जग जग के कल्यान हे, बदले जग परिवेश ।।
महिमा गुरु जी जन जन गावय, भोर सबेरे शाम ।
ले भव भव सब करे आरती, जपे नाम सतनाम ।
सुन लेहू अरजी हो गुरु जी, बारंबार प्रणाम ।।
आदि पुरुष सतनाम पिता के, लिए रूप अवतार ।
सत के तैं तो अलख जगाये, करे जगत उद्धार ।।
ले हे जनम गिरौदपुरी मा, पावन बनगे धाम ।
सुन लेहू अरजी हो गुरु जी, बारंबार प्रणाम ।।1
मानवता के पाठ पढ़ाये, मनखे मनखे एक ।
सत्य अहिंसा थाम कहे गुरु, कारज कर लौ नेक ।।
भेद नहीं कर उँच नीच के, एक सबो के चाम ।
सुन लेहू अरजी हो गुरु जी, बारंबार प्रणाम ।।2
सात बचन ब्यालिस बानी धर, बाँटे जग ला ज्ञान ।
जिनगी के सुख मरम बताये, अइसे संत महान ।।
नाम कमा सत राह धरे जग, सदा करौ सतकाम ।
सुन लेहू अरजी हो गुरु जी, बारंबार प्रणाम ।।3
गजानंद कर जोर गुरु, सादर करे प्रणाम ।
अटके ना नइँया कहूँ, लेहू गुरु जी थाम ।।
सरसी छंद गीत- *देहू आशिष छाँव* (3) सतगुरु जी सत बिरवा बन के, देहू आशिष छाँव। तोर नाम के बने रहय गुरु, ये हिरदे मा ठाँव।। बँधे रहय आशा के डोरी, टूटय झन विश्वास। बने रहय साँसा हे जब तक, श्रद्धा के अरदास।। तर जावय चोला पा के जी, पावन गुरु के पाँव। सतगुरु जी सत बिरवा बन के, देहू आशिष छाँव।।1 मन मंदिर मा ज्ञान जोत हा, जलत रहय दिन रात। करम बचन ले ककरो अंतस, झन पहुँचय जी घात।। सुफल बनाहू जिनगानी ला, भाग अपन सहराँव। सतगुरु जी सत बिरवा बन के, देहू आशिष छाँव।।2 नेक करम के राह दिखाहू, सत्य लखाहू ज्ञान। गजानंद मतिमंद हवे गुरु, सदा धराहू ध्यान।। लोभ मोह तम ये जिनगी मा, करय कभू झन घांव। सतगुरु जी सत बिरवा बन के, देहू आशिष छाँव।।3 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/09/2023
सरसी छंद गीत- *सोमवार दिन शुभ मंगल हे*(4) सोमवार दिन शुभ मंगल हे, सतगुरु जी के वार। ध्यान लगावव गुरु गुन गावव, माथ नवाँ दरबार।। सुग्घर अँगना लीप पोत के, देवव चउँक पुराय। तन के दियना मन के बाती, आसन सेत सजाय।। भाव आरती गुरु के लेलव, मिलके घर परिवार। सोमवार दिन शुभ मंगल हे, सतगुरु जी के वार।।1 सेत वस्त्र तन धारण कर लौ, सादा चन्दन माथ। कंठी गला जनेऊ पहिनौ, भक्ति थाल रख हाथ।। मुख हा तो सतनाम नाम ले, बोले जय जयकार। सोमवार दिन शुभ मंगल हे, सतगुरु जी के वार।।2 आँख बसावव परहित सपना, नेक करम बर पाँव। लोभ मोह झन अंतस बासय, कोर कपट के घांव।। सतनामी कुल जनम धरे हौ, देवव करज उतार। सोमवार दिन शुभ मंगल हे, सतगुरु जी के वार।।3 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/09/2023
जागव जागव सतनामी अब (गीत) (6)
बीड़ा थामे हक के खातिर, गुरु जी बालकदास ।
अँधियारी ला दूर भगा के, करना हवय उजास ।।
देख कलपना समाज के गुरु, पड़गे भारी सोच ।
मोर रहत ले कइसे आही, देख समाज खरोंच ।।
गाँव गाँव रावटी लगाये, सुंता करे प्रयास ।
बीड़ा थामे हक के खातिर, गुरु जी बालकदास ।।1
चले अखाड़ा गाँव गाँव तब, घर घर बने लठैत ।
सोर उड़य बड़ सतनामी के, काँपय चोर डकैत ।।
अत्याचार जुलुम बर लड़बो, करे बुराई नाश ।
बीड़ा थामे हक के खातिर, गुरु जी बालकदास ।।2
आँख उठा जब देखय बैरी, देवव आँखी फोर ।
लिग़री चारी दूर रहव पर, अतके अरजी मोर ।।
देखव कइसे समाज मा फिर, आही सुमत प्रकाश ।
बीड़ा थामे हक के खातिर, गुरु जी बालकदास ।।3
आज भुलागे सपना गुरु के, देखव इही समाज ।
का मतलब के धरे बिमारी, बनगे कउँवा बाज ।।
जीना भी वो का जीना हे, जब हौ जिंदा लाश ।
बीड़ा थामे हक के खातिर, गुरु जी बालकदास ।।4
अलग अलग धारा मा बँटगे, देखव मोर समाज ।
अइसे मा कइसे आही जी, सतनामी के राज ।।
जागव जागव सतनामी अब, बाँधव मन विश्वास ।
बीड़ा थामे हक के खातिर, गुरु जी बालकदास ।।5
सरसी छंद गीत- *लहर लहर लहरावत हावय* (7) लहर लहर लहरावत हावय, सादा झंडा तोर। बगरे हावय सत के बाबा, चारो मुड़ा अँजोर।। हिरदे मा सतनाम बसाये, रग रग मा गुरु नाम। धन्य गिरौदपुरी के माटी, पबरित हावय धाम।। गूँजत हे जयकारा गुरु के, गाँव गली अउ खोर। लहर लहर लहरावत हावय, सादा झंडा तोर।।1 अमृत कुंड अउ चरण कुंड के, निर्मल पावन नीर। धोवत हे दुखिया के दुख ला, हरत भगत के पीर।। पीये बूँद पंचकुंडी के जी, तृप्त हुये मन मोर। लहर लहर लहरावत हावय, सादा झंडा तोर।।2 औंरा धौंरा पेड़ सुनावय, सतगुरु के सतज्ञान। छात पहाड़ी गावत हावय, महिमा गुरु गुनगान।। चौका मंगल भजन आरती, मन ला करे विभोर। लहर लहर लहरावत हावय, सादा झंडा तोर।।3 आसमान ला छूवत हावय, ऊँचा जोड़ा खाम। देवत हे सन्देश जगत ला, हृदय बसा सतनाम।। सत्य अहिंसा मारग चल के, लावव सुख के भोर। लहर लहर लहरावत हावय, सादा झंडा तोर।।4 जगह जगह मा बाजय सुग्घर, माँदर झाँझ मृदंग। सुफल मनोरथ कर लौ जिनगी, सतगुरु जी के संग।। बड़ा दयालू सतगुरु बाबा, करे कृपा घनघोर। लहर लहर लहरावत हावय, सादा झंडा तोर।।5 धन बहरा के माटी चंदन, माथा अपन लगाँव। भाग बड़े भाँटा बारी के, पाये गुरु के पाँव।। जोक नदी के पावन दहरा, मारत हवय हिलोर। लहर लहर लहरावत हावय, सादा झंडा तोर।।6 बाँध सुमत के डोरी बाबा, मिटय आपसी द्वेष। जन जन मा हो भाईचारा, स्वछ रहय परिवेश।। गजानंद के बिनती सुन गुरु जी अरजी हे कर जोर। लहर लहर लहरावत हावय, सादा झंडा तोर।।7 गीतकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/08/2023
छत्तीसगढ़ी भाखा - (8)
छत्तीसगढ़ी भाखा हावय, अब्बड़ मया दुलार ।
सरग बरोबर येकर छइँहा, बहे पिरित के धार ।।
गोद लिये हे सब्बो भाखा, दे के ममता छाँव ।
छत्तीसगढ़ी महतारी के, परत हवँव मैं पाँव ।।
सुवा ददरिया पंथी करमा, हमर धरोहर शान ।
धान कटोरा महतारी के, छत्तीसगढ़ी मान ।।
सत के अलख जगाये घासी, छत्तीसगढ़ी बोल ।
मनखे मनखे एक बरोबर, कहिस बात अनमोल ।।
मान बढाइस महतारी के, सन्त पवन दीवान ।
कोदूराम दलित ये भुइँया, देइस छंद बिधान ।।
दरद सुनाइस महतारी के, मस्तुरिहा के गीत ।
तन सोलह सिंगार कराइस, तब खुमान संगीत।।
स्वर कोकिला दीदी कविता, गावय महिमा गान।
पाँव पखारय अरपा पैरी, माथ मुकुट हे धान ।।
पँडवानी तीजन बाई के, गूँजय देश विदेश ।
अउ भरथरी सुरुज बाई के, छोड़य छाप विशेष ।।
चलौ उठाबो पुरखा बाना, कदम बढ़ाके आज।
मान दिलाये छत्तीसगढ़ी, करना हे मिल काज ।।
माँ- (9)
तोर अंचरा के छइँहा मइँया, हावय सरग समान ।
तहीं मोर जिनगी ओ मइँया, तहीं मोर भगवान ।।
तोला बंदत हँव ओ मइँया, दे सुख के बरदान ।।
पले हवँव मैं नौ महिना ले, तोर कोंख के छाँव ।
करजा दूध चुका नइ पावँव, तोर नाँव से नाँव ।।
जग सम्मान समर्पित तोला, मोर सबो पहिचान ।
तोला बंदत हँव ओ मइँया, दे सुख के बरदान ।।1
चले हवँव मैं ठुमकत अँगना, तोर पकड़ के हाथ ।
जिनगी के सुख दुख मा ठाढ़े, दिये सदा माँ साथ ।।
रहिस कुलुप अँधियारी मन ये, लाने नवा बिहान ।
तोला बंदत हँव ओ मइँया, दे सुख के बरदान ।।2
एक शबद माँ के तो आगू, सबो चीज बेकार ।
जीव चराचर माँ से उपजे, पाये लाड़ दुलार ।।
छोड़ गये माँ गजानंद ला, करके आज बिरान ।
तोला बंदत हँव ओ मइँया, दे सुख के बरदान ।।3
सरसी छंद गीत- बेटी - (10) बेटी हे अनमोल रतन जी, बेटी सुख के खान। घर के इज्जत मर्यादा अउ, दू कुल के हे शान।। किस्मत वाले ला ही मिलथे, बेटी के सुख छाँव। सुफल मनोरथ कारज होथे, पड़े जिहाँ जब पाँव।। किलकारी बेटी के जे घर, वो मनखे धनवान। बेटी हे अनमोल रतन जी, बेटी सुख के खान।।1 कम नइहे बेटा ले बेटी, बदलौ सोच बिचार। समझ पराया धन बेटी ला, कोंख कभू झन मार।। शिक्षा अउ संस्कार ऊँच दौ, भरही ऊँच उड़ान। बेटी हे अनमोल रतन जी, बेटी सुख के खान।।2 बेटी सावित्री फूले बन, लाही शिक्षा द्वार। बेटी रमा मिनीमाता बन, करही जग उपकार।। झलकारी बाई बन लड़ही, हक बर सीना तान। बेटी हे अनमोल रतन जी, बेटी सुख के खान।।3 गीतकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/08/2023
बरसा रानी -(11)
आस लगाये हम हन बइठे, सुन ले हमर पुकार ।
तोर बिना अब बरखा रानी, जरगे खेती खार ।।
प्यासे हे सब जीव जगत हा, प्यासे हे सब पेड़ ।
प्यासे हे अब खेत खार हा, प्यास मरत हे मेड़ ।।
दे दे साथ हमर ओ बरखा, बिनती अब के साल ।
सम्मत के तँय जल बरसा दे, हमला ले सम्भाल ।।
कब तँय गिरबे बरखा रानी, आगे माह अषाढ़ ।
बइला ताँकय खेत डहर ला, नरवा ताँकय बाढ़ ।।
तोर भरोसा जाँगर हमरो, तँय हस पालन हार ।
रिसा जबे ता कइसे बनही, नइ होवय उद्धार ।।
बरखा रानी संग मितानी, रखथे गाँव किसान ।
खूब बरस जा खेत खार मा, जाके बोंही धान ।।
भुइँया के जल इस्तर गिरगे,जाने कहाँ समाय ।
बिरथा बहिथे पानी संगी, काबर समझ न आय ।।
सुनौ सुनौ सब संगी साथी, गजानंद के बात ।
रुख राई जी खूब लगावव, तब होही बरसात ।।
लक्ष्मण मस्तुरिहा (सरसी छंद गीत) (12)
याद जमाना जुग जुग करही, मस्तुरिहा के नाम ।
माथ नवाँ के महूँ करत हँव, बारंबार प्रणाम ।।
धरम धाम हे भारत भुइँया, चौरा गोंदा फूल।
देख सुखाके काँटा बनगे, हिरदे भर दिस शूल।।
चलौ चुकाबो मस्तुरिहा के,अंतस पीरा दाम।
याद जमाना जुग जुग करही,मस्तुरिहा के नाम।।
मोर गाँव के गंगा सुक्खा, बंजर परगे खेत ।
दया मया हा जुल्मी होगे, कोंन करय अब चेत ।।
पड़की मैना बोलत नइहे, इहाँ राम घनश्याम ।
याद जमाना जुग जुग करही, मस्तुरिहा के नाम ।।
दुनिया मड़ई मेला जइसे, मोह लगे बाजार ।
एक नदी के दुई किनारा, सुख दुख हे संसार ।।
करम नाव मा चढ़ जा भइया, मिलही सुख आराम ।
याद जमाना जुग जुग करही, मस्तुरिहा के नाम ।।
माघ फगुनवा मन नइ डोलय, फीका होली रंग ।
गाड़ी वाला रद्दा जोहय, कोनों नइहे संग ।।
झूठ डगर मा झन चलिहौ जी, सत रसदा सुखधाम ।
याद जमाना जुग जुग करही, मस्तुरिहा के नाम ।।
संत कबीरा के सँगवारी, घुनही बँसुरी तान ।
छत्तीसगढ़ी भाखा के जे, खूब बढाइस मान ।।
नाम इहाँ तो उही कमाथे, जे करथे सतकाम ।
याद जमाना जुग जुग करही, मस्तुरिहा के नाम ।।
सुमता के जे बिरवा बोइस, रुनझुन खेती खार ।
बनके छत्तीसगढ़िया बेटा, बाँटिस मया दुलार ।।
भेद तोर आँखी के कहिगे, माटी हे तन चाम ।
याद जमाना जुग जुग करही, मस्तुरिहा के नाम ।।
राखी गीत- (13)
खुशी धरे भाई बहिनी बर, राखी आय तिहार।
मोर अभागा किस्मत भाई, मिलिस बहिन नइ प्यार।।
सुन्ना मोर कलाई रहिथे, मन हा रहय उदास।
ले के आयेंव करम दुखिया, बहिनी नइहें पास।।
नैना ले आँसू बोहावय, बनके दुख के धार।
मोर अभागा किस्मत भाई, मिलिस बहिन नइ प्यार।।
बँधे मया मा भाई बहिनी, सुग्घर ये संसार।
जनम जनम ले बाढ़े राहय, ममता प्रेम दुलार।।
राखी के ये अटूट बँधना, रक्षा के आधार।।
मोर अभागा किस्मत भाई, मिलिस बहिन नइ प्यार।।
ददा मोर छुप छुप के रोवय, दाई डंड पुकार।
आवय सबके घर बेटी जब, पोरा तीज तिहार।
बहिनी के सुख नइ तो जानिस, भाई ये दुखियार।
मोर अभागा किस्मत भाई, मिलिस बहिन नइ प्यार।।
होली- (14)
नइ तो अब मन रंगय होली, फीका होगे रंग ।
गाँव गली सब सुन्ना लागे, छुटगे साथी संग ।।
संग फाग नंगाड़ा बाजय, मातय रंग गुलाल ।
अब तो फूहड़ गाना बजथे, होथे खूब बवाल ।।
छोड़ शहर ला दौड़त जाँवव, माने होली गाँव ।
मया पिरित मैं सुघ्घर पाँवव, संग फगुनवा छाँव ।।
कहाँ नदाँगे ठेठरी खुरमी, चौसेला पकवान ।
अब तो दारू मुरगा माते, बइहा बन इंसान ।।
राधा तरसे मुरली ख़ातिर, मीरा तरसे रंग ।
प्रेम बिना अब होली तरसे, खेलिन काकर संग ।।
आवव मिलके खेलिन होली, जंगल-पानी थाम ।
पर्यावरण से जिनगानी हे, इही कृष्ण अउ राम ।।
कहाँ गवाँगे पुरखा गहना, सोचव मानुष जात ।
लावव सुमता समता रद्दा, गजानंद सुन बात ।।
जोत जले माँ (जस गीत) (15)
जगमग जगमग जोत जले माँ, भुवना तोर अँजोर ।
मांदर झाँझ मँजीरा बाजे, गूँजत चारों ओर ।।
काली चंडी आदि भवानी, सजे जोत नवरूप ।
तोर कृपा के कर दे बारिस, भूख लगे ना धूप ।।
आदि अनन्ता नाम हवे माँ, रिद्धि सिद्धि अउ तोर ।
जगमग जगमग जोत जले माँ, भुवना तोर अँजोर ।।1
रामचन्द्र के नारी तँय हा, शिव शम्भू गर हार ।
भस्मासुर के काल बने तँय, पाप करे संहार ।।
कलजुग बर तँय काल विनाशी, नवा सुरुज नव भोर ।
जगमग जगमग जोत जले माँ, भुवना तोर अँजोर ।।2
आस लगाए आज बिराजे, सबो छंद परिवार ।
ज्ञान सुधा रस ला बरसा दे, कर दे माँ उपकार ।।
तोर दरस बर सब हन प्यासा, तरसे नैन निहोर ।।
जगमग जगमग जोत जले माँ, भुवना तोर अँजोर ।।
मांदर झाँझ मँजीरा बाजे, गूँजत चारों ओर ।।3
संविधान दिवस अमर रहे, जय भीम जय संविधान🙏💐
*सरसी छंद- संविधान अभिमान हमर हे* (16)
संविधान अभिमान हमर हे, संविधान पहिचान।
संविधान अधिकार हमर हे, संविधान वरदान।।
तोड़ गुलामी के बेड़ी ला, थिरकिस हे तब पाँव।
राह विकास सुखी उन्नति के , मिलिस सबो ला छाँव।।
समरसता समभाव दिये हे, बाबा भीम महान।
संविधान अभिमान हमर हे, संविधान पहिचान।।1
जात-पात अउ ऊँच-नीच के, तोड़िस जग ले फाँस।
दीन दलित पिछड़े बहुजन जन, लेत तभे सुख साँस।।
पढ़ लिख अफ़सर बाबू बनगे, बनगे हें विद्वान।
संविधान अभिमान हमर हे, संविधान पहिचान।।2
पंचानबे अनुच्छेद हवे, पच्चीस हवे भाग।
बारह अनुसूचियाँ कहे नित, हक बर मानुष जाग।।
अमर रहे संविधान दिवस नित, ऊँचा राहय शान।
संविधान अभिमान हमर हे, संविधान पहिचान।।3
करिंन सुरक्षा संविधान के, इही हमर कर्तव्य।
पा मौलिक अधिकार सबो हम, बने हवन जी सभ्य।।
शीश झुका गजानंद पात्रे, करत हवे गुनगान।
संविधान अभिमान अमर हे, संविधान पहिचान।।4
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)26/11/2021
छत्तीसगढ़ी राज भाषा दिवस के बधाई💐
*सरसी छंद गीत- कब होही नवा बिहान?* (17)
कहाँ उड़ागे सोन चिरइँया, सुन्ना हे घर खोर।
रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।
बंजर खेती खार दिखत हे, नदी कुँआ अउ ताल।
सुख्खा परगे डोली धनहा, मुरझावत सुख डाल।।
धान कटोरा ये भुइँया मा, कोंन जहर दिस घोर।
रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।1
जल जंगल भुइँया के मालिक, पर देशी हे आज।
लुलवावत हे छत्तीसगढ़िया, पाये राज सुराज।।
डाका डारत हमर खुशी मा, बहरुपिया कुछ चोर।
रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।2
जहर कारखाना हे उगलत, अरझत हावय साँस।
पतझड़ होगे हरियाली अउ, होगे पेड़ विनाश।।
पुरख़ा के चिनहा बिरवा अब, कटगे ओरी ओर।
रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।3
मान कहाँ पावत भाखा निज, वाजिब दाम किसान।
आँख निटोरत खड़े हवन कब होही नवा बिहान।।
आँसू आँख भरे छलकत हे, पीरा पोरे पोर।
रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।4
गुरु के महता घटत दिनों-दिन, शिक्षा हे बदहाल।
लइका ले बस्ता भारी हे, बिछे लूट के जाल।।
कमर टूटगे महँगाई मा, पीठ परे दुख लोर।
रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।5
उल्टा-पुल्टा पाठ पढ़ा के, बदलत हें इतिहास।
मान कहाँ हे पुरख़ा मन के, होवत हे उपहास।।
गजानंद जी बाँध चलौ अब, सुख सुमता के डोर।
रोवत हे मन के पिंजरा हा, लमा-लमा के सोर।।
लौट चले आ सोन चिरइँया, सुन्ना हे घर खोर.....6
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
(बिलासपुर) 27/11/2021
छंद परिवार- छत्तीसगढ़
छंद साधक- सत्र 2
सरसी छंद गीत- *जतन करव महतारी भाखा* (18)
जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।
इही हमर हे स्वाभिमान अउ, इही हमर हे शान।।
दया-मया के गुरतुर बैना, मधुरस भरे मिठास।
सत संदेश दिये जन-जन ला, सतगुरु घासीदास।।
कहे इही भाखा मा मनखे, मनखे एक समान।
जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।1
लिखिस दानलीला ला बढ़िया, पंडित सुंदर लाल।
कविता कोदूराम दलित के, ऊँचा कर दिस भाल।।
जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिहा के, मातृभूमि प्रति गान।
जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।2
रखिन सँजो के पुरख़ा हमरो, सपना आँखी कोर।
छत्तीसगढ़ी आगू बढ़ही, गाँव शहर घर खोर।।
छत्तीसगढ़िया बन परबुधिया, आज भुलागे मान।
जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।3
तरसे सुवा ददरिया करमा, राउत गम्मत नाच।
परदेशी भाखा पथरा मा, दिहिस अपन ला काँच।।
झन परलोकिहा बनौ भइया, पढ़े लिखे विद्वान।
जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।4
सुसकत हावय बासी-चटनी, नंगरिहा अउ खेत।
बइला गाड़ी के घँघड़ा हा, कहत हवे कर चेत।।
गजानंद जी जाग-जाग अब, लाबो नवा बिहान।
जतन करव महतारी भाखा, भइया मोर मितान।।5
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर 28/11/2021
छंद परिवार- छत्तीसगढ़
छंद साधक- सत्र 2
सरसी छंद गीत- लंबोदर गनराज (19) अहो गजानन सुनौ गजानन, लंबोदर गनराज। दुख ला हर दौ सुख ला भर दौ, मंगल कर दौ काज।। पहिली पूजा तोर करे जग, गूँजय जय जयकार। जगह जगह हौ आप बिराजे, गाँव शहर घर द्वार।। नर नारी सब गावँय महिमा, थाल आरती साज। अहो गजानन सुनौ गजानन, लंबोदर गनराज।। मन मंदिर मा बसा गणेशा, मिलही खुशी अपार। विघ्न हरण ला जपते कर ले, भव सागर ला पार।। सुनथौ सबके अरजी बिनती, मोरो सुन लौ आज। अहो गजानन सुनौ गजानन, लंबोदर गनराज।। याचक बन के खड़े हवँव मँय, देहू बुद्धि विवेक। माँगत हँव आशीष सुमत के, तोर चरण सर टेक।। भरे रहय प्रभु सुख सुविधा ले, छत्तीसगढ़ ये राज। अहो गजानन सुनौ गजानन, लंबोदर गनराज।। इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध'' बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 31/08/22
एक मई मजदूर दिवस के बधाई- सरसी छंद गीत- मजदूर (20) एकमई होगे हे जिनगी, कलपत हे मजदूर। कोंन इँखर पीरा ला समझय, कोंन करय दुख दूर।। तन मा लटके चिथरा कपड़ा, मन मा दुख के बोझ। दर-दर भटकय ठोकर खावय, राह दिखय नइ सोझ।। तर-तर चूहय माथ पसीना, बेबस अउ मजबूर। एकमई होगे हे जिनगी, कलपत हे मजदूर।।1 ऊँचा ऊँचा बने इमारत, ताज महल मीनार। बाँध नहर कल कल झरना कल, महानदी के धार।। रेल जहाज बनाये बम बस, कर श्रम तँय भरपूर। एकमई होगे हे जिनगी, कलपत हे मजदूर।।2
सरसी छंद गीत- शिव गौरी के लाल (21)
घरो घर बिराजे हो देवा, शिव गौरी के लाल। तीन लोक मा गूँजत हावय, जय जय हो करताल।। पहिली पूजा तोर करे जग, विघ्न हरण हे नाम। रिद्धि सिद्धि हे तोर चरण मा, बनथे बिगड़े काम।। मूषक के तँय करे सवारी, तिलक सजे हे भाल। घरो घर बिराजे हो देवा, शिव गौरी के लाल।। निर्धन ला तँय माया दे दे, कोढ़िन ला तँय रूप। अपन कृपा के कर दे बरसा, भगे तमस दुख धूप।। बाँझन ला दे बेटी बेटा, कर दे मालामाल। घरो घर बिराजे हो देवा, शिव गौरी के लाल।। दुखिया बनके खड़े हवँव मँय, आके शरण गणेश। सुनौ गजानन बिनती मोरो, हर लौ विघ्न कलेश।। लडुवन के मैं भोग लगावँव, सजा आरती थाल। घरो घर बिराजे हो देवा, शिव गौरी के लाल।। इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/08/22
सरसी छंद गीत *मोर गवाँगे गाँव* (22) गरुवा नइहे कोठा मा अब, अमरइयाँ मा छाँव। खोजव- खोजव रे भाई हो, मोर गवाँगे गाँव।। सबो डहर हे बेजा कब्जा, छेकागे दइहान। नदिया नरवा ताल कुँआ अउ, छेकागे शमशान।। खोर गली घर सुन्ना लागे, सुन्ना हे हर ठाँव। खोजव- खोजव रे भाई हो, मोर गवाँगे गाँव।।1 लोभ धरे स्वारथ के मनखे, काँटत हें बन पेड़। हरियाली बर तरसत हावय, धनहा डोली मेड़।। चिरई चिरगुन चहकत नइहे, नइहे कउँवा काँव। खोजव- खोजव रे भाई हो, मोर गवाँगे गाँव।।2 भाई- भाई बैरी होगे, बँटगे खेती खार। परवा छानी डीह दुवारी, बँटगे पालनहार।। हाय हलो अब कहिथे लइका, परे नहीं जी पाँव। खोजव- खोजव रे भाई हो, मोर गँवागे गाँव।।3 सुनें नहीं अब गोठ सियानी, पढ़े नहीं गुरु पाठ। गायब हे चौपाल गुड़ी अब, मनखे बनगे काठ।। कोट कचहरी आज करत हे, घर के बात नियाँव। खोजव- खोजव रे भाई हो, मोर गँवागे गाँव।।4 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 12/08/2023
सरसी छंद गीत- *गुरु घासी के ज्ञान* (23) सुन लौ भइया गुन लौ भइया, गुरु घासी के ज्ञान। सबद सबद सत शहद भरे हे, कर लौ जी रसपान।। लड़ौ लड़ाई झन तो भाई, जाति- पाति के नाम। करम भलाई सँग मा जाही, जाहू जब सतधाम।। लाल लहू हे सब के तन के, मनखे एक समान। सुन लौ भइया गुन लौ भइया, गुरु घासी के ज्ञान।।1 दर-दर भटका खावव झन तो, झाँकव मन के द्वार।
का बोलही बताही पथरा, कर लौ बात बिचार।।
मातु- पिता के चरण बसे हे, कोटि -कोटि भगवान। सुन लौ भइया गुन लौ भइया, गुरु घासी के ज्ञान।।2 बिछे बिछौना मोह मया के, मिले नहीं आराम। दरर दरर दिन रात कमाये, समझे नइ तन दाम।। छोड़ सबो धन तन ला जाना, का गरीब धनवान। सुन लौ भइया गुन लौ भइया, गुरु घासी के ज्ञान।। गीतकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/08/2023 *@copyright reserved*
सरसी छंद गीत- *कर लौ जी सतनाम सुमरनी* (24) सत बानी ला बोले बाबा, सतगुरु घासीदास। कर लौ जी सतनाम सुमरनी, जब तक तन मा साँस।। जुच्छा आना जुच्छा जाना, नइहे काँही तोर। घर परिवार ददा अउ दाई, बँधे मया के डोर।। मोर- मोर के रटत पहाड़ा, झन कर तन मन नाश। कर लौ जी सतनाम सुमरनी, जब तक तन मा साँस।।1 बिरथा हे संस्कार बिना तो, रीति नीति व्यवहार। सद् बिचार सत संगत करथे, जिनगी मा उजियार।। भक्ति भजन गुरु के कर लौ जी, कटही दुख के फाँस। कर लौ जी सतनाम सुमरनी, जब तक तन मा साँस।।2 मुरझाये झन सुमता बगिया, उगा सुमत के फूल। बोल बचन कटु ककरो मन मा, झन भरिहौ जी शूल।। गजानंद सतनाम जड़ी ला, रखौ कहे खुद पास। कर लौ जी सतनाम सुमरनी, जब तक तन मा साँस।।3 गीतकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/08/2023
सरसी छंद गीत- *शान बढ़य भारत भुइँया के* (25)
तीन रंग के शान तिरंगा, देवत हे संदेश। शान बढ़य भारत भुइँया के, सुग्घर हो परिवेश।। तान खड़े हें सीना सेना, सरहद मा दिन रात। सरदी गरमी धूप ठंड हो, या चाहे बरसात।। देश सुरक्षा खातिर सहिथें, वीर सिपाही क्लेश। शान बढ़य भारत भुइँया के, सुग्घर हो परिवेश।।1 रीति नीति संस्कार सिखावय, गीता ग्रन्थ कुरान। अनेकता मा बसे एकता, भारत के पहिचान।। हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई, रखँय नहीं मन द्वेष। शान बढ़य भारत भुइँया के, सुग्घर हो परिवेश।।2 ये भुइँया के भाग जगावय, माटी पूत किसान। गार पसीना अन्न उगावय, करथे कर्म महान।। जग के पालनहार ल देवव, आशीर्वाद अशेष। शान बढ़य भारत भुइँया के, सुग्घर हो परिवेश।।3
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/08/2023
सरसी छंद गीत- धजा तिरंगा लिपटे आये (26) धजा तिरंगा लिपटे आये, जब -जब वीर जवान। झर-झर नीर बहावय नैना, दिये करेजा चान।। माता के तब ममता सुसकय, पिता नसीब ठठाय। घर के नारी कलपत रोवय, सुख सिंदूर मिटाय।। भाई के हिरदे मा चलगे, बिधुना के तो बान। धजा तिरंगा लिपटे आये, जब -जब वीर जवान।। बेटा बेटी रोवत बोलय, जाग न पापा आज। बहिनी बोलय कोंन निभाही, राखी के तो लाज।। सँग साथी पारा मोहल्ला, होगे आज बिरान। धजा तिरंगा लिपटे आये, जब -जब वीर जवान।। गये रहे सीमा मा तँय तो, लड़हूँ कहिके जंग। तोर बिना अब होली दीवाली, लागत हे बेरंग।। देश सुरक्षा खातिर ललना, होगे तँय कुर्बान। धजा तिरंगा लिपटे आये, तँय तो वीर जवान।। गीतकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/08/2023
(21अगस्त- विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस विशेष) सरसी छंद गीत- *सियान* (27)
होथे धरखन सियान घर के, जइसे कांड़ मँयार। सुख मा दुख मा थेगा बनके, जोड़ रखय परिवार।। जिनगी के सुख सार बतावय, करय सियानी गोठ। कहय सिखौना बात धरे ले, होथे मन हा पोठ।। दूर रखय झगरा झंझट ले, बाँटय मया दुलार। होथे धरखन सियान घर के, जइसे कांड़ मँयार।। बिना सियान धियान नहीं जी, कहिथें दुनिया लोग। दिये बिना आदर सियान ला, बिरथा हे तप जोग।। पार करय डुबती नइया ला, बन के जी पतवार।। होथे धरखन सियान घर के, जइसे कांड़ मँयार।। देव समान सियान हवय जी, पबरित उंखर पाँव। देवय सुख पुरवाई सब ला, बन पीपर बर छाँव।। सुसकय झन जी कभू बुढ़ापा, नैनन आँसू ढार। होथे धरखन सियान घर के, जइसे कांड मँयार।। कर्म धर्म संस्कार सिखावय, रीति नीति के बात। फेर बहू बेटा बेटी मन, सब ला हे बिसरात।। गजानंद कर सियान सेवा, देबे कर्ज उतार। होथे धरखन सियान घर के, जइसे कांड मँयार।। इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)21/08/2023
सरसी छंद गीत- रखिया बरी (28) रखिया बरी बनावय भौजी, खावँय मिल परिवार। जीभ लमा के खावय भइया, मारत जी चटकार।। भरे विटामिन आनी बानी, भरे वसा प्रोटीन। पाय सुवाद बरी रखिया के, रहिथें सब शौकीन।। भारी महँगाई ला धर के, बिकथे हाट बजार।। रखिया बरी बनावय भौजी, खावँय मिल परिवार।।1 आलू मुनगा के सँगवारी, डार टमाटर लाल। नून मसाला धनिया पत्ती, हरदी करय कमाल।। डार चरोहन फिर चूरन दे, बढ़िया डबका मार। रखिया बरी बनावय भौजी, खावँय मिल परिवार।।2 का गरीब अउ का अमीर जी, खावँय धरे सुवाद। एक बार के खाये ले फिर, सदा करँय फरियाद।। चाव लगा के खाथे बढ़िया, गजानंद हर बार। रखिया बरी बनावय भौजी, खावँय मिल परिवार।।3 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 28/08/2023
सरसी छंद गीत- हॉकी (29) राष्ट्रीय खेल भारत के हॉकी, जग जन मा पहिचान। मेजर ध्यानचंद हॉकी के, जादूगर तो जान।। दिन अगस्त उनतीस ये, सन उन्निस सौ पाँच। शहर इलाहाबाद हा, झूम उठिस जी नाच।। ध्यानचंद जी जनम धरे, बनके प्रतिभावान। राष्ट्रीय खेल भारत के हॉकी, जग जन मा पहिचान।।1 मातु शारदा के जी ललना, सामेश्वर के लाल। जनम धरे तँय ऊँच करे बर, भारत माँ के भाल।। मेजर बन भी डँटे रहे तँय, सीमा सीना तान। राष्ट्रीय खेल भारत के हॉकी, जग जन मा पहिचान।।2 करे महारथ हासिल हॉकी, देख रहय सब दंग। ध्यानचंद जी ध्यान लगा के, खेलय मस्त मलंग।। देश विदेश सबो जन जानय, भारत के ये शान। राष्ट्रीय खेल भारत के हॉकी, जग जन मा पहिचान।।3 गोंद लगा के छड़ी घुमाथे, बोलिस जब जापान। तोड़ छड़ी ला देखे जब तो, होगें सब हैरान।। ना तो गोंद छड़ी मा पाइस, ध्यानचंद के ध्यान। राष्ट्रीय खेल भारत के हॉकी, जग जन मा पहिचान।।4 खेल विदेशी ला अपनाये, छोड़ अपन अब खेल। हॉकी हा तो झाँकी रहिगे, खेंलत पेल ढपेल।। आगे आ आवाज उठावव, पाये हॉकी मान। राष्ट्रीय खेल भारत के हॉकी, जग जन मा पहिचान।।5 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/08/2023
सरसी छंद गीत- *दहेज* (30) बनके दहेज दानव निस दिन, निगलत हवय समाज। देह दहेज जला बइठे हे, बेटी मन के आज।। बेटी तो बस बेटी होथे, तोर रहे या मोर। जे घर पाँव पड़े बेटी के, उहाँ खुशी के भोर।। बहू पराया धन झन मानौ, मानौ खुद के लाज। बनके दहेज दानव निस दिन, निगलत हवय समाज।।1 हाथ करे पींयर बेटी के, पाई-पाई जोर। घिरलत दाई ददा कमाये, तन जाँगर ला टोर।। सुख जिनगी ससुराल बितावय, बेटी सपना साज। बनके दहेज दानव निस दिन, निगलत हवय समाज।।2 दहेज लेना दहेज देना, बहुत बड़े अभिशाप। आज नहीं तो कल बनना हे, जग मा सब ला बाप।। रहिथे सबो ददा दाई ला, बेटी ऊपर नाज। बनके दहेज दानव निस दिन, निगलत हवय समाज।।3 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/09/2023
सरसी छंद गीत- *मृत्युभोज* (31) मृत्युभोज अभिशाप बड़े हे, जन समाज बर आज। चगलत हे तन मन धन ला ये, बन करके तो खाज।। ढ़ोंग रूढ़ि हा परंपरा बन, रूप धरे विकराल। सभ्य समाज कहाँ अब रहिगे, चलत भेड़ कस चाल।। पढ़े लिखे इंसान मौन हें, कोंन करय आगाज। मृत्युभोज अभिशाप बड़े हे, जन समाज बर आज।।1 मृत्युभोज के खातिर ककरो, बिक जाथे घर खेत। मार पालथी सबो खवइया, कोंन करय जी चेत।। दीन गरीब उबर नइ पावय, गिरे जिहाँ ये गाज। मृत्युभोज अभिशाप बड़े हे, जन समाज बर आज।।2 देख चेहरा शोकित घर के, कौर उठे ना हाथ। मानवता ला राखव जिंदा, देवव दुख मा साथ।। ऊपर ले महँगाई सुरसा, छींनत सुख के ताज। मृत्युभोज अभिशाप बड़े हे, जन समाज बर आज।।3 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/09/2023
*होगे अब तो गुरू गरू जी* (32) होगे अब तो गुरू गरू जी, बेच डरिंन तन लाज। तथाकथित मा रमगे देखव, पहिने बर सर ताज।। दल बदलू बन नाँचत हावँय, सत्ता बने गुलाम। स्वाभिमान ला बेच डरिंन जी, राह रूढ़ि ला थाम।। पुरखा के तो मान भुलागे, खो दिंन लाज समाज। होगे अब तो गुरू गरू जी, बेच डरिंन तन लाज।।1 नागनाथ अउ साँपनाथ के, लेलिंन फाँस लपेट। गुरु घासी के करम बचन ला, कर दिंन मटिया मेट।। माथ लगा लिंन बंदन लाली, चन्दन तज के आज। होगे अब तो गुरू गरू जी, बेच डरिंन तन लाज।।2 अंग अंग मा मनुवादी के, चढ़गे भगवा रंग। अंधभक्ति के राग अलापत, चाल चलत बेढंग।। चाल चलन परिधान बदलगे, बदल गये अब काज। होगे अब तो गुरू गरू जी, बेच डरिंन तन लाज।।3 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/09/2023
सरसी छंद गीत- *छत्तिसगढ़ के शान* (33) फरा ठेठरी खुरमी मुठिया, चौसेला पकवान। अंगाकर रोटी हा भइया, छत्तिसगढ़ के शान।। परब हरेली तीजा पोरा, सब ला गजब सुहाय। राखी होली दीवाली मा, घर अँगना ममहाय।। खुशी उमंग तिहार कहाइस, अउ पुरखा के मान। अंगाकर रोटी हा भइया, छत्तिसगढ़ के शान।।1 करी अइरसा कतरा पकुवा, मालपुआ के स्वाद। खाजा कुसली खा ले करबे, जिनगी भर तँय याद।। कहाँ मिठाई अइसन पाबे, हाट बजार दुकान। अंगाकर रोटी हा भइया, छत्तिसगढ़ के शान।।2 पाख पितर पुरखा बर तर्पण, भक्ति श्राद्ध अउ भोग। बरा बोबरा बटिया पपची, खूब खिलावँय लोग। गुलुल गुलुल चीला भजिया ला, खावय हमर सियान। अंगाकर रोटी हा भइया, छत्तिसगढ़ के शान।।3 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/09/2023
सरसी छंद गीत- *शिक्षक* (34) शिक्षक शिक्षा के दीपक बन, बाँटय ज्ञान प्रकाश। अनगढ़ माटी के चोला ला, देवय रूप तराश।। प्रथम पिता माता हे शिक्षक, बात रखौ ये भान। जेन पढ़ावय क ख ग घ हमला, दूजा शिक्षक मान।। तिसरइया उन सब शिक्षक ये, जे बाँधय मन आस। शिक्षक शिक्षा के दीपक बन, बाँटय ज्ञान प्रकाश।।1 बुरा भला के भेद बतावय, रीति नीति संस्कार। परहित सेवा धर्म परायण, बाँटय भाव विचार।। शिक्षक के शिक्षा से संभव, सभ्य समाज विकास। शिक्षक शिक्षा के दीपक बन, बाँटय ज्ञान प्रकाश।।2 ढ़ोंग रूढ़ि पाखंडवाद ले, करथे सदा सचेत। शिक्षा के आगे नतमस्तक, जादू टोना प्रेत।। शिक्षक शिक्षा ले ही करथे, मन के भरम विनास।। शिक्षक शिक्षा के दीपक बन, बाँटय ज्ञान प्रकाश।।3 🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/09/2023
सरसी छंद गीत- *साक्षरता* (35) साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास। पाथे मान समाज मा, भरके ज्ञान उजास।। साक्षर सक्षम लोग उन, जेला क ख ज्ञान। भाषा मर्यादा सहित, सही गलत के भान।। शिक्षा ले बढ़थे सदा, खुद मा दृढ़ विस्वास। साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास।।1 करिया अक्षर भैंस कस, शिक्षा बिना सियान। शिक्षा ले मन भीतरी, उगथे नवा बिहान।। अँधियारी दुख के भगे, सुख के भरे प्रकाश। साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास।।2 शिक्षा बर बंधन नहीं, कोई उम्र पड़ाव। लइका वृद्ध जवान सब, मिलके पढ़व पढ़ाव।। करबो जिनगी के सबो, इम्तिहान तब पास। साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास।।3 साक्षरता के दर बढ़े, सुग्घर हवय उपाय। आठ सितम्बर हर बछर, साक्षर दिवस मनाय।। गजानंद लिख छंद मा, सरसी सहीं प्रयास। साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास।।4 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/09/2023
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सरसी छंद गीत- *पंथी* लोक गीत मा पंथी गाना, देथे सुख के छाँव। झाँझ मँजीरा माँदर बाजे, थिरके सबके पाँव।। गुरु तपसी पंथी ले पाइस, योग साधना ध्यान। पंथी नृत्य हरत तन व्याधा, देवय मुख मुस्कान।। ताल मिलाके पाँव उचाके, घुँघरू छेड़य तान। रागी पारय साखी बढ़िया, गायक गावय गान।। पंथी पंथ हरय सत के अउ, सत के सच्चा ठाँव। लोक गीत मा पंथी गाना, देथे सुख के छाँव।। पंथी के जस ला बगराइस, जग मा देवादास। बेधुन पंथी धुन मा नाचय, मन ला करत उजास।। देश विदेश बजाइस डंका, बगरे सत्य प्रकाश। बनके सच्चा अनुयायी जे, सतगुरु घासीदास।। पंथी महिमा गावँय जन-जन, आज शहर अउ गाँव। लोक गीत मा पंथी गाना, देथे सुख के छाँव।। पंथी के ग्रन्थी मन बोलय, पंथी सत के राह। पंथी मा सुख सार समाहित, सागर ज्ञान अथाह।। सत्य अहिंसा प्रेम भरे ये, मन मा शांति उछाह। शुद्ध आचरण पावन कर दै, सदा दिसंबर माह।। पंथी के महिमा बरनन कर, भाग अपन सहराँव। लोक गीत मा पंथी गाना, देथे सुख के छाँव।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/07/2025
सरसी छंद गीत- *21 मार्च विश्व वानिकी दिवस विशेष* हॅंसय खुशी ले रुख राई हा, पंछी गावय गान। नदिया नरवा कल-कल बोहय, बन सुघ्घर बरदान।। माटी महकय सोन बरोबर, पवन चलय सुख पाॅंय। पर्यावरण सुरक्षित रखबो, जम्मो किरिया खाॅंय।। हरियर धरती सुंदर लागय, मनखे पावय चैन। दूर प्रदूषण ला करबो कहि, देखय सपना नैन।। रंग-रंग के फूल खिलय अउ, भँवरा मन मुसकाय। पावन तुलसी के चॅंवरा ले, घर कुरिया ममहाय।। धरती दाई रूॅंधे हावय, मनखे करत बिनास। रुख-राई सब कटत हवय अब, कइसे लेबो साॅंस।। बगरत हावय जहर हवा मा, संकट भारी छाय। जे नइ चेतय आज समय मा, जाही जीव सिराय।। इही बात ला जानव संगी, मिल सब पेड़ लगाव। हरियर-हरियर धरती करबो, सूरुज नवा उगाव।। राखव पर्यावरण सुरक्षित, होही जग कल्यान। छत्तीसगढ़ के माटी कहिथे, राखव मोरो मान।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/03/2026
सरसी छंद गीत - *22 मार्च विश्व जल दिवस* नदिया नरवा हवय सुखावत, तरिया हे बदहाल। बूँद-बूँद बर तरसत हन सब, हवय जीव के काल।। रुख-राई ला काट डारे हन, हरियाली कर दूर। धरती दाई रोवत हे अब, सुख हे चकनाचूर।। ठुड़गा बन ठाड़े जंगल मा, सरई साजा साल। नदिया नरवा हवय सुखावत, तरिया हे बदहाल।। पानी आय मितान जगत के, देवव सब झन ध्यान। अमरित कस अनमोल रतन ये, कहिथें हमर सियान।। पानी बिन जिनगानी कइसे, होही जी खुशहाल। नदिया नरवा हवय सुखावत, तरिया हे बदहाल। बनय सोखता घर-घर मा अउ, उही म जल ला डार। आने वाला पीढ़ी बर जी, सब झन करौ विचार।। जाग जवव सब समय रहत मा, स्वारथ झन मन पाल। नदिया नरवा हवय सुखावत, तरिया हे बदहाल।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/03/2026

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