सोमवार, 22 अगस्त 2022

कहमुक़री-

कहमुकरी का अर्थ है --- कह के मुकर जाना।

कहमुकरी (Kahmukari) हिंदी और लोक साहित्य की एक बहुत ही सुंदर, मनोरंजक और कौतुकपूर्ण काव्य विधा है। यह अमीर खुसरो के समय से चली आ रही एक प्राचीन विधा है, जिसका अर्थ इसके नाम में ही छुपा है: 'कहकर मुकर जाना' (यानी अपनी ही बात से पलट जाना)।

      कहमुकरी काव्य की एक बहुत पुरानी विधा है और बहुत ही खूबसूरत ,मनोरंजक बूझ- बूझौव्व्ल (पहेली)  वाली विधा है। इस विधा को लिखने में आपको बहुत आनंद आएगा। और पढ़ने वालों को बहुत. गुदगुदाएगी।

      यह विधा दो सखियों के बीच वार्तालाप पर आधारित विधा है, जो कि चार चरणों की होती है। जिसकी प्रथम तीन पंक्ति एक सखी दूसरे सखी से  अपने साजन के बारे में  अपने मन की बात कहती है। परन्तु यह बात कुछ इसप्रकार से कहती है,कि  वह बात किसी अन्य बिम्ब पर भी सटीक बैठे।

 चौथी पंक्ति के पहले हिस्से में सखी पूछती है,क्या वह अपने साजन के बारे में बतला रही  है तो वह लजाकर कहती अपने बात से मुकरते हुए कहती नहीं मैं तो -------- के बारे में कह रही थी ।

      यह चार पंक्तियों की रचना है जो कि 16- 16 16 - 16 पर(चौपाई) की तरह या फिर  16-16 -15-15 पर लिखा जाता है।

  इसमें तुकांत चौपाई की तरह ही लेना होता है। 

चौथे चरण के आधे हिस्से में सखी प्रश्न करती , ( आठ मात्रा में), शेष आठ मात्रा में उत्तर होता है ।

     *16 वाले में अंत चौकल हो।*

*15 मात्रा वाले में अंत 21 हो*

*नोट*  - *इसके अलावा*

*आप सभी ध्यान रखेंगे* 

*तीसरी पंक्ति में* *जिसका ,वो ,उसे, उसका ,जो,जिसने,* *ज्यों , जिनका... आदि शब्द आना आवश्यक*

*मात्रागणनानुसार ---  न,ना ,नहिं  ,नहीं, सखी, सखि का प्रयोग कर सकते हैं*।

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 कहमुक़री-

देख जिसे मैं रूप सजाऊँ।

बिंदी कुमकुम माथ लगाऊँ।।

रोज करे मन जिसका दर्शन।

का सखि साजन? ना सखि दर्पण।।1


मेरे जीवन की आशा है।

नेह लुटाने जो प्यासा है।।

प्रेम डोर से मुझे लपेटा।

का सखि साजन? ना सखि बेटा।।2


करवट बदल बदल मैं सोऊँ।

याद उसे कर पल-पल रोऊँ।।

मचा दिया है दिल में हलचल।

का सखि साजन? ना सखि खटमल।।3


मुझ पर प्रेम कृपा बरसाये।

मेरी हर तकलीफ मिटाये।।

मेरी चाहत वो अभिमान।

का सखि साजन? ना सखि भगवान।।4


कभी हँसाये कभी रुलाये।

जीवन की सच राह दिखाये।।

प्रेम आस में खाकर ठोकर।

का सखि साजन? ना सखि जोकर।।5


घुमड़-घुमड़ कर आता है वो।

प्रेम नीर बरसाता है वो।।

आँख बसा जो बनके काजल।

का सखि साजन? ना सखि बादल।।6


रंग दिया है प्रेम रंग में।

आग लगाकर अंग अंग में।।

करता मुझसे हँसी ठिठोली।

का सखि साजन? ना सखि होली।।7


मेरा वो अनमोल रतन है।

निखरे जिससे रूप बदन है।।

जिसकी आहट कर दे घायल।

का सखि साजन, ना सखि पायल।।8


छुप-छुप कर देखा करता है।

तन्हाइयों से वो डरता है।।

कटे नही बिन उसके रैना।

का सखि साजन? ना सखि नैना।।9


मधुर-मधुर वह बोली बोले।

बैठ प्रेम पिंजरा में डोले।।

सुख-दुख में हँसता-रोता।।

का सखि साजन? ना सखि तोता।।10


नींद उड़ाये चैन चुराये।

बेदर्दी बन खूब सताये।।

बरते मेरे साथ न नरमी।

का सखि साजन? ना सखि गर्मी।।11


उसके बगैर जी न सकूँ मैं।

जहर जुदाई पी न सकूँ मैं।।

मेरे जीवन की वह आशा।

का सखि साजन? ना सखि साँसा।।12


रक्षा करने तत्तपर रहता

मन में मेरे उमंग भरता।।

मुझे सिखाये दुख सह लेना।

का सखि साजन? ना सखि सेना।।13


नव जीवन निर्माण करे जो।

अवचेतन में प्राण भरे जो।।

देता मेरे दिल में दस्तक।

क्या सखि साजन? ना सखि पुस्तक।।14


साथ रहे वो धूप छाँव में।

काँटा चुभने न दे पाँव में।।

जिनके बिन सुख राह अछूता।

क्या सखि साजन? ना सखि जूता।।15

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

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*कहमुकरी*

रूप रंग सब वही दिखाता,

देख जिसे यह हिय हरषाता।

कर दूँ जिस पर सर्व समर्पण

क्या सखि साजन? ना सखि दर्पण! (16)


हाथ पकड़कर नब्ज टटोले,

भेद हिया का है वह खोले।

देख जिन्हें मन काँपे थर-थर,

क्या सखि साजन? ना सखि डॉक्टर!(17)


​रस घोले जो मुख में आके,

लाल करे होंठों को जाके।

सभा-सलोने जिसकी शान,

क्या सखि साजन? ना सखि पान!(18)


पकड़ कलाई को वह बोले,

मस्ती कर लूँ हौले-हौले।

छुवन करे तो बढ़ती धड़कन,

का सखि साजन? ना सखि कंगन!(19)


श्याम घटा आँखों पर छाई,

मन मोहे बन कृष्ण-कन्हाई।

नैन कटारी कर दे घायल,

का सखि साजन? ना सखि काजल!(20)

इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/05/2026 


भीतर आए मन हरषाए,

बाहर जाए हिय घबराए।

विरह-अग्नि की टूटे फाँस,

क्या सखि साजन? ना सखि साँस!(21)


शहर बरेली से हैं आए,

कानों में प्रिय गीत सुनाए।

संग लगाते हैं जो ठुमका, 

क्या सखि साजन, ना सखि झुमका!(22)


हरित रंग का ओढ़ चदरिया,

महकाए जो हृदय नगरिया।

जिन्हें देखने तरसे यह मन,

क्या सखि साजन? ना सखि उपवन!(23)


केश कनक सम सुंदर दमके,

मुख बत्तीसी चमचम चमके।

करे मुझे वो हक्का-बक्का,

क्या सखि साजन? ना सखि मक्का!(24)


गोल मटोल लगे जो प्यारा,

रूप सलोना सबसे न्यारा।

प्रेम ताग में उसे पिरोती,

क्या सखि साजन? ना सखि मोती!(25)


श्याम सलोना मुझको भाए,

प्रेम नीर से मन हर्षाए।

सैर कराता मुझको अंबर,

क्या सखि साजन, ना सखि जलधर!(26)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)02/06/2026


रोज सबेरे है जो आता,

प्रेम किरण दे मुझे जगाता।

तेवर जिनका रहता तनकर,

क्या सखि साजन? ना सखि दिनकर!(27)


मेरे मन का प्यास बुझाता,

जीवन में नव आस जगाता।

देता जो साँसों को संबल,

क्या सखि साजन? ना ना सखि जल!(28)


ध्यान रखे जो पग-पग मेरा,

डाल राह में सुख का डेरा।

करे सुरक्षा जो रख अक्क्ल,

क्या सखि साजन? ना सखि चप्पल!(29)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)02/06/2026


​तन-मन पावन करने वाला,

जिसने मुझमें जीवन डाला।

छाँव कृपा दे बन जो गुरुवर,

क्या सखि साजन? ना सखि तरुवर!(30)


अमरैया में रास रचाया,

छैल-छबीला रूप दिखाया।

रस का सागर उसका धाम,

क्या सखि साजन? ना सखि आम!(31)


जिसमें अथाह ज्ञान समाए,

मुझको जिसका बोल सुहाए।

दिखलाए जो सत का पंथ,

क्या सखि साजन? ना सखि 'ग्रंथ'!(32)


​रात समय आँगन में आता,

चमक मुझे अपना दिखलाता।

मुखड़ा जिनका सुंदर न्यारा,

क्या सखि साजन? ना सखि तारा!(33)


रोज रात में है जो आता,

गोरा मुखड़ा को चमकाता।

प्रीत डोर में जो ले फाॅंद,

क्या सखि साजन? ना सखि चाँद!(34)


रोज सबेरे दौड़े आता,

उठो-उठो कह मुझे जगाता।

बहुत सुहानी है उसकी छवि,

क्या सखि साजन? ना ना सखि रवि!(35)


श्याम रूप धर नभ में छाए,

करके रिमझिम जो मन भाए।

तन की तपन बुझाए पल-पल,

क्या सखि साजन? ना सखि बादल!(36)


शाम सबेरे मन को भाए,

बेचैनी जो और बढ़ाए।

प्रीत जताकर करे दिवाना,

क्या सखि साजन, ना सखि गाना!(37)


देख आइना को मुस्काए,

पल-पल मन को बहुत लुभाए।

करता है जो बात अनूप।

क्या सखि साजन? ना सखि रूप!(38)

✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/06/2026


खड़ा सुरक्षा करने तत्पर,

लटका रहता घर के बाहर।

बन कर जो हरदम रखवाला,

क्या सखि साजन? ना सखि ताला!(39)


बंद किवाड़ी को जो खोले,

घुसकर अंदर हौले-हौले।

रखता है जो हुनर नवाबी,

क्या सखि साजन? ना सखि चाबी!(40)


पहचान मिला जिसके कारण,

किया जन्म से जिसको धारण।

जिसके बिन ना होता काम,

क्या सखि साजन? ना सखि नाम!(41)

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)04/06/2026


जब वह आए आफ़त टारे,

धूप-धार से मुझे उबारे।

उसका श्याम रूप मन भाता,

क्या सखि साजन? ना सखि छाता!(42)


पीला वस्त्र पहन जो आए,

देख जिसे तन-मन हर्षाए।

रखता पास सुखों का मेला,

क्या सखि साजन? ना सखि केला!(43)


श्याम सेज पर तन तड़पाए,

पर सबकी जो भूख मिटाए।

जिसके बिन है थाली खोटी,

क्या सखि साजन? ना सखि रोटी!(44)

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/06/2026


एक पंक्ति में कदम बढ़ाए,

मीठा देख लार टपकाए।

छूते ही दे सिहरन सीटी,

क्या सखि साजन? ना सखि चींटी!(45)


सबका मन जो खूब लुभाता,

रंग-बिरंगे रूप दिखाता।

भीड़-भड़क्का रेलम-पेला,

क्या सखि साजन? ना सखि मेला!(46)


गाँव शहर की शान बढ़ाता,

मनभावन जो मोद लुटाता।

घेर रखे जो मन का घाट,

क्या सखि साजन? ना सखि हाट!(47)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/06/2026


जग के सारे भेद छुपाए,

फीके रस में रंग जमाए।

मेरे मन का है जो सविता,

क्या सखि साजन? ना सखि कविता!(48)


पग धरते ही शोर मचाए,

उसके सुंदर बोल सुहाए।

कर देता जो मुझको घायल,

क्या सखि साजन? ना सखि पायल!(49)


भीतर खाली, बाहर खाली,

देता तान पड़े जो ताली।

बिन मुँह के जो बोले बोल,

क्या सखि साजन? ना सखि ढोल!(50)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/06/2026


दूर थकान मिटाता है जो,

शाम सबेरे भाता है जो,

जिसमें फुर्ती बहुत समाय।

क्या सखि साजन? ना सखि चाय!(51)


​अधरों पर जो रंग सजाए,

अंतर्मन की तपन बुझाए।

रीत-प्रीत का दे पहचान,

क्या सखि साजन? ना सखि पान!(52)


अंतर्मन की प्यास बुझाए,

हर एक रूप मन को भाए।

कहलाता है जो जिनगानी,

क्या सखि साजन? ना सखि पानी!(53)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/06/2026


अंग विशाल, बड़ी है काया,

मदमस्त चाल मन को भाया।

चलता बन जो हरदम साथी,

क्या सखि साजन? ना सखि हाथी!(54)


उधम मचाये जो तो हरदम,

डाल-डाल पर कूदे झमझम।

मुँह बिचकाय करे जो खटपट,

क्या सखि साजन? ना सखि मर्कट!(55)


तन काला पर है दिलवाला,

सीधा-सादा भोला-भाला।

प्रिय जिसको है महुआ आलू,

क्या सखि साजन? ना सखि भालू!(56)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)06/06/2026


मेरे मन को है जो भाता,

मेरा है वह भाग्य विधाता।

मिला न कोई इसके जैसा,

क्या सखि साजन? ना सखि पैसा!(57)


रात-रात भर जो तड़पाए,

आसमान में सैर कराए।

पल भर का जो बनता अपना,

क्या सखि साजन? ना सखि सपना!(58)


​याद सुबह प्रतिदिन जो आता,

नींद भगाकर होश जगाता।

गलती हो तो माँगे माफी,

क्यों सखि साजन? ना सखि, कॉफी!(59)

✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)06/06/2026


​रूप सँवारे, मन को भाये,

चाल चले तो जादू छाये।

बाँध रखे जो अपना बंध,

क्या सखि साजन? ना सखि, छंद!(60)


तन पर आए, मन को भाए,

धुँधली दुनिया साफ दिखाए।

आँखों पर जो करे करिश्मा,

क्या सखि साजन? ना सखि चश्मा!(61)


आकर मन की तपन बुझाए,

लिपटे तन से, मोद बढ़ाए।

ऋतु-सावन का है जो वारिस,

क्या सखि साजन? ना सखि बारिश!(62)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)06/06/2026


​रूप-रंग का है जो काला,

शीतल जल नित देने वाला।

जिसके बिन हर प्राणी भटका,

क्या सखि साजन? ना सखि मटका!(63)


सींच-सींच कर अन्न उगाए,

सारी जग की भूख मिटाए।

रखता सबका जो हित चेत,

क्या सखि साजन? ना सखि खेत!(64)


तन है लंबा, गांठों वाला,

रस का उसके जग मतवाला।

मन को भाए बन वह बन्ना,

क्या सखि साजन? ना सखि गन्ना!(65)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)06/06/2026


दिन रात संग मेरे खेले,

दर्द सभी वो मेरा ले ले।

पर तीखा है उनका तेवर,

क्या सखि साजन? ना सखि देवर!(66)


घर-आँगन में रौनक लाए, 

मीठी-मीठी बात सुनाए।

देख जिसे मन सुध-बुध खोता,

क्या सखि साजन? ना सखि तोता!(67)


पास रहूँ तो रूप निहारे,

पल-पल मेरी अलक सँवारे।

पल भर को भी तजे न सूरत,

क्या सखि साजन? ना सखि मूरत!(68)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)07/06/2026


चाल चले वो बड़ी सुहानी,

जिसकी जग में अमित कहानी।

दिशा हवा का जिसने मोड़ा,

क्या सखि साजन? ना सखि घोड़ा!(69)


सुबह-सुबह जो घर में आए,

दुनिया भर की खबर सुनाए।

ज्ञान बढ़ाए बुद्धि अपार,

क्या सखि साजन? ना सखि अखबार!(70)


माथे पर जो तिलक लगाता,

शीतल कर सब कष्ट मिटाता।

जिसका करते सब जग वन्दन,

क्या सखि साजन? ना सखि चन्दन!(71)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)07/06/2026


ऊपर से है रूप गठीला,

परतें खोले रंग-रसीला।

साजे सिर पर है जो ताज,

क्या सखि साजन? ना सखि प्याज!(72)


​गोल मटोल रखे जो काया,

सबके मन को है जो भाया।

हर महफिल का यह स्टार्टर,

क्या सखि साजन? न सखि टमाटर!(73)


अंग-अंग में जोश जगाए,

तृप्त करे जब सम्मुख आए।

करता है जो मुझे निहाल,

क्या सखि साजन? ना सखि दाल!(74)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)07/06/2026


गोल-गोल शब्दों के ताने,

सूझे बिना न कोई जाने।

जिसे बूझ मैं थकी सहेली,

क्या सखि साजन? न सखि पहेली!(75)


चित्त चुराए नैन लुभाए,

अंतस में सुख स्वप्न सजाए

रखे प्रीत जो बांधे डोर,

क्या सखि साजन? न सखि चकोर!(76)


सतरंगी पंखों का डेरा,

सबके मन को जिसने घेरा।

बोल मधुर गूँजे चहुँओर,

क्या सखि साजन? ना सखि मोर।(77)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)07/06/2026


मझधारों में हाथ बढ़ाए,

मुझे सुरक्षित पार लगाए।

लगा रहे जिससे हर चाव,

क्या सखि साजन? ना सखि नाव!(78)


डगर-डगर जो चलता जाए,

मंज़िल की वह आस जगाए।

बनकर जो सुख-दुख का ग्राही,

क्या सखि साजन? ना सखि राही!(79)


​टेक-टेक लाठी को आए,

पल में बिगड़ी बात बनाए।

ध्यान रखे जो सबसे ज्यादा,

क्या सखि साजन? ना सखि दादा!(80)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)07/06/2026


रात समय वह खुल-खुल जाए,

सुखद हवा जो घर में लाए।

देखूँ बाहर मिले न झिड़की,

क्या सखि साजन? ना सखि खिड़की।(81)


घर की जो है लाज बचाता,

बाहर वाले को अटकाता।

खोलो तो वह देता बाट,

क्या सखि साजन? न सखि कपाट!(82)


दिन भर बैठे मुझे रिझावे,

दुनिया भर की सैर करावे।

कहलाता है जो परजीवी,

क्या सखि साजन? ना सखि टीवी!(83)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)07/06/2026


दुख में सबसे पहले आवे,

सुख में भी वह रंग जमावे।

नेक-नेम है जिसका धाॅंसू,

क्या सखि साजन? ना सखि आँसू!(84)


सारे जग को राह दिखाए,

ममता का वह रस बरसाए।

मेरे सुख का जो अधिकारी,

क्या सखि साजन? ना सखि नारी!(85)


तन का स्वेद बहाए भारी,

जिसके आगे सुध-बुध हारी।

तपिश दिखाए, तनिक न नरमी,

क्या सखि साजन? ना सखि गरमी!(86)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)07/06/2026


बाँध सुरक्षा की जो डोरी,

हरदम मेरा राह निहोरी।

मेरे लिए बने बैसाखी, 

क्या सखि साजन? ना सखि राखी!(87)


बात-बात में मुझे सताये,

माँ-बाबू से डाँट खिलाये।

फिर भी कहे सदा खुश रहना,

क्या सखि साजन? ना सखि बहना!(88)


बिन मांगे सब लाकर देवे,

रूठूं तो वो मुझे मनावे।

पास रहे जो थाम कलाई,

क्या सखि साजन? ना सखि भाई!(89)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)07/06/2026


अँधियारा जो दूर भगाए,

सुप्त नींद से मुझे जगाए।

खुशी बिखेरे चारों ओर,

क्या सखि साजन? ना सखि भोर!(90)


दिन ढलते जो घर पर आए,

मन का सारा ताप मिटाए।

थके बदन को दे आराम,

क्या सखि साजन? ना सखि शाम!(91)


सपनों का जो सेज सजाए,

थपकी देकर मुझे सुलाए।

मीठी-मीठी करके बात,

क्या सखि साजन? ना सखि रात!(92)

इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)08/06/2026


सीने पर जो लहरें खाए,

पल में रूठे, पल में भाए।

डुबो मुझे ले जो बन गागर,

क्या सखि साजन? ना सखि सागर!(93)


मन की भाषा जो समझाती,

हर भावों को सहज बताती।

लगे भाल पर सुंदर बिंदी,

क्यों सखि साजन? ना सखि हिंदी!(94)


मेरा आँचल गोद सजाए,

घर का हर कोना महकाए।

दिल का है जो सुंदर सच्चा,

क्या सखि साजन? ना सखि बच्चा!(95)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)09/06/2026


जिसके बिन कुछ हाथ न आए,

वह रूठे तो सुख खो जाए।

सिखलाता जो जीवन मर्म,

क्या सखि साजन? ना सखि कर्म!(96)


गोल-गोल जो बड़ा रसीला,

रंग हरा जिसका चमकीला।

रस टपके जिससे भरपूर,

क्या सखि साजन? नहिं अंगूर!(97)


सुर्ख रंग तन बड़ा गठीला,

गुणकारी है रूप रसीला।

जिसमें दिखे न कोई ऐब,

क्या सखि साजन? ना सखि, सेब!(98)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)10/06/2026


​सुख-दुख में जो साथ निभाए,

हँसते-रोते गले लगाए।

'सत्यबोध' वो तारणहार,

क्या सखि साजन? ना सखि परिवार।(99)


​जिससे घर में रौनक आए,

देख जिसे मन अति हर्षाए।

जिसके बिना लगे सूनापन,

क्या सखि साजन? ना सखि आँगन!(100)


प्रेम खूँट से बाँधे मन को,

राहत देता है जो तन को।

सुध-बुध खोए, करे मलंग,

क्या सखि साजन? न सखि पलंग!(101)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)10/06/2026


ऊपर से वह हरा-भरा है,

भीतर ठंडी प्रीत धरा है।

हर लेता जो मन की पीरा,

क्या सखि साजन? ना सखि खीरा!(102)


रोज सबेरे पट जो खोले,

सौदे की वो भाषा बोले।

दिए जरूरत का सामान,

क्या सखि साजन? न सखि दुकान!(103)


वादे करके दिल बहलाए,

अपना कहकर पास बुलाए।

हमदर्द बने जो जुमले देता,

क्या सखि साजन? ना सखि 'नेता'!(104)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)11/06/2026


वादे करके दिल बहलाए,

अपना कहकर पास बुलाए।

हमदर्द बने जो जुमले देता,

क्या सखि साजन? ना सखि नेता!(105)


बंद रहे तो मन अकुलाए,

खोले से वो ज्ञान बढ़ाए।

आकर दिल में दे जो दस्तक,

क्या सखि साजन? ना सखि पुस्तक!(106)


हरदम साए जैसा रहता,

सुख-दुख की हर बातें सहता।

जो है मेरे लिए बंदगी,

क्या सखि साजन? न सखि जिंदगी!(107)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)13/06/2026


हरा-भरा है जिसका काया,

जिसने जीवन रूप सजाया।

देख जिसे मन होता मंगल,

क्या सखि साजन? ना सखि जंगल!(108)


जो मुझको है गोद खिलाए,

उनसे ही जीवन इठलाए।

हरी-भरी हो या हो परती,

क्या सखि साजन? ना सखि धरती!(109)


आते ही जो घूँघट खोले,

छू ले मुझे बिना कुछ बोले।

झूम उठे मन संग शरीर,

क्या सखि साजन? ना सखि समीर!(110)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)15/06/2026 


देख जिसे मन है ललचाए,

तीखा मीठा स्वाद चखाए।

देखूँ जिसका हरदम बाट,

क्या सखि साजन? ना सखि चाट!(111)


गोल-गोल तन रूप सलोना,

देख जिसे मन चाहे खोना।

रस का घूंट पिए जो चुपचुप,

क्या सखि साजन? ना सखि, गुपचुप!(112)


​गोल-गोल है रस की धारी,

देख जिसे ललचाए नारी।

करे न रस की कभी फरेबी,

क्या सखि साजन? नहीं जलेबी!(113)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)13/06/2026


तन से लिपटे देह सजाए,

मनभावन जो रूप दिखाए।

वो तो है जी बहुत अनाड़ी,

क्या सखि साजन? ना सखि साड़ी!(114)


तन की शोभा शान बढ़ाए,

मुखड़े जिससे खिल-खिल जाए।

हिय में घोले रस की लाली,

क्या सखि साजन? ना सखि बाली!(115)


स्वप्न गगन में जो ले जाए,

सुध-बुध मेरी सब बिसराए।

देख जिसे मेरा मन भूला,

क्या सखि साजन? ना सखि झूला!(116)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)16/06/2026


कहमुकरी:


शीश मुकुट है सुंदर काया,

वक्त उसी के साथ बिताया।

रखूँ सहेज बनाकर पुड़िया,

क्या सखि साजन? ना सखि गुड़िया!(117)


पल-पल मेरे साथ बिताए,

सुख-दुख में जो अश्रु बहाए।

मिले नहीं जिसके बिन चैन,

क्या सखि साजन? ना सखि नैन!(118)


मेरे मन को जो है भाता,

पास रहे तो महक लुटाता।

छूते ही मिट जाती शूल,

क्या सखि साजन? ना सखि फूल!(119)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)16/06/2026


रात-रात भर जाग जगाए,

अपनी धुन में सब बिसराए।

तन-मन से जो है मनमौजी,

क्या सखि साजन? ना सखि फ़ौजी!(120)


अंग-अंग का नाप लिए जो,

भाव हिया का भाँप लिए जो।

काम करे अपने मनमर्जी,

क्या सखि साजन? ना सखि दर्ज़ी!(121)


तन को सुंदर रूप सजाए,

मन को मोहे, रंग जमाए।

चमकाए हर इक सिंगार,

क्या सखि साजन? न सखि, सुनार!(122)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)16/06/2026


​अंग लगायें बिरह मिटाए,

मन की तपती आग बुझाए।

जिसका जग में होता वंदन,

क्या सखि साजन? ना सखि चन्दन!(123)


मस्तक ऊपर रंग बिखेरे,

रूप अनोखा मुख पर मेरे।

देख जिसे मन करे ठिठोली,

क्या सखि साजन? ना सखि रोली!(124)


मांग सँवारे, मुख चमकाए,

देख जिसे तन-मन हर्षाए।

रंग उमंग भरे जो रुमझुम,

क्या सखि साजन? ना सखि कुमकुम!(125)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)18/06/2026


होंठों से रस-रीति बढ़ाए,

मुख पर आए शोर मचाए।

उड़े लगाकर जो ध्वनि पंख,

क्या सखि साजन? ना सखि शंख!(126)


​कहते इसे सभी हितकारी,

जिसे पूजते पति व्रत नारी।

सेवा कर अंतस है हुलसी,

क्या सखि साजन? ना सखि तुलसी!(127)


अंग-अंग में स्फूर्ति जगाता,

सुस्ती और थकान मिटाता।

दूर भगाए जो सब रोग,

क्या सखि साजन? ना सखि योग!(128)

✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)22/06/2026

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