मंगलवार, 16 अगस्त 2022

उल्लाला (चंद्रमणि) छंद-

 1 ( 13-13 मा यति, सम सम तुकांत )

 सतज्ञान

सतगुरु घासीदास के, अमर बोल सतज्ञान हे।

मानवता के पाठ अउ, सत चिनहा पहिचान हे।।


सत मा ही धरती खड़े, सत मा खड़े अकास जी।

सत मा ही दुनिया खड़े, कह गय घासीदास जी।।


अमर पुजारी नाम के, ज्ञान भरे भंडार हे।

गुरु घासी बाबा कहे, सत ही जग मा सार हे।।


सत्य अहिंसा राह मा, आगू बढ़ते जाव जी ।

गुरु के आशीर्वाद ले, सुखमय जिनगी पाव जी।।


मनखे मनखे एक हे, घट घट मा सतनाम जी।

सत मा चंदा अउ सुरुज, सत मा चारों धाम जी ।।


धरे मोटरी पाप के, बोझ लगे संसार हे।

क्रोध अहं के आग हा, तन ला करे खुँवार हे।।


प्यास बुझय ना नीर से, ये तो अइसे प्यास ये।

बूँद पड़य सतनाम के, जागय मन सत आस ये।।


तन मा काई हे रचत, मन ला खात दियाँर जी।

जपे नहीं सतनाम ता, ये जिनगी बेकार जी।।


*सतगुरु घासीदास जी के सात संदेश* मान सदा सतनाम ला, सत मा धरती हे खड़े। सत मा हे चंदा सुरुज, सत ही ईश्वर हे बड़े।।1 जीव चराचर एक सब, एक सबो के प्रान हे। हत्या करना जीव के, जग मा पाप समान हे।।2 नशा पान ला छोड़ दौ, जिनगी करे खुँवार जी। बिगड़े खेती खार अउ, उजड़े घर परिवार जी।।3 पथरा ला झन पूजहू, कहना घासीदास गुरु। देव असल माता पिता, रख चलिहौ बिस्वास गुरु।।4 नाँगर झन जी जोतहू, खड़े मझनिया घाम मा। गाय कभू झन फाँदहू, खेत किसानी काम मा।।5 पर नारी माता कहव, रखव आचरण शुद्ध जी। पर नारी खातिर हुये, बड़े-बड़े तो युद्ध जी।।6 चोरी करना पाप हे, चख महिनत के अन्न जी। रखिहौ उच्च विचार तब, रइहू सदा प्रसन्न जी।।7 छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/08/2023


2 ( 13-13 मा यति, विषम- सम तुकांत )

सत के महिमा

नाचय पंथी झूम के, गोल गोल जी घूम के।

चरण कमल गुरु चूम के, नोनी बाबू ठूमके।।


आपस बढ़िया मीत हे, सतनामी के रीत हे।

मंगल पंथी गीत हे, सत मा सबके जीत हे।।


चाँद सुरुज धरती खड़े, सत के महिमा हे बड़े।

सच बर सतनामी लड़े, जान भले देना पड़े।।


गुरु बालक के खून के, लेबो बदला चून के।

क्रोध अहम ला भून के, सत के जाला बून के।।


सतनामी वो शेर हे, आगू दुश्मन ढेर हे।

कहत लगय बस देर हे, फेर न कछु अंधेर हे।।


सतनामी वो बंश ये, गुरु बालक के अंश ये।

झेले बहुते दंस ये, मारे बहुते कंस ये।।


बेटा असली बाप के, दुश्मन देखय खाप के।

छल धोखा ला भांप के, रद्दा रेंगय नाप के।।


चन्द्रमणि छंद- *छत्तिसगढ़ गुरु धाम हे* छत्तिसगढ़ गुरु धाम हे, नैनिहाल श्री राम हे। खेत किसानी काम हे, धान कटोरा नाम हे।। जंगल नदी पठार हे, महानदी के धार हे। रुनझुन खेती खार हे, खनिज विपुल भंडार हे।। बसे मया सुख गाँव हे, पबरित पुरखा पाँव हे। घन अमरइया छाँव हे, करथे कउँवा काँव हे।। बोली मधुरस कस लगे, मया मितानी मा पगे। खुशहाली मन मा जगे, दुख अँधियारी हे भगे।। पूरब म रायगढ़ रसे, पश्चिम कबीरधाम से। उत्तर म सरगुजा बसे, दक्षिण ले बस्तर हँसे।। राजिम कुंभ महान हे, शुभ पावन इस्नान हे। शबरी के गुणगान हे, अउ कबीर सत ज्ञान हे।। धाम गिरौदपुरी बड़े, जैतखाम ऊँचा गड़े। चरण बबा के हें पड़े, जोर हाथ ला सब खड़े।। इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/08/2023


3 ( 15- 13 मा यति, सम- सम तुकांत )

सतगुरु

जिनगी बिरथा सतगुरु बिना, कोंन लगाही पार जी।

बिन माही नइया डूबथे, जस सागर मझधार जी।।


लख चौरासी तन भोग के, मानुष तन ला पाय हौ।

बोझ उतारे जग पाप के, ये धरती मा आय हौ।।


कर्म धर्म के ये हाट मा, मोल करव सतज्ञान के।

तौल तराजू सत पालड़ा, करव खरीदी जान के।।


धन दौलत मन भरमात हे, सहीं गलत के राह ला।

बीच भँवर बन पतवार तँय, नाप नदी के थाह ला।।


देखव कलजुग के आदमी, कहिथे खुद भगवान हे।

दूर रखय खुद दाई ददा, धन पाछू परशान हे।।


पाँव बढ़ा कर सतकाज ला, चलही जुग जुग नाम हा।

पाबे गुरु आशीर्वाद ला, अमर रही सतकाम हा।।


अंत घड़ी पछताना नहीं, समय रहत मन चेत जा।

हाथ पसारे जाना हवय, नाम जगत मा देत जा।।


सतनामी अब खाँटी बनौ, दुश्मन बर काँटी बनौ।

औराबांधा माटी बनौ, बेटा लोहाटी बनौ।।


सरहा जोधाई तुम बनौ, गुरु बालक कस अब तनौ।

कहना गजानंद के सुनौ, समता सुमता बर गुनौ।।


तब चलबो सीना तान के, जीये बर सम्मान के।

बदला लेबो अपमान के, पुरखा के बलिदान के।।


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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