(1) हिंदी गज़ल
बहर- 2122 2122 212)
लड़खड़ाते देश के हालात हैं, भूख से बिलखते ये नवजात हैं। दाग़ है दामन पे सिंहासन के अब, बेच खाते देश आदम-ज़ात हैं। हैं नशे में चूर सत्ता के सभी, समझते ये बाप की ख़ैरात हैं। रो रही दुल्हन यहाँ अब सेज पर, और चोरों की सजी बारात हैं। फ़िक्र 'पात्रे' देश की किसको यहाॅं, हर घड़ी बैठे लगाए घात हैं। शायर: इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
(2) हिंदी गजल-
बह्र: 2122 2122 212
तख़ल्लुस: सत्यबोध
चेहरे की असलियत अब जान लो।
कौन है जयचंद, तुम पहचान लो।
है छुपा गद्दार अपने देश में,
बन विभीषण जो रहे, तुम मान लो।
एक के बदले कलम दस सिर कहाँ?
पूछता है देश, अब संज्ञान लो।
चाहिए अब दुश्मनों के सिर कलम,
बैठ सिंहासन पे फिर सम्मान लो।
भूल मत हरगिज़ शहादत वीर की,
है कसम माँ भारती की, ठान लो।
पीठ पीछे वार जो है कर रहा,
पाक से अब छीन तुम पहचान लो।
माफ़ करना भूल होगी 'सत्यबोध',
कर सफ़ाया, छीन उनकी जान लो।
(3) हिंदी गजल-
बहर- 2122 2122 212)
लेखनी में धार होना चाहिए।
शेर सी ललकार होना चाहिए।।
सह चुके हम दासता की बेबसी,
ज़ुल्म पर अब वार होना चाहिए।
देश में पहचान संविधान का,
भीम का जयकार होना चाहिए।
ज्ञान का नव दीप तुम रोशन करो,
अब न ये अँधकार होना चाहिए।
तुम निवासी देश के सच्चे अगर,
देश से तुमको प्यार होना चाहिए।
दूर करना है लुटेरों को हमें,
हाथ में तलवार होना चाहिए।
बात 'पात्रे ' हक़ की ही करता रहे,
ऐसा ही किरदार होना चाहिए।
(4) हिंदी गजल-
बहर- 2122 2122 212)
आज कोरोना कहर में देश है।
कौन जिम्मेदार किसका द्वेष है।।
हर तरफ़ लाशें बिछी हैं देख लो।
ख़ौफ़ से मन में उभरता क्लेश है।।
लाकडाउन हो रही नित साँस भी।
तन बना अब राख का अवशेष है।।
है विषम दुख की घड़ी खुद ध्यान दो।
आप हम सब के लिए निर्देश है।।
लिख दिया विपदा कहानी सत्यबोध।
थाम दिल पढ़िए ग़ज़ल यह पेश है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 04/05/2021
(5) हिंदी गजल-
बहर- 2122 2122 212)
मैं बहुत बेबस दुखी लाचार हूँ। बीच दरिया में फँसा पतवार हूँ।। छोड़ जाना है मुझे तेरा शहर, चार दिन का मैं किरायेदार हूँ। आदमी ही आदमी को डस रहा, देखता बन मौन मैं संसार हूँ। लोग दिखते अंध श्रद्धा पाठ में, रोज सजता धर्म का बाजार हूँ। सत्य को कब आँच आया "सत्यबोध" झूठ को सच काटता तलवार हूँ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
(6) हिन्दी ग़ज़ल-
वज्न- 2122 2122 212
सोचते रहते हैं अक्सर रात में।
डूब क्यों जाते हैं मंज़र रात में।।
बेसहारा हो न जाये आसमां,
झिलमिलाते हैं समंदर रात में।
दर्द का मारा हुआ हूँ इसलिए,
ओढ़ मैं सोता हूँ चादर रात में।
गाँव मेरे खिलखिलाते हैं सदा,
ये शहर लगते हैं खंडहर रात में।
अज़नबी का बन नबी पात्रे यहाँ,
तोड़े मत कोई छप्पर रात में।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
(7) हिन्दी ग़ज़ल-
वज्न- 2122 2122 212
रास्ता मंज़िल का अपनी खो गया,
ग़फ़लतों की नींद में जो सो गया।
दर्द की ऐसी घटा छाई यहाँ,
अश्क का दरिया अचानक रो गया।
वक़्त ने पाकीज़गी बख़्शी हमें,
दाग़ दामन का हमारे धो गया।
बो रहा था नफ़रतें जो शहर में,
आज अपने ही वो काँटे बो गया।
थी तमन्ना जिसकी बरसों 'सत्यबोध',
वो हसीं लम्हा भी आख़िरी हो गया।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/07/2026
•|| ग़ज़ल||•
(वज़्न: 2122 2122 212)
देश की मिट्टी पे हमको नाज़ है
मुल्क की हर शान इक अंदाज़ है
खून की बौछार से सींचा जिसे
वो तिरंगा सर पे मेरे ताज है
जंग में दी जान जिन परवानों ने
आज उनका ख़ून ही आग़ाज़ है
ज़ुल्म की दीवार को ढाया जिधर
हर तरफ गूँजी नई आवाज़ है
सर कटा कर जो बचाए आबरू
उन शहीदों पर हमें परवाज़ है
वक्त की हर एक ठोकर से लड़े
हर सिपाही देश का जाँबाज़ है
देश पर कुर्बान तन-मन सत्यबोध
ज़िंदगी अपनी तो बस इक साज़ है
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)15/08/2026
•||ग़ज़ल ||•
वज़्न: 2122 2122 212
ज़िन्दगी का हर फ़साना चल दिया
कारवाँ बे-आशियाना चल दिया
रास्ता रोका किसी ने किस तरह
वक़्त का यूँ ही तराना चल दिया
ख्वाब आँखों में सजाए थे जो कल
आज वो सारा ज़माना चल दिया
ढूँढते हैं जिसको हम सारी उमर
वो छुपा कोई खज़ाना चल दिया
दर्द की चादर लपेटे 'पात्रे' अब
हर तरफ़ ढूँढो बहाना चल दिया
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)10/08/2026
•|| ग़ज़ल ||•
(वज़्न: 212 212 212 212)
जिंदगी बे-सबब कम-नज़र हो गई
राह की हर डगर दर-ब-दर हो गई
ज़िंदगानी के इस सिलसिले में हमें
हर ख़ुशी से नज़र बे-ख़बर हो गई
शब के सीने में जलता रहा इक दिया
बे-दिली की फ़ज़ा मुख्तसर हो गई
ढूँढता ही रहा उम्र भर जिसको मैं
वो नज़र से मगर बे-असर हो गई
छुप गए इस क़दर हम यहाँ 'सत्यबोध'
ज़िंदगी अजनबी इक सफ़र हो गई
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)13/08/2026
(8) हिंदी गजल-
(बहर- 2122 2122 2122 212)
नोंचता है तन यहाँ जो गिद्ध कौआ बाज है।
भेड़ियों का रूप साजे लोमड़ी का राज है।।
कौन करता है हिफाज़त देश की तक़दीर की?
घुन लगा है इस तरह जैसे कि कोई खाज है।।
भूख से तड़पी हुई हर एक की आवाज़ है,
हर तरफ फैली हुई बे-रोज़गारी आज है।
जंग सत्ता की खड़ी मैदान में तलवार ले,
काटता है सिर तुम्हारा, ढूँढता वो ताज है।
कौन सुलझाए पहेली इस सियासत की यहाँ,
जानते हैं सब मगर, पात्रे छुपा यह राज़ है।
(9) हिंदी ग़ज़ल-
बहर- (2122 2122 2122 212)
ग़म किसी का बाँट लो तुम, यह खुशी का राज़ है।
कौन देखेगा यहाँ कल, जो भी है वो आज है।।
हैं सभी मसरूफ़ अपने ही सुखों में आजकल,
रो रहा हर घर बुढ़ापा, आज की आवाज़ है।
पाँव में छाले पड़े धन को कमाने के लिए?
साथ जाना कुछ नहीं, यह सोच ही परवाज़ है।
हर क़दम पड़ती ज़रूरत है यहाँ परिवार की,
दूर रहकर अपनों से, कैसा अनोखा नाज़ है?
रंग भर लो प्यार का तुम आज इस संसार में,
जिंदगी संगीत बिन जैसे अधूरा साज़ है।
रोक मत बढ़ते क़दम को राह-ए-ख़िदमत में कभी,
नोंचता है तन-बदन, जो कौआ या फिर बाज़ है।
मान लो पात्रे बड़ों की हर नसीहत को यहाँ,
फिर ज़माने में तुम्हारे सर बँधा सरताज़ है।
(10) हिंदी गजल-
(बहर- 2122 2122 2122 212)
पूछते हैं लोग मंदिर में बसे भगवान को।
क्या चढ़ाऊँ भोग मैं या क्या करूँ अब दान को?
देख बाहर भूख से जो है तड़प कर गिर पड़ा,
है जरूरत दान की बस आज उस इंसान को।
माँगते हो क्यों भला तुम एक पत्थर-मूर्त से?
रोक जो सकता नहीं है चोर बेईमान को।
है बसा भगवान मन में, बात ये तुम जान लो,
ढूँढता क्यों फिर रहा है तू किसी अनजान को?
है बड़ा ही कर्म दुनिया में किसी भी धर्म से,
श्रम की रोटी ही दिलाती है यहाँ पर मान को।
लोग पढ़-लिखकर भी क्यों नादान बनकर घूमते?
काट पाता है भला क्या तीर्थ गंगा-स्नान को?
मत करो 'पात्रे' यहाँ तुम धर्म की बातें कभी,
है बहुत मुश्किल जगाना इस जगत नादान को।
(11) हिंदी गजल
(बहर- 2122 2122 2122 212)
आज दुनिया में कहाँ है सच्ची पहचान भी।
झूठ पाता है यहाँ अब मान और सम्मान भी।।
रास्तों पर सो रहा है आज वो कुनबा सभी,
ढूँढते हो व्यर्थ क्यों हँसने का तुम अरमान भी।
छोड़ जाओ मित्र यह चीज़ दौलत का नशा,
साथ जाता है कहाँ इंसान का सम्मान भी।
जिस तरह बाज़ार में हर एक सामान है,
इस कदर बिकता यहाँ अब धर्म भी ईमान भी।
धर्म के बाज़ार में बिकते हैं देखो आज तो,
कौन जाने नित्य कितने रूप में भगवान भी।
बच सका ना काल के इस दर्प से कोई यहाँ,
रंक राजा संत ज्ञानी और सब धनवान भी।
स्वार्थ में दुनिया खड़ी है बात इतनी सुन जरा,
पात्रे बना क्यों इस जहाँ में इतना तू नादान भी।
(12) हिंदी ग़ज़ल
(बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़ )
2122 2122 2122 212
साथ उसका आज छूटा बेसहारे हो गए।
थे कभी कश्ती नदी के, अब किनारे हो गए।।
जो सुहाने ख़्वाब आँखों में सजाये थे कभी,
तोड़ नाता दो दिलों का, वो अंगारे हो गये।
रो पड़ा है आज अम्बर देख कर ग़म की घटा,
चाँद भी रूठा खफ़ा क्यों अब सितारे हो गए।
कर सके ना प्यार में उनसे जफ़ा कोई सनम,
बेवफ़ा वो कह गए, इल्ज़ाम सारे हो गए।
रूह में बस नाम तेरा गूँजता है रात दिन,
आज सूने-सूने से दिल के नज़ारे हो गए।
छेड़ता है तान कोई ग़म जताने को हमें,
ग़म के सब संगीत हमको अब गँवारे हो गए।
लौट आओ अब सनम, पात्रे बुलाता है तुझे,
अब जुदाई के नहीं दिन ये गुज़ारे हो गए।
(13) हिंदी ग़ज़ल
(बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़ )
2122 2122 2122 212
हूँ शराबी प्यार का इल्ज़ाम तेरे नाम है।
कुछ नहीं पहचान मेरी नाम तेरे नाम है।।
पी रहा हूँ ताकि मैं भी दूर यादों से रहूँ,
मयकदे छलके नशा हर जाम तेरे नाम है।
देखकर ये बंद बोतल प्यास उठती है वफ़ा,
है सजी महफ़िल सुबह, हर शाम तेरे नाम है।
तोड़ना दिल बेवफाओं की नई आदत बनी,
बिक गया दिल मुफ़्त में हर दाम तेरे नाम है।
आख़िरी ये सांस पात्रे दे रही है ये दुआ,
खुश रहे तू ही सदा पैगाम तेरे नाम है।
इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
हरे रमल मुसम्मन महजूफ़ )
(बहर- 2122 2122 2122 212)
देख मंज़र मौत फिर भी बेख़बर इंसान है।
शोहरत धन जोड़ने में बस लगाया ध्यान है।।
काम नेकी का ही कर ले, ज़िंदगी दो चार दिन,
दीन दुखियों की मदद कर इससे ही पहचान है।
तेरे धन का मोल क्या है, झाँक अपना तू ज़मीर,
कौन तुझको जानता है क्या तेरा जग मान है।
सुख चमन उजड़ा हुआ पतझड़ लगी है जिंदगी,
चुप पड़ा है बागबाँ अब साँस भी वीरान है।
मिट गए सब रंक राजा साथ कुछ ना ले गए,
जानकर पात्रे भला सच क्यों बना नादान है।
07/05/2021
(15) हिंदी गज़ल
(बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़ )
(बहर- 2122 2122 2122 212)
भावना रख प्रेम की, जीना मुझे संसार में।
आशियाँ नफ़रत मिटा कलियाँ खिला गुलजार में।।
मज़हबी इंसान से रखना बना कर दूरियाँ,
मतलबी बन बेचता है मान जो बाजार में।
चापलूसी का ज़माना आ गया है लो समझ,
सत्य रोता है जहाँ अब झूठ के दरबार में।
सोचता हूँ छोड़ दूँ लिखना ग़ज़ल अब छंद मैं,
दाग झूठा मत लगे मेरे कलम किरदार में।
सीख लो जीना अकेले याद उसकी तू मिटा,
ढूँढता पात्रे वफ़ा क्यूँ बेवफ़ा दिलदार में।
•|| ग़ज़ल ||•
(बहर- 2122 2122 2122 212)
नर्म माटी, खेत सोना, मुस्कुराते गाँव हैं।
झूमती है हर तरफ अब, प्रेम के ही छाँव हैं।
रुक गए जो राह में वे, पार कर लेंगे कभी,
हौसले के नाम अपने, जीत के सब दाँव हैं।
धूप में जो जल रहे थे, छाँह उनको दी गई,
है यही तो सभ्यता जो, प्रेम के ही भाव हैं।
बोलते जो शब्द मीठे, दिल उसी में बस गए,
साधना के सार देखो, रूप ये ही पाँव हैं।
देख इनको याद आती जड़ यहाँ पर 'सत्यबोध',
भोर की तो लाली जैसे, सुनहरे ये ठाँव हैं।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)17/07/2026
•|| ग़ज़ल ||•
बहर: 2122 2122 2122 212
दिल पुकारा है तुम्हें इक आशियाने के लिए।
छोड़ बैठा हूँ ज़माना इक फ़साने के लिए।
ढूँढता फिरता हूँ मैं हर मोड़ पर उस याद को,
जल रही है ये शमा भी इक दिवाने के लिए।
किसने देखा है भला कल की हसीं तारीख को,
जी रहे हैं हम भी अब तो इक बहाने के लिए।
ख्वाब आँखों में सजे हैं जो तुम्हारे प्यार के,
दिल मेरा पागल हुआ है इक ठिकाने के लिए।
तुम नहीं तो ये बहारें सब अधूरी 'सत्यबोध',
महफ़िलें तो हैं सजीं बस इक तराने के लिए।
✍️ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 18/07/2026
•|| ग़ज़ल ||•
(वज़्न: 2122 2122 2122 212)
देश की खातिर हमेशा जान देना सीखिए
इस तिरंगे को हमेशा मान देना सीखिए
रोशनी मिलती रहे हमको लहू के दीप से
ज़िंदगी को देश पर कुर्बान देना सीखिए
जो नज़र तिरछी कभी डाले हमारे देश पर
उन हवाओं को नया तूफान देना सीखिए
सरहदों पर जो डटे हैं मुल्क की रखवाली में
उन जवानों को सदा सम्मान देना सीखिए
जो यक़ीं हो जीत पर तो जंग के मैदान में
अपनी ग़ैरत की नई पहचान देना सीखिए
हौसलों के दीप से रोशन करो तुम ऐ जहाँ
देश की हर आन पर अब ध्यान देना सीखिए
देश पर हो मिटने कोई बात जब भी 'सत्यबोध'
हँस के अपना हर नया अरमान देना सीखिए
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)14/08/2026
(16) हिंदी ग़ज़ल
बहरे मुतकारीब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
चले ज़ख़्म खाकर सनम राह में हम,
मिले बेवफ़ा से वफ़ा चाह में हम।
नज़र जो झुकी तो गिरा आसमां है,
तड़प ही रहे हुस्न की गाह में हम।
चलो भूल जाएँ दिसंबर की बातें,
बढ़ें अब नए साल के माह में हम।
कसम है जवानी सुनो साथ दो तुम,
मिलें प्रेम की इस तरह थाह में हम।
बने प्रेम रोगी दवा दे जा साक़ी,
कि बर्बाद हैं बस इसी आह में हम।
बहरे मुतकारीब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
बह्र- 122 122 122 122
उठे तिश्नगी मन मिटाये रखो तुम।
शमां प्रेम की नित जलाये रखो तुम।।
भुला दो ग़मों की चलो सब कहानी।
लबों पे हँसी अब सजाये रखो तुम ।।
कहीं मिट न जाये ए हस्ती तुम्हारी।
रगों में रवानी बनाये रखो तुम।।
मिलेगा वही जो लिखा है मुकद्दर।
समय पर निगाहें टिकाये रखो तुम।।
गजानंद ताकत कलम की समझ लो।
सदा पाँव सच को बढ़ाये रखो तुम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )03/05/2021
(18) हिंदी ग़ज़ल
बहरे मुतकारिब मुसम्मन सालिम
फ़उलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
वज्न: 122 122 122 122
खफ़ा यार है अब मनाना पड़ेगा,
शमां प्यार की फिर जलाना पड़ेगा।
ख़ता भी उसी से जफ़ा भी उसी से,
वफ़ा भी उसी से बताना पड़ेगा।
मिला ज़ख्म मुझको इनायत है उसकी,
शिक़ायत मुझे यह भुलाना पड़ेगा।
सनम ने क़सम तोड़ दी साथ जीना,
अकेले सफर अब बिताना पड़ेगा।
दुआ पात्रे करता सलामत रहे वह,
मुझे ग़म से नाता निभाना पड़ेगा।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
(19) हिंदी ग़ज़ल
बहरे मुतकारिब मुसम्मन सालिम
फ़उलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
वज्न: 122 122 122 122
मुहब्बत की राहों में चलना सिखाया,
मुसीबत में हँस कर सँभलना सिखाया।
दिलों में अँधेरा बहुत बढ़ गया था,
मगर एक दीये ने जलना सिखाया।
नदी की तरह हम भी बहते रहे हैं,
हमें वक़्त ने बस बदलना सिखाया।
सुलगते रहे हम भी ग़म की अगन में,
मगर ज़िन्दगी ने पिघलना सिखाया।
जहाँ लोग डर कर ही रुकने लगे थे,
गजानंद को भी निकलना सिखाया।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 04/07/2026
(20) हिंदी ग़ज़ल
बहरे मुतकारिब मुसम्मन सालिम
फ़उलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
वज्न: 122 122 122 122
उजाला ही अब तो फ़साना हुआ है,
कि तुमसे बिछड़कर ज़माना हुआ है।
नगर में हमारे जो कल तक था राही,
वही आज दिल का ठिकाना हुआ है।
सुनाई न जिसने कभी अपनी धड़कन,
उसी का लबों पर तराना हुआ है।
नज़र से गिरा जो समझ कर पराया,
वही शख़्स अब तो यगाना हुआ है।
मिला जो 'गजानंद' को हौसला है,
सफ़र में वही आशियाना हुआ है।
✍️ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 05/07/2026
ग़ज़ल:
(बहर- 122 122 122 122)
मुहब्बत में दिल का लगाना बुरा है,
समझकर भी धोखा ये खाना बुरा है।
चले आइए अब कि तरसें निगाहें,
यूँ अपनों को अपनी रुलाना बुरा है।
जो वादे किए थे भुलाने लगे हो,
हसीं ख़्वाब ऐसे दिखाना बुरा है।
ज़माने के डर से जो पीछे हटे तुम।
तो दुनिया को सच ये बताना बुरा है।
गिला जो भी दिल में है खुलकर कहो तुम,
यूँ बातों को दिल में छुपाना बुरा है।
हँसी में उड़ाते हो तुम हर गिला ही,
किसी की वफ़ा को भुलाना बुरा है।
दिया साथ जिसने तुम्हारा हमेशा,
उसे 'पात्रे' यूँ ही सताना बुरा है।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)09/07/2026
|| ग़ज़ल ||
(बहर- 122 122 122 122)
चले लौट आओ, खुदा की कसम है,
बची ज़िंदगी में, ये साँसे भी कम है।
अधूरा सफ़र है, कहाँ तुम गए हो?
जहाँ देखते हम, वहीं पे सितम है।
दुआ में भी तुमको, पुकारा है हमने,
मुक़द्दर में मेरे, फ़क़त एक गम है।
नज़र ढूँढती है, तुझे हर घड़ी अब,
तेरी याद का ही, ये मरहम नरम है।
कहानी लिखी दिल की मैंने 'गजानंद',
जफ़ा राह में क्यों वफ़ा का भरम है।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
दिनांक: 16/07/2026
(बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर)
वज़्न: फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
(122 / 122 / 122 / 12)
तुझे भूल जाऊँ गँवारा नहीं,
तुम्हारे सिवा अब सहारा नहीं।
चमक चाँदनी रात की ओट में,
चकोरी बिना चाँद तारा नहीं।
नदी बीच माझी है आकर खड़ा,
बिना प्यार साहिल किनारा नहीं।
निभानी पड़ेगी हमें ही वफ़ा,
यकीं मैं करूँ ये तुम्हारा नहीं।
गजानंद उम्मीद-ए-चाहत रखो,
बिना प्यार जीवन गुजारा नहीं।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
(बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर)
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
122 122 122 12
करो बन्द मधुशाला दरकार है,
उजड़ तो रहा आज परिवार है।
उसे फिक्र राजस्व की है पड़ी,
इधर तो सजी मौत बाजार है।
हुए हाल बेहाल जनता सभी,
अभी त्रस्त कोरोना संसार है।
नशा नाश की खान छत्तीसगढ़,
बना आज सुर्खी ये अखबार है।
गजानंद जी बन्द हो मयकदे,
नियम ठोस सरकार लाचार है
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
( बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
122 122 122 12 )
मुझे प्यार में तुम रुलाना नहीं,
जुदा हो कभी भी भुलाना नहीं।
चले सांस जब तक रहो साथ तुम,
वफ़ा का चलन तुम मिटाना नहीं।
कदम डगमगाए कभी जो सनम,
हमें छोड़ तुम दूर जाना नहीं।
वफ़ा के ही नग़्मे सुनाता रहूँ,
जुदाई का क़िस्सा सुनाना नहीं।
गुज़ारिश करूँ आपसे मैं यही,
किसी और से दिल लगाना नहीं।
पता है मुझे तू नहीं बेवफा,
कभी याद रुसवा दिलाना नहीं।
'सत्यबोध' दिल में छुपा कर रखो,
कभी आँख आँसू बहाना नहीं।
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
( बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
(122 122 122 12 )
शमा प्यार की तुम बुझाना नहीं,
मुझे इश्क़ में तुम रुलाना नहीं।
रहूँ ज़ुल्फ़ का आसरा कर सदा,
कहीं दूर जाकर भुलाना नहीं।
वफ़ा का सिला बेवफ़ा मत मिले,
किसी और से दिल लगाना नहीं।
लहू बन बसे हो रगों में सनम,
निशां प्यार का तुम मिटाना नहीं।
गजानंद फ़रियाद जब भी करे,
चले आना वापस सताना नहीं।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 07/05/2021
•|| ग़ज़ल ||• ( बहर: 122 122 122 12) नज़र में वफ़ा का असर रह गया, ख़ुदा का दिया इक हुनर रह गया। परिंदे हवाओं में उड़ने लगे, शज़र पर अकेला समर रह गया। ज़माने की साज़िश के परदे उठे, दिलों में छुपा कुछ कसर रह गया। सफ़र ज़िंदगी का कठिन है बड़ा, अधूरा यहाँ हर सफ़र रह यहाँ। अजब खेल देखे ज़माने के हम, गजानंद बाक़ी भँवर रह गया। ✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 24/07/2026
•|| ग़ज़ल||• (बहर- 122 122 122 12) सफ़र में जो साया बने यार का, वही नाम सच्चा मिला प्यार का। अँधेरे में जलता जो दीपक दिखे, वही मीत है अपने संसार का। गले से लगा ले मुसीबत में जो, बड़ा मान होता है दिलदार का। भुलाए न भूले कभी जो कोई, बड़ा आसरा है उसी धार का। दुआ है सलामत रहे हर डगर, करम मानिए सच्चे सरदार का। मुसीबत में रहता खड़ा जो सदा, वही मीत है यार गुलज़ार का। गजानंद बातें सुनो अब ज़रा, यही रंग होता है तकरार का। ✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)02/08/2026
•|| ग़ज़ल ||• (वज़्न: 122 122 122 12) नज़र में वफ़ा का सितारा रहे दिलों में मुहब्बत का धारा रहे चले जो हवाएँ तो ऐसा लगे कि हर सू तुम्हारा इशारा रहे बुझाना न दीया इरादों का तुम अंधेरों से हर पल किनारा रहे न हो कोई शिकवा ज़माने से अब जो किस्मत में अपनी गुजारा रहे कटे उम्र सारी तेरी चाह में ख़ुदा से यही इक सहारा रहे ज़माने की ठुकराई दुनिया में हम मगर दिल में कोई तुम्हारा रहे गजानंद बन मीत रहना सदा वफ़ा का ही पैग़ाम सारा रहे ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)12/08/2026
(25) हिंदी ग़ज़ल
(हज़ज मुसम्मन सालिम)
बहर- 212 212 212 212
छोड़ कर साथ वो अजनबी बन गए,
बेवफ़ा हैं सनम मतलबी हो गए।
जब भी आती है उनकी वफ़ा की सदा,
वो जो लम्हे थे अब ज़िंदगी हो गए।
हम रहे मौन ले अश्क सौगात में,
ग़ैर ही आज उनके नबी हो गए।
लाज़मी है सज़ा प्यार की राह में,
दर्द जितने थे सब दिल्लगी हो गए।
माँगता हूँ दुआ खुश रहे तू सदा,
फिर गजानंद के दिन सुखी हो गए।
✍️ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
(26) हिंदी ग़ज़ल
(बहरे-हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़ / मक़सूर)
बहर- 212 212 2122
दिल के दुख की दवा तू बता दे।
बेवफ़ा मत मुझे तू सज़ा दे।
रो रही रात यादें सँजोये,
प्यार का तू चरागे जला दे।
अब सही जाती मुझसे जुदाई,
आ ज़हर मौत का तू पिला दे।
दर्द में गर कोई भी कमी हो,
आ मेरे ही कफ़न को जला दे।
है गजानंद फ़रियाद रब से,
वो सलामत रहे ये दुआ दे।
✍️ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
•|| ग़ज़ल ||•
बहर: 212 212 212 2
बेवफ़ा से वफ़ा चाहते हैं
इश्क़ में भी नफ़ा चाहते हैं
रास्ते में मज़ा क्या सफ़र का
दर्द की अब शिफ़ा चाहते हैं
दिल्लगी में ज़रा सोचिए तो
आप किससे खफ़ा चाहते हैं
मुफ़्लिसी की नमी देख कर क्यों
आप हमसे जफ़ा चाहते हैं
जिंदगी में हमेशा गजानंद
लोग दिल से सफ़ा चाहते हैं
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 25/07/2026
•|| ग़ज़ल ||•
(बहर: 212 212 212 2)
हम सफ़र कारवाँ हो चला है
हर तरफ़ आसमाँ हो चला है
ढूँढते उम्र भर हम जिसे थे,
दिल का वो राज़दाँ हो चला है।
तिश्नगी इस क़दर बढ़ चली तो
जाम भी अब रवाँ हो चला है
फूल गुलशन में फिर खिल रहे हैं
वक़्त भी अब जवाँ हो चला है
लिख रहे हैं ग़ज़ल अब गजानंद
हर तरफ़ अब निशाँ हो चला है
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)27/07/2026
(27) हिंदी गजल-
बहर( 212 212 212 212 )
(02/05/2021)
कौन किसका यहाँ अब मददगार है,
हर तरफ आदमी आज लाचार है।
दोस्त, दौलत यहाँ काम आयी नहीं,
खौफ में आज सारा संसार है।
मुश्किलों में तलाशें हैं वो फायदे,
मौत पर जो चला, वो व्यापार है।
विष ग़मों का पिलाया है अपनों ने ही,
कर पता अब भला कौन गद्दार है।
छीन ली हर खुशी एक वायरस ने,
आज उजड़ा हुआ सब परिवार है।
हाथ में हाथ रख, अब न बैठें कहीं,
अब हिफ़ाज़त करें, अर्ज सरकार है।
चर्च सुनसान है, बंद मंदिर पड़ा,
ऐ 'सत्यबोध' अब सब निराधार है।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
(28) हिंदी ग़ज़ल
बहर- 212 212 212 212
एक प्रतिमा की सूरत गढ़ना मुझे,
छंद कविता गज़ल में तो पढ़ना मुझे।
चाटुकारी लिखे वो क़लम मैं नहीं,
राह सच थाम कर ही है बढ़ना मुझे।
दर्द सीने में है दीन मजलूम का,
हक़ इन्हें देने को जंग लड़ना मुझे।
पीठ पीछे बुराई न भाए मुझे,
सामने सबके सच ही है कहना मुझे।
हौसला बाजुओं में रहे नित नया,
बन के सागर की धारा है बहना मुझे।
कुछ भरोसा नहीं आजकल साँस का,
कुछ दुआएँ सलामत की करना मुझे।
मुक्त हो जब परिंदा उड़े आसमाँ,
अलविदा ऐ गजानंद कहना मुझे।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )03/05/2021
| ग़ज़ल ||• (बहर: 212 212 212 212) दर्द की रात में तुम सँवरने लगे आप दिल में हमारे उतरने लगे हर तरफ़ नूर ही नूर दिखने लगा सब्र के सिलसिले सब बिखरने लगे आरज़ू बन के आँखें बिछाए हुए रास्ते खुद-ब-खुद ही सुधरने लगे ज़िन्दगी में अजब इक रवानी हुई वक़्त के पाँव जब से ठहरने लगे फूल चेहरे तुम्हारे खिले इस तरह आईने आपसे क्यों मुकरने लगे तीर नज़रों के ऐसे चलाये सनम दौर उल्फ़त के ऐसे गुज़रने लगे नाम यादों में आ ही गया सत्यबोध दर्द दिल से ज़रा अब उभरने लगे ✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 27/07/2026
•|| ग़ज़ल||• (बहर: 212 212 212) चाँदनी छा गई रात में, रोशनी आ गई बात में। जिंदगी ने दिया जो मज़ा, ढूँढते हम रहे घात में। दूरियाँ मिट गईं इस तरह, चैन आया मुझे मात में। हर तरफ़ प्यार की धूप है, रात बीती मुलाकात में। हर खुशी आ मिली सत्यबोध, छोड़ ग़म प्यार जज़्बात में। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)26/07/2026
•|| ग़ज़ल ||• (बहर: 212 212 212 212 / फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन) शाम ढलते ही फिर याद आने लगे मेरे दिल में कोई अक्स छाने लगे ज़िन्दगी की महक आपके प्यार से सूखे मौसम भी फिर से सुखाने लगे दूरियों के अंधेरे मिटे इस तरह रास्ते अपने घर के बताने लगे कुछ हवा में था जादू सा या आपका फूल शाखों पे बन के ज़माने लगे दर्द की धूप में जो झुलसते रहे प्यार की छाँव में वे ठिकाने लगे देखकर आपका सादगी चेहरा दिल के अरमान फिर से जगाने लगे लिख रहे हैं सभी हम नज़र सत्यबोध लफ़्ज़ कागज़ पे जलकर मुस्कुराने लगे
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 2122 1212 22/ 112)
माँ तुझे मैं प्रणाम करता हूँ,
जिंदगी तेरे नाम करता हूँ।
दे के अपना लहू मुझे पाला,
सज़दे में चारों धाम करता हूँ।
कर्ज़ माँ दूध का चुका पाऊँ,
खुद को तो मैं ग़ुलाम करता हूँ।
क्या बुरा क्या भला बताया माँ,
राह सच थाम काम करता हूँ।
ऐ गजानंद याद करके माँ,
छंद अर्पित कलाम करता हूँ।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 08/05/2021
॥ ग़ज़ल ॥
बह्र- 2122 / 1212 / 22
दिल की बातों को दिल में रहने दो,
ग़म का दरिया है, इसको बहने दो।
सामने सब के ज़हर का प्याला,
शौक़ से अब तो दर्द सहने दो।
धूप में चल के आ रहे हैं हम,
अब घटाओं को हाल कहने दो।
कांच के घर बनाए बैठे हैं,
आँधियों को यहीं पे ढहने दो।
है गजानंद रात ये काली,
ख़्वाब आँखों को आज गहने दो।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
|| ग़ज़ल || (बहर- 2122 1212 22/112) दर्द दिल का छुपा नहीं पाया, आँख से वो गिरा नहीं पाया। उम्र भर जो रहा मेरे दिल में, नाम उसका बता नहीं पाया। ग़म के साए थे इस क़दर गहरे, ख़ुद को मैं भी हँसा नहीं पाया। काँच के घर बना तो लिए पर, कोई पत्थर हटा नहीं पाया। सामने वो खड़ा ही था लेकिन, हाथ आगे बढ़ा नहीं पाया। बात जो कहनी थी ज़माने से, डर के मारे सुना नहीं पाया। है 'गजानंद' खोजता रास्ता, पर कहीं घर बना नहीं पाया। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 14/07/2026 ✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 13/07/2026
|| ग़ज़ल ||• (बहर: 2122 1212 22) रात का ज़ख़्म भर नहीं पाया, ख़्वाब कोई उतर नहीं पाया। उम्र भर ढूँढता रहा ख़ुद को, वो मुसाफ़िर ठहर नहीं पाया। ज़िंदगी के बुझे हुए दीये, दिल में फिर भी भँवर नहीं पाया। फासला ये बढ़ा हुआ है जो, ख़ुद में कोई असर नहीं पाया। दिल में तूफ़ान थे मगर लब तक, आँसुओं का सफ़र नहीं पाया। वक़्त ने यूँ बदल दिया सब कुछ, मैं भी कल से उबर नहीं पाया। मंज़िलें सामने ही थीं लेकिन, पाँव को रहगुज़र नहीं पाया। साज़ दिल का बिखर गया अब तो, दर्द का कुछ सब्र नहीं पाया। ढूँढता है जो रोशनी 'पात्रे', ख़ुद की ही वो सहर नहीं पाया। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 19/07/2026
•|| ग़ज़ल ||• (बहर: 2122 1212 22) शौक़ में ज़िन्दगी लुटाते हैं दर्द सीने में अब छुपाते हैं राह में दूर तक अंधेरा है दीप बन खुद ही को जलाते हैं साजिशों के तमाम मेले में हम अकेले ही मुस्कुराते हैं वक़्त की बेरुखी से क्या डरना हम नए रास्ते बनाते हैं जिंदगी इम्तिहान लेती है पर 'गजानंद' सर झुकाते हैं ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)29/07/2026
•|| ग़ज़ल ||• (वज़्न: 2122 1212 22) क़ाफ़िला ज़िंदगी का चलता है हर तरफ़ दर्द ही मचलता है शब के सीने पे नक़्श है कोई चाँद तन्हा सा हाथ मलता है लोग मतलब के यार होते हैं कौन हर वक़्त दिल में खलता है? सुब्ह की धूप में नमी सी है अश्क़ से ही जहाँ ये ढलता है होश में सत्यबोध आ जाओ देख हर शख़्स क्यूँ बदलता है ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)11/08/2026
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 221 1222 221 1222)
जो दर्द मिला उसको तक़दीर बनाया है,
कर याद ज़माने को तस्वीर बनाया है।
चाहूँ न मिले चाहे यह साथ ज़माने का,
इस हौसले को मैंने जागीर बनाया है।
मैं जान लुटा भी दूँ, हो आन की बातें जब,
इस गर्म... लहू को ही तासीर बनाया है।
ताक़त है जो बाज़ू में, मैं लाँघ गया पर्वत,
ख़्वाबों को हक़ीक़त में तामीर बनाया है।
मज़दूर कहे कोई, मजबूर कहे कोई,
क्यों मेरे लिए दुख का प्राचीर बनाया है।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )08/05/2021
ग़ज़ल: (बहर- 221/ 1222/ 221/ 1222) दुनिया की जफ़ाओं का अब कोई गिला भी क्या? तुम ही जो बदल बैठे, फिर हमको मिला भी क्या? महफ़िल में उजाला है पर दिल में अँधेरा है, चाहत के सफ़र में अब हासिल ही हुआ भी क्या? काँटों से शिकायत थी फूलों पे भरोसा था, ज़ख़्मों को जो देखा तो फिर दर्द बढ़ा भी क्या? किस्मत की लकीरों पर क्यूँ नाज़ भला कीजे, हाथों से जो छूटा तो वो शख़्स मेरा भी क्या? पात्रे! जो मोहब्बत की राहों में सँभल के चल, इस राह में खोने को अब कुछ भी बचा भी क्या? ✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 10/07/2026
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 221 2122 221 2122)
तुम साथ मेरे चलना, हर राह जिंदगी की,
हो साँस आस तुम ही, हर चाह जिंदगी की।
मेरी ग़ज़ल तराना, तुम सात रंग सरगम,
तुम छंद गीत कविता, हर भाव जिंदगी की।
तुम शब्द वर्ण रचना, लय ताल तुम ही मेरे,
मेरी कलम तुम्हीं हो, हर स्याह जिंदगी की।
बस तुम ही इक हकीकत हर ख़्वाब तुम हो मेरे,
उम्मीद तुम भरोसा, परवाह जिंदगी की।
तुम बाग हो चमन हो, सब मानता गजानंद,
पतवार प्रेम दरिया, तुम थाह जिंदगी की।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )12/05/2021
॥ ग़ज़ल ॥ (बह्र: 221 2122 221 2122) दिल को करेंगे मिल कर आबाद अब यहाँ पर, रखते नहीं हैं कोई नाशाद अब यहाँ पर। भूलेंगे अब तो बीती हर एक बात को हम, लाएंगे अब न दिल में वो याद अब यहाँ पर। दुनिया के इस चमन में खुशियाँ बिखर गईं तो, गूंजेगी अब न कोई फ़रियाद अब यहाँ पर। सच्चाई के सफ़र में पीछे न हम हटेंगे, मानेगी दुनिया हमको उस्ताद अब यहाँ पर। ग़ज़लें सुनाओ दिल की कहते हमें गजानंद, सुन कर जिसे कि सब हों आज़ाद अब यहाँ पर। ✍🏻शायर: इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" (बिलासपुर, छत्तीसगढ़)07/07/2026
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 221 1222 221 1222)
कुर्बान वफ़ा पर हों, वो प्यार नहीं मिलता,
जो साथ निभा पाए, वो यार नहीं मिलता।
है इल्म मुझे इतना, सब छोड़ यहाँ जाना,
जो रोक सके साँसें, किरदार नहीं मिलता।
वीरान गली दिखती, सुनसान है हर आँगन,
मिल-जुल के रहें ऐसा, परिवार नहीं मिलता।
तुम बाँट चलो खुशियाँ, हर दीन-ग़रीबों में,
हो प्रेम जहाँ बिकता, बाज़ार नहीं मिलता।
विश्वास को तोड़ा है, कुछ लोगों ने ही पात्रे,
निःस्वार्थ ज़माने में, व्यवहार नहीं मिलता।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 13/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 1222 1222 122)
चलो सच राह नेकी काम होगा।
करो तुम कर्म अच्छा नाम होगा।।
मरे ना लोग भूखा ध्यान रखना।
मदद तेरे कदम अविराम होगा।।
मिलेगा जब सहीं अधिकार सबको।
तभी खुशहाल यह आवाम होगा।।
लड़ेगा जोश भर वह बाजुओं में।
गरम जिनका लहू तन चाम होगा।।
क़लम में धार तुम रखना गजानंद।
सभी को मेरा यह पैगाम होगा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 14/05/2021
•|| ग़ज़ल ||• (बहर: 1222 1222 122) मुहब्बत में बड़ा धोखा मिला है ज़माने से हमें शिकवा गिला है न जाने क्यूँ कमी सी लग रही थी बहारों में नया इक गुल खिला है धड़कनों ने बनाए थे घरौंदे न जाने ढह गया क्यों वो किला है पुराना वो शजर जो कल हरा था हवाओं के थपेड़ों से हिला है मिला इस जिंदगी में है गजानंद वफ़ाओं का वही अच्छा सिला है ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)22/07/2026
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
बहर - 122, 122, 122
इबादत करो प्यार का तुम।
बनो यार दिलदार का तुम।।
दिनों दिन बिखर घर रहा है।
रखो ख्याल परिवार का तुम।।
रहे ना तमस अब दुखों का।
बनो दीप उजियार का तुम।।
हिफाज़त करो मान इज्जत।
लड़ो जंग अधिकार का तुम।।
नही कोई अपना गजानंद।
न कर फिक्र संसार का तुम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )15/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
बहर - 122 122 122
बहुत याद आने लगे हो।
मुझे तुम सताने लगे हो।।
बसे हो तुम्हीं साँस बनकर।
रगों में समाने लगे हो।।
तड़प मैं रहा था ग़मों से।
नबी बन हँसाने लगे हो।।
ग़ज़ल बन मुकम्मल वफ़ा की।
क़लम तुम सजाने लगे हो।
सुनो तोहफ़ा जिंदगी का।
गजानंद पाने लगे हो।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )16/05/2021
बहर- 122 122 122 122
नज़र में मुझे यूँ बसाये रखो तुम।
लबों पे हँसी को सजाये रखो तुम।।
जहन में कली बन खिले प्यार तेरा।
वफ़ा फूल दिल में खिलाये रखो तुम।।
कहानी तुम्हीं से शुरू जिंदगी की।
मुझे धड़कनों में समाये रखो तुम।।
मिटाना नहीं प्यार को ऐ ज़माना
हमें हीर राँझा बनाये रखो तुम।।
गजानंद तुझसे गुजारिश यही है।
शमा प्यार का यूँ जलाये रखो तुम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )17/05/2021
(बहरे मुत़कारिब:मसम्मन सालिम) बहर- 122 122 122 122 तुझे भूल जाऊँ गँवारा नहीं है सिवा तेरे मेरा सहारा नहीं है बहा जा रहा हूँ तलाश-ए वफ़ा को मेरी कश्ती का अब किनारा नहीं है दिनों दिन कटा जा रहा पेड़ जंगल फ़िजा में सुहाना नज़ारा नहीं है लगा आस बैठा हूँ अच्छे दिनों का दग़ाबाज़ अब तक पुकारा नहीं है लगाया गला मुफ़लिसी में सभी को गजानंद पात्रे नकारा नहीं है ग़ज़लकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
•|| ग़ज़ल||• (बहर: 122 122 122 122) नया इक सवेरा, नया इक नज़ारा मिला है मुक़द्दर, मिला है सहारा सफ़र है कठिन, पर चले जा रहे हैं दुआ ने जगाया, जलाया सितारा कभी ग़म ने घेरा, कभी डर लगा है किनारे से गुज़रा, किसी ने पुकारा बड़ी है ये दुनिया, अजब मोड़ आए किसी का नहीं है, यहाँ कोई प्यारा लिखा है जो क़िस्मत, हक़ीक़त गजानंद ग़ज़ल कह रहा है, ये दिल का इशारा ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)20/07/2026
*बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम*-
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*
(1222 1222 1222 1222)
जिसे तुम धर्म कहते हो उसे मैं लूट कहता हूँ।
रखे जो बाँध लोगों को गुलामी खूँट कहता हूँ।।
बढ़ावा ढ़ोंग आडंबर जहाँ मंदिर दिखाई दे।
पुजारी और पंडो के लिए क्यों छूट कहता हूँ।।
जहाँ इंसानियत को बाँटते हैं धर्म अनुयायी।
उसे मैं आदमी में आदमी का फूट कहता हूँ।।
जिसे तुम दान कहते हो भला भगवान के दर पे।
उसे मैं दीन दुखियों के दुखों का घूँट कहता हूँ।।
सुनो पात्रे जहाँ पर ज़ुल्म को यूँ लोग सहते हैं।
उन्हें मैं भेड़ बकरी या मरुस्थल ऊँट कहता हूँ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )18/05/2021
📜 ग़ज़ल बहर- 1222 1222 1222 1222 अंधेरों से जो रिश्ता जोड़ बैठे हैं ज़माने में, वही मशगूल हैं दिन-रात हमको तो डराने में। तमाशा देख लें जी भर नया इक खौफ है मन में, लगे हैं लोग जो हमको यहाँ नीचे गिराने में। परिंदे कैद करने के लिए जो जाल बुनते हैं, ज़रा उनसे कहो आएं नया फंदा लगाने में। हवाओं के थपेड़ों से बिखरने का नहीं डर कुछ, दिया जलता ही आया है सदा आंधी हराने में। बुझाना चाहते 'पात्रे' वजूदों की किरणें जो, ज़रा उनसे कहो आएं नया सूरज उगाने में। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)02/08/2026
•|| ग़ज़ल ||• बहर: 1222 1222 1222 1222) न जाने किस नगर का रास्ता मुझको बुलाता है अकेलापन मुझे आवाज़ हर लम्हा लगाता है भटकते कारवाँ को ढूँढती हैं ये मेरी आँखें पुराना दर्द सीने में नया मंज़र सजाता है भरोसा जिस पे करते थे उसे ही भूल बैठे हम वही साया हमारा अब हमें आँखें दिखाता है वफ़ा के नाम पर हमको सज़ाएँ उम्र भर दीं जो वही कातिल हमारा सामने हँस कर भी आता है मिटा डाले हैं 'पात्रे' वक्त के सारे पुराने ग़म नया इक ख़्वाब फिर से दिल में चुपके से समाता है ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)01/08/2026
•|| ग़ज़ल ||• (बहर: 1222 1222 1222 1222) अँधेरे चीरकर जो सामने दीवार रखते हैं, वही तूफ़ाँ के सीने पर सदा तलवार रखते हैं। ज़ुबाँ पर दोस्ती का नाम केवल है दिखावे का, असल में लोग पत्थर-सा कई किरदार रखते हैं। चलाते हैं जो तीखे तीर पीठों पर छुपे-छुपकर, वही हाथों में अक्सर फूल का उपहार रखते हैं। भला बेघर परिंदों से कोई क्या हाल अब पूछे, जो अपनी पीठ पर उजड़ा हुआ संसार रखते हैं। जताते प्यार हैं लेकिन बदल जाते हैं पल भर में, वही अपनों से हरदम बेवज़ह तकरार रखते हैं। सभी ईमान की बातें बड़े उत्साह से करते, मगर हर जेब में अपने अलग बाज़ार रखते हैं। बचा लो गर बचा सकते हो अपनी ग़ैरतें, 'पात्रे', यहाँ हर मोड़ सौदागर नई दस्तार रखते हैं। ✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 02/08/2026
*बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला*
मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
(1212 212 122, 1212 212 122)
रहो सलामत दुआ करूँ मैं, बुरी नजर से खुदा बचाये।
जले शमा प्यार का सदा ही, चराग रोशन हवा बचाये।।
नहीं भरोसा रहा किसी पे, जमीर सबका मरा हुआ है।
वजूद इंसानियत भलाई, यहाँ नबी कोई आ बचाये।।
क़दम कहीं रूकना पड़े ना, चलो बढ़ाये सहीं दिशा में।
भला करो तुम दुखी जनों का, तुझे बला प्रभु सदा बचाये।।
ग़ुरूर किस बात का तुझे है, चले नहीं संग धन अटारी।
कफ़न सिवा कुछ नहीं मिलेगा, नहीं यहाँ कुछ क़ज़ा बचाये।।
वबा दमन का बढ़ा हुआ है, यहाँ दिनों दिन सुनो गजानंद।
सभी तरफ़ कोहराम दुख का, हबीब बन रहनुमा बचाये।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )21/05/2021
*बहरे कामिल मुसम्मन सालिम*
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
(11212 11212 11212 11212)
सदा इश्क़ में बहा अश्क़ है वफ़ा अब नसीब है तो कहाँ।
दवा ज़ख्म दे सके जो मुझे बता वो रक़ीब है तो कहाँ।।
लुटा सब दिया बचा कुछ नहीं मिला क्या सिला मुझे प्यार में।
सदा साथ खा लिया जो कसम खुदा वो हबीब है तो कहाँ।।
पता ही नहीं हुआ इश्क कब मिला चैन ना मुझे रात दिन।
दवा मर्ज कर दुआ साथ में पता कर तबीब है तो कहाँ।।
मिला मुफ़्त ताज अमीर का तुझे इसलिए तो ग़ुरूर है।
कभी झाँक लो गली गाँव की पता कर ग़रीब है तो कहाँ।।
लिखे गीत छंद वफ़ा ग़ज़ल बड़े शौक से सभी सत्यबोध।
रखे स्याह ज़ुल्म ख़िलाफ़ में बता अब अदीब है तो कहाँ।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 22/05/2021
*बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़*
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
( *221 2121 1221 212*)
हम तो वफ़ा की चाह में बरबाद हो गए।
उस बेवफ़ा के प्यार से आजाद हो गए।।
अब्सार में बसा जिसे मैं पूजता रहा।
फिर क्यों भला नसीब से फरियाद हो गए।।
माना जिसे दुआ ख़ुदा की प्यार में सदा।
दे ज़ख्म ज़िंदगी वही जल्लाद हो गए।।
कोई यहाँ नहीं ख़ता को बख़्स दे जरा।
सब तो सजा दिलाने में उन्माद हो गए।
परवाह तो नहीं किसी को सत्यबोध का।
दे दर्द ग़म मुझे सभी उस्ताद हो गए।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )23/05/2021
*बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़*
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
(वज्न- 221 2121 1221 212) लड़ते लड़ाई मज़हबी इंसान हो गए खा धर्म के अफ़ीम को हैवान हो गए इज्ज़त बचाने बेटियों की आते क्यों नही लाचार अंध मूक क्यों भगवान हो गए बंदूक ताने थे खड़े जाबांज सीमा पर हँसते हुये वे देश पे बलिदान हो गए माता पिता को बाँट लिए भाई -भाई मिल खुदगर्ज़ कितने आज तो संतान हो गए बनना नमकहराम ना,खा देश का नमक पात्रे उतार कर्ज़ क़दरदान हो गए इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/08/2023
ग़ज़ल: (बहर: 221 2121 1221 212) जाकर वफ़ा की राह में पैग़ाम लिख ज़रा, दिल पर हमारे आज भी तू नाम लिख ज़रा। तपते हुए ही धूप में जो काम कर रहे, उनके लिए भी प्यार की इक शाम लिख ज़रा। हर एक दिल में प्यार की खुशबू बिखेर कर, गाँवों की इस ज़मीन के आयाम लिख ज़रा। रिश्तों की हर गिरा को जो चाहत से जोड़ दे, उस रहनुमा के वास्ते इक जाम लिख ज़रा। राह- ए- वफ़ा पे चलते रहो 'सत्यबोध' तुम, नेकी का अपने हाथ से अब काम लिख ज़रा। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 08/07/2026
•|| ग़ज़ल ||• (बहर: 221 2121 1221 212) दर्द-ए-जिगर का कोई भी चारा न मिल सका इस ज़िंदगी में हमको सहारा न मिल सका हम ने बुझाए ग़म के शरारे बहुत मगर इस तीरगी में हमको किनारा न मिल सका हर मोड़ पर तलाश किया जिसको उम्र भर वो शख़्स हमको दूर से प्यारा न मिल सका जब हार दिल गया तो गिला किस से हम करें अपनों से हमको कोई इशारा न मिल सका ढूँढा सदा जहाँ में वफ़ा सत्यबोध ने कोई भी उनसा दर्द का मारा न मिल सका ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)31/07/2026
*बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ*
मुफ़ाइलुन फ़यलातुन मुफ़ाइलुन (फ़ेलुन)
(1212 1122 1212 22)
मिले सभी ग़मों का मैं हिसाब रखता हूँ।
पढ़ो मुझे खुला दिल की क़िताब रखता हूँ।।
मुझे हरा नहीं सकते कभी जहां वालों।
सभी सवाल का हाज़िर जवाब रखता हूँ।।
नशा निगाह में अंदाज़ कातिलाना है।
हँसी लबों पे क़यामत शबाब रखता हूँ।।
मेरी ख़ुशी के लिए जान भी लुटा देंगे।
हरेक दोस्त मैं तो लाज़वाब रखता हूँ।।
मिले सुगंध गजानंद से मुहब्बत की।
बहार इश्क़ में ख़िलता ग़ुलाब रखता हूँ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )27/05/2021
हिंदी ग़ज़ल
बहरे रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122 2122
कौंन है जिसको जहां में गम नहीं है,
पर मेरा ग़म भी किसी से कम नहीं है।
प्यार को मानो इबादत है ख़ुदा की,
दें मिटा हस्ती किसी में दम नहीं है।
इस क़दर रोए बिछुड़ कर आज उससे,
बेवफ़ा की आँखें फिर भी नम नहीं है।
हर घड़ी डसती मुझे तन्हाई है मेरी,
जी सकूँ मैं चैन से मौसम नहीं है।
दर्द रख दिल में लगा जीने गजानंद,
ज़ख्म भर दे जो मेरी मलहम नहीं है।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )28/05/2021
हिंदी ग़ज़ल
बहरे रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122 2122
ज़िन्दगी की यह अनोखी बात है ना, धूप के पीछे छुपी ही रात है ना। हौसलों के सामने हर मुश्किलों ने, हार मानी, खा गई वह मात है ना। चल रहे हैं हम वफ़ा की राह पर अब, हमसफ़र तू हर क़दम पर साथ है ना। भेद कोई भी नहीं इंसान में अब, एक ही तो सब जहाँ की जात है ना। गीत चाहत के यहाँ गाए 'गजानंद', यह हमारी शान की सौगात है ना। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 06/07/2026
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
बह्र- (2212 2212)
स्वार्थी सभी इंसान हैं।
रखते कहाँ ईमान हैं।।
माता पिता मानों सदा।
जग में बड़े भगवान हैं।।
पड़ रूढ़िवादी ढ़ोंग में।
जन भूलते विज्ञान हैं।।
चमचागिरी करके सदा।
कुछ लोग लें सम्मान हैं।।
बेटी बहू इज्ज़त यहाँ।
नित लूटते शैतान हैं।।
नेता के भ्रष्टाचार से।
जनता दिखे हैरान हैं।।
पात्रे कहे सुन लो सभी।
गुरुजन गुणों की खान हैं।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )30/05/2021
•|| ग़ज़ल ||• (बहर: 2122 2122) ज़िंदगी से प्यार कर ले साँसों का उद्धार कर ले वक़्त कम है ए मुसाफ़िर तू सफ़र तैयार कर ले रंज की गलियों से बच कर फूल सा संसार कर ले आरज़ू का दीप धर के दिल का घर गुलज़ार कर ले बेवफ़ा दुनिया 'गजानंद' हौसला दमदार कर ले ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 30/07/2026
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
(2122 1122 22)
आदमी आदमी से जलता है।
रख वहम जिंदगी में चलता है।।
चमकते चाँद सितारे सुन लो।
सूर्य भी शाम लिए ढलता है।।
हाथ थामा नहीं दुख में जिसने
एक दिन हाथ वही मलता है।।
गर्भ नौ माह रखी माँ हमको।
गोद उनकी बड़ी शीतलता है।।
ए- गजानंद भुला ग़म जीना।
साथ ले चल हँसी चंचलता है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )06/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन
(बह्र- 2122 1212 22)
कल समझ कर मुझे भुला देना।
सब निशाँ प्यार का मिटा देना।।
मौत ही आखरी दवा मेरी।
हो सके आ के तुम पिला देना।।
है गुज़ारिश यही सनम तुमसे।
आग मेरी चिता लगा देना।।
मेरा कोई अगर पता पूछे।
कब्र की राह तुम बता देना।।
कह गजानंद अलविदा सबको।
जाते जाते ग़ज़ल सुना देना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ)04/07/2021
ग़ज़ल- एक प्रयास-
*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
(2212 2212 2212 2212)
आँसू बहा गम को छुपाऊँ मैं बहुत मजबूर हूँ।
कोई सहारा है नहीं अपनों से मैं तो दूर हूँ।।
बेदर्द दुनिया की कभी करता नहीं परवाह मैं।
होकर ज़माने से ख़ता मैं बन गया नासूर हूँ।।
तड़पे नहीं अब प्यार में कोई ज़ुदा हो इस क़दर।
मैं जोड़ दूँ बिछड़े दिलों को वो वफ़ा दस्तूर हूँ।।
चमचागिरी कर शोहरत मुझको कमाना है नहीं।
जागीर ज़िंदा इसलिए रहता सदा मगरूर हूँ।।
तकलीफ़ ही तकलीफ़ पात्रे इस जमाने से मिली।
मैं नफ़रतों की आग में जलता हुआ तंदूर हूँ।।
✍🏻ग़ज़लकार- इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छतीसगढ)25/07/2021
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
(1222 1222 122)
तिरंगा आन मेरा शान मेरा।
वतन के नाम जाँ कुर्बान मेरा।।
खड़े हैं वीर सीना तान शरहद।
बचाने देश हिंदुस्तान मेरा।।
करूँ मैं याद वीरों की शहादत।
जिसे मानूँ सदा अभिमान मेरा।।
जुबां पे गीत वंदे मातरम है।
रखें जग याद ये गुणगान मेरा।।
सिपाही हूँ कलम का मैं गजानंद।
यही छोटा सा है पहचान मेरा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/07/2021
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
(1222 1222 122)
शराफ़त सादगी का ये सिला है वफ़ा के राह में धोखा मिला है किसे अपना समझकर दर्द बाँटे यहाँ तो फूलों पर काँटे खिला है तमाशाबीन बनकर देखते सब चले जो साथ अपना काफ़िला है ग़लतफ़हमी लिए जीये पड़ा था चलेगा साथ घर बहुमंजिला है। यहाँ सब मतलबी है सुन गजानंद जरूरत पर मुकरना सिलसिला है इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
(1222 1222 122)
वफ़ा की राहों में चलने लगा हूँ ग़मों की आग में जलने लगा हूँ सितारे बन कभी मैं चमकता था नज़र किसकी लगी ढलने लगा हूँ मुझे मेरी शराफ़त की सजा दो यक़ी अपनों पे जो करने लगा हूँ लड़ाई है निवालों की यहाँ बस ग़रीबी हक लिये लड़ने लगा हूँ क़दम रखना ज़रा संभल गजानंद ज़माना मतलबी डरने लगा हूँ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
|| ग़ज़ल || (बहर: 1222 1222 122) मज़ारों पर तो चादर चढ़ रही है, मगर ज़िंदा बदन पर बेबसी है। जो महलों में अंँधेरा बाँटते हैं, उन्हीं के हाथ में ये रौशनी है। खिलौने देखकर कल एक बच्चा, बहल तो वो गया, आँखें भरी हैं। न पूछो शहरे-मशरूफ़ा का आलम, यहाँ तो भीड़ में भी बेकसी है। अदालत में सुबूतों का है मेला, मगर सच की ज़बाँ सहमी हुई है। दिखावे की इबादत कर रहे हैं, दिलों में नफ़रतों की तीरगी है। चलो अब सच ही बोलें हम 'गजानंद', भले ही दौर में बंदिश बड़ी है। ✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 11/07/2026
*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
(बह्र- 1222 1222 1222)
हक़ीक़त से भला क्यों दूर रहते हो।
नशे में भक्ति की मजबूर रहते हो।।
बपौती मान ढोते आये हो पाखंड।
दिखावे में सदा मगरूर रहते हो।।
नचाते हैं मदारी धर्म का तुमको।
ग़ुलामी का बने लंगूर रहते हो।।
मलाई खा रहें चालाक शातिर लोग।
मगन फिर भी बने तंदूर रहते हो।।
दिलाने ढ़ोंग से आजाद नित पात्रे।
कलम स्याही भरे मशहूर रहते हो।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/10/2021
*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*
*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*
(बह्र *2122 1122 1122 22*)
ढ़ोंग पाखंड भरा आज जमाना यारों।
थाम सच राह यहाँ पाँव बढ़ाना यारों।।
धर्म ले आड़ सदा लूट मचाया किसने।
कौन वे धूर्त हैं मुझको भी बताना यारों।।
भेद करते हैं धरम-जात अलग है कहकर।
खून का रंग अलग हो तो दिखाना यारों।
मज़हबी लोग लड़ाते फिरे हैं आपस में।
एक है धर्म वतन पाठ पढ़ाना यारों।।
सुन गजानंद मिले कौंर निवाला सबको।
प्रेम का दीप सदा दिल में जलाना यारों।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़)15/10/2021
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हिंदी ग़ज़ल- माँ
(बहर- 2 2 , 2 2 , 2 2 , 2 2 )
फ़ेलुन , फ़ेलुन , फ़ेलुन , फ़ेलुन।
बहरे मुतदारिक़ मुसम्मन मख़्बून मक़्तूअ।।)
माँ ममता की परिभाषा है।
दुख में किरणें सुख आशा है।।
माँ ही मंदिर माँ ही मस्जिद
माँ चरणों में प्रभु वासा है।।
माँ ही धड़कन माँ ही जीवन।
माँ बिन निर्थक यह साँसा है।।
माँ पे कर दूँ सब कुछ सज़दा।
इस जीवन की अभिलाषा है।।
सिंचित कर दो इस बगिया को
पतझड़ में पात्रे प्यासा है।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 8889747888
------------------*------------------
हिन्दी ग़ज़ल-
(बहर- 2212 2212 2212 12)
बन रहनुमा मेरे मुझे बदनाम कर दिये। हिस्से मेरे शिक़वे गिले इल्जाम कर दिये। टूटे हुये दिल को तसल्ली कौन दे यहाँ। इस जिंदगी की भीड़ में गुमनाम कर दिये। ठोकर मिली हर राह पर क्यों बेवज़ह मुझे। मेरी वफ़ा चुपचाप क़त्लेआम कर दिये। पीता रहा जिसके लिये हर पल ग़मों ज़हर। पर बेवफ़ा का जाम मेरे नाम कर दिये। तुझको मिले वो हर ख़ुशी मेरे नसीब की। पात्रे सफ़र का अलविदा पैग़ाम कर दिये। ग़ज़लकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
----------------------*--------------------------
हिन्दी ग़ज़ल-
बहर- 2122 2122 2122 नफ़रतों की आग भड़काने लगे हैं ज़ुल्म अपनों पर ही क्यों ढाने लगे हैं लोग कहते थे जिसे अपना मसीहा वे सियासत जाम छलकाने लगे हैं कागज़ी वादे किये हैं इसलिए ही माँ क़सम ऊपर क़सम खाने लगे हैं सो रहे हैं देशवासी नींद गहरी हक़ तुम्हारे दूसरे खाने लगे हैं आँख पट्टी बाँध बैठे लोग पात्रे चाटुकारी गीत नित गाने लगे हैं इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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||ग़ज़ल|| (बहर- 2212 2212 2212) भटके हुए अरमान का घर है कहाँ? दीवार है सूनी तो ये दर है कहाँ? वादे किए थे उसने जो सदियों के सब, वो शख़्स अब मसरूफ़ है, पर है कहाँ? हम चल पड़े तन्हा लिए ज़ख़्मी जिगर, इस धूप का साया भी अब सर है कहाँ? आँखें सुलगती हैं मेरी यादों में अब, अश्कों से दामन ही ये अब तर है कहाँ? लिक्खा था जो 'पात्रे' कभी ख़ून-ए-जिगर, उस दर्द का अब एक मंज़र है कहाँ? ✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध' बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
•|| ग़ज़ल ||• (बहर: 2212 2212 2212) जब से दिया तुमने हमें आवाज़ है सजने लगी ये ज़िंदगी की साज़ है हर याद में है आपका ही अक्स अब देखो नया ये इश्क़ का अंदाज़ है दिल से मिटाने दूरियाँ जो थीं दिलों तेरी नज़र का ही करम ये आज है जब से मिला है प्यार हमको आपका दुनिया हमारी लगती अब परवाज़ है महके ये गुलशन याद में 'पात्रे' सदा तेरी ग़ज़ल पर दिल को होता नाज़ है ✍️ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 21/07/2026
॥ ग़ज़ल ॥ (बहरे रमल मुसम्मन सालिम) बह्र: 2122 2122 2122 2122 (फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन) दीप चाहत का दिलों में तुम जला कर ही दिखाना। नफ़रतों की हर दीवारें तुम गिरा कर ही दिखाना।। रास्ते के ये अंधेरे ख़ुद-ब-ख़ुद ही मिट सकेंगे, एक जुगनू हौसले का तुम जगा कर ही दिखाना। धूप में जो झुलसते ही जा रहे हैं उम्र भर से, उन दुखी इंसानों को साया बना कर ही दिखाना। जीत लोगे तुम ज़माने की मुहब्बत एक दिन ही, ग़म में भी होठों पे मुस्कानें सजा कर ही दिखाना। मंज़िलें आवाज़ देंगी ख़ुद दिखाए राह में सुन 'गजानंद', बस क़दम आगे सफलता के बढ़ा कर ही दिखाना।। ✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)06/07/2026
•|| ग़ज़ल ||•
बहर: 221 2122 221 212
महफ़िल में आज देखो, उल्फ़त की बात है
हर दिल में जल रही जो, चाहत की बात है
वीरानियों से निकली, दुनिया बहार में
गुलशन में खिल रही जो, राहत की बात है
मज़हब के भेद सारे, मिट जाएँ इस तरह
आपस में जुड़ रही जो, बरकत की बात है
पत्थर हुए हैं दिल भी, सदियों की धूप में
अपना ले जो शराफ़त, हिम्मत की बात है
मिल जाए जो इनायत तेरी, ऐ 'सत्यबोध'
दिल में उतर गई जो, क़िस्मत की बात है
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)23/07/2026
•|| ग़ज़ल||•
(बहर: 212 1222 212 1222)
राह देख थक बैठे, कारवाँ कहाँ पहुँचा।
तप रही है ये धरती, आसमाँ कहाँ पहुँचा॥
ज़िंदगी के मेले में, सोचना ये पड़ता है।
ढूँढते रहे जिसको, वो मकाँ कहाँ पहुँचा॥
ये ज़माने की सच है, उलझती रही दुनिया।
समझते इसे जब तक, फलसफ़ा कहाँ पहुँचा॥
ज़हन में जो आई थी, इक बहार सी बनकर।
रंग वो बदल बैठी, इम्तिहाँ कहाँ पहुँचा॥
सत्यबोध सा सागर, ज्ञान की ये धाराएँ।
छंद के बहाने ही, ये समाँ कहाँ पहुँचा॥
✍️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)19/07/2026
•|| ग़ज़ल ||•
(बहर: 2212 1212)
इन बाजुओं में जान है
हम भर रहे उड़ान है
मंजिल खड़ी है सामने
बस लक्ष्य पर निशान है
तू रुकना नहीं कभी
जाना यही तो शान है
तूफ़ान से लड़ेंगे हम
अब हारना न मान है
हर साँस में उमंग का
हमको हमेशा ध्यान है
हर रास्ते में जिंदगी
देती हमें तो ज्ञान है
इस दौर में तो 'सत्यबोध'
पाना नया जहान है
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/08/2026

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