गुरु बंदना
संत शिरोमणि आप गुरु, चरण कमल हम दास ।
तोर आरती जग करे, बाँधव मन विश्वास ।।
सतगुरु बाबा घासीदास। जग के आशा अउ विश्वास।।
गूँजे नभ मा जय जयकार। सत्य नाम जग मा हे सार।।
सुरुज जोत ला नित्य प्रणाम। जप ले सतगुरु जय सतनाम।।
मिलही जिनगी पद निर्वान। कर अंतस मा गुरु के ध्यान।।
करै आरती संतन तोर। तन दियना ले मन के भोर।।
पान सुपारी ले जय माल। सजा कलश जी कंचन थाल।।
भक्ति भजन मंगल पद गीत। सतनामी बाना धर रीत।।
सेत सजा के चन्दन माथ। नर नारी सब मिलके साथ।।
गजानंद बिनती कर जोर। सुन लौ गुरु जी अरजी मोर।।
समता सुमता जग कल्यान। बनौ आप गुरु जग बरदान।।
अहंकार मन दूर हो, सहज सरल व्यवहार।
बानी भरौ मिठास गुरु, बहे सुधा रस धार।।
जप ले जिनगी मा सतनाम
जपले जिनगी मा सतनाम। बनही तोरे बिगड़े काम।
जे समझे जिनगी के दाम। लेथे वो सत ला जी थाम।।
चलव गिरौदपुरी के धाम। ऊँचा हवे सेत के खाम।।
गुरु लिये जिहाँ जी अवतार। कर दिस सबके बेड़ापार।।
माघ पंचमी मेला जाव। गुरु बाबा के दरसन पाव।।
सुन लेबे गुरु के संदेश। मिट जाही जी मन के क्लेश।।
जोक नदी के निरमल धार। देवय सबला खुशी अपार।।
गुरु धुनी रमाये छात पहाड़। महिमा गावय जंगल झाड़।।
सुग्घर अमृत चरण के कुंड। रइथे जिहाँ संत के झुंड।।
आस रखे पीये दो बूँद। हो गुरु दरसन आँखी मूँद ।।
सतनामी के का पहिचान। जोड़ा खम्भा सेत निशान।।
सुमता के हे का परमान। बालक गुरु के हे बलिदान।।
डारा लमगे लोरी लोर। लेवव संगी बइँहा जोर।
लावव मिलके नवा बिहान। रखना हे पुरखा के मान।।
सत के महिमा अपरंपार। घासी गुरु के कहना सार।
मनखे मनखे एक समान। सबो धरम के कर सम्मान।।
चौपई छंद
सतनामी के का पहिचान। सादा झंडा सेत निशान।।
सुमता के हे का परमान। बालक गुरु के हे बलिदान।।
डारा लमगे लोरी लोर। लेवव संगी बइहाँ जोर।।
लावव मिलके नवा बिहान। रखना हे पुरखा के मान।।
सत के महिमा अपरंपार। घासी गुरु के कहना सार।।
मनखे मनखे एक समान। सबो धरम के कर सम्मान।।
जपले जिनगी मा सतनाम। बनही तोरे बिगड़े काम।।
समझे जे जिनगी के दाम। लेथे वो सत ला जी थाम।।
माघ पंचमी मेला जाव। गुरु बाबा के दर्शन पाव।।
सुन लेबे गुरु के संदेश। मिट जाही जी मन के क्लेश।।
रचना:- इंजी.गजानंद पात्रे"सत्यबोध"
07-05-2017
वर्ण
मनु वर्ण बनाये तँय चार। जेकर बरनन हे बिस्तार।।
आवव सुनलौ मोर बिचार। अँधरा मन के खुलय दुवार।।
बाम्हन चिनहा माथ बताय। माथा लागी कोंन कहाय।।
बाम्हन के सिर होतिस चार। बहतिस अंग दूध के धार।।
क्षत्री चिनहा भुजा बताय। छै ठा बाजू कहाँ लुकाय।।
रण म लड़त हे असली कोन। देख सबो बइठे हौ मौन।।
बनिया चिनहा पेट बताय। काबर बड़का नही बनाय।।
दिन रात सुबह अउ शाम। पेट कहय खाली हे राम।।
चिनहा शुद्र बताये गोड़। दुनिया ला जे राखे जोड़।
जात पात के पाटव खान। मनखे मनखे एक समान।।
मचोली
चार खुरा अउ पाटी चार। बमरी कउहा लकड़ी सार।।
बीच म डोरी बेनी पार। मिलके बने मचोली यार।।
गाँव गँवई के खुरसी जान। बइठ मचोली मिटय थकान।।
बइला आँखी सुघर गथान। कासी डोरी बरय सियान।।
जब जब पहुना घर मा आय। निकले अँगना गजब सुहाय।।
गाँव कहाँ जी सोफ़ा दीवान। थोकुन बइठ बढ़ा दे मान।।
शहरी जिनगी थोकुन छोड़। गाँव तरफ भी नाता जोड़।।
बड़ सुघ्घर हे गँवई रीत। देथे भाई चारा मीत।।
गँवई गाँव
बर पीपर के जुड़हा छाँव। खूब सुहाये गँवई गाँव।।
सुघ्घर मया पिरित के गोठ। खा रोटी अंगाकर रोठ।।
हरियर हरियर खेती खार। नदियाँ नरवा छलके धार।।
राहर गेहूँ तिवरा धान। कोदो चना बढ़ावत मान।।
पंथी सुवा ददरिया गीत। बाँधे बँधना आपस मीत ।।
मड़ई मेला हाट बजार। राउत नाचे दोहा पार ।।
गाँव गुड़ी होवे चौपाल। बात सियनहा लेंय सँभाल।।
छोट बड़े के होथे मान। करँव गाँव के मँय गुणगान।।
धन्य धन्य हे गाँव किसान। जेकर से हेे देश महान।।
जग के तैं हा पालनहार। बंदन तोला बारंबार।।

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