गुरु महिमा
जपे नाम सतनाम जे, भव सागर हो पार ।
सत्यनाम नइँया बने, गुरु जी हे पतवार ।।
मन भावन हे गुरु के महिमा, हे मन तँय जप ले ।
ज्ञान अमृत सत गुरु जी पाये, धरे योग तप ले ।।
ज्ञान वृक्ष बन औंरा धौंरा, छाँव दिये सत के ।
कण कण मा गुरु सत ला साजे, पग धरे सुमत के ।।
छात पहाड़ी धुनी रमाये, सत के आसन ले ।
नाम जपे सतनाम पिता के, अंतस दर्शन ले ।।
झूमे घन डोंगरी पहाड़ी, पावन जंगल हो ।
धन्य करे गुरु जीव जंतु सब, सबके मंगल हो ।।
डारा डारा पाना पाना, गुरु गुन गावत हे ।
नीर कुंड सत धार बहा गुरु, चरन पखारत हे ।।
छै महिना ले योग तपस्या, गुरु कर आवत हे ।
सत के महिमा ला जन जन मा, गुरु अलखावत हे ।।
दया धरम करुणा के सागर, गुनि गुन गागर तैं ।
शबद शबद मा ज्ञान लखाये, जग दू आगर तैं ।
तोर ज्ञान महिमा करे, गजानन्द गुनगान ।
चरण कमल मा माथ हे, गुरु जी देहू ध्यान ।।
सुमिरन गुरु कर ले
सुन ले तँय माटी के चोला, छोड़ गरब मनके ।
कोन घड़ी ये पंछी उड़ही, पर देशी बनके ।।
धन दौलत अउ महल अटारी,ये जीयत भरके ।
हाथ पसारे जाना परही, सुन्ना जग करके ।।
करम धरम हा जीयत रइही, जुग जुग ले बरसों ।
नाम जगत मन भावत रइही, जस फूले सरसों ।।
का ले के तँय आये जग मा, का ले तँय चलबे ।
मोर मोर के माला जपथस, पर हित कब फलबे ।।
हँस ले गा ले मजा उड़ाले, दया धरम धर ले ।
छोड़ बुराई मन के बैरी, सुमिरन गुरु कर ले ।।
चंदा जइसे चमकत रहिबे, सुरुज भोर बन के ।
चंदन जइसे मन ला रख ले, छोड़ मोह धन के ।।
पा के तँय मानुष तन जोनी, मोल नही समझे ।
मोह मया के पिंजरा घुसके, मन पंछी अरझे ।।
दान पुन्य के परम धरम ले, जे मनखे बचथे ।
घुन्ना खाथे तन ला ओकर, मन काई रचथे ।।
भारत माँ
रूप सजे हे भारत माँ के, बिजुरी कस चमके ।
उज्जर काया कंचन जइसे, दगर दगर दमके ।।
बने हवे जी माँ दुल्हनिया, चुनरी ओढ़ खड़े ।
आज मिले हे मौका दर्शन,हमरो भाग बड़े ।।
केसरिया परिधान हवे जी, चिनहा त्याग धरे ।
सदा खिलावय फूल प्रेम के, ममता नयन भरे ।।
श्वेत रंग के कमर करधनी, शांति हवय चिनहा ।
चारो कोती जगमग चमके, शाम रात दिन हा ।।
हरा रंग के चूड़ी छन छन, हाथ दुनो छनके ।
हरियाली सँग पूरन होवय, इच्छा सब मनके ।।
सिंह वाहनी जगत भवानी, पर्वत मुकुट सजे ।
महानदी जी पाँव पखारे, मंगल भजन बजे ।।
हाथ सुहावय शान तिरंगा, चरणों कमल खिले ।
फूलय फलय देश आघू बाढ़े, सबला मया मिले ।।
वोट के कीमत जानव
देश धरम अब कहाँ दिखत हे, मोला दौ बतला ।
बइठ सुवारथ के कुर्सी मा, नेता गँय पगला ।।
रिश्वतखोरी लूट डकैती, जग ला रोग धरे ।
कोई तरसे कौंर निवाला, कोई भूख मरे ।।
रोजगार के बात कहाँ हे, शिक्षा गर्त पड़े ।
युग निर्माता भावी पीढ़ी, धरमन द्वार खड़े ।।
वोट बैंक अब जनता बनगे, समझव खेल इहाँ ।
राजनीति के मतलब बदले, सेवा भाव कहाँ ।।
न्याय कहाँ हे सच के रद्दा, झूठा राज करे ।
ढोंगी तपसी पाखंडी मन, सत्ता आज भरे ।।
अपन वोट के कीमत जानव, सुन पहिचान करव ।
गजानन्द हे आज बतावत, अब तो ध्यान धरव ।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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