सुंदरी सवैया- गुरु
अँधियार मिटे सत जोत जले गुरु ज्ञान बिना भटका जग खाबे।
पतवार बने गुरु बीच नदी सुख के नदिया डुबकी ग लगाबे।।
पद मान मिले पहिचान मिले किरपा गुरु पा भव ले तर जाबे।।
गुरु के पग मा बलिहार गजानन ये जिनगी तँय धन्य बनाबे।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
सच जोत जला-
सच के रसदा दुख ही दुख हे अउ झूठ करै बड़ जी किलकारी ।
सच रोवत हे धरके मुड़ ला जग मा नइ हे अब मोर पुछारी ।
घपटे रतिहा घुघवा नरियावय पाप कहै हँव मैं बनवारी ।
मिल दूर भगावव झूठ बसे सच जोत जला कर लौ उजियारी ।।
सच मान कहाँ मिलथे
सुख मा सब तो हितवा बनथे अउ देख दुखी सब दूर भगे हे।
सुख मा दुख मा बनथे मितवा सच जान उही जग मीत लगे हे।।
खुद मान सुवारथ खातिर देखव हे मनखे जग खूब ठगे हे।
सच मान कहाँ मिलथे दुनिया लबरा मन के अब भाग जगे हे।।
सरहा अउ जोधइ
पहिने मुड़ मा पगड़ी अउ हाथ धरे सुकला कर सार ग लोटा।
सरहा अउ जोधइ नाम सुने तब काँपय दुश्मन के बड़ पोटा।।
लहुटे जस पारस बाँह दुनो अउ पाँव रहै ग गजानन मोटा।
गरजे बिघवा कस बीर दुनो तब मार सुखावय दुश्मन टोटा।।
गुरु बालक दास चले सँग मा बनके मुखिया तलवार धरे हे।
जे हितवा बर गा मितवा अउ दीन दुखी मन के उपकार करे हे।।
अउ जे हर आँख दिखावय वोखर ले शेर सहीं ललकार भरे हे।
पहिचान धरे सत सेत धजा नइतो गुरु बालक दास डरे हे।।
पुरखा सुरता
सुरता कर लौ पुरखा मन ला अनमोल धरोहर जे मन हावै।
मनखे मनखे मन जोर रखे सुमता समता के रीत बतावै।।
कर साहित के रचना बढ़िया उजियार भरे सत राह दिखावै।।
नित जोर गजानन हाथ दुनों चरणों पुरखा नव माथ नवावै।।
सतनाम बरोबर नाम कहाँ?
लड़थे मनखे अब धर्म धरे नित आपस मा तकरार बने हे।
लिगरी करथे घर नाश सदा मन द्वेष घलो तलवार बने हे।।
गढ़ लौ जिनगी सत राह धरे सुमता बर जे रखवार बने हे।
सतनाम बरोबर नाम कहाँ गुरु ज्ञान इँहा पतवार बने हे।।
रखिहौ बिसवास सदा गुरु मा
चलिहौ सत के रसदा धर के करिहौ पर के झन दोष बुराई। कर लौ मन उज्जर दीप बरोबर सीप बरोबर हो तन भाई।। रखिहौ बिसवास सदा गुरु मा मिलही तब तो यश मान बड़ाई। सतनाम पिता सब ला जग मा नित मानवता सत पाठ पढ़ाई।।
सतनाम गजानन हे अनमोल
गुरु ज्ञान धरे सत मारग मा चल लौ अँधियार सबो मिट जाही।
मन ध्यान लगा गुरु के चरणों सगरी दुख हा पल मा कट जाही।।
धरही जग झूठ जिहाँ मनखे घुनही कस ये तन ला चट जाही।
सतनाम गजानन हे अनमोल धरोहर संतन मा बट जाही।।
सतनाम महा गुरु मंत्र
सतनाम महा गुरु मंत्र हवे जग मा रइही सत हा अविनाशी।
गुरु नानक संत कबीर जपे रविदास बने सत घाट निवासी।।
सतनाम प्रचार करे जग मा मनखे सब एक कहे गुरु घासी।
करथे पग वंदन नित्य गजानन भाव धरे बनके गुरु दासी।।
सुमता सुखदाई
कुमता करथे घर द्वार विनाश धरौ मन मा सुमता सुखदाई।
पर के कहना धरके झन आपस मा लड़हू सुन लौ तुम भाई।।
गिधवा बनके तन नोंचत हे अब कोंन सुराज करै अगुवाई।
सब देख गजानन के हिरदे मन रोवत हे सुन लौ करलाई।।
सत थाम गजानन लौ बढ़ लौ
गुरु बालक दास कहे सुन लौ बढ़ आज समाज बनौ रखवाला।
धर के चल लौ कहना गुरु के गर मा पहिनौ सुमता सत माला।।
पहिचान करौ कपटी मन के कुमता धर थामत हे दुख ताला।
सत थाम गजानन लौ बढ़ लौ तब तो मिलही मन भोर उजाला।।
बरसात
छलके नदिया नरवा तरिया बरसात लगे गिरथे बड़ पानी।
दुखिया मन के छितका कुरिया चुहथे परवा दुख घोर चुहानी।।
सँग नाँगर जाँगर रोवत हे सँग रोवत हे अब खेत किसानी।।
धर आय दुकाल हवे पनिया कइसे बितही दुख मा जिनगानी।।

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