गुरु गुनगान
करके गुरु गुनगान, लिखँव मँय सुग्घर रोला ।
दे दे गुरु जी ज्ञान, सदा मँय बंदव तोला ।।
हँव लइका नादान, कृपा के कर दे बरसा ।
लिखँव ज्ञान सत छंद, पढ़य सब मन ला हरसा ।।
दया के खान
तहीं दया के खान, तहीं गुरु सब के दाता ।
जग के पालनहार, तोर से जुड़गे नाता ।।
कलम चलय गुरु नाम, सुनावत सत के बानी ।
अतके बिनती मोर, सुनव गुरुवर सत ज्ञानी ।।
सुग्घर गढ़व समाज
थाम हाथ मा हाथ, करव सब पूरा सपना ।
सुग्घर गढ़व समाज, समझ के सब ला अपना ।।
सुन लौ आज गुहार, पुकारत गुरु बलिदानी ।
गुरु जी बालकदास, दिए सत के कुरबानी ।।
गुरु के नाम
ले लौ गुरु के नाम, सबो जी बहिनी भइया ।
गावव रख के राग, लिखे हँव छंद सवइया ।।
होवय पूरन काज, हवय जो मन मा सपना ।
राखव नेक विचार, सबो ला जानव अपना ।।
बिन गुरु के सतज्ञान, कहाँ कब तोला मिलही ।
सुन मानुष नादान,भीतरी तन मन जलही ।।
गुरु के आगे मान, देव सब हें बलिहारी ।
अँधियारी मन द्वार, बने गुरु तारनहारी ।।
मानवता के पाठ, पढ़ाइस हे गुरु घासी ।
चलौ राह सत थाम, कहे गुरु सत अविनासी ।।
एक नाम सतनाम, जपे सब दुख मिट जाये ।
भवसागर ले पार, नाम गुरु तोर लगाये ।।
अलख निरंजन ज्ञान, थाम के गुरु सत ज्ञानी ।
एक घाट मा लान, पिलाये सब ला पानी ।
मिटे भरम अउ भेद, दिये तँय मारग अइसे ।
समता सुमत अँजोर, उगाये पुन्नी जइसे ।।
हे गुरु घासीदास, जला दे सत के बाती ।
झूठ पाप के आज, मिटा अँधियारी राती ।।
अंतस भर सद्भाव, एक हो मनखे मनखे ।
दिये तोर सतज्ञान, सबो फिर आज सरेखे ।।
संकट मोचन आप, विघ्न दारुण के हर्ता ।
करौ दूर संताप,जगत के पालनकर्ता ।।
देव सबो बलिहार, बड़े हे गुरु के दरजा ।
गजानन्द धर ध्यान, चुका ले गुरु के करजा ।।
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
रोला छंद- *पंच पावा* सन्तों सन्त समाज, गवाही हे ये पल के। पाँच पंच के रूप, धरे सतगुरु जी झलके।। बेला आज विवाह, सगाई के हे पावन। सगा सहोदर साथ, कृपा बरसै मनभावन।। पाँच पंच मिल आज, पंच पावा ला पावव। खा के पान प्रसाद, धन्य खुद ला कर जावव।। देवव आशीर्वाद, वधू अउ वर ला सुग्घर। रहय सुखद संबंध, उँखर जिनगी हा उज्जर।। चूड़ी अम्मर तोर, सदा दिन राहय बेटी। जाथस जे घर द्वार, उहाँ भरबे सुख पेटी।। रखबे कुल के लाज, ददा दाई भाई के। रहिबे बनके छाँव, पिया बर अमराई के।। *छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"* बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/03/2024
बिरथा हे माया
जिनगी बइला जान, हवय गाड़ा ये काया ।
जीयत भर के संग, फेर बिरथा हे माया ।।
आगू बाढ़य हाथ, सुखी जीवन के ओरा।
चिंता छोड़व माथ, थाम उन्नति के डोरा ।।
सत गहना
गजानंद कविराय, कहे मानौं जी कहना ।
लावव नवा बिहान, रखव सत ला तुम गहना ।।
छूटे कभू न रंग, रचे सत तन मन काया ।
गुरु जी दौ बरदान, बढ़े झन जग धन माया ।।
कहाँ पावन हे गंगा
जाति धरम के नाम, होत हे निस दिन दंगा। बहत रकत के धार, कहाँ पावन हे गंगा।। धरे सुवारथ कोंन, खनत हे कुमता खाई। हिन्दू मुस्लिम सिक्ख, लड़ावत भाई-भाई।।
मानवता रख धर्म
सहीं गलत ला छाँट, राह सत के तँय धर ले ।
मानुष तन अनमोल, करम जग अच्छा कर ले ।।
सांसा मिले उधार, चुका ले येखर करजा ।
कर ले कारज नेक, ज्ञान गंगा मा तर जा ।।
कर सेवा उपकार, दीन दुखिया के भाई ।
कर नारी सम्मान, समझ खुद बहिनी माई ।।
एक बरोबर मान, सबो मनखे अउ प्रानी ।
मानवता रख धर्म, लिखे जा अपन कहानी ।।
छोट बड़े के भाव, फेंक दे येला घुरवा ।
लगा सुमत के पेड़, रितो ले पानी चुरुवा ।।
गजानंद कविराय, बताये सत के महिमा ।
अपन हाथ सम्मान, बनाये रख तँय गरिमा ।।
रोला छंद - संत शिरोमणी गुरु घासीदास जी ढोंग रूढ़ि पाखण्ड, छाय अँधियारी राहय। तँय छोटे मँय ऊँच, जाति मा लोगन काहय।। कहिके हीन अछूत, सताये मनखे जावय। भेद-भाव के दंश, सदा घुन्ना बन खावय।। समय बिकट बिकराल, रहय ठाढ़े दुख ठीहा। मेटे तब जग त्रास, अवतरे एक मसीहा।। सत गिरौदपुरी धाम, जिहाँ चमके ध्रुव तारा। अमरौतिन के लाल, पिता महँगु के दुलारा।। करुणा के भंडार, रहय बचपन ले मन मा। दीन-दुखी के पीर, बसावय अश्रु नयन मा।। करे तपस्या घोर, बिहड़ जंगल मा भारी। पा के गुरु सतज्ञान, करिस जग ला उजियारी।। जोत जला सतनाम, मिटाये भ्रम ला ज्ञानी। यश गुरु घासीदास, आज गूँजत हर बानी।। मनखे-मनखे एक, कहिस हे सतगुरु घासी। तोड़ जाति के बंध, मिटाइस घोर उदासी।। सात बचन अपनाव, सुखी जिनगी रख पाहू। सत्य अहिंसा प्रेम, धरे गुरु ज्ञान लखाहू।। झूठ कपट ला छोड़, लोभ अउ करना चोरी। चलौ सदा सत राह, पहा सुख रात अँजोरी।। कोई ऊंँच न नीच, सबो हें एक बराबर। देवव सब ला मान, करव सबके नित आदर।। रंग सबो के एक, एक तन खून समाई। एक कोख ले जन्म, लिये हन हम सब भाई।। दारू गांजा भांग, नशा ले दूर रहौ जी। करौ न देह खुँवार, न ही अपमान सहौ जी।। माता बहन समान, सदा मानौ पर नारी। राह चलौ तुम नेक, बनौ झन जी ब्यभिचारी।। भवसागर ले पार, उतरही वो प्रानी हा। बिते जपत सतनाम, जिंखर तो जिनगानी हा।। छोड़ भटकना दूर, जोड़ ले गुरु से नाता। गुरु ले बड़े महान, मिलय नइ जग मा दाता।। गाँव-गली घर खोर, सत्य के खाम गड़ाये। सेत धजा सतनाम, शांति संदेश सुनाये।। शोषित-पीड़ित लोग, सबो के मिटगे पीड़ा। गुरु अन्याय खिलाफ, उठाइस जब जी बीड़ा।। नारी के उत्थान, करे बर पाँव बढ़ाइस। नारी शक्ति अदम्य, बात उन ला समझाइस।। अइसन क्रांति मिसाल, मिलय नइ तो संसारा। चरण कमल मा माथ, नवावँय ये जग सारा।। घासीदास विचार, अमर जुग-जुग ले रइही। सत्यनाम के धार, सरी दुनिया मा बइही।। मानवता के पाठ, लोग सब हरदम पढ़हीं। सत्य अहिंसा प्रेम, राह धर गुरु के बढ़हीं।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)13/08/2026

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