कहमुक़री-
देख जिसे मैं रूप सजाऊँ।
बिंदी कुमकुम माथ लगाऊँ।।
रोज करे मन जिसका दर्शन।
का सखि साजन? ना सखि दर्पण।।1
मेरे जीवन की आशा है।
नेह लुटाने जो प्यासा है।।
प्रेम डोर से मुझे लपेटा।
का सखि साजन? ना सखि बेटा।।2
करवट बदल बदल मैं सोऊँ।
याद उसे कर पल-पल रोऊँ।।
मचा दिया है दिल में हलचल।
का सखि साजन? ना सखि खटमल।।3
मुझ पर प्रेम कृपा बरसाये।
मेरी हर तकलीफ मिटाये।।
मेरी चाहत वो अभिमान।
का सखि साजन? ना सखि भगवान।।4
कभी हँसाये कभी रुलाये।
जीवन की सच राह दिखाये।।
प्रेम आस में खाकर ठोकर।
का सखि साजन? ना सखि जोकर।।5
घुमड़-घुमड़ कर आता है वो।
प्रेम नीर बरसाता है वो।।
आँख बसा जो बनके काजल।
का सखि साजन? ना सखि बादल।।6
रंग दिया है प्रेम रंग में।
आग लगाकर अंग अंग में।।
करता मुझसे हँसी ठिठोली।
का सखि साजन? ना सखि होली।।7
मेरा वो अनमोल रतन है।
निखरे जिससे रूप बदन है।।
जिसकी आहट कर दे घायल।
का सखि साजन, ना सखि पायल।।8
छुप-छुप कर देखा करता है।
तन्हाइयों से वो डरता है।।
कटे नही बिन उसके रैना।
का सखि साजन? ना सखि नैना।।9
मधुर-मधुर वह बोली बोले।
बैठ प्रेम पिंजरा में डोले।।
सुख-दुख में हँसता-रोता।।
का सखि साजन? ना सखि तोता।।10
नींद उड़ाये चैन चुराये।
बेदर्दी बन खूब सताये।।
बरते मेरे साथ न नरमी।
का सखि साजन? ना सखि गर्मी।।11
उसके बगैर जी न सकूँ मैं।
जहर जुदाई पी न सकूँ मैं।।
मेरे जीवन की वह आशा।
का सखि साजन? ना सखि साँसा।।12
रक्षा करने तत्तपर रहता
मन में मेरे उमंग भरता।।
मुझे सिखाये दुख सह लेना।
का सखि साजन? ना सखि सेना।।13
नव जीवन निर्माण करे जो।
अवचेतन में प्राण भरे जो।।
देता मेरे दिल में दस्तक।
क्या सखि साजन? ना सखि पुस्तक।।14
साथ रहे वो धूप छाँव में।
काँटा चुभने न दे पाँव में।।
जिनके बिन सुख राह अछूता।
क्या सखि साजन? ना सखि जूता।।15
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें