मंगलवार, 16 अगस्त 2022

आल्हा छंद-

                        1- गुरु महिमा

गजानंद गुरु महिमा गावय, लिख लिख सुग्घर आल्हा छंद ।

हे गुरु ज्ञानी ज्ञान बता जा, मँय लइका हँव जी मतिमंद ।।


तीन लोक त्रिभुवना गूँजय, गुरु जी के तो जय जयकार ।

शबद शबद अउ आखर आखर, गुरु के महिमा अपरंपार ।।


किरपा गुरु के पाके लाँघय, लँगड़ा तक हा उच्च पहाड़ ।

अँधरा हा सुख सपना देखय, गूँगा मारय जोर दहाड़ ।।


जनम ददा दाई हा देवय, गुरु हा देवय जग संस्कार ।

बुरा भला के राह बतावय, दीन दुखी सेवा उपकार ।।


गुरु ला बड़ के कोन भला हे, ये दुनिया मा जी भगवान ।

ज्ञान जोत के अलख जगावय, सबला मानय एक समान ।।


बिन गुरु के नइ तो होवय जी, भवसागर ले बेड़ापार ।

माथ नवावँव मँय तो गुरु के, चरण कमल मा बारम्बार ।।


2- सतनाम आल्हा छंद- सेत धजा ला थाम चलौ अब

सेत धजा ला थाम चलौ अब, बगराबो गुरु सत सन्देश।

मान बढ़ाबो पुरखा गुरु के, दुख पीरा समाज के लेस।।


सुमता सुमत घरों घर लाबो, कुमता मन के देबो पाट।

सत्य ज्ञान के अमरित पीबो, बइठ सबो झन एक्के घाट।।


दूर बुराई पर के निंदा, लिग़री चारी ला हम छोड़।

गढ़बो सुराज अपन धरोहर, भाईचारा अंतस जोड़।।


मान बड़े समाज के पहिली, हे समाज से खुद पहिचान।

जीना मरना समाज खातिर, रखना हे अइसे स्वभिमान।।


तोर मोर के छोड़ अगोरा, सबो बढ़ाबो मिलके पाँव।

देखव तो कपटी बैरी मन, पग पग देवत हावय घाँव।।


कलम चलावव ज्ञान धरे सत, अलख जगावव गुरु सतनाम।

छोड़ मोह पद मान प्रतिष्ठा, करना समाज हित हे काम।।


गजानंद के कहना अतके, राखव सुमता मन विश्वास।

देही आशीष सुखी जीवन के, परमपिता गुरु घासीदास।।


3- बेटा सतनामी खाटी

बेटा सतनामी खाँटी अन, खाँटी करथन हम जी बात ।

बराबरी ला हमर करय जे, काकर मा हे जी औकात ।।


अंश हरन हम गुरु बालक के, रखन कभू ना पाछू पाँव ।

बैरी बर मुड़घम्मा बेरा, बनथन हितवा बर हम छाँव ।।


करके सीना आगू लड़थन, दुश्मन का देही जी मात ।

बेटा सतनामी खाँटी अन, खाँटी करथन हम जी बात ।।


हँवन तिजोरी महँगु बबा के, अमरौतिन के लोरी तान ।

सफुरा माँ के त्याग तपस्या, सहोदरा के पउँरी तान ।।


राखव जी हमला सहेज के, हम पुरखा के थाती तान ।

नारनौल के हवन गवाही, वीरभान के छाती तान ।।


गैर फिरंगी लोहा मानय, उँगली तले दबावय दाँत ।

बेटा सतनामी खाँटी अन, खाँटी करथन हम जी बात ।।


अमरदास गुरु सतबानी हम, बालक गुरु बलिदानी तान ।

गुरु घासी के हम अनुयायी, अमरित कुंड के पानी तान ।।


औंरा धौंरा के हम झाड़ी, ओखरे खुरा पाटी तान ।

तेंदु सार के हम तो लाठी, हाँ बेटा हम खाँटी तान ।।


माथा सादा चंदन चमकय, चमकय जइसे पुन्नी रात ।

बेटा सतनामी खाँटी अन, खाँटी करथन हम जी बात ।।


भाई  सरहा  जोधाई  कस, औंराबाँधा माटी तान ।

बोड़सरा के धधकत आगी, सोन खान के घाटी तान ।।


जोक नदी के दहरा हम तो, छात पहाड़ी पथरा तान ।

पचकुंडी के निरमल पानी, जैतखाम के पहरा तान ।।


सतनामियत बसे हे रग रग, हम गिरौदपुर के माटी तान ।

सत्य अहिंसा प्रेम पुजारी, हाँ बेटा हम खाँटी तान ।।


हितवा बर मितवा बन जाथन, मया प्रेम मा सिधवा तान ।

आँख उठा कहुँ देखय बैरी, हाँ फिर हमला बिघवा जान ।।


माँगे मा तब मिलय नही जी, बैरी मन ला कुछ खैरात ।

बेटा सतनामी खाँटी अन, खाँटी करथन हम जी बात ।।


4- कट्टर सतनामी

कट्टर सतनामी हम बेटा, गज भर छाती वाला तान ।

हमर गरजना शेर सहीं जी, जीथन रख के हम स्वभिमान ।।


दीन दुखी के हम रखवाला, औंरा धौंरा छइहाँ तान ।

झूठ लबारी हम नइ जानन, सत्य अहिंसा हे पहिचान ।।


सरहा जोधाई के छाती, सुकला सार ग लोटा तान ।

रजवा बिट्ठल के हम लाठी, गुरु बालक के सोंटा तान ।।


सतनामी के नाम सुनत मा, बैरी थर थर जावय काँप ।

जेन गली सतनामी निकले, तेन गली वो छोड़य छाप ।।


अरे कहत बर लाठी हम तो, बात कहत बर हन तलवार ।

सेत धजा के हँवन पुजारी, जैतखाम के हम रखवार ।।


हमर वीरता जग जाहिर हे, नारनौल के हम इतिहास ।

छत्तीसगढ गवाही सुन ले, राजा उपाधि बालकदास ।।


भले हँवन हम चुप तो बइठे, पर सिधवा हमला झन जान ।

आन मुसीबत जब जब पड़ही, अपन लुटा देबो हम प्रान ।।


गजानंद वीरता सुनावय, सतनामी पढ़ आल्हा छंद ।

मोर लेखनी आज जगावय, जे सतनामी हे मतिमंद ।।


5- सत्य पुजारी सतनामी अन

सत्य पुजारी सतनामी अन, अनुवाई गुरु घासीदास। सत के खातिर जान लुटादन, झूठ कभू नइ आवय रास।। नैन सजा पुरखा के सपना, जीथन हम तो सीना तान। शान झुके झन मान मिटे झन, बात हमेशा रखथन ध्यान।। अपन बात के खर्रा होथन, झूठ कपट ले रहिथन दूर। स्वाभिमान रख जिनगी जीथन, झुकन नही हम हो मजबूर।। अमरदास गुरु के हम बानी, परछाई गुरु बालकदास। सत के खातिर जान लुटादन, झूठ कभू नइ आवय रास।।1 भुजा समाये गोला बारुद, रग-रग मा हे जोश जुनून। करय गरजना जब सतनामी, भींगय बैरी के पतलून।। नाम सुने नइ सतनामी के, कोनों नइ तो पावय पार। फूँक उड़ा दन बैरी मन ला, अरे कहत बर हन तलवार।। साम दाम दँड कूटनीति के, तोड़न हम तो पल मा फाँस। सत के खातिर जान लुटादन, झूठ कभू नइ आवय रास।।2 गाँव गली अउ शहर नगर मा, हमर नाम के उड़थे शोर। अजबे बाना गजबे ताना, देथे सब ला जी झकझोर।। लिखे गजानंद छंद आल्हा, सुन पढ़ मन मा भरय हुलास। सत्य पुजारी सतनामी अन, अनुवाई हम घासीदास।।3 रचना- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/06/2023


6- सतनामी मँय बेटा अघुवा

सतनामी मँय बेटा अघुवा, शेर सहीं हे मोर दहाड़ ।

आँख उठा कहुँ देखय बैरी, देहूँ रे मँय बाँह उखाड़ ।।


अंग अंग मा आग भरे हे, रग रग मा गुरु बालक खून ।

अत्याचार जुलुम बर लड़थौं, भुजा समाये मोर जुनून ।।


सिधवा बर बड़ सिधवा मँय हा, कपटी बर सउँहे यमदूत ।

जान लुटा दँव सच के खातिर, अइसन हँव मँय वीर सपूत ।।


बाना सरहा जोधाई के, वीरभान के छाती ताँव ।

मोर गरजना भुजबल जइसे, गजानंद हे सुन लौ नाँव ।।


अरे कहत बर लाठी अँव मँय, बात कहत बर हँव तलवार ।

नाम सुने नइ सतनामी के, बैरी काँपय सुन ललकार ।।


नैनदास के मैं गोल्लर अँव, हँव अँजोर के बिजरा साँड़ ।

बात बिशाली कस खाटी हे, सुन के आवय तिजरा ठाड़ ।।


7- गुरु-वंशज महिमा

गुरु महिमा के बात बतावँव, सुन लौ संतो ध्यान लगाय ।

आजादी के लड़िन लड़ाई, सतनामी के मान बढ़ाय ।।


साल रहय सत्रह सौ छप्पन, गुरु घासी जी ले अवतार ।

जग के सब अँधियारी मिटगे, भवसागर के हो उद्धार ।।


मानवता के अलख जगाइस, मनखे मनखे एक समान ।

सतनाम एक दीप जलाइस, भेदभाव के मिटे निशान ।।


चार पुत्र जी गुरु घासी के, अमरदास गुरु बालकदास ।

गुरु आगर अउ गुरु अड़गड़िहा, सहोदरा जी बेटी खास ।।


सहोदरा तो राज दुलौरिन, ब्याह कुटेला गिस ससुराल ।

नाम करिस रोशन दू कुल के, दया भाव हिरदे मा पाल ।।


सतनामी के शान रहै जी, योद्धा भारी बालकदास ।

अमरदास गुरु सत्य पुजारी, दमकय काया पुंज प्रकाश ।।


शांत भाव गुरु अड़गड़िहा जी, माँ सफुरा के बेटा खास ।

बंश बढाइस गुरु घासी के, छोटे बेटा आगरदास ।।


ध्यान लगा के आगे सुनहू, गुरु मन के बुलंद आवाज ।

अत्याचार जुलुम के खातिर, करिन इमन मिलके आगाज ।।


गुरु बालक के बाना धरके, अमरदास गुरु आशीर्वाद ।

भुजबल दास कहे गर्जत जी, ब्रिटिश सुनौ हमरो फरियाद ।।


ब्याह रचाहूँ पुत्र दयाली, प्रथा पालकी ले मँय साथ ।

आड़ कहूँ जो बैरी आही, काट मढ़ाहूँ ओकर माथ ।।


बात सुने जब भुजबल के ये, ब्रिटिश गये सन्नाटा खाय ।

कोंन रोकही तोला भुजबल, मउत पास हे काकर आय ।।


ब्याह रचाइस हँसी खुशी जी, संग पालकी ले बारात ।

गाँव चिरहुला देखत रहिगे, बहू लिवाइस रातों रात ।।


उन्नीस सदी सन चौदह मा, गौ माता के घोर पुकार ।

अगमदास गुरु नैनदास जी, गौ रक्षा बर भरे हुँकार ।।


करमनडीह बलौदा राहय, ढाबा डीह गाँव जी पास ।

गौ माता के रोज कटावय, बूचड़खाना मा तो मांस ।।


फूलदास अंजोरदास अउ, रतिराम बड़े मालगुजार ।

बन्द कराइस बूचड़खाना, शेर सहीं करके ललकार ।।


बात रहिस अब करनी मरनी, अपन लिये समता अधिकार ।

सतनाम संघ के अगुआ मुखिया, रतिराम रहे मालगुजार ।।


अंग्रेजी बरार के हुकुमत, अउ बटलर के शासन काल ।

नयनदास गुरु अगमदास जी, अगुवाई सतनामी लाल ।।


भेदभाव बेगारी ले तो, मुक्ति मिले अब अत्याचार ।

कहे सरंक्षण समता के तो, ले के रहिबो हम अधिकार ।।


देख एकता सतनामी के, झुकगे तब बटलर सरकार ।

उन्नीस रहै छब्बीस सदी, पास विधेयक बन तैयार ।।


संविधान के रचना होये, सुन सन उन्नीस सदी पच्चास ।

पास विधेयक आरक्षण बर, अगमदास गुरु घोर प्रयास ।।


नारी शक्ति ला बंदत जी, गजानंद सुन बात बताय ।

ममतामयी मिनीमाता के, कमल चरण में माथ नवाँय ।।


भूख गरीबी दूर करिस माँ, बाँध बना के बांगो बाँध ।

सुमता बाँधे सबो कमावय, जोरे आपस मा सब खाँध ।।


जाति पाति पर सीमा लांघे, बाढ़े राहय सवर्ण उन्माद ।

बात बात मा आँख दिखावय, जबरन इन तो करय विवाद ।।


उन्नीस सदी सन सड़ुषठ के, हाल रहय जी बड़ बेहाल ।

केसतरा गुरुवाइन डबरी, के माटी भय लाले लाल ।।


खून पियासा सतनामी के,सन इक्यासी के वो साल ।

जिंदा जलादिस सतनामी ला,काल समाये कतको लाल ।।


देख अदरमा फटगे सबके, मारो मारो करे पुकार ।

खून उबलगे सतनामी के, घर घर से निकले तलवार ।।

 

नाम मिटा देबो बैरी के, कुल उँखरे कर देबो नाश ।

पड़गे सोंच मिनी माता हा, घर घर बिछ जाही रे लाश ।।


बात उठाइस बीच सदन तब, कइसे रोके जाय फसाद ।

समझौता के राह सुझाइस, मानवता के रख बुनियाद ।।


बात इँहें के इँहे छूटगे, मिले सबो ला सुख आराम ।

असकरणदास गुरु छोडाइस, तेलासी बाड़ा जी धाम ।।


बोड़सरा औराबांधा के, माटी हा अब करे पुकार ।

सन्त समाज सुनव गुरु भाई, कब भरहू तुमन हुँकार ।।


गुरु महिमा के बताइस, लिख लिख भाई पात्रे मोर ।

सतनाम दीप मन में साजव, तभे नवा जी आही भोर ।।


8- ( सतनामी स्वाभिमान दिवस- 26 अप्रैल )

*(भुजबल दास महंत)*

आज सुनावँव तुँहला संगी, गाथा भुजबल राज महंत ।

स्वाभिमान के डोला खातिर, करिस लड़ाई जे सामंत ।।


ढार नवलपुर के माटी मा, जनमे अइसे वीर महान ।

सात हाथ उँच बदन गठीला, कसे भुजा राहय बलवान ।।


नीरा माता के जे भइया, बड़ साला गुरु बालक दास ।

मालगुजार रहे सतनामी, ठाठ रखे जे खासम खास ।।


बात बतावँव तब के संगी, रहिस ब्रिटिश जब शासन काल ।

पुत्र दयाली के शादी के, भुजबल के मन आइस ख्याल ।।


घोड़ा मा सवार हो भुजबल, गये चिरहुला तब जी गाँव ।

गाँव पुरैना के मेड़ो ले, संत बखरिया पूछत नाँव ।।


दे सन्देश बखरिया ला तब, घर पहुँचे जी भुजबल दास ।

हाथ जोर के भुजबल बोले, आये हँव रख मन में आस ।।


बेटा के मँय शादी करिहौं, बहू बनाहूँ मँय जोगांस ।

सुंदर सुशील बेटी तुँहरो, हम ला आगे हावय रास ।।


युद्ध अखाड़ा मा पारंगत, घोड़ सवारी मा जोगांस ।

आन पड़े ता होश उड़ा दै, बैरी मन के छिन लै सांस ।।


बात बखरिया सुनके बोले, कहे धन्य जी हमरो भाग ।

आप असन सतनामी मुखिया, के बनबो हम समधी लाग ।।


शादी रिश्ता पक्का करके, लहुटत राहँय अपन निवास ।

राह रोक दिस तब भुजबल के, मेड़ो सामंती बदमाश ।।


कहे सुनौ तुम छोट जात के, कइसे घोड़ी हवव सवार ।

हमर रहत ले घोड़ी चढ़ना, नइहे तुँहला सुन अधिकार ।।


शांत सहज सद्भाव रखे तब, बोले भुजबल सुन इंसान

ना कोनों तो छोट बड़े हे, मनखे मनखे एक समान ।।


फिर भी ना माने सामंती, तब भुजबल हा भरे हुँकार । 

डोली साज बहू ले जाहूँ, रोक बताहू तुमन कन्हार ।।


अगले दिन ही भुजबल पहुँचे, लगे नागपुर के दरबार ।

कहिस ठोक छाती भुजबल जी, सुन लौ मंटेग्यू सरकार ।।


ब्याह रचाहूँ पुत्र दयाली, बहू लवाहूँ डोला साज ।

रोक सके तो रोक बताहीं, हटे नहीं पर भुजबल आज ।।


ले लिस भुजबल मंटेक्यू से, डोला साजे के अधिकार ।

गाँव चिरहुला बरात जाही, रइही दुश्मन अब तैयार ।।


लगन धरागे शादी के अब, सबो तरफ होगे जी शोर ।

ढार नवलपुर सजगे बढ़िया, खोर गली घर द्वार अँजोर ।।


मंडप छाये डूमर पाना, मँगरोहन हे आमा पान ।

पुत्र दयाली तेल चढ़त हे, गूँजत हे शादी के गान ।।


सुमिरन कर सतनाम पिता ला, भुजबल दास करे जयकार ।

फौज पताका सजे अखाड़ा, चले बराती हो तैयार ।।


हँसी खुशी शादी ला करके, लहुटत जब तो रहय बरात ।

दुश्मन बैरी टूट पड़े तब, अपन लगाये उन तो घात ।।


कूद पड़े तब सबो बराती, चले अखाड़ा खट खट वार ।

भाग पराइस सामंती मन, सतनामी के देख हुँकार ।।


जीत धरे तब सबो बराती, ढार नवलपुर पहुँचे आय ।

बाजा रुंजी बाजन लागे, गाँव गली मा खुशियाँ छाय ।।


साधारण ये डोला नोहय, स्वाभिमान सतनामी लाज ।

भुजबल महंत जी ला बन्दै, गजानन्द पात्रे जी आज ।।


9- सतनामी समाज के लौह पुरुष श्रद्धेय नरसिंह मंडल जी को 7 जून पुण्यतिथि पर सादर काव्यांजली समर्पित💐🙏

आल्हा छंद- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


लौह पुरुष नर सिंह मंडल जी, सतनामी के तँय हा शान ।

तोर गये ले देख ग भइया, सुमता गठरी होय बिरान ।।


करे लड़ाई हक के खातिर, दे बर समाज ला अधिकार ।

तोर करम गति मैं गुन गावँव, याद रही जुग जुग उपकार ।।


सादा जीवन विचार ऊँचा, तोर रहिस गा ये पहिचान ।

दृढ़ इच्छा मन ठान रखे तँय, कारज अइसे करे महान ।।


ममतामयी मिनीमाता के, याद दिवस तैं कर शुरुआत ।

मान रखे हमरो पुरखा के, धन्य भये सतनामी जात ।।


शहर रायपुर मा गुरु घासी, शोभा यात्रा कर आरंभ ।

शूर वीरता धर सतनामी, आज भरत हे तब तो दंभ ।।


घड़ी चौक रायपुर शहर के, तोर हवे जी बड़का देन ।

बड़े बड़े योजना दिलाये, रहिस नहीं सुविधा हा जेन ।।


दीन हीन के रहे मसीहा, बाँटे रोटी वस्त्र मकान ।

समरसता के राह चले नित, माने सब ला एक समान ।।


बोड़सरा बाड़ा के खातिर, छत्तीसगढ़ कराये बंद ।

शांति दूत के अघुवा बनके, चिटिक रखे ना मन में द्वंद ।।


पुण्यतिथि मा तोला बंदय, गजानंद कर दूनों जोर ।

सदा समाज करे सुरता ला, राहय तोरे नाम अँजोर ।।


10 *हमर पुरखा- हमर धरोहर*

सतनाम संस्कृति अउ साहित्य के साधक- आदरणीय पुरानिक लाल चेलक जी ला सादर समर्पित- 🙏

जिला दुर्ग के माटी बंदन, आलबरस पावन जी गाँव ।

तीन जुलाई सन उन्निस सौ, त्रालिस के तो राहय छाँव ।।


जनम धरिन माँ कोंख मलेछिन, सुनौ पुरानिक चेलक लाल ।

पिता शिवचरण चेलक जेखर, बनके राहय पग पग ढाल ।।


होनहार लइका पन से ही, गीत भजन में रहे रुझान ।।

बाँध पाँव घुँघरू ये नाचे, पंथी धुन मा छेड़े तान ।।


गाँव बसे शिवनाथ नदी तट, जेकर निर्मल बोहय धार ।

सीख धरे बहती धारा ले, जिनगी होय चढ़ाव उतार ।।


कुशल रहे तैराक तहूँ अउ, करे पढ़ाई मैट्रिक पास ।

करे भिलाई प्लांट नौकरी, स्वाभिमान रख खुद विश्वास ।।


खेलकूद संगीत गीत अउ, लेखन नाटक तोर पसंद ।

लोक कला के बने पुरोधा, दिये मंच ला तैं आनंद ।। 


सन उन्निस सौ सत्तर मा तँय, धरे नृत्य पंथी के ताल ।

देख मगन जन जन हो जावय, तोर नृत्य हा रहे कमाल ।।


गाँव गाँव मा टोली ले के, पंथी के तँय करे प्रचार ।

जन मानस मा भरे चेतना, रूढ़िवाद बर करे प्रहार ।।


लोक कला मंच महोत्सव मा, माँग बढ़े तब नित नित तोर ।

देश प्रदेश करे गायन ला, पंथी नाम कमाये शोर ।।


करे प्रसारण अकाशवाणी, तोर गीत ला गाँवों गाँव ।

मंगल पंथी गाना सुनके, थिरके लागय सबके पाँव ।।


तोर सिखाये पंथी मा जी, धूम मचाये देवादास ।

उषा बारले नाम कमाये, ज्ञान स्रोत ले तोरे पास ।।


उम्र बुढ़ापा चौहत्तर के, फेर सोंच हे युवा जवान ।

कलम सिपाही बने आज भी, लावत रहिथौ नवा बिहान ।।


गजानंद जी करे विनय ये, शासन देहू कुछ तो ध्यान ।

झन होवय गुमनाम पुरानिक, समय रहत दे दौ सम्मान ।।


छंदकार-  इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध " 

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

सम्पर्क.-  8889747888


11 *हमर पुरखा- हमर धरोहर*

सतनामी समाज अउ प्रथम छत्तीसगढ़ भरथरी गायिका सतलोकी सुरुज बाई खांडेकर जी को सादर समर्पित-

पावन भुइँया छत्तीसगढ़ के, अउ बिलासपुर अरपा धाम ।

जनम धरे सतनामी कुल मा, धन्य सुरुज खांडेकर नाम ।।


बारह तारीख जून महिना, सन उन्निस सौ सन उन्चास ।

गाँव पौंसरी जनम धरे तँय, पावन माटी बिल्हा पास ।।


मातु रेवती ममता पाये, पिता मया ले घसिया राम ।

नानपन से ताल धरे तँय, गीत भरथरी पाये नाम ।


रामसाय नाना से सीखे, उमर सात मा तँय संगीत ।

ढोलामारु भरथरी पंथी, लोरिक चंदा मया पिरीत ।।


मौका मिलिस रतनपुर मेला, प्रथम जिहाँ तँय गाये गीत ।

मधुर कंठ के धनी रहे तँय, सबके मन ला लेये जीत ।।


मध्यप्रदेश आदिवासी जन, लोक कला मँच तत्वाधान ।

सन उन्निस सौ सत्तासी मा, सोवियत रूस देइस मान ।।


मान अहिल्या बाई पाये, सन दो हजार के तो साल ।

देवदास बंजारे के भी, साथ रखे तँय ऊँचा भाल ।।


निःसन्तान सुरुज खाण्डेकर, दत्तक पुत्र लिये जी गोद ।

उज्ज्वल खाण्डेकर बेटा ले, पाये जिनगी मोद प्रमोद ।।


दो हजार सन अट्ठारह सौ, मार्च माह के  दस तारीख ।

सुरुज डूब गे कर अँधियारी, रोवय जन जन भारी चीख ।।


घोड़ा रोवत घोड़ सवारे, राजा रोवत हे दरबार ।

रानी रोवत रंगमहल मा, रोवत हन हम मिल परिवार ।।


छोड़ मया ले जोगी बनके, कहाँ चले गे दौना पान ।

याद जमाना जुग जुग करही, गीत भरथरी कर सम्मान ।।


मौलिक रचना- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

सम्पर्क- 8889747888


12 सतनामी कुल जनम धरे हँव

सतनामी कुल जनम धरे हँव, सतनामी मँय नाम कहाँव ।

अंश हरँव बलिदानी गुरु के, रखँव कभू नइ पाछू पाँव ।।


चरण पखारँव राजा गुरु के, सतनामी के मान बढ़ाय ।

सोये नींद जगाये खातिर, गाँव गाँव रावटी लगाय ।।


संग रहय सरहा जोधाई, भारी योद्धा इमन कहाय ।।

हाथ जोर इँहला बंदन हे, चरणों देवँव माथ नवाय ।।


लगे रावटी औराबांधा, जिहाँ गये गुरु बालकदास ।

ताँकत राहय दुश्मन बैरी, फेंके राहय धोखा फाँस ।।


टूट पड़े तब दुश्मन बैरी, हाथ लिये नंगी तलवार ।

मारो मारो काहन लागे, जिहाँ लगे गुरु के दरबार ।।


पीठ जोर के लड़े लड़ाई, सुकला लोटा थामे हाथ ।

सांस रहत सरहा जोधाई, आगू पाछू राहय साथ ।।


करम फूटगे सतनामी के, बालक गुरु के गिरगे लाश ।

श्राप दिये तब गुरु बालक जी, तुँहर वंश के होही नाश ।।


सांस हवय सांसा मा जब तक, महिमा गुरु मँय तोरे गांव ।

कलम बँधावय सुमता मोरे, मिलत रहय किरपा के छाँव ।।


13 कोंन जलाही सत के दियना

कोंन जलाही सत के दियना, कोंन जगाही मन मा भाव ।

भाई भाई लड़े परे हें, बीच भँवर मा सबके नाव ।।


कोंन उठाही बीड़ा गुरु के, कोंन जगाही सोय समाज ।

देख अदरमा फाटत भइया, मन मा मोर गिरत हे गाज ।।


तोर मोर के पाठ पढ़त हे, सोये आँखी मूँद समाज ।

आँख दिखावत अपने मन ला, आन करत हे अब तो राज ।।


पुरखा मन के मान भुलागे, अउ गुरु बालक के बलिदान ।

सतनामी के खून जुड़ागे, आज भुलागे खुद पहिचान ।।


पढ़े लिखे ये पीढ़ी देखव, पुरखा ऊपर करत सवाल ।

धन्य धन्य वो पुरखा हमरो, रखे विरासत ला संभाल ।।


राजनीति के खुरसी खातिर, अपन गवाँवत हें सम्मान ।

चील गिद्ध बनके नोचत हे, कउँवा जइसे काटत कान ।।


अब कवि कविता लेख कहानी, देखव सब हे मटिया मेट ।

झइन लिखव मनगढँत कहानी, का देबो पीढ़ी ला भेट ।।


जपे भजे से कुछ नइ होवय, करना हे मिलके सतकाम ।

सुमता लावव गाँव गाँव मा, तब समाज के बढ़ही नाम ।।


14 बघवा बन गरजव सतनाम

बघवा बन गरजव सतनामी, गीदड़ मन मारत ललकार ।

कब तक घर मा बइठे रइहौ, छिन छिन लूटत हे अधिकार ।।


कूटनीति के जाल बिछे हे, राजनीति मा हें गद्दार ।

बलि के बकरा हम बन ठाढ़े, उँखर हाथ मा हे तलवार ।।


संविधान मा कब्जा होगे, राज करत हे रे मनुवाद ।

उठव नींद से अब सतनामी, करके गुरु बालक ला याद ।।


मगन दुवारी कब तक रइहौ, निकलव घर से हो तइयार ।

मान बचाना हे पीढ़ी के, नइ तो हो जाही अँधियार ।।


बनके अफसर बाबू भाई, अटियाये अपने बर जोर ।

आँख दिखावय जब बैरी मन, कहाँ कटागे बइहाँ तोर ।।


जीना हे तो तनके जीयव,नइ तो बनके राहव लाश ।

चिथ चिथ के कउँवा खा लै,भले तोर चेथी के मांस ।।


असल बाप के बेटा होहू, भर लौ तब तुम शेर हुँकार ।

डूब मरव चुल्लू भर पानी, अगर खून नइहे अंगार ।।


15 शेर ढिलागे सतनामी के

शेर ढिलागे सतनामी के, सबो तरफ हे हाहाकार ।

कोंन पकड़ पाही रे बैरी, कोंन लड़ाही पंजा चार ।।


भूख सहे हें कौंर निवाला, सहे बहुत हे दुख के मार ।

तोड़ पिंजरा मनुवादी के, आज भरत हे सुन ललकार ।।


झूठ कपट के फेंके पासा, करत लोमड़ी राहय राज ।

गुरु बालक के धर बाना ला, गरजत हे सतनामी आज ।।


एक शेर जी जोधाई के, हे विकास खांडेकर नाँव ।

मुंगेली के आन बान जे, गरजय मेंछा देवत ताँव ।। 


एक शेर सुन अउ सरहा के, शशि रंगीला के जी गीत ।

सतनामी बघवा बन नाचय, सबके मन ला लेवय जीत ।।


एक शेर सुन अउ रजवा के, भुवनदास कोसरिया नाम ।

अलख जगावत हे जे सत के, सत्य लेखनी ला निज थाम ।।


एक शेर सुन अउ बिट्ठल के, हवय विष्णु सतनामी ढाल ।

धन्य नवागढ़ के माटी ला, जनमिस अइसन खाटी लाल ।।


एक शेर अउ गुरु बालक के, गजानन्द के आल्हा छंद।

जोश जगावय सबके मन मा, सुन पढ़ लेवय सब आनंद ।।


16 आल्हा छंद- सुते नींद ले जावव जाग लड़ौ लड़ाई हक के खातिर, सुते नींद ले जावव जाग। पढ़े लिखे सुन बहुजन भाई, झन आवय पुरखा पर दाग।। आरक्षण के भोगी बन के, मगन रहौ झन घर परिवार। भीम राव साहब के करजा, देवव भाई आज उतार।। पग-पग मा हे शूल बिछे अब, लगे नौकरी हावय दाँव डूबत हे लुटिया बहुजन के, बीच नदी मा हावय नाव।। बइठे हावय मार कुंडली, तुँहर गोद मा काला नाग। लड़ौ लड़ाई हक के खातिर, सुते नींद ले जावव जाग।।1 ज़ुल्मी के तो ज़ुल्म बढ़त हे, गावत हे मनुवाद अलाप। पढ़व जीवनी महापुरुष के, छोड़व तथाकथित के जाप।। संविधान के रक्षा कर लौ, नइहे अब तो खेवनहार। फरजी के अरजी खुदगर्ज़ी, मानत हे देखव सरकार।। हंस निटोरत हावय दाना, मजा उड़ावत हावय काग। लड़ौ लड़ाई हक के खातिर, सुते नींद ले जावव जाग।।2 बहरुपिया के जाल फँसौ झन, अपन लुटावव झन तुम मान। सोंचव समझव कूटनीति ला, चेत लगा के देवव ध्यान।। पच्चासी मा पांच करत हे, हमर मुड़ी मा चढ़ के राज। गजानंद जी चुप बइठे हव, छोड़ शरम इज्जत अउ लाज।। भीड़ बने हौ अनशन रैली, इही लिखाये का जी भाग। लड़ौ लड़ाई हक के खातिर, सुते नींद ले जावव जाग।।3 रचना- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/06/2023


17 अंधभक्ति के घूँट

माटी कंकड़ पावन होगे, जीयत मनखे बनगे लाश ।

अंधभक्ति के घूँट पिये हें, हिरदे कइसे होय उजास ।।


धर्म बने व्यापार इहाँ तो, अँधरा बनगे मनखे आज ।

पइसा मा तो भक्ति बिकत हे, लूटवाद के छाये राज ।।


जेन देवता बोलत नइहे, उहाँ चढ़ावत छप्पन भोग ।

घर के देव पड़े हे भूखा, तभो कहाँ समझत हें लोग ।।


श्रद्धा के तो मतलब बदले, बदले मनखे मन के चाल ।

दारू पी हुड़दंग मचावय, बाजय डीजे डिस्को ताल ।।


दुर्घटना ला कर अनदेखी, भक्ति नशा मा हें सब चूर ।

धर्मवाद ला बड़का मानत, कर्मवाद से हें सब दूर ।।


पढ़े लिखे के का मतलब जब, सही झूठ के नइहे सोंच ।

मिटा सके ना जब अंतस ले, अंधभक्ति के लगे खरोंच ।।


18 कहाँ नँदागे 

कहाँ नँदागे ढेकी जाँता, सुपा सुपेली लोढ़ा सील ।

कहाँ नँदागे छितका कुरिया, राचर खपरा अउ कमचील ।।


कहाँ नँदागे खो- खो फुगड़ी, लिब्बा डंडा अउ रेचूल ।

कहाँ नँदागे भँवरा बाटी, बाँधे मया झूलना झूल ।।


कहाँ नँदागे तीरी पासा, भटकउला अउ नदी पहाड़ ।

कहाँ नँदागे सगली भतली, छइँहा पीपर अमली झाड़ ।।


कहाँ  नँदागे घाट घठौंदा, कुँवा बावली टेड़ा ताल ।

कहाँ नँदागे गुड़ी गाँव ले, पारा पइठा के चउँपाल ।।


कहाँ नँदागे दौरी बेलन, बरदी परिया अउ दइहान ।

कहाँ नँदागे अमरइया मन, बेजा कब्जा हे शमशान ।।


कहाँ नँदागे गरुवा कोठा, चुरय कसेली भर भर दूध ।

कहाँ नँदागे देख गोरसी, जाड़ भगा तन राखय शुद्ध ।।


कहाँ नँदागे पड़की मैना, सुवा कोयली मीठा बोल ।

कहाँ नँदागे झाँझ मँजीरा, बंसी नाल तमूरा ढोल ।।


कहाँ नँदागे नाचा गम्मत, चउँका पूजा के कड़िहार ।

कहाँ नँदागे जोक्कड़ ग परी, लोरिक चंदा के दिन चार ।।


कहाँ नँदागे खाट मचोली, बइला आँखी रहय गथान ।

कहाँ नँदागे पोरा करसी, माटी मरकी धरे अथान ।।


कहाँ नँदागे पागा खुमरी, चीला संग अँगाकर रोठ ।

कहाँ नँदागे बात सियानी, अब हे राजनीति के गोठ ।।


19 परब हरेली

सावन मास अमावस के जी, परब हरेली हमर तिहार।

धरती लागे बड़ा सुहावन, देखव संगी आँख निहार।1।


प्यास बुझाये धरती दाई, सहिके गरमी के बड़ घाम ।

बरखा रानी रूप सँवारे, कहिके पड़े हरेली नाम ।।


धान बियासी होगे भइया, नाँगर बइला अब सुरताय ।

मान किसान हवे अन्नदाता, परब हरेली सबो मनाय ।।


आज गाय गरुवा सकलाये, राउत धरे चले दइहान ।

गाय बइल बर गेहूँ लोंदी, संग खम्हार रखे बड़ पान ।।


चले किसान धरे जी थाली, खड़ा नून अउ चाउर दार ।

लोंदी ला गरुवा मन खावय, बाकी राउत बर उपहार ।।


दसमूल कंद राउत बाँटय, घर घर खोंचय पत्ता लीम ।

दूर बिमारी घर से राखय, कतका सुग्घर करे उदीम ।।


बाँटय बइगा सुनव घरो घर, रखे भेलवा केई पान ।

आस लगाये करे प्रार्थना, राहय भरे खेत खलिहान ।।


थाल सजाये फूल नारियर, हाथ रखे चिरइँया हार ।

पूजा करे किसान सबो जी, बैल किसानी के औजार ।।


रच रच रच रच गेड़ी बाजय,गाँव गली मा बड़ मन भाय ।

हमर नँदागे दिन अब भाई, सोंच सोंच के मन पछताय ।।


खेलन गेड़ी दौड़ टिटंगी, आँख बँधौली नरियर फेक।

बइठ सबो सुख दुख ला बाँटन, आँख बहे अब आँसू छेक ।।


20 आनी बानी के पकवान

छत्तीसगढ़ राज मा बनथे, आनी बानी के पकवान ।

गजानंद हे आज बतावत, सुनिहौ संगी दे के ध्यान ।।


बरा फरा अउ भजिया बनथे, गुजिया मुठिया गाँवो गाँव ।

अंगाकर हे राजा रोटी, खावव मेंछा दे के ताँव ।।


 संग ठेठरी खुरमी खा ले, मालपुआ सोहारी झेल ।

पपची चीला बटिया खा ले, दूधफरा टोटा तक पेल ।।


खाजा खा ले कुसली खा ले, अउ खा ले गुड़ मा जी रोठ ।

डाल बफ़ौरी कढ़ी संग मा, जीभ लमा के खीचव पोठ ।।


कतरा पकुआ अउ दहरौरी, सुग्घर लागे रखिया पाग ।

बबरा घारी संग अइरिसा, बने खवा जी समधी लाग ।।


मीठ अनीसा चौसेला हे, गुलगुला संग डुबकी खाव ।

रखिया कोहड़ा बिजौरी ला, खा संगी तुम गुन ला गाव ।।


21 धन्य वो वीर महान

धन्य धन्य हे भारत माता, धन्य धन्य वो वीर महान ।

जान गवाँ के मान बढ़ाथे, जा सीमा मा सीना तान ।।


तपत रेत अउ गरमी जाड़ा, देवय पहरा बारो मास ।

सुख निंदिया हमला घर देवय, खुद जीयय बन जिंदा लाश।।


छोड़ खुशी घर के तन नारी, जा थामे सीमा बंदूक ।

देख कभू चूके झन भाई, साध निशाना तोर अचूक ।।


वीर भगत सिँह फाँसी चढ़गे, हँसते हँसते गुरु सुखदेव ।

झुका सकिन दुश्मन बैरी का, हिला सकिन का भारत नेँव ।।


ताल ठोक के लिंन आजादी, भगिस फिरंगी पागी छोर ।

तोड़ गुलामी के बेड़ी ला, लाइन भारत सुख के भोर ।।


नमन नमन हे वीर सपूतों, आवव मिलके फूल चढ़ाव।

बनके सच्चा लाल देश के, भारत माँ के लाज बचाव।।


22 बंदन माटी पूत किसान

माटी जइसे जीवन राखे, माटी कस तन रखे परान ।

माटी के तो मान बढ़ावय, बंदन माटी पूत किसान ।।


खाँध म नांगर हाथ तुतारी, धरे चले टुकनी भर धान ।

अर्र तता के बोल सुनावय, मूड़ म पगड़ी हे पहिचान ।।


बदे मितानी घाम छाँव सँग, जाँगर टोर कमावय खूब ।

सोन उगावय बंजर भुइँया, मोती नदी निकालय डूब ।।


सउँधे सउँधे माटी महकय, झूमय खेत धान के बाल ।

लहरय चना सोनहा गेंहूँ, देख किसान रहय खुशहाल ।।


माटी के कोरा सिरजावय, दुनिया के जे भरथे पेट ।

देख भला अब हालत ओखर, सुख रोटी से नइहे भेंट ।।


गला बँधे हे करजा घाटी, कनिहा टूटे दुख के बोझ ।

भ्रष्टाचारी आँख दिखावय, कोंन करय दुख लउठी सोझ ।।


धान कटोरा महतारी के, बेटा पावय जग मा मान ।

गजानन्द हे आज पुकारत, सुनव खोल के सब झन कान ।।


23 कदम बढ़ालव मिलके साथ

कदम कदम मा बिखहर काँटा, फूँक फूँक के रखहू पाँव।

लोभी पापी भरे पड़े हे, देखत रइथे चोखा दाँव।।


दया मया के नइये सँसो, जहर घुरत हे मीठी बात।

ताकत रइथे गिधवा बनके, जइसे ताकय घुघवा रात।।


शकुनी रावन बनके घूमय, देखव कलजुग अइसन आज।

नोंच नोंच तन ला खावत हे, मनखे बनके गिधवा बाज।।


कुकुर बिलइ कस झाँकत रइथे, घर मा खुसरै तोड़ कपाट।

पेट मार के हिस्सा खावय, लेथे पतरी जम्मो चाँट।।


कइसे आही आस जगत मा, कइसे बढ़ही परहित हाथ।

सपना बढ़िया मिलके देखव, कदम बढ़ालव मिलके साथ।।


24 असली रावण

फिरत हवय जी असली रावन, जगह जगह मा देखव आज ।

जलत हवय फिर धरमी कइसे, अँधरा भइगे आज समाज ।।


आग सतीत्व म  सीता पावन, पावन  होगे रावन राय ।

बात हमारो सोंचव भइया, काकर मन मा पाप समाय ।।


पाप समाये काकर मन मा, नारी ऊपर बान चलाय ।

नाक कटे जब घर के इज्जत, काकर अंतस नइ करलाय ।।


करम दुनो के एक्के जइसे, एक सजा ला काबर पाय ।

धन्य धन्य कलजुग के मनखे, आँखी पट्टी तुँहर बँधाय ।।


इंसाफ करव सच के पहिली, तब रावन ला आग जलाव ।

रावन महिषा ककरो पुरखा, झन उँखरो अंतस करलाव ।।


पाप जलावव खुद के भाई, बीते बात जाव बिसराव ।

सच्चाई के दीप जलालव, देश धरम बर पाँव बढ़ाव ।।


25 बेटी

गजानंद के बिनती अतके, सुनहू ध्यान लगा के कान ।

आज पुकारत हे बेटी मन, मिले महूँ ला जग मा मान ।।


कभू कोंख मा बेटी मरथे, कभू जले जी दहेज आग ।

पढ़े लिखे तुम समाज सोंचव, इही लिखाये हे का भाग ?


पढ़ा लिखा दौ बेटी ला तब, देखव ओखर उच्च उड़ान ।

अबला येला झन तुम मानौं, बेटी मा हे गुन के खान ।। 


ठुमुक  ठुमुक जब बेटी चलथे, पैरी बाजे दूनों पाँव ।

मन ला मोहे तुतली भाखा, अटक अटक जब बोलय नाँव ।।


काम बुता करके घर आथँव, पापा कहिके दउड़त आय ।

मोर तीर मा बइठय-चूमय, मोर सबो पीरा मिट जाय ।।


रहय मिनीमाता जस बेटी, सफुरा माँ कस मया दुलार ।

मान बढ़ाये दू कुल के ये, इज्जत बन मइके ससुरार ।।


संत फकीरा महिमा गावय, बात लिखाये हे इतिहास ।

बेटी से दुनिया के सिरजन, बेटी से हे जगत उजास ।।


बात मोर तुम मानौं भइया, बेटा ले बेटी हे नीक ।

खूब पढ़ावव नाम कमावय, जग मा जीयय हो निर्भीक ।।


26 मजदूर-

एक मई मजदूर दिवस के, करथव सुरता तुम मजदूर ।

बाँट बधाई भूल गये सब, काबर इन तो हे मजबूर ।।


देखव संगी आँख निहारे, भारत के असली तस्वीर ।

भूख प्यास मजदूर मरे हें, तरसे इन सुख के तकदीर ।।


माथ लगा के चन्दन माटी, दुनिया के सिरजावय भाग ।

तभो डसत हे देखव संगी, बने गरीबी काला नाग ।।


बबरु बरन ये काया साजे, थामे बइठे भुजा पहाड़ ।

माथ पछीना मोती चमके, दिखे कोइला कस तन हाड़ ।।


धरे मेहनत के जादू ये, पाये हे श्रम के बरदान ।

कंकड़ ला तो सोन बना दै, पथरा ला तो ये भगवान ।।


महल अटारी रेल बने हे, दउड़े पानी हवा जहाज ।

खड़े कारखाना अउ टावर, ताज महल श्रम सिरजे नाज ।।


बादर पानी बदे मितानी, जाँगर पेर कमावय खेत ।

तोर दशा अउ सुख के खातिर, करे नहीं कोई जी चेत ।।


कोंन लिही जी शोर पता ला, अँधरा भैरा के दरबार ।

राम राज हे जिहाँ अमीरी, उहाँ गरीबी सर तलवार ।।


देश विकास करे कइसे जी, एक वर्ग ला करके दूर ।

मजबूर नहीं मजदूर हरौ, सुख सुविधा ला दे भरपूर ।।


गजानंद धर विकास डारा, तभे देश होही खुशहाल ।

भूख मरे मजदूर नहीं जी, तन कपड़ा सुख रोटी दाल ।।


 27 रतन बेटा ( लक्ष्मण मस्तुरिहा जी )

भारत माँ के रतन ग बेटा, अउ जे छत्तीसगढ़ सपूत ।

लक्ष्मन मस्तुरिहा गा भइया, रहिस मया क़े सुग्घर दूत ।।


संग चलव सब कहिके मितवा, दिये अकेल्ला हमला छोड़ ।

सुरता आथे रहि रहि तोरे, गीत मया गाये बेजोड़ ।।


आँख बदरिया सावन बरसे, मन रइथे जी मोर उदास ।

घर कुरिया सुन्ना रे मितवा, तोर बिना नइ आवय रास ।।


रंग फगुनवा देख उड़ागे, बखरी तूमा नार सुखाय ।

नाम पता अब कोंन बतावय, गाड़ीवाला घर धुँधवाय ।।


पुन्नी चंदा बदरी छुपगे, मया पिरित होगे अँधियार ।

नइ तो कोई देवय अब गा, मँगनी माँगे मया उधार ।।


चौरा गोंदा फूल सुखागे, बारी के जी मोर पताल ।

छइहाँ भुइयाँ छोड़ जवइया, देख जरा अब आके हाल ।।


मोल करव कुछ नेकी संगी, ये जिनगी हे हाट बजार ।

चलव कमाबो जुरमिल भइया, रुनझुन लागय खेती खार ।।

  

जाने वाले ओ जी ज्ञानी, छोड़ गये परहित गुन वेद ।

देख कोंन कतका समझत हे, तोर बसे आँखी के भेद ।।


अहो गजानन स्वामी सुन ले, लउटा दे गुदड़ी के लाल ।

पड़की मैना फिर से गावय, मया पिरित के बइठे डाल ।।


28 कोरोना (एक वायरस)

याद जमाना जुग जुग रखही, कोरोना के नरसंहार ।

मन्दिर मस्जिद बन्द रहिस हे, बन्द चर्च गरुद्वारा द्वार ।।


वो भगवान कहाँ छुपगे जब, रहिस देश मा संकट घोर ।

अंधभक्त मन दूर लुकागे, कोरोना जब मारिस जोर ।।


राहत बर बस हाथ बढ़ाये, देखव परखव तुम विज्ञान ।

इही बात ला मँय तो सोंचव, होथे का सच मा भगवान ।।


नाम बड़े कब जग मा होथे, होथे बड़का सच मा काम ।

करम करे से सउँहत मिलथे, राम रहीम यीशु गुरु धाम ।।


मोर लेखनी के हे कहना, बनव सबो जी करम प्रधान ।

करम करे तब पेट भरे हे, भरय नहीं कोई भगवान ।।


ना तो मँय हा धरम विरोधी, ना मँय नास्तिक हँव भगवान ।

सच्चाई ला धर मँय जीथँव, मोर इही असली पहिचान ।।


राजनीति के अमर पुरोधा ला श्रद्धांजलि स्वरूप छंद सुमन

29 सादर समर्पित 🙏


अमर पुरोधा राजनीति के, याद रही जुग जोगी नाँव ।

छत्तीसगढ़ महतारी रोवय, सुन्ना होगे अँचरा छाँव ।।


बिलासपुर के उत्तर पश्चिम, पेंड्रा मरवाही के छोर ।

बसे घना जंगल के गोदी, जोगीसार गाँव जी तोर ।।

 

सन उन्नीस सौ छियालिस के, जनम धरे तैं जोगीसार ।

नाम धरिन तब अजीत जोगी, हँसी खुशी मिल घर परिवार ।।


अपन नाम अनुरूप करे तैं, हासिल मंजिल बड़ा मुक़ाम ।

छोट बड़े के रहे चहेता, जन जन जानय तोरे नाम ।।


अकादमिक उपलब्धि बड़े जी, जननायक तैं खासमखास ।

दीन हीन के रहे मसीहा, जन गरीब के तैं तो आस ।।


रहिस मुख्यमंत्री जे पहिली, छत्तीसगढ़ बनिस जब राज ।

शून्य शिखर तक रद्दा गढ़के, करे राज बर बड़का काज ।।


शुक्रवार दिन काल बरोबर, आइस उनतिस के तारीख ।

दू हजार सन बीस रहे जी, पंच तत्व तन होय सरीख ।।


मिटे एक युग राजनीति के, छत्तीसगढ़ धरा ये धाम ।

याद जमाना जुग जुग करही, कुशल चितेरा जोगी नाम ।।


गजानंद भी माथ झुका के, श्रद्दांजलि कर अर्पण फूल ।

लौट चले आबे जोगी जी, कोनों रूप म अपने कूल ।।


30 *फूलनदेवी शहादत दिवस विशेष*

आज दिवस पच्चीस जुलाई, तोर शहादत दिवस मनाय।

कोनों नारी के दामन झन, शामन्तशाही दाग सनाय।।


उत्तर प्रदेश के गाँव गोरहा, धन्य कहौं वो पावन धाम।

सामंतशाही खतम करे बर, बेटी जनमिस फूलन नाम।।


दस अगस्त उन्निस सौ तिरसठ, फूलन देवी लिस अवतार।

सामंतशाही ठाकुर मन के, झेलिस बहुते अत्याचार।।


बेहमई के घटना सुन के, मन जाथे जी थर थर काँप।

डस डारिस इज्जत ला वोखर, सामंतशाही विषधर साँप।।


नग्न घुमा के गाँव गली मा, घोर करिन वोखर अपमान।

कैद बंद कमरा मा राखिन, आफत मा तो राहय जान।।


भाग पराइस ले दे के तब, अपन बचाइस वो हा प्रान।

कहे कसम खा फूलन देवी, लेहूँ बदला मैं अपमान।।


कई महीना बीत गये तब, फूलन लौटिस वापस गाँव।

एक एक अत्याचारी ला, देवन लागे वो तो घाँव।।


एक शाम लिस बदला भारी, बँदूक  गोली कर बौछार।

बाइस अत्याचारी ला तो, एक साथ दिस मौत उतार।।


बेहमई के ये घटना हा, शामन्तशाही भर दिस रोष।

कर दबाव उन काहन लागे, उठो प्रशासन आओ होश।।


जन आक्रोश बढ़े बहुते तब, तोड़ फोड़ रैली बन आग।

वी.पी.सिंह जी तुरते ताही, करिस मुख्यमंत्री पद त्याग।।


फूलन ला पकड़े खातिर तब, छेड़ दिये शासन अभियान।

पर पहुँच ले बाहर फूलन, बनगे राहय शक्ति महान।।


रॉबिन हुड मॉडल बन फूलन, रहे मीडिया जग जन छाय।

बन गरीब के बड़े मसीहा, वो तो बैंडिट क्वीन कहाय।।


निडर अदम्य साहसी बन तब, करत रहय जीवन संघर्ष।

शक्ति दस्यु नारी जिनगी मा, भरत रहय  नित नव उत्कर्ष।।


आत्मसमर्पण बात करिस तब, इंदिरा गांधी शासन काल।

मान धरे जिनगी जी ले अब, ऊँचा करके अपनो भाल।।


शर्त रखे कुछ फूलन देवी, सुन लौ बिनती हे सरकार।

पुलिस सामने नइ तो सौपँव, अस्त्र शस्त्र खुद अउ हथियार।।


मृत्युदंड के सजा मिले ना, कोई भी तो मोर गिरोह।

सजा मिले बस आठ बछर के, रहे दूर ना प्रेम बिछोह।। 


आत्मसमर्पण के गवाह हो, मोर सबो तो घर परिवार।

करौ शर्त मंजूर सबो ये, करौं समर्पण तब सरकार।।


सबो शर्त मंजूर करिस तब, उत्तर प्रदेश के सरकार।

जा फूलन जिनगी जी ले अब, हँसी खुशी मिल घर परिवार।।


सांसद बनके लोक सभा मा, सशक्त नारी नाम कमाय।

गजानंद जी धरे कलम ला, लिख लिख नारी शक्ति बताय।।


छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )


31 आल्हा छंद- *जी लौ मर लौ समाज खातिर*


कलप कलप हिरदे अब रोथे, देख दशा ला मोर समाज।

का बिधुना के मार परे हे, कोंन गिराये हे दुख गाज।।


भाई ला भाई नइ समझत, धरे चलत परबुधिया चाल।

कुमता मा सुमता रोवत हे, सपना पुरख़ा हे बेहाल।।


फरकत नइहे भुजा उधो के, मौन पड़े हे माधो दास।

अइसे लगथे दुश्मन-बैरी, चीथ-चीथ खा जाही माँस।।


काबर उबाल हे नइ मारत, तुँहर खून के खाँटी बूँद।

पढ़त पाहड़ा का मतलब के, चलथौ काबर आँखी मूँद।।


कोंन बचाही लाज काज अब, मगन पड़े सुख हो मशगूल।

अपने हा अपने के अंतस, आज चुभावत हावय शूल।।


गाँव-गाँव अउ शहर-शहर मा, लगे संगठन के बाजार।

तभो कहाँ ले कम होवत हे, समाज ऊपर अत्याचार।।


मुखिया मन दुखिया बन रोवत, सत्ता सुख के माँगत भीख।

कोंन सुनत हे पर समाज के, दर्द भरे पीरा अउ चीख।।


अपन बचा लौ स्वाभिमान ला, निज स्वारथ ला मन से छोड़।

सतनामी औ सतनामी बन, लेवव समाज ला अब जोड़।।


अपन लहू के कतरा कतरा, कर दौ समाज बर बलिदान।

आन मुसीबत जब जब पड़ही, अपन लुटा दौ तुम जी प्रान।।


गजानंद पात्रे के कहना, बाँध चलौ गठरी कस गाँठ।

जी लौ मर लौ समाज खातिर, जब तक ठाढ़े हावय ठाठ।।


✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)8889747888

23/11/2021


32 आल्हा छंद- अमर शहीद वीर नरायण


नमन करत हौं वो मइयाँ ला, दिस जनम नरायण वीर।

नमन करत हौं वो भुइयाँ ला, जेकर पावन माटी नीर।।


सन सत्रह सौ पँचानबे अउ, लगन घड़ी पावन शुभ वार।

जन- जन के तकलीफ हरे बर, वीर नरायण लिस अवतार।।


धाम गिरौदपुरी के मेड़ो, गाँव जुड़े हे सोनाखान।

राजा सोनाखनिहा के घर, जनम धरिस ये पूत महान।।


रहिस गोंडवाना पुरख़ा अउ, सारंगढ़ के माल गुजार।

राजगोंड ले बिंझवार बन, वीर नरायण भरे हुँकार।।


स्वतंत्रता पहिली सेनानी, छत्तीसगढ़ के मान बढ़ाय।

गैर फिरंगी से लड़-लड़ जे, जल जंगल अधिकार दिलाय।।


सात हाथ कद काठी ऊँचा, बदन गठीला बड़ मन भाय।

भुजा बँधाये पारस चमके, देखत मा बैरी थर्राय।।


वीर नरायण पराक्रमी अउ, शूरवीर गुरु बालकदास।

सँगवारी सुख दुख के दून्नों, रहय मित्रता खासमखास।।


शोभा बरनन कहत बनय जब, घोड़ा मा होवय असवार।

धर्मी राजा के होवय तब, गली-गली मा जय जयकार।।


दीन-दुखी के सदा हितैषी, मातृभूमि के रहय मितान।

जल जंगल भुइयाँ के रक्षक, समझे जे हा दर्द किसान।।


सन अट्ठारह सौ छप्पन मा, पड़े रहय जब घोर अकाल।

फटे अदरमा वीर नरायण, देख प्रजा दुख मा बेहाल।।


साथ धरे तब किसान मन ला, गये गाँव वो हा कसडोल।

लूटे अन्न जमाखोरी के, वीर नरायण धावा बोल।।


करिस शिकायत जमाखोर मन, अंग्रेजन इलियट दरबार।

पकड़ निकालव वीर नरायण, सजा दिलावव तुम सरकार।।


भनक लगिस जब वीर नरायण, पाछू पड़गे हे सरकार।

कुर्रूपाट डोंगरी मा छुपगे, जिहाँ कटाकट वन भरमार।।


खोजे निकलिस गुरु बालक तब, अपन सखा के प्राण बचाय।

रखिस छुपा भंडारपुरी मा, कुर्रूपाट डोंगरी ले लाय।।


वीर नरायण के बहनोई, बनके भारी तब गद्दार।

खुफिया बन बंधक बनवा दिस, पता बता इलियट सरकार।।


स्तम्भ चौक रायपुर शहर के, फाँसी मा तब दिस लटकाय।

वीर नरायण शहीद होगे, लिखत लिखत आँसू भर आय।।


अट्ठारह सौ सन्तावन के, काल रात्रि बनगे इतिहास।

खो के बेटा वीर नरायण, भारत भुइयाँ हवे उदास।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/12/2021


( जन कवि- स्व.कोदूराम दलित जी के 54 वीं पुण्यतिथि मा काव्य सुमन सादर समर्पित)🙏💐 33 आल्हा छंद- सुरता पुरखा मन के करके सुरता पुरखा मन के, चरन नवावँव मँय हा माथ। समझ धरोहर मान रखव जी, मिलय कृपा के हर पल साथ।। इही कड़ी मा जिला दुर्ग के, अर्जुन्दा टिकरी हे गाँव। जनम लिये साहित्य पुरोधा, कोदूराम दलित हे नाँव।। पाँच मार्च उन्निस सौ दस के, दिन पावन राहय शनिवार। माता जाई के गोदी मा, कोदूराम लिये अवतार।। रामभरोसा पिता कृषक के, जग मा बढ़हाये बर नाँव। कलम सिपाही जनम लिये जी, बगराये सुमता के छाँव।। बचपन राहय सरल सादगी, धरे गाँव सुख-दुख परिवेश। खेत बाग बलखावत नदिया, भरिस काव्य मन रंग विशेष।। होनहार बिरवान सहीं ये, बनके जग मा चिकना पात। अलख जगाये ज्ञान दीप बन, नीति धरम के बोलय बात।। छंद विधा के पहला कवि जे, कुण्डलिया रचना रस खास। रखे बानगी छत्तीसगढ़ी, चल के राह कबीरा दास।। गाँधीवादी विचार धारा, देश प्रेम प्रति मन मा भाव। देश समाज सुधारक कवि जे, खादी वस्त्र रखे पहिनाव।। ढ़ोंग रूढ़िवादी के ऊपर, काव्य डंड के करे प्रहार। तर्कशील विज्ञानिकवादी, शोधपरक निज नेक विचार।। गोठ सियानी उँखर रचना, जग-जन ला रस्ता दिखलाय। ठेठ बोल छत्तीसगढ़ी के, भावी पीढ़ी लाज बचाय।। पुण्यतिथि गिरधर कविवर के, गजानंद जी करे बखान। जतका लिखहूँ कम पड़ जाही, कोदूराम दलित गुनगान।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़ी)


34 आल्हा छंद- आज पुकारत हे समाज ला आज पुकारत हे समाज ला, बलिदानी गुरु बालकदास। दशा-दिशा दिन-दिन हे बिगड़त, टूटत हे सुमता विश्वास।। सबो डहर अँधियारी छाये, भाई-भाई मा तकरार। कोट कचहरी मा धन फूँके, लुलवावत लइका परिवार।। आँख तरेरत अपने ला हे, दूसर बर मुँह बाँह लुकाय। मति गति सुख चैन हजाये, गोठ सियानी नइ तो भाय। पाई-पाई पुरखा जोरे, बेटा सब ला करत बिनाश।। आज पुकारत हे समाज ला, बलिदानी गुरु बालकदास।। पद पैसा धन मोह भुलाये, बन बाबू अफसर कुछ आज। दया मया घर गाँव भुलाये, झाँके नइ तो कभू समाज।। भरे बुढापा मजबूरी मा, मिटे जवानी के जब जोश। चार काँध पाये समाज के, आथे जी इन ला तब होश।। कर्ज समाज चुका लौ भाई, नइ तो जीते जी हौ लाश। आज पुकारत हे समाज ला, बलिदानी गुरु बालकदास।। रीति नीति संस्कार मिटत हे, खानी-बानी मा बदलाव। बाढ़ कुरीति बढ़े बउराये, बीच नदी मा हे अब नाव।। तथाकथित के जाप करत हें, पाँव फँसे हे दलदल ढ़ोंग। चंदन चोवा भूल गये हें, माथा लाली बंदन ओंग।। गजानंद के अरजी सुन लौ, बाँधव मन मा फिर से आस। आ जा आज समाज जगा जा, बलिदानी गुरु बालकदास।। इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/06/2023


35 आल्हा छंद- *कुमता देवव मन ले टार* चढ़व चढ़व सुमता के सीढ़ी, कुमता देवव मन ले टार। गढ़व सुराज सुजान बने सब, लावव समाज मा उजियार।। तोर मोर के छोड़व हिजगा, करना हे मिलके अब काज। धान कटोरा सोन चिरईया, के रखना हे हम ला लाज।। एक खून अउ एक कोंख हे, मनखे मनखे एक समान। आग हवा जल धरती अंबर, इही असल समझौ भगवान।। जात पात के करौ बिदाई, मानवता के बन रखवार। चढ़व चढ़व सुमता के सीढ़ी, कुमता देवव मन ले टार।।1 सर्व धर्म सम भाव रखौ जी, कहना घासी संत कबीर। पर सेवा उपकार करौ जी, दीन दुखी के हर लौ पीर।। द्वेष भावना मन ले टारव, चगले बनके खाज समाज। तुँहर दिखाये रद्दा चल के, भावी पीढ़ी करही नाज।। ऊँच नीच अउ भेदभाव ले, होथे समाज मा अँधियार। चढ़व चढ़व सुमता के सीढ़ी, कुमता देवव मन ले टार।।2 भाग भरोसा बइठव झन तुम, महिनत के फल होथे मीठ। वो मनखे हा मनखे नोहय, फँसे ढ़ोंग मा बन के ढीठ।। सुफल मनोरथ काम सजे तब, रहे बुराई ले जब दूर। मनुज सुवारथ मा झन डूबव, होथे जिनगी चकनाचूर।। शांति प्रेम के दूत बने सब, बाँटव जग मा मया दुलार। चढ़व चढ़व सुमता के सीढ़ी, कुमता देवव मन ले टार।।3 रचना- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/06/2023


छत्तीसगढ़ी छेर छेरा तिहार के आप सबो ला गाड़ा गाड़ा बधाई🌷 आल्हा छंद- कतका सुग्घर लागे संगी, छत्तीसगढ़ के परब तिहार। छेरिक छेरा लइका बोलँय, माई कोठी हेरव धान।। आव सुनावँव तुँहला संगी, परब छेर छेरा के मान। दया दान अउ प्रीत भरे हे, माई कोठी के जी धान।। पूस महीना पाख अँजोरी, नवा सुरुज के नवा अँजोर। धान कटोरी महतारी हा, सदा रखे हे मया सँजोर।। गाँव शहर अउ गली-गली मा, होगे देखव नवा बिहान। चारो कोती गूँजत हावय, हमर छेर छेरा के गान।। मया दुवारी खुल्ला रखके, सब झन करिहौ सुग्घर दान। दया बिराजे मन मा सबके, धरती दाई दे वरदान।। 🖊️ इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 25/01/2024 बिलासपुर (छ. ग.)


आल्हा छंद- फहर-फहर फहरावत हावय, सादा झंडा सत्य निशान। गाँव-गाँव अउ शहर-शहर मा, सतनामी के बन के शान।। चार कोन के चौंरा जे हा, चार दिशा के हवय प्रतीक। जैतखाम इक्कीस हाथ के, जग ला लागत हे बड़ नीक।। जैतखाम के तीन हूक मा, सत्य अहिंसा प्रेम अटूट। सादा झंडा राह सुझोवत, झन डालव आपस मा फूट।। कलश सजे हे छोर मुकुट बन, कहत हवय मन भर लौ ज्ञान।। फहर फहर फहरावत हावय, सादा झंडा सत्य निशान।।1 पान सुपारी नरियर साजे, जलत हवय जी जगमग जोत। झाँझ मँजीरा मादर बाजे, चौक पुराये चंदन पोत।। महिमा गाये मिल नर नारी, जयकारा करके सतनाम। संत मनौती अपन मनावय, पूरा होवय बिगड़े काम।। माह दिसम्बर पावन महिना, पंथी मंगल गूँजय गान। फहर फहर फहरावत हावय, सादा झंडा सत्य निशान।।2 सत्य पुजारी सतनामी ये, अनुयाई गुरु घासीदास। अडिग खड़े हें सत रक्षा बर, बन सुमता समता विस्वास।। मानवता के मान रखे नित, समरसता के बोलय बोल। हितवा के मितवा बन जावय, मीठ मया के मधुरस घोल।। पाठ पढ़ावय भाईचारा, माने सब ला एक समान। फहर फहर फहरावत हावय, सादा झंडा सत्य निशान।।3 रचना- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/06/2023


आल्हा छंद- *सत्य पुजारी सतनामी अन*

सत्य पुजारी सतनामी अन, अनुवाई गुरु घासीदास।

सत के खातिर जान लुटादन, झूठ कभू नइ आवय रास।।


नैन सजा पुरखा के सपना, जीथन हम तो सीना तान।

शान झुके झन मान गिरे झन, बात हमेशा रखथन ध्यान।।

अपन बात के खर्रा होथन, झूठ कपट ले रहिथन दूर।

स्वाभिमान रख जिनगी जीथन, झुकन नही हम हो मजबूर।।

अमरदास गुरु के हम बानी, परछाई गुरु बालकदास।

सत के खातिर जान लुटादन, झूठ कभू नइ आवय रास।।1


भुजा समाये गोला बारुद, रग-रग मा हे जोश जुनून।

करय गरजना जब सतनामी, भींगय बैरी के पतलून।।

नाम सुने नइ सतनामी के, कोनों नइ तो पावय पार।

फूँक उड़ा दन बैरी मन ला, अरे कहत बर हन तलवार।।

साम दाम दँड कूटनीति के, तोड़न हम तो पल मा फाँस।

सत के खातिर जान लुटादन, झूठ कभू नइ आवय रास।।2


गाँव गली अउ शहर नगर मा, हमर नाम के उड़थे शोर।

अजबे बाना गजबे ताना, देथे सब ला जी झकझोर।।

लिखे गजानंद छंद आल्हा, सुन पढ़ मन मा भरय हुलास।

सत्य पुजारी सतनामी अन, अनुवाई हम घासीदास।।3


रचना- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


आल्हा छंद गीत- मोरो नाम हे आदिवासी

वीर नरायन बिरसा मुंडा, गुंडाधुर के छाती ताँव।

मोरो नाम हे आदिवासी, पुरखा मनके थाती ताँव।।


केशकाल के मैं हा घाटी, बस्तर के मैं माटी ताँव।

इंद्रावती नदी के पानी, मूलनिवासी खाँटी ताँव।।

बैलाडीला के लोहाटी, कोरंडम मदमाती ताँव।

मोरो नाम हे आदिवासी, पुरखा मनके थाती ताँव।।


जल प्रपात मैं चित्रकोट के, बारसूर के सातो धार।

शिमला अँव मैं मैनपाट के, गुफा कहाथँव कुटुंबसार।।

घोर घना वन चैतुरगढ़ के, जशपुर छाँव सुहाती ताँव।

मोरो नाम हे आदिवासी, पुरखा मनके थाती ताँव।।


तीरथगढ़ के मैं तो झरना, गुड़िया पर्वत मैं कांकेर।

विजयादशमी जगदलपुर के, मड़ई नारायणपुर के शेर।।

जल जंगल के मालिक होके, दुख के रात पहाती ताँव।

मोरो नाम हे आदिवासी, पुरखा मन के थाती ताँव।।


-----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/08/2024

****************************************

आल्हा छंद- *गुरु दर्शनीय धाम*


आल्हा छंद गजानंद लिखय, गुरु वंदन कर बारम्बार।

सतनामी सत धाम धरा के, करत हवय बरनन विस्तार।।


पावन धाम गिरौदपुरी हे, जनम भूमि गुरु घासीदास।

अमरौतिन दाई के ललना, महँगू दास बबा के आस।।

सत्यनाम के अलख जगाइस, मानवता के देइस पाठ।

मनखे-मनखे एक बताइस, ऊँच-नीच के तोड़िस गाँठ।।

छात पहाड़ी जोग नदी अउ, पावन बहरा खेत सुहाय।

औंरा-धौंरा पेड़ तरी गुरु, नाम-पान ला सत के पाय।।

धुनी रमाइस ज्ञान लखाइस, ढोंग रूढ़ि पर करिस प्रहार।

आल्हा छंद गजानंद लिखय, गुरु वंदन कर बारम्बार।।1


धाम हवय भंडारपुरी गुरु, मोती महल गजब मन भाय।

बालकदास समाधि जिहाँ हे, गुरु मेला दशहरा भराय।।

राज्याभिषेक गुरु के होइस, पाइस राजा के तो मान।

हाथी घोड़ा मा चढ़ निकले, राजा गुरु सीना ला तान।।

मोतीमहल शिखर मा बइठे, देत तीन बंदर संदेश।

सत्य आचरण ले ही बदले, मानव मन जग के परिवेश।।

सतगुरु बालकदास इँहे ले, करिस पंथ सतनाम प्रचार।

आल्हा छंद गजानंद लिखय, गुरु वंदन कर बारम्बार।।2


अब तेलासीपुरी धाम के, सुन लौ संतो तुम इतिहास।

तपोभूमि गुरु अमरदास के, कर्मभूमि गुरु घासीदास।।

गुरु महिमा ले होय प्रभावित, राजा भूमि करिस जी दान।

जेमा बाड़ा ला बनवाइस, सतगुरु बालकदास महान।।

फेर बाद मा कुछ शातिर मन, चालाकी कर लिन हथियाय।

जेकर बर तब लड़िस लड़ाई, गुरु आसकरण दास कहाय।।

जेल गइस पर हार न मानिस, झुकगे आखिर मा सरकार।

आल्हा छन्द गजानंद लिखय, गुरु वंदन कर बारम्बार।।3


क्रमशः.........

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

****************************************

आल्हा छंद- *नारी के गहना*


आल्हा छंद लिखे हौं संगी, पढ़ लेहू सब गुनिक सुजान।

नारी के गहना के बरनन, गजानंद जी करय बखान।।


आठो अंग सजावय गहना, सुग्घर मुड़ से लेके पाँव।

आवव तुँहला हवँव बतावत, एक-एक कर सबके नाँव।।


मुड़ मा सिंदूर माँगमोती अउ, टिकली बिंदी माथ सुहाय।

कान म तरकी झुमका झूले, नाक म फुल्ली खिनवा भाय।।


नौलक्खा के हार गला मा, धनमाला सुतिया कलदार।

कटुआ चंपाकली दुलारी, मंगलसूत्र फबे हे यार।।


बाँह नाँगमोरी अउ बहुटा, लपटे पहुची बाजूबंद।

कलिवारी ताबीज घलो हा, गहना आय गला के चंद।।


हाथ कंगना चूड़ी ककनी, बनोरिया हर्रइया भाय।

हाथफूल अउ चेन कड़ा हा, सुग्घर ये हा हाथ सुहाय।।


सात लरी के कमर करधनी, नारी के ये सुख सिंगार।

सोहे गजब कमरपट्टा हा, कमर लपेटा गजबे मार।।


पाँव म पैरी साँटी टोड़ा, बिछिया लच्छा अउ पैजेब।

राजमोल के गहना पहिने, मिट जाथे मन ले सब ऐब।।


छत्तीसगढ़िया नारी मन के, ये सब सुग्घर गहना आय।

लिखके आल्हा छंद म संगी, गजानंद हे आज बताय।। 


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/07/2025

***************************************

आल्हा छंद- *जाति-प्रथा*


जाति-धरम ले ऊपर उठके, गढ़ लौ संगी नेक समाज।

काबर देख छुवावत हावय, मनखे ले मनखे हा आज।।


जात जाति के जावत नइहे, उल्टा रूप धरे विकराल।

साध सुवारथ कपटी मनखे, शकुनी जइसे खेलत चाल।।


तार-तार कर मानवता ला, चींथत हें बन कउँवा बाज।

जाति-धरम ले ऊपर उठके, गढ़ लौ संगी नेक समाज।।


श्रेष्ठ जनम ले कोनों नइहे, करम करे ले बने महान।

संत कबीर कहे गुरु घासी, मनखे-मनखे एक समान।।


जाति-पाति अउ छुआछूत हा, फइले हावय बनके खाज।

जाति-धरम ले ऊपर उठके, गढ़ लौ संगी नेक समाज।।


एक कोख ले जनम धरे सब, एक सबो के तन अउ चाम।

रंग लहू तन एक समाये, मिले जगत मा मनखे नाम।।


मुक्ति जाति ले नइ हो पावत, नइ तो आवत हावय लाज।

जाति-धरम ले ऊपर उठके, गढ़ लौ संगी नेक समाज।।


सुमता के डँगनी मा बइठे, पड़की मैना अउ मंजूर।

एक घाट मा पानी पीयत, हावय चीता अउ लंगूर।।


एक खेत मा बाँध डरिन जी, सुमता ला सफरी दुबराज।

जाति-धरम ले ऊपर उठके, गढ़ लौ संगी नेक समाज।।


पर अबूझ मनखे नइ समझत, जाति-धरम ले जग नुकसान।

जाति श्रेष्ठ के ठप्पा ले के, बाँटत हें ज्ञानी बन ज्ञान।।


जाग जगा ले गजानंद तँय, भावी पीढ़ी करही नाज।

जाति-धरम ले ऊपर उठके, गढ़ लौ संगी नेक समाज।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/08/2025

-----------++++++++++++++++++++++++++++------

आल्हा छंद- *किन्नर*


दुख भारी हे किन्नर मन के, पग-पग बगरे ताना शूल।

देह गढ़े प्रभु अइसे काबर, कोंन जनम के होगे भूल।।


किन्नर जान अपन ललना ला, मूरत बन माँ होय निढाल।

लोक लाज मर्यादा खातिर, देथें तब घर गाँव निकाल।।

मनखे ला मनखे नइ समझे, हे धिक्कार समाज उसूल।।

दुख भारी हे किन्नर मन के, पग-पग बगरे ताना शूल।।


ना नर मा हे ना नारी मा, गिनती इँखरो आज समाज।

हेय नजर ले देखय मनखे, रोज गिराये दुख के गाज।।

मिले अनादर जग मा सब ले, करथे हँसके तभो कबूल।

दुख भारी हे किन्नर मन के, पग-पग बगरे ताना शूल।।


रूप अर्धनारीश्वर पाये, पाये अलगे हे पहिचान।

जिंखर दुवा मा हवय समाये, सारी दुनिया के कल्यान।।

ममता के अँचरा मा राखे, रहिथे जे हा सुख के फूल।।

दुख भारी हे किन्नर मन के, पग-पग बगरे ताना शूल।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/08/2025

----------------------------------------------------------


आल्हा छंद- *गुरु बालकदास*


माता सफुरा के ललना अउ, गुरु घासी के बन विश्वास।

भादो कृष्ण अष्टमी के दिन, जनम धरे गुरु बालकदास।।1


दगर-दगर जी काया दमके, बदन गठीला गजब सुहाय।

भुजा बँधाये पारस चमके, देखत सबके मन ला भाय।।2


मुख मुस्कान लगे मनभावन, किलकारी हा शेर दहाड़।

दिखे बज्र फौलादी छाती, लोहा पथरा कस जी हाड़।।3


गाँव गली मा शोर उड़े जी, हर मुख मा महिमा गुणगान।

माँ सफुरा के कोख अवतरे, हे गुरु बालक वीर महान।।4


मातु पिता मिल नाम धरिन तब, वीर प्रतापी बालकदास।

काज समाज करे बर अगुवा, बनके करही नाम उजास।।5


युद्ध अखाड़ा मा पारंगत, बचपन ले गुरु बालकदास।

आँख दिखा कहुँ देखय बैरी, छिन लेवय तब ऊँखर साँस।।6


सतनामी कुल जनम धरे गुरु, गुरु घासी के अंश कहाय।

सत्य धरम के रखवाला बन, आगू-आगू पाँव बढ़ाय।।7


जेन समय गुरु जनम धरिस तब, रहिस मराठा शासन काल।

जोर हुकूमत अंग्रेजन के, कूटनीति के फइले जाल।।8


सामंती अउ पिंडारी मन, खूब मचावँय तब उत्पात।

खड़े फसल ला काट मढ़ाँवय, करँय सदा इज्जत मा घात।।9


तार-तार कर मर्यादा ला, करँय छोट के उन उपहास।

देख समाज दशा ला सोचिस, मन मा तब गुरु बालकदास।।10


कइसे बचही घर अउ इज्जत, कइसे जगही मोर समाज।

इही सोच गुरु अगुवाई के, पहनिस मुड़ मा तुरते ताज।।11


बाँध मुड़ी मा सत के फेटा, चढ़े दुलुरवा हाथी जाय।

लगा रावटी सत्य धरम के, सब संतो मा सुमत मढ़ाय।।12


जागव-जागव सतनामी हो, समय नहीं सोये के आज।

देखव कइसे सामंती मन, हवँय गिरावत निस दिन गाज।।13


बाँध चलव सुमता के डोरी, छोड़व आपस के तकरार।

दुश्मन के फन ला कुचले बर, हो जावव अब सब तइयार।।14


शूरवीर अव सतनामी तुम, नारनौल हा हवय गवाह।

औरंगजेब झुकाये माथा, नइ पाइस हमरो जी थाह।।15


गाथा पुरखा गा-गा गुरु जी, सबके तन-मन जोश जगाय।

शेर बने गरजौ सतनामी, झन कोनों अब आँख दिखाय।।16


इही बात ला गुरु बालक जी, लगे रावटी मा समझाय।

भरय हौसला सबके मन मा, युद्ध अखाड़ा संग सिखाय।।17


रक्षा करना खुद के सीखव, सीखव रखे धरम ईमान।

महानता सतनाम पंथ के, समरसता के देवय ज्ञान।।18


जगह-जगह मा लगय रावटी, चलय अखाड़ा कुश्ती युद्ध।

सत संदेश दिये गुरु बालक, अंतस राखव पावन शुद्ध।।19


जल जंगल जमीन के रक्षा, के बाना ला रखके साथ।

भूस्वामी अधिकार दिलाये, सदा बढ़ाइस गुरु जी हाथ।।20

*******************************************

आल्हा छंद- छत्तीसगढ़ वंदना


पाँव पखारॅंव महतारी के, बंधन करथौं बारंबार।

छत्तीसगढ़ के माटी चंदन, जेकर महिमा अपरंपार।।


अरपा पैरी के कल-कल स्वर, महानदी के निरमल धार।

धान कटोरा दुनिया कहिथे, भरे अन्न के हे भंडार।।


हाथ म सोहय हॅंसिया-खुरपी, मोर मुकुट साजे हे माथ।

फाॅंद करम सॅंग बइला नाॅंगर, खेत कमाथन मिल हम साथ।।


बासी-चटनी अमरित लागे, बरा-फरा के स्वाद अनूप।

सहज-सरल हम छत्तीसगढ़िया, जइसे कंचन काया रूप।।


तीज हरेली रक्षाबंधन, दीवाली होली मिल संग।

गले लगाथन परब मनाथन, दया-मया के धरके रंग।


सुवा ददरिया करमा गाथन, नाचन गावन पन्थी गीत।

संस्कृति अउ संस्कार निभाथन, सब ले जोड़े रखथन प्रीत।।


तीजन बाई के पॅंडवानी, दुनिया मा हावय परसिद्ध।

गाके भरथरी सुरुज बाई, कर दिस संस्कृति ला समरिद्ध।।


चित्रकोट के झरना देखव, सरग उतरगे आपे आप।

बीर बस्तर के माटी पावन, जिहाँ गुॅंजे मांदल के थाप।।


ननिहाल इही रामचंद्र के, कौशिल्या के ममता धाम।

शबरी के जूठा फल खाइस, मर्यादा पुरुषोत्तम राम।।


वीर नरायन सिंह बलिदानी, भुइॅंया बर जो डारे प्रान।

गुरु घासी के अमरित वाणी, मनखे-मनखे एक समान।।


माटी खातिर जान लुटावन, अइसन हमरो हे कुल-रीत।

मधुरस हे बोली भाखा मा, सबके मन ला लेथन जीत।।


जय हो छत्तीसगढ़ भुइँया के, जय हो माटी मोर महान।

सब ले बढ़िया छत्तीसगढ़िया, जग मा राखव येकर मान।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/03/2026


आल्हा छंद- *संत शिरोमणि गुरु घासीदास जी*


सत के डंका बाजत हे जी, धाम गिरौदपुरी मा आज।

जोड़ा ऊँचा खाम गड़े हे, बनके सत्य प्रतीक समाज।।


धन्य-धन्य अमरौतिन दाई, बंदन बाबा महँगू दास।

जनम तुँहर कोरा मा लेइस, सत्यपुरुष बन सबके आस।।


नाम धराइस गुरु घासी जी, मुख मा तेज सुरुज के जोत।

बचपन ले ही मन मा जागिस, दया धरम के पावन स्रोत।।


छात पहाड़ी मा तप साधिस, सत्यपुरुष मा रख विश्वास

औंरा-धौंरा झाड़ तरी मा, पाइस हे गुरु ज्ञान प्रकाश।।


मनखे-मनखे एक बरोबर, देइस गुरु घासी संदेश।

ऊँच-नीच अउ भेद-भाव के, मेटिस सबके मन ले क्लेश।।


सत्य अहिंसा पाठ पढ़ाइस, सबो जीव के कर परवाह। 

नारी के सम्मान बढ़ाइस, दिखलाइस गुरु सत के राह।।


खाम गड़े हे सत्यनाम के, छूवत हे जे ऊँच अगास।

सेत धजा फहरत हे सुग्घर, नाम जपत गुरु घासीदास।।


चरन पखारँव गुरु घासी के, रोज नवावँव पग मा माथ।

छत्तीसगढ़ के माटी पावन, मिलय कृपा गुरु के नित साथ।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/04/2026


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

दोहा छंद - गुरु (छत्तीसगढ़ी)

 दोहा छंद-  गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर। अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।01 गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम। तोर ...