सोमवार, 15 अगस्त 2022

दोहा छंद

 दोहा छंद-

गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर। अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।

गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम।
तोर कृपा ले हे मिले, मोला जग मा नाम।।

सतगुरु घासीदास गुरु, बंदन बारम्बार ।

छंद लिखौं सतज्ञान के, बालक मति अनुसार ।।


अमर दास गुरु बंदगी, बालक दास प्रणाम ।

हाथ जोर विनती करौं, सिद्ध करौ सब काम ।।


जीवन परिचय

गाँव मोर जी सेंदरी, गजानंद हे नाम ।

मुंगेली परथे जिला, अभियंता हे काम ।।


दुकलहीन माता रहिस, लैनदास जी बाप ।

देखत सुघ्घर लागथे, सातों भाई खाप ।।


छोटे हँव मैं सातवां, छै भाई के पाठ ।

कोन तोड़ सकही भला, हमर मया के गाँठ ।।


ऊषा जीवन-संगिनी, जिनगी भर के साथ ।

चाहे कतको दुख पड़े, सदा बढ़ाथे हाथ ।।


मेघा रितु वर्षा हमर, बेटी हें अनमोल ।

हँसी खुशी सुख देत हें,सुघ्घर गुरतुर बोल ।।


गुरु मन के आशीष ले, करथँव रचना छोट ।

सार सार गुन देत हे, दूर करँय सब खोट ।।

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दोहा छंद- जीवन परिचय जन्म गाँव हे सेंदरी, गजानंद हे नाम। मुंगेली पड़थे जिला, अभियंता हे काम।। थाना पड़थे पथरिया, संग इही तहसील। हवय जरेली डाकघर, हवय बसे दू मील।। उसलापुर साईंनगर, हावय अभी निवास। गोपेश्वर मंदिर गली, शांति सरोवर पास।। दुकलहीन दाई रहिस, गे परलोक सिधार। लैनदास पात्रे ददा, जोड़ रखिस परिवार।। होथन भाई सात हम, जेमा मँय हा छोट। रहिथन मिलजुल हम सबो, मन मा नइहे खोट।। जीवन साथी हे उषा, सुख दुख मा दय साथ। जिनगी के गाड़ी चलय, थाम हाथ मा हाथ।। वर्षा रितु मेघा गुनिक, बेटी हावय तीन। जीवन परिचय मोर ये, जानौ संत सुधीन।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/12/2024


दोहा छंद- *सतगुरु घासीदास* ..........................*......................... पावन धाम गिरौदपुर, माह दिसंबर खास। सत्य रूप मा अवतरे, सतगुरु घासीदास।। अमरौतिन के कोख अउ, महँगू दास दुलार। सत्रह सौ छप्पन रहिस, लेइस गुरु अवतार।। छागे अँगना मा खुशी, बाजय मंगल गीत। गुरु दर्शन बर आय सब, सगा सहोदर मीत।। मांदर झाँझ मृदंग सँग, सजे आरती थाल। आये जग उद्धार बर, अमरौतिन के लाल।। देवँय आशीर्वाद ला, नर नारी सब लोग। सत्यपुरुष अवतार ये, करही सत के जोग।। मातु पिता गुरु नाम ला, राखिस घासीदास। बनही संत महान गुरु, हरही जग जन त्रास।। जतन करे लइका बढ़े, पानी पाये धान। बाढ़े उही प्रकार ले, गुरु जी धारत ज्ञान।। नानपना ले ही करिस, गुरु जी सत के काम। महिमा गजब दिखाय हे, नाम जपत सतनाम।। सखा बुधारू ला दिये, गुरु जी जीवन दान। तारिस गौ माता घलो, लगा सत्य के ध्यान।। बिना अन्न पानी बिना, जेवन दिये बनाय। बिना सुरूज प्रकाश के, कपड़ा घलो सुखाय।। भाटा बारी ले बबा, लानिस मिरचा टोर। जोतिस नाँगर ला अधर, होगे महिमा शोर।। वैज्ञानिकता तर्क ले, सत के करिस प्रचार। गुरु के दे सिद्धांत ले, आज चलत संसार।। शादी घासीदास गुरु, माता सफुरा साथ। हँसी खुशी जिनगी जिये, थाम हाथ मा हाथ।। चार पुत्र के संग मा, होइस पुत्री एक। बेटा सब ज्ञानी गुनी, बेटी सुशील नेक।। अमरदास बेटा बड़े, मझला बालकदास। तीसर आगरदास गुरु, अउ अड़गड़िहा खास।। सहोदरा बेटी सुघर, बहुत चतुर हुशियार। मातु पिता के लाड़ली, पाये मया दुलार।। सपना देइस एक दिन, पुरुषपिता सतनाम।

माया मा गे हस भुला, घासी तँय सतकाम।। दुनिया के उद्धार बर, लिये हवस अवतार। घासी तँय तो हस फँसे, मोह मया परिवार।। सपना ले झकना उठिस, बाबा घासीदास। पुरुषपिता गुरु माफ कर, तोड़े हँव विश्वास।। फेर वचन हँव देत मँय, करहूँ जग उद्धार। जावत हँव सत खोज बर, छोड़ आज घर द्वार।। सत खोजन बर गे निकल, गुरु जी छात पहाड़। जिहाँ शेर भालू रहय, कटकट जंगल झाड़।। धुनी रमाये बैठ गे, ध्यान लगा सतनाम। पाये जी गुरु ज्ञान ला, बना हृदय सत धाम।। छै महिना ले तप करिस, पाये बर सत ज्ञान। जोग साधना से बनिस, गुरु जी संत महान।। सफुरा पुत्र वियोग मा, तज दे राहय प्रान। आके घासीदास गुरु, देइस जीवन दान।। आंदोलन सतनाम के, करिस जोर शुरुआत। जाति- पाति के बंध मा, फँसे रहिन सब जात।। मनखे ले मनखे छुआ, छूत करे कुछ लोग। रूढ़िवाद पाखण्ड के, छाये राहय रोग।। बोले घासीदास गुरु, मनखे-मनखे एक। एक खून तन चाम हे, राह चलौ सत नेक।। मानवता के पाठ पढ़, लौ सब संत सुजान। आही सुमत समाज मा, बोले संत महान।। जगह-जगह सत रावटी, होवय गुरु जी तोर। जोड़े सबो समाज ला, बाँध दया के डोर।। ढोंग रूढ़ि पाखण्ड के, छाय रहय अँधियार। मुक्ति दिलाइस संत गुरु, करके सत्य प्रहार।। सत रद्दा चलिहौ कहिस, बानी रखिहौ नेक। लोभ मोह अभिमान ला, देहव संतो फेक।। मनखे जग कल्यान बर, देइस सत संदेश। कर लौ पालन संत जन, मिट जाही सब क्लेश।।। दिये सात संदेश गुरु, ब्यालिस अमरित बोल। अमल करौ सब संत हो, हिरदे के पट खोल।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/12/2024


                          दाता तो सतनाम हे
दाता तो सतनाम हे, मानय सबला एक ।

सत्य अहिंसा प्रेम के, पाठ पढ़ावय नेक ।।


सत्य नाम डोंगा बने, गुरु घासी पतवार ।

लहरा कतको मार लै, होही बेड़ा पार ।।


मनखे मनखे एक हे, गुरु बाबा के बोल ।

सत्यनाम जग सार हे, सत बानी अनमोल ।।


एक रंग सतनाम हे, जेला कहय सफेद ।

मानवता के पाठ हे, जेमा नइ हे भेद ।।


सात रंग माया सजे, तीनों लोक जहान ।

पर सादा के देख ले, कतका हावय मान ।।


सहीं झूठ के ज्ञान दै, मारग नेक बताय ।

सत्य पुजारी नाम गुरु, घासी दास कहाय ।।


पहिली गुरु दाई ददा, दूजा हे गुरु सार ।

माटी मन कच्चा घड़ा, जइसे गढ़े कुम्हार ।।


जिनगी सुन्ना गुरु बिना, बिरथा हे सम्मान ।

गुरु जीवन के सार हे, जग बर गुरु बरदान ।।



बंदन गुरु के मँय करँव, दुनों हाथ ला जोर ।

मोर हृदय अँधियार ला, दूर करव बन भोर ।।


माटी तन कच्चा घड़ा, गुरुवर रूप कुम्हार ।

ज्ञान रूप के चाक मा, जिनगी गढ़त हमार ।।


जननी जग माता पिता, गुरु सउँहत भगवान ।

जनम सुफल सबके करय, अउ जग के कल्यान ।।


जिनगी के गुरु पाहड़ा, गुणा भाग अउ जोड़ ।

पाठ सिखावय ज्ञान भर, भेदभाव ला छोड़ ।।


देव रूप मा गुरु मिलय, जस माही पतवार ।

अंधकार मन दूर करय, ज्ञान जोत ला बार ।।



मँय के उपजे फाँस मा, अरझे साँसा रोज ।

मँय के ये बुनियाद ला, अपन भीतरी खोज ।।


छाँव परे मँय के कहूँ, जर जर मानुष जाय ।

करे बुद्धि ला खोखला, अंत घड़ी पछताय ।।


मँय के जानव भेद ला, छोड़व मन अभिमान ।

हँसी जगत संसार मा, देवय ये अपमान ।।


रावन मरगे काल मँय, करके कुल के नाश ।

मँय मा मरगे कंस हा,मँय के बनके दास ।।


मँय के सही इलाज हे, समानता के सोंच ।

छोड़ अहं के भाव ला, मँय ला खूँटी खोंच ।।



सार नाम सत नाम हे, इही हमर ये मूल ।

बालक गुरु बलिदान ला, झन जावव जी भूल ।।


आँख खोल के देख लौ, आज हमर जी हाल ।

काबर समझत नइ हवव, बहरुपिया के चाल ।।


सोये काबर आज हौ, अपन आँख लौ खोल ।

राजनीति के भेड़िया, देख बजावत ढोल ।।


फटे अदरमा देख के, सतनामी के हाल ।

रूप धरे गीदड़ सहीं, नोचत तन के खाल ।।


कई भाग मा हे बँटे, देखव आज समाज।

ये अनेकता आड़ मा, आन करत हे राज ।।


पानी झन हो खून हा, सतनामी के आज ।

छोड़ अहं के भाव ला, कर लौ सुमता काज ।।


सुमता डोरी बाँध के, ताकत लौ जी जोर।

आँख उठा तब नइ सके, कोनो करिया चोर ।।



सत के चिनहा जान के, धर ले सादा रंग ।

जिनगी सुघ्घर रंगही, गुरु बाबा के संग ।।


तन सादा मन रंग ले, सादा रंग महान ।

भटकत हंसा तारही,बाबा तोर निशान ।।


सादा चंदन माथ के, देथे जी सम्मान ।

सादा पगड़ी जान ले, सतनामी पहिचान ।।


खानी बानी साथ मा, सादा उच्च विचार ।

सादा खंभा गाड़ ले, अंतस अपन दुवार ।।


सत्य नाम तुम साध के, जिनगी सफल बनाव ।

सादा चिनहा थाम के, आघू धरम बढ़ाव ।।


अमर दास गुरु ज्ञान के, अलख जगाइस जान ।

बालक गुरु जी शौर्य के, बनिस अगम परमान ।।



हाथ जोड़ बंदन करौं, चरण कमल मा माथ ।

 ये जिनगी हे मोर अब, गुरु बाबा के साथ ।।


जुबां जुबां सतनाम हे, सेत सेत परिधान ।

पावन माटी मा गड़े, सतनामी पहिचान ।।


स्वाभिमान ले साथ मा, मन मा रख विस्वास ।

मिलके आगू नित बढ़ौ, कहना बालकदास ।।


मोर साँस के ये सफर, बाबा तोरे नाम ।

हाथ उठे सतकर्म बर, पाँव बढ़े सतधाम ।।


ढ़ूँढ़य मन ये बावरा, मंदिर मस्जिद धाम ।

सबो धाम गुरु के चरण, ध्यान लगा सतनाम ।।


जयकारा सतनाम जो, प्राणी करे पुकार ।

भटकत हंसा हो जथे, भवसागर ले पार ।।


सतबानी सत ग्यान के, पी लौ संत सुजान ।

सत धारा सतनाम हे, निर्मल गंग समान ।।


बूंद बूंद सतनाम के, टपके स्वाति समान ।

प्यासा हंसा नाम बिन, गुरु जी दे जा ज्ञान ।।


अपन करम मा ध्यान दौ, नेक करव जी काम ।

करम करे से ही मिलय, जग मा बढ़िया नाम ।।


महुरा तन झन घोर तँय, नशापान ला छोड़ ।

सत कारज के राह मा, ये जिनगी ला मोड़ ।।


ये तन अइसे खोखला, जइसे भीतर बाँस ।

कोंन घडी पंछी उड़े, तोड़ मया के फाँस ।।


काँटा गढ़थे पाँव मा, बनके पेड़ बबूल ।

आजा सतगुरु छाँव मा, झन जाबे तँय भूल ।।


करनी फल सब भोगथे, इही धरा के द्वार ।

सरग नरक सब हे कहाँ, मानुष करव बिचार ।।


तोर मोर के फेर मा, बिगड़े सुंता काज ।

जइसे बिन सुर ताल के, बदरंगा हे साज ।।


हँसत हवे जग देख ले, झन कर अइसे काम ।

छोड़ बुराई राह अउ, सत मारग ला थाम ।।


सोंच समझ अउ जान ले, का सच हे का झूठ ।

लिगरी चारी हा करे, ये जिनगी ला ठूठ ।।


जात-पात कचरा हवे, येला घुरवा डाल ।

रंग लहू के एक हे, सबके तन मा लाल ।।


दुनों हाथ ला जोर के, जप ले सतगुरु नाम ।

काया माया मोह हा,आवय कछु नइ काम ।।


दोहावली- इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"


समय

समय बड़ा बलवान हे, झन राहव अनजान ।

समय करा देथे सुनव, भला बुरा पहिचान ।।


समय चक्र के फेर में, राजा बनथे रंक ।

अभिमानी इंसान ला, मारे अइसे डंक ।।


समय कदर जे हा करे, समय वोखरे दास ।

समय मोल जे ना करे, वोखर सब कुछ नाश ।।


समय समय के बात हे, समय समय के फेर ।

कभू रोशनी सुख इही, कभू दुःख अंधेर ।।


बिना बुलाए इन चलय, समय ख्वाब तन सांस ।

थोकुन रुक जावय कहूँ, जिनगी होय विनाश ।।


छिन छिन के ठोकर सुनव, देथे सब ला सीख ।

उठव चलव आगू बढ़व, साधव तीर सरीख।।


करव समय उपयोग ला, गजानन्द का बोल ।

पछताना नइतो पड़े, समय गये अनमोल ।।


✍🏻 इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"

       बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


सत्यबोध वाणी

फँसे बुराई मा मनुज, छाये कलयुग घोर।

बचही कइसे प्रान हा, कुमत दिखत चहुँ ओर।।


डोर कटे विश्वास के, बईमान के मान।

कुकुर बिलई मितवा बने, कदर नहीं इंसान।।


बेच डरिन खुद के करम, बेचत हे ईमान।

बिसर गये घट देव ला, पथरा बने महान।।


कण कण मा जब हरि बसे, घट घट मा भगवान।

मंदिर मस्जिद फेर मा, बने हवव नादान।।


सत्यबोध वाणी सुनौ, करम धरम बतलाय।

दुखिया के साथी बनौ, जन जन ला समझाय।।


किसान

मोर मयारू गाँव के, बंदन मोर किसान ।

तोर करम ले हे उगे, जग मा नवा बिहान ।।


जग मा नवा बिहान ला, लाथे ये हा खोज ।

धरती के सिंगार बर, जाँगर पेरे रोज ।।


जाँगर पेरे रोज ये, धरती के बन लाल ।

कर्ज गरीबी मा परे, रहे तभो खुशहाल ।।


रहे तभो खुशहाल गा, नाँगर बैल मितान ।

हाथ तुतारी थामथे, जाँगर हे पहिचान ।।


जाँगर हे पहिचान जी, करम बँधे हे हाथ ।

पावन माटी धूल ला, तिलक लगाये माथ ।।


तिलक लगाये माथ ये, सदा बढ़ाये मान ।

देश धरम बर कर दिये, अपन खुशी कुरबान ।।


आज परब गणतंत्र

आव मनाबो मिल सबो, आज परब गणतंत्र ।

आजादी हमला मिलिस, गैर फिरंगी तंत्र ।।


गाथा वीर  जवान के, गाबो मिल सब हिंद ।

इँखर दिये बलिदान से, सोवत हन सुख नींद ।।


संविधान के रचियता, नमन भीम साहेब ।

तोर बदौलत आज हे, कलम सबो के जेब ।।


संविधान सबला बड़े, गीता ग्रंथ कुरान ।

कंडिका अनुच्छेद हे, येकर हिरदे प्रान ।।


रोटी कपड़ा तन ढके, सबला मिले मकान ।

काम मिले हर हाथ ला, कहिगे भीम महान ।।


नित विकास भारत गढ़े, जाति धर्म ले दूर ।

सपना अब अम्बेडकर, होवत चकनाचूर ।।


सत्ता के बहरूपिया, खेलत कइसन खेल ।

संविधान के मान ला, देइस कहाँ धकेल ।।


राजनीति के खूँट

रंग बदलथे टेटका, चाल बदलथे ऊँट ।

खाल बदलथे भेड़िया, राजनीति के खूँट ।।


टर्र टर्र करथे मेचका, कुकरा बासय भोर ।

सुन लौ चौकीदार हा, होथे बड़का चोर ।।


घू घू करथे घूघवा, बन बिलवा नरियाय ।

फेकर्री हा फेंकथे, बात कोंन पतियाय ।।


कूद कूद के बेंदरा, ताली खूब बजाय ।

अंध भक्ति मिट्ठू करे, बंदन माथ लगाय ।।


चिपों चिपों गदहा करे, घोड़ा ह हिनहिनाय ।

हुँआ हुँआ जी कोलिहा, बात समझ ना पाय ।।


गली गली भूँके कुकुर, जूठन पत्तल चाँट ।

कोन गलत अउ हे सही, येमा ले तँय छाँट ।।


दोहा छंद (जनउला )

(1)

चार गोड़ जेकर रहय, चार रहय जी हाथ ।

नींद पड़े आराम से, चार पहर सो साथ ।।1


गोल गोल रोटी बना, गोल रहय खुद आप ।

करिया करिया तन दिखे, खूब सहय जी ताप ।।2


घर घर मिलथे ये सुनव, बड़ा काम के चीज ।

स्वाद बढ़ावय साग के, उगे बिना ये बीज ।।3


माथा बिंदी हे हरा, लाल दिखे जी गाल ।

ला खरीद बाजार ले, दाम करय बेहाल ।।4


महिनत भारी जे करय, सीख धरव सब यार ।

छोड़ लार आघू बढ़य, पाछू मा  परिवार ।।5


संत कबीर दास जयंती विशेष- 5 जून


भक्तिकाल के रहिस कवि, सन्त कबीरा दास ।

करिस कुठाराघात जे, ढोंग अंधविश्वास ।।


कर्म लोक कल्यान के, विश्व प्रेम मन भाव ।

अग्रदूत युग जागरण, भारत भूमि लगाव ।।


जन्म लहरतारा भये, कमल मनोहर ताल ।

धन्य भाग काशी शहर, जनमे अइसे लाल ।।


कोई कहे कबीर जी, बालक रहिस अनाथ ।

पालन नीमा माँ करिस, पिता नीरु के साथ ।।


जात जुलाहा मा भये, पालन बाल कबीर ।

मुसलमान कोई कहे, जात न संत फकीर ।।


पुत्र ब्राम्हणी के कहे, पर ना करे कबूल ।

किस्मत संत कबीर के, कर दिस बड़का भूल ।।


स्वामी रामानंद के, पड़िस कबीर प्रभाव ।

तब ले हिन्दू धर्म बर, बढ़िस कबीर लगाव ।।


घाट पंचगंगा मिले, स्वामी रामानंद ।

राम नाम सुमिरन करे, तब बालक मति मंद ।


देख ढोंग पाखंड ला, धरे ध्यान सतनाम ।

फेर भेद नइ तो करिस, गुरु रहीम इशु राम ।।


गये मदरसा ना कभू, तभो धरे गुरु ज्ञान ।

मसि कागद थामे नहीं, अइसे संत महान ।।


शादी लोई संग मा, करे कबीरा फेर ।

भरे गरीबी राह मा, जिनगी मा अंधेर ।।


वंश कमाली एक झन, संत कबीरा लाल ।

सत्य सुमरनी छोड़ के, घर ले आइस माल ।।


काशी मगहर पास मा, देइस तन ला त्याग ।

हिन्दू मुस्लिम साथ मिल, दिहिन चिता ला आग ।।


जन्म जगह अउ जात के, झेलत दंश कबीर ।

स्वर्ग लोक मा चल दिये, बनके संत फकीर ।।


मुंशी प्रेम चंद जी जन्म जयंती

31 जुलाई

प्रेम चंद मुंशी लिखे, जनजीवन के बात।

कुशल चितेरा के कथा, दिये हवय सौगात।।


पीड़ा देख समाज के, बहे कलम के धार।

नैतिकता के बात हा, प्रेम चंद के सार।।


ईदगाह पढ़ बीत गे, ठंड पूस के रात।

बूढ़ी काकी हा कहिस, दरद बुढ़ापा बात।।


पाठ सुभागी हा कहिस, बेटी हे अनमोल।

कफन तरस गे लाश हा, मानवता के पोल।


एक झलक गोदान हे, गाँव शहर परिवेश।

सौतन दिखलाथे जिहाँ, नारी रूप विशेष।।


हीरा मोती बैल दू, सुख दुख मा रह साथ।

प्रेम भाव के पाठ ला, पढ़ा गइन खुद नाथ।।


बन परमेश्वर पंच मन, न्याय करय निष्पक्ष।

सार बात ला कह गइस, प्रेम चन्द्र जी दक्ष।।


दोहा छंद- मद्यपान

काल बरोबर हे नशा, तन बन जाथे लाश।

उजड़े घर परिवार अउ, सुख हो जाथे नाश।।


नशापान जब लत पड़े, रहे कुछू ना चेत।

बिक जाथे सब चीज हा, घर कुरिया अउ खेत।।


मिटे मान ब्यवहार अउ, मिले नहीं सत्कार।

हेय नजर देखय सबो, कर लौ बात विचार।।


✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'

बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

23/06/2021


दहेज हे अभिशाप दहेज हा, सोंचव गुनव समाज। दाग देहज मिटाय बर, करना हे मिल काज।। जलथे बेटी रोज अब, लिपटे आग दहेज। घर के लक्ष्मी मान के, राखव बने सहेज।। करथे लोभ दहेज के, जे मनखे नादान। बेटी सुख देवय नहीं, वोला तो भगवान।। बगरे खुशियाँ सब तरफ, पड़े बहू के पाँव। महके अँगना द्वार घर, मिलथे सुख के छाँव।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )


*छंद के छ* परिवार मा जुड़े के बाद मोर अनुभव


साधक अँव मैं सत्र दू, धन्य भाग हे मोर।

छंद के छ अभ्यास ले, होवत हवँव सजोर।।


छंद के छ हा मोर बर, सुख बिरवा के छाँव।

ज्ञान तर्क पाये हवँव, साहित मा कुछ नाँव।।


अरुण निगम गुरुदेव के, मिलिस कृपा भरपूर।

ज्ञान जोत बनके करिस, मन अँधियारी दूर।।


छंद के छ परिवार मा, बँधे मया के डोर।

हमर शब्द के भाव हे, नहीं तोर अउ मोर।।


का डॉक्टर इंजीनियर, शिक्षक छात्र वकील।

छंद के छ साधक बने, करथें सबो अपील।।


अरुण निगम गुरुदेव हा, बढ़िया करत उदीम।

अपन मातृभाषा जतन, बनके छंद हकीम।।


दोहा छंद- हरियाली कर लौ मिलजुल के सबो, भुइँया के सिंगार। हरियाली हे जान लौ, जिनगी के आधार।। पेड़ लगा बर नीम के, पीपर अमली आम। जड़ फल पत्ता फूल हा, आथे बहुते काम।। बइठ पेड़ के छाँव मा, मन शीतल हो जाय। बड़े बड़े ज्ञानी गुनी, महिमा येखर गॉय।। ला बादर ला खींच के, बरसा खूब कराय। शुद्ध रखय पर्यावरण, सँग हरियाली लाय।। हरियाली खोवत हवे, निज स्वारथ के नाम। समय रहत ले चेत जौ, पेड़ कटाई थाम।। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )


दोहा छंद गीत- *साक्षरता* साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास। पाथे मान समाज मा, भरके ज्ञान उजास।। साक्षर सक्षम लोग उन, जेला क ख ज्ञान। भाषा मर्यादा सहित, सही गलत के भान।। शिक्षा ले बढ़थे सदा, खुद मा दृढ़ विस्वास। साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास।।1 करिया अक्षर भैंस कस, शिक्षा बिना सियान। शिक्षा ले मन भीतरी, उगथे नवा बिहान।। अँधियारी दुख के भगे, सुख के भरे प्रकाश। साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास।।2 शिक्षा बर बंधन नहीं, कोई उम्र पड़ाव। लइका वृद्ध जवान सब, मिलके पढ़व पढ़ाव।। करबो जिनगी के सबो, इम्तिहान तब पास। साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास।।3 साक्षरता के दर बढ़े, सुग्घर हवय उपाय। आठ सितम्बर हर बछर, साक्षर दिवस मनाय।। गजानंद लिख छंद मा,करथे सतत प्रयास। साक्षरता ले आम जन, करथे देश विकास।।4 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


*@सत्यबोध वाणी-* पाप दिनोंदिन हे बढ़त, बाढ़े अत्याचार। मनखे बनगे कलजुगी, माते हाहाकार।। सच रोवत हे दुख धरे, झूठ करत हे राज। बेच डरिन ईमान सब, बेच डरिन तन लाज।। मनखे डूबे स्वार्थ मा, धर माया के लोभ। भाई-भाई हें लड़त, रख अंतस मा खोभ।। करम धरम के सब मरम, लोगन गे हें भूल। मानवता के राह मा, रोज बिखेरँय शूल।। गावत आँखी मूँद के, अंधभक्ति के राग। फूटत हावय भाग सुख, अब तो मानुष जाग।। ढोंग रूढ़ि पाखंड के, बिछे हवय जग जाल। बुरा भला ला सोच के, खुद ला लौ संभाल।। गजानंद इंसानियत, थाम रखे कर काम। आज नहीं तो कल सहीं, होही जग मा नाम।। ----✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/08/2024

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दोहा छंद - गुरु (छत्तीसगढ़ी)

 दोहा छंद-  गुरु पग वंदन मँय करौं, दुनों हाथ ला जोर। अर्पन हे श्रद्धा सुमन, शुभमय हो नित भोर।।01 गावँव गुरु गुनगान ला, रोज सुबे अउ शाम। तोर ...