नाम जपौ सतनाम के
नाम जपौ सतनाम सदा मन सुघ्घर मानुष जोनि ल पा के।
कोन घड़ी तन साँस उड़े धन दौलत से किरिया तक खा के।।
बूड़त हावय नाव दया अब,देखव थोकिन ध्यान लगा के।
काम बने सत के कर ले जग,नाम दिखे बस ऊपर जा के।।
सूर्य समान हवे गुरु महिमा
सूर्य समान हवे महिमा गुरु अंतस ज्ञान प्रकाश भरे हे। सीख सिखावय राह दिखावय मूरख ला हुशियार करे हे।। द्वेष कभू नइ राखय मन पेड़ बने सुख छाँव धरे हे। हे भगवान समान सुनौ गुरु नित्य गजानन पाँव परे हे।। 30/06/2024
धाम गिरौदपुरी
धाम गिरौदपुरी म बहे सत संगत के बड़ पावन रेला।
फागुन के पँचमी छठ सात जिहाँ भरथे गुरु के सुन मेला।।
नाम जपै सतनाम सबो नित चंदन माथ लगा गुरु चेला।
मंगल गीत बजे दिन रात गजानन जी मनभावन बेला।।
धाम गिरौदपुरी बड़ पावन
धाम गिरौदपुरी बड़ पावन जन्म जिहाँ हमरो गुरु घासी।
नाम जपौ सतनाम सदा गुरु जी कहिगे सत हे अविनासी।।
सत्य प्रतीक दिये हम ला सतखाम गड़ा सबके घट वासी।
ध्यान करे गुरु के मिट जावय कष्ट गजानन घोर उदासी।।
राह धरे गुरु के चल
राह धरे गुरु के चल मानुष तोर इही जिनगी तर जाही।
लोभ अहं तज दे मन ले तब छाँव सुखी जिनगी भर जाही।।
प्रेम भरे कर बात सदा सुनके सबके दुख हा हर जाही।
भोर गजानन जी सुमता जग आज नहीं कल तो कर जाही।।
नाम लखा सतनाम सदा नाम लखा सतनाम सदा भव ले बढ़िया तँय तो तर जाबे। राह दिखावत हे सत के गुरु ध्यान धरे चल ले सुख पाबे।। ज्ञान कभू बिरथा नइ जावय बाँट तभे तँय तो पतियाबे। छोड़ गजानन लोभ मया धन साँस उड़े अबड़े पछताबे।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/08/2024
नाम धरे गुरु के चल
बाँध मुड़ी पगड़ी सत सेत सदा लगबे तब तो सतनामी।
नाम धरे गुरु के चल ले बन जा सत के तँय हा अनुगामी।।
चंदन माथ सजा बढ़िया मन के अँगना कर ले गुरु धामी।
फेंक निकाल बसे सब पाप बुरा न रहे मन मा कुछ खामी।।
नाम गजानन जी गुरु के जप ज्ञान गुणी गुरु के धर ले मन के अँधियार सदा मिट जाही। दूर करे भ्रम खोट विकार दयानिधि हे गुरु राह दिखाही।। ध्यान लगावत हो शरणागत कष्ट मिटा सुख धार बहाही। नाम गजानन जी गुरु के जप नाव बने भव पार लगाही।।
मुक्ति बँधे गुरु नाम
प्रेम सुधा रस हे बरसे सतनाम जपे धर ले गुरु बानी।
मुक्ति बँधे गुरु नाम धरे मन कंचन हो सँवरे जिनगानी।।
राह दिये सत थाम चले बर संत सदा जग हे बरदानी।
बाँध रखे सुमता जग मा गुन ज्ञान गजानन हे मन ठानी।।
गुरु सत्य लगी
माँदर झाँझ बजे मनभावन नाचत हे मन मोर पपीहा।
गीत सुने जब हे गुरु के तब झूमत हे तन के सत ठीहा।
नीक लगे गुरु के बचना तर जावत हे सुन ले बड़ जी हा।।
आज गजानन के बड़ भाग जगे मन मा गुरु सत्य लगी हा।।
एक बरोबर जीव चराचर
झूठ भरे मटका मन फोड़व छोड़व लोभ मया धन माया।
ज्ञान धरे गुरु के चल मानुष फेर सबो मिलही सुख छाया।।
एक बरोबर जीव चराचर छोड़ गुमान इही तन काया।
मीत मया मन मा भर ले जग मा जब ये मनखे तन पाया।।
एक बरोबर धर्म सबो
पावन हे भुइँया गुरु मोर गिरौदपुरी सत धाम बड़े हे।
ज्ञान लखावय संत समाज उही गुरु के जग नाम बड़े हे।।
जोत जला सतनाम रुपी गुरु मानवता बर काम बड़े हे।।
एक बरोबर धर्म सबो मनखे न रहीम न राम बड़े हे।।
ये तन राख बरोबर
ये तन राख बरोबर फेर भरे मटकी मन लालच भारी।
काम बुता कर नेक रे मानुष साँस घलो तँय पाय उधारी।।
राखत राखत राख बने तन मोह मया झन होय लचारी।
राख बने मन उज्जर देख तहाँ जग लागय मंगलहारी।।
गुरु बालक दास जुबानी
बात धरे चलना पड़ही सच हे गुरु बालक दास जुबानी।
बाँध बने सुमता गठरी बनही जग मा तब तोर कहानी।।
मान बढ़ाइस राह दिखाइस देइस जी सुमता पहिचानी।
बंदन हे गुरु बालक दास सदा सुरता रइही बलिदानी।।
मिनी जग माता
सागर तैं ममता करुणा दुख ला कर दूर मिनी जग माता।
ले किरपा सतनाम सदा बनबे हमरो अब भाग्य बिधाता।।
हाथ सदा रखबे सर ऊपर होय कई जनमो तक नाता।
हाँसत गावत ये जिनगी कटजै बन जा सब के सुख दाता।।
कोंन दिशा सच खोजन जाँवव
कोंन दिशा सच खोजन जाँवव, झूठ हवे अब पाँव पसारे।
धूम मचावत पाप फिरे जग,रोवत हे सच आँख निहारे।।
झूठ बरोबर पाप नही जग,देख बसे सच कोंन किनारे।
मान बचालव मानुष जी अब,हे बइठे छुप पाप दुवारे।।
नाँगर खाँध किसान धरे
नाँगर खाँध किसान धरे अब जाय करे बर खेत किसानी। खूब कमावय अन्न उगावय जाँगर के सँग जोर मितानी।। नीक लगे सबला सुन तो अब अर्र तता मुख बोल सुहानी। बाँध मुड़ी पगड़ी चलथे भगवान इही धरती बरदानी।।
सार इही जिनगी
काम करौ जग मा अइसे मनखे तन ला तुम सुग्घर पाके।
मानवता रख ले मनुवा सब जीव चराचर प्रेम बसा के।।
एक बरोबर जान सबो तँय भेद बसे मन घांव मिटा के।
सार इही जिनगी कहिथे सुन आज गजानन ध्यान लगा के।।
हो अँधरा मनखे
हो अँधरा मनखे कहिथे अब मन्दिर के भगवान बड़े हे।
भूख मरे घर के भगवान सुनौ अब पाथर दूध चढ़े हे।
मानवता बर हाथ उठे नइ लोभ धरे जग खूब लड़े हे।
देख भला पहिचान गजानन आज कहाँ इनसान खड़े हे।।
भारत देश भविष्य कहाँ हे..? देख उघार बने नयना अब, भारत देश भविष्य कहाँ हे। भूख मिटाय उपाय करे, गुरु के अब देखव शिष्य कहाँ हे।। वंचित हे हक ले तबका कुछ, फेर कहें असपृश्य कहाँ हे। पावय खावय कौर सुखी सब, खोज गजानन दृश्य कहाँ हे।।
मनु वर्ण करे निरमाणा
पूछत हे जग हा मनु ला कइसे तँय वर्ण करे निरमाणा।
भेद करे मनखे मनखे अब देख समाज भये निसप्राणा।।
बाम्हन क्षत्रिय वैश्य ग शूद्र म हावय का अलगे तन हाड़ा।
का धरती जल शुद्ध हवा अलगे बहथे सबके घर बाड़ा।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
झन बाँट ददा अउ दाई
बाँट डरे घर खेत दुवार कभू झन बाँट ददा अउ दाई। लालन पालन तोर करे सहिके दुख के दिन जे करलाई।। बाँध मया गठरी रइहू कुमता बनथे दुख के बड़ खाई। ध्यान धरौ यह बात गजानन प्रेम करै सुमता भरपाई।। इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/10/22
मत्तगयंद सवैया- योग योग निरोग रखे तन ला हरथे सब ये दुख रोग बिमारी। भार घटावय आयु बढ़ावय साफ रखे नित श्वांस दुवारी।। लोम विलोम कपाल करौ तन खातिर ये बहुते गुणकारी। योग करौ अब रोज करौ मिल वृद्ध जवान सबो नर नारी।। नानक बुद्ध कबीर रहीम कहे मुनि योग करौ गुरु घासी। स्वस्थ रखे तन चुस्त रखे करथे दुख दूर थकान उदासी।। योग बिना मनखे बन जावय रोग अनेक मुसीबत दासी। योग करे उपचार दमा लकवा मधुमेह बढ़े ज्वर खाँसी।।
योग करौ सब लोग करौ हँस लौ सब ला तुम रोज हँसा के।
स्वस्थ समाज निरोग समाज रखौ सपना नित नैन बसा के।।
लोगन योग हवे दुरिहावत नास नशा तन फाँस फँसा के।
जाग जगा अभियान चला सब ला बतला नुकसान नशा के।।
योग निवारण रोग करे रख स्वस्थ निरोग बने हितकारी।
का बुढ़हा अउ का लइका सब योग करौ सुन लौ नर नारी।।
लोम विलोम कपाल सुखासन आवन दे नइ पास बिमारी।
योग गजानन रोज करे महके जिनगी बन के फुलवारी।।
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मत्तगयंद सवैया- देख चरित्तर आवत हाँसी जीयत मा तरसे कपड़ा तन बाद मरे मथुरा अउ काशी। छप्पन भोग चढ़ावँय पाथर खावत हे पुरखा पर बासी। बाप बने कउँवा दिखथे जग देख चरित्तर आवत हाँसी। ढोंग खिलाफ खड़े गुरु नानक संत कबीर बबा गुरु घासी।।
मत्तगयँद सवैया- टूटत हे बिसवास दिनों दिन रात अमावस होवत हे घनघोर घिरे दुख के दिन आगे। स्वारथ मा मनखे अब जीयत मीत मया बइरी कस लागे। दुश्मन कोंन इहाँ हितवा भ्रम के बदरी मन मा अब छागे। ले कर आज उपाय गजानन दूर बला कुमता डर भागे।। झूठ धरे मनखे चलथे सत के दियना अब कोंन जलाही। लोभ भरे मन भीतर मा भवसागर ले कइसे तर पाही।। टूटत हे बिसवास दिनों दिन आस मया कइसे जग आही। घूमत हे बनके गिधवा जन नोंच गजानन जी तन खाही।। इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) १९/१०/२२
मत्तगयँद सवैया- देख उठा अब नैन गजानन कोंन दिशा सत खोजन जावँव झूठ अहं भ्रम पाँव पसारे। रोवत हे मनखे करुणा बर कोंन इहाँ सुख नैन निहारे।। कालिख ला हिरदे चुपरे मनखे मन ला अब कोंन उजारे। स्वारथ मा सब आज गजानन कोंन सुजान समाज सुधारे।। आँख तरेरत हें अपने अपने बर तो बलवान बने हे। बेच डरे मनखे पुरखा धन लोभ धरे धनवान बने हे। भूल गये पहिचान खुदे करथे पर के गुणगान बने हे। देख उठा अब नैन गजानन मीत मया अनजान बने हे।। इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/10/22
गाँव कहाँ अब गाँव सरीक
गाँव कहाँ अब गाँव सरीक कहाँ सुख छाँव बसे मन पीरा। देख सिरावत हे सुमता परिवार सुवारथ खींच लकीरा।। एक रहौ खुशहाल रहौ सच बात कहे गुरु संत कबीरा। छंद लिखौं अइसे अब तो पढ़ के सबके मन होय अधीरा।। :::::::::::::::मत्तगयंद सवैया:::::::::::: ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छतीसगढ़) 30/06/2024
त्रास घटे सतनाम लखाई
ज्ञान घटे करि मूरख संगत मान घटे नित माँगन आई। नारि मया करि रोष घटे निज नीर घटे ऋतु ग्रीष्म सुहाई।। पाप घटे कछु पुण्य किये अरु रोग घटे कछु औषध पाई। मातु पिता कि सहाय नहीं यम त्रास घटे सतनाम लखाई।। :::::::::::::::::मत्तगयंद सवैया::::::::::::::: ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/08/2024
बुद्ध बनौ अउ शुद्ध बनौ
बुद्ध बनौ अउ शुद्ध बनौ तज लोभ अहं धन चीज पराई। थाम चलौ नित नेक विचार बढ़े गुणि संगत ले चतुराई।। पाँव बढ़ा सच मारग मा मिलही जग मा तब मान बड़ाई। झूठ सहीं पहिचान गजानन राह सदा गुरु ज्ञान लखाई।। :::::::::::::::: मत्तगयंद सवैया::::::::::::::: ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/08/2024
धाम गिरौदपुरी बड़ पावन
धाम गिरौदपुरी बड़ पावन हे चल दर्शन ला करि आबो। जोक नदी अउ छात पहाड़ तपो भुइँया शुभ माथ नवाबो।। भक्ति भरे मन मा गुरु के प्रति मंगल गीत सुहावन गाबो। सत्य प्रतीक धजा सत के रख शान गजानन जी फहराबो।। ::::::::::::::::मत्तगयंद सवैया::::::::::::::: ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/09/2024
पीतर पाख
हे लगगे अब पीतर पाख, सबो कउँवा मन हा सकलाही। राँध बरा बबरा पपची, पुरखा मन ला अब भोग लगाही।। जीयत मातु पिता तरसे सुख, बाद मरे सब ढोंग दिखाही। दू दिन के बस मोह गजानन, भूल तहाँ पुरखा इन जाही।। ::::::::::::::::मत्तगयंद सवैया::::::::::::::: ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/09/2024
बाप बने करिया कउँवा
बाप बने करिया कउँवा बइठे घर के डँगनी अउ छानी। पीतर पाख करे सुरता पुरखा मन ला अब देवत पानी।। छप्पन भोग खिलावत हावँय बाद मरे बन लोग नदानी। मातु पिता तरसाय गजानन जीयत लाश बना जिनगानी।। :::::::::::::::::::मत्तगयंद सवैया:::::::::::::::: ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/08/2024

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