सोमवार, 22 अगस्त 2022

हिंदी दोहा छंद-

 दोहा छंद- 

अश्व रहे हैं हिनहिना, अब तो तोड़ लगाम।

राजनीति के दौड़ में, पाने को खुद नाम।।1


अंधभक्त उल्लू हुआ, गधा हुआ उद्दंड।

चाल चतुर चल लोमड़ी, बढ़ा रही पाखंड।।2


बंदर बाँटे रेवणी, राजनीति के मंच।

रंग चुनावी रंग कर, करता झूठ प्रपंच।।3


सोया गहरी नींद में, जो है पहरेदार।

लूट रहें सुख चोर अब, कौन करे उद्धार।।4


राजनीति के मेड़ पर, दिखते खरपतवार।

परजीवी होकर वही, बन बैठे हकदार।।5


कहता काग सियार से, एक हमारे चाल।

बारी-बारी भोग लें, पाँच-पाँच सुख साल।।6


मुर्दे भी अब कह उठे, आया कलयुग घोर।

श्वेत रंग पोशाक में, दिखते काले चोर।।7


राज सिंहासन के लिए, व्याकुल चातक आज।

लूट लिए सुख सीप को, पर फैलाये बाज।।8


सुख की रोटी छीनने, बैठा काग मुँडेर।

राम नाम माला जपे, लगा झूठ का फेर।।9


कौन करे उपचार अब, सत्ता लकवाग्रस्त।

वैद्यराज बीमार है, दुख में रोगी त्रस्त।।10


चला फँसाने और को, मकड़ी बुनकर जाल।

पर पासा उल्टा हुआ, उधड़ी खुद की खाल।।11


होशियार बन लोमड़ी, चली शेर की चाल।

किंतु बाप के सामने, उसकी गली न दाल।।12


राज करे कौंआ वहाँ, चमचा जहाँ मयूर।

अंधभक्त कोयल जहाँ, लूट वहाँ भरपूर।।13


दान भरोसे जी रहें, ढोंगी कौंए आज।

उसको कहाँ पसंद है, कोयल सिर पर ताज।।14


बिल्ली माखन खा गई, भरा नही पर पेट।

मानवता को कर गई, जग में मटियामेट।।15


साँप-नेवले का यहाँ, मचा हुआ है युद्ध।

बनने को सिरमौर अब, है प्रयास अनिरुद्ध।।16


जग जाहिर यह बात है, कौन विलासी लोग।

दुख की छाती बैठकर, करते छप्पन भोग।।17


खुद का पाप कबूल लो, गिद्धराज जी आज।

बनकर के बगुला भगत, पहिने हो जो ताज।।18


अंधभक्त बंदर हुआ, चमचा बना सियार।

इसीलिए गीदड़ यहाँ, जता रहा अधिकार।।19


बाँध आँख पर पट्टियाँ, मौन खड़ा कानून।

इसीलिए तो हो रहा, सदा न्याय का खून।।20


पनप रहा है हर तरफ, कल्पवृक्ष बन दूब।

तड़प रहा है बाग भी, हो करके मजरूब।।21


चाटुकार बन हंस ने, लिया सत्य से भाग।

नीर दूध में फर्क अब, बता रहा है काग।।22


डाल-डाल पर झूठ के, खिले हुए हैं फूल।

भौंरा बन अब मतलबी, चुभा रहें हैं शूल।। 23

 

चोरों के सरदार को, सता रहा भय आज।

जागरूक घर-घर हुए, नहीं बचेगा ताज।।24


लूट लिए बगिया सभी, रख खुश्बू की चाह।

रोये फूल अनाथ बन, पर किसको परवाह।।25


चमचा चमचम खा रहें, अंधभक्त अखरोट।

नेता खाये वोट हक, जनता दर-दर चोट।।26


मगरमच्छ की मौत पर, बंदर किया विलाप।

बैठा जामुन डाल पर, राम नाम कर जाप।।27


कौंवें बैठ मुँडेर पर, देते जग को सीख।

जो रहते चुपचाप वे, दर-दर माँगे भीख।।28


चवनप्राश खाये गधा, घोड़ा लॉलीपॉप।

उछल-कूद बंदर करे, राम नाम कर जाप।।29


जिनके श्रम बलिदान से, खिला बाग में फूल।

उस माली को भूल गुल, चुभा रहें अब शूल।।30

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