गुरु वंदना
करौं आरती रोज तोर ।
हाथ अपन मैं दुनों जोर ।
सुन लौ अर्जी आप मोर ।
हे सतगुरु कर मन अँजोर ।।1
भज के गुरु जी तोर नाम ।
बंदन कर के जैत खाम ।
हृदय बसा गुरु सत्यधाम ।
करथौं मैं शुरुआत काम ।।2
करौ बुराई पाप नाश ।
दूर रहे मन लोभ फाँस ।
जब तक साँसा चलै साँस ।
सतगुरु राहय तोर वास ।।3
पाँव बढ़े जग सत्य राह ।
मिले सदा सतगुरु पनाह ।
भर दे मन में प्रेम चाह ।
तोर ज्ञान सागर अथाह ।।4
हावँव लइका मैं अबोध ।
रहौं दूर मैं अहम क्रोध ।
सत्य राह धर करौं शोध ।
गजानंद मैं सत्यबोध ।।5
गुरु घासी के सात बात
घपटे राहय जात पात ।
झूठ पाप के घोर रात ।
गुरु घासी के सात बात ।
तब मनखे ला दिस निजात ।।1
सतगुरु मा रखव आस ।
सार सार हे बात ख़ास ।
करे बुराई काल नास ।
काटे यम के नार फाँस ।।2
नशा - पान से रहव दूर ।
तन मन घर सब जाय चूर ।
मिटगे कतको बीर शूर ।
मउत बुलावय आँख घूर ।।3
मानवता के रखव नींव ।
एक बरोबर सबो जीव ।
दया धरम के अमृत पीव ।
मांस छोड़ तुम खाव घीव ।।4
जुआ जरे चोरी बिगाड़ ।
देथे घर के खुशी फाड़ ।
देखव हो के तुमन ठाड़ ।
बिकगे कुरिया खेत झाड़ ।।5
घासी गुरु के धर लौ ज्ञान ।
पर नारी माता समान ।
इँहला बेटी बहिन जान ।
ममता के तो इन खदान ।।6
उतरें सब झन एक घाट ।
देइस सबला कोंन बाँट ।
ऊँच नीच के भेद पाट ।
चलव लगाबो प्रेम हाट ।।7
गजानंद के सार बात
सतनामी रख आन बान ।
गुरु बालक के शौर्य शान ।
सुमता मन में आज ठान ।
आही तब तो नव बिहान ।।1
मुड़ मा पगड़ी सेत साज ।
सोहय चंदन माथ नाज ।
सत्य राह धर करौ काज ।
लेवव बइँहा जोर आज ।।2
तोर मोर के भेद छोड़ ।
लोभ मोह के फाँस तोड़ ।
झूठ अहं के घड़ा फोड़ ।
ले समाज सम्बन्ध जोड़ ।।3
अँधियारी हे घोर रात ।
आशा दियना मन जलात ।
गजानंद के सार बात ।
आगू बढ़ सुमता मढ़ात ।।4
गुरु बालक के जनम खास
सबो सन्त सुनव इतिहास ।
मन भीतरी भरय हुलास ।
अष्टमी भादो उजास ।
गुरु बालक के जनम खास ।।1
सुमता के गुरु करे काज ।
जागय सतनामी समाज ।
मुड़ पगड़ी गुरु चले साज ।
लाये बर जी हमर राज ।।2
नइतो कुछु बस भजे होय ।
अंतस छुप छुप मोर रोय ।
देख सुवारथ बीज बोय ।
करजा गुरु के कोंन ढोय ।।3
आवव पूरा करिंन आज ।
बाँचे गुरु के सुमत काज ।
बाँधव मुड़ वीरता ताज ।
करही पीढ़ी हमर नाज ।।4
गजानंद हे मोर नाम
गजानंद हे मोर नाम ।
अभियंता हे मोर काम ।
जिला मुँगेली मा मुकाम ।
गाँव सेंदरी धन्य धाम ।।1
लैनदास हे पिता मोर ।
राखे हे हमला सजोर ।
धन्य दुकलहीन मइँया तोर ।
बेटा करत रइँहीं सोर ।।2
भाई हम जी हँवन सात ।
सबले मँय हा छोट भ्रात ।
चलथन धर हम सुमत बात ।
दुश्मन दे ना सकय मात ।।3
सुख बर बेटी तीन मोर ।
महकाये घर मन विभोर ।
वर्षा मेघा ऋतु अँजोर ।
बगरावय जग गाँव खोर ।।4
उषा संगिनी हवय साथ ।
थामे सुख दुख मोर हाथ ।
हे सतगुरु हे मोर नाथ ।
तँय हा चन्दन मोर माथ ।।5
राखी ममता के तिहार-
राखी ममता के तिहार
भाई बहिनी के दुलार
गजानंद के सुन पुकार
करजा राखी लौ उतार
बड़ बड़का हे उँखर भाग
बँधय कलाई प्रेम ताग
महकै जिनगी खुशी बाग
गूँजय अंतस प्रेम राग
कुछ के किस्मत हे अजीब
बंधन राखी नइ नसीब
आय खुशी ना मन करीब
भाई बहिनी वो गरीब
पावव बाँटव खुशी आज
बहनी सबके मान लाज
सोंचौ समझौ ये समाज
बहिनी के मुड़ बाँध ताज।।
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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