।
शिक्षक गुरु गोविंद हैं, बात करो स्वीकार।
शिक्षक हैं माता पिता, शिक्षक है परिवार।।
जीवन शिक्षा पाठ है, गुणा भाग विज्ञान।
सुख दुख का है पाहड़ा, जीवन गणित समान।।
शिक्षक सीढ़ी है प्रथम, चढ़ मंजिल कर पार।
शिक्षक हैं माता पिता, शिक्षक हैं परिवार।।
सागर से गहरा रहे, जिनके मन की भाव।
खड़े रहे पतवार बन, शिक्षक है वह नाव।।
गजानंद जीवन करे, शिक्षक पग बलिहार।
शिक्षक हैं माता पिता, शिक्षक हैं परिवार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/09/22
40. दोहा गीत- जागो मूलनिवासियों
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।
गजानन्द आगे बढ़ो, हासिल कर लो जीत।।
भीम अकेले ही लड़ा, छुआछूत से जंग।
भूल गए उपकार सब, सोये नींद मतंग।।
प्रताड़ना का दंश क्यों, होता नहीं प्रतीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
तथाकथित को पूजते, पढ़े लिखे इंसान।
शिक्षा ही सब देव है, कहना भीम महान।।
सच्चाई को साथ रख, जीवन करें व्यतीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
मान नहीं जिस द्वार पर, नहीं टेकना माथ।
हक शिक्षा पाने यहाँ, सदा बढ़ाना हाथ।।
तरसे दाने कौंर को, कर लो याद अतीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
जकड़े हैं हम जब तलक, तथाकथित के वाद।
सच कहता हूँ तब तलक, होंगें हम बर्बाद।।
कर्मकांड पांखण्ड का, त्याग चलो अब रीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
पच्चासी पर पड़ रहा, भारी क्यों कुछ लोग।
हम तो बने मरीज हैं, थाम धर्म का रोग।
झूठ ढोंग भ्रम बात से, होते क्यों भयभीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
बनकर मूक बधिर सदा, सहते हैं पर पीर।
जुल्म सहन कर आँख से, झरते झर-झर नीर।।
पैर कुल्हाड़ी मारकर, गाते हो दुख गीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
क्या मतलब के डोर में, बँधे हुए हैं आज।
इसीलिए तो गिर रहा, नित दिन हम पर गाज।।
बँधो एकता सूत्र में, जाये समय न बीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
पिछड़े दलित समाज सब, क्यों बैठे हैं मौन।
छीन रहा सुख कौंर को, सोंचों वे है कौन।।
पाँव बढ़ा खुद के लिए, कौन करेगा हीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
धर्म ढोंग पाखंड का, फैलाकर भ्रम जाल।
हमें लूटकर लोग कुछ, बनते मालामाल।।
स्वार्थ साधने को खड़ा, जिसको समझे मीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
समझे ना सच बात को, गोबर भरा दिमाग।
धधक रहा है हर तरफ, बर्बादी की आग।।
स्वाभिमान रखना बचा, करना बात ग्रहीत।
जागो मूलनिवासियों, समय हुआ विपरीत।।
24/04, 4:36 PM] Er. G.N. Patre:
39. दोहा गीत- कलम
कलम इबादत को लिखे, लिखे नया इतिहास।
युग परिवर्तन भी किया, देख जगत संत्रास।।
कलम शस्त्र तलवार सा, करे मौन यह वार।
तख्त पलट कर दे यही, बन विपक्ष किरदार।।
लिख करके चमचागिरी, बनें नहीं उपहास।
कलम इबादत को लिखे, लिखे नया इतिहास।।
संविधान यह भीम का, गौतम बुद्ध कलाम।
बीजक कबीरदास का, गुरु घासी पैगाम।।
गुरु वाणी यह संत ऋषि, गुरु नानक रविदास।
कलम इबादत को लिखे, लिखे नया इतिहास।।
पर सेवा उपकार यह, गुरुओं का उपदेश।
लिखता है सत धर्म को, मिटा झूठ भ्रम द्वेष।।
कलम कहे मैं का कभी, बनो नहीं तुम दास।
कलम इबादत को लिखे, लिखे नया इतिहास।।
आशा यह उम्मीद है, कलमकार का मान।
शिक्षा का नव दीप यह, सभ्य मनुज पहिचान।।
कलम करे मन से सदा, अहंकार का नाश।
कलम इबादत को लिखे, लिखे नया इतिहास।।
लिखती मन की भावना, जग देखे अनुरूप।
मानवता की छाँव बन, टाले दुख का धूप।।
मिटे नहीं इंसानियत, कलम बने विश्वास।
कलम इबादत को लिखे, लिखे नया इतिहास।।
तारा यह आकाश का, सागर का यह सीप।
मन में भरे प्रकाश यह, बन भावों का दीप।।
मानव जीवन धन्य कर, करता कलम उजास।
कलम इबादत को लिखे, लिखे नया इतिहास।।
गजानंद थामें कलम, लड़े बुराई जंग।
त्याग ढोंग पाखण्ड को, जीते अपने ढंग।।
अस्त्र शस्त्र सब कुछ कलम, रखना हरदम पास।
कलम इबादत को लिखे, लिखे नया इतिहास।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़) 8889747888
38. दोहा गीत- चरामेति
गायें मिल हम आप सब, जन गण मन का गान।
चरामेति के भाव से, होगा देश महान।।
सबको सम अधिकार हो, संविधान का मान।
करें नहीं चमचागिरी, रखें बात यह ध्यान।।
रोजगार सबको मिले, रोटी वस्त्र मकान।
चरामेति के भाव से, होगा देश महान।।
सृजनहार जग का कहें, श्रमजीवी मजदूर।
कर्म भाग्य के सुख से, रहे कभी ना दूर।।
समझे श्रम आराध्य जो, श्रम पूजा वरदान।
चरामेति के भाव से, होगा देश महान।।
ऊँच नीच खाई पटे, होवे द्वेष विनाश।
ज्ञान कला की हो कदर, कटे कपट कटु फाँस।
एकलव्य बनकर खड़ें, देने को गुरु दान।
चरामेति के भाव से, होगा देश महान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/08/22
37. दोहा गीत- संस्कृति
अपने भारत देश की, संस्कृति है पहचान।
आदर सद्व्यवहार है, जग में श्रेष्ठ महान।।
रहन सहन आचार नम, उत्तम रीति रिवाज।
गाँव शहर मिलते जहाँ, शिक्षित सभ्य समाज।।
झरना नदी पहाड़ है, हरा भरा खलिहान।
अपने भारत देश की, संस्कृति है पहचान।।
बड़े बुजर्गों का जहाँ, मिले नेह आधार।
मेहमान का देव सम, होता है सत्कार।।
गुरु का दर्जा ऊँच है, मातु पिता भगवान।
अपने भारत देश की, संस्कृति है पहचान।।
भाषा बोली भिन्न है, है विचार पर एक।
रहते हैं मिल साथ सब, जाति-पाति भ्रम फेक।।
राह दिखाते बाइबिल, गीता ग्रंथ कुरान।
अपने भारत देश की, संस्कृति है पहचान।।
अनेकता में एकता, भाव जहाँ परिशुद्ध।
दिये शांति संदेश गुरु, घासी गौतम बुद्ध।।
देता मंगलकामना, जनगण मन का गान।
अपने भारत देश की, संस्कृति है पहचान।।
होली क्रिसमस ईद मिल, लोग मनाते पर्व।
सबको अपने धर्म पर, होता है नित गर्व।।
गजानंद करता नमन, संस्कृति गा गुणगान।
अपने भारत देश की, संस्कृति है पहचान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)27/08/22
36. दोहा गीत- परहित
परहित रख मन भावना, कर लें जग में काज।
बदलेगा परिवेश तब, होगा सभ्य समाज।।
अपनों से अपने यहाँ, रखते हैं मन द्वेष।
बुनते दुख के जाल नित, देने को दुख क्लेश।
नोच रहें इंसानियत, बनकर कागा बाज।
परहित रख मन भावना, कर लें जग में काज।।
कहता ग्रन्थ कुरान गुरु, परहित धर्म समान।
जीवन रूपी राह पर, रखिये कर्म महान।।
सहज सरल नम भाव से, बँधता सर पर ताज।
परहित रख मन भावना, कर लें जग में काज।।
भूल गए इंसान क्यों, सत्कर्मों की राह।
मात्र एक अब ध्येय है, धन पद अर्जन चाह।।
बेच दिये तन लाज को, रखते नहीं लिहाज।
परहित रख मन भावना, कर लें जग में काज।।
परहित सेवा भाव रख, बहते नदिया नीर।
उगते सूरज चाँद भी, धरती आग समीर।।
गजानंद परहित सजे, जीवन का यह साज।
परहित रख मन भावना, जग में कर लें काज।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)26/08/22
35. दोहा गीत- पथ
बढ़ो कर्म पथ बन पथिक, करने को सतकाम।
अगर डगमगाये कदम, लेना प्रभु का नाम।।
जीव चराचर के लिए, प्रेम दया रख भाव।
वाणी मधुरस घोलिये, बढ़े नहीं अलगाव।।
सच का दामन थामकर, रखिये झूठ लगाम।
बढ़ो कर्म पथ बन पथिक, करने को सतकाम।।
घोर निराशा से परे, आशाओं का भोर।
भाईचारा भावना, दिखे सुमत चहुँओर।।
पथिक पतन पथ छोड़कर, गढ़ना नव आयाम।
बढ़ो कर्म पथ बन पथिक, करने को सतकाम।।
आगे ही बढ़ते चलो, थमे कभी ना पाँव।
बढ़ना पथ में हँस सदा, धूप मिले या छाँव।।
संयम पथ कर मेहनत, जीत मिले अविराम।
बढ़ो कर्म पथ बन पथिक, करने को सतकाम।।
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
मनसा वाचा कर्मणा, बाँधो सबसे प्रीत।।
बुरे कर्म का फल बुरा, मिले बुरा अंजाम।
बढ़ो कर्म पथ बन पथिक, करने को सतकाम।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/08/22
34. दोहा गीत- उपहार
सतगुरु जी की देन है, मानव तन उपहार।
सत्कर्मो से कर चलो, जीवन नैया पार।।
मन विचलित ना कीजिये, पकड़ झूठ का डाल।
पाँव बढ़ा सत राह में, ऊँचा करके भाल।।
पाठ पढ़ा बंधुत्व का, बाँट जगत में प्यार।
सतगुरु जी की देन है, मानव तन उपहार।।
रूढ़िवाद पांखण्ड का, करना नित प्रतिरोध।
प्रेम दीप हो प्रज्ज्वलित, करें सत्य नव शोध।।
मानव मन व्यवहार में, भरे रखें संस्कार।
सतगुरु जी की देन है, मानव तन उपहार।।
कुटुम्बकम वसुधैव का, रहे भावना नित्य।
वैमनस्यता त्याग कर, करें सदा सत कृत्य।।
जाति धर्म के नाम पर, बढ़े नहीं तकरार।
सतगुरु जी की देन है, मानव तन उपहार।।
एक द्वार से आगमन, एक द्वार से साँस।
मानव मानव एक सब, कहना घासीदास।।
मानव कर्म महान जग, गीता का है सार।
सतगुरु जी की देन है, मानव तन उपहार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/08/22
33. दोहा गीत- अहंकार
अहंकार ले डूबता, नाम प्रतिष्ठा ज्ञान।
धन पद रूप शरीर का, करना नहीं गुमान।।
कर्म नाव चढ़कर करें, भवसागर को पार।
भाग्य भरोसे कब हुआ, जीवन का उद्धार।।
पाना खोना सब यहीं, कर्म बना पहचान।
अहंकार ले डूबता, नाम प्रतिष्ठा ज्ञान।।
करे हृदय को छेद नित, अहंकार का शूल।
होकर मैं का वश मनुज, करना कभी न भूल।।
सत्य धर्म ईमान का, रखें सदा ही ध्यान।
अहंकार ले डूबता, नाम प्रतिष्ठा ज्ञान।।
अहंकार को त्यागकर, कर लें मन को शुद्ध।
रहना शांति तलाश में, कहना गौतम बुद्ध।।
अहंकार के फाँस फँस, बने नहीं नादान।
अहंकार ले डूबता, नाम प्रतिष्ठा ज्ञान।।
हुआ बहुत विध्वंस जग, बढ़ा बहुत तकरार।
अहंकार के आग में, जलता घर परिवार।।
सोने का लंका जला, रावण का अभिमान।
अहंकार ले डूबता, नाम प्रतिष्ठा ज्ञान।
दुर्योधन धृतराष्ट्र भी, बना अहं का दास।
अहंकार कुरुक्षेत्र में, खुद का किये विनाश।।
अहंकार वश कंस को, पड़ा त्यागना प्राण।
अहंकार ले डूबता, नाम प्रतिष्ठा ज्ञान।।
फल इच्छा को त्याग कर, कर लें परिहत कर्म।
मानवता इंसानियत, असल मनुज का धर्म।।
कहते ज्ञानी संत गुरु, गीता ग्रंथ कुरान।
अहंकार ले डूबता, नाम प्रतिष्ठा ज्ञान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/08/22
32. दोहा गीत- सावन
गाँव गली बहने लगी, सावन की बरसात।
दिखे लबालब खेत अब, नदी दिखे संभ्रात।।
घटा घिरे घनघोर घन, आतुर बरसे नीर।
बिजली की चमचम चमक, लिए धरा तस्वीर।।
बूँद बूँद सावन दिया, झड़ी सुहावन रात।
गाँव गली बहने लगी, सावन की बरसात।।
सावन की हर बूँद पर, खुशियाली का राग।
मानव जग कल्याण को, रहा प्रकति परित्याग।।
जग के देव किसान को, दे जाता सौगात।
गाँव गली बहने लगी, सावन की बरसात।।
झींगुर राग अलापता, दादुर गाये गीत।
बारिश में जुड़ता सदा, इन दोनों के प्रीत।।
गजानंद तज सोंच यह, प्रेम पड़े प्रतिघात।
गाँव गली बहने लगी, सावन की बरसात।।
इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
31. दोहा गीत- सदा एक के माथ पर
सदा एक के माथ पर, रहते कभी न ताज।
समय बड़ा बलवान है, भूत यही कल आज।।
खोल देख इतिहास का, पन्ना बारम्बार।
हुआ ताज चलते बहुत, जग में नर संहार।
शाहजहाँ ने प्रेम का, दिया नया अंदाज।
सदा एक के माथ पर, रहते कभी न ताज।।
युगों-युगों से आज तक, रहा ताज का जंग।
कोई झेला दुख घड़ी, कोई रहा मतंग।।
वंचित दलित गरीब का, दबा दिए आवाज।
सदा एक के माथ पर, रहते कभी न ताज।।
गाँव शहर अब हर तरफ, गूँजे मैं का शोर।
राजनीति के ताज पर, बैठा काला चोर।।
चगल रहा इस देश को, अंधभक्ति का खाज।
सदा एक के माथ पर, रहते कभी न ताज।।
सच्चाई की कब कहाँ, हुआ भला है मान।
बिन पेंदी लोटा तरह, बदल गए इंसान।।
ताज साज के फेर में, बेच दिए तन लाज।
सदा एक के माथ पर, रहते कभी न ताज।।
गली गली हर द्वार पर, पहुँचा ताज बुखार।
भाई भाई लड़ रहें, बिखर रहा परिवार।।
गजानंद सत्कर्म कर, छोड़ ताज का राज।
सदा एक के माथ पर, रहते कभी न ताज।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/07/22
31. दोहा गीत- चउमास
चार मास चउमास मा, पहली मास असाढ़।
लगथे धान असाढ़ मा, रहिथे नदिया बाढ़।।
सावन हा बरदान बन, आय धरा के द्वार।
साँसा मा आसा जगे, पाये सुख भरमार।।
पानी रद रद हे गिरत, दिखे लबालब खेत।
फोर मुही आ मेड़ के, कमिया कर ले चेत।।
अपन करम के मेड ला, लेहू बाँध किसान।
होवय झन नुकसान जी, चिटकुन देहू ध्यान।।
बउराये नरवा नदी, मारत कुँआ उफान।
छितका कुरिया रोत हे, ध्यान धरे भगवान।।
रखबे ध्यान गरीब के, हे सावन महराज।
चिंता चिता तो झन बने, गिरे न दुख के गाज।।
भदराये भादो खड़े, सम्मत धरे कुँवार।
धान भरय कोठार मा, रखहू दया उदार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/07/22
30. दोहा गीत- माटी ये छत्तीसगढ़
माटी ये छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।
महिमा करौं बखान मैं, गावँव नित गुनगान।।
जन जग मा विख्यात हे, धान कटोरा नाम।
कर्म भूमि ये संत गुरु, धर्म भूमि श्रीराम।।
जल जंगल परिपूर्ण हे, हीरा मोती खान।
माटी ये छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
वाणी संत कबीर के, दामाखेड़ा धाम।
धन्य गिरौदपुरी जिहाँ, गूँजय जय सतनाम।।
कहना घासीदास गुरु, मनखे एक समान।।
माटी ये छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
महानदी अविरल बहे, दे जीवन संगीत।
अरपा जीवनदायिनी, जेखर धार पुनीत।।
सजे मुकुट इंद्रावती, बस्तर के बन शान।
माटी ये छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
सुवा ददरिया लोक धुन, पंथी करमा गीत।
तीज हरेली भोजली, जोड़े मन मा प्रीत।।
दीवाली होली मिलन, दया धरम पहचान।
माटी ये छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
भाई भाई एक के, परिभाषा ले साथ।
अनेकता मा एकता, सदा बढावँय हाथ।।
कर्म बड़े हे धर्म ले, कहिथे वेद कुरान।
माटी ये छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
जाति धर्म ला दूर रह, मानौ सब ला एक।
मानवता बस धर्म हो, रख विचार ये नेक।।
बढ़े नही तकरार जन, गजानंद रख ध्यान।
माटी ये छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/07/22
29. दोहा गीत- माटी यह छत्तीसगढ़
माटी यह छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।
महिमा करूँ बखान मैं, गाऊँ नित गुणगान।।
जन जग में विख्यात है, धान कटोरा नाम।
कर्म भूमि यह संत गुरु, धर्म भूमि श्रीराम।।
जल जंगल परिपूर्ण है, हीरा मोती खान।
माटी यह छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
वाणी संत कबीर का, दामाखेड़ा धाम।
धन्य गिरौदपुरी जहाँ, गूँजे जय सतनाम।।
कहना घासीदास गुरु, मानव एक समान।।
माटी यह छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
महानदी अविरल बहे, दे जीवन संगीत।
अरपा जीवनदायिनी, जिनकी धार पुनीत।।
सजे मुकुट इंद्रावती, बस्तर का बन शान।
माटी यह छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
सुवा ददरिया लोक धुन, पंथी करमा गीत।
तीज हरेली भोजली, जोड़े मन में प्रीत।।
दीवाली होली मिलन, दया धर्म पहचान।
माटी यह छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
भाई भाई एक का, परिभाषा ले साथ।
अनेकता में एकता, सदा बढायें हाथ।।
कर्म बड़ा है धर्म से, कहता वेद कुरान।
माटी यह छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
जाति धर्म से हो परे, मानें सबको एक।
मानवता बस धर्म हो, है विचार यह नेक।।
बढ़े नही तकरार जन, गजानंद रख ध्यान।
माटी यह छत्तीसगढ़, पावन पूज्य महान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/07/22
28. दोहा गीत- तन पिंजरे में काटती
मन बैठा मन मार कर, मन का टूटा आस।
तन पिंजरे में काटती, साँसे कारावास।।
अंदर मन भयभीत है, बाहर झूठी शान।
भटक रहा दर-दर मनुज, पाने को पहचान।।
दिन दिन बढ़ता जा रहा, लोभ मोह का प्यास।
तन पिंजरे में काटती, साँसे कारावास।।
जीवन के इस राह पर, कहीं फूल अरु शूल।
सुख दुख जो जैसा मिले, हँसकर करो कबूल।।
बढ़े चला जा कर्म पथ, होना नही निराश।
तन पिंजरे में काटती, साँसे कारावास।।
तन धन रखा सहेज कर, जरा जवानी सोंच।
दूर किया संतान तब, पड़ा सोंच पर मोंच।
देख बुढ़ापा रो रहा, यौवन पड़ा उदास।
तन पिंजरे में काटती, साँसे कारावास।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/07/22
27. दोहा गीत- श्रम जीवन का धर्म है
श्रम जीवन का धर्म है, श्रम मानव पहचान।
श्रम जीवन आधार भी, श्रम खुशियों का खान।।
कर्म मर्म का भान रख, सतत उठा लो पाँव।
कर्मवीर को श्रम यहाँ, देता है सुख छाँव।।
मिला नही है श्रम बिना, जग में आदर मान।
श्रम जीवन का धर्म है, श्रम मानव पहचान।।
श्रम से ही तो हैं खड़े, बड़े बड़े कल खान।
रखा कदम है चाँद तक, श्रम से ही इंसान।।
श्रम करके ही रात दिन, भरता पेट किसान।
श्रम जीवन का धर्म है, श्रम मानव पहचान।।
श्रम से ही बनते यहाँ, लोग अमीर गरीब।
बिना कर्म कुछ भी नही, हासिल हुआ नसीब।।
गजानंद बनता यहाँ, श्रम से कर्म महान।
श्रम जीवन का धर्म है, श्रम मानव पहचान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/07/22
26. दोहा गीत- मेरा हिंदुस्तान
चढ़कर स्वयं विकास का, नया नया सोपान।
कुछ परिवर्तित हो रहा, मेरा हिंदुस्तान।।
घर बैठे सुविधा सभी, देता इंटरनेट।
मोबाइल से लीजिए, खुशियाँ सभी समेट।।
बना आत्मनिर्भर खड़ा, स्वयं बना पहचान।
कुछ परिवर्तित हो रहा, मेरा हिंदुस्तान।।
गाँव गली पक्की सड़क, बाँध नहर सौगात।
है उन्नत कृषि योजना, बड़ी खुशी की बात।।
यंत्र तंत्र तकनीक नव, शोध लिए विज्ञान।
कुछ परिवर्तित हो रहा, मेरा हिंदुस्तान।।
स्वछ योजना के तहत, शौचालय हर द्वार।
घर घर से कचरा उठा, रही आज सरकार।।
अस्पताल सुविधा दिये, करने रोग निदान।
कुछ परिवर्तित हो रहा, मेरा हिंदुस्तान।।
कहलाती है सोन की, चिड़िया भारत देश।
हिन्दू मुस्लिम ईश सिख, रखते कभी न द्वेष।।
गजानंद इस सोंच से, बनता देश महान।
कुछ परिवर्तित हो रहा, मेरा हिंदुस्तान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/07/22
25. दोहा गीत- मर्म धर्म का जानिये
मर्म धर्म का जानिये, कहते ऋषि मुनि संत।
सत्य अहिंसा से करें, बुरे कर्म का अंत।।
मानवता ही श्रेष्ठ है, इस दुनिया का धर्म।
पर सेवा उपकार ही, असल मनुज का कर्म।।
आभूषण सच प्रेम ही, हो जीवन पर्यन्त।
मर्म धर्म का जानिये, कहते ऋषि मुनि संत।
धर्म सिखाता है नही, आपस में तकरार।
मानव मानव एक सब, हो धर्मों का सार।।
भाईचारा साथ रख, चलें एक ही पंत।
मर्म धर्म का जानिये, कहते ऋषि मुनि संत।
मंदिर मस्जिद चर्च क्यों, मन में जब प्रभु वास।
देव असल माँ बाप है, सेवा कर बन दास।।
सुख दुख में माँ बाप ही, देते साथ तुरंत।
मर्म धर्म का जानिये, कहते ऋषि मुनि संत।
धर्म बनाया कौन क्यों, करिए कभी सवाल।
ऊँच नीच का भेद भर, कौन चला कुटचाल।।
गजानंद मन क्षुब्द है, सुन पढ़ बात गढ़ंत।
मर्म धर्म का जानिये, कहते ऋषि मुनि संत।
24. दोहा गीत- परहित करना काम
सुख दुख अपना भूलकर, परहित करना काम।
अच्छे कर्मों से सदा, होता जग में नाम।।
आये खाली हाथ हैं, जाना खाली हाथ।
रह जायेगा सब धरा, नही चलेगा साथ।।
मनुज जरा पहचान लो, इन साँसों का दाम।
सुख दुख अपना भूलकर, परहित करना काम।।
मतलब के सब यार हैं, मतलब का संसार।
स्वार्थ साधने के लिए, लोग खड़े तैयार।।
बुरे कर्म का फल बुरा, मिला बुरा परिणाम।
सुख दुख अपना भूलकर, परहित करना काम।।
रखना जीवन में सदा, सहज सरल व्यवहार।
कभी नही तुम भूलना, जन सेवा उपकार।
प्यार जगत में बाँटना, पढ़ना प्रेम कलाम।
सुख दुख अपना भूलकर, परहित करना काम।।
मुसीबतों का सामना, करना मन रख धीर।
स्वयं मेहनत से बना, खुद का ही तकदीर।।
गजानंद तब प्राप्त है, सुख का चारों धाम।
सुख दुख अपना भूलकर, परहित करना काम।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/07/22
23. दोहा गीत- साथ हमारे आप गुरु
साथ हमारे आप गुरु, बन करके करतार।
भटकत हंसा कीजिये, भवसागर से पार।।
मन हो कभी उदास तो, देना संबल आप।
कृपा सहारे आपके, सुख नदियाँ लें नाप।।
दास करे अरदास गुरु, सुन लो आप पुकार।
साथ हमारे आप गुरु, बन करके करतार।।
भटके पाँव न सच कभी, होवे मन न अधीर।
अपने श्रम बलिदान से, बदलें भाग्य लकीर।।
दीप जले मन में सदा, पावन कर्म विचार।
आप हमारे साथ गुरु, बन करके करतार।।
दूर रहें तम से सदा, मन भर भक्ति प्रकाश।
जग जन की कल्याण हो, भरें आस विश्वास।।
लोभ मोह से दूर रख, हरना मनोविकार।।
साथ हमारे आप गुरु, बन करके करतार।।
भाई से भाई मिले, त्याग कपट छल द्वेष।
बढ़े प्रेम अनुराग नित, मिटे आपसी क्लेश।।
जाति धर्म की आड़ में, बढ़े नही तकरार।
साथ हमारे आप गुरु, बन करके करतार।।
शब्द सुमन अर्पित करूँ, देना गुरु सुख छाँव
आप भरोसे हूँ खड़ा, अडिग रखे द्वय पाँव।।
गजानंद पा गुरु चरण, जीवन कर उद्धार।
आप हमारे साथ गुरु, बन करके करतार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)26/07/22
22. दोहा गीत- भक्ति करूँगा रात दिन
मन मंदिर में हो गया, सतगुरु जी का वास।
भक्ति करूँगा रात दिन, बन करके मैं दास।।
करुणा सागर आप ही, आप दयानिधि खान।
शरण पड़ा हूँ आपका, दुख का करो निदान।
अंधकार मन का मिटा, भरना दया प्रकाश।
मन मंदिर में हो गया, सतगुरु जी का वास।।
भटक रहा हूँ शांति सुख, पाने को आराम।
साक्षी आठो याम रख, जपन करूँ सतनाम।।
अभिलाषी मैं गुरु दरस, सुन लो अब अरदास।
मन मंदिर में हो गया, सतगुरु जी का वास।।
मन है बहुत उदास गुरु, देख जगत की रीत।
बिखर रहा परिवार घर, रार मचाये मीत।।
गजानंद विश्वास का, होवे नहीं विनाश।
मन मंदिर में हो गया, सतगुरु जी का वास।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/07/22
21. दोहा गीत- ये जग माया चाकरी
ये जग माया चाकरी, लोभ लगा बाजार।
सौदा करना सोच कर, सच्चा रख किरदार।।
बिछा रखा है हर तरफ, यह माया तो जाल।
फूँक-फूँक रखना कदम, होना नहीं निढाल।।
मानव माया को समझ, भवसागर कर पार।
ये जग माया चाकरी, लोभ लगा बाजार।।
जब तक तन में सांस है, मैं मेरे का सोच।
रख झूठा ईमान जन, लिए सत्य को नोच।।
होता अब विश्वास का, तार-तार हर बार।।
ये जग माया चाकरी, लोभ लगा बाजार।।
माया ठगनी ठग लिये, जीवन की सुख रैन।
देख हाल विकराल जग, अश्रु बहे हैं नैन।।
माया ने पैदा किये, घर घर में तकरार।
ये जग माया चाकरी, लोभ लगा बाजार।।
धन तेरा मेरा नहीं, धन माया का रूप।
माया से सुख छाँव अरु, माया से दुख धूप।।
गजानंद माया रचे, प्रेम सुखद संसार।
ये जग माया चाकरी, लोभ लगा बाजार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/07/22
20. दोहा गीत- जीवन का सौभाग्य है
जीवन का सौभाग्य है, सतगुरु जी का जाप।
मिला मनुज तन जन्म यह, पावन कर्म मिलाप।।
वाणी से वाणी मिले, मन से नेक विचार।
जीव चराचर के लिए, नयनन प्रेम निहार।।
कभी किसी का दिल दुखे, करे नहीं यह पाप।
जीवन का सौभाग्य है, सतगुरु जी का जाप।।
जीयें कभी न खौफ़ में, मरे ऊँच रख माथ।
मनुज रहे जो साहसी, देते सतगुरु साथ।।
दुख के पल को याद कर, करना नहीं विलाप।
जीवन का सौभाग्य है, सतगुरु जी का जाप।।
आग हवा पानी धरा, नभ है देव समान।
पाँच तत्व से है बना, मानव तन यह प्राण।।
ढूँढ व्यर्थ बाहर नहीं, ढूँढ मनुज घट आप।
जीवन का सौभाग्य है, सतगुरु जी का जाप।।
स्वर्ग नर्क का भय भरा, कूटनीति रख चाल।
धर्म नीति के आड़ में, कोई मालामाल।।
गजानंद गर झूठ यह, तो लो सच खुद नाप।
जीवन का सौभाग्य है, सतगुरु जी का जाप।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/07/22
19. दोहा गीत- जीवन का सौभाग्य है
जीवन का सौभाग्य है, राम नाम का जाप।
मिला मनुज तन जन्म यह, पावन कर्म मिलाप।।
वाणी से वाणी मिले, मन से नेक विचार।
जीव चराचर के लिए, नयनन प्रेम निहार।।
कभी किसी का दिल दुखे, करे नहीं यह पाप।
जीवन का सौभाग्य है, राम नाम का जाप।।
जीयें कभी न खौफ़ में, मरे ऊँच रख माथ।
मनुज रहे जो साहसी, देते प्रभु भी साथ।।
दुख के पल को याद कर, करना नहीं विलाप।
जीवन का सौभाग्य है, राम नाम का जाप।।
आग हवा पानी धरा, नभ है देव समान।
पाँच तत्व से है बना, मानव तन यह प्राण।।
ढूँढ व्यर्थ बाहर नहीं, ढूँढ मनुज घट आप।
जीवन का सौभाग्य है, राम नाम का जाप।।
स्वर्ग नर्क का भय भरा, कूटनीति रख चाल।
धर्म नीति के आड़ में, कोई मालामाल।।
गजानंद गर झूठ यह, तो लो सच खुद नाप।
जीवन का सौभाग्य है, राम नाम का जाप।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/07/22
18. दोहा गीत- काव्य धर्म
काव्य धर्म कवि मान रख, लिखना छंद व गीत।
जिसमें देश समाज का, होवे भाव प्रतीत।।
कर्म धर्म का मर्म हो, शोषण प्रति आवाज।
दर्पण अर्पण सत्य की, काव्य धर्म हो आज।।
देश किया बर्बाद नित, रूढ़िवाद की रीत।
काव्य धर्म कवि मान रख, लिखना छंद व गीत।।
चमचों की चमचागिरी, चगल रहा है देश।
दिखता है अब हर तरफ, अंधभक्ति परिवेश।।
काव्य करे सच न्याय को, अपना भूल अतीत।
काव्य धर्म कवि मान रख, लिखना छंद व गीत।।
काव्य धर्म अभिव्यंजना, मर्यादों का मूल।
काव्य सुंगधित फूल तो, काव्य चुभाती शूल।।
लिखिये ऐसी काव्य जो, सबका दिल ले जीत।
काव्य धर्म कवि मान रख, लिखिये छंद व गीत।।
कौन छुपा है चोर बन, पहचानें गद्दार।
आहुति सच के लिए, झूठ नहीं स्वीकार।।
बढ़े नहीं मन दूरियाँ, गजानंद रख मीत।
काव्य धर्म कवि मान रख, लिखना छंद व गीत।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/07/22
17. दोहा गीत- मुंशी प्रेमचंद जी
प्रेमचंद साहित्य का, दिये अमर उद्गार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।
ईदगाह बचपन पढ़ा, ठण्ड पूस की रात।
बूढ़ी काकी कह उठे, दर्द बुढ़ापा बात।।
पीड़ा देख समाज की, बहा कलम की धार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।
पाठ सुभागी में पढ़ा, बेटी है अनमोल।
कफ़न तरसते लाश भी, मानवता की पोल।।
नैतिकता की बात ही, प्रेम चंद का सार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।
एक झलक गोदान है, गाँव शहर परिवेश।
सौत दिखाती है बड़ी, नारी रूप विशेष।।
हीरा मोती बैल का, झूरी के प्रति प्यार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।
परमात्मा का वास है, पंच करे सच न्याय।
खाला जुम्मन शेख को, अलगू न्याय सुनाय।।
परमेश्वर है पंच मुख, गजानंद स्वीकार।
कलम सिपाही को नमन, करता हूँ सौ बार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/07/22
16. दोहा गीत- मर्यादा मत लाँघना
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।
जीवन जीने की कला, देता है पहचान।।
रखना मर्यादा बना, रखकर मन को धीर।
मिले सफलता हर कदम, बन जाती तकदीर।।
मर्यादा के मर्म को, समझे मनुज सुजान।
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।।
बनकर मर्यादा पुरुष, सतगुरु घासीदास।
अलख जगाया सत्य का, सत पर कर विश्वास।।
जग जन को गुरु दे गए, मर्यादा सत ज्ञान।
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।।
मर्यादा में कौन अब, प्रश्न खड़ा बन यक्ष।
धोखा कपट प्रपंच में, लोग यहाँ हैं दक्ष।।
मर्यादा को भूलकर, किये अहं इंसान।
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।।
मर्यादा नित ढह रही, सीमायें कर पार।
लाज शर्म जिंदा कहाँ, दिखता मृत संस्कार।।
गजानंद रखना सदा, मर्यादा का भान।
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/08/22
15. दोहा गीत- मर्यादा मत लाँघना
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।
जीवन जीने की कला, देता है पहचान।।
रखना मर्यादा बना, रखकर मन को धीर।
मिले सफलता हर कदम, बन जाती तकदीर।।
मर्यादा के मर्म को, समझे मनुज सुजान।
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।।
बनकर मर्यादा पुरुष, पुरुषोत्तम प्रभु राम।
वचन निभाने के लिए, त्याग दिए सुख धाम।।
जग जन को प्रभु दे गए, मर्यादा का ज्ञान।
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।।
मर्यादा में कौन अब, प्रश्न खड़ा बन यक्ष।
धोखा कपट प्रपंच में, लोग यहाँ हैं दक्ष।।
मर्यादा को भूलकर, किये अहं इंसान।
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।।
मर्यादा नित ढह रही, सीमायें कर पार।
लाज शर्म जिंदा कहाँ, दिखता मृत संस्कार।।
गजानंद रखना सदा, मर्यादा का भान।
मर्यादा मत लाँघना, मर्यादा है मान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/08/22
14. दोहा गीत- सबका मालिक एक है
सबका मालिक एक है, गजानंद दो ध्यान।
दया धर्म उपकार ही, रूप यहाँ भगवान।।
कहना घासीदास गुरु, जाति धर्म सब एक।
मानवता इंसानियत, कर्म धर्म यह नेक।।
मंदिर मस्जिद क्यों भला, भटक रहें इंसान।
सबका मालिक एक है, गजानंद दो ध्यान।।
आदि नाम सतनाम से, जग जन का विस्तार।
शक्ति प्रकृति पाकर मिला, रंग रूप आकार।
भाई भाई एक हम, माँ की कोंख समान।
सबका मालिक एक है, गजानंद दो ध्यान।।
नहीं भटकना झूठ पथ, सच मारग लें थाम।
मानव जीवन को कभी, करें नहीं बदनाम।।
यह जीवन है चार दिन, त्यागें गरब गुमान।
सबका मालिक एक है, गजानंद दो ध्यान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/08/22
13. दोहा गीत- सबका मालिक एक है
सबका मालिक एक है, गजानंद दो ध्यान।
दया धर्म उपकार ही, रूप यहाँ भगवान।।
कहना राम रहीम का, जाति धर्म सब एक।
मानवता इंसानियत, कर्म धर्म यह नेक।।
मंदिर मस्जिद क्यों भला, भटक रहें इंसान।
सबका मालिक एक है, गजानंद दो ध्यान।।
उत्पत्ति ऊँ ओंकार से, जग जन का विस्तार।
शक्ति प्रकृति पाकर मिला, रंग रूप आकार।
भाई भाई एक हम, माँ की कोंख समान।
सबका मालिक एक है, गजानंद दो ध्यान।।
नहीं भटकना झूठ पथ, सच मारग लें थाम।
मानव जीवन को कभी, करें नहीं बदनाम।।
सच कहता है बाइबिल, गीता ग्रन्थ कुरान।
सबका मालिक एक है, गजानंद दो ध्यान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/08/22
12. दोहा गीत- बेटियाँ
घर की शोभा बेटियाँ, दो कुल की है शान।
पापा की होती परी, माँ की धड़कन जान।।
कदम पड़े जिस द्वार पर, रौनक है वह द्वार।
बेटी से परिवार घर, बेटी से संसार।।
बेटी कर्म परायणी, संस्कारो की खान।
घर की शोभा बेटियाँ, दो कुल की है शान।।
बेटी फूल गुलाब सी, बेटी सुख धन मूल।
ममता की प्रतिरूप है, शोषण के प्रति शूल।।
जिनकी भी है बेटियाँ, करो गर्व अभिमान।
घर की शोभा बेटियाँ, दो कुल की है शान।।
परिभाषा है त्याग की, प्रेम समर्पण भाव।
पार लगाये जिंदगी, बीच भँवर बन नाव।।
गजानंद बेटी बिना, दुनिया शोक समान।।
घर की शोभा बेटियाँ, दो कुल की है शान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/08/22
11. दोहा गीत- कलयुग
कल से ही कलयुग बना, कल से अर्थ विकास।
कल से ही सुख समृद्धि, कल से सर्वविनाश।।
कल में कल क्या-क्या हुआ, लेना है संज्ञान।
एक तरफ अभिशाप तो, एक तरफ वरदान।।
त्याग मेहनत आदमी, बना आलसी दास।
कल से ही कलयुग बना, कल से अर्थ विकास।।
मानव कलयुग की सुनो, परिभाषा कुछ और।
झूठ लोभ पांखण्ड छल, अंधभक्ति का दौर।।
भाई पर भाई जहाँ, करे नहीं विश्वास।
कल से ही कल युग बना, कल से अर्थ विकास।।
तथाकथित जब तथ्य पर, कर लें लोग यकीन।
सत्य राह पर तब दिखे, कर्म धर्म गमगीन।।
स्वाभिमान को बेच अब, बना मनुज है लाश।
कल से ही कलयुग बना, कल से अर्थ विकास।।
सतयुग द्वापर की करें, क्यों त्रेता की बात।
रचना चारों युग की, कलयुग की सौगात।।
गजानंद किसने रचा, झूठा जग इतिहास।
कल से ही कलयुग बना, कल से अर्थ विकास।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/08/22
10. दोहा गीत- अरुण निगम गुरुदेव
अरुण निगम गुरुदेव के, महिमा करौं बखान।
नींव रखिस हे छंद के, गुरुवर गुनी सुजान।।
बेटा कोदूराम के, अरुण निगम हे नाम।
दुर्ग जिला पावन धरा, अर्जुन्दा हे ग्राम।।
गुरुवर अइसन हे मिले, हमला गरब गुमान।
अरुण निगम गुरुदेव के, महिमा करौं बखान।।
छत्तीसगढ़ मा हर तरफ, लाइस छंद अँजोर।
कारज पावन नेक कर, सुमत उगाइस भोर।।
सीखत बाँटत ज्ञान सब, करत छंद रस पान।
अरुण निगम गुरुदेव के, महिमा करौं बखान।।
बड़े बड़े विद्वान जन, जुड़े छंद परिवार।
सुमता समता एकता, बहत इँहा सुख धार।।
द्वेष अहं अउ छल कपट, त्याग सबो अभिमान।
अरुण निगम गुरुदेव के, महिमा करौं बखान।।
भाखा के स्वभिमान बर, बढ़े हवय मिल पाँव।
महतारी छत्तीसगढ़, पाही अब सुख छाँव।।
गजानंद पढ़ लिख करय, भाखा के गुणगान।
अरुण निगम गुरुदेव के, महिमा करौं बखान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/08/22
09. दोहा गीत- दर्शन
सच का दर्शन कीजिये, झूठ का न दें साथ।
कर्म बड़ा है धर्म से, कहते दीनानाथ।।
कदाचार है पाप सम, सदाचार है स्तुत्य।
पुण्य साधना त्यागना, है असुरों सा कृत्य।।
दीन भलाई के लिये, जीना बनकर पाथ।
सच का दर्शन कीजिये, झूठ का न दें साथ।।
समानता सम भावना, जीवन का हो ध्येय।
द्वेष अहं को त्याग कर, करना प्रेम प्रदेय।।
जीव चराचर प्रेम हित, सदा बढ़ाना हाथ।
सच का दर्शन कीजिये, झूठ का न दें साथ।।
क्रोध लोभ भ्रम छल कपट, करते बुद्धि विनाश।
आस और विश्वास ही, मन में भरे उजास।।
गजानंद परमार्थ को, सदा झुकाये माथ।
सच का दर्शन कीजिये, झूठ का न दें साथ।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/08/22
08. दोहा गीत- सतगुरु घासीदास
कोटि-कोटि वंदन नमन, सतगुरु घासीदास।
दीप जला सतनाम का, सत का किये प्रकाश।।
बिछा हुआ था हर तरफ, भेदभाव का जाल।
छुआछूत सीमा चरम, बद्तर था जग हाल।।
धर्म बुराई जाति का, गुरु ने किये विनाश।
कोटि-कोटि वंदन नमन, सतगुरु घासीदास।।
रचना तन का एक है, एक लहू का रंग।
पांच तत्व से है बना, मानव रूपी अंग।।
सबका पाँव जमीन पर, पड़े नहीं आकाश।
कोटि-कोटि वंदन नमन, सतगुरु घासीदास।।
सत्य अहिंसा प्रेम ही, गुरु जी का संदेश।
मानव मानव एक हैं, रखे नहीं मन द्वेष।।
दया दृष्टि सबके लिए, रखिये अपने पास।
कोटि-कोटि वंदन नमन, सतगुरु घासीदास।।
ब्यालिस अमृतवाणियाँ, सार सात संदेश।
जो प्राणी अपना चले, मिटे सभी दुख क्लेश।।
संत शिरोमणि नाम गुरु, मन में भरे उजास।
कोटि-कोटि वंदन नमन, सतगुरु घासीदास।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/08/22
07. दोहा गीत- मित्र
मित्र इत्र बनकर सदा, महकाते दिल द्वार।
मित्र रत्न अनमोल है, अनुपम यह उपहार।।
तौल नही सकते कभी, जिसे तराजू बाट।
जुड़ती मन की भावना, प्रेम नदी के घाट।।
जाँच परख जैसे कनक, मित्र रखें खुद्दार।
मित्र इत्र बनकर सदा, महकाते दिल द्वार।।
जाति धर्म को रख परे, करें मित्रता खास।
दवा दुआ बनकर करे, मित्र दुखों का नाश।।
मन में प्रेम उमंग का, मित्र करे संचार।
मित्र इत्र बनकर सदा, महकाते दिल द्वार।।
मिल जाते माँ बाप पर, दुर्लभ सच्चा मित्र।
पावन निर्मल नेक अब, मिलते नहीं चरित्र।।
मतलब से सम्बंध सब, मतलब से परिवार।
मित्र इत्र बनकर सदा, महकाते दिल द्वार।।
होते जिनके मित्र हैं, उनके बड़े नसीब।
धन से भले गरीब हो, दिल से हो न गरीब।।
गजानंद जी मित्र बिन, बोझ लगे संसार।
मित्र इत्र बनकर सदा, महकाते दिल द्वार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/08/2022
06. दोहा गीत- सतगुरु लेना थाम
भटकूँ जब सत राह मैं, सतगुरु लेना थाम।
शरण पड़ा हूँ आपके, पाने सत्य मुकाम।।
धोखा अपनों से मिला, अपनों से अपमान।
दर्द अश्रु पीता गया, त्याग मान सम्मान।।
जीवन में कभी न करूँ, बदनामी का काम।
भटकूँ जब सत राह मैं, सतगुरु लेना थाम।।
दर्द बहुत है देखकर, अपनों का बिखराव।
बात-बात पर बढ़ रहा, दिल से दिल टकराव।।
मैं से मैं का है बना, अपने आज गुलाम।
भटकूँ जब सत राह मैं, सतगुरु लेना थाम।।
रह जायेगा सब धरा, त्याग मनुज निज स्वार्थ।
अगर अमर रहना यहाँ, कर कराज परमार्थ।।
गजानंद सत कर्म से, होता जग में नाम।
भटकूँ जब सत राह मैं, सतगुरु लेना थाम।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/08/22
05. दोहा गीत- याचक बनकर हूँ खड़ा
याचक बनकर हूँ खड़ा, सतगुरु तेरे द्वार।
झोली भरना दे खुशी, हे मेरे करतार।।
गुरु चरणों की धूल को, चंदन कर लूँ माथ।
मेरे सिर पर आपकी, रहे सदा गुरु हाथ।।
चलूँ राह सत राह को, कर लूँ भूल सुधार।
याचक बनकर हूँ खड़ा, सतगुरु तेरे द्वार।।
हर धड़कन में साँस बन, नाम बसा सतनाम।
दीप जले गुरु नाम का, रोज सबेरे शाम।।
जीवन की इस नाव को, करना गुरु भवपार।
याचक बनकर हूँ खड़ा, सतगुरु तेरे द्वार।।
होना आप सहाय गुरु, धूप रहे या छाँव।
दीन भलाई के लिए, बढ़े सदा ही पाँव।।
आत्मशक्ति देना मुझे, देना जग सुख सार।
याचक बनकर हूँ खड़ा, सतगुरु तेरे द्वार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर(छत्तीसगढ़) 10/08/22
04. दोहा गीत- जीवन यह बलिहार
सतगुरु चरणों में करूँ, जीवन यह बलिहार।
जुड़े रहे जन्मों जनम, इन सांसों का तार।।
रहे अंकिचन को नहीं, किंचित गरब गुमान।
लगन लगे सत कर्म में, सतगुरु रखना ध्यान।
संकट संशय भ्रम मिटे, मन से मनोविकार।
सतगुरु चरणों में करूँ, जीवन यह बलिहार।।
मन मंदिर सतनाम का, जोत जले दिन रात।
जीव चराचर में रहे, मानवता की बात।।
पाँव बढ़े सत राह में, हाथ बढ़े उपकार।
सतगुरु चरणों में करूँ, जीवन यह बलिहार।।
करुणा सागर आप ही, आप दयानिधि खान।
कहलाते हैं आप गुरु, जग में संत महान।
गजानंद आशा रखे, पाने प्रेम उदार।
सतगुरु चरणों में करूँ, जीवन यह बलिहार।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/08/22
03. दोहा गीत- सत का अलख जगा गये
सत्य अहिंसा प्रेम का, रहा पुजारी खास।
सत का अलख जगा गये, सतगुरु घासीदास।।
जाति-पाति के नाम पर, होता था जब भेद।
छुआछूत के शूल से, तन मन करते छेद।।
ऊँच नीच के भेद का, गुरु ने किये विनाश।
सत का अलख जगा गये, सतगुरु घासीदास।।
मानव-मानव एक सब, रंग लहू का एक।
द्वेष कपट छल त्याग कर, कर लो कारज नेक।।
होगा देश समाज का, तब तो सतत विकास।
सत का अलख जगा गये, सतगुरु घासीदास।।
ऐसे गुरु का छाँव तो, मिलते बड़े नसीब।
याचक बनकर हूँ खड़ा, मैं तो दीन गरीब।।
गजानंद गुरु ज्ञान का, फैला रहे प्रकाश।
सत का अलख जगा गये, सतगुरु घासीदास।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/08/22
02. दोहा गीत- राष्ट्र तिरंगा
राष्ट्र तिरंगा प्रेम का, देता है संदेश।
अनेकता में एकता, भारत का परिवेश।।
गूँज रहा है गर्व से, जनगण मन का गान।
बोलो वंदेमातरम, अमर जवान किसान।।
हिन्दू मुस्लिम एक सब, एक सभी का भेष।
राष्ट्र तिरंगा प्रेम का, देता है संदेश।।
केसरिया नित त्याग का, सिखलाता है पाठ।
देश धर्म पर मर मिटे, बाँध एकता गाँठ।।
जाति धर्म के नाम पर, रहे नहीं छल द्वेष।
राष्ट्र तिरंगा प्रेम का, देता है संदेश।।
श्वेत रंग है शांति का, अमिट अमर पहिचान।
जिसे बनाकर ध्येय हित, लड़ते वीर जवान।।
सीमा पर रहते अडिग, दृष्टि बना अनिमेष।
राष्ट्र तिरंगा प्रेम का, देता है संदेश।।
देता हरियाली हरा, खुशहाली हरहाल।
ऊँचा देश विदेश में, रहे हिन्द का भाल।।
गजानंद यह देश है, चिड़िया सोन विशेष।
राष्ट्र तिरंगा प्रेम का, देता है संदेश।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/08/22
01. दोहा गीत- राष्ट्र तिरंगा
राष्ट्र तिरंगा गर्व का, हम सबका अभिमान।
हर दिल हर घर में बसा, बन करके यह शान।।
अमिय महोत्सव वर्ष पर, उल्लासित है देश।
नजर उठा पर देख लो, कैसा है परिवेश।।
सच्चाई से फेर मुँह, बने नहीं नादान।
राष्ट्र तिरंगा गर्व का, हम सबका अभिमान।।
खड़ा कहाँ है देश यह, करना जरा विचार।
अंधभक्ति चमचागिरी, दिखता झूठ प्रचार।
रोजगार गायब दिखे, दूर नसीब मकान।
राष्ट्र तिरंगा गर्व का, हम सबका अभिमान।।
दिखे उपेक्षित आज क्यों, सैनिक वीर जवान।
हँसते हँसते देश हित, होते जो बलिदान।।
भूला नहीं सकते कभी, जिनके हम अवदान।
राष्ट्र तिरंगा गर्व का, हम सबका अभिमान।।
जिनके कंधों पर टिका, असली देश विकास।
हुआ उसी के देश में, बहुत बड़ा उपहास।।
भूल नहीं जाना इन्हें, इनका नाम किसान।
राष्ट्र तिरंगा गर्व का, हम सबका अभिमान।।
जिनके श्रम बलिदान से, खड़ा ताज मीनार।
फूटपाथ पर जिंदगी, दिखे दुखित लाचार।।
गजानंद मजदूर का, झोपड़ है वीरान।
राष्ट्र तिरंगा गर्व का, हम सबका अभिमान।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/08/22
दोहा छन्द गीत- (*गौरैया*)
गौरैया आती नहीं, क्यों अब मेरे द्वार।
सिसक रहा है बचपना, तुमको आज पुकार।।
अपने शांत सुभाव से, मन को लेते मोह।
जिस दिन तुम दिखते नहीं, लेते थे तब टोह।।
फुदक- फुदक तुम नाच कर, करती थी मनुहार।
गौरैया आती नहीं, क्यों अब मेरे द्वार।।
कनकी कुटकी को चुगे, चुगते दाना अन्न।
तुम्हें पकड़कर बाल जन, रहते सदा प्रसन्न।।
निहारती तुम चेहरा, दर्पण में सौ बार।
गौरैया आती नहीं, क्यों अब मेरे द्वार।।
पछतावे में लोग अब, मसल रहे हैं हाथ।
किये कारखाना खड़ा, टॉवर सुविधा साथ।
गौरैया गायब हुए, कर लो बात विचार।
गौरैया आती नहीं, क्यों अब मेरे द्वार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/05/2025