सोमवार, 15 अगस्त 2022

सार छंद

जहाँ ढूँढने चला मुसाफिर, बनके आज परिंदा।
झूठ नाचते देखा दुनिया, सच का नही पुलिंदा।।1

होड़ लगी है धाक जमाने, कुर्सी को मतवाला।
लूट रहे हैं देश जहां को, कुर्ता सफेद वाला।।2

भोले भाले जनता देखों, चतुर लोमड़ी नेता।
खुद का जेब लगे जो भरने, सुध भला कौन लेता।।3

भूखे प्यासे देशवासियों, इनका गरम मसाला।
खुले आसमाँ छोड़ हमें ये, बैठे ओढ़ दुशाला।।4

याद नहीं आते हैं इनको, वादें बात पुरानी।
फिर आयेंगे वोट मांगने, लेकर ख़्वाब सुहानी।।5

बचके रहना इनके हाथों, मिलके सबक सिखाना।
नही चलेगा चालाकी अब, उल्टा राह दिखाना।।6

रचना - इंजी.गजानंद पात्रे *सत्यबोध*
दिनांक - 03-07-2017

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

हाइकु-

 1. हाइकू- *उम्र* ​कोरी सी उम्र, कागज़ की नाव है, खुशी अपार। ​उम्र की धूप, सपनों के हैं पंख, ऊँची उड़ान। ​बीतती उम्र, माथे की लकीरें हैं, लिखा...