मंगलवार, 16 अगस्त 2022

कब होही नवा बिहान ?

 लावणी छंद गीत- *​कब होही नवा बिहान सँगी*


​कब होही नवा बिहान सँगी, छत्तीसगढ़ के भुइँया मा।

परदेसी मन राज करत हें, हम हन भूल भुलइया मा।।


धान कटोरा महतारी के, लइकन भूखन सोवत हें।

हवँय धँधाये अपने घर मा, सुसक-सुसक के रोवत हें।।

बन दहरा कस मछरी भाई, भुँजा गयेन तिलइया मा।

कब होही नवा बिहान सँगी, छत्तीसगढ़ के भुइँया मा।।1

अरपा पैरी महानदी के, पानी सुक्खा परगे हे।

डटे कारखाना मा देखव, खेत-खार घर जरगे हे।।

उन झड़कत हे दूध मलाई, हम हन पेज पसइया मा।

कब होही नवा बिहान सँगी छत्तीसगढ़ के भुइँया मा।।2


अन्न उगइया भूख मरत हे, मान दिनों दिन खोवत हे।

परदेसी मन सुख रसदा मा, दुख के काँटा बोवत हे।।

मुरझाये तुलसी के चौंरा, विष घुरगे पुरवइया मा।

कब होही नवा बिहान सँगी, छत्तीसगढ़ के भुइँया मा।।3


धनहा डोली परता परगे, रुख राई सब कटगे जी।

भाई बर भाई बैरी अब, डीह डोंगरी बँटगे जी।।

गुरुवा चारा बर भटकत हे, दूध दही नइ दइहा मा।

कब होही नवा बिहान सँगी, छत्तीसगढ़ के भुइँया मा।।4


हाल किसान बतावँव काला, बतर किरा कस जिनगी हे।

ना जाने कब सुलग जही ये, दुख माचिस के तिलगी हे।

धुँआ उठत हे कुमता के अब, देखव तो घर कुरिया मा।

कब होही नवा बिहान सँगी, छत्तीसगढ़ के भुइँया मा।।5


छत्तीसगढ़ी बोले बर तो, लोगन आज लजावत हें।

खुद के तीज तिहार भुलागें, पर के मान बढ़ावत हें।।

सब भूल धरोहर संस्कृति ला, नाचे ता-ता-थइया मा।

कब होही नवा बिहान सँगी, छत्तीसगढ़ के भुइँया मा।।6

जागव-जागव छत्तीसगढ़िया, कतका दिन ले सोहू जी।

अपन मयारू माटी खातिर, कब धर आँसू रोहू जी।।

पाँव बढ़ावव आवव मिलके, सुमता के सुख छइँहा मा।

तब होही नवा बिहान सँगी, छत्तीसगढ़ के भुइँया मा।।7

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे (सत्यबोध) 

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)27/06/2026

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