छप्पय मकरन्द
कइसे सधही राग, कहाँ सुर लय ला पाबो ।
करव छंद लय पाठ, तभे तो सुंदर गाबो ।।
फोकट रचना जान, बिना जाने गा लय ला ।
करौ झिझक ला दूर, बसे जे मन के भय ला ।।
अलग अलग सुर ताल हे, हमर लिखे सब छंद मा ।
तन मन हा ममहाय जी, ये छप्पय मकरन्द मा ।।
सत्य पुरुष अवतार गुरु
पाँव खड़ाऊ तोर, माथ मा चन्दन सोहे ।
सेत जनेऊ अंग, गला मा कंठी मोहे ।।
जपे नाम सतनाम, ज्ञान के अलख जगाये ।
पाठ पढ़ा सद्भाव, तहीं गुरु सन्त कहाये ।।
पाप झूठ भव अँधियार ला, करे तहीं उजियार गुरु ।
जीव चराचर माला जपे, सत्य पुरुष अवतार गुरु ।।
सतनामी ये लाल
चरण कमल मा माथ, नवावँव जी गुरु घासी ।
अतके अरजी मोर, सुनव सतगुरु अविनासी ।।
लहराहूँ जग तोर, सदा मँय झंडा सादा ।
सतनामी ये लाल, करत हे सच्चा वादा ।।
तन मा जब तक जान हो, सत भाखा ईमान हो ।
वंदन चंदन माथ हो, गुरु के किरपा साथ हो ।।
गुरु जयंती
सजे हवय घर द्वार, दिखत सुघ्घर आँगन हा ।
देख जयंती आज, सबो के हरसत मन हा ।।
मन मा जगे उमंग, जयंती गुरु के आगे ।
सत के जोड़ा खाम, सेत झंडा लहरागे ।।
हवै जयंती आज जी, बाबा घासीदास के ।
झोक बधाई मोर जी, श्रद्धा अउ विश्वास के ।।
फूल सुमत के
कोंन ख़िलावय फूल, सुमत के अँगना महकय ।
गाँव गली अउ खोर, मया के पंछी चहकय ।।
समता के नव भोर, बढ़ावय भाईचारा ।
पुन्नी कस हर रात, मिटावय जग अँधियारा ।।
ढूँढ़ आदमी नेक जी, द्वेष भाव ला फेंक जी ।
लोभ मोह के सामने, झन माथा ला टेक जी ।।
मीठा बानी बोल
राजा हो या रंक, सबो ला जाना परही ।
हाय हाय कर जोर, चीज के झन तँय खरही ।।
आये खाली हाथ, चले जाना हे सुन्ना ।
झाँक अपन मन द्वार, खात हे भारी घुन्ना ।।
जग माया बाजार हे, सोंच समझ कर मोल जी ।
जी ले जग मा प्रेम से, मीठा बानी बोल जी ।।
जिनगी हे दिन चार
जप ले गुरु के नाम, मुक्ति मिलही जी चोला ।
भवसागर ले पार, लगाही गुरु जी तोला ।।
नइ आवय जी काम, छोड़ माया के फाँसा ।
जिनगी हे दिन चार, बसा गुरु अंतस सांसा ।।
खोजत रहिगे डूब के, गहरा नदियाँ धार मा ।
बइठे तारनहार हा, अंतस तोर दुवार मा ।।
करम चले जी संग
सांसा मिले उधार, छोड़ जाही जी डेरा ।
चुग ले दाना चार, हवे तन पंक्षी फेरा ।।
कंचन काया तोर, मिले जी आगी माटी ।
करम चले जी संग, जाय धन खुरा न पाटी ।।
बात सियानी मान के, दया धरम ला जोर ले ।
सेत निशानी रंग मा, तन मन ला बोर ले ।।
बहुरै न फिर काल
आनी बानी रंग, रचे काबर जी चोला ।
झूठ लबारी फाँस, करे जिनगी ला पोला ।।
मन के भीतर झाँक, जलत हे आगी गोला ।
चले न सत के राह, कोन समझावय तोला ।।
माथा धर पछताय ले, बहुरै ना फिर काल जी ।
पाँव बढ़ा बन सोंच के, अपन बदल ले चाल जी ।।
अंधभक्ति
अंधभक्ति के राग, सुनावत चारो कोती ।
पथरा बने महान, ददा तरसत हे ओती ।।
दाई परे बिरान, देख लौ भूखा प्यासा ।
अंधभक्त औलाद, फिरे रख पथरा आशा ।।
राग अलापे छोड़ दौ, आँख मूँद नादान रे ।
घट भीतर मा खोज लौ, असली जग भगवान रे ।।
एक नाम सतनाम
पूजे देव करोड़, तभो तैं दर दर भटके ।
पाये गुरु के नाम, इही हंसा हा अटके ।।
एक नाम सतनाम, जपे जा भव तर जाबे।
पाथर मा भगवान, कहीं ना तैं तो पाबे ।।
एक सधे तो सब सधे, सब साधे सब खोय जी ।
अंत घड़ी कुछ ना मिले, माथ पटक के रोय जी ।।
सत्यनाम हे सार
हालत देख समाज, हृदय मा पीरा जागे ।
तोर दिखाये राह, सबो गुरु आज भुलागे ।
धरे चलत पाखंड, जपत हे कंकड़ पाथर ।
सत्यनाम हे सार, बसा लौ मन दू आगर ।।
धरे संत गुरु ज्ञान ला, गजानंद कर काज जी ।
पढ़े लिखे इंसान हव, गढ़ लौ नेक समाज जी ।।
अजर नाम सतनाम
अजर नाम सतनाम, बसा अंतस मा भाई ।
कर ले गुरु के ध्यान, नाव भव पार लगाई ।।
समझ शबद के अर्थ, बताये हे गुरु घासी ।
जीवन के सब सार, समाये घट अविनासी ।।
जप लौ गुरु के नाम जी, तज माया अभिमान ला ।
मानुष तन अनमोल कर, धर लौ गुरु के ज्ञान ला ।।
करँव मँय काकर बिनती
माथ नवाँ कर जोर, करँव मँय काकर बिनती ।
देव बसे हें लाख, करँव मँय कइसे गिनती ।।
काकर थामव हाथ, छोड़ दँव मँय हा काला ।
बड़ा हवय भ्रमजाल, कहाँ हे गड़बड़ झाला ।।
एक सधे तो सब सधे, छोड़व पूजा लाख ला ।
अंधभक्ति के फेर मा,झन खोवव सच साख ला ।।
धर्म हे बारुद गोला
सुन कलजुग के बात, बतावत हँव मँय तोला ।
थाम हाथ विज्ञान, धर्म हे बारुद गोला ।।
धर्म लड़ावत आज, सुनव आपस मा भाई ।
मुस्लिम सिख अउ हिन्द, लड़ावत हे ईसाई ।।
मानवता ला मान लौ, सब ले बड़का धर्म जी ।
सत्य अहिंसा अउ दया, हो मानुष के कर्म जी ।।
होथे का भगवान
मन मूरख नादान, सुने ना ककरो कहना ।
बनके धरम गुलाम, रात दिन करथे जपना ।।
होथे का भगवान, बता दे सच मा मोला ।
रंग रूप आकार, दिखा दे ओकर चोला ।।
गजानन्द कविराय के, कहना मानव सार जी ।
अंध भक्ति से दूर रह, खुशी रखव परिवार जी ।।
चुनाव
देख बदलगे चाल, बने नेता अब बपुरा ।
पाये बर जी वोट, घरो घर बाँटत लुगरा ।।
दुर्योधन बन साथ, रखे हे शकुनि मामा ।
माँगत घर घर भीख, पहन सादा पैजामा ।।
जनता हे बगुला भगत, फँसगे चुपड़ी बात मा ।
अपन भुला अधिकार ला, बिकगे मुरगा भात मा ।।
पइसा के हे खेल, लुटावत लोटा थारी ।
जीतय बेईमान, हार जावय खुद्दारी ।।
अलग अलग हे छाप, अलग हे सबके नारा ।
पटे हवय दीवार, गाँव मोहल्ला पाराब ।।
भाई बेटा बाप अब, बनके बैरी हे लड़े ।
देख चुनावी रंग ला, माथा धर सब हे खड़े ।।
जाति धरम के नाम, करावय रोज लड़ाई ।
करय नही कुछ काम, बइठ बस खाय मलाई ।।
भरथे खुद के जेब, दिखाके हमला ठेंगा ।
बन परबुधिया आज, इँखर पाछू झन गा रेंगा ।।
झन बेचव ईमान ला, अपन वोट अधिकार ला ।
सार बात हे सोंच लौ, दूर रहव मक्कार ला ।।
*छप्पय छंद- बारह बछर महिमा बखान*
(1) चैत महिना-
नवा बछर शुरुआत, चैत महिना ले होथे।
नव दुर्गा नव रूप, जंवारा माँ बर बोंथे।।
मास अमावस चाँद, तारिका चित्रा जाये।
माह चैत ये नाम, तभे शुभ पावन पाये।।
मन मा भरे उमंग बड़, कारज नेक सँजोर के।
महके मन पर्यावरण, उगे सुमत नव भोर के।।
(2) बैसाख महिना-
नाम पड़े बैसाख, विशाखा शुभ नक्षत्रा।
सिक्ख धर्म नव वर्ष, बताये नानक पत्रा।।
जन्मदिवस सिद्धार्थ, धर्म जन बौद्ध मनाये।
भीम राव साहेब, जन्मदिन पावन आये।।
गुरु जी बालकदास के, दिवस शहादत त्रास के।
अमरदास गुरु जन्म भी, बेटा जे घासीदास के।।
(3) जेठ महिना-
जेठ माह पंचाग, तीसरा महिना परथे।
रहिथे सूरज तेज, घाम अड़बड़ के करथे।।
जल के रहे महत्व, पिला जन पुन्य कमाथे।
रुख राई के छाँव, सबो के मन ला भाथे।।
परब पड़े एकादशी, उपवास रखे निर्जला।
पूजा गंगा दशहरा, पड़े सावित्री व्रत घला।।
(4) आषाढ़-
महिना शुभ आषाढ़, करे सब खेत किसानी।
बरखा रानी खूब, झमाझम बरसे पानी।।
दान पुन्य के कर्म, सबो करथे जन तन मन।
जगन्नाथ प्रभु धाम, चले दर्शन बर भक्तन।।
शुक्ल पक्ष आषाढ़ के, पड़े देवउठनी लगन।
हृदय मयूरा नाचथे, खुशहाली मा हो मगन।।
(5) सावन महिना-
सावन महिना खास, परब हरेली राखी।।
मनभावन बरसात, बदरिया पारे साखी।।
सोमवार उपवास, रखे हिंदू नर नारी ।
मनोकामना पूर्ण, करे भोले भंडारी ।।
शुभ विवाह भगवान शिव, चले करे माँ पार्वती।
ज्योति कलश मन साज के, भक्त करे भव आरती।।
(6) भादों ( भाद्र ) महिना
भाद्र माह कल्याण, सबो के करे भलाई।
धान बियासी होय, काम चलथे निंदाई।।
पोरा तीज तिहार, धरे अँगना मा आथे ।
आजादी के पर्व, खुशी धर सबो मनाथे।।
जन्मदिवस प्रभु कृष्ण के, सतगुरु बालकदास जी।
पूजन करे गणेश के, बँधे आस विश्वास जी।।
(7) क्वांर महिना-
होथे बरसा अंत, क्वांर मा शीत सुहाथे।
हरसे हमर किसान, धान हा पोठिरयाथे।।
कड़के फिर से धूप, उमस हा अबड़ जनाथे।
पितर मोक्ष के पाख, भोग पुरखा ल लगाथे।।
जगमग माँ के द्वार मा, जोत जले नवरात हे।
विजयादशमी क्वांर मा, लाय खुशी सौगात हे।।
(8) कार्तिक महिना-
शरद पूर्णिमा संग, शुरू ये कार्तिक महिना।
भाईचारा जोर, सिखाथे हमला रहिना।।
पतिव्रत करवा चौथ, खुशी धर आय दिवाली।
पावन भाई दूज, भरे मन मा खुशहाली।।
धनतेरस एकादशी, कार्तिक चले नहाय जी।
पूजन नवमी आंवला, हिन्दू धर्म मनाय जी।।
(9) अग्घन महिना-
अग्घन महिना होय, अन्नपूर्णा के पूजा।
जावय खेत किसान, छोड़ बूता सब दूजा।।
माते खेत किसान, करे जी धान लुवाई।
करपा बाँधे खेत, चले भइया भौजाई।।
सोना बाली धान के, महके खेती खार मा।
बाँध बैल गाड़ी सुघर, लाथे जी कोठार मा।।
(10) पूस महिना-
पूस माह मा ठंड, रात दिन अबड़ जनाथे।
तापँय कउड़ा बार, गोरसी नीक सुहाथे।।
सतगुरु घासीदास, जयंती मन हरसाये।
ईसाई के पर्व, यीशु क्रिसमस डे आये।।
धान मिसाई काम हा, चलथे दिन अउ रात जी।
आय छेरछेरा घलो, सम्मत धर सौगात जी।।
(11) माघ महिना-
ऋतु बसंत शुरुआत, माघ महिना ले होथे।
कोयल छेड़े तान, बिरह मा बिरहिन रोथे।।
लहसे आमा डार, लुभाये मन अमराई।
हरा भरा फल फूल, दिखे जग मा सुघराई।।
पावन बसंत पंचमी, पूजन हो माँ सरस्वती।
बिनती वीणावादिनी, ज्ञान धराये मन्दमति।।
(12) फ़ागुन-
फागुन महिना फाग, धरे होली हा आथे।
मनखे मनखे एक, रंग मा सब रँग जाथे।।
महारात्रि शिव शंभू, परब भोले कैलासी।
सत गिरौदपुर धाम, भरे मेला गुरु घासी।।
जन्म जयंती माँ मिनी, माता के दिन खास जी।
बोड़सरा सत धाम मा, मेला बालकदास जी।।
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
माँ-
नइ जानँव भगवान, जानथँव माँ के ममता।
सृष्टि करे विस्तार, अगम हे जेखर क्षमता।।
गोदी सरग समान, दूध हे अमरित जइसे।
माँ के मया दुलार, लगे सुख पबरित जइसे।।
सबो धाम ले हे बड़े, माँ के पावन पाँव हा।
तन मन ला हरसाय हे, अँचरा शीतल छाँव हा।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )09/05/2021
नानपन के सुरता
सुरता आगे आज, नानपन मोला संगी ।
घूमन फैशन मार, जेब मा धरके कंघी ।।
कहाँ नँदागे मोर, गाँव के गुरतुर बोली ।
पैठा मा जब बैठ, करे जी बबा ठिठोली ।।
खेलन नदी पहाड़ अउ, लुका छिपी के खेल जी ।
रेस टीप खेलन नदी, बनन कभू हम रेल जी ।।
टुरा टुरी मिल संग, फूगड़ी पचवा खेलन ।
मिसन धान कोठार, चलावन दौरी बेलन ।।
भौंरा बाटी संग, तिरी पासा भटकौला ।
धरे सायकिल हाथ, रहन जी हरफनमौला ।।
राहय ना संसो फिकर, घूमन बस बिंदास जी ।
आथे बचपन याद अब, होथे आस उदास जी ।।

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