बंदना
माथ नवाँ के बंदन, बारंबार ।
बोझ उतारव गुरु कर, बेड़ापार ।।
पग पग काँटा गढ़थे, अंतस बान ।
देख लबारी पकड़े, सत के कान ।।
थर थर काँपय चोला, उड़य परान ।
मुँह फेरे सत रसदा, गिरे उतान ।।
करिया करिया बादर, जल बरसाय ।
तइसे सतगुरु सागर, मन हरसाय ।।
प्यास बुझाये तन मन, बाँधे आस ।
किरपा बन रखबे गुरु, घासीदास ।।
तीन लोक मा चमकय, जोड़ा खाम ।
नील गगन मा गूँजय, जय सतनाम ।।
सतनाम हवय असली, जिनगी सार ।
अंतस भीतर सत के, दीया बार ।।
गजानंद के कहना, मानौ बात ।
छोड़ गरब जी तन के, मानुष जात ।।
मनखे मनखे एक समान
संत कहाये गुरु जी, घासीदास ।
जोत जलाये सत के, करे प्रकाश ।।
मनखे मनखे बोले, एक समान ।
मानवता के बाँटे, जग मा ज्ञान ।।
ऊँच नीच के पाटे, तँय हा खान ।
भेद भाव के टोरे, बड़े मचान ।।
छुआछूत के फाँसा, गुरु जी काट ।
दिये पिलाये पानी, एक्के घाट ।।
सत ला थामे राखव, उच्च विचार ।
दूर बुराई राखव, जिनगी सार ।।
दया धरम मनखे के, हो पहिचान ।
दीन दुखी कर सेवा, रख ईमान ।।
हो समाज बर जीवन,ये बलिदान ।
नइ तो जिनगी जानव,लाश समान ।।
राजा गुरु बालकदास
हाथ जोर के बिनती, श्रद्धा फूल ।
तिलक लगा के माथा, चरणों धूल ।।
स्वभिमानी राजा गुरु, बालकदास ।
सुमता लाये सब मा, बन बिस्वास ।।
तलवार धरे मुड़ मा, पगड़ी बाँध ।
सरहा जोधाई दू, गुरु के खाँध ।।
गुरु उपाधि राजा के, पाये मान ।
गैर फिरंगी मन के, सीना चान ।।
सतनाम धजा सत के, हे पहिचान ।
जेकर खातिर होगे, गुरु बलिदान ।।
बोड़सरा के माटी, करत पुकार ।
औराबांधा सुसकत, सुनव गुहार ।।
परबुधिया अब बइठे, माड़ी मोड़ ।
कहाँ चले गुरु हमला, कलपत छोड़ ।।
अब समाज जोहत हे, रद्दा तोर ।
आ के दुनिया मा गुरु, करव अँजोर ।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
बरवै छंद- *नशा* नशा करे ले होथे, नाश समाज। बर्बादी तन धन के, बुरा रिवाज।। दास नशा के झन बन, होय विनाश। सुख संपत्ति ला हरै, करै उदास।। नशा करे दुर्घटना, होथे लोग। बड़े-बड़े बीमारी, कैंसर रोग।। करथे बुद्धि खोखला, भरै विकार। नाम नशेड़ी देथे, नशा उधार।। नशा गिराथे सुख मा, दुख के गाज। नशा करे ले होथे, नाश समाज।। हलाकान घर लइका, सगा समेत। समय रहत ले हो जौ, सबो सचेत।। तब जिनगी मा आही, नवा सुराज। नशा करे ले होथे, नाश समाज।। गाँजा बीड़ी गुटका, भांग शराब। करे फेफड़ा किडनी, आंत खराब।। मौत गुड़ाखू माखुर, चरस अफीम। येला छोड़े के कर, तुरत उदीम।। तभे बाचही घर अउ, खुद के लाज। नशा करे ले होथे, नाश समाज।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/07/2025

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