गुरु सतबानी (गीत)
अमरदास गुरु सतबानी ला, धरे चलव सँगवारी हो ।
गाँव गाँव अउ शहर शहर ला, चलव करव उजियारी हो ।।
बइठे समाज रद्दा जोहत, कोंन उठावय बीड़ा ला ।
नैना ले आँसू छलकत हे, कोंन भगावय पीड़ा ला ।।
सुमता के बाना ला धरके, महका लौ फुलवारी हो ।
गाँव गाँव अउ शहर शहर ला, चलव करव उजियारी हो ।।1
कोंन गढ़य सपना पुरखा के, आशा भावी पीढ़ी ला ।
टाँग धरे सब खींचत हावय, अब बिकास के सीढ़ी ला ।।
देख खजाना हमर लुटागे, कोंन करय रखवारी हो ।
गाँव गाँव अउ शहर शहर ला, चलव करव उजियारी हो ।।2
लोभ मोह मा सबो भुलाये, बड़े बने हे माया जी ।
दिखावटी मा देख सजे हे, अब मनखे के काया जी ।।
झूठ डगर मा सुख सुविधा सब, सत्य डगर दुख भारी हो ।
गाँव गाँव अउ शहर शहर ला, चलव करव उजियारी हो ।।3
करजा आज चुकाना परही, पुरखा के बलिदानी के ।
अब समाज बर जी लौ भाई, तभे मोल जिनगानी के ।।
मिलके दूर भगाबो आवव, रात कुमत अँधियारी हो ।
गाँव गाँव अउ शहर शहर ला, चलव करव उजियारी हो ।।4
अलख जगाये- सतगुरु घासी
अलख जगाये सत गुरु घासी, हे महँगू के लाला गा।
पाठ पढ़ाये मानवता के, महिमा तोर निराला गा।।
न तो बड़े हे मंदिर मस्ज़िद, न तो चर्च गुरुद्वारा गा।
कर्म बड़े गुरु घासी बोले, रख लौ भाईचारा गा।।
भेदभाव के खाई पाटव, जप लौ समता माला गा।
अलख जगाये सत गुरु घासी, हे महँगू के लाला गा।।1
पथरा भोग लगाना छोड़व, असली देव ददा दाई।
सच के रद्दा सुख जिनगी हे, ढोंग भरे दुख के खाई।।
कहाँ भुलाये झूठ धरे तैं, सोंच परे हे ताला गा।
अलख जगाये सत गुरु घासी, हे महँगू के लाला गा।।2
सत्य अहिंसा मारग धर लौ, बोले गुर घासी बाबा।
राम इही सत यीशु इही सत, गुरु नानक जानौ काबा।
नाम धरे सत के गुरु घासी, बनगे सत रखवाला गा।।
अलख जगाये सत गुरु घासी, हे महँगू के लाला गा।।3
औराबांधा आज पुकारत
कदम धरे चलना हे सब ला, राजा गुरु बलिदानी के ।
हवय चुकाना करजा भाई, अब पुरखा कुरबानी के ।।
औराबांधा आज पुकारत, सुनव दरद करलाई के ।
खून गिरे हे वो भुइँया मा, गुरु सरहा जोधाई के ।।
बोड़सरा के धधकत आगी, कोंन बुझाही पानी मा ।
छोड़ कहाना सतनामी जब, नइहे जोश जवानी मा ।।
करजा चुका नहीं पाबो ता, दाग लगय रे ये चोला ।
सोंच सोंच तन घुन्ना खाथे, अंतस मा गिरथे गोला ।।
गजानंद हे आज पुकारत, जागव वीर प्रतापी हो ।
गुरु के बदला गिन गिन लेबो, कब तक देबो माफी हो ।।
हाथ पसारे जाना हे
सीना ताने जिनगी जीना, सतनामी के बाना जी ।
बात कहे बलिदानी राजा, सुन्ता राह मढ़ाना जी ।।
सत के सादा झंडा धरले, रखले मीठा बानी ला ।
करम धरम के कर चिनहारी, मानौ बात सियानी ला ।।
दाई ददा जनम के साथी, सुख दुख मा बलिहारी हे ।
गुरु हे बड़ के ये दुनिया मा, जिनगी सिरजन हारी हे ।।
नाम कमाले जग मा भाई, छिन भर के जिनगानी जी ।
छोड़ मया पंछी उड़ जाही, जग मा अपन कहानी जी ।।
सुख के सब्बो संगी साथी, दुख मा सब तो भागे हे ।
सुख दुख मा जे आगू रहिथे, असली हितवा लागे हे ।।
मुट्ठी बाँधे सबके आना, हाथ पसारे जाना हे ।
जीयत भरके संगी साथी, मरे तहाँ बेगाना हे ।।
काया माटी माटी मिलही, पथरा पड़ही छाती गा ।
बइठ दुवारी छिन भर रोही, बुझही जिनगी बाती गा ।।
बोली बतरस मीठा रखले, दया मया संगवारी तैं ।
सुमता के अब फूल खिलाले, महका ले फुलवारी तैं ।।
नमन नमन गुरु घासी बाबा, सत्य पुरुष अवतारी ला ।
मानवता के पाठ पढ़ाइस, जीव जन्तु नर नारी ला ।।
कलम सिपाही
कलमकार हव कइसन भाई, लिखथव धर्म गुलामी ला ।
मान मिले ये जग मा कहिके, करथव अंध सलामी ला ।।
महिमा गाथव तथाकथित तुम, मन का देव बिराजे हे ।
पढ़े लिखे के का मतलब जब, ढोंग कलम मा साजे हे ।।
भर ले स्याही अपन कलम मा, खून वीर बलिदानी के ।
जाग खुदे अउ जगा सबो ला, तभे मोल जिनगानी के ।।
कलम चलावव हक के खातिर, दर्द लिखव दुखियारी के ।
भूख गरीबी शोषण जइसन, कालरा महामारी के ।।
रक्षा कर लौ ये भुइयाँ के, स्वाभिमान रख माटी के ।
पहरेदार बनौ रे भाई, जल जंगल अउ घाटी के ।।
क्रांति कलम से जुग जग आये, भोर सुमत के आही जी ।
तोर कलम मा बड़ ताकत हे, सुन ले कलम सिपाही जी ।।
नवा बछर के स्वागत कर लौ
नवा बछर के स्वागत कर लौ, मन मा आस जगाये हे।
गये साल के त्रास मिटा के, खुशियाँ धर ये आये हे।
दीन दुखी कल्याण लिये अउ, मानवता भाईचारा।
जीव चराचर मंगलमय हो, अविरल प्रेम बहे धारा।
मृत शरीर नव प्राण लिये ये, गीत प्रेरणा नव गाथा।
देश क्षितिज मा ऊँचा राहय, भारत माता के माथा।
तान कोयली सुंदर छेड़त, गीत पपीहा गाये हे।
नवा बछर के स्वागत कर लौ, मन मा आस जगाये हे।
ऊँच नीच के भेद मिटे जग, जाति धरम ना खाई हो।
मनखे मनखे एक बरोबर, समरसता परछाईं हो।
मान बढ़े यशगान बढ़े नित, नव प्रकाश उजियारी हो।
मन मंदिर में जोत जले सत, महके मन फुलवारी हो।
सुमता समता भाव सकेले, गजानंद धर लाये हे।
नवा बछर के स्वागत कर लौ, मन मा आस जगाये हे।
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
ढिढ़हिन दाई
महिमा गाँवय ढिढ़हिन दाई, तोरे भुवना मा आये ।
भर दे झोली सुख के माई, तोर सबो किरपा पाये ।।
मल्हार भरे मेला भारी, घूमे फिरे सबो आथे ।
ढ़िढ़हिन दाई जिहाँ बिराजे, दरस सबो कोई पाथे ।।
पूरब सतबहनिया बिराजे, पश्चिम भोले कैलाशा ।
उत्तर मा परघनिया बाबा, दक्षिण देउर के वासा ।।
जगमग जोत जलत दिन राती, दीप कलश घी साजे हे ।
मगन लंगुरवा नाचे थइया, ढ़ोल नगाड़ा बाजे हे ।।
गढ़ राजा के सुन्दर दिखथे, इतिहास पुराना गाथा ।
पुरातत्व के धरती बंदव, अपन नवाँ के मैं माथा ।*****************************************************
ताटंक छंद- *गाँव*
कहाँ गवाँगे गाँव मया के, घुलगे विष पुरवाई रे।
कुहकत नइहे कूक कोयली, सुन्ना हे अमराई रे।।
ढेरा आँटत बबा सुनावय, सुग्घर गीत कहानी ला।
कहय सँजो के राखव बाबू, नाता मीत मितानी ला।।
राहव मिल सब सुमता बाँधे, पाटव कुमता खाई रे।
कहाँ गवाँगे गाँव मया के, घुलगे विष पुरवाई रे।।
गायब हे चौपाल गुड़ी अब, गायब पैठा चौरा हे।
गायब चौकस बिल्ला फुगड़ी, गायब बाटी भौंरा हे।।
गायब बेटी के घरघुँदिया, गायब दूध मलाई रे।
कहाँ गवाँगे गाँव मया के, घुलगे विष पुरवाई रे।।
कुआँ अटागे सुक्खा परगे, तरिया नदिया नाला हा।
बेजा कब्जा परिया होगे, ठलहा बइठे ग्वाला हा।।
लावारिस हे गाय सड़क मा, कोंन सुनय करलाई रे।
कहाँ गवाँगे गाँव मया के, घुलगे विष पुरवाई रे।।
भाई-भाई लड़े परे हें, धरके लिगरी चारी ला।
चक्कर कोट कचहरी काटे, बेचत लोटा थारी ला।।
जुआ नशा हा नाश करे धन, देवव छोड़ बुराई रे।
कहाँ गवाँगे गाँव मया के, घुलगे विष पुरवाई रे।।
संस्कृति अउ संस्कार गवाँगे, बिखहर बोली भाखा हे।
द्वेष करे मनखे ले मनखे, कपट दबाये बाखा हे।।
गजानंद जी खोजत हावय, भाईचारा भाई रे।
कहाँ गवाँगे गाँव मया के, घुलगे विष पुरवाई रे।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/07/2025
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ताटंक छंद- *लोक गीत*
घुले चासनी शक्कर जइसे, लोक गीत के बोली मा।
भुइँया छत्तीसगढ़ धरे हे, दया- मया ला ओली मा।।
माह दिसम्बर पंथी गाना, गुरु गुनगान बखाने हे।
सत संदेशा धर के आये, लागे परब सुहाने हे।।
झूम- झूम के पंथी नाचँय, टोली मिल हमजोली मा।
घुले चासनी शक्कर जइसे, लोक गीत के बोली मा।। (1)
राउत नाचा मड़ई मा अउ, मातर मा मतराये हे।
गीत ददरिया नंगरिहा हा, बासी झड़कत गाये हे।।
सुआ सुहावय दीवाली मा, फाग गीत हा होली मा।
घुले चासनी शक्कर जइसे, लोक गीत के बोली मा।। (2)
छट्ठी- बरही मा सोहर हा, ममता रस ला घोले हे।
आमा पाना जइसे करमा, अमरइया मा डोले हे।।
शोक समेटे बाँस गीत ला, बबा सुनावय खोली मा।
घुले चासनी शक्कर जइसे, लोक गीत के बोली मा।। (3)
भरथरी पंडवानी आल्हा, बारो महिना के गाना।
गीत भड़ौनी शादी साजे, मारे समधी ला ताना।।
गीत पठौनी हा रोवाये, बेटी ला तो डोली मा।
घुले चासनी शक्कर जइसे, लोक गीत के बोली मा।। (4)
राखी बाद बिहान बिदाई, हमर भोजली दाई के।
गीत भोजली महिमा गाये, दाई के सुघराई के।।
चैत कुवाँर जँवारा माँ जस, गावँय मिल सब टोली मा।
घुले चासनी शक्कर जइसे, लोक गीत के बोली मा।। (5)
देवय पहिली सुख के सम्मत, गम्मत राहस छैला हे।
देखव तो संस्कार दिनोंदिन, होवत अब तो मैला हे।।
चेत करौ मिल लोक गीत बर, दाग लगय झन चोली मा।
घुले चासनी शक्कर जइसे, लोक गीत के बोली मा।। (6)
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/07/2025
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ताटंक छंद- *पावन धाम गिरौदपुरी हे*
पावन धाम गिरौदपुरी हे, जनम भूमि गुरु घासी के।
लिखके ताटंक छंद गावँव, महिमा सत अविनाशी के।।
घोर घना कटकट जंगल मा, औंरा धौंरा झाड़ी हे।
धुनी रमाये सतगुरु घासी, बइठे छात पहाड़ी हे।।
जोग नदी हा चरन पखारय, सत्यपुरुष सन्यासी के।।
पावन धाम गिरौदपुरी हे, जनम भूमि गुरु घासी के।।1
चरण कुंड अउ अमृत कुंड के, निरमल पावन पानी हे।
पाँच धार मा पँचकुंडी के, सुग्घर अमर कहानी हे।।
संत समाज समागम मेला, रहिथे बारहमासी के।
पावन धाम गिरौदपुरी हे, जनम भूमि गुरु घासी के।।2
हाथी लहुटे हे पथरा हा, जोग नदी के धारा मा।
मुक्ति दिये भटकत हंसा ला, गुरु सतनाम सहारा मा।।
कट जाथे गुरु नाम लिये ले, फाँसा जुग चौरासी के।
पावन धाम गिरौदपुरी हे, जनम भूमि गुरु घासी के।।3
सेत सिंहासन गुरु के साजे, गुरु गद्दी गुरुद्वारा मा।
गूँजत रहिथे मन मंदिर हा, गुरु के जय जयकारा मा।।
चिनहा ऊँचा जैतखाम हा, गुरु दर्शन अभिलाषी के।
पावन धाम गिरौदपुरी हे, जनम भूमि गुरु घासी के।।4
रहिस दिखाये गुरु महिमा जी, बंजर बहरा डोली मा।
रेंगाये गरियार बैल ला, सतगुरु सत के बोली मा।।
हवय गवाह गिरौदपुरी अउ, लोग उहाँ रहवासी के।।
पावन धाम गिरौदपुरी हे, जनम भूमि गुरु घासी के।।5
जीवन दान बुधारू पाये, तारे सफुरा माता ला।
संत शिरोमणि सतगुरु मानौं, अइसन जीवन दाता ला।।
श्रद्धा सुमन चढ़ावँव पग मा, अरजी सुन लौ दासी के।।
पावन धाम गिरौदपुरी हे, जनम भूमि गुरु घासी के।।6
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/07/2025
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ताटंक छंद गीत- *नारी के गहना*
गहना-गोटी बिन नारी के, तन सिंगार अधूरा हे।
सोना चाँदी हीरा मोती, करे शौक ला पूरा हे।।
कारी कजरा आँखी आँजे, गजरा खोफा मा फूले।
नाक म नथनी फुल्ली खिनवा, कान म झुमका हा झूले।।
लहरावत बेनी हर लागे, छेड़त तान तमूरा हे।
गहना-गोटी बिन नारी के, तन सिंगार अधूरा हे।।1
हार गला मा नौलक्खा के, गोरी तन ला हे सोहे।
ऊपर ले सिंगार सादगी, पति परमेश्वर ला मोहे।।
मुस्कावत हे मुचमुच सुग्घर, मन के मगन मयूरा हे।
गहना-गोटी बिन नारी के, तन सिंगार अधूरा हे।।2
पहिरे बाजूबंद बाँह मा, ताबीज नाँगमोरी ला।
बहुटा पहुची कलिवारी हा, फबे गजब के गोरी ला।।
नारी बर गहना के आगे, सुन सब चीज धतूरा हे।
गहना-गोटी बिन नारी के, तन सिंगार अधूरा हे।।3
लाली पीली चूड़ी खनखन, खनके हाथ कलाई मा।
कंगन ककनी हर्रइया हा, इतराये सुघराई मा।।
कमर करधनी झटका मारे, हिलगे मया कँगूरा हे।
गहना-गोटी बिन नारी के, तन सिंगार अधूरा हे।।4
पाँव म पैरी छनछन बाजे, पैजब गीत सुनाये हे।
साँटी टोड़ा लच्छा बिछिया, सुन लौ राज बताये हे।।
गजानंद जी हँस ले गा ले, ये जिनगी तो चूरा हे।
गहना-गोटी बिन नारी के, तन सिंगार अधूरा हे।।5
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/07/2025
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ताटंक छंद- *जात-पात*
कोंन खनिस हे जात-पात के, मानव समाज मा खाई।
कोई होगे हिन्दू मुस्लिम, कोई हा सिख ईसाई।।
कोंन बनाइस वर्ण व्यवस्था, कर्म अधार बता के जी।
छोट-बड़े मनखे ला कर दिस, छत्तिस जात बना के जी।।
बाम्हन क्षत्रिय वैश्य शूद्र मा, तब बँटगे भाई-भाई।।
कोंन खनिस हे जात-पात के, मानव समाज मा खाई।।
चार वर्ण पहिचान बताइस, पैर पेट भुज माथा ला।
जहर विषमता के घोलिन हें, गावँत झूठा गाथा ला।।
चतुराई कर चतुर मनुज हा, ऊँच सिंहासन हे पाई।
कोंन खनिस हे जात-पात के, मानव समाज मा खाई।।
बाँटिन मरघट घाट घठौंदा, गाँव गुड़ी अउ पारा ला।
नींव हिला दिंन सुमता के जी, भेदभाव भर गारा ला।।
चाल चलिन हें झन पावय कहि, छोट जात हा ऊँचाई।।
कोंन खनिस हे जात-पात के, मानव समाज मा खाई।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/08/2025
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ताटंक छंद- बेजा-कब्जा
बेजा-कब्जा सबो जगह मा, दिन-दिन बाढ़त हे भारी।
धरे सुवारथ मनखे अब तो, हृदय चलावत हें आरी।।
बेजा-कब्जा जल जंगल अउ, नरवा नदिया मा होगे।
भाठा भर्री नइ तो बाचिस, परिया धरसा हा खोगे।।
गायब हे सरकारी भुइँया, गायब हे कोला-बारी।
बेजा-कब्जा सबो जगह मा, दिन-दिन बाढ़त हे भारी।।1
बेजा-कब्जा मन्दिर मठ मा, मठाधीश मन हे बाढ़े।
अंधभक्ति के राग अलापत, धर्म पुजारी हें ठाढ़े।।
देव धरम के आड़ लिए इन, लूटत हें आरी-पारी।
बेजा-कब्जा सबो जगह मा, दिन-दिन बाढ़त हे भारी।।2
बेजा-कब्जा संस्कृति मा अब, होगे हे परदेशी के।
छेंक डरिन दइहान संग मा, चारागाह मवेशी के।।
मालिक बन बइठे परदेशी, छीन हमर सथरा थारी।
बेजा-कब्जा सबो जगह मा, दिन-दिन बाढ़त हे भारी।।3
बेजा-कब्जा सत्ता मा हे, करँय वोट के घोटाला।
मचे लड़ाई कुर्सी के हे, सबके मुँह मा हे ताला।।
दीन-दुखी जनता के कब तो, मिटही संगी लाचारी।
बेजा-कब्जा सबो जगह मा, दिन-दिन बाढ़त हे भारी।।4
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/09/2025
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