कुण्डलिया छंद-
1. शोषण-अत्याचार-
काँटा पग-पग है बिछा, शोषण अत्याचार।
तड़प रही जनता यहाँ, चुप बैठी सरकार।।
चुप बैठी सरकार, स्वार्थ का थामे सत्ता।
बेकारी की मार, युवा तरसे हक भत्ता।।
समानता अधिकार, मिले सबको सुख बाँटा।
राहें कर दो साफ, गड़े मत पग में काँटा।।
2. प्यारे भारत देश-
करते हैं शत शत नमन, प्यारे भारत देश।
जल जंगल सुख सम्पदा, हरा-भरा परिवेश।।
हरा-भरा परिवेश, नदी झरने का कल कल।
लेते मन को मोह, गीत जन गण मन मंगल।।
जननी बन संस्कार, प्रीत जन-जन में भरते।
संत गुणी गुणगान, वेद गीता भी करते।।
3. आजादी-
आजादी के अर्थ को, लोग गए हैं भूल।
जाति धर्म के नाम पर, चुभा रहे हैं शूल।।
चुभा रहे हैं शूल, रूप दानव का धरके।
करते नाश समाज, त्याग मानवता करके।।
संविधान को आग, लगाते बन उन्मादी।
गजानंद धिक्कार, करे ऐसी आजादी।।
4. सहना कभी न जुल्म-
सीखो सच को बोलना, यही परम है धर्म।
सहना कभी न जुल्म को, मूक बधिर यह कर्म।।
मूक बधिर यह कर्म, रहे जो मौन यहाँ पर।
सच्चाई दे साथ, लड़े हैं कौन यहाँ पर।।
पाने खुद अधिकार, किसी के पास न चीखो।
तोड़ झूठ की फाँस, बोलना सच को सीखो।।
5. मानवता धर्म-
ऐसा कारज हम करें, बन जाए पहचान।
सार्थक यह जीवन करें, बनें भला इंसान।।
बनें भला इंसान, धर्म मानवता रख लें।
सत्य राह को थाम, कर्म फल मीठा चख लें।।
आये काम न मोह, रूप दौलत पद पैसा।
रहे युगों तक याद, करें कारज हम ऐसा।।
6. महँगाई-
महँगाई की मार से, जूझ रहा संसार।
त्राहि त्राहि जनता करे, बेसुध है सरकार।
बेसुध है सरकार, सुखद निद्रा में सो कर।
भूल गए पद मान, सिंहासन सुख में खो कर।।
रोटी वस्त्र मकान, मिले श्रम दाम कमाई।
जनता करे पुकार, करो कम अब महँगाई।।
7. भ्रष्टाचार-
कर लो मुट्ठी बंद अब, भ्रष्टाचार खिलाफ।
छुपे हुए गद्दार को, करना कभी न माफ।।
करना कभी न माफ, सबक इनको सिखलाओ।
बीच सड़क में खींच, तमाचा एक लगाओ।।
कर बुलंद आवाज, हौसला मन में भर लो।
रहे सुरक्षित देश, प्रतिज्ञा मिलकर कर लो।।
8. दहेज-
दानव बना दहेज क्यों, निगला सकल समाज।
रूढ़िवादिता का शमन, करिए मिलकर आज।।
करिए मिलकर आज, काज मिथकों को तोड़ें।
बेटी असल दहेज, शेष सब लालच छोड़ें।।
सुखी रहे संसार, सोंच रख जीए मानव।
गजानंद हर हाल, रहे मत जग में दानव।।
9. उन्नत बने समाज-
बद्तर मेरे देश की, वतर्मान परिदृश्य।
जाति-धर्म के नाम पर, फैला है अस्पृश्य।।
फैला है अस्पृश्य, बुराई कोढ़ सरीखे।
अंधभक्ति में लीन, यहाँ पर चमचा चीखे।।
मिटे कलह तकरार, जातिवादी का अंतर।
उन्नत बने समाज, रहे परिवेश न बद्तर।।
10. राजनीति के खूँट-
घोड़े खच्चर हैं बँधे, राजनीति के खूँट।
दूध दही घी खा रहे, बैठे बैठे ऊँट।।
बैठे बैठे ऊँट, साथ अपि खाते हाथी।
बगुला काग सियार, बने हैं इनके साथी।।
बिल्ली भी चुपचाप, आस को कैसे छोड़े।
च्यवनप्राश ले नित्य, दौड़ में आगे घोड़े।।
11. शोषण-
शोषण अत्याचार का, बिछा हुआ है जाल।
नजर उठा कर देख लो, हाल बड़ा बेहाल।।
हाल बड़ा बेहाल, गरीबी लांघें सीमा।
जन विकास का काम, पड़ा है देखो धीमा।।
अंधभक्ति को थाम, झूठ का करते पोषण।
इसीलिए तो आज, बढ़ा है जग में शोषण।।
12. सच्चाई-
सच्चाई का कब कहाँ, हुआ भला है मान।
दुनिया झूठ फरेब का, अंधभक्त इंसान।।
अंधभक्त इंसान, पूजते हैं नित पत्थर।
इसीलिए हालात, हुआ है देखो बद्तर।।
गजानंद हम आप, करें कुछ तो अच्छाई।
तभी बचेगा मान, जमाने में सच्चाई।।
13. किसान-
भरते जग का पेट नित, कृषक बने भगवान।
फिर भी मिलते क्यों नहीं, इनको हक पहचान।।
इनको हक पहचान, दिलाने आगे आओ।
उचित मूल्य श्रम मान, इन्हें अधिकार दिलाओ।।
होता गर सच न्याय, नहीं फिर किसान मरते।
बन जग पालनहार, पेट नित सबका भरते।।
14. महँगाई-
महँगाई की मार पर, कौन करेगा बात।
देखो घर-परिवार का, बद्तर है हालात।।
बद्तर है हालत, बढ़ा है भ्रष्टाचारी।
आम लोग हैं त्रस्त, मजे में हैं व्यापारी।।
जन नेता दो ध्यान, समय है यह दुखदाई।
गजानंद दिन-रात, कमर तोड़े महँगाई।।
15. नशापान-
करते जीवन खोखला, नशापान दो त्याग।
मिटे मान सम्मान भी, तन पर लगते दाग।।
तन पर लगते दाग, बनाते घर बीमारी।
बिक जाते घर खेत, घेरते दुख लाचारी।।
देख दुखद परिणाम, नहीं फिर भी जन डरते।
त्याग खुशी परिवार, नशा की आदत करते।।
16. शासक-
शासक बैठा मौन है, कौन सुने फरियाद।
राज करे चमचा यहाँ, देश हुए बरबाद।।
देश हुए बरबाद, सोन की चिड़िया कहती।
समता संगम धार, नहीं अब गंगा बहती।।
दूर करो दुख मर्ज, दवा दे पीड़ा नाशक।
देश रहे खुशहाल, ध्यान दो अब तो शासक।।
17. जातिवाद-
आसन धर्म विशेष पर, बैठे हैं सामंत।
नहीं चाहते वे कभी, जातिवाद हो अंत।।
जातिवाद हो अंत, असमता मिट जायेगा।
तब यह भारत देश, विश्व गुरु कहलायेगा।।
जाति धर्म ले आड़, दुशासन करते शासन।
हमें लड़ाकर आज, जमाये बैठे आसन।।
18. मानव मानव एक-
मानव मानव एक है, एक सभी की जात।
धर्म बड़ा इंसानियत, अमल करो यह बात।।
अमल करो यह बात, संत गुरुओं ने बोला।
एक सभी का खून, एक ही सबका चोला।।
जग में शांति विनाश, किया करते हैं दानव।
मानवता की राह, चलें हम मिल सब मानव।।
19. शिक्षा-
शिक्षा पावन दीप है, देती ज्ञान प्रकाश।
दूर करे अज्ञानता, भरती दृढ़ विश्वास।।
भरती दृढ़ विश्वास, सिखाती हक को लड़ना।
थामे राह विकास, सदा ही आगे बढ़ना।।
गजानंद हम आप, ज्ञान की ले लें दीक्षा।
करने सभ्य समाज, करें धारण हम शिक्षा।।
20. हक मुद्दे की बात-
पायेंगे तब तक नहीं, भ्रष्टाचार निजात।
नहीं करेंगे जब तलक, हक मुद्दे की बात।।
हक मुद्दे की बात, चलो संसद में लायें।
सोई है सरकार, उन्हें तत्काल जगायें।।
चाटुकारिता राग, नहीं जब हम गायेंगे।
सच कहता हूँ आज, अभी हम हक पायेंगे।।
21. बात सच्चाई-
लिखना दर्द-समाज का, तभी कलम का मोल।
अंधभक्ति के राग में, नहीं बजाना ढोल।।
नहीं बजाना ढोल, चाटुकारी को थामे।
पाने पद-सम्मान, नहीं बनना मन तामे।।
भाव रखे निष्पक्ष, सदा ही आगे दिखना।
धर्म-कलम को थाम, बात सच्चाई लिखना।।
22. पर्यावरण-
दूषित है पर्यावरण, गाँव शहर चहुँओर।
नदी कुआँ तालाब में, उठती नहीं हिलोर।।
उठती नहीं हिलोर, न डोले पत्ती-डाली।
नित्य कटे जब पेड़, दिखे कैसे हरियाली।।
जल जंगल से साँस, इन्हें हम रखें सुरक्षित।
कर लें दृढ़ संकल्प, नहीं हो धरती दूषित।।
23. राजनीति-
नेताओं के बात पर, रहती नहीं लगाम।
इसीलिए तो हो रही, राजनीति बदनाम।।
राजनीति बदनाम, स्वार्थ निज कारण होते।
जाति-धर्म मतभेद, बीज कुमता की बोते।।
करते वादें झूठ, कसम खा माताओं के।
रहती नहीं लगाम, बात पर नेताओं के।।
24. आडम्बर-
आडम्बर-पाखंड का, मन से कर दें त्याग।
मानव धर्म विकास को, नोंच रहा यह काग।।
नोंच रहा यह काग, नित्य मानवता की जड़।
पढ़े-लिखे इंसान, बने फिरते हैं अनपढ़।।
अंधभक्ति में लीन, लोग दिखते हैं घर-घर।
इसीलिये तो पाँव, पसारा है आडम्बर।।
25. समरसता-
समरसता-धारा बहे, शांति-प्रेम का नीर।
जग-जन का कल्याण हो, मिटे सभी के पीर।।
मिटे सभी के पीर, रहे जग में खुशहाली।
कोयल गाये गीत, बैठ समता की डाली।।
सुखद रहे परिवेश, विनय कर पात्रे कहता।
गाँव शहर चहुँओर, बहे धारा-समरसता।।
26. बेटियाँ
मानव मन अंधा हुआ, रख बेटे की चाह।
मार कोंख में बेटियाँ, करते बड़ा गुनाह।।
करते बड़ा गुनाह, समझकर चीज पराया।
पर बेटी माँ बाप, देश का मान बढ़ाया।।
करने कोंख उजाड़, बढ़ाये पाँव न दानव।
रोकें मिलकर आज, भ्रूण हत्या को मानव।।
27. प्रतीक्षा
करे प्रतीक्षा शाम दिन, करे प्रतीक्षा रात।
निर्धारित सबका समय, सुन लो मेरी बात।।
सुन लो मेरी बात, प्रतीक्षा करते सारे।
चाँद सूर्य नक्षत्र, पिंड ग्रह उल्का तारे।।
गजानंद कविराय, सभी यह देते शिक्षा।
समय बड़ा बलवान, मनुज मन करो प्रतीक्षा।।
इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
मो. नं.- 8889747888
28. जाल ढ़ोंग पाखंड
दिखता है चारों तरफ, जाल ढ़ोंग पाखंड।
फँसे हुए हैं लोग सब, थोड़ा और प्रचंड।।
थोड़ा और प्रचंड, ढ़ोंग हर घर में दिखते।
अंधभक्ति के नाम, तथाकथितों को जपते।।
गजानंद सच बात, कहाँ अब कोई लिखता।
खाये धर्म अफीम, यहाँ हर कोई दिखता।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
29. रहो दूर पाखंड
समझाऊँ मैं लाख पर, अंधभक्त हैं मौन।
गोबर भरा दिमाग में, बतलाओ जी कौन।।
बतलाओ जी कौन, तुम्हें गुमराह किया है।
रूढ़िवाद से संत, तुम्हें आगाह किया है।।
त्याग ढ़ोंग भ्रम फाँस, भलाई राह दिखाऊँ।
रहो दूर पाखंड, बात मैं नित समझाऊँ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
30. सच बैठा लाचार
सच्चाई की कौन अब, जग में पहरेदार।
ताकतवर झूठा बना, सच बैठा लाचार।।
सच बैठा लाचार, नित्य ही फाँसी चढ़ती।
कलम पड़ी है मौन, स्याह भी फीकी पड़ती।।
सत्य तथ्य से दूर, लोग दे झूठ दुहाई।
टूटा मन विश्वास, कहाँ जग में सच्चाई।।
31. प्रजातंत्र रोता हुआ
बद्दतर है माहौल अब, बिगड़ा है परिवेश।
प्रजातंत्र रोता हुआ, संकट में यह देश।।
संकट में यह देश, दिखाई अब है देता।
मग्न सभी खुद आप, कौंन अब सुध को लेता।।
देश हुए आजाद, हो रहा है चौहत्तर।
फिर भी देखो हाल, अभी तक भारी बद्दतर।।
32. न्याय को तरसे जनता
जनता भूखे प्यास में, भटक रही दिन रात।
बद्दतर से बद्दतर हुआ, देखो जग हालात।।
देखो जग हालात, आँख में आँसू छलके।
है विकास बेहाल, बंद फिर भी हैं पलके।।
मूक बधिर लाचार, अंध जब शासक बनता।
निश्चित तब यह जान, न्याय को तरसे जनता।।
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर- छत्तीसगढ़, भारत
33. जाल ढ़ोंग पाखंड
दिखता है चारों तरफ, जाल ढ़ोंग पाखंड।
फँसे हुए हैं लोग सब, थोड़ा और प्रचंड।।
थोड़ा और प्रचंड, ढ़ोंग हर घर में दिखते।
अंधभक्ति के नाम, तथाकथितों को जपते।।
गजानंद सच बात, कहाँ अब कोई लिखता।
खाये धर्म अफीम, यहाँ हर कोई दिखता।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
34. बंदर बैठा तीन है, बापू तेरे देश
बंदर बैठा तीन है, बापू तेरे देश।
मचा रखा उत्पात है, बद्दतर है परिवेश।।
बद्दतर है परिवेश, नही है सुख खुशहाली।
बहरा अंधा मौन, रहा शासन की डाली।
छीन रहा अधिकार, यहाँ अंदर ही अंदर।
दे तालों में ताल, मजे में तीनों बंदर।
पहला बंदर मूक बन, सत्ता पर आसीन।
भूख गरीबी बढ़ गई, हालत है गमगीन।।
हालत है गमगीन, बढ़ा है भ्रष्टाचारी।
जग में हाहाकार, करें हैं अत्याचारी।।
राजीनीति का खेल, देख नहले पे दहला।
बड़ा धूर्त चालाक, रहा ये बंदर पहला।।
दूजा बंदर मीडिया, आँख रखा जो बंद।
चाट रहा तलवा सदा, पा पैसे वे चंद।।
पा पैसे वे चंद, दूर रहता सच्चाई।
करने झूठ प्रचार, सदा करता अगुवाई।।
अंधभक्त मतिमन्द, करे आका की पूजा।
सजा रखा दरबार, भक्त ये बंदर दूजा।।
बहरा बंदर तीसरा, करोड़पति धनवान।
औरों की दुख से परे, तौल रहा इंसान।।
तौल रहा इंसान, तराजू बेईमानी।
तरस रहें कुछ लोग, अन्न दाना औ पानी।।
देखो देश विकास, यहीं से तो है ठहरा।
बन बैठा धनवान, तीसरा बंदर बहरा।।
छंदकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर- छत्तीसगढ़, भारत
35. जाति में जाति बताया
तेरे मेरे जन्म का, अलग नही है द्वार।
मानव-मानव भेद फिर, कौन किया संसार।।
कौन किया संसार, जाति में जाति बताया।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य, शूद्र यह वर्ण बनाया।।
गजानन्द क्या खून, अलग है तेरे मेरे।
हाड़ मास से भिन्न, बना क्या शरीर तेरे।।
इंजी. गजानन्द पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/02/23
36. बात नित सत्य परखना
संत कबीरा थक गये, कहते-कहते बात।
ढ़ोंग रूढ़ि पाखंड से, पाओ मनुज निजात।।
पाओ मनुज निजात, बात नित सत्य परखना।
मंदिर मस्जिद द्वार, नहीं तुम माथ पटकना।
सत्य समझ भगवान, धरा जल आग समीरा।।
गजानन्द बन शिष्य, चला पथ संत कबीरा।।
इंजी. गजानन्द पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 17/02/23
37. अंधभक्ति का जोग
ज्ञानी बनकर ज्ञान जग, बाँट रहें वे लोग।
बैठे जो तन मन लगा, अंधभक्ति का जोग।
अंधभक्ति का जोग, ढोंग पाखंड बढ़ाये।
जाति- धर्म के नाम, जनों को रोज लड़ाये।
गजानन्द मत भूल, महापुरुषों की वाणी।
तथाकथित से दूर, रहो सच बनकर ज्ञानी।।
इंजी. गजानन्द पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/02/2023
38. सत्ता का गुणगान
सत्ता का गुणगान वे,करते हैं दिन रात।
सच पूछो तो है नहीं,जिनकी कुछ औकात।
जिनकी कुछ औकात,नहीं बन बैठे नेता।
चारण बन चुपचाप,दुहाई झूठा देता।।
गजानंद कविराय,हिले ना जन हित पत्ता।
ऐसे लोगों हाथ,नहीं देना तुम सत्ता।।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध",
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
39. अंधभक्ति की पोल
समझाऊँ कितना भला,सुन मानुष नादान।
बचा नहीं सकते हमें,कभी मूर्त भगवान।
कभी मूर्त भगवान,करें ना खुद जो रक्षा।
पढ़े लिखे इंसान,ढोंग की पढ़ते कक्षा।
कहूँ सही जो बात,धर्मद्रोही कहलाऊँ।
अंधभक्ति की पोल,खोल तुमको समझाऊँ।।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
40.
रातों से डरने लगा, मन का चाँद चकोर।
जैसे डरते हैं सुनो, दिन में काला चोर।।
दिन में काला चोर, बने रहते हैं भोला।
ऐसा अब परिवेश, आग का जलता गोला।।
लोग काटते लोग, भरे विषधर दाँतों से।
मन मे छाया खौफ, अँधेरी अब रातों से।।
✍इंजी.गजानंद पात्रे *सत्यबोध*
41. मेरा देश महान.
देखो बदला देश का, कैसा अब परिवेश।
लूट रहें तन आबरू, साध साधु कुछ भेष।।
साध साधु कुछ भेष, ढोंग का स्वांग रचाये।
नारी इज्जत दाँव, भला अब कौन बचाये।।
अंधभक्ति को छोड़, चलो तो बात सरेखो।
मेरा देश महान, कहाँ है अब तो देखो।।
✍इंजी.गजानंद पात्रे *सत्यबोध*
42. दूर अंधभक्ति रहना
रहना मुझसे दूर ही, अंधभक्त वे लोग।
जो पत्थर के मूर्त में, बाँटे छप्पन भोग।।
बाँटे छप्पन भोग, चढ़ाये मिष्ठी मेवा।
भूखा घर का देव, धन्य हो तेरी सेवा।।
गजानंद की बात, भले तीखा पर सहना।
पढ़े लिखे इंसान, दूर अंधभक्ति रहना।।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
43. सच को पढ़ लो
पढ़ लो गीता वेद तुम, पढ़ लो ग्रंथ कुरान।
संविधान को बिन पढ़े, मनुज नहीं कल्याण।।
मनुज नहीं कल्याण, फिरोगे ठोकर खाते।
अंधभक्ति गुणगान, रहोगे तुम तो गाते।।
सत्यबोध कर शोध, तर्क वैज्ञानिक गढ़ लो।
तथाकथित इतिहास, छोड़ तुम सच को पढ़ लो।।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
44.नारी से हम आप
नारी नर जग तारणी, नहीं नर्क का द्वार।
नारी से हम आप हैं, नारी से संसार।।
नारी से संसार, इन्ही से प्राण चराचर।
नारी आत्म समान, करो नित इनके आदर।।
सुन लो तुलसीदास, नहीं यह ताड़नहारी।
दिये तुम्हें भी जन्म, जिन्हें कहते हैं नारी।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/03/2023
45.अंधभक्ति का त्रास-
कोरोना की त्रासदी, भूल गये इंसान।
त्राहि-त्राहि जब था मचा, ग़ायब थे भगवान।
गायब थे भगवान, पुकारे थे जब दुखिया।
कोई खोया लाल, पिता माता घर मुखिया।।
मंदिर मस्जिद लोग, अभी भी कहते होना।
अंधभक्ति का त्रास, बड़ा तुझसे कोरोना।।
46. 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस विशेष-
पेड़ लगायें मिल सभी, आसपास परिवेश।
स्वच्छ रखें पर्यावरण, दें सबको संदेश।।
दें सबको संदेश, कभी न पेड़ को काँटें।
पेड़ प्राण आधार, छाँव जन-जन को बाँटें।।
गजानंद उठ जाग, सभी को आज जगायें।
करें धरा श्रृंगार, वचन लें पेड़ लगायें।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
47. जाति में जाति बताया
तेरे मेरे जन्म का, अलग नही है द्वार।
मानव-मानव भेद फिर, कौन किया संसार।।
कौन किया संसार, जाति में जाति बताया।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य, शूद्र यह वर्ण बनाया।।
गजानन्द क्या खून, अलग है तेरे मेरे।
हाड़ मास से भिन्न, बना क्या शरीर तेरे।।
इंजी. गजानन्द पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
48. बात नित सत्य परखना
संत कबीरा थक गये, कहते-कहते बात।
ढ़ोंग रूढ़ि पाखंड से, पाओ मनुज निजात।।
पाओ मनुज निजात, बात नित सत्य परखना।
मंदिर मस्जिद द्वार, नहीं तुम माथ पटकना।
सत्य समझ भगवान, धरा जल आग समीरा।।
गजानन्द बन शिष्य, चला पथ संत कबीरा।।
इंजी. गजानन्द पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
49 *कर्ज़दार हम भीम, चुकायें कर्ज़ा कैसे??*
सबका भाग्य जगा गये, बाबा भीम महान।
संविधान लिख देश का, पाया जग में मान।।
पाया जग में मान, नमन शत-शत करते हैं।
भीम बदौलत आज, शान से हम चलते हैं।।
वंचित हक अधिकार, रहे ना कोई तबका।
संविधान में ख्याल, रखा बाबा ने सबका।।
कैसे पायेंगे भुला, बाबा तेरी याद।
मुक्ति दिलाये आपने, ढोंग रूढ़ि मनुवाद।।
ढोंग रूढ़ि मनुवाद, आग में लोग जले थे।
करने तब उत्थान, कष्ट सह आप चले थे।।
गजानंद सौभाग्य, मसीहा पाये ऐसे।
कर्जदार हम भीम, चुकायें कर्ज़ा कैसे??
पायें कैसे रोक हम, निज नैनन से नीर।
छोड़ गए बाबा हमें, भर अंतस में पीर।।
भर अंतस में पीर, याद उनको करते हैं।
करे नेक जो काम, अमर हरदम रहते हैं।।
गजानन्द गुणगान, भीम का आओ गायें।
भीम मिशन को थाम, कर्ज हम उतार पायें।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 8889747888
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
50. होते अगर न भीम
इतना मन में खौफ़ है, भीम नाम से आज।
करते फिरे विरोध हैं, बनकर कौंवे बाज।।
बनकर कौंवे बाज, रहोगे बस चिल्लाते।
होते अगर न भीम, गटर में तुम सड़ जाते।।
अमर रहेगा नाम, करो तुम विरोध जितना।
गजानन्द उठ जाग, जोश रग भर दो इतना।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 8889747888
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
51. चाहत
चाहत से मिलती खुशी, चाहत से सुख धाम।
चाहत से ही जिंदगी, चाहत से यश नाम।।
चाहत से यश नाम, कमाते निस-दिन रहना।
रखना सबसे प्रेम, कभी कटु बोल न कहना।।
मन में रखकर द्वेष, किसी को करो न आहत।
गजानंद सब श्रेष्ठ, सिखाती है यह चाहत।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/11/2024
52. केसरी
वंदन बारंबार है, पवनपुत्र हनुमान।
नमन केसरी लाल को, करूँ सदा गुणगान।।
करूँ सदा गुणगान, सुनो हे! संकट मोचन।
हर लो हर संताप, खोलकर दोनों लोचन।।
करते भक्त पुकार, करो तन-मन को चंदन।
गजानंद कर जोर, तुम्हें नित करता वंदन।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 20/11/2024
53. प्रारब्ध
पाना सुख दुख सत्य है, जीवन का प्रारब्ध।
मानव मन सन्तुष्ट रख, जो भी है उपलब्ध।।
जो भी है उपलब्ध, उसी में खुश नित रहना।
लोभ किये जो लोग, पड़े दुख उसको सहना।।
धन पद मोह शरीर, छोड़ सबको है जाना।
गजानंद कर कर्म, अगर है सुख दिन पाना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/11/2024
54. अभ्यागत
जीवन अभ्यागत सदा, रखना इसका ध्यान।
बनना मनुज महान जग, गीता का है ज्ञान।।
गीता का है ज्ञान, सभी का आदर करना।
द्वेष द्वंद को त्याग, प्रेम जग-जन में भरना।।
दया धर्म उपकार, भरे रखना नित तन-मन।
गजानंद कर कर्म, करो सार्थक यह जीवन।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/11/2024
55. पुस्तक
पढ़कर पुस्तक ज्ञान को, बनते लोग सुजान।
पुस्तक से बढ़कर नहीं, कोई मित्र महान।।
कोई मित्र महान, कहे पुस्तक को गीता।
बिना ज्ञान इंसान, सुनो यह जीवन रीता।।
रहना सदा प्रसन्न, कामयाबी पथ गढ़कर।
गजानंद विद्वान, बना है पुस्तक पढ़कर।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/11/2024
56. रोकें वृक्ष कटाव
तरुवर से है जिंदगी, इसका करें बचाव।
कदम बढायें मिल सभी, रोकें वृक्ष कटाव।।
रोकें वृक्ष कटाव, साथ में वृक्ष लगायें।
जीवन सुख आधार, फूल फल औषध पायें।।
है यह पुत्र समान, पढ़ाये हैं श्री गुरुवर।
गजानंद धर ध्यान, करो तुम रक्षा तरुवर।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 8889747888
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
57. खूब लगाओ पेड़
गर्मी ने ढाया क़हर, धूप बढ़ा विकराल।
लोग तरसते छाँव को, जलते जब तन खाल।।
जलते जब तन खाल, याद तब आती नानी।
वृक्ष दिए हो काट, स्वार्थ में कर मनमानी।।
मानव जाओ चेत, वृक्ष प्रति रख मन नरमी।
खूब लगाओ पेड़, तभी कम होगी गर्मी।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" 8889747888
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
58. नीर
फैला है चारो तरफ, ट्यूबवेल का जाल।
नीर स्रोत भी घट रहा, सूख रहे हैं ताल।।
सूख रहे हैं ताल, नदी जल कुआँ सभी तो।
रहा नहीं परवाह, कष्ट शुरुआत अभी तो।।
जानबूझ इंसान, करो मत जीवन मैला।
गजानंद संदेश, सभी जन को दो फैला।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 22/05/2025
59. मोक्ष
पाने को इंसान तुम, मोक्ष शांति की राह।
नेक कर्म करते रहो, रखकर मन में चाह।।
रखकर मन में चाह, बढ़ाओ पग को अपने।
करिए दृढ़ संकल्प, तभी सच होंगे सपने।।
गजानंद कविराय, छोड़ दो व्यर्थ बहाने।
करते रहो प्रयास, कामयाबी को पाने।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/05/2025
60. नवतपा
तन झुलसाये नवतपा, तप-तप कर दिन रात।
सोच रहें हैं लोग सब, कब होगी बरसात।।
कब होगी बरसात, मिटाये जो तन गर्मी।
जेठ नवतपा आग, उगलता बन बेशर्मी।।
लोग ढूँढते छाँव, नहीं कुछ भी तो भाये।
गर्म हवा लू साथ, नवतपा तन झुलसाये।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 26/05/2025
61- *रोना रोते भाग्य पर*
रोना रोते भाग्य पर, करते कभी न कर्म।
परजीवी कुछ लोग हैं, समझे धर्म न मर्म।।
समझे धर्म न मर्म, ढोंग का स्वांग रचे हैं।
उनके फेंके जाल, कहाँ कब लोग बचे हैं।।
रहना लोग सचेत, पड़े मत धन मन खोना।
सिर्फ लूट है चाल, व्यर्थ है उनका रोना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 23/06/2025

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