संविधान दिवस - (26 नवम्बर) न गीता न बाईबिल,न ही ग्रन्थ कुरान से। देश मोर चलथे जी,भीम संविधान से। अनेकता में एकता,दिखय भाव समता। देश आगू बढ़थे जी,सही दिशा ज्ञान से। पढ़ लिख आगू बढ़ौ,नवा इतिहास गढ़ौ। संविधान सब पढ़ौ,जी लौ फिर शान से। हाथ मा कलम हवै,सुख के आलम हवै। सच कहौं मिले हवै,भीम बलिदान से।। चलै बने लोकतंत्र,दिये भीम महामंत्र। रख मान प्रजातंत्र,लिखे संविधान ला। हर हाथ काम पाये,सुख रोटी सबो खाये। झन कोई लुलवाये,कपड़ा मकान ला। दुख खुद ही सहिके,चुपचाप जी रहिके। सबो मोर ये कहिके,सहे अपमान ला। सत मैं बचन धरौं,नमन नमन करौं। चरन बंदन करौं,विभूति महान ला।।
मनहरण घनाक्षरी-
सुमता सुमत धरौ, दुखिया के दुख हरौ।
पाँव बढ़ा के आगू, करौ नेकी काम ला।
दया मया मन रखौ, महिनत फल चखौ।
समझ बने जौ इँहा, जिनगी के दाम ला।
लोभ मोह छोड़ चलौ, झन क्रोध अहं पलौ।
अपन कमा लौ भाई, दुनिया मा नाम ला।
तन मन राख होही, सत्यनाम साख होही।
हिरदे बसा के जपौ, गुरु सतनाम ला।।
मनहरण घनाक्षरी-
फइले देश बिमारी, कोरोना ये महामारी।
अधरे मा लटके हे, सबो के तो जान जी।
भयानक छूत रोग, जानौ बुझौ सब लोग।
सावधानी रखे चलौ, ढक मुँह कान जी।
येखर से युद्ध लड़े, सबो झन सोंच पड़े।
रात दिन भिड़े हवे, दुनिया विज्ञान जी।
गजानंद भाई कहे, झन कोई दुख सहे।
लापरवाही ला छोड़, बात धरौ ध्यान जी।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
बिरवा धरम सदा, जग हरियाय जी (05 जून विश्व पर्यारण दिवस विशेष) हरा भरा रुख राई, निक लागे पुरवाई, फल फूल जड़ी बूटी,कुटिया छवाय जी शुद्ध साँस हवा देथे , दूर प्रदूषन होथे, झूमर झूमर ये हा, पानी बरसाय जी। पलंग दिवान बने , महल अटारी तने, हमरो किसान भाई , नाँगर बनाय जी। पटिया धारन खड़े , कारखाना बड़े बड़े, बचपन रचुलिया , इही ह झुलाय जी।। अबादी बढ़त हवै , रुखवा कटत हवै, एक दिन पड़ जाही , छाँव लुलवाय जी। तोर मोर झन करौ , येकर जतन करौ, संगी साथी सुख दुख,मितवा कहाय जी। जनम मरन रहे , संगवारी बन रहे, चिता बन अंत घड़ी, तन ला जलाय जी। जिनगी सुफल करौ , रसदा सरग धरौ, बिरवा धरम सदा , जग हरियाय जी।। रचना - इंजी.गजानंद पात्रे *सत्यबोध* 05-06-2018
"*छंद के छ*" परिवार के स्थापना दिवस के 10 साल पूरा होय के आप सबो ला हार्दिक बधाई अउ शुभकामना 💐💐 छंद के तो साधना मा, बीते हे ये दस साल, सबो के तो मीत सदा, मिले संग-संग हे। "छंद के छ" छाया मा जी, ज्ञान के अलख जगे, मन मा रचे हे गाढ़ा, गुरु कृपा रंग हे।। भाव के हे सेतु बंधे, छंद रस नित बहे, हर शनि रविवार, मंच मा उमंग हे। अक्षय तृतीया आज, सधही जी शुभ काज, साधक पुराना नवा, छंद मा मतंग हे।। दशक पड़ाव पार, लाये हे खुशी अपार, "छंद के छ" सुमन ले तो, सजे परिवार हे। भाषा के सेवा मा लगे, छंद परिवार सदा, व्याकरण लय-ताल, लेखन आधार हे।। कोना-कोना महके हे, सोन चिड़ी चहके हे, छंद के प्रकाश ले तो, मिटे अंधकार हे। छंद कारवां हा बढ़े, नव इतिहास गढ़े, सत्यबोध छत्तीसगढ़, गूॅंजे जयकार हे।। ✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/04/2026 साधक - सत्र-2
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'छंद के छ' के आज दिनांक 09 मई (2016) स्थापना दिवस के गाड़ा-गाड़ा बधाई! छत्तीसगढ़ी भाखा अउ छंद साधना ला समर्पित दू ठन घनाक्षरी प्रस्तुत हे :
छंद के खजाना मा हे, गजब के रंग भरे,
छत्तीसगढ़ी भाखा के, मान ला बढ़ाय हे।
नवा-नवा साधक जी, जुड़े छंद सीखे बर,
मया के परोसना मा, अमृत खवाय हे।।
'छंद के छ' आज संगी, दीया कस हे बरत,
साहित्य के कोठी ला ये, सुग्घर सजाय हे।
स्थापना के दिन आज, खुशी मिल मनावन,
सुरुज के जोत बन, चारों मुड़ा छाय हे।।
दोहा अउ घनाक्षरी, सोहत हे जी सोरठा,
लय अउ ताल के तो, बाजत नॅंगारा हे।
सहज सरल मिलै, छंद के विधान इहाँ,
छंद के सुजान मन, करे उजियारा हे।।
अंतस के पीरा मिटे, सुन के झंकार इहाँ,
छंद के जी गोठ-बात, लगे बड़ प्यारा हे।
जलत रहय सदा, छंद के ये जोत जग,
छत्तीसगढ़ दाई के, लाड़ला दुलारा हे।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2026
साधक, सत्र -2

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