मंगलवार, 16 अगस्त 2022

चौपाई छंद-

 गुरु वंदना 

दयानिधी गुरु आप हौ, सबके तारनहार ।

बनिहौ आप सहाय गुरु, बिनती बारंबार ।।


हे सतगुरु जी बाबा घासी। कमल चरण के मैं हँव दासी ।।

तोर कृपा गुन कर दे बरसा। सबके तन मन जावय हरसा ।।


धरे बात सच गुरु के चल ले। सत्यनाम सुमिरन कर बल ले ।।

भय शंका मन से मिट जावय। सुमत खुशी घर घर मा आवय ।।


सत्य अहिंसा गुरु पहिचानी। सादा राखव खानी बानी ।।

धरम असल ये मनखे जानव। मानवता जग में पहिचानव ।।


देश समाज भलाई कर लौ, भूख गरीबी पीरा हर लौ ।

इही बात गुरु घासी बोले। कड़ू बात हिरदे ला छोले ।।


जात पात के टोरव जाला। सुमता के मिल जप लौ माला ।।

जात हवे दू नारी अउ नर। सबो जीव हे एक बरोबर ।।


नारी के सम्मान करौ जी। जग जननी हे ध्यान धरौ जी ।।

उँच नीच के भेद मिटा ले। कुंठा मन के द्वेष हटा ले ।।

 

अगम अटल हे गुरु के नामा। हृदय बना ले सत के धामा ।।

सत्य थाम ले कारज बनही। सतनामी तब छाती तनही ।।


सार बात बस एक हे, जगत बुराई छोड़ ।

जप ले जी सतनाम ला, सतगुरु नाता जोड़ ।।


सुमिरन

पहिली सुमिरौं गुरु घासी ला। सत्य पुरुष गुरु अविनासी ला ।।

जगमग जोत जले दिन राती। तन के दियना मन के बाती ।।


दूजे सुमिरौं गिरौद धामा। जन्म धरे गुरु घासी नामा ।।

ऊँचा  खंभा सादा  झंडा। साथ हाथ लहरय जे डंडा ।।


तीजे सुमिरौं माँ अमरौंतिन। घासी गुरु के जे जनमौतिन ।।

ममता रुप बड़े सती नारी। सत्य धरम जीवन बलिहारी ।।


चौथे सुमिरौं महँगू दासा, सतगुरु मा जेकर बिश्वासा ।।

रखे साथ सतनामी बाना, सादा जिनगी सत्य जुबाना ।।


पाँचे सुमिरौं औंरा धौंरा। सत्य ज्ञान गुरु मंगल चौंरा ।

छाँव सुहावय अउ पुरवाई,गुरु घासी सत ज्ञान लखाई ।।


छठवें सुमिरौं छात पहाड़ी। महिमा गावै जंगल झाड़ी ।।

गुरु जी बइठे धुनी रमाये। सब झन आवय सोर लमाये ।।


सातें सुमिरौं भंडारपुरी। प्रथम समागम गुरु के जूरी ।।

बढ़े जिहाँ ले ज्ञान प्रचारा। मानवता तब ले अवतारा ।।


चौपाई छंद- *गुरु चालीसा* दोहा- करत हवँव गुरु वंदना, हो करके मतिमंद। गजानंद गुरु भावना, लिख चौपाई छंद।। चौपाई गुरु हर दीपक ज्ञान उजाला। गुरु हर मंदिर देव शिवाला।। गुरु हर भक्ति भाव अउ पूजा। गुरु ले कोई बड़े न दूजा।। तीन लोक गाये गुरु महिमा। गुरु ले ही हे शिक्षा गरिमा।। गुरु हर इज्जत मान बढ़ाथे। सदा सफलता शिखर चढ़ाथे।। चाक कुम्हार समान गढ़े मन। गुरु कहिलाथे पहिया जीवन।। मूढ़ गूढ़ उद्धार करे हे। भवसागर ले पार करे हे।। छाँव कृपा गुरु जे हा पाये। जिनगी वो हा सफल बनाये।। धर्म कर्म गुरु मर्म बताथे। सदा सत्य के पाठ पढ़ाथे।। गुरु हर असली देव सही हे। जग के सृष्टि विशेष इही हे।। रूप देव के कोन सरेखा, गुरु हर कर्म बनाथे लेखा।। गुरु गुण सूर्य समान प्रखर हे। बसा रखव गुरु नाम अजर हे।। गुरु जग मा पहचान दिलाथे। इही धरा मा स्वर्ग दिखाथे।। गुरु के वचन न जाये खाली। जीवन बगिया के गुरु माली।। फूल समान सुगन्धित करथे। ज्ञान सुधा रस मन मा भरथे।। गुरु कबीर रैदास कहाये। सच्चाई विश्वास दिलाये।। गुरु नानक सत पंथ चलाये। सतगुरु घासीदास कहाये।। गुरु हर मथुरा गुरु हर काशी। गुरु के ज्ञान हवै अविनाशी।। रखव आत्म ला गुरु के दासी। बंधन छूटे लख चौरासी।। गुरु हर प्रेम दया के सागर। गुरु हर ज्ञान भरे गुण गागर।। गुरु हर पावन गंगा धारा। गुरु हर सब ला भव ले तारा।। गुरु वाणी रसपान करो सब। जीवन मा सुख शांति भरो सब।। चरण कमल रज कर लौ सेवा। कहिथे ऋषि मुनि गुरु हे देवा।। गुरु हर सत्य सनातन शोधक। अहंकार अज्ञान निरोधक।। सत्य पुंज गुरु सूरज जइसे। गुरु उपकार चुकाबो कइसे।। गुरु के कृपा स्वर्ग के सीढ़ी। तर जाथे पीढ़ी दर पीढ़ी।। गुरु गुण गाथे कीट पतंगा। गुरुवर करथे तन मन चंगा।। माता-पिता प्रथम गुरु मानौ। आदर गुरु के करना जानौ।। गुरु हर सभ्य समाज बनाथे। नेक भलाई राह सुझाथे।। कीचड़ मा गुरु फूल खिलाथे। सुखमय जिनगी सेज सजाथे।। मर्यादा के सीख सिखाथे। गुरु अटूट रहि वचन निभाथे।। गुरु हर जग के भाग्य विधाता। गुरु से कोई बड़े न दाता।। गुरु शिक्षा संस्कार दिये हे। मानवता कल्याण किये हे।। गुरु समाज के असली दर्पण। गुरु सेवा मा जीवन अर्पण।। शिष्य सदा रहि गुरु बलिहारी। महकाये जीवन फुलवारी।। वेद पुराण कहे गुरु ज्ञानी। रखव सुरक्षित कर्म निशानी।। कर्म गढ़व गुरु ले पा शिक्षा। बदला मा देहू गुरु दीक्षा।। सफल मनोरथ पूर्ण करे गुरु। जिनगी मा नित नेह भरे गुरु।। जीव चराचर सुन लौ प्राणी। झइन भूलहू जी गुरु वाणी।। लोहा ला करथे गुरु कुंदन, भरे विचार सदा ही कंचन।। पेड़ बबूल बनाये चंदन। करे गजानन गुरु पग वंदन।। दोहा- गुरुवर ज्ञान अथाह हे, कइसे करँव बखान। शब्द स्याह भी कम पड़े, सुन लौ संत सुजान।। 🔻स्वरचित मौलिक अप्रकाशित🔻 ---✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/07/2024


(गुरु घासीदास जी के 52 उपदेश)

*अ*

अमर नही संतो ये चोला, काल उठा ले जाही तोला|

हिरदे मा सतनाम बसा ले, गुरु के महिमा मनुवा गा ले||1


*आ*

आवव आवव सतगुरु चरना, नाम-पान हे गुरु के धरना|

भवसागर ले तब तर जाहू, सबद सबद जब ज्ञान लखाहू||2


*इ* 

इरखा लिग़री-चारी त्यागौ, मीठ बोल मा अंतस पागौ|

दूर बुराई पर के रहना, सत मारग धर निस दिन चलना||3


*ई*

सत ईमान धरम हे गहना, संत गुनी गुरु जन के कहना|

सत ला जानौ सत ला मानौ, सत रक्षा बर मन मा ठानौ||4


*उ*

उल्लू चाहत घपटे रतिया, हम ला भावत सतगुरु बतिया|

सत्य प्रकाश करे उजियारा, झूठ करे जग मन अँधियारा||5


*ऊ*

ऊँचा जग मा इंखर दर्जा, चुका कभू नइ पावन कर्जा|

दाई ददा जनम देवइया, गुरु हे जिनगी के सिरजइया||6


*ए*

एक नाम हे सार जगत मा, रमे बसे सतनाम भगत मा|

घट घट कण कण जीव चराचर, चाँद सुरुज अउ पर्वत सागर||7


*ऐ*

ऐंठ गोठ झन ऐंठत रहिबे, दया मया झन मेंटत रहिबे|

धन दौलत के छोड़ गुमाना, जुच्छा आना जुच्छा जाना||8


*ओ*

ओढ़ चलौ गुरु नाम चदरिया, छाय नही तब दुःख बदरिया|

नार फाँस ला काटे यम के, खुशहाली से जिनगी दमके||9


*औ*

और नही मन रंग रँगावव, अजर नाम सतनाम लखावव|

दया दान जन पर हित सेवा, कर्म नेक रख पावव मेवा||10


*अं*

अंत अनंत अनादि हवे सच, लोभ मोह ले रइहौ बच बच|

क्रोध अगन ले तन मन जलथे, धीर धरे सुख जिनगी चलथे||11


*अः*

छः आगर छः कोरी सुमिरन, करके तन मन गुरु ला अर्पन|

बन सत हंसा गुरु गुन गावय, जनम दुबारा जग मा पावय||12


*ऋ*

ऋषि मुनि गुरु जन के बानी, सत्य प्रेम ले सत पहचानी|

कर्मयोग जिनगी के शाखा, जग कल्याण करे नित भाखा||13


*क*

कपट द्वेष झन रार करौ जी, सत्य काम मा ध्यान धरौ जी|

नजर गड़े झन पर धन नारी, अपन करम फल कर निस्तारी||14


*ख*

खान-पान सादा रख भाई, काम असुर हे मांस खवाई|

स्वस्थ दिमाक बसे चतुराई, बात कहे सच गुरु गोसाई||15


*ग*

गला लगा ले दीन दुखी ला, हँसी खुशी दे बाँट सुखी ला|

मान असल जग मान खजाना, दुख बिपदा मा हाथ बँटाना||16


*घ*

घर घर मंगल चौका गावव, सत के मांदर झाँझ बजावव|

महानाम सतनाम जपौ सब, सत्य करम मा पाँव नपौ सब||17


*ङ*

गङ्गा जल कस गुरु के बानी, ध्यान लगा उर बनबे ज्ञानी|

बुरा भला के राह बतावय, भटकत हंसा पार लगावय||18


*च*

चाल चलन रख नेक करम ला, थाम सदा सतनाम धरम ला|

जनम धरे हस कुल सतनामी, सत्य अहिंसा बन अनुगामी||19


*छ*

छोड़ बुराई जी सुख जिनगी, नशा पान हे दुख के तिलगी|

हँसी खुशी घर तन जर जाये, पद इज्जत धन मान गँवाये||20


*ज*

जल जंगल के रक्षा कर लौ, मातृभूमि बर जी लौ मर लौ|

जिनगी के आधार हवय ये, सतगुरु उद्गार हवय ये||21


*झ*

झगरा झंझट ला तुम टारौ, द्वेष अहम ला आगी बारौ|

आपस मा हम भाई भाई, सुमता के मिल बीज उगाईं||22


*ञ*

पञ्च तत्व ले बने शरीरा, अग्नि भूमि जल गगन समीरा|

नाम तभे भगवान पड़े हे, सत्यनाम संसार खड़े हे||23


*ट*

टल जाथे दुख बिपदा आये, महामंत्र सतनाम लखाये|

मनुज मनोरथ सुफल सुहाये, पद निर्वान सुगम पथ पाये||24


*ठ*

ठगनी हे ये काया माया, मोह धरे जग जन इतराया|

अंत घड़ी मिट्टी मिल जाना, फिर मनुवा काहे पछताना||25


*ड*

डर डर के नइ जिनगी जीना, सुख दुख के हे बिछे बिछौना|

दुख दिन बाद मिले सुख रैना, कतका सुग्घर गुरु के बैना||26


*ढ*

ढोंग रूढ़िवादी ला छोड़व, ज्ञान राह मा मन ला मोड़व|

सही गलत के कर करौ सरेखा, कर्म बनाये सब के लेखा||27


*ण*

प्राण भले जावय सच खातिर, पर जीते ना कपटी शातिर|

ध्यान धरौ सतगुरु के कहना, सत्य सदा हो सबके गहना||28


*त*

तरी तरी तन घुन्ना खाये, जे सतनाम सबद दुरिहाये|29

धरे नही जे गुरु के बैना, पाय नही वो सुख दिन रैना||


*थ*

थाह मिले ना ज्ञान समुंदर, खोज मनुज मन खुद के अंदर|

सबद सबद धर गुरु के बानी, बनबे मनुवा परम सुजानी||30


*द*

दान ज्ञान के मोल अनोखा, बिना ज्ञान के जिनगी खोखा|

सच ला थाम मढ़ा ले जोखा, नइ खाबे तब मनुवा धोखा||31


*ध*

धरम करम दू नाँव बने हे, सतगुरु किरपा छाँव बने हे|

धरम बिना हे करम अधूरा, करम लेख ला कर लौ पूरा||32


*न*

नमन करौ गुरु संत चरन मा, ध्यान लगा सतनाम भजन मा|

नाम सबद जग मुक्ति बँधे हे, हर प्राणी के साँस छँदे हे||33


*प*

पाटव जाति- पाति के खाई, एक रंग तन लहू समाई|

मनखे मनखे एक समाना, सीखव सब ला गले लगाना||34


*फ*

फाँस फँसौ ना जाति धरम के, पाठ पढ़व सब नेक करम के|

कर्म बड़े हे मानव जग मा, बाँध सुमत चल हर पग पग मा||35


*ब*

बैर खैर के दाग न छूटे, प्रेम भाव के घड़ा न फूटे|

बात ध्यान ये रख के चलना, झूल सबो लौ सुमता पलना||36


*भ*

भरम-भूत के तोड़व जाला, सत्य प्रेम के पी लौ प्याला|

बाँध मया परिवार रखौ जी, सुख जिनगी आधार रखौ जी||37


*म*

मन के जीते जीत हवे जग, मन के हारे हार हवे पग|

धीर धरे सुख जिनगी मिलथे, रात गये ही भोर निकलथे||38


*य*

यज्ञ बरोबर मारग सच के, चलिहौ संतो तुम बच बच के|

कठिन परीक्षा पग पग मिलथे, फूल सफलता के तब खिलथे||39


*र*

रंग रचे बस सादा तन मा, नाम सुमर गुरु के जीवन मा|

अइसे कर लौ खुद के करनी, तर जाहू संतो बैतरनी||40


*ल*

लगन लगा कर माटी सेवा, मिलही धाम परम सुख मेवा|

येखर गोदी सरग समाना, संत गुनी गुन करे बखाना||41


*व*

वाणी गुरु के अमरित जइसे, सत्य ज्ञान हे पबरित जइसे|

जग जन हित संदेश दिये हे, मानवता परिवेश दिये हे||42


*श*

शंख बजे सतनाम सबद जब, मिट जाये दुख संत दरद सब|

मन कर चंगा भरे उमंगा, जब जब बाजे झाँझ मृदंगा||43


*ष*

षड़यंत्र करे जे सगा बिरादर, नइ पावय वो जग मा आदर|

छल कपटी ले बच के रइहू, नइ तो पग पग दुख ला सइहू||44


*स*

समय बड़ा बलवान हवे जी, सुख दुख के पहिचान हवे जी|

कदर करे जे मान कमाये, समय गवायें वो पछताये||45


*ह*

हँसी खुशी धर जिनगी जीना, चमके श्रम के माथ पसीना|

हीन भाव तज आगू बढ़ना, नव विकास के सिढ़ही गढ़ना||46


*क्ष*

क्षमा प्रेम ज्ञानी के गहना, दूर द्वेष कुंठा ले रहना|

समरसता के पाठ पढ़ावय, भला करे जग पाँव बढ़ावय||47


*त्र*

त्रास मिटे सतनाम जपन मा, फूल खिले सुख हिया चमन मा|

गा लौ संतो सतगुरु महिमा, जेन बढ़ावय जग जन गरिमा||48


*ज्ञ*

ज्ञान कभू नइ बिरथा जावय, मान सदा वो जग मा पावय|

धीर विवेक रखे ये मनखे, सच ला जाने सच ला परखे||49


*ढ़*

ढूँढ़ फिरे मन अंदर बाहिर, सत के महिमा जग हे जाहिर|

सत मा धरती खड़े अकासा, बात कहे गुरु घासीदासा||50


*ड़*

हाड़ मांस के देह बने हे, छुआछूत धर लोग सने हे|

खून अलग नइ बहे शरीरा, एक सबो के सुख अउ पीरा||51


*श्र*

श्रवण करौ सतगुरु के बानी, सँवर जही मानुष जिनगानी|

धर चलिहौ बावन उपदेशा, मिट जाही संतो सब क्लेशा||52


गुरु महिमा

जिनगी के मटका गढ़े, गुरु बन चाक कुम्हार।

ज्ञान जोत ला बार के, करथे मन उजियार।।


गुरु के महिमा निस दिन गावँव। चरण कमल मा माथ नवावँव।।

सबो देव ले देव बड़े गुरु। बने ज्ञान वरदान खड़े गुरु।।


गुरु-गुरु मा भी भेद हवे जी। गुरु गीता अउ वेद हवे जी।

द्वेष कपट मन गुरु नइ राखे। जग समाज हित भाखा भाखे।।


सदा भला के राह दिखावय। अंतस के गुरु खोट निकालय।।

जिनगी के गुण सार बतावय। भव सागर ले पार लगावय।।


गुरु घासी रैदास कबीरा। खींचिन ढ़ोंग विरुद्ध लकीरा।।

जन समाज हित लिन अवतारी। करिंन ज्ञान दे जग उजियारी।।


जग जाहिर हे गुरु के महिमा। गुरु ला हे चेला के गरिमा।।

गुरु ज्ञान बिना हंसा भटके। बीच भँवर मा नइया अटके।।


गजानंद गुरु के करय, बारंबार प्रणाम।

तोर नाम से मोर गुरु, जग मा होवय नाम।।


छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)24/07/2021


गुरु जीवन दर्शन

दोहा- 

धीर धीर चल आत हे, सत के थामे काम ।

 सादा चिनहा संग मा, मन मा हे सतनाम ।।

चौपाई-

        देवय सपना रात पहाती। जग मा बारे सत के बाती।।

                आवत हँव मैं तोरे अँगना। अमरौतिन के झूले पलना ।।

          अड़बड़ कुलुप रहय अँधियारी। सतगुरु पहुँचे महँगु दुवारी ।।

              शुभ सोमवार गुरु अवतारी। दिन होगे बड़ मंगलहारी ।।

              झाँझ मँजीरा बाजन लागे,महँगु दास घर खुशियाँ छागे ।

           कंचन कलश जोत हा साजे।गुर दरसन सतपुरुष बिराजे ।।

           सतपुरुष धरे घासी नामा। करही जग मा सत के कामा ।।

            सत्य निशानी खाम गढ़ाही। सतनामी के मान बढ़ाही ।।

दोहा-

महिमा बड़ हे मान लौ, घासी बचपन जान।

                     खेल खेल मा ही दिये, सत के जीे परमान ।।

चौपाई-

    जस जस बेरा बीतय ठाढ़े। तस तस बालक घासी बाढ़े।।

              संगी साथी खेले जावय। सत महिमा ला संग बतावय ।।

          लइका बारी चीज चुरावय। घासी चोरी पाप बतावय ।।

        पर नारी पर चीज बुरा हे। चोरी के तो ख़ुशी चुरा हे ।।

महिमा बड़ बचपना दिखाये। अधरे कपड़ा गगन सुखाये ।।

भाटा बारी मिरचा लाये। देख सबो अचरज हो जाये ।।

साँप बुधारू ला हे चाबे। चल घासी अब तहीं जियाबे।।

अमृत पानी घासी थामा। उठे बुधारू जप सतनामा ।।

 दोहा- 

बचपन बीते छाँव मा,माता पिता दुलार।

            माया जिनगी सार हे,जनम तभे उद्धार।।

चौपाई-

अमरौतिन माँ बोलन लागे। शादी के अब बेरा आगे।।

घासी के अब शादी करबो। नाती पोता कोरा धरबो ।।

घासी मन मा सोचन लागे। माया मोह कहाँ ला आगे।।

हँसा उबारे पहुँचे जग मा। बँध जाही जी बेड़ी पग मा ।।

समय चक्र के लगगे डेरा। सफुरा घासी परगे फेरा।।

सफुरा माता सिरपुर ग्रामा। आय बिहाये गिरौद धामा ।।

धीेर धीर दिन बीतन लागे। घर परिवार फिकर हा छागे।

खेत किसानी मिलके करबो। दुनो परानी सुन्ता धरबो ।।                    

दोहा-

बहरा डोली खार मा,जोतय खेत मरार।

           सँघरा नाँगर साथ मा,रहय बैल गरियार।।

 चौपाई-

सँघरा नाँगर रखे मरारा। जोतत राहय डोली बहरा ।।

बइला राहय बड़ गरियारा। कोर्रा मारय देख मरारा ।।

घासी पहुँचे तीर मरारा। रोकय जी पशु अत्याचारा ।।

घासी थामे मुठिया नाँगर। बइला रेंगय दू मन आगर ।।

अधरे नाँगर अधर तुतारी। बइला रेंगय सरपट भारी ।।

धान मुठा मा लेके घासी। जपे नाम गुरु सत अविनासी ।।

छींचय धान पुरोवय डोली। किरपा सतगुरु भरदिस झोलीब ।।

देख अचंभा घासी न्यारा। चरन गिरे हे बड़े मरारा ।।

दोहा- 

समय चक्र के डार मा, फरगे फल दू चार ।

 महके आमा मौर हे, बगिया छाय बहार ।।

चौपाई-

चार पुत्र घर पाँव मढ़ाये। आये जग मा बंश बढ़ाये ।।

बालक आगर अम्मर दासा। चौथा हे अड़गड़िहा दासा ।।

सहोदरा हे आँखी तारा। बेटी सबके रहय सहारा ।।

गाँव कुटेला गये बिहाये। सास ससुर के नैन सुहाये ।।

सफुरा पड़गे पुत्र वियोगा। अमरू ला बघवा ले भागा ।।

तब घासी ला सुरता आगे। मन हा मोरे मोह भुलागे ।।

माया मोह छोड़ तब घासी। ढूंढे जंगल सत अविनाशी ।।

जाके जंगल छात पहाड़ी। बइठे मोड़ दुनो जी माड़ी ।।

दोहा-

रम रम आगी हे बरे, बघवा करय दहाड़ब।

       जय गूँजय सतनाम के, झूमे छात पहाड़ ।।


जागृति के गुरु- बालकदास

बालकदास नाम गुरु ज्ञानी। आवव सुन लौ संत कहानी ।।

जेकर हे सुमता पहिचानी। हे गुरु धन्य वीर बलिदानी ।।


रामत सामत के बन अगड़ी। बाँध चलय गुरु मुड़ मा पगड़ी ।।

वीर बड़े सरहा जोधाई। संग लड़य जी खूब लड़ाई ।।


काया गुरु के दग दग दमके। माथा चंदन चम चम चमके ।।

जागृति के गुरु बन जी आँधी। सत समाज मुड़ फेटा बाँधी ।।


संग दुलरुवा हाथी भावय। जेमा चढ़ गुरु रामत जावय ।।

औराबांधा रहय रावटी। चले चाल तब दुश्मन कपटी ।।


रात रहय घपटे अँधियारी। दुश्मन छुपे करे तइयारी ।।

जइसे जेवन बर गुरु बइठे। टूट पड़े बैरी मन अइठे ।।


सांस रहत ले लड़े लड़ाई। गुरु रक्षक सरहा जोधाई ।।

अंत घड़ी गुरु सांसा छुटगे। सुन समाज के किस्मत फुटगे ।।


छल धोखा से वार करे हव। गुरु ऊपर संहार करे हव ।।

दिये श्राफ तब गुरु बलिदानी। मिट जाही जग तुँहर निशानी ।।


बालक दास हमर गुरु राजा। सुन पुकार तैं फिर से आजा ।

तोर बिना सत काज अधूरा। आके गुरु जी कर दे पूरा ।।


    देश अजादी परब मनाबो

वीर शहीद दिये कुरबानी। शत शत नमन इँखर बलिदानी ।।

देश धरम राखँय पहिचानी। अर्पन कर दिए सरी जिनगानी ।।


वीर भगत सिंह चढ़गे फाँसी। खूब लड़य मर्दानी झाँसी ।।

लाल बाल पाल चँद्रशेखर। देख फिरंगी काँपय थरथर ।।


गरम नरम दल हिंसावादी। एक साथ मिल करिन अजादी ।।

सपना सुघ्घर आँख सँजोवय। सोन चिरइँया भारत होवय ।।


माह अगस्त क्रांतिवादी। पन्द्रह तारीख लिन अजादी ।।

सन सैंतालीस खुशी छागे। छोड़ देश अंग्रेजन भागे ।।


देश अजादी परब मनाबो,लाल किला मा धज फहराबो ।।

देश भक्ति के गीत सुनाबो। शान तिरंगा मान बढ़ाबो ।।


केसरिया रंग चुनर घानी। राह बतावय त्याग निशानी ।।

श्वेत रंग हे शांति निशाना। हरा रंग समृद्धि बताना ।।


चंदन जइसे जेकर माटी। पहरादार हिमालय घाटी ।।

भारत भुइँया सोन चिरइँया। चरन पखारय गंगा मइँया ।।


पर अब देखव हालत भारी। झूठ पाप मारत किलकारी ।।

बात भुलागे सबो सियानी। राजनीति के चलत कहानी ।।


सपना भारत आज उजड़गे। मनखे हा मनखे बर अड़गे ।।

जाति धरम बर लड़त लड़ाई। हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई ।।


एक धरम बस देश धरम हो। देश बिकास सबके करम हो ।।

तब होबो हम भाई भाई। हिन्दू मुस्लिम सिक्ख  इसाई ।।


चौपाई छंद- छत्तीसगढ़ मोर महतारी

छत्तीसगढ़ मोर महतारी हे। सुख सुम्मत के चिनहारी हे ।।

येखर कोरा सरग समाना। महिमा गुन के करौं बखाना ।।


धान कटोरा येला कहिथे। जिहाँ संत गुरु ज्ञानी रहिथे ।।

माँ कौशिल्या के मइकारो।  रामचन्द्र जी के ममियारों ।।


संत कबीर जिहाँ हे बानी। वीर नरायन जस बलिदानी ।।

सत सन्देश दिये गुरु घासी। मनखे मनखे एक सुभाषी ।।


मन्दिर मस्जिद अउ गिरिजा घर। गुरुद्वारा एकता धरोहर ।।

सर्व धर्म सुमता ले रहना। भाईचारा येखर गहना ।।


कण कण मा हे देव बिराजे। भक्ति भाव जन जन मा साजे ।।

लोककला अउ गीत कहानी। कवि कविता अलख जुबानी ।।


कल कल झरना नदी पहाड़ी। भरे कटाकट जंगल झाड़ी ।।

खान खनिज के हे भंडारा। सोना चांदी लौह अपारा।।


जल जंगल जमीन हरियाली। बाग बगीचा अमुवा डाली ।।

कूक कोयली मारे ताना। सुवा ददरिया करमा गाना ।।


राउत नाचा पंथी टोली। सुग्घर लागे मया ठिठोली ।।

तीज तिहार लगे मनभावन। मया प्रेम के गीत सुहावन ।।


गाँव गाँव अउ शहर शहर मा। दिखे सुमत हर डगर डगर मा ।।

गजानंद बिनती कर जोरे। रइहू मिल जुल मया बटोरे ।।


चौपाई छंद- थामे जग पाखंड

*दोहा*- 

मनखे धर्म गुलाम बन, थामे जग पाखण्ड।

धरे अंधविश्वास ला, करथे ब्यर्थ घमण्ड।।


*चौपाई*-

अब के मनखे धरे गुलामी।

झूठ ढ़ोंग के करे सलामी।।

सही बात ले दूर बहुत हे। 

धरम नशा मा चूर बहुत हे।।


तथाकथित मा मगन पड़े हे। 

जाति धरम ला कहत बड़े हे।।

मानवता पहिचान कहाँ हे।

सत गुरु ज्ञानी ज्ञान कहाँ हे।।


*दोहा*-

पढ़े लिखे मनखे घलो, बनगे हे नादान।

मन्दिर मस्जिद मा इँहा, खोजत हे भगवान।।


कंकड़ पाथर पावन होगे। 

घट के देव लुकावन होगे।

दाई ददा भूख मा तड़पे।

जीते जी धन बेटा हड़पे।।


जपे भजे ना होय भलाई।

धरम आड़ धन मान लुटाई।

तुँहर भाग मा दुख करलाई।

चातुर मनखे खाय मलाई।।


*दोहा-*

आपस हम ला दे लड़ा, करत बाहरी राज।

हमर भाग मा हे लिखे, बनिहारी का काज ?


*चौपाई*-

जल जंगल जमीन बेचागे।

हमर भाग तकलीफ लिखागे।।

धरे कटोरा दान देवईया।

राज करत हे भीख मँगैया।।


दीन गरीबी दुख दिन काटे।

कोंन असमता खाई पाटे।।

जोर चीज बड़ मनखे बइठे।

क्रोध अहं मा तन मन अइठे।।


*दोहा*

दिन दिन बाढ़त हे इँहा, अँधियारी जी रात।

कोंन धरै सत राह अउ, गजानंद के बात।।


छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )


हे शंभू शिव शंकर

हे शंभू शिव शंकर भोला। आज पुकारत हँव मैं तोला ।।

रूप भयानक धरके आ जा। क्रोध अहं के बाजत बाजा ।।


पाप मिटा जा जग से अब तो। तोर आसरा देखय सब तो ।।

आँख तीसरा खोल दिखावव। पापी मन ला ठाड़ जलावव ।।


चन्द्र घटा ले धार बहा दे। गंगा माँ ला भार सहा दे ।।

तर जावय सब नर अउ नारी। जीव जंतु जल थल नभचारी ।।


अत्याचारी नइ तो रूकत हे। कुकुर सहीं निस दिन भूकत हे ।।

कोन मिटावय जग के दुख ला। तहीं दिखा दे मन के सुख ला ।।


बम गोला नइ काम करत हे। अग्नि मिसाइल धरम डरत हे ।।

भेज त्रिशूल करव संहारी। नाग शेष शिव गर धारी ।।


जहर घुरत हे अब तो सागर। कर विषपान कंठ शिव सादर ।।

कलजुग मा परमान दिखा जा। होथे सच का भगवान दिखा जा ।।


रखिया बरी

रखिया बरी बनाये भौजी। भइया खाये बड़ मनमौजी ।।

संग बरी के डारव मुनगा। जेकर हावय भारी गुन गा ।।


किसम किसम के बरी बनाले। दार उरिद मा स्वाद बढ़ाले ।।

बरी लेड़गा खूब मिठाथे। बर्राकस के शान बढ़ाथे ।।


जीमी कांदा दार सुहाये। बरी अदौरी नाम कहाये।।

मखना बरी लगे अमसुरहा। संग सुहाये रोटी गुरहा ।।


सोयाबीन बरी हे शहरी। दार बरी खावय जी लहरी ।।

तुमा बरी ला खा मनमाने। मूँग बरी खा सीना ताने ।।


आलू बरी उरिद के संगी। जेला खाथे जी मनरंगी ।।

गजानंद के कहना मानौ। बरी हवय गुणकारी जानौ ।।


इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

दोहा छंद - गुरु (छत्तीसगढ़ी)

 दोहा छंद-  गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर। अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।01 गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम। तोर ...