बहर - बहरे-रमल मुसद्दस महज़ूफ़
वज़्न - 2122--2122--212
अर्कान - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन..
संत घासीदास गुरु सत ज्ञान हे।
धर्म मानवता दिये पहिचान हे।।
सत्य मारग थाम चल मनखे कहे।
मान जग मा तो दया ईमान हे।।
भोग पत्थर मा लगाये झूठ धर।
जान ले घट भीतरी भगवान हे।।
दीन दुखिया के करौ सेवा सदा।
गुरु चरण दाई ददा सुख बरदान हे।।
मेहनत के फल सदा मीठा लगे।
मोह धन पर चीज दुख के खान हे।।
चाटुकारी पर गुलामी छोड़ मन।
सर उठा जी जब तलक ये जान हे।।
नाम जप सतनाम पात्रे रात दिन।
ढोंग जग पाखंड झन दे ध्यान हे।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे *"सत्यबोध"*
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे रमल मुसद्दस महजूफ़
अर्कान- फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
( 2122 2122 212 )
बाँध भाई अब सुमत के डोर ला।
मिल के लाना हे मया के भोर ला।।
देख ताकत हे खड़े दुश्मन इँहा।
मिल भगाना हे सुमत के चोर ला।।
भेद ले के भेद झन देवव कभू।
बात मानौ ये हमेशा मोर ला।।
फूल सुमता के ख़िलाबो मिल चलव।
फेर महकाबो गली अउ खोर ला।।
खोल आँखी तैं बने पहिचान ले।
कोन लूटत हक इहाँ जी तोर ला।
पाटबो डबरा कुमत के अब चलव।
फेर बगराबो मया के शोर ला।।
घोर अँधियारी दिखत हे सत्यबोध।
लान बो चल अब मया अंजोर ला।।
बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 212
आदमी सब ले बड़े गुनवान हे।
भूल बइठे पर अपन पहिचान हे।
जन्मदाता नित नवा निर्माण के
सृष्टि रचनाकार भी इंसान हे।
श्रम लगन से छू बता दै आसमां
कर्म से मनखे बने भगवान हे।
ग्रंथ गुरु साहेब गीता बाइबिल
खोज मनखे हा करिस विज्ञान हे
तंत्र शासन ला घलो मनखे गढ़े
घर गलीचा खेत अउ खलिहान हे।
रेलगाड़ी बस नहर पक्की सड़क
कारखाना भी मनुज वरदान हे।
तोर श्रम पूजा बरोबर हे मनुज
फेर पात्रे बन फिरे अनजान हे।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे रमल मुसद्दस महजूफ़
अर्कान- फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
( 2122 2122 212 )
तोर खातिर मोर जाही जान ओ ।
पर मयारू ले मया पहिचान ओ ।।
जादू नैना ले चलाये तैं गियाँ ।
ये करेजा मा लगे हे बान ओ ।।
होंठ लाली हे गुलाबी पंखुड़ी ।
जान लेथे तोर तो मुस्कान ओ ।।
मोर अंतस बगिया के तैं कोयली ।
बैठ मन के डार छेड़े तान ओ ।।
झन अधूरा प्रीत ये पात्रे रहय ।
माँगबो भगवान से बरदान ओ ।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर
छत्तीसगढ़ी गजल-(2)
(बहर- 2122 1212 22)
मोर तो बस इही निशानी हे।
प्रेम के मीठ रस जुबानी हे।।
भाव समता रखे जिये जाथँव।
देश हित काम बर जवानी हे।।
बन सिपाही खड़े हवँँव मैं तो।
मोर छाती ह जंग ठानी हे।।
देखहीं कोन जी उठा आँखी।
चन्द्रशेखर सहीं तो बानी हे।।
दोगला मन चले धरे पासा।
चाल शकुनी कभू ना आनी हे।।
सोन चिड़िया कहाय भारत हा।
माँ चुनर तोर रंग घानी हे।।
ये गजल ला पढ़व सबो भाई।
दर्द भारत छुपे कहानी हे।।
मैं गजानन्द सेंदरी रहिथँव।
रायपुर मोर राजधानी हे।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (3)
बहर- 2122 1212 22
संत गुरु ज्ञान पाठशाला हे।
सच कहौं जग तभे उजाला हे।।
मान भगवान जी ददा दाई।
पाँव गुरु के इहाँ शिवाला हे।।
देख डॉक्टर नजीर बनगे अउ।
ज्ञान गुरु पाय कोट काला हे।।
लाँघ पर्वत बड़े बड़े डारिन।
चाँद मा पाँव बीर बाला हे।।
नित गजानन्द हा करै विनती।
गुरु के महिमा बड़ा निराला हे।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (4)
(बहर- 2122 1212 22)
पेड़ समता चलव उगाना हे।
फूल सुमता इहाँ खिलाना हे।।
राज परदेशिया चलन झन दव।
लाज मिलके अपन बचाना हे।।
पेड़ पानी जमीन कर रक्षा।
मान छत्तीसगढ़ बढ़ाना हे।।
दूर करबो चलव गरीबी मिल।
दुःख अँधियार ला मिटाना हे।।
पेट खाली रहे हमर झन अब।
रोज हर हाथ काम पाना हे।।
गाँव दिखही शहर चकाचक जी।
काम कुछ नेक कर दिखाना हे।।
कह गजानंद हाथ जोड़े जी।
थाम बइहाँ गिरे उठाना हे।।
छत्तीसगढ़ी गजल - (5)
(बहर- 2122 1212 22)
दाई छत्तीसगढ़ कहौं मइयाँ।
छाँव अँचरा तुँहर रहौं मइयाँ।।
आरती ला सजा सुमन सुमता।
तेल हित दीप भर बरौं मइयाँ।।
पाँव धोवँव महानदी अरपा।
माथ चन्दन धरा भरौं मइयाँ।।
गीत करमा मया सुवा पंथी।
फूल बन ददरिया झरौं मइँया।।
पंच कुंडी गिरौद सत धारा।
कुंभ राजिम नहा तरौं मइयाँ।।
बोल घासी कबीर जग गूँजे।
राम तुलसी बचन धरौं मइयाँ।।
ये गजानंद तोर बन बेटा।
रोज सेवा जतन करौं मइयाँ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (6)
(बहर- 2122 1212 22)
चल करम धाम गाँव पाबो जी।
आम बर नीम छाँव पाबो जी।।
साँस अरझे बिना ददा दाई।
रूप भगवान पाँव पाबो जी।।
मन जराथे हवा शहर के तो।
चल नदी तीर ठाँव पाबो जी।।
मीठ बोली सुनौं सखा संगी।
बचपना खेल दाँव पाबो जी।।
भाव समता उहाँ बसे भारी।
नित शहर भेद घांव पाबो जी।।
कोयली कूहके मया बोली।
पर शहर काँव काँव पाबो जी।।
जान छत्तीसगढ़ उँहे बसथे।
अउ गजानंद नाँव पाबो जी।।
छत्तीसगढ़ी गजल - (7)
(बहर- 2122 1212 22)
सच हा जग मा महान होथे जी।
झूठ के कब बखान होथे जी।।
छल कपट के भरे जमाना मा।
कोन काकर मितान होथे जी।।
मेहनत के चखौ सदा फल ला।
मीठ जइसे जुबान होथे जी।।
पाठ इंसानियत सिखावय जे।
ग्रंथ गीता कुरान होथे जी।।
देश भारत अखण्डता के हे।
सोंच हमला गुमान होथे जी।।
मान छत्तीसगढ़ धरौं मैं हा।
सुन जिहाँ खूब धान होथे जी।।
जान ले सत्यबोध गुरु बाना।
ज्ञान गुरु सब सुजान होथे जी।।
छत्तीसगढ़ी गजल - (8)
(बहर- 2122 1212 22)
दोस्ती मोर बड़ निराला हे।
मैं सुदामा वो नन्द लाला हे।।
मैं गरम चाय केटली भाई।
प्रेम के मीठ वो पियाला हे।।
वो मसीहा गरीब मन बर जी।
मैं पुजारी उही शिवाला हे।।
घोरथे रस मया निरन्तर वो।
मैं दुखी दीन भाग काला हे।।
का कहौं मोर दुख कहानी ला।
हे सखा देख हाथ छाला हे।।
घोर संकट परे सहौं बिपदा।
मोर किस्मत के बंद ताला हे।।
हे गजानन्द दुख बरोबर सुख।
जीत मन के उहाँ उजाला हे।।
छत्तीसगढ़ी गजल-(9)
(बहर- 2122 1212 22)
पाप के आज पाँव बाढ़े हे।
झूठ के आज घांव बाढ़े हे।।
देख धर्मी खड़े धरे माथा।
अब अधर्मी के नाँव बाढ़े हे।।
चील कउँवा भरे इहाँ हामी।
सब डहर काँव काँव बाढ़े हे।।
हे विभीषण विनाश के भाई।
फेर रावण के ठाँव बाढ़े हे।।
का गजानन्द चुप खड़े रहिबे।
चोर चंडाल गाँव बाढ़े हे।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (10)
(बहर- 2122 1122 22)
दुःख मा मीत कहाँ पाबे तँय।
काल ला जीत कहाँ पाबे तँय।।
लोभ के पेड़ दिनों दिन बाढ़त।
त्याग के रीत कहाँ पाबे तँय।।
आज घर गाँव शहर धुँगियागे।
प्रेम मन शीत कहाँ पाबे तँय।।
सुन सकव मीठ मया के बोली।
वो गजल गीत कहाँ पाबे तँय।।
बस गजानन्द पहा ले जिनगी।
साँचा वो प्रीत कहाँ पाबे तँय।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (11)
(बहर- 2122-1212-22)
देश के आज हाल तुम देखव।
नेता के चाल ढाल तुम देखव।।
हे छुपे बन सियार कुछ गीदड़।
दोगला बोलचाल तुम देखव।।
जावथे अब वतन कहाँ यारों।
अंधश्रद्धा कमाल तुम देखव।।
मस्त हें लोग भक्ति पूजा मा।
आँख बाँधे रुमाल तुम देखव।।
हे खवावत पुलाव धोखा के।
हे कहाँ सच सवाल तुम देखव।।
सोन चिड़िया रहिस कभू भारत।
खाली अब पेड़ डाल तुम देखव।।
भेड़िया जातिवाद के पात्रे।
नोंचथे जिस्म खाल तुम देखव।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (12)
(बहर- 2122-1212-22)
बाँध गठरी मया मितानी के।
का भरोसा ये जिंदगानी के।।
काम कब कोंन तोर आ जाही।
मान कहना ल सन्त ज्ञानी के।।
एक दिन छोड़ सब चले जाना।
आसरा मीठ बस जुबानी के।।
काम कर लौ समाज बर भाई।
बात धर गुरु बड़े सियानी के।।
चल गजानंद बाँध सुमता ला।
मोल अनमोल तब जवानी के।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (13)
(बहर- 2122 1212 22)
जागही कब समाज सतनामी।
राखहीं कोन लाज सतनामी।।
मतलबी हे सबो इहाँ भाई।
कोन लाही ग राज सतनामी।।
भांग धतुरा नशा मताये हे।
नींद ले जाग आज सतनामी।।
नाम बदनाम मन जहर होगे।
छोड़ झन सत्यकाज सतनामी।।
मान पुरखा लुटाय बइठे हे।
फेर का बात नाज सतनामी।।
कोलिहा कस हुआँ हुआँ काबर।
शेर बन गिद्ध बाज सतनामी।।
सुन गजानन्द जोर ले सुमता।
बाँध मुड़ फेर ताज सतनामी।।
छत्तीसगढ़ी गजल-(14)
(बहर- 2122 1212 22)
मान पुरखा लुटाय बइठे हे।
बात गुरु के भुलाय बइठे हे।।
ढोंग पाखंड के धरे अँचरा।
माथ बन्दन लगाय बइठे हे।।
ज्ञान धारा बहत अलग बानी।
अंश गुरु के बटाय बइठे हे।।
जाप पथरा लगे बड़ा भावन।
देख घर वो मड़ाय बइठे हे।।
कर गुलामी पसंद परबुधिया।
भेद घर के बताय बइठे हे।।
भोर सुमता कहाँ दिखे ओला
रात पुन्नी बुड़ाय बइठे हे।।
सुन गजानन्द छाँव ला सुमता
पेड़ कुमता उगाय बइठे हे।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (15)
(बहर- 221 1222 221 1222)
ये माटी सही तन के,अभिमान करे मनखे।
हे कोंन अपन दूसर,पहिचान करे मनखे।।
ले बाँट मया जग मा,हे चार पहर जिनगी।
सब छोड़ इहें जाना,नादान करे मनखे।।
बड़ लोभ करे माया,मन बाँध धरे गठरी।
धन जोर इहाँ ख़ुद ला,धनवान करे मनखे।।
मँय बात बतावत हँव,सुन कान करे खुल्ला।
सतकर्म सदा जग मा,बलवान करे मनखे।।
वो नाम कमाथे जी,अउ मान सदा पाथे।
जे सत्य अहिंसा ला,परिधान करे मनखे।।
हे नाश नशा दारू,घर द्वार सबो उजड़े।
सुख शांति खुदे तन ला,शमशान करे मनखे।।
सत जोत जला पात्रे,धर मानवता दीया।
अब कर्म बनय पूजा,गुनगान करे मनखे।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (16)
(बहर- 221 1222 221 1222)
सब पेड़ इहाँ कटगे,अब छाँव कहाँ मिलथे।
बड़ घाम सहे प्रानी,सुख ठाँव कहाँ मिलथे।।
अब बाग बगीचा के,फल फूल सुखागे हे।
छतनार चमेली के,वो नाँव कहाँ मिलथे।।
जब गीत मया गूँजय,हर गाँव गली पारा।
भगवान लगय मनखे,वो पाँव कहाँ मिलथे।।
चौपाल हवय गायब,गय गोठ सियानी हा।
मन मीत जुरे राहय,वो गाँव कहाँ मिलथे।।
परिवार घलो बटगे,अब दूर सगा पात्रे।
जब दर्द मया राहय,वो घाँव कहाँ मिलथे।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (18)
(बहर- 122 122 122 122)
करव काम नेकी तभे नाम होही।
नवा भोर आही सुमत शाम होही।।
रहय भेद ना तोर अउ मोर के जी।
चरन माँ पिता के जिहाँ धाम होही।।
मया मोह के सब धरे हे धुरी ला।
बता लोभ के तँय कतक दाम होही।।
करव रूप के ना कभू जी गुमानी।
चिता राख जइसे इही चाम होही।।
जमाना रखय याद हमला हमेशा।
गजानन्द जब तोर सतकाम होही।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (20)
(बहर-2122 2122 2122 212)
आज हक सम्मान लुटगे अउ सबो अधिकार हा।
देख खेती खार लुटगे अउ सजे घर द्वार हा।।
कारखाना नौकरी मा सब जगह परदेशिया।
तोर हिस्सा मा लिखाये घोर दुख अँधियार हा।।
तोर रग मा घोर दिस दारू नशा विषपान ला
रात दिन अउ चौगुनी बाढ़े इँखर व्यापार हा।।
हाल शिक्षा का बतावँव सुन बड़ा बेहाल हे।
पाठशाला ला चलावत आज चौकीदार हा।।
देख पात्रे हाल ला छत्तीसगढ़िया के इहाँ।
छोड़ दिस बंजर बना अब नार खरपतवार हा।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (21)
(बहर- 122 122 122 122)
सही का गलत तँय बने जान ले ना।
अपन कोंन पर कोंन पहिचान ले ना।।
बँधाये मया फाँस पर के दुवारी।
तबत कुरु कबूतर तहूँ मान ले ना।।
उड़ा ले मजा छोड़ चिंता फिकर ला।
धरे मीठ बोली जियाँ चान ले ना।।
भरे दुख कहाँ नींद आथे बता दे।
बिछौना बरोबर तहूँ तान ले ना।।
गजानंद बगुला भगत झन बने रह।
जहर बात मा हे घुले छान लें ना।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (22)
(बहर- 122 122 122 122)
दे जा रे मयारू निशानी मया के।
अमर हो जही रे कहानी मया के।।
अधूरा लगे हे बिना तोर जिनगी।
कहाँ भूल पाहूँ जवानी मया के।।
बसे मोर मन अउ लहू मा समा के।
लुकागे कहाँ रे दिवानी मया के।।
सजे नैन सपना मिलन के अगोरा।
बुझा आग आ के सुहानी मया के।।
गजानंद तँय तो हवच बड़ अभागा।
करम मा लिखे हे चुहानी मया के।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (23)
(बहर- 1222 1222 122)
मया के बात मँय कइसे बतावँव।
हे जुल्मी रात मँय कइसे बतावँव।।
का मजबूरी खड़े हमरो मिलन मा।
जियाँ के हाल मँय कइसे सुनावँव।।
बसे जा दूर संगी तँय छोड़ मोला।
लगे तन आग मँय कइसे बुझावँव।।
हे बिरथा मोर सजना सँवरना सब।
अभागन मांग मँय कइसे सजावँव।।
अजब हे खेल पात्रे सुन विधाता।
विरह के घाँव मँय कइसे मिटावँव।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (24)
(बहर- 1222 1222 1222)
गँवागे गाँव घर परिवार भाई रे।
उजरगे देख सुमता नार भाई रे।।
लड़त हे भाई भाई खेत बारी बर।
बँटागे देख अब कोठार भाई रे।।
दतावत हे धरे कहना सुवारी के।
गला माँ बाप के तलवार भाई रे।।
जुआ दारू नशा मा नाश धन होगे।
बचे का चीज के रखवार भाई रे।।
शहर ला छोड़ आजा गाँव मा पात्रे।
बुलावत हे मया घर द्वार भाई रे।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (25)
(बहर- 221 2122 221 2122)
परदेशिया बने हे,राजा इहाँ तो भाई।
खावत चुपे छुपे उन,खाजा इहाँ तो भाई।।
का नौकरी कहँव मैं,अउ कोन कारखाना।
चमचा बने बजावत,बाजा इहाँ तो भाई।।
छत्तीसगढ़ कहाँ अब,तँय देख ना गँवागे।
हे बंद अब हमर दरवाजा इहाँ तो भाई।।
हम ला सदा लड़ावय,इन जाति धर्म ले के।
देवत सदा जखम ला,ताजा इहाँ तो भाई।।
सुन सत्यबोध हम तो,हो गेन पेड़ बमरी।
अउ उन बने हवय बर,साजा इहाँ तो भाई।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (26)
(बहर - 221 2122 221 2122)
भगवान कोन बड़का,अउ छोटका बता दे।
जादू सही गलत हे,का टोटका बता दे।।
होये अजर अमर जग,कोई नही इहाँ जी।
का प्रेत भूत होथे,मन खोट का बता दे।।
तन बुलबुला भरे हे,पानी सहीं सुनव जी।
झन सोंच तँय जियादा,मन फोटका बता दे।।
माटी समान तन के,झन कर कभू गुमाना।
कब संग मा चले हे,धन नोट का बता दे।।
सुन सत्यबोध तँय तो,बलवान बन लड़े जी।
कमजोर कोन हे अउ,चल मोटका बता दे।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (27)
(बहर- 221 1222 221 1222)
मिल मान बढ़ाना हे,ये शान तिरंगा के।
चल माथ उठा करबो,सम्मान तिरंगा के।।
झन आँख उठा बैरी,हे जोश भरे बाजू।
सर काट मढ़ा देबो,बन जान तिरंगा के।।
नइ लोग भुला पावय,उन वीर शहादत ला।
जे देश धरम होगे,बलिदान तिरंगा के।।
का सीख इसाई अउ,का हिन्द इहाँ मुस्लिम।
सब एक बरोबर हे,पहिचान तिरंगा के।।
हे आज अजादी के,ये पर्व बड़ा भावन।
गा गीत मया पात्रे,यशगान तिरंगा के।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (28)
(बहर- 221 1222 221 1222)
माँ आज सबो ला दे,बरदान मिनीमाता।
मैं जोत जलावत हँव,सम्मान मिनीमाता।।1
माँ देश म नारी के,नित मान बढ़ाइस हे।
खुद सत्य अहिंसा के,पहिचान मिनीमाता।।2
माँ भूख गरीबी ला,बड़ दूर भगाइस हे।
बन दीन गरीबी के,भगवान मिनीमाता।।3
माँ बाँध बना बांगो,जन प्यास बुझाइस हे।
छत्तीसगढ़ी सुख के,खलिहान मिनीमाता।।4
माँ छोड़ कहाँ चल दे,मन दुःख भरे पात्रे।
अब याद सदा रइही,कुरबान मिनीमाता।।5
छत्तीसगढ़ी गजल- (29)
(बहर- 221 1222 221 1222)
अब लोग भुलागे हे,माँ तोर कहानी ला।
सत सत्य अहिंसा के,माँ तोर जुबानी ला।।1
जग रूप धरे ममता,माँ मोर मिनीमाता।
जे दाँव लगा दिस जी,सत राह जवानी ला।।2
बस झूठ हवै माया,अउ लोभ भरे रस्ता।
अब कोन धरे चलथे,माँ बात सियानी ला।।3
माँ मानवता के जी,जग पाठ पढाइस हे।
सब साथ चलौ धर के,सतनाम निशानी ला।।4
जन भूख हरिस माता,नव बाँध बना बांगो।
ये बात बता पात्रे,अब लोग नदानी ला।।5
छत्तीसगढ़ी गजल- (30)
(बहर - 221 1222 221 1222)
का तोर हवय जग मा,का मोर सगा जग मा।
सब देत इहाँ धोखा,बन चोर सगा जग मा।
दिन रात जपे माला,धन मोह भरे भारी।
सब छोड़ इहाँ जाबे,मन जोर सगा जग मा।।
तैं गीत मया गाये,हरि नाम भुलाये जी।
सब छूट जही साथी,सुध डोर सगा जग मा।।
जग प्रेम धरे चल ले,अउ बोल सदा मीठा।
नव पेड़ लगा सुमता,फल टोर सगा जग मा।।
ना धर्म बड़े जग मा,बस कर्म कहे पात्रे।
झन झूठ बसा हिरदे,झकझोर सगा जग मा।।
बहर - 122, 122, 122 (31)
मया गीत बोली नँदागे ।
बबा के ठिठोली नँदागे ।।
बँटागे ददा दाई तक हा ।
बुआ छोर ओली नँदागे ।।
दिखे आज परिवार बेघर ।
सुमत खोर खोली नँदागे ।।
कहाँ बाँचगे फ़ाग सुंता ।
रसे रंग होली नँदागे ।
कहाँ आज पात्रे मयारू ।
बँधे प्रेम चोली नँदागे ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (32)
बहर - 122, 122, 122
कहाँ बाँचगे राज तोरे ।
लुटागे सबो ताज तोरे ।।
घुसे चोर परदेशिया बन ।
छिनागे सबो काज तोरे ।।
करे चाटुकारी फिरत हे ।
अपन हे दगाबाज तोरे ।।
बता कोंन अब राखही जी ।
बचे मान अउ लाज तोरे ।।
कहे बात पात्रे सुनौ जी ।
बचा घर इहाँ आज तोरे ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (33)
बहर - 122, 122, 122
दिखे रात तारा चकाचक ।
दिखे खोर पारा चकाचक ।।
उगे हे सुमत भोर अब तो ।
दिखे घर बियारा चकाचक ।।
चकोरी मया गीत गाये ।
हे चंदा दुलारा चकाचक ।।
उठे नाच अब मोरनी हा ।
बसंती नजारा चकाचक ।।
गजानंद आसा धरे चल ।
बहे प्रेम धारा चकाचक ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (34)
बहर- 122, 122, 122
ये तन के गुमानी करे तँय ।
इही तो नदानी करे तँय ।।
उड़ा ये जही बनके पंछी ।
लबारी मितानी करे तँय ।।
फँसे मोह माया डगर मा ।
कहाँ ले सियानी करे तँय ।।
करे हाय दिन रात धन बर ।
कमा तन ला पानी करे तँय ।।
सबो छोड़ जाना इँहे हे ।
कहाँ सेवा दानी करे तँय ।।
गये भूल तैं मीठ बोली ।
बँधे प्रीत चानी करे तँय ।।
गजानंद महकय दुवारी ।
मया बागवानी करे तँय ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (35)
बहर- 122, 122, 122
धरम ला बड़े मान बइठे ।
भरम थाम इंसान बइठे ।।
बिना मेहनत दूर सुख हे ।
करम के कदरदान बइठे ।।
कहाँ ढूँढथस बावला बन ।
हृदय द्वार भगवान बइठे ।।
मिले ना दुबारा ग मउका ।
समय घेर तूफान बइठे ।।
सहीं के पुछारी कहाँ हे ।
गलत संग मलखान बइठे ।।
लड़ौ जंग अधिकार खातिर ।
दिये न्याय सँविधान बइठे ।।
दशा देख अब तो गरीबी ।
करेजा दरद चान बइठे ।।
बढ़े खूब बेरोजगारी ।
युवा पीढ़ी हैरान बइठे ।।
भगाये गरीबी लचारी ।
गजानंद मन ठान बइठे ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (36)
बहर- 122 122 122 122
(बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन)
हवे धन्य छत्तीसगढ़ राज मइँया ।
परौं पाँव तोरे महूँ आज मइँया ।।
सबो ला दुलारे अपन गोद राखे ।
रखे छाँव अँचरा मया साज मइँया ।।
जिहाँ संत घासी कबीरा के बानी ।
रखे राम शबरी जिहाँ लाज मइँया ।।
चना धान गेहूँ उगे तिंवरा अउ ।
किसानी हमर देश के नाज मइँया ।।
गजानंद पुरखा के बाना धरे चल ।
बँधे फेर छत्तीसगढ़ ताज मइँया ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (37)
बहर- 122 122 122 122
धरे ज्ञान चलिहौं सदा सार गुरु के ।
कहाँ भूल पाहूँ मैं उपकार गुरु के ।।
कहे वेद गीता जिहाँ सन्त मुनि हे ।
सबो नाम भगवान बलिहार गुरु के ।।
बुराई मिटावय सहीं राह देवय।
जले जोत सतज्ञान दरबार गुरु के ।।
चले रीत ये शिष्य गुरु के सदा ही ।
सबो ला मिले छाँव फलदार गुरु के ।।
गजानंद पात्रे करे कामना जी ।
सलामत रहे छंद परिवार गुरु के ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (38)
बहर- 122 122 122 122
बहरे मुतकारिब मुसमन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
इँहा झूठा मनखे के सब काम होगे ।
चले सत्य मारग वो बदनाम होगे ।।
धरे भेष रावण दिखे कंस शकुनी ।
अछप राम बलदाऊ घनश्याम होगे ।।
फिरे आज परलोकिहा दोगला मन ।
तभे आज सुख बेरा दुख घाम होगे ।।
जगाये चलौ भाग छत्तीसगढ़ के ।
हमर मेहनत फोकला दाम होगे ।।
कहाँ मान हे सन्त ज्ञानी बबा के ।
धरम मा बँटे देव के धाम होगे ।।
दगाबाज आये नहीं करके वादा ।
डहर तोर जोहत सुबे शाम होगे ।।
गजानंद विश्वास आशा धरिस हे ।
तभे आज मशहूर ये नाम होगे ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (39)
बहर- 122 122 122 122
सिपाही दरोगा हवलदार बनगे ।
धरे जोत शिक्षा कलमकार बनगे ।।
बने कोई इंजीनियर कोई डाक्टर ।
इहाँ शिक्षा के पाना अधिकार बनगे ।।
पढ़े नोनी बाबू कका अउ बबा मन ।
घरो घर दिखे सभ्य परिवार बनगे ।।
दिखे जेब मा आज सुग्घर कलम हा ।
रहिस जेन अनपढ़ समझदार बनगे ।।
गजानंद शिक्षा अलख चल जगाबो ।
हमर आज ये शिक्षा संस्कार बनगे ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (40)
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
बिना मान देये कहाँ मान पाबे ।
बिना गुरु लखाये कहाँ ज्ञान पाबे ।।
समाये रही द्वेष मन भीतरी ता ।
सुमत भोर ला तैं कहाँ लान पाबे ।।
शरण धाम चारो ददा दाई गुरु के ।
जपे देव पथरा कहाँ ध्यान पाबे ।।
धरे राह तैं झूठ के तो कहूँ जी ।
बता फेर सीना कहाँ तान पाबे ।।
करौ दीन दुखिया के सेवा सदा जी ।
बड़े येखरे ले कहाँ दान पाबे ।।
धरे राह संगत बुराई चले तँय ।
भलाई मरम ला कहाँ जान पाबे ।।
गजानंद जग आज अँधरा बने हे ।
वचन सत्य खातिर कहाँ ठान पाबे ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (41)
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
सुनौ बात संगी नशा नाश होथे ।
धरे साथ जे मौत के दास होथे ।।
बड़ा नीक लागे शुरू मंद दारू ।
इही बाद मा तो गला फाँस होथे ।।
पिये बेच दारू सकेले कमाई ।
इहाँ भूख परिवार उपवास होथे ।।
मिलाये नजर ना सके फेर सबसे ।
लुटे मान सम्मान उपहास होथे ।।
जरे बुद्धि काया करे खोखला तन ।
नशेड़ी तो मनखे जियत लाश होथे ।।
बुराई के जड़ बड़ भरे हे नशा मा ।
लड़ाई मचे घोर उदबास होथे ।।
गजानन्द पात्रे नशा दूर रहिबे ।
बड़ा कीमती जिंदगी सांस होथे ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (42)
बहर- 122 122 122 122
जपौं नाम सतनाम गुरु सन्त घासी ।
बड़े तोर सत धाम गुरु सन्त घासी ।।
धजा सेत हे सत्य पथ के निशानी ।
गड़ाये तहीं खाम गुरु सन्त घासी ।।
सहारा बनौ आप दुख दूर करिहौ ।
मिले छाँव आराम गुरु सन्त घासी ।।
बढ़े पाँव सत बर बढ़ाये निशानी ।
उठे हाथ सत काम गुरु सन्त घासी ।।
खिले फूल सुमता शहर गाँव पात्रे ।
तभे सांस के दाम गुरु सन्त घासी ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (43)
बहरे मुतकारीब मुसमन सालिब
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
(अरकान- 122 122 122 122)
बिना भाव कविता गजल अब बनत हे ।
तभो मंच मा वाहवाही मिलत हे ।।
सकेले महल बंगला कार गाड़ी ।
तभो आज इंसान भूखा दिखत हे ।।
विषम आपदा देश मा मंडराये ।
तभो ले जमाखोर धंधा सजत हे ।।
सुखद राज के सपना होगे दुभर जी ।
कहाँ शांति सुख के सबेरा उगत हे ।।
लगाये नहीं पेड़ छइँहा रखे बर ।
लगे पेड़ मा टँगिया आरी दतत हे ।।
खवाये नहीं कौर माँ बाप जीयत ।
मरे मा बड़ा दान पिंडा करत हे ।।
गजानंद पात्रे धरे राह सच के ।
कहे बात खर्रा कहाँ वो हटत हे ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (45)
( बहर- 2122 2122 2122 )
बाँध लेना आ मया के डोर जोही ।
का भरोसा जिंदगी के मोर जोही ।।
अन्न पानी नइ सुहावय का बतावौं ।
नीक लागे नइ गली घर खोर जोही ।।
आँखी आँखी झूलथे तोरेच बैना ।
तैं चुराये नींद बनके चोर जोही ।।
मीठ बोली तोर मैना अउ सुवा कस ।
बड़ जुवानी के उड़त हे शोर जोही ।।
बान मारे तोर नयना ओ कटारी ।
आँजे काजर ला तैं आँखी कोर जोही ।।
तैं चकोरी मोर चंदा रात रानी ।
मैं पपीहा मैं सुरुज अँव तोर जोही ।।
बाँध राखे हे मया ला ये गजानंद ।
छोड़ जाबे झन कहूं दिल टोर जोही ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (46)
बहर- 1212- 1212- 1212- 1212
परे हवौं चरण बबा बने हवौं मैं दास जी ।
कृपा करौ दयानिधी रखे हवौं मन आस जी ।।
जले सुमत के दीप गुरु शहर गली सबो जगह ।
मिटे कुलुप ये अंधियार गुरु करौ कुमत के नाश जी ।।
हवौं पुजारी आपके करौ अँजोर आप मन ।
जपौं सदा मैं नाम गुरु बसौ सदा ये साँस जी ।।
भुला कभू माँ बाप ला कहाँ खुशी संतान हे ।
बड़े जगत मा नाम गुरु करे हृदय उजास जी ।
धरे चलौ जी सत्यबोध के मया दया के राह ला ।
इही असल हे जिंदगी भरौ जगत प्रकाश जी ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (47)
अरकान- 212 212 212
संतो सतनाम के जाप कर ।
दिन सुबो शाम आलाप कर ।।
छोड़ दे तैं मया मोह ला ।
कर्म साँचा चुपेचाप कर ।।
तज असत के धरे राह ला ।
नाम रोशन तैं माँ बाप कर ।।
मोल अनमोल हे जिंदगी ।
बेवजह झन तैं संताप कर ।।
गुरु शरण मा गजानंद हे ।
हे दयालू कृपा आप कर ।।
छत्तीसगढ़ी गजलध- (48)
बहर- 212 212 212 212
आरती तोर गुरुवर सुबह शाम के ।
रोज सुमिरन करौं सत्य सतनाम के ।।
ज्ञान के जोत मन भीतरी मा जला ।
पार भवपार हो नाव गुरु थाम के ।।
सादा चंदन बने मान पहिचान जग ।
सेत फहरे धजा जोड़ा सत खाम के ।।
बोल मीठा सबो ले मया बाँध चल ।
फेर जिनगी बना ले सहीं काम के ।।
अब गजानंद के मान ले बात ला ।
का भरोसा इही फोकटे चाम के ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (49)
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
बहर -122 122 122 12
बसा ले हृदय द्वार सतनाम ला ।
बढ़ा पाँव कर ले भला काम ला ।।
दिये संत गुरु घासी संदेश जग ।
गड़ा जोड़ा खंभा विजय खाम ला ।।
भजन भाव गुरु के करौ संत हो ।
बना आस गुरु के जनम धाम ला ।।
मिले सांस ये तो उधारी सगा ।
बढ़ा जा अपन तैं करम दाम ला ।।
गजानन्द सुमता मिले छाँव सब ।
लगा पेड़ बर नीम अउ आम ला ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (50)
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
( 122 122 122 12 )
कहाँ मोर छत्तीसगढ़ राज हा ।
नँदागे हवे देख सुमत साज हा ।।
परे खेत परिया सुखागे कुआँ ।
अकाली किसानी गिरे गाज हा ।।
बिछे जाल हे कारखाना बड़े ।
छिनागे हमर श्रम धरे काज हा ।।
बड़ा नीक लागे ददरिया मया ।
सुआ ताल पंथी के अंदाज हा ।।
नवा रोज फैशन जमाना दिखे ।
अपन ले बड़े के कहाँ लाज हा ।।
कुमत चाल परदेशिया मन चले ।
छिनागे हमर सुमता के ताज हा ।।
गढ़ौ राह कल बर गजानंद अब ।
कहाँ हे सुरक्षित हमर आज हा ।।
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक्सूर
फ़ऊलन फ़ऊलन फ़ऊलन फ़अल
122 122 122 12
रखौ जोर सुंता ला परिवार मा।
मया बाँट लौ भाई संसार मा।।
उड़े पिंजरा ले सुआ जेन दिन।
दुबारा कहाँ आय हे द्वार मा।।
लड़े जा लड़ाई खुदे हक लिये।
बिके मान झन झूठ बाजार मा।।
बड़े आदमी के सजे हे महल।
जिये छोट मनखे तो अँधियार मा।।
गढ़े जा कहानी जवानी सुघर।
दिखे रूप जिनगी असरदार मा।।
किसानी हमर मान पहिचान हे।
बसे प्रान हे खेत मन खार मा।।
गजानंद बिरवा लगा ले सुमत।
खिले फूल समता सुखी डार मा।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक्सूर
फ़ऊलन फ़ऊलन फ़ऊलन फ़अल
122 122 122 12
दिनों दिन बढ़त अंधविश्वास हे।
बने लोग मँय वश इँहा दास हे।।
बढ़े ढ़ोंग पाखण्ड हा तो बहुत।
बसे झूठ मन मा बड़ा आस हे।।
सिपाही कलम के बने खाक तैं।
कहूँ चाटुकारी ह्रदय वास हे।।
बँधे पाँव जंजीर जब दासता।
वो मनखे तो जी के भी लाश हे।।
रखे लालसा चीज पद के कहूँ।
समझ ले मनुज के सबो नाश हे।।
रहव दूर चोरी नशा पान ला।
उजाड़े खुशी घर जुआ तास हे।।
गजानंद सच बात ला तो कहय।
दिलाथे धरे झूठ उपहास हे।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
छत्तीसगढ़ी गजल- (51)
बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिम
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212 212 212
मान छत्तीसगढ़ के करौ ।
दू कदम आगू बढ़ के करौ ।।
देश हित जान पुरखा दिये ।
याद इतिहास पढ़ के करौ ।।
झन करौ जी हुजूरी कभू ।
ज्ञान के बात कढ़ के करौ ।।
नइ मिले माँगे अधिकार हा ।
जंग तब न्याय चढ़ के करौ ।।
सुन गजानंद तँय प्रेम मा ।
दाग ना दोष मढ़ के करौ ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (52)
बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिम
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( 212 212 212 )
दुख बिधाता लिखे भाग मा ।
मैं जरत हँव विरह आग मा ।।
कोयली छेड़थे तान अब ।
मन बँधा प्रेम के राग मा ।।
मैं दिवानी बने तोर हँव ।
रंग लौं तन मया दाग मा ।।
कोंन रक्षा करे रे कली ।
फूल मुरझा गये बाग मा ।।
ले बराती चले आ गियाँ ।
भर दे सिंदूर ला मांग मा ।।
छत्तीसगढ़ी गजल- (53)
*बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर*
*फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा*
*212 212 212 2*
मान देबे तभे मान पाबे ।
का दया ले बड़े दान पाबे ।।
ढोंग पाखंड मा डूबे दुनिया ।
लोभ मन थामे इंसान पाबे ।।
मान सम्मान हक दे बरोबर ।
ग्रन्थ बड़का वो सँविधान पाबे ।।
गाँव गरुवा घलो अब नँदागे ।
अब कहाँ कोठा दइहान पाबे ।।
ज्ञान शिक्षा धरे दीप जोती ।
नइ बड़े गुरु ले भगवान पाबे ।।
बोल कर्कश कउँवा जुबानी ।
अब कहाँ कोयली तान पाबे ।।
नित गजानंद बाँटव मया ला ।
तब तहूँ जग मा पहिचान पाबे ।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
छत्तीसगढ़ी गजल- (54)
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़जू आखिर
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा
212 212 212 2
मोर छत्तीसगढ़ राज हावय ।
सोनहा धान के ताज हावय ।।
टोर जाँगर कमा ले तहूँ हा ।
मेहनत ले सजे साज हावय ।।
खून पानी समाये कभू झन ।
जान ले तोर का लाज हावय ।।
आदमी आदमी के हे दुश्मन ।
ये जमाना दगाबाज हावय ।।
छोड़ कल के तैं चिंता फिकर ला ।
जी ले जिनगानी जे आज हावय ।।
हे बताये सबो धर्म गुरु मन ।
नेक इंसानियत काज हावय ।।
मैं गजानंद माथा नवावँव ।
मोर गुरु मोर बर नाज हावय ।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आख़िर*
*फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा*
*212 212 212 2*
बाँट लेबे मया मोर संगी।
मान होही तभे तोर संगी।।
छोड़ देना गरब अउ गुमानी।
नइ चले मौत मा जोर संगी।।
चार दिन के जवानी सबो के।
फिर बुढ़ापा करे शोर संगी।।
भोर सुमता उगे गाँव घर मा।
कर उजाला गली खोर संगी।।
हे गजानंद जग प्रेम भूखा।
मीठ मधुरस मया घोर संगी।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)21/07/2021
छत्तीसगढ़ी गजल- (55)
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222
ददा दाई हवे जब तक तभे जग मा पुछारी हे ।
मया धन मोह बिरथा जान ले सब ये लबारी हे ।।
भरोसा छोड़ ये तन सांस के कुछ संग नइ जावय ।
चले जाथे करम बस संग मा बन सत सवारी हे ।।
लगा ले पेड़ तैं दू चार अँगना खेत बारी मा ।
कटावत रोज सुख छइँहा धरे छूरी कटारी हे ।।
बचे ना खेत घर डोली सबो धन नाश कर डारे ।
जुआ दारू नशा मा आज नाचत बन मदारी हे ।।
करत हे राज ला परदेशिया मन तो इहाँ देखव ।
हमर छत्तीसगढ़िहा भाग मा नाँगर तुतारी हे ।।
बुढ़ापा मा कभू झन छोड़हू दाई ददा ला तुम ।
चुका लौ दूध के करजा बचे माँ के उधारी हे ।।
सुना जा मीठ बोली प्रेम के धर राग ला पात्रे ।
मया ले का कभू दौलत महल बड़का अटारी हे ।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
छत्तीसगढ़ी गजल- (56)
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222
बिना देखे मयारू ला करौं कइसे गुजारा मैं ।
नदी तैं मोर अंतस के मया के हँव किनारा मैं ।।
पिरोही तोर सुरता हा सताये रात दिन मोला ।
झलक बस एक पाये बर फिरत हँव तोर पारा मैं ।।
बँधा जा प्रेम के बँधना लगे ना दाम कौड़ी ओ ।
समझ लेना मया ला मोर देवत हँव इशारा मैं ।।
कभू झन छोडबे तैं संग मर जाहूँ मतौना रे ।
बसा ले तोर अँचरा छोर रइहूँ बन सहारा मैं ।।
अमर कर दे मया ला मोर पात्रे हे कहत तोला ।
तहीं बनबे सफर जिनगी जनम पावँव दुबारा मैं ।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222
उठा ले पाँव नेकी बर जहां मा नाम हो जाही ।
जतन माँ बाप के कर ले इँहे प्रभु धाम हो जाही ।।
सियासत देश के तो आज बिगड़े हे बहुत प्यारे ।
कहूँ तैं बोलबे सच न्याय कत्लेआम हो जाही ।।
बढ़े हे खूब महँगाई बता कइसे चलाबो घर ।
लगत हे धान ले ज्यादा सबो के दाम हो जाही ।।
धरे टँगिया तहूँ हा रोज काटत पेड़ काबर हस ।
सुवारथ आज के ये तोर कल दुख घाम हो जाही ।।
सबो ला नौकरी चाही इँहा बस आज सरकारी ।
बढ़त बेरोजगारी मा युवा नाकाम हो जाही ।।
बिता ले चार पल हँसके मया परिवार मा तैं तो ।
फिकर चिंता करे ला छोड़ जिनगी जाम हो जाही ।।
बराबर एक सब ला मान पात्रे हे कहत सुन लौ ।
तहाँ सब सिक्ख ईसाई सबो गुरु राम हो जाही ।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध "
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे हजज़ मुसमान सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222
समय के साथ जे चलथे उही बलवान होथे जी ।
धरम के बात जे करथे उही इनसान होथे जी ।।
नदी सागर सहीं रख भाव हिरदे मा सँजो के तैं ।
दुखी के दुख हरइया हा बड़े भगवान होथे जी ।।
भला कब कोंन सकही छिन बँधाये भाग गठरी ला ।
करम पूजा करे हे जे उही धनवान होथे जी ।।
चलौ सच थाम जिनगी मा सदा जग मान पाहू ना ।
बता दौ झूठ के कब का सही परमान होथे जी ।।
जियादा के धरे लालच सुनौ बरबाद करथे सब ।
पड़े हे लोभ जे फाँसा बहुत हलकान होथे जी ।।
रमा ले ध्यान गुरु के नाम ये जिनगी सुखद होही ।
बटोही प्रेम के बन जा सदा गुनगान होथे जी ।।
गरब ला छोड़ दे तन चीज के पात्रे तहूँ हा अब ।
चले जाना हवे सब छोड़ जग शमशान होथे जी ।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे मुतदारीम मुसम्मन सालिम
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212 212 212 212
ये तिरंगा हमर मान अभिमान हे।
एकता मा बँधे देश पहिचान हे।।
हे सिपाही खड़े तान के तो भुजा।
देश खातिर करे प्रान कुरबान हे।।
जय जवान-ए किसान-ए सदा हो विजय।
तोर जजबा बढ़े हिन्द के शान हे।।
सोन चिड़िया हवे मोर ये देश हा।
लहलहावत दिखे खेत मा धान हे।।
माथ पात्रे नवा के करत हे नमन।
देश रक्षा करे सर्व बलिदान हे।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे मुतदारीम मुसम्मन सालिम
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212 212 212 212
रात मा चाँदनी खूब चमकत हवे।
भोर सूरज धरे आग दहकत हवे।।
सुन ले ज्यादा मया जाथे बन तो सजा।
छाय बादर सही खूब कड़कत हवे।।
आजा परदेश ले लौट के तैं पिया।
कर अगोरा दुनों आँख फरकत हवे।।
पालबे जेन ला चार कौंरा खिला।
बाद बनके उही साँप लहुकत हवे।।
गाँव ले जोड़ लिन छाँव नाता चलौ।
खेत नरवा नदी प्रेम छलकत हवे।।
जोत शिक्षा जला नोनी बाबू पढ़ा।
फूल बगिया सहीं ज्ञान महकत हवे।।
पेड़ समता उगे मन गजानंद के।
छाँव बइठे सबो आज चहकत हवे।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212 212 212 212
मान इज्जत कमा राख ईमान ला।
झन गँवाबे कमाये तैं पहिचान ला।।
फूल जइसे महक ख़ुश्बू सच धरे।
झूठ फाँसी बरोबर लिये जान ला।।
छाँव सब ला मिले प्रेम बिरवा लगा।
गोठ मधुरस घुरे बोल इंसान ला।।
घट दुवारी बसे फेर भटके मनुज।
चर्च मंदिर तलाशे वो भगवान ला।।
पाठ मानवता पढ़ राख इंसानियत।
बाँट ले दीन दुखिया दया दान ला।।
देश सेवा बड़े जइसे माता पिता।
बेटा बनके सच्चा बढ़ा शान ला।।
सुन गजानंद तैं झन भुलाबे कभू।
जन्म भुइँया अपन खेत खलिहान ला।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
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212 212 212 212
घासी बाबा कहे प्रेम गुरु धाम हे।
झूठ बदनाम हे सच हा सत काम हे।।
तैं बड़े आदमी मोर दुख दिन कटे।
चल बता दे तहीं जिनगी का दाम हे।।
लोभ काया धरे मोह माया फँसे।
फोकटे तोर दौलत ये तन चाम हे।।
कोंन करही भला सत सत्कार ला।
झूठ के राह मा एशो आराम हे।।
हे गजानंद अब सोंच मा तो परे।
सत करम छाँव मा आज दुख घाम हे।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे मुतदारीम मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212
मोहनी रे मया जोर मारे गियाँ।
का करौं का बता जादू डारे गियाँ।।
रात सुरता मा तो नींद आवय नहीं।
नैन हा बिन मिलन आँसू ढारे गियाँ।।
घोर घनघोर बरसात कर के मया।
आग सावन जिया मा बारे गियाँ।।
तैं चुहानी ता मैं तो झिपारी हरौं।
चूह जा मोर मन के दुवारे गियाँ।।
ले गजानंद ला छाँव अँचरा तरी।
मोर सपना के रानी निहारे गियाँ।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212
ला बिसा के मया प्रेम के हाट ले।
बाँट नफरत नही लोभ के घाट ले।।
ज्ञान के बात बोलै सदा लेखनी।
न्याय स्याही भरे सत्य के बाट ले।।
चार दिन के जवानी पहा सुख धरे।
फिर बुढ़ापा पहाये हे दुख खाट ले।।
प्रेम बिरवा लगा छाँव सुख जन मिले।
काँटा कुमता गढ़े पाँव ना काट ले।।
एक मनखे सबो एक हे तो लहू।
भेद खाई बढ़े रात दिन पाट ले।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212
साथ छूटय कभू झन इही आस हे।
मोर अंतस बसे तोर विश्वास हे।।
मान कहना सियानी भलाई तभे।
झूठ के राह जिनगी करे नाश हे।।
सोंच पाये नही का सही का गलत।
बुद्धि रहिके मनुज अब बने दास हे।।
छोड़ देना नशा नाश के द्वार ला।
करथे बरबाद घर ला जुआ ताश हे।।
जान ले गाँव परिवार के मोल ला।
प्रेम डोरी बँधे सब मया खास हे।।
थाम सच ला चलौ संत कहना इही।
ज्ञान गुरु के धरे मन मिटे प्यास हे।।
सुन गजानंद जी हे जमाना बुरा।
नोंच खाथे सुवारथ मा तन लाश हे।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला
मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
1212 212 122 1212 212 122
इँहे सरग अउ नरक इँहे हे, अपन बने तैं करम करे जा।
हँसी खुशी से बिता ले जिनगी, दया धरे मन धरम करे जा।।
मजा उड़ा ले जिया जुड़ा ले, लहुट दुबारा समय न आये।
हवय इहाँ मतलबी जमाना, मिले मरम,झन भरम करे जा।।
उठा कदम अउ बढ़े चले जा, कहाँ मिले हे बिना लड़े कुछ।
मिलय कभू झन डगर निराशा, लहू जिगर ला गरम करे जा।।
बड़ा सुहाथे नजर सबो के, कदर करे जे मया के बोली।
गड़े कभू फाँस बन इही हा, कड़क जुबानी लरम करे जा।।
पड़य कभू झन नजर छुपाना, कहत हवे गोठ नेक पात्रे।
कभू न जीना करे गुलामी, करे कभू ता शरम करे जा।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला
मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
1212 212 122 1212 212 122
खड़े कहाँ देश आज देखव, फकीर हाथो गुलाम होगे।
विकास के बात भूल जा तैं, गरीब के वोट आम होगे।।
नदी कुँआ सब परे हे सुक्खा, नहर दिखत हे तको पियासा।
कटत हवय रोज पेड़ छइँहा, डगर डगर दुःख घाम होगे।।
करय गुलामी धरम धरे जन, सही गलत के दिशा भुलाये।
करत हवव झूठ वाहवाही, इही मनुज तोर दाम होगे।।
कलम उठा लिख नवा इबादत, दिशा दशा देश खातिर।
पता नही कब उगे बिहनिया, करत अगोरा ये शाम होगे।।
कहत हवय हाथ जोड़ पात्रे, अपन समझ जा वजूद भाई।
बढ़े हवय जेन धर बुलंदी, उँखर इँहा आज नाम होगे।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
करे जा करम धरे जा धरम, तभे तो मिले इँहा मान हा।
बढ़ा पाँव नेक डगर मा तैं, सुनै बोल सच दुनो कान हा।।
कमा नाम खूब अपन तहूँ, बढ़ा मान देश समाज के।
ददा दाई के करौ सेवा ला, उगै रोज नवा बिहान हा।।
कहाँ अब नँदागे सुपा तवा, दिनों दिन नवा नवा खोज हे।
दिखे हाइब्रिड अनाज अब, उगे आज कम चना धान हा।।
मिले राख मा इही देह हा, बता फेर का के गुमान हे।
जिया मोह लेथे मया भरे, सदा मीठ बोली जुबान हा।।
धरौ सत्यबोध के सीख ला, करे ज्ञान के सदा गोठ जे।
सबो दान ले बड़े हे कहे, लहू ज्ञान शिक्षा के दान हा।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
सुना गीत प्रेम रखे मया, उगे चाँदनी नवा रात हे।
लगा ले गला दिखे जे दुखी, बने मीत के इही बात हे।।
खिले फूल सुंता मया धरे, रहे द्वेष बैर कभू नही।
गढ़े जा कहानी नवा नवा, दिनों दिन जवानी बुढ़ात हे।।
पड़े लोभ मोह के फेर मा, करे तैं खुशी ला खुँवार जी।
कहे जे ला मोर अपन सदा, उही धोखा जाल बिछात हे।।
लहू रंग एक हवय सुनौ, बड़े कोंन जाति बता भला।
कहे संत गुरु सदा बात ये, धरे स्वार्थ मनखे भुलात हे।।
कहे सत्यबोध सदा सही, धरे लोग बात कहाँ इँहा।
सजे धर्म ढोंग बजार जग, रखे शौंक झूठ बिसात हे।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
धरे बात सत्य बढ़े चलव, तभे मोल जिनगी के मान ले।
बढ़ा पाँव ला रखे हौसला, मिले जीत तब तो सदा ठान ले।।
जले हे जमाना मया देख के, करे कोंन कब हे कदर भला।
मिटा ना सके कभू तो मया, जगे मन हिलोर उफान ले।।
बनौ देश वीर सिपाही तुम, सदा नाम मान अमर रही।
लुटा जान रक्षा वतन करौ, जियौ शान से मरौ शान ले।।
धरे रूढ़िवादी परंपरा, बढ़े जात लोग समाज हा।
मिटे अन्धभक्ति सबो ढोंग जग, बढ़ा पाँव आज धियान ले।।
कहे सत्यबोध उठौ अउ बढ़ौ, करौ काम देश समाज हित।
मिला हाँ मा हाँ चलौ झन कभू, सही का गलत बने जान ले।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़*
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
*221 2121 1221 212*
बंदन करौं किसान ला मैं हाथ जोर के।
हावय सुरुज विकास इही आस भोर के।।
लावव नवा बिहान सुमत धर सुराज ला।
छत्तीसगढ़ के मान बढ़ै गाँव खोर के।।
हपटे गिरे परे डरे मनखे उठा चलौ।
पानी पिला पियासा ला रस प्रेम घोर के।।
राहय समय न एक बरोबर इँहा सदा।
झन हाँसहू गरीब दुखी जन निहोर के।।
सत काज बढ़ै हाथ गजानंद चाहथे।
आपस रखौ मया सबो मन भेद टोर के।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़*
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
*221 2121 1221 212*
चमचागिरी करे उही मनखे के नाम हे।
सच के कहाँ हे मोल सदा झूठ दाम हे।।
माथा तिलक लगा बने पंडित बड़े बड़े।
दिखथे उही धरम के बड़का गुलाम हे।।
कपटी कपट करे सदा कुछ पाय मान बर।
रखथे छुरी बगल मा भले मुँह मा राम हे।।
भटके कहाँ इँहा उँहा प्रभु खोज मा बता।
घट भीतरी ला झाँक बसे चारो धाम हे।।
बिछड़े पिरित मिले कहूँ बड़का नसीब ले।
छलके मया मयारू खुशी प्रेम जाम हे।
सुन ले किसान के कभू तैं तो पुकार ला।
गर मा अकाल फँदा सहे जाड़ घाम हे।।
बनके सबो के मीत गजानंद जीत मन।
जग बैर पालना इँहा दुश्मन के काम हे।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़*
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
*221 2121 1221 212*
होवत फसल बिनाश तो रखवार हे कहाँ।
उजड़त सुमत सुराज हा घर द्वार हे कहाँ।।
देखव जगह जगह दिखे पाखंड ढ़ोंग हा।
पर हित उठै जे हाथ मददगार हे कहाँ।
सब अन्धभक्ति मा परे बन चाटुकार अब।
देखव उठा नजर भला संसार हे कहाँ।।
दीया बुझा जही लगे अब तो विकास के।
घर मा गरीब दीन के उजियार हे कहाँ।
बेरोजगार हे युवा डिगरी धरे धरे।
जनता करे पुकार ला सरकार हे कहाँ।।
मतलब धरे सबो इँहा चुपचाप हे पड़े।
अधिकार हक लिये लड़े दमदार हे कहाँ।।
कर लौ नीति न्याय गजानंद हा कहे।
अन्याय के खिलाफ मा ललकार हे कहाँ।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़*
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
*221 2121 1221 212*
कहिगे सुजान मन बड़े गुरु संत ज्ञान हे।
ना छोटे ना बड़े सबो मनखे समान हे।।
सबके शरीर एक बने हाड़ मांस ले।
का भेद फेर हे बता अलगे निशान हे।।
धरके गरब गुमान चले जेन भी इँहा।
मुँह भार एक दिन उही गिरथे उतान हे।।
जाना सबो हे छोड़ इँहा तोर मोर का।
फिर भी बने फिरे सबो मनखे नदान हे।।
जग मा बटोर बाँट गजानंद तँय मया।
चल ले समय धरे सदा हर पल महान हे।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ*
मुफ़ाइलुन फ़यलातुन मुफ़ाइलुन (फ़ेलुन)
*1212 1122 1212 22*
दिखे ना झूठ इँहा जोत सत जलाना हे।
खिले जे फूल सुमत पेड़ वो लगाना हे।।
गरीब दीन दुखी के बनौ सहारा अब।
गिरे परे डरे ला मिल चलौ उठाना हे।।
मिलै सबो ला मया दुःख कोनो झन साहय।
धरम करम रखे हित पाँव ला बढ़ाना हे।।
जुआ नशा तो सदा हे बिगाड़े चीज ला।
उजाड़ हो खुशी झन घर सुखी बसाना हे।।
परोपकार रहै जग तब सही भलाई हे।
विचार उच्च गजानंद जी बनाना हे।।
गजानंद पात्रे "सत्यबोध " बिलासपुर
छत्तीसगढ़
*बहरे रमल मुसद्दस सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
*2122 2122 2122*
बाँध ले गठरी मया तब मान पाबे।
नेक कारज ले इँहा पहिचान पाबे।।
देवता दाई ददा सुन आज भी हे।
राम सरवन कस कहाँ संतान पाबे।।
एक मनखे खून सबके एक कहिगे।
संत घासीदास ले सत ज्ञान पाबे।।
अंधविश्वासी धरे हे ढ़ोंग जन जन।
सत्य मारग मा कहाँ इंसान पाबे।।
मोर भारत देश मा बड़ एकता हे।
जान से बड़के तिरंगा शान पाबे।।
हे कटोरा धान के छत्तीसगढ़ हा।
लहलहावत खेत अउ खलिहान पाबे।।
जोर दून्नों हाथ ला कहिथे गजानंद।
दीन दुखिया सेवा ले भगवान पाबे।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
*2122 2122 2122*
सोंच थँव कब सत्य के उजियार होही
ढ़ोंग पाखँड मुक्त ये संसार होही
वोट कीमत लोग नइ जब जानही ता
दूर जम्मो वो अपन अधिकार होही
खाय पर के छीन जे हा भात रोटी
जान वो इंसानियत गद्दार होही
साध मतलब जब तलक इंसान रइही
दीन दुखिया साथ अत्याचार होही
ढूँढ़ ले पावच नही सुमता गजानंद
भाई भाई मा बटे परिवार होही
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
*2122 2122 2122*
जाग संगी जाग रे नव भोर होगे
गाँव घर सब्बो डहर अंजोर होगे।
कोयली के कूक बोली मीठ लागे
देख बादर ला मगन तो मोर होगे।
छाँव सुमता बैठ सब मल्हार गाये
प्रेम के बरसा घलो घनघोर होगे।
का भरोसा साँस तन ये छोड़ जाही
झूलना कस जिनगी के डोर होगे।
देश खातिर जान जब जब वीर देथे
धन्य तब तब माँ के अँचरा छोर होगे।
कोंन करही देश जनता के भलाई
चोर हे सब चोर हे जग शोर होगे।
सत्य ला थामे चले हे जे गजानंद
ओकरे तो नाम चारो ओर होगे।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
*2122 2122 2122*
साँस ये जिनगी सबो गुरु नाम कर ले।
थाम नेकी राह ला सत काम कर ले।।
मिल जला लौ जोत सुमता ला घरो घर।
सेत चंदन मन ला जोड़ा खाम कर ले।
पार भवसागर करे हे ज्ञान गुरु के।
गुरु चरण ला थाम सुख आराम कर ले।
छोड़ दे तन मोह दौलत के गुमानी।
साँचा मन से साँसा के तैं दाम कर ले।
ढूँढ़बे गुरु ला कभू झन बाहर गजानंद।
झाँक हिरदे ला अपन गुरु धाम कर ले।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212
सच ले सबो अनजान हे।
घट मा बसे भगवान हे।।
पथरा लगावत भोग ला।
मनखे बने नादान हे।।
तन मोह धन अब छोड़ दे।
मिल जाना तो शमशान हे।।
सब बढ़ चलौ सत राह मा।
जग के तभे कल्यान हे।।
माँ बाप के कर ले जतन।
सच प्रभु इही गुनगान हे।।
सुख दुख नदी के धार दू।
मझधार मा इंसान हे।।
जग हाल ला अब देख के।
पात्रे बड़ा हैरान हे।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212
सुक्खा नदी अउ ताल हे
लगथे अकाली साल हे।
पानी बिना जिनगी कहाँ
सब जीव मन बेहाल हे।
कटगे सबो वन पेड़ अब।
ठुड़वा दिखत डंगाल हे।।
नेता फिरे सेवक बने
पर पहिने गीदड़ खाल हे।
बाली सजे हे कान मा
बिगड़े टुरा के चाल हे।।
करुहा लगे दाई ददा
हितवा बने ससुराल हे।
पात्रे कहय सच बात ला
मिर्ची सही बड़ झाल हे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212
धरथे कहाँ सच बात ला।
भुलगे मनुज औकात ला।
थामे धरम के डोर जग
कहिथे बड़े खुद जात ला।
इंसानियत अब हे कहाँ
बइठे लगा कुछ घात ला।
पानी रितो सुख पेड़ मा
हरिया ले मन के पात ला।
मन के चकोरी ताकथे
अब तो अँजोरी रात ला।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212
सत बानी हे पहिचान गा।
पुरखा हमर हे शान गा।
घासी बबा सन्देश सत
तैं सार जिनगी जान गा।
सतनाम ला चल ले धरे
मिलही तभे गुरु ज्ञान गा।
भटके कहाँ बिरथा मनुज
घट मा बसे भगवान गा।
नित पाँव नेकी बर बढ़ा
दुखिया ला दे दे दान गा।
रक्षा करे सतनामी सच
जीये हे सीना तान गा।
पात्रे कहें सुमता बढ़े
अतके हवे अरमान गा।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212
मनखे पड़े भ्रम जाल मा।
बइठे कुमत के डाल मा।
सुमता भुलाये आज जन
जिनगी दिखे दुख काल मा।
सच के डगर ला छोड़ के
चलथे असत के चाल मा।
का सोंच मा पड़गे हवस
चिंता दिखत हे भाल मा।
पात्रे लिखे सच बात जब
सब ताल दौ सच ताल मा।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212
जन थाम बइठे ढ़ोंग ला।
पाखंड जइसे रोग ला।
घर देव हा भूखन मरे।
पत्थर लगाये भोग ला।
रखबे मया झन कपटी बर।
करबे कभू झन सोग ला।
फिरथे इहाँ कुछ साधु बन।
जाने नही सत जोग ला।
पात्रे सदा समझाये हे।
जड़ मंद मति मन लोग ला।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212
सत जोत ला तैं बार ले।
गुरु किरपा ले उजियार ले।
सुख के लगा बिरवा इहाँ
काँटा डगर ले टार ले।
जग बाँट ले गुरु ज्ञान ला
मन के अहम ला मार ले।
जाला लगे हें सोंच मा
सद्ज्ञान से तैं झार ले।
मनखे सबो तो एक हे
जग प्यार दे अउ प्यार ले
गुरु नाम के करले भजन
ऊबर जबे मझधार ले।
पात्रे कमा ले नाम ला
का ले जबे संसार ले।।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे रजज़ मुसद्दस मख़बून
मुस्तफ़इलुन मुफ़ाइलुन
2212 1212
सच के बड़ा उजार हे।
अउ झूठ के बहार हे।
पाखंड रूढ़िवाद के
जग मा बहत बयार हे।
अन्याय देख चुप रहे
वो मनखे चाटुकार हे।
नेता बने फिरे बड़ा
पर चाल दागदार हे।
कर लौ मदद गरीब अउ
बेबस जे बड़ लचार हे।
नइ तो कभू मिले इहाँ
मँगनी मया उधार हे।
जिंदा रखौ जमीर खुद
पात्रे कहत पुकार हे।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
बहरे रजज़ मुसद्दस मख़बून
मुस्तफ़इलुन मुफ़ाइलुन
2212 1212
धरके गरब गुमान ला।
धोखा दिये परान ला।
करथे धरा सिंगार जे
दौ मान वो किसान ला।
दौ बेटियाँ ला हौसला
अउ देख लौ उड़ान ला।
मन मा रखौ दया धरम
मीठा रखौ जुबान ला।
मिल संग सब बढ़े चलौ
पाटव कुमत के खान ला।।
उठ जाग नींद ला तहूँ
लाबो नवा बिहान ला।
धर सत्यबोध गोठ नित
बाँधव मया गठान ला।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
संत जन मान बचन गुरु घासी।
लौ लगा सत्य लगन गुरु घासी।
नाम दुख दूर करे दुखिया के
करथे मन पाप दमन गुरु घासी।
ज्ञान के खान दया के सागर
प्रेम सुख फूल चमन गुरु घासी।
जोड़ जग पाठ पढ़ाये समता
एक सब लोग कथन गुरु घासी।
रख गजानंद सदा सत ला गहना
गा ले मन गीत भजन गुरु घासी।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
नाम सतनाम अजर दुनिया मा।
सत्य परमान अमर दुनिया मा।
गुरु बताये हवे सत के महिमा
देख ले खोल नजर दुनिया मा।
तैं कहाँ भटके भुला सतगुरु ला
गुरु बड़े सत्य डगर दुनिया मा।
ले मया बाँट सबो जग जन मा
साँस तन चार पहर दुनिया मा।
चल गजानंद धरे गुरु कहना
होही तब सत्य असर दुनिया मा।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
नाम कर शोर कहे गुरु घासी।
थाम सत डोर कहे गुरु घासी।
सत अहिंसा रखौ जन गहना
कर मया भोर कहे गुरु घासी।
जाना सब छोड़ इही दुनिया मा
जग सुमत जोर कहे गुरु घासी।
एक तन चाम सबो मनखे के
जाति बँध टोर कहे गुरु घासी।
चल गजानंद धरे सत मारग
मुक्ति तब तोर कहे गुरु घासी।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
कर अमर नाम कहे गुरु घासी।
सत्य कर काम कहे गुरु घासी।
ढ़ोंग पाखंड तजे बढ़ आघू
सत्य ला थाम कहे गुरु घासी।
नित्य जग पाँव बढ़ा सत खातिर
छोड़ आराम कहे गुरु घासी।
प्रेम सुख छाँव दिला जन जन ला
क्रोध तज घाम कहे गुरु घासी।
लोभ झन मोह करौ धन तन के
त्याग बड़ दाम कहे गुरु घासी।
जग मा भगवान ददा दाई हे
जप सुबो शाम कहे गुरु घासी।
सुन गजानंद कहाँ भटके तँय
हिरदे गुरु धाम कहे गुरु घासी।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
सत्य बर पाँव बढ़ाबे जग मा।
फेर बड़ नाम कमाबे जग मा।
लूट के जाल बिछे हे पग पग
कइसे तँय खुद ल बचाबे जग मा।
कोंन हे तोर परख ले नइ तो
फोकटे चीज लुटाबे जग मा
जब तलक तोर चले ये साँसा
सत्य के साथ निभाबे जग मा
जीत अउ हार बरोबर धर ले
नाव सुख पार लगाबे जग मा।
तँय लगा पेड़ मया के सब बर
बैठ मन छाँव जुड़ाबे जग मा
सुन गजानंद भरोसा रख ले
बड़ गजलकार कहाबे जग मा
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
बात करु तोर सुने ला परगे।
रात भर माथ धुने ला परगे।
बाँट घर द्वार सबो ला डारे
संग माँ बाप चुने ला परगे
फूटहा मोर करम के दोना
भाग के ताग तुने ला परगे।
झूठ के बदरा दिखत हे भारी
धर सुपा सत्य फुने ला परगे।
धर्म सच कोंन करे अब रक्षा
सुन गजानंद गुने ला परगे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
दीन दुखिया के सहारा बन जा।
बीच मझधार किनारा बन जा।
बाँट ले राह सबो बर सुख के
धर सुमत छाँव गुजारा बन जा।
बाँध मन आस बढ़े जा आगू
आसमाँ चाँद सितारा बन जा।
तँय समझ गोठ मया के भाई
दर्द मन भाव इशारा बन जा।
चल गजानंद धरे सत रसदा
सबके तँय राजदुलारा बन जा।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
ज्ञान के खान कहौं गुरु तोला।
मोर भगवान कहौं गुरु तोला।
झूठ ले दूर रखौ नित जग ले
सत्य ईमान कहौं गुरु तोला।
पा दया तोर बढ़े हँव आगू
हौ कदरदान कहौं गुरु तोला।
देव बलिहार हवय गुरु आगे
योग सत ध्यान कहौं गुरु तोला।
मान यश नाम सबो तँय देये
मोर पहिचान कहौं गुरु तोला।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
हौसला राख तभे बढ़ पाबे।
जीत के ऊँचा शिखर चढ़ पाबे।
जान ले पीर पराई दुनिया
भाव जन दर्द खुदे पढ़ पाबे।
तँय कलम वीर सिपाही बन जा
फेर इतिहास नवा गढ़ पाबे।
संग धर गोठ सियानी मन के
जिनगी के सार तहूँ कढ़ पाबे।
बन गजानन्द पुजारी सत के
झूठ मा साँच तभे मढ़ पाबे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
देश के शान तिरंगा भारत।
सबके अभिमान तिरंगा भारत।
केसरी त्याग हवे पहिचानी
वीर पहिचान तिरंगा भारत।
श्वेत सुख शांति दिये जनगण ला
बाँह बज्र तान तिरंगा भारत
देथे संदेश हरा हरियाली
समृद्धि वरदान तिरंगा भारत।
सुन गजानंद गरब सब करथे
हे बसे जन प्रान तिरंगा भारत।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
2122 1122 22
आज ईमान कहाँ दुनिया मा।
साँचा इंसान कहाँ दुनिया मा।
ढ़ोंग ला थाम सबो बइठे हे
सोंच विज्ञान कहाँ दुनिया मा।
हे मचे होड़ बढ़े आगू अब
ज्ञान के दान कहाँ दुनिया मा।
झूठ के राग अलापत दुनिया
सत्य के गान कहाँ दुनिया मा।
कब गजानन्द गरीबी मिटही
दीन दुख ध्यान कहाँ दुनिया मा।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
छत्तीसगढ़ी गजल-
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन
बहर- 2122 1212 22
तोर मुस्काई जान लेवत हे।
कोयली बोली तान देवत हे।।
नाव मझधार मा फँसे हे ओ।
प्रेम दहरा नदी मा झेलत हे।।
बाँध लेना मया के बँधना ला।
तोर रस्ता ये नैन देखत हे।।
मोर मन चाँदनी खुशी जिनगी।
मोर मन बिरवा देख नेवत हे।।
मान ले सत्यबोध के कहना।
तोर बर जान आज फेकत हे।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212 2212
जिनगी सफल ये हो जही सत के डगर ला थाम ले।
तज मोह माया के गरब ला नाम गुरु के नाम ले।
असली उही मितवा इँहा तँय मान कहना सार जी।
दे छाँव सुख बिरवा बने रख दूर दुख के घाम ले।
श्रम के सदा पूजन करौ अउ कर्म खुद भगवान हे।
रख मेहनत मा नित भरोसा धीर धर के काम ले।
भवपार गुरु के नाम करही सत्य बन पतवार जी
सन्देश जग बर हे पठोवत गुरु बइठ सतधाम ले।
एक्के लहू के रंग हे फिर भेद पात्रे हे कहाँ
हे दूध काकर तन बहत काकर अलग तन चाम ले।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212 2212
तन दाम दू कौड़ी हवे अउ कर्म जग अनमोल हे।
कर ले करम सत ला धरे गुरु संत के ये बोल हे।
काबर करे मन लोभ तन के संग कब ये जात हे
पानी सही तन बुलबुला मन मीठ शरबत घोल हे।
अब टेटका कस रंग बदलत हे मनुज कर जात जी
बइठे कुआँ घट टरटरावत मन बने भिंदोल हे।
बनहू कभू झन दोगला पर चार पइसा छीन के
मिलही सजा सब पाप के दुनिया इही तो गोल हे।
बंदन सजा के माथ मा बन के फिरे पंडित बड़े
पात्रे कहे थामे उही जग ढ़ोंग अउ मन पोल हे।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212 2212
महिना नवंबर एक तारिख सबला जय जोहार जी।
छत्तीसगढ़ निर्माण सपना करिन मिल साकार जी।
अरपा पखारय पाँव पावन आरती शिवनाथ हा
पूजा करे हसदो नदी इंद्रावती श्रृंगार जी।
आशा बने उम्मीद सबके आज आघू हे बढ़े
गूँजत हवे सबके हृदय संगीत बन ये तार जी।
सुख दुख धरे बितगे बछर सुन आज पूरा बीस हा
कर लौ मनन छत्तीसगढ़ बर होय का उपकार जी।
तनगे इहाँ बड़ कारखाना मील क्रेशर खान हा
तब ला हमर होये कहाँ हे देख लौ उद्धार जी।
भाखा तरसगे मान खातिर अउ किसानी दाम बर।
परदेशिया के फेर बढ़िया हे चलत व्यापार जी।
कहिथे कटोरा धान के छत्तीसगढ़ ये धाम ला।
माथा नवा परनाम भुइयाँ मोर बारम्बार जी।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212 2212
छत्तीसगढ़ के नाम ऊँचा कर बने मन ठान के।
छलकत रहे सुख संपदा निस दिन कटोरा धान के।
भुइँया इही गुरु संत के बानी कबीरा दास जी
सत जोत गुरु घासी जलाये राह दे गुरुज्ञान के।
तिवरा चना गेहूँ उगे सरसो सुहावन खेत मा
भंडार लोहा सोन चाँदी हे खनिज सुख खान के।
पंथी सुवा करमा ददरिया गीत नाचा नीक हे
होरी हरेली अउ दिवाली हे परब पहिचान के।
पात्रे कहे मिलके बढ़ौ छत्तीसगढ़ के मान बर।
कोनों दिखावय आँख गर तब मार झापड़ तान के।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212 2212
मान कहना संत जन गुरु मोर घासीदास के।
सन्देश ला बगरा दिये गुरु जी इहाँ विस्वास के।
सत के डगर सुख हा बसे अउ झूठ मारग पाप हे
बनहू कभू झन दास संतो क्रोध जग उपहास के।
घर खोखला करथे जुआ बिकथे सबो सुख चैन हा
मांस मदिरा जड़ हवे जानौ सदा ही नाश के।
मनखे उही जिंदा इहाँ जे सत्य बर लड़थे सदा।
पाखंड धर के जे जिये वो हे बरोबर लाश के।
चिनहार पात्रे कोंन दुख के हे मिले जग मा बता
लगथे सुहावन ढोल दुरिहा गीत कर्कश पास के।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212 2212
महिना नवंबर एक तारिख सबला जय जोहार जी।
छत्तीसगढ़ निर्माण सपना करिन मिल साकार जी।
अरपा पखारय पाँव पावन आरती शिवनाथ हा
पूजा करे हसदो नदी इंद्रावती श्रृंगार जी।
आशा बने उम्मीद सबके आज आघू हे बढ़े
गूँजत हवे सबके हृदय संगीत बन ये तार जी।
सुख दुख धरे बितगे बछर सुन आज पूरा बीस हा
कर लौ मनन छत्तीसगढ़ बर होय का उपकार जी।
तनगे इहाँ बड़ कारखाना मील क्रेशर खान हा
तब ला हमर होये कहाँ हे देख लौ उद्धार जी।
भाखा तरसगे मान खातिर अउ किसानी दाम बर।
परदेशिया के फेर बढ़िया हे चलत व्यापार जी।
कहिथे कटोरा धान के छत्तीसगढ़ ये धाम ला।
माथा नवा परनाम भुइयाँ मोर बारम्बार जी।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212
सुमिरन करौं मैं सतपुरुष सतनाम ला।
पहिचान सत के सेत जोड़ा खाम ला।
जाने हवँव मैं मोल जिनगी सार जग
कइसे चुकाहूँ ज्ञान गुरु के दाम ला।
बनके पुजारी नाम गुरु के हौं धरे
सत जोत बारे हौं सुबो अउ शाम ला।
मनखे सबो ला एक मानौं जान लौ
करथौं नमन मैं यीशु गोविंद राम ला।
अरजी सुनौ पात्रे कहे गुरु मोर जी
सबके बना दौ नेक बिगड़े काम ला।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212
गुरु हे बड़े भगवान ये संसार मा।
नइया लगाये पार जे मझधार मा।
जानय नही मन भेद बड़का छोट के
रखथे बराबर भाव खुद ब्यवहार मा।
जिनगी सँवारे राह सच के दे सदा
गुरु जोत शिक्षा बारे हे मन द्वार मा।
गुरु के सहारा नाम दुनिया हे मिले
आशा जगाये जीत हो या हार मा।
बलिहार जिनगी हे करे पात्रे अपन
दरजा दिये गुरु ला बड़े करतार मा।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212
अब तो कहाँ दुनिया बचे ईमान हे।
लालच धरे दिखथे इँहा इंसान हे।
खुद मेहनत के रोटी खा आराम से
पर चीज क़ाबर तोर संगी ध्यान हे।
सच के डगर मा बोलबाला झूठ के
इंसानियत के अब कहाँ पहिचान हे।
अब के जमाना मतलबी खुदगर्ज के
उपकार सेवा अब कहाँ सुख दान हे।
बिरवा लगाबो आव जी सुमता धरे
मानव जगत के तब भला कल्यान हे।
धर ले बचन तैं नेक जिनगी ला बना
हितकारी जग गुरु संत मुनि के ज्ञान हे।
पात्रे सदा रह संग मा माँ बाप के
ओखर चरन दुनिया बसे भगवान हे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )
*बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
2212 2212 2212
महिना दिसम्बर गुरु जयंती खास हे।
सत के पुजारी संत घासीदास हे।
सादा दिखे अँगना दुवारी गाँव हा
सादा सबो के मन बँधे विश्वास हे।
मांदर मृदंगा झाँझ पंथी ताल मा
झूमत घलो धरती इहाँ आकाश हे।
मंगल भजन गुरु आरती चौका भये
सतनाम महिमा ला सुने मन आस हे।
किस्मत बड़े पात्रे हवे तैं जान ले
गुरु नाम आशीर्वाद तोरे पास हे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसमन महज़ूफ़*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
मन सजे हे झूठ मा सत के कहाँ पहिचान हे।
जाति मजहब ला धरे जग मा बँटे इंसान हे।
गाँव अँगना खोर सब सुन्ना लगे सुमता बिना
बिन मया मन के दुवारी जस लगे शमशान हे।
माँ बाप रखथे आसरा बेटा बने सरवन कुमार
कलयुगी संसार मा अब मान ना सम्मान हे।
भोग पथरा मा लगे पाखंड के दरबार मा
बंद आँखी ला करे मनखे बने नादान हे।
हौसला खुद मेहनत के फल सदा मीठा मिले
नाम के नइ कर्म के होवत सदा गुनगान हे।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसमन महज़ूफ़*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
लूट डारिन खेत बारी कोला अउ खलिहान रे।
तुम पड़े हव पी के दारू उन झड़त पकवान रे।।
देख ले परदेशिया बाँटत हवय हमला इँहा।
बाँट डारिस जात के ले आड़ अब भगवान रे।।
धान के हे अब कटोरा खाली खाली देख ले।
सोवथे मजदूर खाली पेट अब शमशान रे।।
संत वाणी गुरु कबीरा गीत पंथी ददरिया।
देख कर डारिन सबो इन संत के अपमान रे।।
जाग भाई जाग छत्तीसगढ़िया बन के बने।
झन भुलाहू अब कभू संगी अपन पहिचान रे।।
चीर के तो मोर अंतस देख लौ ना आज भाई।
हे पुकारत अब हमर पुरखा अमर बलिदान रे।।
मान छत्तीसगढ़िया के ये बचन ला जी तहूँ।
गोहरावत हे अनुज "पात्रे" धरौ अब ध्यान रे।।
इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुरब्बा सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122
संत घासीदास गुरु के।
मन बसा विस्वास गुरु के।
कतरा कतरा हे समर्पित
जिनगी ये हर साँस गुरु के।
पाबे हर पग कामयाबी
छोड़बे झन आस गुरु के।
भटका दर दर खात हे
जे करे उपहास गुरु के।
शाम दिन अउ रात पात्रे
पाथे खुद ला पास गुरु के।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुरब्बा सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122
नाम सतनामी पड़े हे।
सत्य ला जब धर खड़े हे।
दीन दुखिया के मसीहा
न्याय बर हर पग अड़े हे।
जुल्म बर तलवार खाड़ा
तान सीना जे लड़े हे।
हे अहिंसा के पुजारी
ढाल सत बन तन जड़े हे।
सत निशानी सेत झंडा
जैत खम्भा हा गड़े हे।
नेक बानी गुरु कहे जी
ढ़ोंग मा तन मन सड़े हे।
मनखे मनखे एक पात्रे
कोई छोटे ना बड़े हे।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुरब्बा सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122
सुख धरे जब भोर होही।
गाँव उज्जर खोर होही।
बाँटही जे आज हमला
वो सुमत के चोर होही।
का भरोसा जिंदगी के
मौत मा नइ जोर होही।
बाँध लेबो प्रीत बँधना
मन मया के डोर होही।
तैं करे कर नेक कारज
नाम जग मा तोर होही।
सच सदा कहिथे गजानंद
झूठ के सच टोर होही।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुरब्बा सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122
हाल बड़ बेहाल होगे।
जनता हा कंगाल होगे।
बेच डारिन देश धन ला
नेता मालामाल होगे।
योजना हे बस कलम मा
पर हकीकत झाल होगे।
दीन दुखिया नइ पुछाड़ी
सुख नही दुख काल होगे।
आज हमरे भाग मा बस
नून बासी दाल होगे।
नइहे कोनों सुख मसीहा
सबके बदले चाल होगे।
देख हालत देश पात्रे
खून मा ऊबाल होगे।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122 2122 2122
संत घासीदास गुरु संदेश सत के सार संतो।
सत्य ही गहना मनुज के प्रेम सुख आधार संतो।
पर बुराई दूर रहना थाम सुमता के डगर चल
क्रोध दुख के आग मा मन जल जथे घर द्वार संतो।
चल अहिंसा राह मा नित थाम गुरु के सत्य बानी
माया नगरी ले तभे हे तोर तो उद्धार संतो।
ले जला हिरदे दुवारी दीप समता एकता के
कोंख माँ के एक जानौ एक हे परिवार संतो।
ज्ञान सत उपदेश गुरु के धर चले पात्रे गजानंद
मोर जिनगी मा सदा गुरु नाम के उपकार संतो।
*इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"*
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन सालिम*
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122 2122 2122
जन भलाई हे कहाँ अब मतलबी संसार होगे।
झूठ इरखा द्वेष मा इंसान अब मतवार होगे।
गाँव घर अँगना गली मा कोंन लावय भोर सुमता
प्रेम सुख बाती बिना दीया तले अँधियार होगे।
आजकल मनखे ल मनखे साँप बन के डसत हे
विष भरागे बात मा विस्वास मा गद्दार होगे।
घूस महँगाई गरीबी हा बढ़त हे बड़ दिनों दिन
आम जनता कौंर सुख पाये इहाँ लाचार होगे।
जाति मजहब मा पड़े हम दूर धंधा से गजानंद
अउ इहाँ चारों डहर परदेशी व्यापार होगे।
*इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"*
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222. 122
बचन घासीदास गुरु के मान तैं चल।
करम मा सत धरम नित ठान तैं चल।
हमर पुरखा हमर हे धन धरोहर
उँखर गाथा करत गुनगान तैं चल।
चलत व्यापार जग मा चाटुकारी
गलत अउ झूठ बर दे ध्यान तैं चल।
जहर घूरत हवय विश्वास मा अब
अपन दूसर करत पहिचान तैं चल।
जमाना आजकल बड़ मतलबी हे
डगर जिनगी खुला रख कान तैं चल।
गिरे हपटे दुखित ला चल उठा के
गरीबी बर करत सुख दान तैं चल।
हरस तैं पूत सतनामी गजानंद
रखे फौलादी छाती तान तैं चल।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222. 122
शिरोमणि संत घासीदास बाबा।
उड़त हे शोर सत आकास बाबा।
जलाये जोत सुख बन ज्ञान दीया
मिटाये दीन दुखिया त्रास बाबा।
मिले आशीष किरपा तोर गुरु जी
हवय बस मोर अतके आस बाबा।
जपत रइहूँ सदा गुरु नाम कंठी
चलत हे जब तलक ये साँस बाबा।
करय अरजी सदा पात्रे गजानंद
बुराई के करौ नित नाश बाबा।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222. 122
उहाँ ले ढोंग के शुरुआत होथे।
जिहाँ ले मनगढ़ंती बात होथे।
रहे सुमता न जे घर द्वार भाई
उहाँ कुमता भरे दिन रात होथे।
उही चलथे सदा सच राह मा सुन
बड़े जेकर जिगर औकात होथे।
भरोसा आजकल बाँचे कहाँ हे
इहाँ विश्वास मा भी घात होथे।
रखौ मन द्वेष ना फोकट गुमानी
मया जिनगी खुशी सौगात होथे।
बढ़े दिन दिन जिहाँ बेरोजगारी
सबो के दुख भरे हालात होथे।
बचा खुद ला रखे रहिबे गजानंद
भरे बिखहर मनुज के जात होथे।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222
बढ़त हे घूसखोरी चाटुकारी हा।
दिनों दिन लूट के धंधा उधारी हा।
रखे ईमान ला अब कोंन जी चलथे
चढ़े हे झूठ के जन जन खुमारी हा।
बँटे हे आज मनखे जाति धर मजहब
करत हे राज अब पंडा पुजारी हा।
लड़त हे भाई भाई चल कुमत रद्दा
कहाँ हे आज घर सुमता दुवारी हा।
नशा मा बेच डारिस खेत घर अँगना
धरे मुड़ हाथ अब रोवत दुलारी हा।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*
*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*
*1222 1222 1222*
जपौं कंठी सदा सतनाम गुरु घासी।
बना हिरदे अपन सतधाम गुरु घासी।
कृपा गुरु के गड़े ना पाँव मा काँटा
करे हे दूर दुख के घाम गुरु घासी।
सबो के तन लहू के रंग लाली हे।
कहे हे एक मनखे चाम गुरु घासी।
चलौ नित राह मानवता अहिंसा के
दिये संदेश सत आवाम गुरु घासी।
तजौ पाखंड पूजा ढ़ोंग तन मन ले
कहे जिनगी असल तब दाम गुरु घासी।
पड़ौ झन फेर पथरा देवता धामी
कहे घट देव ला निज थाम गुरु घासी।
पढ़ा के एकता के पाठ जग जन ला
सुमत समता करे हे काम गुरु घासी।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*
*मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*
*1222 1222 1222*
लिखौं मैं छंद कविता गीत बानी ला
गजल के सेर मा जिनगी कहानी ला।
गिनावत काम झूठा कागजी कोरा
करौ विश्वास झन नेता बखानी ला।
बढ़त हे घूस अउ बेरोजगारी हा
फिरत हे नव युवा खोवत जवानी ला।
ददा दाई रखे रहिबे अपन अँगना
सहारा बन पिला दू बूँद पानी ला।
कभू धोखा मिले नइ बात ये सच्चा
धरे कहना चलौ पात्रे सियानी ला।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*
*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*
*2122 112 2 1122 22*
सत्य गुनगान करौं राह चलौं सत के जी।
साँस गुरुनाम चले चाह हवे अतके जी।।
लोभ जग झूठ रहौं दूर सदा दिन मैं तो
प्रेम धन जोर रखौ मोल मिले जतके जी।
ध्यान रख शान बढ़ा मान पुरखौती के
नाम हित देश धरम वीर शहादत के जी।
सार संदेश हवे नीड़ सबो प्राणी ला
बोल ईमान रखौ करम शराफत के जी।
जुल्म अन्याय गजानंद कभू नइ साहय
थाम सत ढाल बढ़े पाँव बगावत के जी।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*
*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*
*2122 112 2 1122 22*
नींद ले जाग उठौ मान बचाना हे तो।
दौ मिटा दाग खुदे शान बचाना हे तो।।
हाथ मा हाथ धरे आज चुपे बइठे हौ।
जंग मैदान बढ़ौ बलिदान बचाना हे तो।
खून का ठंड पड़े आज सतनामी के
मार चिंघाड़ खुदे प्रान बचाना हे तो।
तोर अउ मोर के छोड़ बने खाई ला
आगू रख पाँव खुदे आन बचाना हे तो।
सोंच दिन रात गजानंद पड़े रहिथे जी
सत्य के लाज कलम ज्ञान बचाना हे तो।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*
*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*
*2122 112 2 1122 22*
सुमता के राह धराइस बबा गुरु घासी।
एकता पाठ पढ़ाइस बबा गुरु घासी।
जीव जग सत्य अहिंसा बढ़े समरसता
प्रेम के बात बताइस बबा गुरु घासी।
तोड़ के जाति धरम फाँस अउ जाला ला
सब ला सँग साथ चलाइस बबा गुरु घासी।
रंग हे एक लहू तन सबो मनखे के
द्वेष मनभेद मिटाइस बबा गुरु घासी।
रात दिन शाम गजानंद करे गुरु बंदन
ज्ञान के जोत जलाइस बबा गुरु घासी।।
गजलकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
छत्तीसगढ़ी गजल-(44)
( बहर- 2122 2122 2122 122 )
तैं नदी पतवार ओ मोला किनारा बना ले ।
डूब जाही नाव नदिया ओ सहारा बना ले ।।
खोज ले पाबे मया अइसन कहाँ तैं मयारू ।
मोर अंतस भीतरी घर द्वार पारा बना ले ।।
संग जीबो संग मरबो संग हर पल निभाबो ।
तैं बसा सांसा अपन मोला गुजारा बना ले ।।
ताज तैं मुमताज सपना मोर जिनगी तहीं ओ ।
मांग भर ले चाँद मोला तैं सितारा बना ले ।।
का फिकर तोला बता साथी गजानंद जब हे ।
खुशनुमा तैं जिंदगी के हर नजारा बना ले ।।
*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*
*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*1212 1212 1212 1212*
उठा नजर ला देख ले कहाँ रमे धियान हा।
लगे हे आग जाति धर्म नित जलत मकान हा।
गिरे परे उठा चले मसीहा अब वो हे कहाँ
लगे हे दाँव जिंदगी अधर मा हे परान हा।
बिरान हे गली बगीचा गाँव घर सबो जगा
मिले नही सुने ला मीठ कोयली के तान हा।
उठा कलम सदा सही दिशा धरे नियाव के
तभे पढ़े लिखे के मोल सार गुरु के ज्ञान हा।
कहे हे बात सत्यबोध थाम राह नेक जी
तभो ले भैरा हे पड़े सबो के आज कान हा।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*
*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*1212 1212 1212 1212*
कहाँ दिखत हे रोजगार देश जन विकास हा।
मरत हे आम जनता अउ बढ़त हे भूख प्यास हा।
सजे हे राजनीति मंच चमचा अउ दलाल के
करे गुलामी चाटुकार अंधभक्त दास हा।
कहाँ ले राम राज के खुवाब पूरा होय जी
फँसे गला जिहाँ हे जाति पाति धर्म फाँस हा।
युवा किसान दीन अउ गरीब के पुकार हे
मिले सबो ला रोटी सुख मिटे जुलुम के त्रास हा।
रखौ सुमत समानता ला गोठ सत्यबोध के
मिटे कभू ना काकरो बसे मया के आस हा।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*
*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*1212 1212 1212 1212*
करौं नमन ला घासी दास गुरु के नाम के।
तिलक लगा के माथ माटी मैं गिरौद धाम के।
रहौं पुजारी सत्य प्रेम पथ अहिंसा के सदा
दिये निशानी सेत झंडा जोड़ा जैतखाम के।
दया धरम परोपकार ले बड़े का दान हे
गरब गुमान छोड़ माटी तन ये चाम के।
रखे बुराई दूर गुरु भलाई के राह ला बता
बने हे छाँव सुख बिपत दुखी असत के घाम के।
चले ये साँस सत्यबोध कर्म नेकी ला करत
रखौ समाज पीड़ा मन तभे ये जिनगी काम के।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़*
*मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*1212 1212 1212 1212*
झुकौं नही बढ़े चलौं लहू रखे उबाल जी।
जबर हे मोर छाती अउ भुजा बने हे ढाल जी।
सहौं नही कभू जुलुम नियाव के कटार औं
मितान मितवा के सहौंत बैरी बर तो काल जी।
हे वीरभान बाना मोर शेर कस दहाड़ हे
बनौं सपूत खाँटी बेटा दे के मेंछा ताल जी।
रखौं नही मैं द्वेष भाव त्याग के प्रतीक औं
उठा चलौं गिरे परे करम करौ कमाल जी।
गली गली शहर शहर हे चर्चा मोर नाम के
कहे जी मोला सत्यबोध बंदा बेमिसाल जी
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
छत्तीसगढ़ी गजल-
बहर- 1212 1212 1212 1212
मया जगा के चल दिये मयारू मोला छोड़ के।
कहाँ छुपे तैं बइठे हस ये जिंदगी ला मोड़ के।।
अगोरा तोर रहिथे गियाँ सुबह ले शाम तक।
सुते हवस तैं तो सबो खुशी ला मोर ओढ़ के।
का पाबे तैं बता जवानी मा लगा के आग ओ।
बुझा दे प्यास आ मया पिरीत ला तैं जोड़ के।।
तहीं हा मोर चंदा अउ तहीं हा मोर रात ओ।
बता भला तैं कुछ का पाबे दिल ला मोर तोड़ के।।
करत हवँव मैं बिनती साथ दे दे सत्यबोध ला।
मयारू दौना पान झन जा तैं मया मरोड़ के।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम*
*फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन*
*212 1222 212 1222*
टोर फाँस भ्रम के सब ला गला लगाना हे।
गाँव घर सुघर सुमता जोत ला जलाना हे।
गोठ मीठ कर ले नित बाँट ले मया दुनिया
छोड़ आज कल चिंता हँसना अउ हँसाना हे।
ढाल बन खड़े रइहौ झन जुलुम कभू सइहौ
न्याय के सिपाही बन तीर हक चलाना हे।
लिख नवा इबादत इतिहास पुरखा के
थाम के कलम स्याही मान ला बढ़ाना हे।
सत्यबोध कहिथे सच ध्यान ला लगा के सुन।
स्वार्थ के सगा भाई मतलबी जमाना हे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्फूफ़ मक़्बूज़ मुख़न्नक सालिम*
*फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन*
*212 1222 212 1222*
ज्ञान गुरु धरे अढ़हा तक सुजान होथे जी।
नेक कर्म ले मनखे हा महान होथे जी।
हौसला रखे चलबे साथ मा भरोसा जब
आसमान ले ऊँचा तब उड़ान होथे जी।
लोभ मोह के चक्कर मा पड़े कहूँ भाई
हाय हाय मा छूटत तब परान होथे जी।
मीठ मीठ चुपड़ी चुपड़ी करे जे हा बतिया ला
जान वोकरे अंतस मा गठान होथे जी।
तन सजा रखौ सच परिधान हो अहिंसा हा
झूठ पाप अउ हत्या के समान होथे जी।
जीत ले सबो के मन बाँधे मया बँधना
प्रेम ले बड़े मीठा का जबान होथे जी।
सत्यबोध समरसता राह नित बताइस हे
फेर कब कहाँ सच्चाई बखान होथे जी।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
ग़ज़ल - इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
*बहरे हजज़ मुसमन अख़रब मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ महज़ूफ़*
*मफ़ऊल मुफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ऊलुन*
*221 1221 1221 122*
घर गाँव गली खोर हा वीरान पड़े हे।
बिन दाई ददा जिंदगी सुनसान पड़े हे।
चौपाल गुड़ी गोठ नँदावत हे दिनों दिन
बिन गरुवा बिना गाय के दइहान पड़े हे।
मतवार सबो आज डगर झूठ थामे
लाचार दुखी नित्य ही ईमान पड़े हे।
परदेशिया उद्योग लगा राज करत हे
अउ देख हमर भाग मा शैतान पड़े हे।
मझधार खड़े नाँव सदा तोर गजानंद
पतवार खुशी बीच मा तूफान पड़े हे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*
*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*212 1212 1212 1212*
संत घासी दास गुरु करे सुमत के काम हे।
देश दुनिया मा तभे तो आज ऊँचा नाम हे।
जोत सत्य के जला करे उजाला ज्ञान के
गुरु कृपा मिटे जगत के द्वेष बैर घाम हे।
टोर फाँस जाति पाति धर्म के महानता
नाम ले बड़े सदा ही नेक कर्म दाम हे।
सादा झंडा आसमान हे प्रतीक सत्य के।
प्रेम दूत शांति के तो जोड़ा जैतखाम हे।
घासी गुरु जनम धरे सत पुरुष के रूप मा
माटी कर नमन पवित गिरौदपुर के धाम हे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*
*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*212 1212 1212 1212*
सत्यनाम नाम हा सदा जगत मा सार जी
बानी घासी दास गुरु समाज मा सुधार जी
लोभ झूठ क्रोध चिंता भ्रम अगन समान हे
तोड़ दुख के फाँस जाला सुख डगर निहार जी।
पाँच तत्व काया सृष्टि तोर मोर जान ले।
सत पुरुष ले जोड़ राखौ साँसा के तो तार जी।
सत करम करत कमा ले नाम मान ज्ञान तैं।
मोह के बने महल मा घोर अंधकार जी।
सत्यबोध बाँध ले सुमत के डोर गाँव घर।
भाई भाई मा दिखत तो आपसी दरार जी।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*
*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*212 1212 1212 1212*
घासी दास गुरु करे हे ज्ञान के अँजोर ला।
जोत सत जला उगाये सुमता के भोर ला।
ऊँच नीच भेद भाव पाट जाति खाई जग।
एक राह मा चलाये बाँध प्रेम डोर ला।
कर्म के महानता बताये ज्ञानी बाबा हा।
मेहनत करे से छू ले आसमान छोर ला।
आज फेर गँय भुला बबा जी तोर बानी ला।
तोर सत दिये निशानी जन भलाई शोर ला।
गाँव घर गली बिरान बाबा तोर ज्ञान बिन।
सत्यबोध ढूँढथे मया पिरीत के खोर ला।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*
*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*212 1212 1212 1212*
फूल प्रेम के खिले हृदय सदाबहार हो।
बैर भाव तज चलौ सुमत के ना उजार हो।
दया मया के वास हो बोल मा मिठास रख
दीन हीन अउ गरीब सेवा मन मा प्यार हो।
छोड़ चाह नाम के कदम बढ़ा ले कर्म पथ।
पाँव पाछु झन हटाबे जीत हो या हार हो।
कर खरीदी साँच के धरे तराजू धर्म हित
लोभ मोह स्वार्थ के लगे जिहाँ बजार हो।
सत्यबोध के कलम चले मिटाये ढ़ोंग जग।
रूढ़िवादी ना कभू जमाना जन सवार हो।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*
*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*212 1212 1212 1212*
शान मान बेटी हा माँ बाप के तो लाज हे।
फूल ये गुलाब प्रेम गीत लय ये साज हे।
बेटी रानी लक्ष्मी बाई ज्योतिबा के रूप ये।
वीरता मिसाल जान सादगी के ताज हे।
आसमान छू बताये हौसला के पंख धर
त्याग ममता ला धरे करे महान काज हे।
नव बिहान भूत वर्तमान अउ भविष्य के।
बेटी देश राज के विकास अउ सुराज हे।
झन जले दहेज आग बेटी हा धियान दौ।
सत्यबोध प्रार्थना करे सदा समाज हे।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे हज़ज मुसम्मन अशतर मक़्बूज़, मक़्बूज़, मक़्बूज़*
*फ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन*
*212 1212 1212 1212*
तीन रंग के तिरंगा हे प्रतीक शान के।
हे कफ़न शहीद वीर हौसला जवान के।
त्याग के अमिट निशानी रंग केसरी हवे।
दे उबाल खून मा गा गीत शौर्य गान के।
श्वेत रंग शांति दे रखे अमन ये देश मा।
बाँधे सुमता अउ सुमत सबो ला एक मान के।
रंग तो हरा कहे नित देश हो हरा भरा।
नारा हिंद जय जवान बोल जय किसान के।
बार बार हे नमन, मसीहा भीम राव ला।
लोक तंत्र के महान ग्रंथ संविधान के।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*
*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*
*1121 2122 1121 2122*
उड़े शोर तोर घासी बबा आसमान मा जी।
रमे मोर मन हवे गुरु सदा तोर ध्यान मा जी।
तहीं मोर आसरा अउ तहीं मोर गुरु भरोसा।
कहाँ जाहूँ छोड़ तोला बसे मोर दिन बिहान मा जी।
मिले जब जनम दुबारा कृपा तोर छाँव पावँव।
बने धन्य मोर जिनगी चले राह सत गियान मा जी।
रहौं दूर मोह माया कभू लोभ मन बसे ना
बँधे प्रेम डोर जग बर, सदा मोर तो परान मा जी।
धरे बानगी गजानंद शूर वीर पुरखा।
कहे जान हे निछावर नित समाज आन मा जी।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*
*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*
*1121 2122 1121 2122*
दगा दे जही जवानी तहूँ मीत गीत गा ले।
मिले ना समय दुबारा बने कर्म ला बना ले।
धरौ साथ गुरु गुनी के मिले ज्ञान के खजाना।
ददा दाई के चरन मा सदा माथ ला नँवा ले।
रहौ दूर नाश दारू करे खोखला बसे घर।
दही दूध घी मही मा बने तन अपन सजा ले।
दिखे छाँव ना खुशी के तिपे घाम बड़ बिपत के।
गली गाँव घर शहर मा मया पेड़ ला लगा ले।
बढ़ा पाँव ला गजानंद धरे बात ला सियानी।
दया दान कर जगत मा खुदे नाम ला कमा ले।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*
*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*
*1121 2122 1121 2122*
लमा हाथ सत धरम बर तभे जग मा नाँव मिलही।
लगा पेड़ ला सुमत के तभे सुख के छाँव मिलही।
लगे भाँय भाँय अँगना गली खेत खार सुन्ना।
सजे मोर आँख सपना कहाँ अब वो गाँव मिलही।
चले तोर जोर जाँगर हवे तब तलक पुछाड़ी।
धरे आय तन बुढ़ापा तहाँ हाँव हाँव मिलही।
बिछे जाल छल कपट के इहाँ देख ताक चलबे।
रचे कूटनीति के अब घरों घर मा ठाँव मिलही।
बचा आज तैं गजानंद अपन आप ला इहाँ।
कहे जेन ला अपन तैं सदा ओखरे से घाँव मिलही।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*
*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*
*1121 2122 1121 2122*
नवाँ माथ गुरु चरण मा सुखी तोर द्वार होही।
फँसे बीच नाँव जिनगी कृपा गुरु पा पार होही।
रखे दूर गुरु बुराई जला जोत ज्ञान हिरदे।
खड़े ढाल बन बिपत मा जिहाँ सच पुकार होही।
सहीं राह गुरु दिखाये मिले बड़ नसीब ले वो।
सजे मन घड़ा बरोबर पड़े हाथ गुरु कुम्हार होही।
पढ़ा पाठ एकता गुरु कहे संग संग रइहौ।
रहे मान शिष्य गुरु के इही बात सार होही।
जपे नाम ला गजानंद सदा अपन तो गुरु के।
मिले तोर ज्ञान के जनमो जनम ले उधार होही।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
*बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]*
*फ़यलात फ़ाइलातुन फ़यलात फ़ाइलातुन*
*1121 2122 1121 2122*
लुटे खेत झन दुवारी बने तैं सवाल रख ले।
करे याद तोला पीढ़ी लहू मा उबाल रख ले।।
बढ़ा पाँव हक लिये बर चलौ संग संग साथी।
उगे भोर सुख सुमत के सदा कर्म ढाल रख ले।
रहौ दूर ढ़ोंग पाखंड धरौ जुबान सच के।
बसे देव तोर घर मा ददा दाई ख्याल रख ले।।
करे हाय हाय धन बर इहाँ छोड़ सब हे जाना।
लगा मन करम धरम मा उठा ऊँचा भाल रख ले।
जले जोत सत गजानंद इही साँस मा हमेशा।
मिटे घोर दुख तमस ज्ञान के तैं मसाल रख ले।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )

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