बहर- 2122 2122 212)
लड़खड़ाता देश की हालात है।
भूख से ये बिलखता नवजात है।
दाग दामन है सिंहासन की सुनो।
बेच खाते देश ये आदम जात है।
है नशे मगरूर सत्ता की सभी।
समझते ये बाप की खैरात है।
सिसकती दुल्हन यहाँ अब सेज पर।
देख लूटेरों की सजी बारात है।
फिक्र किसको देश की अब तो गजानंद।
हर घड़ी बैठे लगाये घात है।।
हिंदी गजल- (2)
बहर- 2122 2122 212)
चेहरें की असलियत पहचान लो।
कौन है जयचंद ये तुम जान लो।
है छुपा अब गद्दार अपने देश में।
बन विभीषण लोग ये तुम मान लो।
एक के बदले कलम दस सिर कहाँ?
पूछता अब देश कुछ संज्ञान लो।
चाहिए अब दुश्मनों की सिर कलम।
फिर सिंहासन बैठ तुम सम्मान लो।
भूल ना जाना शहादत वीरों की।
है कसम माँ भारती ये ठान लो।
पीठ पीछे वार कर है ललकारता।
छीन अब आवाज पाकिस्तान लो।
माफ करना भूल होगी सत्यबोध।
कर सफाया बदला अपमान लो।।
हिंदी गजल- (3)
बहर- 2122 2122 212)
लेखनी में धार होना चाहिए।
शेर दिल ललकार होना चाहिए।।
सह लिए हम तो बहुत ही दासता।
जुल्म वास्ते वार होना चाहिए।।
मान हो सम्मान हो संविधान का।
भीम का जयकार होना चाहिए।।
दीप शिक्षा लो जला यारों यहाँ।
अब नही अंधकार होना चाहिए।।
हो निवासी वाकई इस देश के।
खुद को स्वीकार होना चाहिए।।
दूर करना है लुटेरों को सुनो।
आपका अधिकार होना चाहिए।।
हिंदी गजल- (4)
बहर- 2122 2122 212)
आज कोरोना कहर में देश है।
कौन जिम्मेदार किसका द्वेष है।।
हर तरफ़ लाशें बिछी हैं देख लो।
ख़ौफ़ से मन में उभरता क्लेश है।।
लाकडाउन हो रही नित साँस भी।
तन बना अब राख का अवशेष है।।
है विषम दुख की घड़ी खुद ध्यान दो।
आप हम सब के लिए निर्देश है।।
लिख दिया विपदा कहानी सत्यबोध।
थाम दिल पढ़िए ग़ज़ल यह पेश है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 04/05/2021
हिंदी गजल- (5)
बहर- 2122 2122 212)
मैं बहुत बेबस दुखी लाचार हूँ बीच दरिया में फँसा पतवार हूँ छोड़ जाना है मुझे तेरा शहर चार दिन का मैं किरायेदार हूँ आदमी ही आदमी को डस रहा देखता बन मौन वह संसार हूँ लोग दिखते अंध श्रद्धा पाठ में रोज सजता धर्म का बाजार हूँ सत्य को कब आँच आया "सत्यबोध" झूठ को सच काटता तलवार हूँ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
हिन्दी ग़ज़ल (6)
वज्न- 2122 2122 212 सोचते रहते हैं अक्सर रात में डूब क्यों जाते हैं मंज़र रात में बेसहारा हो न जाये आसमां झिलमिलाते हैं समंदर रात में दर्द का मारा हुआ हूँ इसलिए ओढ़ मैं सोता हूँ चादर रात में खिलखिलाते गाँव मेरे रात दिन ये शहर लगते बस सुंदर रात में अज़नबी का बन नबी पात्रे यहाँ तोड़े मत कोई छप्पर रात में इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
छत्तीसगढ़ी गजल
(बहर- 2122 2122 2122 212)
नोंचता है तन यहाँ तो गिद्ध कौंआ बाज है।
राज नेता रूप साजे लोमड़ी का राज है।।
कौन करता है हिफाजत देश की तस्वीर का।
चगलता है अंग जैसे बस यही वो खाज है।।
दे दिखाई भूख से अब तड़पती सबकी नजर।
हर तरफ बेरोजगारी गूँजता आवाज है।।
जंग सिंहासन खड़े मैदान ले तलवार को।
काटता है सिर तुम्हारा साजने खुद ताज को।।
कौंन सुलझाए पहेली ये सियासत की भला।
जानते सब लोग पात्रे पर छुपाते राज को।।
गजल
(बहर- 2122 2122 2122 212)
गम किसी का बाँट लो तुम बस खुशी की राज है।
कौन देखा कल यहाँ जो कुछ भी है वो आज है।।
है सभी मसगूल अपने चंद खुशियों के लिए।
सिसकता हर घर बुढापा आज की आवाज है।।
पाँव छाले पड़ गए अब धन कमाने के लिए ।
आज जाना कुछ नही ये चीज भी परवाज है ।।
हर कदम पड़ती जरूरत तो यहाँ परिवार की।
दूर रहकर क्या भला वो स्वाभिमानी नाज है।।
रंग भर लो प्यार का अब तुम गुले गुलजार में।
जिंदगी संगीत बिन जैसी अधूरी साज है।।
रोक ना बढ़ते कदम जन सेवा पर उपकार से।
नोंचता है तन बदन कुछ आज कौंआ बाज है।।
मान लो पात्रे बड़ों की कुछ नसीहत तो यहाँ।
फिर जमाने में तुम्हारा सर बँधा सरताज है।।
गजल
(बहर- 2122 2122 2122 212)
पूछते हैं लोग मंदिर में बसे भगवान को।
क्या चढ़ाऊँ भोग में मैं या करूँ कुछ दान को।।
देख बाहर भूख से है तड़पता कोई पड़ा।
है जरूरत दान की सच में उसी इंसान को।।
माँगते हो क्यों भला तुम एक पत्थर मूर्त से।
जो पकड़ सकता नही भी चोर बेईमान को।।
है बसा भगवान मन ये द्वार बस ये जान लो।
ढूँढ ना तू इस कदर बंदे कभी अनजान को।।
धर्म ना होता बड़ा सुन लो कभी भी कर्म से।
मेहनत की चंद रोटी ही दिलाती मान को।।
लोग पढ़ लिख नादान क्यों बनकर फिरे ।
पाप कटता है भला क्या तीर्थ गंगा स्नान को।।
ना करो पात्रे यहाँ तुम धर्म की बातें कभी।
है बड़ी मुश्किल यहाँ समझाना जग नादान को।।
हिंदी गजल
(बहर- 2122 2122 2122 212)
आज दुनिया में कहाँ है सत्य की पहचान भी।
झूठ पाते मान जग में और सब सम्मान भी।।
फूटपाथों पर पड़ा परिवार की खुशियाँ सभी।
ढूँढता हो ब्यर्थ क्यूँ हँसने का तुम अरमान भी।।
छोड़ जाओ मित्र तुम ये चीज दौलत का नशा।
साथ में जाता नहीं सुन कुछ यहाँ शमशान भी।।
जिस तरह बाजार में बिकता सभी सामान है।
इस कदर बिकता यहाँ अब धर्म भी ईमान भी।।
धर्म के बाजार में बिक तो रहे हैं देखो भला।
कौंन जाने नित्य कितने अनगिनत भगवान भी।।
बच सका ना काल के इस दर्प से कोई यहाँ।
रंक राजा संत ज्ञानी और क्या धनवान भी।।
स्वार्थ में दुनिया खड़ी है बात इतनी सुन जरा।
क्यों बना पात्रे जहां में इतना तुम नादान भी।।
(बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़ )
2122 2122 2122 212
साथ उसका आज छूटा बेसहारे हो गए ।
थे कभी कश्ती नदी का वो किनारे हो गए ।।
जो सुहाने ख़्वाब आँखों में सजाये थे कभी ।
तोड़ नाता दो दिलों का वो पराये हो गये।।
रो पड़ा है आसमां भी देख गम काली घटा ।
चाँद भी रूठा खफा क्यों अब सितारें हो गए ।।
कर सके ना प्यार में उनसे जफ़ा कोई सनम ।
बेवफा इल्जाम किस्मत क्यों हमारे हो गए ।।
रूह में बस नाम तेरा गूँजता है रात दिन ।
आज सूना सूना सा दिल के नजारे हो गए ।।
छेड़ता है तान कोई गम जताने को हमें ।
प्रेम के संगीत हमको अब गँवारे हो गए ।।
लौट आओ अब सनम पात्रे बुलाता है तुझे ।
दिन जुदाई के बिना तेरे गुजारे हो गए ।।
(बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़ )
2122 2122 2122 212
हूँ शराबी प्यार का इल्जाम तेरे नाम है।
कुछ नहीं पहिचान मेरा नाम तेरे नाम है ।।
पी रहा हूँ इसलिए मैं दूर यादों से रहूँ ।
मयकदे छलके नशा हर जाम तेरे नाम है ।।
देखकर ये बंद बोतल प्यास उठती है वफ़ा ।
है सजी महफ़िल सुबह हर शाम तेरे नाम है ।।
तोड़ना दिल बेवफाओं की नई आदत बनी ।
दिल खिलौने की तरह हर दाम तेरे नाम है ।।
आखिरी ये सांस पात्रे जिंदगी का दे दुआ ।
खुश रहे तू तो सदा पैगाम तेरे नाम है ।।
(बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़ )
(बहर- 2122 2122 2122 212)
देख मंज़र मौत फिर भी बेख़बर इंसान है।
शोहरत धन जोड़ने में बस लगाया ध्यान है।।
काम नेकी कर ले बंदे जिंदगी है चार पल।
दीन दुखियों की मदद कर इससे ही पहचान है।।
तेरे धन का मोल क्या है झाँक अपना दिल ज़मीर।
कौन तुझको जानता है क्या तेरा जग मान है।।
सुख चमन उजड़ा हुआ पतझड़ लगी है जिंदगी।
चुप पड़ा है बागबाँ अब साँस भी वीरान है।।
मिट गए सब रंक राजा साथ कुछ ना ले गए।
जानकर पात्रे भला सच क्यों बना नादान है।।
07/05/2021
(बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़ )
(बहर- 2122 2122 2122 212)
भावना रख प्रेम का जीना मुझे संसार में। आशियाँ नफ़रत मिटा कलियाँ खिला गुलजार में। मज़हबी इंसान से रखना बना कर दूरियाँ। मतलबी बन बेचता है मान जो बाजार में। चापलूसी का ज़माना आ गया है लो समझ। सत्य रोता है जहाँ अब झूठ के दरबार में। सोंचता हूँ छोड़ दूँ लिखना ग़ज़ल अब छंद मैं। दाग झूठा मत लगे मेरे कलम किरदार में। सीख लो जीना अकेले याद उसकी तू मिटा। ढूँढता पात्रे वफ़ा क्यूँ बेवफ़ा दिलदार में।
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
122 122 122 122
चले जख्म खाते सनम राह में हम ।
खफ़ा बेवफ़ा से वफ़ा चाह में हम ।।
नजर जो झुकी तो गिरा आसमां है ।
तड़फ तो रहें इश्क़ परवाह में हम ।।
चलो भूल जायें दिसंबर की बातें ।
बढ़ाये कदम जनवरी माह में हम ।।
जवानी कसम साथ दो जिंदगी भर ।
लिखें प्रेम की गाथा उत्साह में हम ।।
बना प्रेम रोगी दवा साथ दे जा ।
हैं बर्बाद पात्रे इसी आह में हम ।।
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
बह्र- 122 122 122 122
उठे तिश्नगी मन मिटाये रखो तुम।
शमां प्रेम का नित जलाये रखो तुम।।
भुला दो ग़मों की चलो सब कहानी।
लबों पे हँसी अब सजाये रखो तुम ।।
कहीं मिट न जाये ए हस्ती तुम्हारी।
रगों में रवानी बनाये रखो तुम।।
मिलेगा वही जो लिखा है मुकद्दर।
समय पर निगाहें टिकाये रखो तुम।।
गजानंद ताकत कलम की समझ लो।
सदा पाँव सच को बढ़ाये रखो तुम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )03/05/2021
बहरे मुतकारीब मुसमल सालिम
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
(वज्न- 122 122 122 122) खफ़ा यार है अब मनाना पड़ेगा शमां प्यार का फिर जलाना पड़ेगा ख़ता भी उसी से जफ़ा भी उसी से वफ़ा भी उसी से बताना पड़ेगा मिला ज़ख्म मुझको इनायत है उसकी शिक़ायत मुझे यह भुलाना पड़ेगा सनम ने क़सम तोड़ दी साथ जीना अकेले सफर अब बिताना पड़ेगा दुआ पात्रे करता सलामत रहे वह मुझे ग़म से यारी निभाना पड़ेगा इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
( बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
( 122 122 122 12 )
तुझे भूल जाऊँ गँवारा नहीं ।
तुम्हारे सिवा अब सहारा नहीं ।।
चमक चांदनी रात खामोश में ।
चकोरी बिना चाँद तारा नहीं ।।
नदी बीच पतवार है अब खड़ा ।
बिना प्यार साहिल किनारा नहीं ।।
निभाना पड़ेगा हमें ही वफ़ा ।
यकीं मैं करूँ ये तुम्हारा नहीं ।।
गजानंद उम्मीद चाहत रखो ।
बिना प्यार जीवन गुजारा नहीं ।।
बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
122 122 122 12
करो बन्द मधुशाला दरकार है ।
उजड़ तो रहा आज परिवार है ।।
उन्हें फिक्र राजस्व की है पड़ी ।
इधर तो सजी मौत बाजार है ।।
हुए हाल बेहाल जनता सभी ।
अभी त्रस्त कोरोना संसार है ।।
नशा नाश की खान छत्तीसगढ़ ।
बना आज सुर्खी ये अखबार है ।।
गजानंद जी बन्द हो मयकदे ।
नियम ठोस सरकार लाचार है ।।
( बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
122 122 122 12 )
हमें प्यार में तुम रुलाना नहीं ।
जुदा हो कभी भी भुलाना नहीं ।।
चले सांस जब तक रहो साथ तुम ।
वफ़ा रस्म दिल से मिटाना नहीं ।।
कदम डगमगाए कभी जो सनम ।
हमें छोड़ तुम दूर जाना नहीं ।।
वफ़ा नज़्म मैं गुनगुनाता रहूँ ।
कहानी जुदाई सुनाना नहीं ।।
गुज़ारिश करूँ आपसे मैं यही ।
किसी और से दिल लगाना नहीं ।।
पता है मुझे तू नहीं बेवफा ।
कभी याद रुसवा दिलाना नहीं ।।
गजानंद पात्रे कसम प्यार की ।
कभी आँख आँसू बहाना नहीं ।।
( बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
(122 122 122 12 )
शमां प्यार का तुम बुझाना नहीं।
मुझे इश्क़ में तुम रुलाना नहीं।।
रहूँ ज़ुल्फ़ सायें बनाकर सदा।
कहीं दूर जाकर भुलाना नहीं।।
वफ़ा का सिला बेवफ़ा ना मिले।
किसी और से दिल लगाना नहीं।।
लहू बन बसे हो रगों में सनम।
निशां प्यार की तुम मिटाना नहीं।।
गजानंद फ़रियाद जब भी करे।
चले लौट आना सताना नहीं।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 07/05/2021
बहर- 212 212 212 212
छोड़ कर साथ वो अजनबी हो गए ।
बेवफा है सनम मतलबी हो गए ।।
याद आती वफ़ा की सदायें सदा ।
धड़कनों में यहाँ खलबली हो गए ।।
हम रहे मौन ले अश्क सौगात में ।
कौंन है आज तेरा हबी हो गए ।।
लाजमी है सजा प्यार की राह में ।
दर्द मेरा सजा दिल्लगी हो गए ।।
माँगता हूँ दुआ खुश रहे तू सदा ।
फिर गजानंद दिल सादगी हो गए ।।
गजल-
बहर- 212 212 2122
दर्द दिल की दवा तू बता दे।
बेवफा ना मुझे तू सजा दे।।
रो रही रात यादें सँजोये।
प्यार का तू समां तो जला दे।।
सह नही सकता मैं तो जुदाई।
आ जहर मौत का तू पिला दे।।
दर्द देने में गर कुछ कमी हो।
आ कफ़न आग मेरी लगा दे।।
है गजानंद फरियाद रब से।
वो सलामत रहे ये दुआ दे।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
कोरोना संदर्भ-
गजल-
बहर( 212 212 212 212 )
(02/05/2021)
कौन किसका यहाँ अब मददगार है।
हर तऱफ आदमी आज लाचार है।।
दोस्त दौलत यहाँ काम आयी नहीं।
दिख रहा ख़ौफ़ में आज संसार है।।
मुश्किलों में तलाशें हैं वो फायदें।
मौत पे जो चली आज व्यापार है।।
विष ग़मों का पिलाया है आराम से।
कर पता वो छुपा कौन गद्दार है।।
छीन ली हर खुशी एक तो वायरस।
आज उजड़ा हुआ देख परिवार है।।
हाथ में हाथ रख अब नहीं बैठना।
अब हिफाज़त करें अर्ज सरकार है।।
चर्च सुनसान है बंद मंदिर पड़ा।
ऐ गजानंद सुन सब निराधार है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )
ग़ज़ल- एक प्रयास
बहर- 212 212 212 212
है गुज़ारिश यही याद रखना मुझे।
छंद कविता गजल में तो पढ़ना मुझे।।
चाटुकारी लिखूँ वो कलम मैं नहीं।
राह सच थाम कर है तो बढ़ना मुझे।।
दर्द सीने में है दीन मजलूमों का।
हक इन्हें देने है जंग लड़ना मुझे।।
पीठ पीछे बुराई न करता पसंद।
आमने सामने जो है कहना मुझे।।
हौसला बाजुओं में रखे नित चलूँ।
धार सागर बने नित है बहना मुझे।।
कुछ भरोसा नहीं आजकल सांसों की।
कुछ दुआयें सलामत का करना मुझे।।
मुक्त हो जब परिंदा उड़े आसमां।
अलविदा ऐ गजानंद कहना मुझे।।
✍🏻 इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )03/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 2122 1212 22/ 112)
माँ तुझे मैं प्रणाम करता हूँ।
जिंदगी तेरे नाम करता हूँ।।
सींच अपना लहू मुझे पाला।
सज़दे में चारों धाम करता हूँ।।
कर्ज माँ दूध का चुका पाऊँ।
खुद को खुद में निज़ाम करता हूँ।।
क्या बुरा क्या भला बताया माँ।
राह सच थाम काम करता हूँ।।
ऐ गजानंद याद करके माँ।
छंद गाना कलाम करता हूँ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 08/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 221 1222 221 1222)
जो दर्द मिला उसको तक़दीर बनाया है।
कर याद ज़माने को तस्वीर बनाया है।।
मैं चाह नहीं रखता दे साथ जमाना भी।
ख़ुद हौसलें को मैंने जागीर बनाया है।।
मैं शीश कटा दूँगा जो आन पड़ी इज्जत।
वो गर्म लहू अपना तासीर बनाया है।।
रख बाज़ुओं में ताक़त मैं लाँघ दिया पर्वत।
मैं ख़्वाब नहीं सच में तामीर बनाया है।
मजदूर कहे मुझको मजबूर रखे सुख से।
क्यों मेरे लिए दुख का प्राचीर बनाया है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )08/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 221 2122 221 2122)
तुम साथ साथ चलना हर राह जिंदगी की।
हो साँस आस तुम ही हर चाह जिंदगी की।।
मेरी ग़ज़ल तराना तुम सात रंग सरगम।
तुम छंद गीत कविता हर भाव जिंदगी की।।
तुम शब्द वर्ण रचना लय ताल पाठ तुम हो।
मेरी कलम तुम्हीं हो हर स्याह जिंदगी की।।
बस एक तुम हकीकत हर ख़्वाब भी तुम्हीं हो।
उम्मीद तुम भरोसा परवाह जिंदगी की।।
तुम बाग हो चमन हो सब मानता गजानंद।
पतवार प्रेम दरिया तुम थाह जिंदगी की।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )12/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 221 1222 221 1222)
कुर्बान वफ़ा वास्ते अब प्यार नहीं मिलता।
जो साथ निभा पाये वो यार नहीं मिलता।।
है इल्म मुझे इतना सब छोड़ यही जाना।
जो रोक सके साँसे किरदार नहीं मिलता।।
वीरान गली दिखता सुनसान पड़ा आँगन।
मिल साथ रहे ऐसा परिवार नहीं मिलता।।
नित बाँट चलो खुशियाँ तुम दीन गरीबों में।
हो प्रेम जहाँ बिकता बाजार नहीं मिलता।।
कुछ लोग उजाड़े हैं विश्वास यहाँ पात्रे।
निःस्वार्थ ज़माने में व्यवहार नहीं मिलता।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 13/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
(बहर- 1222 1222 122)
चलो सच राह नेकी काम होगा।
करो तुम कर्म अच्छा नाम होगा।।
मरे ना लोग भूखा ध्यान रखना।
मदद तेरे कदम अविराम होगा।।
मिलेगा जब सहीं अधिकार सबको।
तभी खुशहाल यह आवाम होगा।।
लड़ेगा जोश भर वह बाजुओं में।
गरम जिनका लहू तन चाम होगा।।
क़लम में धार तुम रखना गजानंद।
सभी को मेरा यह पैगाम होगा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 14/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
बहर - 122, 122, 122
इबादत करो प्यार का तुम।
बनो यार दिलदार का तुम।।
दिनों दिन बिखर घर रहा है।
रखो ख्याल परिवार का तुम।।
रहे ना तमस अब दुखों का।
बनो दीप उजियार का तुम।।
हिफाज़त करो मान इज्जत।
लड़ो जंग अधिकार का तुम।।
नही कोई अपना गजानंद।
न कर फिक्र संसार का तुम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )15/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
बहर - 122 122 122
बहुत याद आने लगे हो।
मुझे तुम सताने लगे हो।।
बसे हो तुम्हीं साँस बनकर।
रगों में समाने लगे हो।।
तड़प मैं रहा था ग़मों से।
नबी बन हँसाने लगे हो।।
ग़ज़ल बन मुकम्मल वफ़ा की।
क़लम तुम सजाने लगे हो।
सुनो तोहफ़ा जिंदगी का।
गजानंद पाने लगे हो।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )16/05/2021
बहर- 122 122 122 122
नज़र में मुझे यूँ बसाये रखो तुम।
लबों पे हँसी को सजाये रखो तुम।।
जहन में कली बन खिले प्यार तेरा।
वफ़ा फूल दिल में खिलाये रखो तुम।।
कहानी तुम्हीं से शुरू जिंदगी की।
मुझे धड़कनों में समाये रखो तुम।।
मिटाना नहीं प्यार को ऐ ज़माना
हमें हीर राँझा बनाये रखो तुम।।
गजानंद तुझसे गुजारिश यही है।
शमा प्यार का यूँ जलाये रखो तुम।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )17/05/2021
(बहरे मुत़कारिब:मसम्मन सालिम) बहर- 122 122 122 122 तुझे भूल जाऊँ गँवारा नहीं है सिवा तेरे मेरा सहारा नहीं है बहा जा रहा हूँ तलाश-ए वफ़ा को मेरी कश्ती का अब किनारा नहीं है दिनों दिन कटा जा रहा पेड़ जंगल फ़िजा में सुहाना नज़ारा नहीं है लगा आस बैठा हूँ अच्छे दिनों का दग़ाबाज़ अब तक पुकारा नहीं है लगाया गला मुफ़लिसी में सभी को गजानंद पात्रे नकारा नहीं है ग़ज़लकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
*बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम*-
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन*
(1222 1222 1222 1222)
जिसे तुम धर्म कहते हो उसे मैं लूट कहता हूँ।
रखे जो बाँध लोगों को गुलामी खूँट कहता हूँ।।
बढ़ावा ढ़ोंग आडंबर जहाँ मंदिर दिखाई दे।
पुजारी और पंडो के लिए क्यों छूट कहता हूँ।।
जहाँ इंसानियत को बाँटते हैं धर्म अनुयायी।
उसे मैं आदमी में आदमी का फूट कहता हूँ।।
जिसे तुम दान कहते हो भला भगवान के दर पे।
उसे मैं दीन दुखियों के दुखों का घूँट कहता हूँ।।
सुनो पात्रे जहाँ पर ज़ुल्म को यूँ लोग सहते हैं।
उन्हें मैं भेड़ बकरी या मरुस्थल ऊँट कहता हूँ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )18/05/2021
*बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला*
मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन
(1212 212 122, 1212 212 122)
रहो सलामत दुआ करूँ मैं, बुरी नजर से खुदा बचाये।
जले शमा प्यार का सदा ही, चराग रोशन हवा बचाये।।
नहीं भरोसा रहा किसी पे, जमीर सबका मरा हुआ है।
वजूद इंसानियत भलाई, यहाँ नबी कोई आ बचाये।।
क़दम कहीं रूकना पड़े ना, चलो बढ़ाये सहीं दिशा में।
भला करो तुम दुखी जनों का, तुझे बला प्रभु सदा बचाये।।
ग़ुरूर किस बात का तुझे है, चले नहीं संग धन अटारी।
कफ़न सिवा कुछ नहीं मिलेगा, नहीं यहाँ कुछ क़ज़ा बचाये।।
वबा दमन का बढ़ा हुआ है, यहाँ दिनों दिन सुनो गजानंद।
सभी तरफ़ कोहराम दुख का, हबीब बन रहनुमा बचाये।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )21/05/2021
*बहरे कामिल मुसम्मन सालिम*
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
(11212 11212 11212 11212)
सदा इश्क़ में बहा अश्क़ है वफ़ा अब नसीब है तो कहाँ।
दवा ज़ख्म दे सके जो मुझे बता वो रक़ीब है तो कहाँ।।
लुटा सब दिया बचा कुछ नहीं मिला क्या सिला मुझे प्यार में।
सदा साथ खा लिया जो कसम खुदा वो हबीब है तो कहाँ।।
पता ही नहीं हुआ इश्क कब मिला चैन ना मुझे रात दिन।
दवा मर्ज कर दुआ साथ में पता कर तबीब है तो कहाँ।।
मिला मुफ़्त ताज अमीर का तुझे इसलिए तो ग़ुरूर है।
कभी झाँक लो गली गाँव की पता कर ग़रीब है तो कहाँ।।
लिखे गीत छंद वफ़ा ग़ज़ल बड़े शौक से सभी सत्यबोध।
रखे स्याह ज़ुल्म ख़िलाफ़ में बता अब अदीब है तो कहाँ।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) 22/05/2021
*बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़*
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
( *221 2121 1221 212*)
हम तो वफ़ा की चाह में बरबाद हो गए।
उस बेवफ़ा के प्यार से आजाद हो गए।।
अब्सार में बसा जिसे मैं पूजता रहा।
फिर क्यों भला नसीब से फरियाद हो गए।।
माना जिसे दुआ ख़ुदा की प्यार में सदा।
दे ज़ख्म ज़िंदगी वही जल्लाद हो गए।।
कोई यहाँ नहीं ख़ता को बख़्स दे जरा।
सब तो सजा दिलाने में उन्माद हो गए।
परवाह तो नहीं किसी को सत्यबोध का।
दे दर्द ग़म मुझे सभी उस्ताद हो गए।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )23/05/2021
*बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़*
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
(वज्न- 221 2121 1221 212) लड़ते लड़ाई मज़हबी इंसान हो गए खा धर्म के अफ़ीम को हैवान हो गए इज्ज़त बचाने बेटियों की आते क्यों नही लाचार अंध मूक क्यों भगवान हो गए बंदूक ताने थे खड़े जाबांज सीमा पर हँसते हुये वे देश पे बलिदान हो गए माता पिता को बाँट लिए भाई -भाई मिल खुदगर्ज़ कितने आज तो संतान हो गए बनना नमकहराम ना,खा देश का नमक पात्रे उतार कर्ज़ क़दरदान हो गए इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 03/08/2023
*बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ*
मुफ़ाइलुन फ़यलातुन मुफ़ाइलुन (फ़ेलुन)
(1212 1122 1212 22)
मिले सभी ग़मों का मैं हिसाब रखता हूँ।
पढ़ो मुझे खुला दिल की क़िताब रखता हूँ।।
मुझे हरा नहीं सकते कभी जहां वालों।
सभी सवाल का हाज़िर जवाब रखता हूँ।।
नशा निगाह में अंदाज़ कातिलाना है।
हँसी लबों पे क़यामत शबाब रखता हूँ।।
मेरी ख़ुशी के लिए जान भी लुटा देंगे।
हरेक दोस्त मैं तो लाज़वाब रखता हूँ।।
मिले सुगंध गजानंद से मुहब्बत की।
बहार इश्क़ में ख़िलता ग़ुलाब रखता हूँ।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )27/05/2021
बहरे रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122 2122
कौंन है जिसको जहां में गम नहीं है।
पर मेरा ग़म भी किसी से कम नहीं है।।
प्यार को मानों इबादत है ख़ुदा की।
दें मिटा हस्ती किसी में दम नहीं है।।
इस क़दर रोये बिछुड़ कर आज उससे।
बेवफ़ा की आँखे फिर भी नम नहीं है।।
हर घड़ी डसते मुझे आँसू तन्हाई।
जी सकूँ मैं चैन से आलम नहीं है।।
दर्द रख दिल में लगा जीने गजानंद।
ज़ख्म भर दे मेरी जो मलहम नहीं है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )28/05/2021
*बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
बह्र- (2212 2212)
स्वार्थी सभी इंसान हैं।
रखते कहाँ ईमान हैं।।
माता पिता मानों सदा।
जग में बड़े भगवान हैं।।
पड़ रूढ़िवादी ढ़ोंग में।
जन भूलते विज्ञान हैं।।
चमचागिरी करके सदा।
कुछ लोग लें सम्मान हैं।।
बेटी बहू इज्ज़त यहाँ।
नित लूटते शैतान हैं।।
नेता के भ्रष्टाचार से।
जनता दिखे हैरान हैं।।
पात्रे कहे सुन लो सभी।
गुरुजन गुणों की खान हैं।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )30/05/2021
*बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन*
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन
(2122 1122 22)
आदमी आदमी से जलता है।
रख वहम जिंदगी में चलता है।।
चमकते चाँद सितारे सुन लो।
सूर्य भी शाम लिए ढलता है।।
हाथ थामा नहीं दुख में जिसने
एक दिन हाथ वही मलता है।।
गर्भ नौ माह रखी माँ हमको।
गोद उनकी बड़ी शीतलता है।।
ए- गजानंद भुला ग़म जीना।
साथ ले चल हँसी चंचलता है।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ )06/05/2021
*ग़ज़ल- एक प्रयास*
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन
(बह्र- 2122 1212 22)
कल समझ कर मुझे भुला देना।
सब निशाँ प्यार का मिटा देना।।
मौत ही आखरी दवा मेरी।
हो सके आ के तुम पिला देना।।
है गुज़ारिश यही सनम तुमसे।
आग मेरी चिता लगा देना।।
मेरा कोई अगर पता पूछे।
कब्र की राह तुम बता देना।।
कह गजानंद अलविदा सबको।
जाते जाते ग़ज़ल सुना देना।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ)04/07/2021
ग़ज़ल- एक प्रयास-
*बहरे रजज़ मुसम्मन सालिम*
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन
(2212 2212 2212 2212)
आँसू बहा गम को छुपाऊँ मैं बहुत मजबूर हूँ।
कोई सहारा है नहीं अपनों से मैं तो दूर हूँ।।
बेदर्द दुनिया की कभी करता नहीं परवाह मैं।
होकर ज़माने से ख़ता मैं बन गया नासूर हूँ।।
तड़पे नहीं अब प्यार में कोई ज़ुदा हो इस क़दर।
मैं जोड़ दूँ बिछड़े दिलों को वो वफ़ा दस्तूर हूँ।।
चमचागिरी कर शोहरत मुझको कमाना है नहीं।
जागीर ज़िंदा इसलिए रहता सदा मगरूर हूँ।।
तकलीफ़ ही तकलीफ़ पात्रे इस जमाने से मिली।
मैं नफ़रतों की आग में जलता हुआ तंदूर हूँ।।
✍🏻ग़ज़लकार- इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छतीसगढ)25/07/2021
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
(1222 1222 122)
तिरंगा आन मेरा शान मेरा।
वतन के नाम जाँ कुर्बान मेरा।।
खड़े हैं वीर सीना तान शरहद।
बचाने देश हिंदुस्तान मेरा।।
करूँ मैं याद वीरों की शहादत।
जिसे मानूँ सदा अभिमान मेरा।।
जुबां पे गीत वंदे मातरम है।
रखें जग याद ये गुणगान मेरा।।
सिपाही हूँ कलम का मैं गजानंद।
यही छोटा सा है पहचान मेरा।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे 'सत्यबोध'
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 29/07/2021
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
(1222 1222 122)
शराफ़त सादगी का ये सिला है वफ़ा के राह में धोखा मिला है किसे अपना समझकर दर्द बाँटे यहाँ तो फूलों पर काँटे खिला है तमाशाबीन बनकर देखते सब चले जो साथ अपना काफ़िला है ग़लतफ़हमी लिए जीये पड़ा था चलेगा साथ घर बहुमंजिला है। यहाँ सब मतलबी है सुन गजानंद जरूरत पर मुकरना सिलसिला है इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
*बहरे हज़ज मुसद्दस महजूफ़*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
(1222 1222 122)
वफ़ा की राहों में चलने लगा हूँ ग़मों की आग में जलने लगा हूँ सितारे बन कभी मैं चमकता था नज़र किसकी लगी ढलने लगा हूँ मुझे मेरी शराफ़त की सजा दो यक़ी अपनों पे जो करने लगा हूँ लड़ाई है निवालों की यहाँ बस ग़रीबी हक लिये लड़ने लगा हूँ क़दम रखना ज़रा संभल गजानंद ज़माना मतलबी डरने लगा हूँ इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
*बहरे हज़ज मुसद्दस सालिम*
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
(बह्र- 1222 1222 1222)
हक़ीक़त से भला क्यों दूर रहते हो।
नशे में भक्ति की मजबूर रहते हो।।
बपौती मान ढोते आये हो पाखंड।
दिखावे में सदा मगरूर रहते हो।।
नचाते हैं मदारी धर्म का तुमको।
ग़ुलामी का बने लंगूर रहते हो।।
मलाई खा रहें चालाक शातिर लोग।
मगन फिर भी बने तंदूर रहते हो।।
दिलाने ढ़ोंग से आजाद नित पात्रे।
कलम स्याही भरे मशहूर रहते हो।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 15/10/2021
*बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़*
*फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन*
(बह्र *2122 1122 1122 22*)
ढ़ोंग पाखंड भरा आज जमाना यारों।
थाम सच राह यहाँ पाँव बढ़ाना यारों।।
धर्म ले आड़ सदा लूट मचाया किसने।
कौन वे धूर्त हैं मुझको भी बताना यारों।।
भेद करते हैं धरम-जात अलग है कहकर।
खून का रंग अलग हो तो दिखाना यारों।
मज़हबी लोग लड़ाते फिरे हैं आपस में।
एक है धर्म वतन पाठ पढ़ाना यारों।।
सुन गजानंद मिले कौंर निवाला सबको।
प्रेम का दीप सदा दिल में जलाना यारों।।
✍🏻इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर ( छत्तीसगढ़)15/10/2021
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हिंदी ग़ज़ल- माँ
(बहर- 2 2 , 2 2 , 2 2 , 2 2 )
फ़ेलुन , फ़ेलुन , फ़ेलुन , फ़ेलुन।
बहरे मुतदारिक़ मुसम्मन मख़्बून मक़्तूअ।।)
माँ ममता की परिभाषा है।
दुख में किरणें सुख आशा है।।
माँ ही मंदिर माँ ही मस्जिद
माँ चरणों में प्रभु वासा है।।
माँ ही धड़कन माँ ही जीवन।
माँ बिन निर्थक यह साँसा है।।
माँ पे कर दूँ सब कुछ सज़दा।
इस जीवन की अभिलाषा है।।
सिंचित कर दो इस बगिया को
पतझड़ में पात्रे प्यासा है।।
🖊️इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध"
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 8889747888
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हिन्दी ग़ज़ल-
(बहर- 2212 2212 2212 12)
बन रहनुमा मेरे मुझे बदनाम कर दिये। हिस्से मेरे शिक़वे गिले इल्जाम कर दिये। टूटे हुये दिल को तसल्ली कौन दे यहाँ। इस जिंदगी की भीड़ में गुमनाम कर दिये। ठोकर मिली हर राह पर क्यों बेवज़ह मुझे। मेरी वफ़ा चुपचाप क़त्लेआम कर दिये। पीता रहा जिसके लिये हर पल ग़मों ज़हर। पर बेवफ़ा का जाम मेरे नाम कर दिये। तुझको मिले वो हर ख़ुशी मेरे नसीब की। पात्रे सफ़र का अलविदा पैग़ाम कर दिये। ग़ज़लकार- इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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हिन्दी ग़ज़ल-
बहर- 2122 2122 2122 नफ़रतों की आग भड़काने लगे हैं ज़ुल्म अपनों पर ही क्यों ढाने लगे हैं लोग कहते थे जिसे अपना मसीहा वे सियासत जाम छलकाने लगे हैं कागज़ी वादे किये हैं इसलिए ही माँ क़सम ऊपर क़सम खाने लगे हैं सो रहे हैं देशवासी नींद गहरी हक़ तुम्हारे दूसरे खाने लगे हैं आँख पट्टी बाँध बैठे लोग पात्रे चाटुकारी गीत नित गाने लगे हैं इंजी. गजानंद पात्रे "सत्यबोध" बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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