*लावणी छंद-*(स्वतंत्रता दिवस विशेष)
आजादी तो मिली हुई है, सिर्फ कागजी खातों में ।
देश आज भी बँटा हुआ है, जाति धर्म की बातों में ।।
भूख गरीबी चरम लाँघती,
बढ़ी हुई महँगाई है।
मजहब का दे नाम लड़ाते,
हिन्दू मुस्लिम भाई है ।।
कर्ज बोझ से झूल रहे हैं,
बेबस किसान फंदों पे ।
बढ़ा रहें अलगाववाद को,
कृपा छूट जयचंदो पे ।।
देश नही चल सकता यारों, इन खोंटी जज्बातों में।
आजादी तो मिली हुई है, सिर्फ कागजी खातों में ।।1
उतर रही इज्जत सड़कों पर,
अब भी अबला है नारी ।
राजनीति भी दागदार है,
साधू वेष बलात्कारी ।।
जनगण मन का मतलब बदला,
फूटा भाग्य हमारा है ।
वीर शहीदों की कुर्बानी,
इनको नहीं गँवारा है ।।
दहशत गर्दी धमकी देते, मौन रहो औक़ातों में ।।
आजादी तो मिली हुई है, सिर्फ कागजी खातों में ।।2
फूटपाथ पर रात बिताते,
मरते भूखे प्यासे हैं ।
रहम भीख को तरस रहे अब,
नित गरीब की साँसे हैं ।।
अंधभक्ति की राग अलापे,
अब मीडिया बिकाऊ है ।
दीन दलित पर लाठी बरसे,
नेता म्याऊँ म्याऊँ है ।।
जहर भरा है सर्प सरीखे, नेताओं की बातों में ।
आजादी तो मिली हुई है, सिर्फ कागजी खातों में ।।3
संविधान भी बदल रहा है,
न्यायालय दरवाजों में ।
थर थर काँपे शेर यहाँ पर,
भेड़ों की आवाजों में ।।
कानून यहाँ अंधा बैठा,
थाना चोर उचक्कों का ।
बात सहीं साबित होती है,
सिर्फ यहाँ बेतुक्कों का ।।
जीवन कैसे बीत रहा है, देखो इन हालातों में।
आजादी तो मिली हुई है, सिर्फ कागजी खातों में।।4
अब विकास के नाम जहां पे,
उजड़े नित हरियाली है ।
जेब भरे हैं हथकंडों से,
यह कैसी रखवाली है ।।
एक थाल के चट्टे बट्टे,
देश बाँट खा जायेंगे।
भारत माँ की जयकारा तब,
कैसे जनगण गायेंगे।।
शर्मसार है देश हमारा, दुश्मन के आघातों में।
आजादी तो मिली हुई है, सिर्फ कागजी खातों में ।।5
इंजी.गजानंद पात्रे *सत्यबोध*
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
*COPYRIGHT RESERVED*
*कलम की ताकत*
पहचानो कलम की ताकत,
इसमें जंग चिंगारी है।
इस कलम ने दी आजादी,
इसने गुलाम धिक्कारी है।।
कलम उठाओ न्याय दिलाने
सच का पर्दाफाश उठाने
निर्दोषों को न सजा मिले
गुनहगार कभी न सीना ताने
पर जब चाटुकार बन यह
कर ली स्वीकार चाटुकारी है।
तब यह कलम विनाशकारी है।।
जाति धर्म न कलम की होती
सिर्फ इंसानियत भाषा जाने
मानवता उत्थान जगत हो
शब्द सेवा जन आशा माने
थाम ज्ञान सच दिशा कलम
लिखे इबादत जब हितकारी है।
तब यह कलम सृजनकारी है।।
हाँ में हाँ जब कलम मिलाती
सत्य बात को झूठ ठहराती
उस दिन कलम यह टूट जाये
तब सच की स्याही सूख जाए
यह देश समाज हित गद्दारी है।
कलम अलापे राग दरबारी है।।
पहचानो कलम की ताकत,
इसमें जंग चिंगारी है।
इसमें जंग चिंगारी है।।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
कुण्डलिया छंद-
सच्चाई की कौन अब, जग में पहरेदार।
ताकतवर झूठा बना, सच बैठा लाचार।।
सच बैठा लाचार, रोज वह फाँसी चढ़ती।
कलम पड़ी है मौन, स्याह भी फीकी पड़ती।।
सत्य तथ्य से दूर, लोग दे झूठ दुहाई।
टूटा मन विश्वास, कहाँ जग में सच्चाई।।
बद्दतर है माहौल अब, बिगड़ा है परिवेश।
प्रजातंत्र रोता हुआ, संकट में यह देश।।
संकट में यह देश, दिखाई अब है देता।
मग्न सभी खुद आप, कौंन अब सुध को लेता।।
देश हुए आजाद, हो रहा है चौहत्तर।
फिर भी देखो हाल, अभी तक भारी बद्दतर।।
जनता भूखे प्यास में, भटक रही दिन रात।
बद्दतर से बद्दतर हुआ, देखो जग हालात।।
देखो जग हालात, आँख में आँसू छलके।
है विकास बेहाल, बंद फिर भी हैं पलके।।
मूक बधिर लाचार, अंध जब शासक बनता।
निश्चित तब यह जान, न्याय को तरसे जनता।।
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर- छत्तीसगढ़, भारत
कुण्डलिया छंद- #गुरु बढ़कर गुरु से कौन है, इस जग में भगवान। करना कभी न भूलकर, तुम उसका अपमान।। तुम उसका अपमान, निरादर कभी न करना। रहो सदा सानिध्य, ज्ञान का गुरु जी झरना।। भवसागर कर पार, नाव शिक्षा में चढ़कर। हुआ नहीं भगवान, जहां में गुरु से बढ़कर।। पा जाओ पद मान पर, करना नहीं गुरूर। जीवन में गुरु ज्ञान से, रहना कभी न दूर। रहना कभी न दूर, नहीं तो भटक पड़ोगे। पाकर गुरु आशीष, नया आयाम गढ़ोगे।। ऐ मानुष नादान, शरण गुरु के आ जाओ। करके गुरु सम्मान, सभी खुशियाँ पा जाओ।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छतीसगढ़)
नवगीत- बेटी
जग में अब संताप बढ़ा है
अत्याचार व पाप बढ़ा है
चीखती जब जब बेटियाँ
तब तब धरती काँपती
फिर भी ब्यभिचार दिनों दिन
सीमा को है लाँघती
वसुंधरा तेरे दामन में
यह कैसा विलाप बढ़ा है
दर्द हिम बन पिघल रहा है
माँ की ममता छाँवों में
मलहम कौन लगाये अब तो
एक पिता के घाँवों में
पंगु हुआ जज्बात यहाँ
अपराध तभी चुपचाप बढ़ा है।
आँख में पट्टी बाँध रखे हैं
मूक बधिर जनतंत्र हुआ
झूठी रामराज्य परिकल्पना
स्वतन्त्र जन परतंत्र हुआ
न्याय सुरक्षा की बात कहाँ?
सिर्फ अन्धभक्ति जाप बढ़ा है
न आँगन में फूल खिलेगी
न कलियाँ मुस्कायेगी
कद्र करो बेटी की वरना
हस्ती ही मिट जायेगी
कुर्सी के दीवानों बोलो
पाप क्या अपने आप बढ़ा है।
गीतकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर-छत्तीसगढ़,भारत
कुण्डलिया छंद-
बंदर बैठा तीन है, बापू तेरे देश।
मचा रखा उत्पात है, बद्दतर है परिवेश।।
बद्दतर है परिवेश, नही है सुख खुशहाली।
बहरा अंधा मौन, सभी शासन की डाली।
छीन रहा अधिकार, यहाँ अंदर ही अंदर।
दे तालों में ताल, मजे में तीनों बंदर।
पहला बंदर मूक बन, सत्ता पर आसीन।
भूख गरीबी बढ़ गई, हालत है गमगीन।।
हालत है गमगीन, बढ़ा है भ्रष्टाचारी।
जग में हाहाकार, करें हैं अत्याचारी।।
राजीनीति का खेल, देख नहले पे दहला।
बड़ा धूर्त चालाक, रहा ये बंदर पहला।।
दूजा बंदर मीडिया, आँख रखा जो बंद।
चाट रहा तलवा सदा, पा पैसे वे चंद।।
पा पैसे वे चंद, दूर रहती सच्चाई।
करने झूठ प्रचार, फिरे हैं बन अगुवाई।।
अंधभक्त मतिमन्द, करे आका की पूजा।
सजा रखा दरबार, भक्त ये बंदर दूजा।।
बहरा बंदर तीसरा, करोड़पति धनवान।
औरों की दुख से परे, तौल रहा इंसान।।
तौल रहा इंसान, तराजू बेईमानी।
तरस रहें कुछ लोग, अन्न दाना औ पानी।।
देखो देश विकास, यहीं से तो है ठहरा।
बन बैठा धनवान, तीसरा बंदर बहरा।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
चित्राधारित रचना- 25/06/2020
पशु पक्षी और जानवर भी
इंसान के रिश्तेदार हो गए ।
कैसा घोर कलयुग है साहेब
ढोंग पाखण्ड अंधविश्वास का
शिक्षित लोग भी शिकार हो गए ।।
गाय माता और गधा बाप
मान रहें है सब चुपचाप
कौंआ पुरखा,मौसी बिल्ली
दुनिया उड़ा रहा तुझपे खिल्ली
हद है ग्रह नक्षत्र भी ना छोड़े
चाँद मामा, चमत्कार हो गए ।
ढोंग पाखण्ड अंधविश्वास का
शिक्षित लोग भी शिकार हो गए ।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर
अंतराष्ट्रीय योग दिवस की शुभकामनाएं-
पाने को संतोष मन, करते योगा लोग ।
होता दूर तनाव भी, रहते लोग निरोग ।।
रहते लोग निरोग, शुद्ध आत्मा को करता ।
मोटापा कर दूर, खून नव शरीर भरता ।।
गजानंद कर योग, दूर तन रोग भगाने ।
योगा है आसान, तरीका सुख का पाने ।।
कैसी है ये परम्परा--
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" का दोहा छंद
एक महात्मा था बसा,सिद्ध योग परमार्थ।
जंगल में आश्रम बना,रहता शिष्यों साथ।।
एक दिवस की बात है,सुनो लगाकर कान।
बैठा था तप योग में,लगा महात्मा ध्यान।।
राह भटकर आ गई ,छोटी बिल्ली एक।
ध्यान महात्मा का हटा,शुभ मुहूर्त अरु नेक।।
भूख प्यास से ये कहीं, आई है बेसूध।
दिया महात्मा ने उसे ,एक कटोरी दूध।।
आश्रम रह पलने लगी,वह नन्हीं सी जान।
पाकर वो अपनत्व को,करने लगा गुमान।।
एक मुसीबत आ पड़ी,ज्ञान ध्यान अरु योग।
चट जाती बिल्ली कभी,देव चढ़ाये भोग।।
कभी गोद पर बैठती,कभी महात्मा काँध।
योग समय रखता इसे,दूर पेड़ पर बाँध।।
नियम बना यह रोज का,रख मुनिवर का ध्यान।
दूर पेड़ बँधने लगी,वह बिल्ली नादान।।
स्वर्ग लोक को एक दिन,मुनिवर गये सिधार।
परम शिष्य ने तब लिया,गुरुवर का अधिकार।।
फिर भी अब बँधने लगी,बिल्ली वह नादान।
वह बिल्ली भी एक दिन,त्याग दिया खुद प्रान।।
लगा सोंचने शिष्य फिर,अब क्या करें उपाय।
इस बिल्ली की मौत का,कैसे भेद छुपाय।।
बिन बिल्ली कैसे भला,हो मुनिवर का योग।
बड़े महात्मा ने बना,दिया नियम संजोग।।
अतः पास ही गाँव से,लाया बिल्ली एक।
जाने कितने बिल्लियाँ,गई मौत को टेक।।
लेकिन आज भी है यही,परम्परा यह रीत।
कौन मिटाये अब भला,गुजरा हुआ अतीत।।
परम्परा के नाप पर ,बढ़ा अंधविश्वास।
पढ़े लिखे ही लोग अब,बना हुआ है दास।।
मुक्तक-
बूँद पड़ी सावन की तन में ।
हलचल हुई अजब सी मन में।
अश्रु जल से आँचल भींगा,
जिया जल रहा प्रेम अगन में ।।1
गम बादल मंडराता गगन में ।
आग लगाता भरी यौवन में ।
अर्पण कर दूँ यह जवानी ?
हे प्रिये! तेरे प्रेम हवन में ।।2
तड़फ रहा मन विरह चुभन में ।
पिया मिलन की आस लगन में ।
पल पल हर पल थमती साँसे,
लिपट न जाये तन कफ़न में ।।3
कुण्डलिया छंद
रखिये प्रेम स्वभाव नित, आपस तज तकरार ।
सबका है सम्मान प्रिय, हम सब हैं परिवार ।।
हम सब हैं परिवार, यहाँ है सबका आदर ।
वाणी रखें मिठास, किसी का हो न निरादर ।।
सुमत उगाओ पेड़, प्रेम फल मीठा चखिये ।
गजानन्द समभाव, बंधुवर आपस रखिये ।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर
गुरु नामदान लेने के लिए👉🏻
*सच्चे सतगुरु की पहचान*
सच्चा सतगुरु की सुनो, धीर दया पहचान।
मुक्त रहें आशक्तियाँ, सतमार्गी हो ज्ञान।।
सतमार्गी हो ज्ञान, गुजारे सात्विक जीवन।
समदर्शी हो सोंच, भलाई अर्पण तन- मन।।
लोभ मोह से दूर, तत्वज्ञानी हो अच्छा।
नामदान गुरु सार, शरण लें सतगुरु सच्चा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )13/06/2021
घनाक्षरी-
वंदन चंदन करूँ, नमन वतन करूँ।
जान से भी प्यारा मेरे, इस हिंदुस्तान को।
सदा ऊँचा भाल रहे, माँ ये तेरा लाल रहे।
दे बाजुओं में जोश माँ, वीरता तूफान को।
आजादी का जो दीवाना, अलबेला मस्ताना।
शान तिरंगा शहीद, नमन जवान को।
आओ आओ प्यारे आओ, एक साथ सब गाओ।
जन गण मन अधि नायक के गान को।।
लावणी छंद- *समाज जागृति के गीत*
पढ़े लिखे शिक्षित समाज के, हम युवा क्रांतिकारी हैं।
आईना हम भावी पीढ़ी, आशा जिम्मेदारी हैं।।
छोटी मोटी बात सोंचकर, विचलित हो ना बिखरेंगे।
समाधान हर बात निकाले, नित नव इतिहास लिखेंगे।।
कौंन करेगा समाज चिंता, सभी अपेक्षा हम से है।
हम ताकत हैं गुरु बलिदानी, मान हमारे दम से है।।
जोश रगों में दौड़ रहा है, हम तो न्याय कटारी हैं।
आईना हम भावी पीढ़ी, आशा जिम्मेदारी हैं।।
नही भागना है समाज से, नही बुराई डर जायें।
जीना मरना समाज खातिर, नाम लहू ये कर जायें।।
शिक्षा ताकत पहचानो सब, चलो संगठित हो जायें।
तड़फ रहा है समाज मेरा, दाग दूरियाँ धो जायें।।
कदम बढ़ा लें आओ मिलकर, समाज हित बलिहारी हैं।
आईना हम भावी पीढ़ी, आशा जिम्मेदारी हैं।।
डाक्टर वकील अभियंता सब, आओ सभी युवा भाई।
नारी शक्ति साथ में आओ, समाज के लाज बचाई।
अगर क्रांति ना ला पायें, चिंतन करना शिक्षा पर।
कमी नहीं है गुरु पुरखों की, सौगात मिले दीक्षा पर।।
मतलब साधे नहीं बैठना, तर्कशील अधिकारी हैं।
आईना हम भावी पीढ़ी, आशा जिम्मेदारी हैं।।
रहो निडरता साहस थामे, मिशन बढ़ाना है आगे।
एक समाज गढ़ें आओ अब, नही दूर कोई भागे।
साथ जोड़ना और समझना, रूठे आज मनाना है।
भेदभाव आडंबर त्यागे, मिलकर हाथ बढ़ाना है।।
मिल अज्ञानता दूर भगाये, मानवता उजियारी हैं।
आईना हम भावी पीढ़ी, आशा जिम्मेदारी हैं।।
गुरु पुरखों की सपना साजें, उत्साह क्रांति लाना है।
नही खून पानी हो जाये, सबको आज जगाना है।
काम जमीनी स्तर करना, ऊँचा नाम कमाना है।
गुरु घासी गुरु बालक जी के, सपना आज सजाना है।
झुके नही हैं नही झुकेंगे, हम ऐसे चिंगारी हैं।
आईना हम भावी पीढ़ी, आशा जिम्मेदारी हैं।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
समकालीन भारतीय जनजीवन के चितेरा,कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जयंती( *31जुलाई* ) पर समर्पित #चंद_दोहे
प्रेम चंद मुंशी लिखा, जनजीवन की बात।
कुशल चितेरे की कथा, मानव जग सौगात।।
पीड़ा देख समाज की, बहा कलम की धार।
नैतिकता की बात ही, प्रेम चंद का सार।।
ईदगाह बचपन पढ़ा, ठंड पूस की रात।
बूढ़ी काकी कह उठी, दर्द बुढ़ापा बात।।
पाठ सुभागी में पढ़ा , बेटी है अनमोल।
कफ़न तरसते लाश ही, मानवता की पोल।।
एक झलक गोदान है, गाँव शहर परिवेश।
सौतन दिखलाती बड़ी, नारी रूप विशेष।।
हीरा मोती बैल दो, सुख दुख में रह साथ।
प्रेम भाव का पाठ ये, पढ़ा गए खुद नाथ।।
बन परमेश्वर पंच ही, न्याय करे निष्पक्ष।
यही बात बतला गए, प्रेमचंद जी दक्ष।।
छंदकार- इंजी.गजानंद पात्रे *सत्यबोध*
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*एक कोशिश* -
तन्हा इस तरह हुआ कि
भीड़ में भी अकेला हुआ
चला था साथ लेकर
उम्मीद की कुछ किरणें
ख्वाब टूटा तब जाना कि
सिर्फ सपनों का मेला हुआ
साथ अपनों का छूटा
इस कदर पता न चला
जैसे मुट्ठी से रेत फिसलती गई
वो दिन वो रात शाम भी
तन्हा कर गए मुझे
दिखता तो हूँ भीड़ में
पर सच कहूँ
शाम चौपाटी का ठेला हुआ
पतझड़ सी जिंदगी
वीरान श्मशान सा
अपनों के बीच में भी
मैं अनजान सा
उम्मीद की कुछ बूँद
को तरसता
सच कहूँ मैं रेला हुआ
मैं रेला हुआ !!
✍🏻 इंजी.गजानंद पात्रे " सत्यबोध"
माँ!!
छट जाता है दुखों का बादल
मिल जाये जो माँ का आँचल
हाँ माँ!
तेरी आँचल पकड़ ही
पला हूँ बढ़ा हूँ
इस मुकाम पर खड़ा हूँ
वो सिर्फ दूध नहीं
जीवन घोल था
जिसका बूँद बूँद अमोल था
माँ! जिसे मैंने पीया
तभी खड़ा हूँ आज
तूफानों में बनकर दीया
हे! माँ कैसे चुका पाऊँगा
उस दूध का कर्ज
बौना लगता है मेरा हर फर्ज
मेरे मन की भावनाओं को
मेरी हर आशाओं को
बिना बताए भाँप जाती थी
मुझे खुद से दूर देख
तेरी आत्मा काँप जाती थी
पर हे! माँ देख आज
तुझसे कितना दूर हूँ
तेरी ममता की आँचल
पाने कितना मजबूर हूँ
अगर सच में यही
विधना का खेल है
तो माँ बदल दो न
यह विधना का खेल
कराओ न खुद से मेल
कराओ न खुद से मेल
एक मुक्तक -
गर्दिशों से सीखा है मैंने मुस्कुराना ।
पर सीखा नहीं कभी पीछे मुड़ जाना ।
ये जिंदगी तेरी हस्ती ही क्या ?
मुझे बर्बाद करने की।
मैंने सीखा है तूफानों में भी पतंग उड़ाना ।।
गिरता हूँ उठता हूँ, निरन्तर चलता हूँ।
ठोकरों से भी न कभी मचलता हूँ।
सीखा है बुरे वक्त से भी लड़ जाना।
पर सीखा नहीं कभी पीछे मुड़ जाना।
गर्दिशों से सीखा है मैंने मुस्कुराना ।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
*शब्द नहीं बस दर्द है---*
( इंजी.गजानंद पात्रे सत्यबोध- 3.10 AM)
देखा ही नहीं मैंने
महसूस भी किया
मजदूरों की बेबसी
भूख प्यास तड़प
बहुत नजदीक से
पथराई हुई आँखें
मायूस मासूम चेहरें
मेरे देश राज्य का
हाल बता रहा था
सोंच में था साहब
क्या इनका स्थान
सिर्फ वोट बैंक का
देश विकास सृजन?
फिर क्यों लाचार
बेबस वे मजबूर
लौट रहें सरजमीं
पाँव में दर्द छाले ले
उबलते आँसुओं के
प्याले, दुख निवाले ले
मौत के गाल समाते
सफर प्राण खपाते
देख भयावह स्तिथि
नींद नहीं आ रही साहेब
देख भारत की तस्वीर।।
डींग हाँकने वालो ?
समाज देश के दलालों
मूक बधिर अंधभक्तों
गिनाओ विकास?
जताओ विश्वास?
कहाँ है मजदूरों का
मेहनतकश नूरों का
पहचान,मान,सम्मान?
एक कोरोना वायरस
बता गया यथार्तता!
बता गया यथार्तता!!
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
8889747888
*दुखों का गुब्बार है*
( चित्र - वर्षा पात्रे )
खून से है लथपथ
दुखों का गुब्बार है
चीख चीख कहती
तस्वीर मेरे देश की
भूख से बिलखते
पानी को तरसते
मायूस चीत्कार है ।
दुखों का गुब्बार है ।।
दंश है ये महामारी
सर पे है बोझ भारी
दूर मंजिल गाँव है ।
ये मजदूरों का पाँव है
बहते खून की धार है
दुखों का गुब्बार है ।।
नाप तेरे विकास को
काल रूप ग्रास को
मारा गाल पे चांटा है
साहब दुखों का काँटा है
मजदूरों की पुकार है ।
दुखों का गुब्बार है ।।
✍🏻 इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
कुण्डलिया छंद- हिंदी भाषा दिवस
(14/07/2020)
जन मानस की बोल है, हिंदी है अभिमान।
देवनागरी रूप में, संस्कृत की वरदान।।
संस्कृत की वरदान, राष्ट्रभाषा यह भारत।
अभिधा यह साहित्य, यही कवियों की ताकत।।
शबनम यही प्रभात, बूँद है निर्मल पावस।
हर धड़कन हर साँस, बसी है जग जन मानस।।
कुण्डलिया छंद- अभियंता दिवस
(15/07/2020)
अभियंता इस देश का, कर्णधार आधार।
सबके सपनों को करे, अभियंता साकार।।
अभियंता साकार, करे युग नव निर्माणा।
रहकर भूखे प्यास, सहे जो गर्मी जाड़ा।।
इनके परिश्रम दान, सड़क पुल मकान बनता।
गजानंद सुख दूर, रहे फिर क्यों अभियंता..???
*🙏दिवाली विशेष🙏*
दिवाली में निकल ना जाए,
कहीं लोगों का दिवाला।
आओ भूखे प्यासे को हम,
खिला आयें दू निवाला।।
झूठी खुशियाँ मना रहे है,
जलते हुए पटाखों में।
व्यर्थ पैसा यूँ लूटा रहे हैं,
हजारो और लाखों में।
ठंड में कोई मर ना जाये,
ओढ़ा आयें उन्हें दुशाला।
आओ भूखे प्यासे को हम,
खिला आयें दू निवाला।।
छप्पन भोग पत्थर मूरत,
सोना चाँदी पहनाते गहना।
घर के बाहर प्यासा कोई,
वाह रे मानुष तेरा क्या कहना।।
नंगे तन किसी का ढकने,
हाथों में जड़ा है तेरा ताला।
आओ भूखे प्यासे को हम,
खिला आयें दू निवाला।।
फोड़ना है गर पटाखा तो,
क्रोध घमंड अहं का फोड़ो।
दीप जला मानवता का,
इंसानियत से नाता जोड़ो।
और सही ख़ुशी पाना है तो,
पी लो किसी के गम का प्याला।
आओ भूखे प्यासे को हम,
खिला आयें दू निवाला।।
*ताटंक छंद गीत- होली विशेषांक*
नारी इज्जत तार तार है, देखो कैसी होली है।
लगे जलाने आज होलिका, अँधभक्तों की टोली है।।
रूढ़िवाद को कब तक ढोयें, परम्परा की आड़ों में।
इसे मिटाने पढ़े लिखे जन, उतरो आज अखाड़ों में।।
पड़े नही रहना है तुमको, गटक भांग की गोली है।
नारी इज्जत तार तार है, देखो कैसी होली है।।1
दहन करो मद द्वेष बुराई, पाट विषमता खाई को।
मानव मानव एक सभी हैं, अमल करो सच्चाई को।।
पता लगाओ मानवता में, कौन जहर को घोली है।
नारी इज्जत तार तार है, देखो कैसी होली है।।2
शांति अमन परिवेश रहे जग, आपस भाईचारा हो।
सबको सम अधिकार दिलाने, संविधान की धारा हो।।
फूहड़ता का रंग रचे ना, संस्कृति की चोली है।
नारी इज्जत तार तार है, देखो कैसी होली है।।3
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
कुण्डलिया छंद- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छ.ग.)
*(8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेषांक)*
नारी नर अर्धांगनी, एक अंग दो प्राण।
नारी है नारायणी, कहते वेद पुराण।।
कहते वेद पुराण, हकीकत पर ये झूठा।
युगों युगों अपमान, हुआ देखों आँख उठा।।
कहते तुलसीदास, कभी ये ताड़नहारी।
जली होलिका आग, परीक्षा सीता नारी।।
महिमा मंडन ना करो, नहीं सही इंसाफ।
लिखना है सच लेखनी, अत्याचार खिलाफ।।
अत्याचार खिलाफ, सिखाओ उनको लड़ना।
उच्च बुलन्दी राह, नित्य ही आगे बढ़ना।।
अबला नारी जात, बात करता मैं खण्डन।
सहीं दिशा दो राह, करो ना महिमा मंडन।।
कुण्डलिया छंद- *फल*
(25/04/2021)
रखने स्वस्थ शरीर को, खायें फल भरपूर।
इम्युनिटी पावर बढ़े, रखे रोग से दूर।।
रखे रोग से दूर, शुगर को कम यह करता।
कम कैलोरी और,विटामिन ज्यादा रहता।।
आम सेव अंगूर, लगा फल नित्य खरीदने।
सेहत का अब ध्यान, लगा हूँ मैं तो रखने।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
कुण्डलिया छंद--
पत्थर बनता देवता, अब तो आस्था नाम।
पर मानव जाने नहीं, घट में चारो धाम।।
घट में चारो धाम,भटकता पर क्यों दर दर।
सही गलत को सोंच,करो फिर सच का आदर।।
अब तो मानुष तोड़,धर्म का चढ़ा पलस्तर।
कर लो पुनः विचार,नही कुछ देता पत्थर।।
छंदकार- इंजी.गजानन्द पात्रे *सत्यबोध*
✏ कलम की धार ✏
(12-10-2017)
न मैं तीर रखता हूँ और न तलवार रखता हूँ।
पास हमेशा मैं तो कलम की धार रखता हूँ।
तीर और तलवार तो हिंसा के परिचायक है।
कलम सत्य अहिंसा और प्रेम के नायक है।
भाईचारा व बंधुत्व से भरा मैं परिवार रखता हूँ।
न मैं तीर रखता हूँ और न तलवार रखता हूँ।
पास हमेशा मैं तो कलम की धार रखता हूँ।
कमान से निकला तीर और मयान से तलवार।
वापस कभी नही होता बिना किये कोई वार।
मैं तो कलम से झुके प्यार का संसार रखता हूँ।
न मैं तीर रखता हूँ और न तलवार रखता हूँ।
पास हमेशा मैं तो कलम की धार रखता हूँ।
तीर चुभता दिल में और तलवार काटता सर।
कलम ऐसी शस्त्र है जिसका रहता सबको डर।
मैं तो कलम से ही कानून व सरकार रखता हूँ।
न मैं तीर रखता हूँ और न तलवार रखता हूँ।
पास हमेशा मैं तो कलम की धार रखता हूँ।
✍ ईंजी. गजानंद पात्रे"सत्यबोध"
23/04/2016
*दोहा छंद*
मुझे समझ आया नहीं, इस कलयुग की बात।
कितना स्वार्थी है बना, यह मानुष कर जात।।
बोली तीर कमान रख, देते मन में घाँव।
एक दूसरे के लिए, नहीं प्रेम की छाँव।।
प्रेम भूमि बंजर हुई, उगे नहीं विश्वास।
प्रीत पराई हो गई, नफ़रत दिल के पास।।
जग में सभी गरीब हैं, माँगे भीख पुकार।
कोई मंदिर भीतरी, कोई बाहर द्वार।।
चढ़ते छप्पन भोग है, पत्थर के भगवान।
जन्म दिये जिसने तुम्हें, हुआ वही अनजान।।
सत्य परख कल्याण जग, शोध करे विज्ञान।
दूर रहो पाखंड से, सत्यबोध धर ध्यान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )13/05/2021
चौपाई छंद- हरियाली
सूखी रहे न कोई डाली।
सभी तरफ हो वन हरियाली।।
जल जंगल की रक्षा कर लें।
पेड़ लगा कुछ अच्छा कर लें।।1
धुआँ कारखाना बन दानव।
और असुर जैसे कुछ मानव।।
हरियाली को निगल रहें हैं।
प्राण सभी का मसल रहे हैं।।2
स्वार्थ मनुज बन बैठा अंधा।
चला रहें हैं गोरख धंधा।।
काट पेड़ वन हरियाली को।
मिटा रहे हैं खुशहाली को।।3
धरती का शृंगार करें हम।
हरियाली विस्तार करें हम।।
रखें बचा अस्तित्व हमारा।
मान धर्म व्यक्तित्व हमारा।।4
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
उसलापुर, बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )28/05/2021
कोरोना
दोहा-
कोरोना की रोग से, डरा हुआ संसार।
अस्त व्यस्त है जिंदगी, बंद पड़ा व्यापार।।
चौपाई-
दुश्मन बन कोरोना आया।
गाँव शहर आतंक मचाया।।
सभी देश में मातम छाया।
सुख जीवन में दुख गहराया।।1
किस दुश्मन की नजर गड़ी है।
देश मुसीबत आन पड़ी है।
कोई तो है जाल बिछाया।
मौत निमंत्रण करके लाया।।2
एक वायरस टहल रहा है।
सब कुछ यह तो निगल रहा है।।
खौफ़नाक है जग का मंजर।
पल पल सुख में चुभते खंजर।।3
रखे सावधानी है चलना।
लापरवाह नहीं है बनना।।
सेनिटाइजर मास्क लगायें।
दो गज दूरी रखें बनायें।।4
मंदिर मस्जिद बंद पड़े हैं।
देव खुदा सब मौन खड़े हैं।
कहाँ गए दुःख विघ्नहर्ता।
कहें जिसे जग कर्ता-धर्ता।।5
खोज लिए विज्ञान उपायें।
सब जन टीकाकरण करायें।।
गजानंद पर सचेत होना।
अँधभक्ति भी है कोरोना।।6
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )31/05/2021
( 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस विशेष)
*चौपाई छंद- वृक्षारोपण*
आओ वृक्षारोपण कर लें।
तपन धरा का मिलकर हर लें।।
पेड़ लगाना कारज पावन।
हरियाली लगते मनभावन।।1
तन मन धन से ऊपर वन है।
वन से ही संभव जीवन है।।
जन्म मरण तक साथ निभाते।
काम विकास सदा यह आते।।2
पेड़ धरा की प्यास बुझाते।
खींच मेघ को जल बरसाते।।
तब किसान हैं अन्न उगाते।
जीव चराचर भूख मिटाते।।3
देव तुल्य तरु मंगलकारी।
जड़ से पत्ते तक गुणकारी।।
दवा हवा छाया भी देता।
पर बदले में कुछ ना लेता।।4
पेड़ कटन से बढ़ा प्रदूषण।
स्वार्थ मनुज रख करते शोषण।।
धुआँ कारखाना बन दानव।
साँस हरण कर लेता मानव।।5
पेड़ लगाकर भूल न जाना।
पालन करना पुत्र समाना।।
धरती का श्रृंगार करें हम।
जीवन का आधार धरें हम।।6
गजानंद जी करें प्रतिज्ञा।
मान पेड़ को प्राण अभिज्ञा।।
पेड़ लगाना पेड़ बचाना।
सभी जनों को तुम समझाना।।7
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
चौपाई छंद- *अभिमान*
कभी किसी को कम ना आँको।
खुद के भीतर खुद ही झाँको।।
मिट्टी तन अभिमान करो ना।
अंतस में दुख द्वेष भरो ना।।1
मैं वश रावण था अभिमानी।
मैं में कंस मिटा जिनगानी।।
मैं में ही अभिमान बढ़ा है।
मैं का भ्रम परवान चढ़ा है।।2
अंधेरा अभिमान डगर है।
सभी तरफ मतलबी नजर है।।
जब जब मैं मन वास हुआ है।
मानव जीवन नाश हुआ है।।3
जो अभिमान हिया में रखते।
बुद्धि विनाश खुदे ही करते।।
मान नहीं वे जग में पाते।
तजे नहीं जो मैं की बातें।।4
बराबरी की बात करें हम।
आज अभी शुरुआत करें हम।।
गजानंद सुन सभी बराबर।
जल थल नभ सब जीव चराचर।।5
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )06/05/2021
चौपाई छंद- *दया*
दया धर्म की पहली भाषा।
करुणा ममता प्रेम पिपासा।।
दया धर्म की मूल कड़ी है।
धर्म मनुज जग क्षमा बड़ी है।।1
झूठ शब्द प्रतिकार नहीं है।
जग में सत्य विचार नहीं है।।
कौन दया मन भाव रखें हैं।
धीर बने कटु बोल चखें हैं।।2
दयावान इंसान बनो तुम।
पर सेवा ईमान बनो तुम।।
दया कभी ना जग में मरती।
दुखी जनों का दुख को हरती।।3
दया रखो जग जीव चराचर।
जीव सभी हैं एक बराबर।।
संत गुणी जन का है कहना।
कभी दया से दूर न रहना।।4
कभी दया की भीख न माँगो।
पर निर्भरता को नित त्यागो।।
स्वालंबन का जीवन जी लो।
भले दुखों का प्याला पी लो।।5
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )8/06/2021
चौपाई छंद- *अनुशासन*
अनुशासन में सीखो रहना।
नियम सतत ही पालन करना।।
मंत्र सफलता है यह मानो।
समय बचत करते पहिचानो।।1
सूर्य चंद्रमा अनुशासित है।
रात भोर भी निर्धारित है।।
धीर वीर ज्ञानी अनुशासित।
दया क्षम्य अनुराग समाहित।।2
पतन जिंदगी बिनु अनुशासन।
करें नियम हम सदैव पालन।।
अमन शांति अरु मान मिलेगा।
हिया चमन सुख फूल खिलेगा।।3
खेल जेल में अनुशासन है।
रेल टिकट जन परिपालन है।।
अनुशासन है स्कूल पढ़ाई।
अनुशासन हो भाई भाई।।4
अनुशासन की विनती सब से।
राष्ट्र विकास सहायक जन से।।
गजानंद रखना अनुशासन।
माथ सजे फिर सुख सिंहासन।।5
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 09/06/2021
o अंतस प्रीत।।
तीज पर्व पावन पावस में, मन में भरे उमंग।
अधरों में मुस्कान बिखेरे, खुशियों का नवरंग।।
गजानंद जग बड़ा धर्म है, प्रीत धर्म की रीत।
कोयल मोर पपीहा नाचे, उमड़े अंतस प्रीत।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ)
ताटंक छंद गीत- 3/07/2021
व्रत साधन उपवास करूँ मैं, ईश्वर तुझे मनाने को।
तेरे दर पर माथ झुकाऊँ, शांति प्रेम सुख पाने को।।
कृपा नीर नित बारिश करना, सभी तरफ खुशहाली हो।
बगिया रूपी इस जीवन का, सिर्फ आप प्रभु माली हो।।
रहें प्यास ना कोई भूखा, तरसे ना जन दाने को।
तेरे दर पर माथ झुकाऊँ, शांति प्रेम सुख पाने को।।
भाईचारा हो जन-जन में, रिश्तों में गहराई हो।
नेक कर्म प्रभु कर जायें हम, जिसमें लोक भलाई हो।।
गजानंद नित करे प्रार्थना, मन का दीप जलाने को।
तेरे दर पर माथ झुकाऊँ, शांति प्रेम सुख पाने को।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
कुण्डलिया छंद- राग-रंग
पहिचानों खुद आप में, मनुष्यता का अर्थ।
राग-रंग अनुराग बिन, सभी खुशी है व्यर्थ।।
सभी खुशी है व्यर्थ, सुने जो ना गुरु वाणी।
लगे नहीं इंसान, लगे वे पशुवत प्राणी।।
कण कण गुरु का वास, सत्य को जानों मानों।
राग-रंग अनुराग, कृपा गुरु की पहिचानों।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)05/07/2021
कुण्डलिया छंद- दीपावली
पावन यह दीपावली, खुशियों का त्यौहार।
दीप जले मन प्रीत का, जगमग हो संसार।
जगमग हो संसार, फटाका ईर्ष्या फोड़ें।
उँच नीच दीवार, ढहा कर जग को जोड़ें।
पर सेवा उपकार, करें संकल्प सुहावन।
गजानंद यह पर्व, करें आओ मिल पावन।
कुण्डलिया छंद *गुरु गुण ज्ञान अथाह*
ऐसे गुरु का ज्ञान है, जैसे चाक कुम्हार।
मानव मन कच्चा घड़ा, गुरु जी दे आकार।।
गुरु जी दे आकार, गढ़े मन की सुघराई।
जग में भरे प्रकाश, ज्ञान की जोत जलाई।।
गुरु गुण ज्ञान अथाह, थाह मैं पाऊँ कैसे।
गजानंद सौभाग्य, मिले हैं गुरुवर ऐसे।।
कुण्डलिया छंद- झूठ रचता है ऐसा
आकर जन दरबार पर, खूब चढ़ाओ दान।
मुझे जररूत दान की, बोला क्या भगवान।।
बोला क्या भगवान, चाहिए मुझको पैसा।
पता लगा फिर कौंन, झूठ रचता है ऐसा।।
गजानंद दो छोड़, दान मंदिर में जा कर।
करना है गर दान, करो दुखिया घर आकर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
कहते मुझको लोग अब, सत्य बात मत बोल।
अहंकार तुझमें पला, रहा जहर तू घोल।।
रहा जहर तू घोल, मौन बैठे ही रहना।
पुरखा रहा गुलाम, जुल्म वैसे ही सहना।।
पर सतनामी खून, गलत को कब हम सहते।
करें नहीं परवाह, जमाना जो भी कहते।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर
कुण्डलिया छंद- कोरोना
आया मेरे देश में, कोरोना बन रोग ।
दुनिया अब भयभीत है, सहमे हैं सब लोग ।।
सहमे हैं सब लोग, घिरा जीवन मजबूरी ।
एक दूसरे आज, रखें गज भर की दूरी ।।
पाँव पसारा रोग, मौत का मंजर छाया ।
कोरोना बन काल, देश में मेरे आया ।।
रोग बना यह संक्रमित, मौत रूप फैलाव ।
खान पान हो संयमित, रहना दूर तनाव ।।
रहना दूर तनाव, ठंड से बचके रहना ।
खाँसी दर्द जुकाम, जाँच तुम इसकी करना ।।
सतर्कता रख आप, भीड़ जाना आज मना ।।
बिना रूप आकर, वायरस यह रोग बना ।
खोजो जल्द इलाज कुछ, दुनिया के विज्ञान ।
अस्त ब्यस्त है जिंदगी, चुप बैठा भगवान ।।
चुप बैठा भगवान, त्रासदी जन जन झेले ।
कहाँ छुपा चंडाल, लूट जो धंधा खेले ।।
राशि चक्र फल ढोंग, बताये ज्ञानी वो जो ।
रोको नरसंहार, रोग से रक्षा खोजो ।।
छंदकार- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
8889747888
*साधक हूँ मैं सत्य का*
साधक हूँ मैं सत्य का, सदा चलूँ मैं साध्य।
मानवता का भक्त हूँ, कर्म करूँ आराध्य।।
कर्म करूँ आराध्य, दूर ढोंगो से रहकर।
पाया हूँ पद मान, उपेक्षाओं को सहकर।।
पीछे रखूँ न पाँव, रहे पथ कोई बाधक।
कर्म वीर मैं धीर, सत्य का हूँ मैं साधक।।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
ताटंक छंद गीत- *माँ* ( इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' ) माँ की ममता बड़ी निराली, माँ ही भाग्य विधाता है। माँ की गोदी स्वर्ग सरीखी, जन जग सुख को पाता है।। दया प्रीत करुणा की सागर, ममता की परिभाषा है। एक शब्द है माँ जो जग में, सभी सुखों की आशा है।। माँ से हम सभी आप का तो, रक्त कणों का नाता है। माँ की ममता........(1) सुन पुकार माँ की तो दौड़े, देव चले भी आते हैं। इस धरती से उस अम्बर तक, महिमा माँ की गाते हैं।। जीवन सर्जन प्रेम प्रेरणा, प्रतिमूर्ति कहा जाता है। माँ की ममता.......(2) माँ ही राम रहीम कबीरा, वेद ग्रंथ गुरु गीता है। माँ ही लक्ष्मी सरस्वती अरु, माँ सावित्री सीता है।। माँ ही चारों धाम जगत में, गीत भजन जगराता है। माँ की ममता.......(3) माँ की दुआ बड़ी दौलत जग, कायनात खुशियाँ सारी। माँ के कदमों में जन्नत है, कर दें जीवन यह वारी।। गजानंद कर याद सदा माँ, अपना शीश झुकाता है। माँ की ममता बड़ी निराली, माँ ही भाग्य विधाता है।।(4) 👣🙏🌷🌸💐 ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
सरसी छंद गीत- 2/07/2021 कोयल मोर पपीहा नाचे, उमड़े अंतस प्रीत। झूला झूले सखियाँ मिलकर, सावन है मनमीत।। नील गगन से नीर गिरे हैं, रिमझिम पड़े फुहार। हरियाली की ओढ़ चुनरिया, धरा किया श्रृंगार।। झूम झूम झिंगुरा भी झूमे, दादुर गाये गीत। कोयल मोर पपीहा नाचे, उमड़े अंतस प्रीत।। महक हवाओं में सौंधी सी, फूलों में अनुराग। गुन-गुन करते भौंरे उस पर, इठलाती है बाग।। बारिश में बचपन की मस्ती, आते याद अतीत। कोयल मोर पपीहा नाचे, उमड़े अंतस प्रीत।। तीज पर्व पावन पावस में, मन में भरे उमंग। अधरों में मुस्कान बिखेरे, खुशियों की नवरंग।। गजानंद जग बड़ा धर्म है, प्रीत धर्म की रीत। कोयल मोर पपीहा नाचे, उमड़े अंतस प्रीत। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ)
रोला छंद- *मित्रता* (10/07/2021) करें मित्रता खास, निभायें नित मर्यादा। त्याग स्वार्थपन भाव, रखें मन नेक इरादा।। सुख-दुख हर पल साथ, रहे जो बन परछाईं। बन करके हमदर्द, रखे जग दूर बुराई।। उदाहरण है एक, मित्र प्रभु कृष्ण सुदामा। राम और हनुमान, हाथ सुख-दुख में थामा।। दुर्योधन का कर्ण, मरण तक साथ निभाया। मित्र धर्म के नाम, वीरगति को वह पाया।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ)
ताटंक छंद गीत- रंग बिरंगी हुई धरा अब, इठलाई हर डाली है | जाने किसने रंग भरा है, कौन धरा का माली है || बागों में भँवरे मँडराये, आई कली जवानी है | पात-पात श्रृंगार किया है, रंग धरा की धानी है || कुहू-कुहू कोयल की बोली, लगे बड़ी मतवाली है | जाने किसने रंग भरा है, कौन धरा का माली है || कल-कल करते झरने नाले, बहते नदी उफ़ानों में | ताल-तलैया भरा लबालब, छाई खुशी किसानों में || अर्र् तता की बोल सुनाये, खेत मेड़ खुशहाली है | जाने किसने रंग भरा है, कौन धरा का माली है || जीव चराचर हैं मस्ती में, कश्ती में अँगड़ाई है | ये दुनिया के मालिक तुमनें, दुनिया गजब बनाई है || सत्यबोध बन प्रकृति चितेरा, अपनी कलम सजा ली है | जाने किसने रंग भरा है, कौन धरा का माली है || ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर ( छत्तीसगढ )
कुण्डलिया छंद- अपने में मशगूल सब, कोई नहीं हबीब। तरस रहा मन दर-बदर, पाने प्रेम करीब।। पाने प्रेम करीब, कहाँ अब कोई जाये। गाँव शहर चहुँओर, घृणा है शूल बिछाये।। टूट रहा है नित्य, यहाँ पर सुख के सपने। गजानन्द रख याद, दगा देते हैं अपने।।1
मेरे सपनो का कहाँ, उजड़ गया है गाँव। गायब नदिया ताल है, अमराई का छाँव।। अमराई का छाँव, दिखाई देता निर्झर। सहमे सहमे लोग, जिंदगी जीते डर डर।। आपस कर तकरार, लगाते थाने फेरे। दिखे नहीं चौपाल, कहाँ है अपने मेरे।।
[24/05, 9:34 pm] Er. G.N. Patre:
कुण्डलिया छंद- बहन होती है प्यारी
प्यारी बहना लाड़ली, तुम हो धड़कन जान। अधरों पे खिलती रहे, सदा प्रीत मुस्कान।। सदा प्रीत मुस्कान, खुशी जीवन भर पाओ। बनकर फूल गुलाब, प्रेम बगिया महकाओ।। तुम हो कुल दो मान, बढ़ाओ आन हमारी। गजानंद कविराय, बहन होती हैं प्यारी।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)8889747888
कुण्डलिया छंद- गुरु बढ़कर गुरु से कौन है, इस जग में भगवान। करना कभी न भूलकर, तुम उसका अपमान।। तुम उसका अपमान, निरादर कभी न करना। रहो सदा सानिध्य, ज्ञान का गुरु जी झरना।। भवसागर कर पार, नाव शिक्षा में चढ़कर। हुआ नहीं भगवान, जहां में गुरु से बढ़कर।। पा जाओ पद मान पर, करना नहीं गुरूर। जीवन में गुरु ज्ञान से, रहना कभी न दूर। रहना कभी न दूर, नहीं तो भटक पड़ोगे। पाकर गुरु आशीष, नया आयाम गढ़ोगे।। ऐ मानुष नादान, शरण गुरु के आ जाओ। करके गुरु सम्मान, सभी खुशियाँ पा जाओ।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छतीसगढ़) 8889747888
सच्चे सतगुरु की पहचान सच्चा सतगुरु की सुनो, धीर दया पहचान। मुक्त रहें आशक्तियाँ, सतमार्गी हो ज्ञान।। सतमार्गी हो ज्ञान, गुजारे सात्विक जीवन। समदर्शी हो सोंच, भलाई अर्पण तन- मन।। लोभ मोह से दूर, तत्वज्ञानी हो अच्छा। नामदान गुरु सार, शरण लें सतगुरु सच्चा।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
ऐसे गुरुवर ज्ञान है, जैसे चाक कुम्हार। मानव मन कच्चा घड़ा, गुरु जी दे आकार।। गुरु जी दे आकार, गढ़े मन की सुघराई। जग में भरे प्रकाश, ज्ञान की जोत जलाई।। गुरु गुण ज्ञान अथाह, थाह मैं पाऊँ कैसे। गजानंद सौभाग्य, मिले हैं गुरुवर ऐसे।। इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" अध्यक्ष- सतनाम साहित्य एवं कला मंच (छत्तीसगढ़)
कुण्डलिया छंद- बन जायें हम बुद्ध
अवगुण सारे छोड़कर, हो जायें हम शुद्ध। अपना दीपक खुद बनें, बन जायें हम बुद्ध।। बन जायें हम बुद्ध, रखें सच ज्ञान पिपासा। तजें मोह धन लोभ, बढ़ा सुख जीवन आशा।। रखें शांति मन धीर, भक्ति कर गौतम निर्गुण। चलें राह हम बुद्ध, त्याग कर सारे अवगुण।।
कुण्डलिया छंद- शिक्षा शिक्षा से संभव सदा, बौद्धिक तर्क विकास। यह वह पावन दीप है, जो मन भरे प्रकाश।। जो मन भरे प्रकाश, सदा वह आगे बढ़ता। विपदा से लड़ जंग, प्रगति का सीढ़ी चढ़ता।। भला बुरा क्या राह, करे वह सदा समीक्षा।। गजानंद अनमोल, रत्न है जानो शिक्षा।। खाना दो कम कौंर पर, शिक्षा पर दो ध्यान। अपने बच्चों के लिए, कर दो सुख कुर्बान।। कर दो सुख कुर्बान, व्यर्थ ना यह जायेगा। पढ़ लिख कर संतान, नाम जग में पायेगा।। गजानंद हम आप, नहीं तरसेंगे दाना। देगा शिक्षा मान, शोहरत पद सुख खाना।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 8889747888
कुण्डलिया छंद- महँगाई महँगाई नित छू रही, आसमान की छोर। त्राहि त्राहि जनता करे, कब आये सुख भोर।। कब आये सुख भोर, दाम जब कम हो जाये। वर्तमान परिदृश्य, देख चक्षु नम हो जाये।। मौन पड़ी सरकार, कान में रुई घुसाई। निगल रहा सुख चैन, बना सुरसा महँगाई।। थाली से गायब दिखे, रोटी सब्जी दाल। महँगाई ने कर दिया, है सबका बेहाल।। है सबका बेहाल, बजट घर-घर का बिगड़ा। दिखते लोग उदास, चेहरा उजड़ा-उजड़ा।। बगिया दिया उजाड़, जिसे समझे थे माली। महँगाई हर द्वार, परोसा थाली-थाली।। महँगाई को देखकर, साथी कुछ तो बोल। सौ से भी ऊपर हुआ, दाम आज पेट्रोल। दाम आज पेट्रोल, चैन घर-घर का छीना। लोग दिखे मजबूर, हो गया दूभर जीना।। गजानंद कब कौन, करेगा सुख भरपाई। चुप बैठा सरकार, बढ़ा करके महँगाई।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 8889747888
माह दिसम्बर पर्व है, सतगुरु घासीदास। सत्य प्रेम सद्भावना, भरता मन उल्लास।। भरता मन उल्लास, लगे घर द्वार सुहावन। अट्ठारह तारीख, जयंती गुरु का पावन।। जय गुरु जय सतनाम, गूँज से गूँजे अम्बर। गजानंद गुरु पर्व, मना लो माह दिसम्बर।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
देकर सत सन्देश जग, सतगुरु बना महान। जाप तपस्या त्याग से, पाया गुरु जी ज्ञान।। पाया गुरु जी ज्ञान, भलाई जग-जन करने। सत्य अहिंसा प्रेम, दिलों में सबके भरने।। पर सेवा उपकार, चलो मानवता लेकर। गजानंद पा मान, मान औरों को देकर।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
कुण्डलिया छंद- पुस्तक पुस्तक से बढ़कर नहीं, कोई सच्चा मित्र। महकाये जीवन सदा, बन करके यह इत्र।। बन करके यह इत्र, ज्ञान ख़ुश्बू फैलाये। पढ़े अमीर गरीब, सभी को योग्य बनाये।। देकर पद सम्मान, करे यह ऊँचा मस्तक। गजानंद पढ़ नित्य, राह दिखलाती पुस्तक।। पुस्तक दरिया ज्ञान का, पुस्तक गुण का खान। सभी समस्या का मिले, तुरते यहाँ निदान। तुरते यहाँ निदान, बनाये सबको ज्ञानी। गीता ग्रन्थ कुरान, संत गुरुओं की वाणी।। बनकर सच्चा मित्र, करे जीवन में दस्तक। गजानंद कविराय, सदा तुम पढ़ना पुस्तक।। 🖊️इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 8889747888
कुण्डलिया छंद- रहो दूर पाखंड समझाऊँ मैं लाख पर, अंधभक्त है मौन। गोबर भरा दिमाग में, बतलाओ तो कौन।। बतलाओ तो कौन, तुम्हें गुमराह किया है। तथाकथित से संत, तुम्हें आगाह किया है।। त्याग ढ़ोंग भ्रम फाँस, सदा सच राह दिखाऊँ। रहो दूर पाखंड, बात मैं नित समझाऊँ।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (बिलासपुर) मोबाइल मोबाइल वरदान तो, मोबाइल अभिशाप। मोबाइल के हो गयें, दीवानें हम आप।। दीवानें हम आप, इसी में खोये रहते। रख तकिया के पास, रात में सोये रहते।। फ़ोटो इससे खींच, लोग देते हैं स्माइल। बच्चें और सियान, सभी रखते मोबाइल।। मोबाइल से हो रहा, रोग और नुकसान। रखें बनाकर दूरियाँ, सावधान इंसान।। सावधान इंसान, समय रहते हो जाओ। त्याग खुशी परिवार, नहीं इसमें खो जाओ।। बने नहीं जंजाल, कहीं कल को यह स्टाइल। कम से कम उपयोग, करें हम तो मोबाइल।। 05/05, 10:02 pm] Er. G.N. Patre:
कुण्डलिया छंद- हरियाली
हरियाली गर चाहिए, चलो लगायें पेड़।
हरा भरा चारों तरफ, रखें खेत का मेड़।।
रखें खेत का मेड़, बचायें हम जल जंगल।
मिले दवा सुख छाँव, करें यह कारज मंगल।।
गजानंद धर ध्यान, इसी से जग खुशहाली।
कर लें पेड़ बचाव, चाहिए गर हरियाली।।
जागो बहुजन आज ( 26 नवंबर संविधान दिवस की बधाई🌷 पढ़ लें हम सब भीम को, पढ़ लें हम सँविधान। मिला हमें सँविधान से, लोकतंत्र में मान।। लोकतंत्र में मान, शान पहचान इसी से। बिता रहें हैं आज, जिंदगी हँसी खुशी से।। भीम मिशन को थाम, शिखर उन्नति का चढ़ लें गजानंद सँविधान, भीम को हम सब पढ़ लें।। करता भीम पुकार है, जागो बहुजन आज। शोषित पिछड़े आमजन, वंचित दलित समाज।। वंचित दलित समाज, मुखर आवाज उठाओ। पाने हक अधिकार, क़दम से क़दम मिलाओ।। हो जायें हम एक, देख हालात बिखरता। गजानंद कर जोर, सभी से विनती करता।। 🖊️इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 8889747888
पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर🙏 ( रचना- गजानंद पात्रे सत्यबोध ) पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर । सबको जीना सिखाया संभलकर ।। शिक्षा का जिसने अलख जलाया । समानता का अधिकार दिलाया । दर्द अपमान खुद ही जो सहकर । पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर । सबको जीना सिखाया संभलकर ।। हवा पानी जमीन जब बँट गया था । स्वतंत्रता और विचार दब गया था । जीना पड़ता था सबको मर मरकर । पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर । सबको जीना सिखाया संभलकर ।। अलग रंग अलग रूप पहचान था । छुआछूत ऊँचनीच आसमान था । साँस भी लेना पड़ता था छुपकर । पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर । सबको जीना सिखाया संभलकर ।। मंदिर के जगह पुस्तकालय जाना । रुढ़िवादी धर्मान्धता से मुक्ति पाना । हासिल नहीं कुछ देवों के दर पर । पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर । सबको जीना सिखाया संभलकर ।। सशक्त समाज का जो देखा सपना । हक अधिकार के लिये तुम लड़ना । जीना भाईचारे का मिशाल बनकर । पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर । सबको जीना सिखाया संभलकर ।। समानता के लिए संविधान बनाया । मानव समाज का मसीहा कहलाया । नमन महामानव को सिर झुककर । पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर । सबको जीना सिखाया संभलकर ।। ......
*विश्व रत्न भारत रत्न भारतीयों के सिल्पकार भारतीय संविधान के रचयिता, ज्ञान के प्रतिक ,गरीबों ,दबे ,कुचले लोगों ,औरतों , शोषित पीड़ित के मसीहा महामानव बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर जी की 127 जयंती की हार्दिक बधाई, शुभकामनाए देते उनके सम्मान में चंद पंक्तियाँ--------* *पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर।* *सबको जीना सिखाया संभलकर।* *शिक्षा का जिसने अलख जलाया।* *समानता का अधिकार दिलाया।* *दर्द अपमान खुद ही जो सहकर।* *पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर।* *सबको जीना सिखाया संभलकर।* *हवा पानी जमीन जब बट गया था।* *स्वतंत्रता और विचार दब गया था।* *जीना पड़ता था हमें मर मरकर।* *पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर।* *सबको जीना सिखाया संभलकर।* *अलग रंग अलग रुप पहचान था।* *छुआछूत ऊँचनीच आसमान था।* *साँस भी लेना पड़ता था छुपकर।* *पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर।* *सबको जीना सिखाया संभलकर।* *मंदिर के जगह पुस्तकालय जाना।* *रुढ़िवादी धर्मान्धता से मुक्ति पाना।* *हासिल नहीं कुछ देवो के दर पर।* *पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर।* *सबको जीना सिखाया संभलकर।* *सशक्त समाज का जो देखा सपना।* *हक अधिकार के लिये तुम लड़ना।* *जीना भाईचारे का मिशाल बनकर।* *पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर।* *सबको जीना सिखाया संभलकर।* *समानता के लिए संविधान बनाया।* *मानव समाज का मसीहा कहलाया।* *नमन महामानव को सर झुककर।* *पूज्य डॅा. बाबा साहब अंबेडकर।* *सबको जीना सिखाया संभलकर।* रचना -इंजी.गजानंद पात्रे *(सत्यबोध)* सत सत नमन🙏🙏🙏💐💐💐
मनहरण घनाक्षरी
प्रेम सुख दीनबंधु, करुणा कृपाल सिंधु गुरुओं के भी तो गुरु, घासीदास नाम है। धरती गगन जल, पवन अनल बल दिन रात प्रातः शाम, बसे आठों याम है। फिरे कहाँ दर दर, देख हिया झाँक कर घट में विराजमान, जग चारों धाम है। दीन दुखी उपकार, रखें सम व्यवहार गजानंद तेरा मेरा, सबका ये काम है।। सागर जो ज्ञान गुण, दूर रखे अवगुण संत गुरु शिरोमणि, गुरु घासीदास हैं। घट घट बसते हैं, दया कृपा रखते हैं दीन दुखियों के गुरु, हरते तो त्रास हैं। सबके सहारा गुरु, सुख उजियारा गुरु दुख अँधियारी भगा, करते प्रकाश हैं। जग भाईचारा रहे, कोई नहीं कष्ट सहे सतगुरु आप ही तो, आस विश्वास हैं।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मनहरण घनाक्षरी-- चलें हम साथ मिल, जोड़ दिल से तो दिल टूटने न देंगे कभी, एकता की डोर को। बातें हम साफ करें, अपनों को माफ करें मार भगाना है मन, बसे काले चोर को। रखें नहीं तकरार, प्यार बाँटे बस प्यार उठने न देंगें कभी, कटुता हिलोर को। गले से तो गले मिले, खुशियों की फूल खिले गजानंद नित्य देखे, सुमता की भोर को।।
मनहरण घनाक्षरी- स्वतंत्रता आओं मिल करें वादा, स्वतंत्रता की मर्यादा याद कर शहीदों को, रखेंगे सम्मान से। भलीभांति सोंचे लोग, करें न दुरुपयोग मिली हमें स्वतंत्रता, वीर बलिदान से। रोटी कपड़ा मकान, मिले सबको समान। रहे न वंचित कोई, हक शिक्षा ज्ञान से। गजानंद आगे बढ़ें, उन्नति की सीढ़ी चढ़ें अधिकार समता का, मिला संविधान से।
मनहरण घनाक्षरी- आजाद ऊँच-नीच भेदभाव, लोगों में है बिखराव सहीं मायने में कहाँ, देश ये आजाद है। जाति-धर्म सर्वोपरि, अंधभक्ति है बढ़ी मानवता दूर खड़ी, करे फरियाद है। कानून भी अंध मूक, अपराधियों को छूट भाई भाई में कराते, ये दंगा फसाद है। अधिकारी भ्रष्टाचारी, नेता में नहीं खुद्दारी गजानंद इसीलिए, देश बरबाद है।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर ( छत्तीसगढ़)
मनहरण घनाक्षरी- शहीद सीमा पर अड़े रहे, देश हित खड़े रहे जान की लगाते बाजी, वीर वे महान है। ठंड धूप प्यास सहे, फिर भी न उफ्फ कहे हौसला पहाड़ जैसे, मुख पे मुस्कान है। कर्मपथ अनुरागी, सुख-दुख सहभागी लड़ना मुसीबतों से, इनका तो शान है। ऊँचा रखे देश भाल, बन मातृभूमि लाल गजानंद नित करे, वीर गुणगान है। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मनहरण घनाक्षरी- ममतामयी मिनीमाता करुणा की अभिव्यक्ति, ममता की प्रतिमूर्ति जननी जगत माँ, मिनीमाता नाम है। नारी स्वाभिमान हेतु, सभी के उत्थान हेतु कदम बढ़ा के सदा, माँ ने किये काम है। ऊँच-नीच भेदभाव, मिटा मन के दुराव समता सुमत रखो, दिए माँ पैगाम है। दिन पुण्यतिथि आज, याद करें हैं समाज। गजानंद सत्यबोध, करे माँ प्रणाम है।
🙏🌷💐💐🙏 ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मनहरण घनाक्षरी- संत गुरु शिरोमणि सागर जो ज्ञान गुण, दूर रखे अवगुण संत गुरु शिरोमणि, गुरु घासीदास हैं। घट घट बसते हैं, दया कृपा रखते हैं दीन दुखियों के गुरु, हरते तो त्रास हैं। सबके सहारा गुरु, सुख उजियारा गुरु दुख अँधियारी भगा, करते प्रकाश हैं। जग भाईचारा रहे, कोई नहीं कष्ट सहे सतगुरु आप ही तो, आस विश्वास हैं।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मनहरण घनाक्षरी- बजरंग बली सीने में तो राम बसा, चरणों में धाम बसा अंजलि पवन सूत, वीर हनुमान है। राम दूत अतुलित, बल धामा प्रफुल्लित राम नाम का तो सदा, करे गुणगान है। दूर करे दुख बला, भक्तों के करते भला जिनके तो नाम सुन, भागते शैतान है। तीनों लोक गूँजे नाम, जय जय हनुमान नमन नमन करूँ, उर लगा ध्यान है। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
02/08/2021
विधा- मनहरण घानाक्षरी
विषय- मित्र
सुख दुख साथ सहे, बुराई से दूर रखे
निश्छल मन जिसका, मित्र वही जानिये।
एक प्राण दो बदन, बन फूल व चमन
प्रेम रूपी बगिया को, सदा महकाइये।
कृष्ण व सुदामा जैसे, दुर्योधन कर्ण जैसे
राम हनुमान जैसे, मित्रता निभाइये।
मित्र है गुरु का रूप, दूर रखे दुख धूप
गजानंद इसलिए, मित्र तो बनाइये।
मनहरण घनाक्षरी- दहेज
[3/8/2021, 9:27 pm] Er. G.N. Patre:
दानव दहेज बना, लूट का तो सेज बना
कैसे बेटी विदा करें, सोंच में माँ बाप है।
नीति रीति रूढ़िवादी, समाज को कहाँ ला दी
पढ़े लिखे लोग देखो, बैठे चुपचाप है।
असल दहेज वधु, रखो व्यवहार मधु
दहेज का लेना देना, जग अभिशाप है।
फर्क नहीं बहू- बेटी, दोनों ही है सुख पेटी।
इनको सताना सुनो, बड़ा ही तो पाप है।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मनहरण घनाक्षरी- पहचान
माता-पिता से है मान, गुरु से मिले हैं ज्ञान।
भाग्य नहीं जग में तो, कर्म पहचान है।
धीर वीर आगे बढ़े, नित इतिहास गढ़े
हौसलों के पंख लिए, भरते उड़ान है।
कर्म सभी करते हैं, कर्म कहाँ मरते हैं
कर्म से मनुज यहाँ, बनते महान है।
कर्म के तो दो है रूप, बुरा भला छाँव धूप
गीता ग्रंथ बाइबिल, बताया कुरान है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मनहरण घनाक्षरी- वतन
वतन-वतन मेरा, तन मन सब मेरा
वतन के नाम पर, जीवन कुर्बान है।
वतन है आन मेरा, वतन है शान मेरा
वतन जिहाद मेरा, वतन ईमान है।
बंधुता व भाईचारा, प्रेम रस बहे धारा
अनेकता में एकता, जग पहचान है।।
गुरु नानक कबीरा, भक्त सूरदास मीरा
जन्म ले भारत भूमि, बाँटे भक्ति ज्ञान है।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
साईं नगर,उसलापुर (बिलासपुर)
मनहरण घनाक्षरी- बेटियाँ
बेटियाँ हैं आन बान, बेटियाँ दो कुल शान
पिता की तो लाड़ली है, माँ का अभिमान है।
ममता की प्रतिमूर्ति, बेटियाँ से जग कीर्ति
तरसे बिना बेटियाँ, अभागा इंसान है।
बाग फूल गुलाब बन, सुख आफ़ताब बन
आनंद उमंग भरे, मधुर मुस्कान है।
संत गुरु ऋषि मुनि, पढ़े लिखे विद्व गुणी
बेटियों की महिमा का, करते गुणगान है।।
मनहरण घनाक्षरी- हरेली तिहार
मन मा उमंग भरे, खुशियाँ अपार धरे
परब हरेली आये, पहिली तिहार हे।
हरा भरा दिखे धरा, लगे जइसे अप्सरा
धान के चुनर ओढ़, करे ये सिंगार हे।
रंग रंग फूल खिले, मीत ले तो प्रीत मिले
सावन महिना बहे, प्रेम रस धार हे।
राज ये छत्तीसगढ़ी, उन्नति के गढ़े सीढ़ी
गजानंद अरजी ये, करे बार बार हे।
✍🏻इंजी.गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मनहरण घनाक्षरी- विश्व आदिवासी दिवस विशेष
मूल वासी आदिवासी, समझें न इन्हें दासी
जल जमीं जंगल का, इन्हें स्वामी मानियें।
ले रंग कला संस्कृति, गढ़ने जग उन्नति
कदम बढ़ाते सच, अनुगामी मानियें।
बने फिरे मजबूर, सुख सुविधा से दूर
बेबस लाचार दिखे, सत्ता खामी मानियें।
करो नहीं तिरस्कार, मिले इन्हें अधिकार
नहीं तो देश राज का, बदनामी मानियें।
[7/8/2021, 9:01 am] Er. G.N. Patre:
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
चौपाई छंद- जस करनी तस फल पायेगा
सुन लो मुझे मिटाने वालों। कश्ती मेरी डूबाने वालों।। अडिग रहा हूँ अडिग रहूँगा। कभी जुल्म मैं नहीं सहूँगा।। कलम थाम मैं सच्चाई की। पोल खोल दूँ चमचाई की।। किये कहाँ हो तुम घोटाले। कितने छीने कौंर निवाले।। बेबस समझो ना खामोशी। मुझे पता है तुम हो दोषी।। कितना भ्रष्टाचार किये हो। जुल्मी अत्याचार किये हो।। गबन किये हो धन सरकारी। बन करके तुम तो अधिकारी।। दाग़दार है तेरा दामन। बतलाओ ना खुद को पावन।। तोंद किये हो बड़ा बड़ा जो। बेईमानी से महल खड़ा जो।। नहीं रहेगा नहीं रहेगा। सबकी तुझको हाय लगेगा।। चिकनी चुपड़ी बातें करके। क्या ले जाओगे तुम मरके।। नहीं मिलेगा दो गज कपड़े। पाल रखे जो इतने लफड़े।। सुन लो मुझे सताने वालों। खून अश्क रोवाने वालों। देर सहीं अंधेर नहीं पर। उजड़ेगा तेरा भी तो घर।। हाथ मलेगा पछतायेगा। याद उसी दिन सब आएगा।। जस करनी तस फल पायेगा। दिन ऐसा प्रभु जी लाएगा।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध " बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
( 5 जून #विश्व_पर्यावरण_दिवस विशेष)
*चौपाई छंद- वृक्षारोपण*
आओ वृक्षारोपण कर लें।
तपन धरा का मिलकर हर लें।।
पेड़ लगाना कारज पावन।
हरियाली लगते मनभावन।।1
तन मन धन से ऊपर वन है।
वन से ही संभव जीवन है।।
जन्म मरण तक साथ निभाते।
काम विकास सदा यह आते।।2
पेड़ धरा की प्यास बुझाते।
खींच मेघ को जल बरसाते।।
तब किसान हैं अन्न उगाते।
जीव चराचर भूख मिटाते।।3
देव तुल्य तरु मंगलकारी।
जड़ से पत्ते तक गुणकारी।।
दवा हवा छाया भी देते।
पर बदले में कुछ ना लेते।।4
पेड़ कटन से बढ़ा प्रदूषण।
स्वार्थ मनुज रख करते शोषण।।
धुआँ कारखाना बन दानव।
साँस हरण कर लेता मानव।।5
पेड़ लगाकर भूल न जाना।
पालन करना पुत्र समाना।।
धरती का श्रृंगार करें हम।
जीवन का आधार धरें हम।।6
गजानंद जी करें प्रतिज्ञा।
मान पेड़ को प्राण अभिज्ञा।।
पेड़ लगाना पेड़ बचाना।
सभी जनों को तुम समझाना।।7
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
चौपाई छंद- किसने ऐसी जाति बनाई? खून-खून में छूत समाई। किसने ऐसी जाति बनाई।। एक मनुज ऊँचा कहलाये। एक मनुज नीचा बन जाये।। सबके लिए हवा सम बहती। आसमान धरती ये कहती।। भेद किया क्या कभी किसी से। चलती सबकी साँस इसी से।। कहाँ लिखा है धर्म ग्रंथ में। भेद करो जो जाति पंथ में।। बाँट लिए भगवान मनुज ही। मंदिर मस्जिद चर्च दनुज ही।। कभी कर्म से धर्म बड़ा ना। छोड़ो इसके आड़ लड़ाना।। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई। एक कोंख से माँ जनमाई।। मानवता की बात करें हम। नहीं किसी पर घात करें हम।। संविधान की बोलो जय-जय। जाति-पाति की होवे क्षय-क्षय।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 8889747888
रूपमाला छंद- क्रांतिकारी सोंच रख कर, तुम बढ़ाना पाँव। लेखनी में धार सच का, जिंदगी रख दाँव।। चाटुकारी झूठ से तुम, दूर रहना नित्य। मुँह छुपा जीना पड़े जग, मत करो वह कृत्य।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छतीसगढ़)
गीतिका छंद- धर्म मानवता बड़ा हो.. नफरतों का बीज बोना, ये मनुज तुम छोड़ दो। एक है तन खून सबका, जाति बंधन तोड़ दो।। नींव समता एकता में, ईंट मिलकर जोड़ दो। धर्म मानवता बड़ा हो, द्वेष मटका फोड़ दो।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
आया साथ उमंग ले, माह दिसम्बर पर्व। पावन बेला पर करें, आओ मिल हम गर्व।। आओ मिल हम गर्व, करें मानुष तन पाकर। धन्य करें खुद आप, भजन गुरु मंगल गाकर।। सत्य अहिंसा प्रेम, सुमत का पाठ पढ़ाया। सतगुरु घासीदास, जयंती पावन आया।। 🙏🌸🏳🏳🏳🏳🏳🌸🙏 ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
सार छंद गीत- भीम नाम का नारा गूँजे है जग जय जयकारा, भीम नाम का नारा। अजर अमर सँविधान रखें हम, पावन ध्येय हमारा।। गूँजे है जग जय जयकारा...... चौदह अप्रैल जन्मदिवस है, भीमराव उद्धारक का। शोषित पिछड़े दीन दलित जन, लोक समाज सुधारक का।। जग से घोर अँधेर मिटाने, चमका दिव्य सितारा। गूँजे है जग जय जयकारा, भीम नाम का नारा।।1 समानता अधिकार दिलाकर, नारी का उत्थान किया। प्रदाप्रथा की तोड़ गुलामी, ऊँचा सिर सम्मान किया।। भीमराव मनुस्मृति जलाकर, मनुओं को ललकारा। गूँजे जग जय जयकारा, भीम नाम का नारा।।2 पढ़ो लिखो संघर्ष करो जन, जीवन की है बुनियादी। मंदिर मस्जिद नहीं भटकना, स्वयं समय की बर्बादी।। गजानन्द जी संविधान है, सबका आज सहारा।। गूँजे है जग जय जयकारा, भीम नाम का नारा।।3 छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/03/2023
कुकुभ छंद गीत- बिदाई
बाबुल के घर से बेटी की, जब-जब हुई बिदाई है।
अपना होकर भी क्यों लगती, बेटी आज पराई है।।
दिल से कैसे दिल का टुकड़ा, पल भर में तो खोता है।
आसमान भी रोता सहमा, मातु पिता जब रोता है।।
घर आँगन सब सूना सूना, तुलसी भी मुरझाई है।
बाबुल के घर से बेटी की, जब-जब हुई बिदाई है।।1
उड़ चला पिंजरा से पक्षी, अपने नए बसेरा को।
भूल नहीं तुम जाना बेटी, बाबुल के इस डेरा को।।
दो कुल का बन मान सदा ही, बेटी रीत निभाई है।
बाबुल के घर से बेटी की, जब-जब हुई बिदाई है।।2
छूट गई सब सखी सहेली, माँ की ममता परछाई।
कोने में सुबके बैठा है, यादों में रोता भाई।।
करता विदा दुआ दे बहना, दिल में दर्द जुदाई है।
बाबुल के घर से बेटी की, जब-जब हुई बिदाई है।।3
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/09/2023
सरसी छंद गीत- अवसर जिसने अवसर पाया उसने, रचा नया इतिहास। वंचित कुनबा अवसर का, करता रहा तलाश।। अवसर पाते नेता मंत्री, राजसिंहासन बैठ। लोकतंत्र का हत्या करते, करके नित घुसपैठ।। काबिल को तो जाहिल समझे, समझे अपना दास। जिसने अवसर पाया उसने, रचा नया इतिहास।।1 अवसर पाया धर्म पुजारी, लिया मनुज को लूट। दीन गरीब लुटाते धन मन, पीते भय का घूँट।। स्वर्ग नर्क का खेल निराला, बिछा हुआ है फाँस। जिसने अवसर पाया उसने, रचा नया इतिहास।।2 अवसर देकर देखो सबको, बदलेगी तस्वीर। मिट जाएगा ऊँच नीच का, मन से छोट लकीर।। गजानंद जी कभी किसी का, करें नहीं उपहास। जिसने अवसर पाया उसने, रचा नया इतिहास।।3 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/09/2023
सतगुरु बना महान
देकर सत सन्देश जग, सतगुरु बना महान। जाप तपस्या त्याग से, पाया गुरु जी ज्ञान।। पाया गुरु जी ज्ञान, भलाई जग-जन करने। सत्य अहिंसा प्रेम, दिलों में सबके भरने।। पर सेवा उपकार, चलो मानवता लेकर। गजानंद पा मान, मान औरों को देकर।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
कुण्डलिया छंद- प्यारे भारत देश
करते हैं शत शत नमन, प्यारे भारत देश। जल जंगल सुख सम्पदा, हरा-भरा परिवेश।। हरा-भरा परिवेश, नदी झरने का कल कल। लेते मन को मोह, गीत जन गण मन मंगल।। जननी बन संस्कार, प्रीत जन-जन में भरते। संत गुणी गुणगान, वेद गीता भी करते।। इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
(दोहा छंद) सत्यबोध वाणी-* रोना रोते भाग्य पर, सदा आलसी लोग। कर्मवाद जन कर्म कर, लेते नित सुख भोग।। अपनी पीर पहाड़ है, पर पीड़ा बेकार। स्वार्थी लोगों का सदा, रहा यही व्यवहार।। बनावटी सब कुछ हुआ, रीति प्रीति संबंध। गुलशन से गायब हुआ, फूल गुलाब सुगंध।। फैला है चारों तरफ, रूढ़ि अंधविश्वास। अंधभक्ति में लीन सब, तथाकथित रख आस।। चढ़ा धर्म का है नशा, जैसे नशा अफ़ीम। लूट रहें हैं लोग कुछ, बनकर धर्म हक़ीम।। बदल गए इंसान अब, बदल गया परिवेश। सोने की चिड़िया रहा, नहीं हमारा देश।। ढ़ोंग रूढ़ि पाखंड का, होगा पर्दाफाश। गजानंद संयम रखो, होना नहीं हताश।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/01/2024
सत्यबोध वाणी- कलम मेरी ताकत बन कलम, दे मुझको पहचान। देता कभी न झूठ को, स्याह बूँद में स्थान।। कलम तेज तलवार से, रखूँ बना हथियार। ढोंग रूढ़ि पाखंड पर, लिख-लिख करूँ प्रहार।। करे उजागर सच सदा, यही कलम का धर्म। मानव जग कल्याण का, रहे समाहित मर्म।। इसी कलम ने है लिखा, गीता ग्रंथ कुरान। संविधान भी लिख दिया, बाबा भीम महान।। लिखता कलम कलाम भी, देने जन संदेश। सदा सत्य अनुरूप में, बदल दिया परिवेश।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/01/2024
दोहा छंद- *माँ* सहकर माँ दुख धूप को, देती है सुख छाँव। जीते जी जन्नत मिले, छू कर माँ का पाँव।। सहती कष्ट अपार माँ, खुश रखने संतान। ममता के आँचल तले, रखती हरदम ध्यान।। प्रतिछाया माँ नेह की, कृपा दया का खान। पाकर जिनकी गोद को, मिटती सहज थकान।। देती शुभ संस्कार माँ, देती सुख वरदान। माँ से बढ़कर है नहीं, दुनिया में भगवान।। रखती है सम्भाल कर, माँ ही घर परिवार। गजानंद माँ के बिना, निर्झर द्वार बहार।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 8889747888 बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
कुण्डलिया छंद- *आये हैं प्रभु राम जी* आये हैं प्रभु राम जी, लौट अयोध्या धाम। पूर्ण हुए वनवास अब, झूम उठे गृहग्राम।। झूम उठे गृहग्राम, लगाते प्रभु जयकारा। छाया भगवा रंग, भक्तिमय देश हमारा।। गजानंद सौभाग्य, दरस प्रभु के पाये हैं। बीते सदियों बाद, राम जी घर आये हैं।। दीप जलाओ द्वार में, भक्ति भाव में डूब। स्वागत है प्रभु राम का, झूमो नाचो खूब।। झूमो नाचो खूब, मनाओ फिर दीवाली। करो राम जयघोष, बजाओ मिल सब ताली।। गजानंद गुणगान, गीत स्वागत के गाओ। आये हैं प्रभु राम, घरो-घर दीप जलाओ।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर(छत्तीसगढ़) 01/02/2024
(दोहा छंद) सत्यबोध वाणी-* रोना रोते भाग्य पर, सदा आलसी लोग। कर्मवाद जन कर्म कर, लेते नित सुख भोग।। अपनी पीर पहाड़ है, पर पीड़ा बेकार। स्वार्थी लोगों का सदा, रहा यही व्यवहार।। बनावटी सब कुछ हुआ, रीति प्रीति संबंध। गुलशन से गायब हुआ, फूल गुलाब सुगंध।। फैला है चारों तरफ, रूढ़ि अंधविश्वास। अंधभक्ति में लीन सब, तथाकथित रख आस।। चढ़ा धर्म का है नशा, जैसे नशा अफ़ीम। लूट रहें हैं लोग कुछ, बनकर धर्म हक़ीम।। बदल गए इंसान अब, बदल गया परिवेश। सोने की चिड़िया रहा नहीं हमारा देश।। सच्चाई का एक दिन, होगा पर्दाफाश। गजानंद संयम रखो, होना नहीं हताश।। 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
*15 सितंबर अभियंता दिवस पर सभी अभियंता साथियों को सादर समर्पित-* सुविधाओं के हैं सृजक, अभियंता है नाम। लोक भलाई के लिए, किये हमेशा काम।। किये हमेशा काम, भवन पथ बाँध बनाते। वायुयान बस रेल, सुखों का जाल बिछाते।। अभियंता दे मोड़, इरादा बाधाओं के। करते जन कल्याण, सृजक बन सुविधाओं के।। गढ़ते नित आयाम नव, करते भी साकार। अभियंता हर क्षेत्र में, सृजन किये विस्तार।। सृजन किये विस्तार, वायु जल थल में संभव। यंत्र यांत्रिकी देन, विश्व में देख अचंभव।। अभियंता की सोच, भलाई को ही बढ़ते। ताजमहल मीनार, सलोने सपने गढ़ते।। रहते हैं सुख से परे, रख कर सबका ध्यान। अभियंता पाते सदा, उपमा में अपमान।। उपमा में अपमान, दर्द बातों में झलके। फिर भी मुख मुस्कान, सजाये रखती पलके।। हिस्से का रविवार, कहाँ है कभी न कहते। ठंड धूप बरसात, काम जो करते रहते।। नापे व्यास विकास का, बनकर त्रिज्या चाप। ध्यान रखे वृत केंद्र पर, सच्चा हो परिमाप।। सच्चा हो परिमाप, सदा यह कोशिश करते। बन बेबस लाचार, अफसरों से हैं डरते।। गहराई में डूब, बात मन की भी भाँपे। अभियंता है नाम, सदा सच्चाई नापे।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/09/2024
मदिरा सवैया- जननायक साथ रहे सुख में दुख में असली वह तो जननायक है। आप सभी पहचान करें सबके हित क्या वह लायक है।। नायक या खलनायक हो व्यवहार बना परिचायक है। स्वार्थ भरे जग में अब कौन गजानन जी सुखदायक है।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/10/2024
विधा- छप्पय छंद सृजन शब्द- नसीब गढ़ लो स्वयं नसीब, कर्म का पूजा कर लो। रखकर मन में धीर, खुशी जीवन में भर लो।। रखो बात यह ध्यान, कौन अपना व पराया। हुआ समय विपरीत, न कोई साथ निभाया।। स्वार्थ भरे संसार में, हर कोई खुदगर्ज है। गजानंद मैं मोह का, कभी न मिटता मर्ज है।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/11/2024
सार छन्द- *संविधान को मानों* भारत की धड़कन अरु दर्पण, संविधान को मानों। सबके सुख का भाग्य विधाता, भीम राव को जानों।। छुआछूत का दंश झेलकर, जिसने किये पढ़ाई। सबको सम अधिकार दिलाने, की थी कलम लड़ाई।। कर्जदार हम आप सभी हैं, सुन लो बात जवानों। भारत की धड़कन अरु दर्पण, संविधान को मानों।। हर हाथों को काम दिलाया, और दिलाया रोटी। दिया सभी को शिक्षा उन्नत, तन को दिया लँगोटी।। भीम महान मसीहा कहते, अपना हक पहिचानों। भारत की धड़कन अरु दर्पण, संविधान को मानों।। विश्व बंधुता भाईचारा, जिसने पाठ पढ़ाया। रोजगार का द्वार खोलकर, अर्थ विकास बढ़ाया।। गजानंद जी भीम मिशन को, आगे करने ठानों। भारत की धड़कन अरु दर्पण, संविधान को मानों।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 8889747888
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विधा- सरसी छंद सृजन शब्द- *मातु भवानी* मात्रा भार- 27 यति- 16,11 पर *********************************** मातु भवानी वरद शारदे, विनती करूँ पुकार। सुन लो मेरी अर्जी माता, शरण पड़ा हूँ द्वार।। मंदिर-मन्दिर गूँज रहा है, माँ ही माँ का नाम। पावन मन से शीश झुका लो, सिद्ध हुए सब काम।। कलश सजे हैं दीप जले हैं, लाखों लाख हजार। मातु भवानी वरद शारदे, विनती करूँ पुकार।। जगराता नौ रात दिवस तक, भक्त करे यशगान। ढोल मंजिरा मांदर बाजे, सुर में छेड़े तान।। माँ आये नवरात्रि पर्व में, कर सोलह श्रृंगार। मातु भवानी वरद शारदे, विनती करूँ पुकार।। नाम एक सौ आठ जपूँ मैं, सुबह शाम दिन रात। गजानंद को पुत्र समझ माँ, देना सुख सौगात।। भवसागर से पार लगा दो, बन करके पतवार। मातु भवानी वरद शारदे, विनती करूँ पुकार।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/04/2025
विधा- सरसी छंद
सृजन शब्द- *मोह भंग*
यति- 16,11
विषय प्रदाता- आदरणीया डॉ. आशा मेहर "किरण"
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*मोह भंग अब कभी न होवे*, राम नाम से ध्यान।
शरण सदा मैं पड़ा रहूँ प्रभु, गाते महिमा गान।।
बीज संचरित अच्छाई का, करना प्रभु जी आप।
दूर बचा अवगुण से रखना, मिट जाए संताप।।
झूठ कपट की बोल न बोलूँ, भरना सत्य जुबान।
*मोह भंग अब कभी न होवे*, राम नाम से ध्यान।।
प्रेम प्रतिष्ठा मर्यादा का, सिखलाना प्रभु पाठ।
लोभ मोह भ्रम क्रोध अहं से, बने न जीवन काठ।।
सफल बना लूँ इस जीवन को, देना सद्गति ज्ञान।
*मोह भंग अब कभी न होवे*, राम नाम से ध्यान।।
रोम-रोम में राम रमा लूँ, मेरे मन की चाह।
भक्ति भाव में कमी न हो प्रभु, देना शक्ति अथाह।।
गजानंद बन दास खड़ा है, दे दो सुख वरदान।
*मोह भंग अब कभी न होवे*, राम नाम से ध्यान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/04/2025
विधा- सरसी छन्द
सृजन शब्द- भाग्य भरोसे
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भाग्य भरोसे रहता है जो, मानव वह नादान।
कर्म राह को थाम बढ़ो नित, पाने को पहिचान।।
श्रम से मिले सफलता पग-पग, श्रम से मिले मुकाम।
बनना कर्म प्रधान सुनो जी, होगा जग में नाम।।
कर्मवीर बन जीवन रण में, चलना सीना तान।
भाग्य भरोसे रहता है जो, मानव वह नादान।।
सृजित हुआ है श्रम से ही तो, ताजमहल मीनार।
श्रम के आगे रुकी झुकी है, नदियों की भी धार।।
कर्म बना लो पूजा कहते, गीता ग्रंथ कुरान।
भाग्य भरोसे रहता है जो, मानव वह नादान।।
श्रम से अपने श्रमिक दिये हैं, पर्वत को भी नाप।
आँसू का सैलाब बहाकर, सहते दुख चुपचाप।
फिर भी श्रम का शोषण करते, आये हैं धनवान।
भाग्य भरोसे रहता है जो, मानव वह नादान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/04/2025
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विधा- सार छन्द
सृजन शब्द- पधारो
(16,12)
दर्शन सुख को तरस रहा हूँ, प्रभुवर द्वार पधारो।
शरण पड़ा हूँ आस लिए प्रभु, मेरे कष्ट निवारो।।
याचक बन मैं करूँ याचना, सुन लो अर्जी दाता।
साँस चले इस तन में जब तक, रहे सुखों से नाता।।
लीन रहूँ मैं भक्ति भाव में, नंदित नैन निहारो।
दर्शन सुख को तरस रहा हूँ, प्रभुवर द्वार पधारो।।
द्वेष प्रवेश करे मत मन में, छल भ्रम क्रोध बुराई।
नेक बनाना कर्म सदा ही, राह दिखा सच्चाई।।
हो जाऊँ कर्तव्य विमुख मत, देना भूल सुधारो।
दर्शन सुख को तरस रहा हूँ, प्रभुवर द्वार पधारो।।
मन में मैं का ख्याल न आये, बहे बंधुता धारा।
बन करके पतवार आप ही, करना नाव किनारा।।
सफल करो प्रभु जन्म हमारे, जीवन भार उतारो।
दर्शन सुख को तरस रहा हूँ, प्रभुवर द्वार पधारो।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/05/2025
विधा- सार छन्द
सृजन शब्द- *अभ्युदय*
भाग्य अभ्युदय करने को नित, श्रम में ध्यान लगाना।
कर्म राह पर बढ़ते जाओ, छोड़ो व्यर्थ बहाना।।
लाँघ बताओ पर्वत सागर, पाने को सुख मोती।
रोक बताओ धार नदी की, हिम्मत में दम होती।।
कर्मपरायण बनकर हरदम, मंजिल अपना पाना।
भाग्य अभ्युदय करने को नित, श्रम में ध्यान लगाना।।
तथाकथित से ध्यान हटाओ, करो परख सच्चाई।
पढ़ना सीखो मन की बातें, और पीर गहराई।।
छोड़ सभी रुसवाई जग में, हँसना और हँसाना।
भाग्य अभ्युदय करने को नित, श्रम में ध्यान लगाना।।
गीता ग्रन्थ कुरान सभी के, मूलमन्त्र को जानो।
कर्म प्रधान मनुज बन जाओ, खुद को खुद पहिचानो।।
गजानंद जी कर्म महत्ता, सबको आप बताना।
भाग्य अभ्युदय करने को नित, श्रम में ध्यान लगाना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/04/2025
विधा- सार छन्द
सृजन शब्द- *निर्विवाद*
निर्विवाद जीवन को रखने, अपना ध्येय बनाना।
सत्य अहिंसा प्रेम दया का, सबको पाठ पढ़ाना।।
ठग बैठी है सत्कर्मों को, बनकर ठगनी माया।
सभी तरफ में मँडराता है, लोभ मोह का साया।।
समय सचेत किये अब जागो, पड़े नहीं पछताना।
निर्विवाद जीवन को रखने, अपना ध्येय बनाना।।
तुझमें मुझमें बसते सब में, राम नाम अविनाशी।
फिर क्यों दर-दर भटक रहा है, मन को किये उदासी।।
हरि मिले न पाहन पूजे से, है इतना समझाना।
निर्विवाद जीवन को रखने, अपना ध्येय बनाना।।
नहीं भरोसा है सांसों का, दे जाएगी धोखा।
पाने को सम्मान जगत में, कर्म करे जा चोखा।।
जोड़ रखो रिश्तों को हरदम, असली यही खजाना।
निर्विवाद जीवन को रखने, अपना ध्येय बनाना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/04/2025
विधा- सार छन्द
सृजन शब्द- *भारत*
भारत की धड़कन अरु दर्पण, संविधान को मानों।
सबके सुख का भाग्य विधाता, भीम राव को जानों।।
छुआछूत का दंश झेलकर, जिसने किये पढ़ाई।
सबको सम अधिकार दिलाने, की थी कलम लड़ाई।।
कर्जदार हम आप सभी हैं, सुन लो बात जवानों।
भारत की धड़कन अरु दर्पण, संविधान को मानों।।
हर हाथों को काम दिलाया, और दिलाया रोटी।
दिया सभी को शिक्षा उन्नत, तन को दिया लँगोटी।।
भीम महान मसीहा कहते, अपना हक पहिचानों।
भारत की धड़कन अरु दर्पण, संविधान को मानों।।
विश्व बंधुता भाईचारा, जिसने पाठ पढ़ाया।
रोजगार का द्वार खोलकर, अर्थ विकास बढ़ाया।।
गजानंद जी भीम मिशन को, आगे करने ठानों।
भारत की धड़कन अरु दर्पण, संविधान को मानों।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/04/2025
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प्रदीप छन्द-
(16,13)
*भारत देश महान है*
ऋषि मुनि यश महिमा गाते, गीता ग्रंथ कुरान है।
सबसे प्यारा सबसे न्यारा, भारत देश महान है।।
संत महापुरुषों की वाणी, देते जीवन सीख है।
राम रहीम कबीर यीशु की, पावन भक्ति सरीख है।।
अनेकता में जहाँ एकता, इसकी धड़कन जान है।
सबसे प्यारा सबसे न्यारा, भारत देश महान है।।
मर्यादा का पाठ पढ़ाया, जहाँ हमें श्री राम ने।
सत्य अहिंसा मानवता का, मन्त्र दिया सतनाम ने।।
संविधान है भीमराव का, देता सबको मान है।
सबसे प्यारा सबसे न्यारा, भारत देश महान है।।
बड़े-बड़े उद्योग यहाँ पर, आर्थिकता सम्पन्न है।
भूमण्डल का भूख मिटाते, सदा यहाँ की अन्न है।।
खनिज संपदा सोना चाँदी, हीरा मोती खान है।
सबसे प्यारा सबसे न्यारा, भारत देश महान है।।
वंदेमातरम गीत जनगण, मन गाते आवाम है।
सब सोने की चिड़िया कहते, हिन्द हिमालय धाम है।।
तीन रंग का राष्ट्र तिरंगा, हम सबकी तो शान है।
सबसे प्यारा सबसे न्यारा, भारत देश महान है।।
पाँव पखार रहा है निसदिन, पावन गंगा धार है।
गूँज रहा है दसो दिशा में, इसकी जय जयकार है।।
संस्कृति संस्कार सुवासित का, करते सब गुणगान है।
सबसे प्यारा सबसे न्यारा, भारत देश महान है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/04/2025
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विधा- आल्हा छन्द
सृजन शब्द- महारथ
मात्रा भार- 31
यति- 16,15
जन्में वीर महारथ भारत, वंदित पावन धरा महान।
भाव सुमन अर्पित कर मन से, गजानंद करता गुणगान।।
आजादी की लड़ीं लड़ाई, वीर साहसी योद्धाबाज।
खेल जान की बाजी सबने, भारत माँ की रख ली लाज।।
संस्कृति संस्कार सुरक्षा, हेतु हुए हैं जो बलिदान।
भाव सुमन अर्पित कर मन से, गजानंद करता गुणगान।।1
ब्रिटिश हुकूमत को ललकारे, एक -एक कर दिए पछाड़।
धूल चटाकर मार भगाये, दिए बाजुएँ साथ उखाड़।।
नरम गरम दल के सब साथी, जंग लड़े मिल थाम कमान।
भाव सुमन अर्पित कर मन से, गजानंद करता गुणगान।।2
वीरांगना जहाँ झाँसी की, रानी लक्ष्मीबाई नाम।
छपक- छपक तलवार चलाती, दोनों हाथों में जो थाम।।
आजादी की दीवानी बन, लड़ते थे जो पुरुष समान।
भाव सुमन अर्पित कर मन से, गजानंद करता गुणगान।।3
लाल बाल अरु पाल भगतसिंह, बोस सुभाष खुदी आजाद।
गरम खून के वीर सिपाही, भरते थे जो भीषण नाद।।
ब्रिटिश सिंहासन थरथर कांपे, जब भी लेते नाम जुबान।
भाव सुमन अर्पित कर मन से, गजानंद करता गुणगान।।4
महा महात्मा गाँधी बापू, दिए शांति का शुभ परिवेश।
अंग्रेजो अब भारत छोड़ो, नहीं तुम्हारा है यह देश।।
बिगुल बजा तब आजादी का, कूद पड़े सब वीर जवान।
भाव सुमन अर्पित कर मन से, गजानंद करता गुणगान।।5
सीना चौड़ा हो जाता है, अमर शहीदों को कर याद।
लड़ते थे रणवीर बांकुरे, बना हौसला को फौलाद।।
वीर शहीदों की यश गाथा, गाता है यह हिंदुस्तान।
भाव सुमन अर्पित कर मन से, गजानंद करता गुणगान।।6
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/04/2025
विधा- आल्हा छन्द गीत
सृजन शब्द- आराम
मात्रा भार- 31
यति- 16,15
खुद के श्रम के बलबूते ही, पाओगे जग में यश नाम।
रुको नहीं तुम झुको नहीं तुम, करना कभी नहीं आराम।।
काम आज का आज करो तुम, देना कभी न कल पर टाल।
समय किसी का हुआ नहीं है, नाहक भ्रम मत मन में पाल।।
साथ समय के जो चलते हैं, मिलते उनको सदा मुकाम।
रुको नहीं तुम झुको नहीं तुम, करना कभी नहीं आराम।।
चिंता चिता समान हुए हैं, कहते मानव चिंतनशील।
जो जवाबदारी से भगते, लेते उनको आलस लील।।
कथन महापुरुषों की सुन लो, होता है आराम हराम।
रुको नहीं तुम झुको नहीं तुम, करना कभी नहीं आराम।।
झर झर झर झरने झरते हैं, कल कल करती नदिया धार।
कभी नहीं यह पीछे मुड़ते, करना मन में बात विचार।।
अडिग खड़ा रहता है पर्वत, देते दृढ़ निश्चय पैगाम।
रुको नहीं तुम झुको नहीं तुम, करना कभी नहीं आराम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/04/2025
विधा- आल्हा छन्द
सृजन शब्द- *माधव*
माधव- माधव चीख रही हैं, नारी कलयुग की तो आज।
उतर रही इज्जत सड़को पर, आप बचा लो आकर लाज।।
नहीं सुरक्षित रहीं बेटियाँ, गाँव शहर दफ्तर कालेज।
चील गिद्ध की तरह लोग अब, नजर गड़ाए बैठे तेज।।
नाजुक- नाजुक फूल कली को, नोच रहें हैं कौवें बाज।।
माधव- माधव चीख रही हैं, नारी कलयुग की तो आज।।
साधु- संत के आड़ लिए कुछ, करते हैं काले करतूत।
फिर भी तन पर चुपरे बैठे, शिक्षित नारी भक्ति भभूत।।
चीख-चीख तब रोते गाते, गिरते जब इज्जत पर गाज।।
माधव- माधव चीख रही हैं, नारी कलयुग की तो आज।।
कर्म धर्म संस्कार प्रदूषित, कौन किये हैं करो विचार।
अंधभक्ति में मग्न हुए सब, तन- मन धन कर बंटाधार।।
खौफ दिखाकर धर्म सुरक्षा, पहनें हैं कुछ सर पर ताज।
माधव- माधव चीख रही हैं, नारी कलयुग की तो आज।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/04/2025
सरसी छंद- *बुद्ध धम्म है....*
बुद्ध धम्म है बुद्ध मार्ग है, बुद्ध विचार प्रबुद्ध।
बुद्ध शांति है बुद्ध कांति है, बुद्ध नहीं पथ युद्ध।।
बुद्ध प्रेम है बुद्ध त्याग है, बुद्ध नहीं है धर्म।
बुद्ध अहिंसा मानवता है, बुद्ध नेक है कर्म।।
बुद्धम शरणम गच्छामी से, जीवन हो परिशुद्ध।
बुद्ध शांति है बुद्ध कांति है, बुद्ध नहीं पथ युद्ध।।
बुद्ध नहीं है ढोंग रूढ़ि भ्रम, बुद्ध नहीं पाखण्ड।
बुद्ध मनन है शुद्ध वचन है, बुद्ध सत्य आखण्ड।।
बुद्ध सुगम है बुद्ध सरल है, बुद्ध नहीं अवरुद्ध।
बुद्ध शांति है बुद्ध कांति है, बुद्ध नहीं पथ युद्ध।।
बुद्ध नहीं है अंधभक्ति की, योग साधना ध्यान।
बुद्ध दीप है बुद्ध सीप है, बुद्ध शोध विज्ञान।।
बुद्ध दया है बुद्ध दुआ है, नहीं भावना क्रुद्ध।
बुद्ध शांति है बुद्ध कांति है, बुद्ध नहीं पथ युद्ध।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/07/2025
कुंडलिया छन्द- *सिंदूर* (13/07/2025
चुटकी भर सिंदूर का, मोल कीमती मान।
देता यही समाज में, नारी को पहिचान।।
नारी को पहिचान, दिलाने को है बढ़ना।
नारी शक्ति प्रधान, देश हमको है गढ़ना।।
नारी लक्ष्मी रूप, करें हम इज्जत आदर।
सजे रहे सिंदूर, मांग में नित चुटकी भर।।
कुण्डलिया छन्द- *प्यास*
कोई भूखे प्यास में, तड़पे मत दिन रात।
जिंदा हो इंसानियत, ध्यान रखो यह बात।।
ध्यान रखो यह बात, निभाओ भागीदारी।
सबके हिस्से अन्न, थाल में हो तरकारी।।
सबका हो मन तृप्त, प्यास से कंठ न सूखे।
गजानंद दो ध्यान, रहे मत कोई भूखे।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/07/2025
रूपमाला (मदन) छन्द- *परिवार*
जान लो संसार में है, धन असल परिवार।
रख इसे संभाल चलना, बाँध नाता प्यार।।
अंश हैं अपने लहू का, दो खुशी भरपूर।
रूठ जाए तो मनाओ, हो न दिल से दूर।।
है कहाँ परिवार घर वो, मुस्कुराते गाँव।
हो गए हैं मतलबी सब, बोल चुभते घांव।।
बाँटते माता पिता को, स्वार्थ में संतान।
अब नहीं इंसान जग में, लोग हैं हैवान।।
मोह माया में फँसे अब, लड़ रहें हैं लोग।
हर किसी को है लगा धन, लोभ का बस रोग।।
रो रहा इंसानियत है, सोच में पड़ आज।
धर्म संकट में पड़े मत, लो बचा लो लाज।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/05/2025
रूपमाला (मदन) छन्द- *माँ भारती*
है नमन माँ भारती को, नित झुकाकर शीश।
सर्व कुछ अर्पण करूँ माँ, मानकर शुभ ईश।।
है धरा पावन सुशोभित, नाम भारत देश।
एकता है जान इसकी, स्वच्छ है परिवेश।।
प्रेम है सौहार्द है अरु, आपसी सद्भाव।
देश की करने सुरक्षा, है हृदय में चाव।।
वीर सीमा पर खड़े हैं, बाँह अपने तान।
नित बढ़ाते हम रहेंगे, हर कदम पर शान।
संत गुरुओं की धरा यह, कीर्ति है चहुँओर।
ग्रंथ गीता वेद में भी, गूँजता यश शोर।।
गर्व से माँ भारती पर, सर्व कर दूँ त्याग।
जान पर भी खेलकर मैं, दूँ मिटा सब दाग।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/05/2025
अमृतध्वनि छन्द- (19/05/2025)
*पथिक*
प्यासा पथ में है पथिक, रख पानी की चाह।
पाने को पानी सदा, लगा रहा है थाह।।
लगा रहा है, थाह जिंदगी, भर वे फ़िरते।
भटक रहा है, दर दर जग में, गिरते उठते।।
मन उदास है, कभी आस है, कभी निराशा।
राह न सूझे, प्यास न बूझे, पथ नित प्यासा।।
अमृतध्वनि छन्द- (20/05/202)
नीर
जीवन पथ में बढ़ चलो, रखे हौसला धीर।
बहने देना मत कभी, इन नैनों से नीर।।
इन नैनों से, नीर बचाकर, तुम तो रखना।
नेक कर्म से, दया धर्म से, सुख फल चखना।।
नावाबी बन, जीना बनठन, तन असली धन।
कहती धड़कन, सुख दुख दर्पण, है यह जीवन।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
अमृतध्वनि छन्द- श्री राम
पावन वंदन नाम है, नाम नमन श्री राम।
मन से सुमिरन कीजिये, सिद्ध हुए सब काम।।
सिद्ध हुए सब, काम नाम प्रभु, का जप माला।
कष्ट घटे हैं, तमस मिटे हैं, हुए उजाला।।
शत शत वंदन, दशरथ नंदन, नाम सुहावन।
खुशियाँ भर लो, जीवन कर लो, प्रभु पग पावन।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/05/2025
लावणी छन्द- चंदा
चातक प्रेम चकोर पुकारे, लेकर तड़प निगाहों में।
मधुर मिलन का पल है चंदा, आ जाओ अब बाहों में।।
ओझल मन से मीत न होवे, बोझिल दिल को समझाओ।
हो जाऊँ मदहोश प्रिये मैं, प्रेम छटा को बिखराओ।।
चमक जुगनुओं की है चमके, आसमान की राहों में।
चातक प्रेम चकोर पुकारे, लेकर तड़प निगाहों में।
कभी न होवे रात अमावस, ग्रहण प्रीत को मत घेरे।
एक दूसरे का हो जायें, आओ ले लें हम फेरे।।
माना हूँ मूरत मंदिर का, तुमको अपनी चाहो में।
चातक प्रेम चकोर पुकारे, लेकर तड़प निगाहों में।।
अधरों पर मुस्कान खिला दूँ, खुशियों की सौगात लिए।
डोली लेकर आ जाऊँ मैं, तारों की बारात लिए।।
सुखमय जीवन कर लूँ अपना, पाकर तुम्हें पनाहों में।
चातक प्रेम चकोर पुकारे, लेकर तड़प निगाहों में।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/06/2025
लावणी छंद- *बसेरा*
आसमान में उड़ते पंछी, करते रात बसेरा है।
जीवन जीने की तलाश में, फिर से नया सबेरा है।।
पंखों में जब तलक जान है, तब तक उड़ान भरते हैं।
अनजाना रह परिणामों से, श्रम से नहीं मुकरते हैं।।
चुग-चुग तिनका नीड़ बनाते, डाले उस पर डेरा है।
आसमान में उड़ते पंछी, करते रात बसेरा है।।
कभी तरसते छाँव ठाँव को, कभी तरसते दाने को।
कभी तरसते कलरव करने, कभी पंख फैलाने को।।
खेल निराला इस जीवन का, घिरा समय का घेरा है।
आसमान में उड़ते पंछी, करते रात बसेरा है।।
कभी पिंजरे में बन कैदी, सजा भुगतते रहते हैं।
इंसानों को बेजुबान हम, चीज खिलौने लगते हैं।।
जीने दो उन्मुक्त गगन में, विनय सभी से मेरा है।
आसमान में उड़ते पंछी, करते रात बसेरा है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/06/2025
लावणी छन्द- *पर्यावरण*
पर्यावरण सुरक्षा करने, आओ सब मन में ठानें।
लापरवाही अगर किये तो, पायेंगे नहीं ठिकानें।।
जल थल नभ अब शुद्ध नहीं है, गंदगी जहर बन फैली।
पानी ध्वनि है हवा प्रदूषित, जिंदगी हुई है मैली।।
प्लास्टिक पन्नी में बिकता है, अब तो सारी सामानें।
पर्यावरण सुरक्षा करने, आओ सब मन में ठानें।।
पेड़ लगायें पेड़ बचायें, पालन करना है नारा।
रखें सुरक्षित हरियाली को, बस हो यह ध्येय हमारा।।
सभी जनों को समझाना है, आगे बढ़ पेड़ लगाने।
पर्यावरण सुरक्षा करने, आओ सब मन में ठानें।।
खड़ा मौत की पगडंडी पर, देश समाज हमारा।
पर्यावरण बिना तो जीवन, होगा भी नहीं गुजारा।।
गजानंद जी ध्यान धरो अब, कर लिए बहुत मनमाने।
पर्यावरण सुरक्षा करने, आओ सब मन में ठानें।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/06/2025
लावणी छन्द- *कलम*
मानवता कल्याण लिखे जो, कलम वही कहलाती है।
सत्य राह पर बढ़े चलो नित, कवि को कलम सिखाती है।।
लिखे हकीकत दर्पण बन तब, देश समाज विकास करे।
तथाकथित भ्रम आडम्बर का, जग में पर्दाफाश करे।।
ढोंग रूढ़ि पाखण्ड मिटाने, ढाल कलम बन जाती है।
मानवता कल्याण लिखे जो, कलम वही कहलाती है।।
राग अलापे दरबारी जो, लोभ भरे भय स्याही से।
सच्चाई दिग्भ्रमित करे जो, झूठी बोल गवाही से।।
कलम नहीं कहलाती वह जब, डर से शीश झुकाती है।
मानवता कल्याण लिखे जो, कलम वही कहलाती है।।
शोषण अत्याचार मिटाने, कलम कलाम सुराज बने।
दीन दुखी असहाय जनों की, साज बने आवाज बने।।
गजानंद जी कलम युगों से, कवियों की तो थाती है।
मानवता कल्याण लिखे जो, कलम वही कहलाती है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/06/2025
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गीतिका छन्द- *भारत*
(2122 2122, 2122 212)
देश भारत की धरा को, है नमन सौ बार जी।
संत गुरुओं ने दिए हैं, ज्ञान का उपहार जी।।
नाम ऊँचा है जगत में, जानते सत धर्म को।
लोग असली देव पूजा, मानते हैं कर्म को।।
लोक जनमत एकता का, गा रहें गुणगान जन।
सर्व धर्मों का सदा ही, कर रहें सम्मान जन।।
सोन की चिड़िया कहाते, धन्य भारत देश है।
विश्व गुरु का ताज सर पर, सौम्य शुभ परिवेश है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 01/07/2025
गीतिका छन्द- *शिक्षा*
ज्ञान शिक्षा से मिले हैं, मान शिक्षा से मिले।
दीप शिक्षा का जले नित, पुष्प शिक्षा का खिले।।
शेरनी का दूध शिक्षा, पी दहाड़े लोग हैं।
भीम साहब का दिए यह, सूक्ति सुख का योग है।।
सिर्फ शिक्षा ज्ञान पाने, का नहीं बस मन्त्र है।
बोलने लड़ने समझने, के लिए यह तंत्र है।।
इसलिए लोगों पढ़ो तुम, जानने अधिकार को।
लो मिटा मन के तमस को, कर उजाला द्वार को।।
आज शिक्षा सिर्फ यारों, लूट का व्यापार है।
पंगु है कानून सत्ता, मौन भी सरकार है।।
देख लो बेरोज़गारी, का बढ़ा अनुपात है।
आम जनता को मिली बस, वोट की सौगात है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/07/2025
गीतिका छंद- *बरसात*
माह है आषाढ़ का यह, हो रही बरसात है।
हल चलाने खेत में अब, दे रही सौगात है।।
थाम हलधर बाँह में हल, खेत को जाने लगे।
पेट भरने इस जगत का, भाग्य उनका है जगे।।
गीत दादुर गा रहे हैं, ताल झींगुर दे रहे।
प्रेम मदिरा पी पवन अब, झूमने सबको कहे।।
रूप पानी ले धरा से, मेघ मस्ती में मिले।
अंगड़ाई है कली में, फूल बगियों में खिले।।
खेत डोली है लबालब, है नदी ऊफान में।
ताल सरगम छेड़ते हैं, सुरमई सी गान में।।
बूँद पत्तो पर पड़ी तो, खिल रही मुस्कान है।
हो रहा बरसात का अब, हर तरफ गुणगान है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/07/2025
गीतिका छंद- *सरिता*
जिस तरह सूखे नहीं हैं, प्रेम की सरिता कभी।
उस तरह प्यासे नहीं हैं, छन्द कवि कविता कभी।।
शब्द में जिंदा सदा हैं, नित अमर उर भाव में।
है हकीकत बात यह तो, जी रहें अलगाव में।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/07/2025
गीतिका छन्द- *मौन*
देख अत्याचार शोषण, मौन तुम रहना नहीं।
बाजुओं में जोश रखना, जुल्म को सहना नहीं।।
झूठ जग में हारती है, सत्य की ही जीत है।
मीठ वचनों से सदा ही, लोग बनते मीत है।।
तज बुराई क्रोध तन से, मैं अहं को छोड़ दो।
धीर मन में बाँध चलना, द्वेष मटका फोड़ दो।।
बन सिपाही कर्म योगी, धर्म रक्षा के लिए।
साथ रखना एक गुरुवर, ज्ञान दीक्षा के लिए।।
कर अलौकिक काम जग में, नाम हो सम्मान हो।
युग युगों तक लोग जानें, मान हो गुणगान हो।।
जिंदगी का मोल समझो, और जीवन अर्थ हो।
सुन गजानन ध्यान रखना, सुख समय मत व्यर्थ हो।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/07/2025
चौपाई छन्द- *जन्म-मृत्यु*
जन्म-मृत्यु तो है अटल, अटल जगत की रीत।
जब तक तन में साँस है, जोड़ रखो प्रिय प्रीत।।
धन्य जन्म धरती पर कर लो।
दामन में यश खुशियाँ भर लो।।
नहीं मिलेगा समय दुबारा।
चमका लो तुम भाग्य सितारा।।
कर्म महान सदा हितकारी।
देते फल जो मंगलकारी।।
जीवन का कुछ ध्येय बना लो।
हिय में प्रभु का नाम बसा लो।।
द्वंद-द्वेष को त्याग चलो तुम।
परहित दीप समान जलो तुम।।
दानी बनकर दान करो नित।
ध्यानी बनकर ध्यान करो नित।।
मीत मृत्यु को मानिए, मन माया सब लूट।
सत्यबोध संसार में, जो है सत्य अटूट।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/03/2026
चौपाई छन्द- *विवाह*
प्रेम मिलाप विवाह है, समझें इसे न खेल।
कर्म रीति संस्कार यह, दो रिश्तों का मेल।।
तन मन से जब जुड़ते नाते।
सच तब वही विवाह कहाते।।
जिसमें हो संस्कार समाहित।
वर वधु धर्म करे यह ग्राहित।।
मंगल कलश सजा अति सुंदर।
गूँज रहा स्वर घर के अंदर।।
पाणिग्रहण की रीति सुहानी।
बंधे प्रेम में राजा रानी।।
सात फेर सँग वचन निभायें।
बसे सुखी घर खुशियाँ आयें।।
अग्नि देव को साक्ष्य बनाकर।
मातु-पिता का आशिष पाकर।।
मंगल बेला पावन आई।
गूँज रही घर-घर शहनाई।।
दो तन-मन का मेल सुहावन।
जीवन पथ हो अति मनभावन॥
वर-कन्या का बंधन प्यारा।
जैसे नभ में चाँद-सितारा।।
प्रीत रीति की रस्म सुहानी।
दो जीवन की जुड़ी कहानी।।
शुभ आशीष लुटाते द्वारे।
सुखी रहें ये जोड़ी प्यारे।।
देते आशीर्वाद सभी जन।
सुखमय मंगलमय हो जीवन।।
सत्यबोध इस शुभ समय, गूँजे मंगल गान।
अक्षय रहे सुहाग यह, सदा बढ़े सम्मान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 07/03/2026
चौपाई छंद - *नारी* ( 8 मार्च विश्व महिला दिवस विशेष)
जग को जीवन दान दे, नारी ही आधार।।
समझ नहीं कमजोर वह, शक्ति रूप अवतार।।
नारी शक्ति अपार अपारा।
जग जननी यह रूप तुम्हारा।।
ममता की तुम बहती धारा।
संकट में तुम बनी सहारा।।
घर की शोभा तुमसे न्यारी।
त्याग तपस्या तुम पर वारी।।
प्रेम भाव का दीप जलाती।
जग को तुम ही स्वर्ग बनाती।।
ज्ञान वीरता लोक बखानी।
जग में पूजित गुण वरदानी।।
धैर्य धरम की मूरत पावन।
महक उठे जिनसे घर आँगन।।
रण में चंडी रूप दिखाती।
शत्रु देखकर कंपकपाती।
बुद्धि शक्ति की खान तुम्हीं हो।
घर की इज्जत मान तुम्हीं हो।।
नूतन पथ पर बढ़ती जाओ।
गौरव अपना सदा बढ़ाओ।।
बनकर महको तुम फुलवारी।
शत-शत वंदन तुमको नारी।।
नारी पावन रूप है, ममता का भंडार।
सत्यबोध उनसे धरा, सुंदर यह संसार।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/03/2026
चौपाई छंद- *परीक्षा*
कठिन परीक्षा देखकर, मन में बढ़े हताश।
करते श्रम जो रात दिन, छुए वही आकाश॥
निकट परीक्षा जब है आती
मन में भारी चिंता छाती॥
तजकर आलस पढ़ो सबेरे।
दूर करो अज्ञान अँधेरे॥
दृढ़ संकल्पित हो जो पढ़ते।
वे ही आगे जग में बढ़ते॥
कठिन मेहनत मंत्र हमारा।
चमका लें हम भाग्य सितारा॥
पढ़ लिख मन में धीरज रखिए।
श्रम का फल नित मीठा चखिए।।
पुस्तक ज्ञान हृदय में लायें।
सारे संशय दूर भगायें।।
लिख-लिख कर अभ्यास करें नित।
ज्ञान घड़ा अनमोल भरें नित।।
समय नियोजन जो हैं करते।
नहीं परीक्षा से वे डरते।।
गुरु का ध्यान धरें चल मन में।
विद्या से ही सुख जीवन में।।
श्रम का रंग चढ़े जब चोखा।
नहीं मनुज तब खाते धोखा।।
मोल समय की जान लें, तज दें आलस मीत।
सत्यबोध श्रम से मिले, हर राहों में जीत।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 09/03/2026
सादर समीक्षार्थ
चौपाई छंद- *मान*
मान बराबर धन नहीं, मान बिना सब शून्य।
जिनका मानस मानमय, सबसे बड़ा सपुण्य।।
परहित मान परम सुखदाई।
तज मद-मान करें चतुराई।।
मान सहित जो जीवन जीता।
वही जगत में सुख रस पीता।।
निज गौरव का ध्यान रहे नित।
अनुशासन का भान रहे नित।।
सत्य राह पर जो भी चलता।
जग में उसका मान न ढलता।।
अति अभिमान पतन की सीढ़ी।
सहती दुख है अगली पीढ़ी।।
मान वही जो विनय बढ़ाये।
मानवता का पाठ पढ़ाये।।
पर का मान सदा जो करते।
उनके घर यश वैभव भरते।।
कटु वचन से मान न खोना।
द्वेष घृणा का बीज न बोना।।
मान प्रतिष्ठा संयम पाते।
ज्ञानी जन यह ज्ञान बताते।।
मर्यादा में जो जन रहता।
कभी नहीं जग में दुख सहता।।
रूठा मान मनाइये, तजकर सब अभिमान।
बिन पानी के सीप ज्यों, त्यों नर बिनु सम्मान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/03/2026
सादर समीक्षार्थ
चौपाई छंद- *किसान*
तप-तप सूरज जेठ का, देह रही झुलसाय।
अन्न उगाता देश हित, हलधर थके न पाय।।
फटे बिवाई पाँव में, सिर पर भारी भार।
धरती का बेटा खड़ा, जग का है आधार।।
जग हित करने अन्न उगाता।
कष्ट सहे बन भाग्य विधाता॥
जेठ मास की तपती गर्मी।
किये मेहनत बन श्रम धर्मी।।
बरखा ऋतु जब झमझम आवे।
भीग-भीग हल खेत चलावे॥
जाड़े की रातों में जगते।
ठिठुरन देख नहीं वे भगते।।
मिट्टी को वह सोना करता।
पेट सभी का खाली भरता॥
सादा जीवन उच्च विचा़रा।
यही किसान जगत का प्यारा॥
मेघों की पदचाप सुन, मन में जगे उमंग।
माटी से सोना उगे, खुशियों का ले रंग।।
खुद भूखा सोता मगर, देता सबको अन्न।
त्याग मूर्ति वह देव है, सबको करे प्रसन्न।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/03/2026
सादर समीक्षार्थ-
चौपाई छंद- *स्वप्न*
स्वप्न सुहाने भोर के, मन में भरते आस।
मृगतृष्णा बन छल रहे, तोड़ सभी विश्वास।।
मूँदे नैन नींद जब आवे।
एक अनूपा जगत बनावे।।
बिना पंख खग बन उड़ जाई।
अद्भुत कौतुक स्वप्न दिखाई।।
कहुँ कंचन के महल सुहावन।
कहुँ उपवन अति मंजु लुभावन।।
जो न जगत में संभव होई।
स्वप्न वही देखे सब कोई।।
पर जब नैन खुले पल माहीं।
सत्य कहीं कुछ दीखत नाहीं।।
माया जाल समझ यह खेला।
जैसे रैन दिवस का मेला।।
किंतु स्वप्न ही शक्ति जगाते।
लक्ष्य ओर पग सदा बढ़ाते।।
जो नर ऊँचे स्वप्न निहारे।
जीवन में सुख पाये सारे।।
नींद खुली तो खो गए, सपने सुंदर रूप।
जैसे ढलती साँझ में, ओझल होती धूप।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 16/03/2026
सादर समीक्षार्थ -
चौपाई छंद- *भक्ति*
भक्ति बिना है शून्य सब, जैसे नभ बिन चाँद।
हृदय कमल खिलता तभी, टूटे जग की फाँद॥
भक्ति मार्ग अति वंदित पावन।
लगते हरि का भजन सुहावन।।
हृदय कमल में प्रीति जगाओ।
राम नाम का रस पी जाओ।।
बाधा क्लेश सकल मिट जाते।
सुबह शाम जो प्रभु गुण गाते।।
श्रद्धा दीप जला निज अंतर।
सुमिरन कर लो मंत्र निरंतर।।
विषय वासना दूर भगाये।
प्रभु पद पंकज शीश झुकाये।।
सदा शरण जो प्रभु के आते।
परम शांति सुख वैभव पाते।।
जैसे मीन नीर बिनु व्याकुल।
वैसे भक्त नाम बिनु आकुल।।
मोह जाल सब बंधन छूटे।
भक्ति मिले तो भाग्य न फूटे।।
अमल भक्ति है सुख की खानी।
संत पुरान निगम जस बानी।।
प्रेम मगन हो हरि गुण गाओ।
सत्यबोध सब विघ्न मिटाओ।।
राम नाम की ओट ले, तज दो सब अभिमान।
भक्ति मार्ग वह राह है, जहाँ मिले भगवान॥
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/03/2026
विश्व वानिकी दिवस विशेष- (21 मार्च)
*गीतिका छंद*
है धरा का भाग्य तरुवर, प्राण इनमें बस रहे।
पल्लवों की ओट में से, सब सितारे हँस रहे।।
बाँटते खुशबू निरंतर, छाँव शीतल भी दिए।
यह विषैली वायु पीते, आप हम सबके लिए।।
झूमते जब मेघ अम्बर, गीत इनका गा रहे।
खग मधुर कलरव सुनाकर, मन हृदय हर्षा रहे।।
काटकर इनको न मानव, स्वयं को लाचार कर।
वृक्ष रोपण आज कर तू, सृष्टि का श्रृंगार कर।।
वानिकी से जिंदगी है, और बढ़ती आयु है।
शुद्ध वन पर्यावरण घर, शुद्ध होते वायु है।।
लें शपथ हर व्यक्ति पावन, एक पौधा पालना।
वानिकी के पर्व पर अज्ञानता को टालना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/03/2026
चौपई छंद- *वीर शहीद*
मातृभूमि प्रति अर्पण प्राण।
वीर शहीदों का गुणगान।।
शत्रु दलन को बने कृपाण।
अमर हुआ उनका बलिदान।।
देश सुरक्षा थाम कमान।
रहा अडिग जो बन चट्टान।।
सीना ताने खड़ा सपाद।
उनको जग करता है याद।।
रक्त बहे बन पावन धार।
मिटा गए वे अत्याचार।।
माटी तिलक लगाओ आज।
जिन पर हम सबको है नाज।।
लिपटे वीर ध्वजा की ओट।
सहे हृदय पर तीखी चोट।।
अम्बर करता उन्हें प्रणाम।
जय-जय भारत वीर ललाम।।
याद करेगी दुनिया वीर।
मिटा गए जो सबकी पीर।।
दीपक बनकर जले महान।
भारत माँ की ऊँची शान।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/04/2026

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