*गम का बादल छटा नही है*
गम का बादल छटा नही है, घिरा हुआ चहुँओर।
नित्य ताकती है पलके मेरी, उम्मीदों का भोर।।
बड़ी कश्मकश हालत मेरी, मिलता नही मुकाम।
साथ सभी का ऐसा छूटा, हुआ आज गुमनाम।।
कौन किसे अब अपना माने, मतलब का संसार।
बीच भँवर में नैय्या मेरी, नही कोई पतवार।।
घूट रहा है दम अब मेरा, मानो गहरा कूप।
हँसता हुआ चेहरा अब तो, मुरझाये हैं धूप।।
शिकवा नही किसी गैरो से, मिला नही हम साथ।
दौड़ चले आते जो सुख में, छोड़ गए दुख हाथ।।
समझ नही पाया मैं जग को, था इतना नादान।
समझ खिलौना ऐसा खेला, कठपुतली सामान।।
घूम रहा है वक्त पहिया, सुख दुख दुनिया साथ।
कभी नहीं अब तो जीना, गजानंद परमाथ।।
रचना - गजानंद पात्रे *सत्यबोध*
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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