सतनाम सार
महिमा घासीदास, कलम धरँव मँय सोरठा ।
गुरु मा रख के आस, ज्ञान कहानी ला लिखँव ।।
सत हा पुन्नी रात, गुरु प्रकाश दिन के हवय ।
सदा करे बरसात, सुधा गगन बन ज्ञान के ।।
दिये नाम सतनाम, जोत जला सतज्ञान के ।
नेक करिस गुरु काम, मानवता के पाठ बर ।।
बचन लगे अनमोल, मनभावन गुरु के भजन ।
झाँझ मजीरा ढोल, पंथी के धुन ताल मा ।।
मंगल पंथी गीत, बड़ा सुहावन जी लगे ।
पुरखा मन के रीत, महिमा घासीदास गुरु ।।
गुरु ले हे संसार, जग जननी माता पिता ।
भवसागर से पार, ज्ञान नाव बन गुरु करे ।।
चलव डगर सतनाम, दया मया के भाव हे ।
सत्य धरम के काम, सुमता समता एकता ।।
बेटी
पीरा भरे पुकार, बेटी करथे गर्भ से ।
कोंख न मोला मार, ये दुनिया मा आन दे ।।
ये दू कुल के शान, नोहय बेटी बोझ जी ।
सदा बढ़ावय मान, घर अँगना खिल उठय ।।
लाही नवा बिहान, पढ़ा लिखा बेटी बने ।
रखही कुल के शान, नाव बढ़ा माता पिता ।।
सुन लौ बात जहान, बेटी बेटा एक हे ।
मानौं दुनों समान, फरक रखव झन सोंच मा ।
उड़ही उच्च अगास, बनके फौजी पायलट ।
बेटी बाँधय आस, बेटा हे उम्मीद ता ।।
अपन जला लौ द्वार, शिक्षा पावन जोत ला।
मन करथे उजियार, बिन बाती बिन तेल के ।।
माँगे मया दुलार, धन दौलत माँगे नहीं ।
झन भेजव ससुरार, चीज पराया मान के ।
ममता के प्रतिरूप, बेटी माता अउ बहिन ।
सुख अउ दुख के धूप, जगत भलाई बर

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