गुरु बालक के हे कहना, सुमता बाँधे हे चलना।
जुल्म सितम नइ तो सहना, हक के खातिर हे लड़ना ।।
पग पग बैरी खड़े इहाँ,गिधवा आँखी गड़े इहाँ ।
ताक जमाये हे बइठे, मूँछ दिखावा ला अइठे ।।
धोखा खाये हे पुरखा, पेरे हावय दुख चरखा ।
सतनामी बेटा असली, तोड़य बइरी के पसली ।।
सिधवा बर बड़ हे सिधवा, पर कपटी बर बन बिघवा ।
मार दहाड़ हुँकार करे, छाती मा अंगार भरे ।।
सत्य पुजारी नाम पड़े, कहिथे जेकर काम बड़े ।
मानवता के पाठ पढ़े, तेकर सेती ठाठ बढ़े ।।
संत अमर गुरु सत पहरी, गुन सागर जेकर गहरी ।
ज्ञान लखाये सत दुनिया, भरम मिटा बइगा गुनिया ।।
घासीदास कहे वचना, दूर बुराई ले रहना ।
पर हित काम सदा करना, सत्य बनय सबके गहना ।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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